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Thursday, November 12, 2009

रहीम सन्देश-गरीब पर कृपा करे वही है बड़ा आदमी (garib aur amir-rahin ke dohe)

जे गरीब पर हित करै, ते रहीम बड़लोग
कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग


कविवर रहीम कहते हैं जो छोटी और गरीब लोगों का कल्याण करें वही बडे लोग कहलाते हैं। कहाँ सुदामा गरीब थे पर भगवान् कृष्ण ने उनका कल्याण किया।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आपने देखा होगा कि आर्थिक, सामाजिक, कला, व्यापार और अन्य क्षेत्रों में जो भी प्रसिद्धि हासिल करता है वह छोटे और गरीब लोगों के कल्याण में जुटने की बात जरूर करता है। कई बडे-बडे कार्यक्रमों का आयोजन भी गरीब, बीमार और बेबस लोगों के लिए धन जुटाने के लिए कथित रूप से किये जाते हैं-उनसे गरीबों का भला कितना होता है सब जानते हैं पर ऐसे लोग जानते हैं कि जब तक गरीब और बेबस की सेवा करते नहीं देखेंगे तब तक बडे और प्रतिष्ठित नहीं कहलायेंगे इसलिए वह कथित सेवा से एक तरह से प्रमाण पत्र जुटाते हैं। मगर असलियत सब जानते हैं इसलिए मन से उनका कोई सम्मान नहीं करता।

जिन लोगों को इस इहलोक में आकर अपना मनुष्य जीवन सार्थक करना हैं उन्हें निष्काम भाव से अपने से छोटे और गरीब लोगों की सेवा करना चाहिऐ इससे अपना कर्तव्य पूरा करने की खुशी भी होगी और समाज में सम्मान भी बढेगा। झूठे दिखावे से कुछ नहीं होने वाला है।वैसे भी बड़े तथा अमीर लोगों को अपने छोटे और गरीब पर दया के लिये काम करते रहना चाहिये क्योंकि इससे समाज में समरसता का भाव बना रहता है। जब तक समाज का धनी तबका गरीब पर दया नहीं करेगा तब तक आपसी वैमनस्य कभी ख़त्म नहीं हो सकता है।


संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://terahdeep.blogspot.com

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Wednesday, March 04, 2009

रहीम संदेश: ह्रदय से काम करने पर सफलता निश्चित

रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय

कविवर रहीम के मतानुसार मन लगाकर कोई काम कर देखें तो कैसे सफलता मिलती है। अगर अच्छी नीयत से प्रयास किया जाये तो नर क्या नारायण को भी अपने बस में किया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-लोग बहुत जल्दी सफलता हासिल करना चाहते हैं। काम में मन कम उससे होने वाली उपलब्धि पर अधिक दृष्टि रखते हैं यही कारण है कि उनको सफलता नहीं मिलती। भक्ति हो या सांसरिक काम उसमें मन लगाकर ही आदमी कोई उपलब्धि प्राप्त कर सकता है। अधिकतर लोग अपना काम करते हुए केवल इस बात की चिंता करते हैं कि उससे उनको क्या मिलेगा? जो भक्ति करते हैं वह सोचते हैं कि भगवान बस तत्काल उनका काम बना दें। मन भक्ति में कम अपने काम में अधिक होता है। न उनको इससे भक्ति का लाभ होता है और न काम बनने की संभावना होती है। भक्ति में काम का भाव और जो काम है उससे करने की बजाय भगवान की भक्ति में लगने से दोनों में उनकी सफलता संदिग्ध हो जाती है और फिर ऐसा करने वाले लोग अपनी नाकामी का दोष दूसरों को देते हैं।

अगर मन लगाकर भक्ति या सांसरिक काम किया जाये तो उसमें सफलता मिलती है। आदमी क्या भगवान भी बस में किये जा सकते हैं।
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Saturday, February 28, 2009

रहीम संदेश: पति पत्नी का आराध्य देव एक ही होना चाहिए

पुरुष पूजै देवरा, तिय पूजे रघुनाथ
कहि रहीम दोउन बने, पड़ौ बैल के साथ

कविवर रहीम कहते हैं कि घर का पुरुष किसी दूसरे देवता की पूजा करता है या केवल कमाने में ही उसका मन लगता है और पत्नी भगवान श्रीराम को मानती है तो उनका साथ नहीं बन पाता। उनका यह साथ ऐसा ही जैसे बैल के साथ पड़ा चल रहा हो।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल की विषम परिस्थतियों में लोगोंें के घर तनाव का यह भी एक कारण है। वर्तमान भौतिक युग में कठिन होते जा रहे इस जीवन में जहां केवल कमाने का दायित्व पुरुष सदस्यों का है वहां ऐसे तनाव जरूर पैदा होता है। पुरुष तो रोज कमाने के चक्कर में घर से निकल जाते हैं और स्त्री समय निकालकर भगवान की पूजा करती हैं और सत्संग में जाती है। इसके अलावा पुरुषों के मन में यह भी होता है कि यह पूजा वगैरह तो केवल बुढ़ापे में करने का काम है और फिर अपने घर की स्त्री यह सब कर ही रही है तो उसका फल उसे मिलेगा तो हम भी लाभान्वित होंगे। इससे दोनों के बीच एक वैचारिक अंतर पैदा होता है जो दोनों के लिये तनाव का कारण बनता है। इसके अलावा कहीं पुरुष किसी तांत्रिक या सिद्ध के चक्कर में पड़े रहते हैंं पर स्त्री केवल भगवान का भजन करती है वहां यही संकट पैदा होता है। हर घर में स्त्री और पुरुष को एक ही देव की उपासना करना चाहिए। यहां यह बात याद रखना चाहिए कि जैसे देव या इष्ट की पूजा आदमी करता है वैसा ही गुण उसमें आता है। अगर किसी ऐसे देव की जीवंत भावना रखकर आराधना की जायेगी तो हमारा मन प्रफुल्लित हो उठेगा और अगर किसी देव में उसके स्वर्गीय होने का आभास होता है तो उसकी आराधना से हमारा मन भी निराशा और निष्कियता की ओर अग्रसर हो जायेगा और वैसा ही फल भी होता है। अतः स्त्री और पुरुष को एक ही देव को पूजना चाहिए।
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Friday, January 30, 2009

रहीम संदेश: ज्ञान और भक्ति के तेज से चेहरा चमकता है

उत्तम जाती ब्राह्मनी, देखत चित्त लुभाय
परम पाप पल में हरत, परसत वाके पाय


ज्ञानी मनुष्य की पहचान तो स्वतः ही उसके गुणों और लक्षणों से हो जाती है। ब्रह्मज्ञानी का चेहरा मात्र देखते ही आदमी का चित्त आनन्द विभोर हो उठता है। ऐसे ब्रह्मज्ञानी के दर्शन मात्र से पाप परे हो जाते हैं और उसके चरणों कें शीश झुकाने का मन करता है।
वर्तमान संदभ में संपादकीय व्याख्या-यह बिल्कुल सत्य बात है कि आदमी के चेहरे पर वही भाव स्वतः रहते हैं जो उसके मन में विद्यमान हैं। किसी प्रकार के ज्ञान और विज्ञान में श्रेष्ठता का भाव प्रदर्शन करना व्यर्थ है। आदमी के गुण स्वतः ही दूसरों के सामने प्रकट होते हैंं। दूसरे के अंदर अगर झांकना हो तो उसके चेहरे को पढ़ें। कई बार ऐसा होता है कि हम दूसरों के कहने में आकर किसी को श्रेष्ठ समझ बैठते हैं यह देखने का प्रयास ही नहीं करते कि उस व्यक्ति का आचरण कैसा है या उसमें वह गुण है भी कि नहीं जिसका बखान किया जा रहा है।

अनेक गुरु ऐसे हैं जो रटारटाया ज्ञान तो बताते हैं पर उनके चेहरे देखकर नहीं लगता कि वह कोई ब्रह्मज्ञानी हैं। योग साधना,ध्यान और धार्मिक ग्रंथों से चिंतन और मनन से ज्ञान प्राप्त होता है और जिसने वह धारण कर लिया उसका चेहरा स्वतः खिल उठता है और अगर नहीं खिला तो इसका आशय यह है कि मन में भी तेज नहीं है। इसलिये किसी के कहने में आकर कोई गुरु नहीं बनाना चाहिये। जिन लोगों में ज्ञान है तो उनका चेहरा ही बता देता है और उनका आचरण और व्यवहार उसे पुष्ट भी करता है। अतः ऐसे लोगों को ही अपना गुरु बनाना चाहिये। जिनके पास ज्ञान और भक्ति की शक्ति है उनके चेहरे पर तेज का भाव दिखाई देता है।
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Monday, January 26, 2009

रहीम संदेश: अवसर चूकने का कष्ट हमेशा रहता है

समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक
चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक

कविवर रहीम कहते हैं कि समय ही लाभ है तथा समय ही हानि भी है। चतुर लोग समय अवसर का लाभ उठा लेते हैं और अगर चूक जाते हैं तो उनके मन में त्रास हमेशा ही बना रहता है।

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात
सदा रहै नहीं एक सी, का रहीम पछतात


कविवर रहीम कहते हैं कि समय के अनुसार अपने निश्चित समय पर ही पेड़ पर फल लगता है और समय के अनुसार ही झड़ जाता है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसलिये कभी अपने बुरे समय को देखकर परेशान नहीं होना चाहिये।

वतंमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समय चक्र घूमता रहता है और मनुष्य की जीवन धारा भी उसी के अनुसार बहती जाती है। अपने जीवन से असंतुष्ट लोग अक्सर कहते हैं कि ‘मैंने अमुक की बात मान ली होती तो आज मैं कुछ और होता‘,या मैंने अमुक काम किया होता तो धनाढ्य होता‘। समय और सृष्टि का यह नियम होता है कि एक बार आदमी को इस संसार में उपलब्धि प्राप्त कराने के लिये अवसर अवश्य आता है बस उसे पहचान कर उसका उपयोग करने की बुद्धि होना चाहिए। कई लोग जो दूसरों की बुद्धि के अनुसार चलने के आदी हैं वह ऐसी शिकायतें करते हैं हमने अमुक की बात मानकर गलती की थी। यह सब अपनी गलतियां और बौद्धिक आलस्य की कमी छिपाने का बहाना है। जो लोग अपने कर्तव्य पथ पर चलने के लिये दृढ़संकल्पित होते हैं वह बिना किसी की परवाह किये चलते जाते हैंं और अपने लक्ष्य का चरम शिखर प्राप्त करते हैं।
समय का पहिया ऊपर नीचे घूमता है और राजा हो या रंक उसके लिये अच्छा बुरा समय आता रहता है। ज्ञानी लोग इस रहस्य को जानते हैं और इसलिये विचलित नहीं होते।
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Thursday, January 08, 2009

रहीम संदेश: आलोचकों की टिप्पणियों का जवाब न दें

कहते को कहिं जान दे, गुरू की सीख तू लेय
साकट जन और स्वान को, फेरि जवाब न देय


कविवर रहीम कहते है कि कहने वालों को कुछ भी कहने दो अपने गुरू की सीख लें और फिर अपने मार्ग पर चलें। अज्ञानी लोग और श्वान के भौंकने पर ध्यान न दें

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों का काम है कहना। सच तो यह है कि अपने जीवन में वह लोग कोई भी उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाते जो जो इस तरह कहने पर ध्यान देकर कोई कदम नहीं उठाते। अपने गुरू से चाहे वह आध्यात्मिक हो या सांसरिक ज्ञान देने वाला उसे शिक्षा ग्रहण कर अपने जीवन पथ पर बेखटके चल देना चाहिए। अगर उसके बाद अगर किसी के कहने पर ध्यान देते हैं तो अकारण व्यवधान पैदा होगा और अपने मार्ग पर चलने में विलंब करने से हानि भी हो सकती है। एक बात मान कर चलिए यहां ज्ञान बघारने वालों की कमी नहीं है। ऐसे लोग जिन्हें किसी भक्ति या सांसरिक क्षेत्र का खास ज्ञान नहीं होता वह खालीपीली अपनी सलाहें देते हैं और अपने अनुभव भी ऐसे बताते हैं जो उनके खुद नहीं बल्कि किसी अन्य व्यक्ति ने उनको सुनाये होते हैं।

इतना ही नहीं जब अपने मार्ग पर चलेंगे तो दस लोग टोकेंगे। आपके कार्यो की मीनमीेख निकालेंगे और तमाम तरह के भय दिखाऐंगे। इन सबकी परवाह मत करो और चलते जाओ। यही जीवन का नियम है। हम देख सकते हैं जो लोग अपने जीवन में सफल हुए हैं उन्होंने अन्य लोगों की क्या अपने लोगों भी परवाह नहीं की। जिन्होनें परवाह की ऐसे असंख्य लोगों को हम अपने आसपास देख सकते हैं।
दूसरों की आलोचना करने वाले लोग स्वयं ही कोई काम नहीं करना जानते। बड़े काम की बात तो छोडि़ये छोटे काम तक के उद्देश्य और प्रक्रिया का ज्ञान उनको नहीं होता। अगर कोई छोटा काम प्रारंभ किया जाये तो लोग अपनी प्रतिकूल टीका टिप्पणी से बाज नहीं आते ऐसे में अगर कोई बड़ा और महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभ किया जाये तो उस पर तो लोग अनावश्यक रूप से वैसे ही अंटसंट बोलते रहते हैं। ऐसे में अगर हमने कोई महत्वपूर्ण काम प्रारंभ किया है तो फिर लोगों की आलोचना की परवाह नहीं करना चाहिये क्योंकि केवल टीका टिप्पणियां करने वाले लोग स्वयं निष्क्रिय होते हैं या अपना समय व्यर्थ के कार्यों में नष्ट करते हैं।
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Monday, December 22, 2008

रहीम संदेश: अब इस बाग में घास के ढेर रह गए हैं

रहिमन अब वे बिरछ कहं जिनकी छांह गंभीर

बागन बिच बिच देखिअत, सेंहुड, कुंज करीर

कवीवर रहीम कहते हैं की अब इस संसार रुपी बाग़ में अब वह वृक्ष कहाँ है जो घनी छाया देते हैं। अब तो इस बगीचे में सेमल और घास फूस के ढेर या करील के वृक्ष ही दिखाई देते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हम कहते हैं कि ज़माना बहुत खराब हैं पर देखें तो यह केवल हमारा एक नजरिया है। इस कलियुग में तो झूठे और लघु चरित्र के लोगों का बोलबाला है। रहीम जी के समय तो फिर भी सात्विक भाव कुछ अधिक रहा होगा पर अब तो स्थिति बदतर है।

पहले तो लोग दान -पुण्यके द्वारा समाज के गरीब तबके पर दया करते थे और अन्य भी तमाम तरह की समाज सेवा करते थे। आपने देखा होगा कि अनेक धर्म स्थलों पर तीर्थ यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनीं हैं जो अनेक तरह के दानी सेठों और साहूकारों ने बनवाईं पर आज उन जगहों पर फाईव स्टारहोटल बन गए हैं। कहने का तात्पर्य अब वह लोग नहीं है जो समाज को अपने पैसे, पद और प्रतिष्ठा से छाया देते थे। अगर कुछ लोग दानवीर या दयालू बनने का दिखावा करते हैं तो उनके निज स्वार्थ होते हैं। ऐसे लोगों से सतर्क रहने की जरूरत है।


मूल बात यह है कि इस समय भारत में ही नहीं वरन् विश्व में अमीर और गरीब के बीच धन की उपलब्धता को लेकर खाई बढ़ रही है। सभी जगह गरीबों की स्थिति दिन ब दिन खराब होती जा रही है पर हमारा भारत देश जो कि दान और सत्संग की द्वारा समाज में सामाजिक समन्वय स्थापित करने के लिये जाना जाता था वहां भी लोग पाश्चात्य संस्कृति की राह पर चल पड़े हैं और यह मान लिया गया है कि गरीब और कमजोर का कल्याण करना सरकार का ही काम है। इस भावना से मुक्त होना होगा।

Thursday, December 18, 2008

रहीम सन्देश:किसी के कहने की फिक्र न कर अपनी राह चलें

कहते को कहिं जान दे, गुरू की सीख तू लेय
साकट जन और स्वान को, फेरि जवाब न देय


कविवर रहीम कहते है कि कहने वालों को कुछ भी कहने दो अपने गुरू की सीख लें और फिर अपने मार्ग पर चलें। अज्ञानी लोग और श्वान के भौंकने पर ध्यान न दें

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों का काम है कहना। सच तो यह है कि अपने जीवन में वह लोग कोई भी उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाते जो जो इस तरह कहने पर ध्यान देकर कोई कदम नहीं उठाते। अपने गुरू से चाहे वह आध्यात्मिक हो या सांसरिक ज्ञान देने वाला उसे शिक्षा ग्रहण कर अपने जीवन पथ पर बेखटके चल देना चाहिए। अगर उसके बाद अगर किसी के कहने पर ध्यान देते हैं तो अकारण व्यवधान पैदा होगा और अपने मार्ग पर चलने में विलंब करने से हानि भी हो सकती है। एक बात मान कर चलिए यहां ज्ञान बघारने वालों की कमी नहीं है। ऐसे लोग जिन्हें किसी भक्ति या सांसरिक क्षेत्र का खास ज्ञान नहीं होता वह खालीपीली अपनी सलाहें देते हैं और अपने अनुभव भी ऐसे बताते हैं जो उनके खुद नहीं बल्कि किसी अन्य व्यक्ति ने उनको सुनाये होते हैं।


इतना ही नहीं जब अपने माग पर चलेंगे तो दस लोग टोकेंगे। आपके कार्यो की मीनमीेख निकालेंगे और तमाम तरह के भय दिखाऐंगे। इन सबकी परवाह मत करो और चलते जाओ। यही जीवन का नियम है। हम देख सकते हैं जो लोग अपने जीवन में सफल हुए हैं उन्होंने अन्य लोगों की क्या अपने लोगों भी परवाह नहीं की। जिन्होनें परवाह की ऐसे असंख्य लोगों को हम अपने आसपास देख सकते हैं।
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Monday, December 15, 2008

रहीम सन्देश:प्रीति और प्रतिष्ठा में धीरे-धीरे होती है वृद्धि

रहिमन अति न कीजिए, गहि रहिए निज कानि
सैंजन अति फूलै तऊ, डार पात की हानि

कविवर रहीम कहते हैं कि कभी भी किसी कार्य और व्यवहार में अति न कीजिये। अपनी मर्यादा और सीमा में रहें। इधर उधर कूदने फांदने से कुछ नहीं मिलता बल्कि हानि की आशंका बलवती हो उठती है

यही रहीम निज संग लै, जनमत जगत न कोय
बैर प्रीति अभ्यास जस, होत होत ही होय


कविवर रहीम कहते हैं कि प्रीति, अभ्यास और प्रतिष्ठा में धीरे धीरे ही वृद्धि होती है। इनका क्रमिक विकास की अवधि दीर्घ होती है क्योंकि यह सभी आदमी जन्म के साथ नहीं ले आता। इन सभी का स्वरूप आदमी के व्यवहार, साधना और और आचरण के परिणाम के अनुसार उसके सामने आता है।
वर्त्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में उपलब्धि प्राप्त करने का कोई छोटा या संक्षिप्त मार्ग नहीं होता। दूसरों का वैभव देखकर कुछ लोग अपना संयम खोने लगते हैं और सोचते हैं कि वह तत्काल उनको प्राप्त हो जाए। अनेक लोगों को कड़े संघर्ष करते हुए ही धन और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। तब उनकी आयु भी बड़ी होती हैं पर युवा सोचते हैं कि वैसी ही प्रतिष्ठा और सुख तत्काल छोटे या संक्षिप्त मार्ग से प्राप्त हो जाए। जिन लोगों के माता पिता ही प्रतिष्ठित और धनवान हैं उन युवाओं के लिए यह संभव है पर जो छोटे और गर्गीब परिवारों के हैं उनके लिए तो यह संभव नहीं नहीं होता। अत: उनको संयम रखकर ही आगे बढ़ना चाहिये। संक्षिप्त और छोटे मार्ग के चक्कर में उन्हके जीवन में भटकाव भी आ सकता है।
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Thursday, December 11, 2008

रहीम के दोहे:प्रेम में जो त्याग न करे वह पशु समान

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत

ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछु न देत

कविवर रहीम कहते हैं कि बंसी की धुन पर रीझकर हिरन शिकार हो जाता है उसी तरह मनुष्य भी प्रेम के वशीभूत होकर अपना तन, मन और धन न्योछावर कर देता है लेकिन वह लोग पशु से भी बदतर हैं जो किसी से खुशी तो पाते हैं पर उसे देते कुछ नहीं है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-वैसे देखा जाये तो आज के युग भी यह सत्य है कि अधिकतर लोग मुफ्त में मजे करना चाहते हैं। किसी से बिना लिए-दिए काम करने में चतुराई समझी जाती है। कई सरल ह्रदय लोग प्रेमवश दूसरों का काम कर देते हैं तो उनको मूर्ख समझा जाता है। हालांकि चतुर लोग भी प्रेम में ही मूर्ख बनते हैं। आजकल आपने देखा होगा कि तमाम तरह के विज्ञापन आते हैं जिनमें बडे प्रेम से विनिवेश और अन्य लाभों के बारे में बताया जाता है और लोग उसके शिकार हो जाते हैं। अनेक पढी-लिखी लडकियां प्रेम में अपना सर्वस्व लुटा बैठतीं है और बाद में उनके पास पछताने का भी अवसर नहीं होता। हालात यह है कि अपने से बहुत अधिक आयु और अकमाऊ व्यक्ति के साथ घर से भाग कर विवाह कर अपना जीवन तबाह कर बैठतीं हैं।

कुछ लड़के भी ऐसे हैं जो सुन्दर और शिक्षित लडकी से प्रेम का ढोंग करते हैं पर विवाह के समय अपने परिवार वालों का वास्ता देकर नाता तोड़ लेते हैं। इतना ही नहीं कई माता-पिता भी लड़की के सुयोग्य होते हुए भी बिना दहेज़ के विवाह करने से इनकार कर देते हैं। कहते हैं कि हर माता-पिता अपने बच्चे से प्रेम करते हैं पर कई ऐसे लड़के हैं जो विवाह की आयु पार कर चुके हैं पर उनका दिल नहीं पसीजता कि उसका विवाह कम दहेज़ में कर दें। कुल मिलाकर प्रेम एक दिखावा हो गया है और कहा जाये तो अब मानव भेष में पशु होने लगे हैं। अत: समझदार लोगों को चाहिए कि अगर कोई उनको प्रसन्न करता है तो उसे भी कुछ दें तभी वह अपने इंसान होने की अनुभूति कर सकते हैं और यही ईश्वर भक्ति भी है।

Tuesday, December 09, 2008

रहीम सन्देश:गरीब का सच में भला करे वही है महान

जे गरीब पर हित करै, ते रहीम बड़लोग
कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग


कविवर रहीम कहते हैं जो छोटी और गरीब लोगों का कल्याण करें वही बडे लोग कहलाते हैं। कहाँ सुदामा गरीब थे पर भगवान् कृष्ण ने उनका कल्याण किया।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आपने देखा होगा कि आर्थिक, सामाजिक, कला, व्यापार और अन्य क्षेत्रों में जो भी प्रसिद्धि हासिल करता है वह छोटे और गरीब लोगों के कल्याण में जुटने की बात जरूर करता है। कई बडे-बडे कार्यक्रमों का आयोजन भी गरीब, बीमार और बेबस लोगों के लिए धन जुटाने के लिए कथित रूप से किये जाते हैं-उनसे गरीबों का भला कितना होता है सब जानते हैं पर ऐसे लोग जानते हैं कि जब तक गरीब और बेबस की सेवा करते नहीं देखेंगे तब तक बडे और प्रतिष्ठित नहीं कहलायेंगे इसलिए वह कथित सेवा से एक तरह से प्रमाण पत्र जुटाते हैं। मगर असलियत सब जानते हैं इसलिए मन से उनका कोई सम्मान नहीं करता।

जिन लोगों को इस इहलोक में आकर अपना मनुष्य जीवन सार्थक करना हैं उन्हें निष्काम भाव से अपने से छोटे और गरीब लोगों की सेवा करना चाहिऐ इससे अपना कर्तव्य पूरा करने की खुशी भी होगी और समाज में सम्मान भी बढेगा। झूठे दिखावे से कुछ नहीं होने वाला है।वैसे भी बड़े तथा अमीर लोगों को अपने छोटे और गरीब पर दया के लिये काम करते रहना चाहिये क्योंकि इससे समाज में समरसता का भाव बना रहता है।

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Sunday, December 07, 2008

रहीम के दोहे:प्रेम की दुर्गम राह पर हर कोई नहीं चल सकता

फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर
रहिमन सीधे चालसौं, प्यादा होत वजीर

कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम में कभी भी टेढ़ी चाल नहीं चली जाती। जिस तरह शतरंज के खेल में पैदल सीधी चलकर वजीर बन जाता है वैसे ही अगर किसी व्यक्ति से सीधा और सरल व्यवहार किया जाये तो उसका दिल जीता जा सकता है।

प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं
रहिमन मैन-तुरगि बढि, चलियो पावक माहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम का मार्ग ऐसा दुर्गम हे कि सब लोग इस पर नहीं चल सकते। इसमें वासना के घोड़े पर सवाल होकर आग के बीच से गुजरना होता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-आजकल जिस तरह सब जगह प्रेम का गुणगान होता है वह केवल बाजार की ही देन है जो युवक-युवतियों को आकर्षित करने तक ही केंद्रित है। उसे प्रेम में केवल वासना है और कुछ नहीं है। सच्चा प्रेम किसी से कुछ मांगता नहीं है बल्कि उसमें त्याग किया जाता है। सच्चे प्रेम पर चलना हर किसी के बस की बात नहीं है। प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण हो तो वह प्रेम कहां रह जाता है। सच तो यह है कि लोग प्रेम का दिखावा करते हैं पर उनके मन में लालच और लोभ भरा रहता है। लोग दूसरे का प्यार पाने के लिये चालाकियां करते हैं जो कि एक धोखा होता है।
सच बात तो यह है कि लोग प्रेम करने की बात तो करते हैं पर उसका उनके हृदय मेंं कोई स्थान नहीं होता। वैसे तो आपस में दोस्ती और रिश्तेदारी होने से लोग एक दूसरे के संपर्क में रहते हुए प्रेम होने का दावा करते हैं पर जब एक दूसरे से स्वार्थ पूरा नहीं होता तो फिर उन्हीं संबंधों में कटुता आ जाती है। प्रेम में किसी से आशा नहीं करना चहिये पर लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये किसी का ऐसी चालें चलते हैं कि कोई उनके प्रेमजाल में फंस जाये। आज की युवा पीढ़ी तो प्रेम का नारा लगाते नहीं थकती और चालाकियों से संपर्क बनाने का कोई उपाय नहीं छोड़ती।

अनेक कथित और गुरु प्रेम को लेकर तमाम तरह की बातें करते हैं पर वह स्वयं नहीं जानते कि वह होता क्या बला है? ऐसे कथित अध्यात्मिक गुरू बस अपने से ही प्रेम करते हैं और अपने शिष्यों के साथ उनका प्रेम एक तरह से ढोंग ही होता है।
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Saturday, December 06, 2008

रहीम सन्देश:किसी की परवाह न कर अपनी राह चलें

कहते को कहिं जान दे, गुरू की सीख तू लेय
साकट जन और स्वान को, फेरि जवाब न देय


कविवर रहीम कहते है कि कहने वालों को कुछ भी कहने दो अपने गुरू की सीख लें और फिर अपने मार्ग पर चलें। अज्ञानी लोग और श्वान के भौंकने पर ध्यान न दें

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों का काम है कहना। सच तो यह है कि अपने जीवन में वह लोग कोई भी उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाते जो जो इस तरह कहने पर ध्यान देकर कोई कदम नहीं उठाते। अपने गुरू से चाहे वह आध्यात्मिक हो या सांसरिक ज्ञान देने वाला उसे शिक्षा ग्रहण कर अपने जीवन पथ पर बेखटके चल देना चाहिए। अगर उसके बाद अगर किसी के कहने पर ध्यान देते हैं तो अकारण व्यवधान पैदा होगा और अपने मार्ग पर चलने में विलंब करने से हानि भी हो सकती है। एक बात मान कर चलिए यहां ज्ञान बघारने वालों की कमी नहीं है। ऐसे लोग जिन्हें किसी भक्ति या सांसरिक क्षेत्र का खास ज्ञान नहीं होता वह खालीपीली अपनी सलाहें देते हैं और अपने अनुभव भी ऐसे बताते हैं जो उनके खुद नहीं बल्कि किसी अन्य व्यक्ति ने उनको सुनाये होते हैं।


इतना ही नहीं जब अपने मार्ग पर चलेंगे तो दस लोग टोकेंगे। आपके कार्यो की मीनमीेख निकालेंगे और तमाम तरह के भय दिखाऐंगे। इन सबकी परवाह मत करो और चलते जाओ। यही जीवन का नियम है। हम देख सकते हैं जो लोग अपने जीवन में सफल हुए हैं उन्होंने अन्य लोगों की क्या अपने लोगों भी परवाह नहीं की। जिन्होनें परवाह की ऐसे असंख्य लोगों को हम अपने आसपास देख सकते हैं।

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Sunday, October 05, 2008

रहीम सन्देश:इस शरीर में होती हैं सहने की अपार क्षमता

जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह

कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर किसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।

मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया?

इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।
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