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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Friday, December 02, 2016

राजसी विषयों के निष्पादन में सात्विक नीति नहीं चलती-नोटबंदी पर विशेष हिन्दीलेख (Satwik policy Not may Be apply for Rajsi karma-Hindi Editorial on demonetisation)


जब नोटबंदी का अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक ने समर्थन किया तो हमें आश्चर्य हुआ। इस मामले में जनवादियों से ऐसे तर्कों की उम्मीद कर रहे थे जिनमें तीसरा पक्ष होता। जनहित के विषयों मेें हमारा कुछ विषयों पर राष्ट्रवादियों तो कुछ पर जनवादियों से विचार मिलता है। हमारा विचार तो प्रगतिशीलों से भी मिलता है पर मूल रूप से हम भारतीय विचारवादी हैं जिसके संदर्भ ग्रंथों में अध्यात्मिक तथा सांसरिक विषयों पर स्पष्ट, सुविचारित तथा वैज्ञानिक व्याख्यान मिलते हैं। इन्हीं के अध्ययन से हमने यह निष्कर्ष निकाला है कि भारत के लिये न केवल अध्यात्मिक वरन् सांसरिक विषयों में भी जापान, अमेरिका, चीन या ब्रिटेन में से किसी एक या फिर आधा इधर से आधा उधर से विचार उधार लेकर राजकीय ढांचा बनाना एक बेकार प्रयास है। यहीं से हम प्रत्यक्ष अकेले पड़ जाते हैं पर हम जैसे सोचने वाले बहुत हैं-पर कोई एक मंच नहीं बन पाया जिसकी वजह से सब अकेले अकेले जूझते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक के समर्थन के बाद जनवादियों के लिये नोटबंदी के विरुद्ध चिंत्तन करने का रास्ता खुल गया था पर उन्होंने निराश किया। उनकी मुश्किल यह रही कि उनके आदर्शपुरुषों चीन के राष्ट्रपति शीजिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी भारत की नोटबंदी का समर्थन कर दिया इस कारण उन्हें अपना चिंत्तन बंद कर दिया और जनता की तात्कालिक समस्याओं को ही मुद्दा बनाकर विरोध करने लगे। भारतीयवादी-कृपया इसे स्वदेशी न कहें-होने के कारण अंतर्जाल पर हमारा कोई समूह नहीं है मगर करीब करीब सभी समूहों के विद्वान हमसे जुड़े हैं। भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर हमने जो आठ बरस पहले बातें लिखीं वह आज कही जा रही हैं। हमारे एक अंतर्जालीय मित्र ने हमसे कहा था कि आपके अंतर्जाल पर मित्र कम रहेेंगे पर आपको पढ़ने वाले बौद्धिक जरूर होंगे और आपके विचारों का अनुकरण इस तरह करेंगे कि आपको पता ही नहीं चलेगा। आतंकवाद पर सबसे पहले हमने लिखा था कि यह एक व्यापार है और यही आज सभी लोग कह रहे हैं। भ्रष्टाचार से देशभक्ति पर खतरे का प्रश्न हमने उठाया था जिसका बाद में अनेक लोगों ने अपने नाम से प्रचार करते हुए उठाया। आज नोटबंदी के दौर में ऐसे कई प्रश्न हमारे दिमाग में आ रहे हैं जिनका उत्तर मांगना है पर हमारी बात अपनी जगह तक पहुंचेगी उसमें समय लगेगा। हम जिन खतरों को अनुभव कर रहे हैं जनवादी उन्हें क्यों नहीं अनुभव कर रहे हैं? यह प्रश्न भी आता है।
नोटबंदी के बाद ऐसा कोई दिन नही रहा है जब एटीएम की लाईन में हम न लगे हों। एक दिन बैंक की लाईन में भी जाकर देखा। सभी दिन पैसा नहीं निकाला क्योंकि हमारा मुख्य लक्ष्य इन पंक्तियों में खड़े होकर उस जनमानस को देखना था जो बाद में एक समाज बन जाता है। हमें उनकी तात्कालिक मुद्रा की आवश्यकता नहीं देखनी थी क्योंकि वहां हर आदमी इसी कारण आया था। हमें देखना था कि आखिर उसकी मानसिकता क्या है? वह इस समस्या स जूझने बाद कौनसे परिणाम की कल्पना कर रहा है? यह भी बता दें कि हमने सड़कों पर ऐसे भी लोग देखे जिनको नोटबंदी की परवाह नहीं थी। उससे बात कर कोई निष्कर्ष नहीं निकलना था। सभी लोग इस पर खुश थे। हमें तो उन पंक्तियों में अपने लिये चिंत्तन सामग्री ढूंढनी थी। अखबार और टीवी के समाचार भी पढ़े और देखे पर हमें त्वरित समस्याओं से ज्यादा भविष्य की तरफ देखना है। हम इस दौरान प्रश्नों का उत्तर नहीं ढूंढ रहे थे क्योंकि वह तो समय देगा पर कुछ चेतावनियों का अनुभव हुआ और वह बहुत डरावनी लगी रहीं हैं।
हम भारतीय हैं। हमें विश्वगुरु कहा जाता है। यह पदवी केवल पूजा पाठ की वजह से नहीं वरन् एक ज्ञान विज्ञान से परिपूर्ण जीवन शैली के कारण मिली है। हमारे पास अपना अर्थशास्त्र है तब जापान, चीन, अमेरिका और ब्रिटेन के यशस्वी विचाराकों के सिद्धांतों को उधार लाने की जरूरत क्यों हैं? हम विकास का वह स्वरूप क्यों चाहते हैं जो जापान या चीन का है? जब हम चीन, जापान, अमेरिका या ब्रिटेन की तरह बनना चाहते हैं तो हमें यह भी क्या यह नहीं देखना चाहिये कि हमारा राज्य प्रबंध तथा समाज कैसा है? मूल बात यह कि हमारे देश के नागरिक क्या चाहते हैं?
नोटबंदी कर नागरिकों को सुखद भविष्य का सपना दिखाया गया है। सब जानते हैं कि इसके आगे भी काम किये बिना सार्थक परिणाम प्राप्त नहीं होगा। कहा गया कि आतंकवादियों के पास धन की कमी हो जायेगी। जिस तरह हमारे देश में भ्रष्टाचार है उसके चलते यह संभव नहीं लगता। जब मुद्रा वितरण से जुड़े लोगों पर ही काला धन सफेद करने को आरोप लग जायें तब क्या उनसे यह आशा कर सकते हैं कि वह आतंकवादियों को वही सुविधा नहीं देंगे? कश्मीर में कुछ दिन आतंक थमा रहा पर आतंकियो पास जब दो हजार के नोट पहुंच गये तो फिर वही क्रम शुरु हो गया है। नोटबंदी के बाद पंजाब में भी एक जेल टूट गयी जिसमें भ्रष्टाचार एक हथियार बना। मतलब आतंक और भ्रष्टाचार पर नकेल का दावा तो तात्कालिक रूप से निष्फल हो गया। अब जनमानस जैसे ही अपनी समस्या से निजता पायेगा तो वह सवाल करेगा। वह इधर उधर देखेगा। जब सब पूर्ववत मिलेगा तो उसके अंदर एक भारी निराशा पैदा होगी। यही निराशा क्रोध का रूप भी लेगी। उसके पास करने के लिये ज्यादा कुछ नहीं पर समय आने पर वह अपने मत से सब बता देगा। संभव है कि लोकप्रियता के शिखर पर जो लोग हैें उन्हें खलनायक करार दिया जाये। नोटबंदी के बाद कर्णधारों के पास पीछे लौटने का अवसर नहीं है और उन्हें आगे बढ़कर अपनी प्रहारशक्ति दिखानी होगी। खड़े या यहीं बैठे रहने का भी अवसर अब निकल गया है।
सबका साथ सबका विकास का नारा अच्छा है पर याद यह भी रखें कि जो साथ दें उनका ही विकास हो-जिन्हें नहीं चाहिये उन्हें दूध में मक्खी की तरह अपने पास से हटा दें। यह राजसी नीति है इसमें सात्विक सिद्धांतों को कोई मतलब नहीं है।
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नोट-इसी ब्लॉग पर नोटबंदी पर आगे भी लेख आयेंगे।


Saturday, November 26, 2016

कास्त्रो की मौत से क्यूबा आजादी की सांस ले पायेगा या नहीं-हिन्दी संपादकीय (Cuba May be Possible Freedom of Espression After Death of FidelCastro

                      क्यूबा का तानाशाह फिदेल कास्त्रो स्वर्ग सिधार गया।  हमारी दृष्टि से वह दुनियां का ऐसा तानाशाह रहा जिसने सबसे लंबी अवधि तक राज्य किया। वामपंथी विचाराधारा का प्रवाह ऐसे ही लोगों की वजह से हुआ है जो यह मानते हैं कि दुनियां के हर आदमी की जरूरत केवल रोटी होती है-कला, साहित्य, फिल्म और पत्रकारिता में स्वतंत्रता की अभियक्ति तो ऐसे तानाशाह कभी नहीं स्वीकारते।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि मनुष्य तथा पशु पक्षियों की इंद्रियों में उपभोग की प्रवृत्ति जैसी होती हैं, अंतर केवल बुद्धि का रहता है जिस कारण मनुष्य एक पशु पक्षी की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक रूप से संसार में सक्रिय रहता है।  वामपंथी मानते हैं कि मनुष्य की इकलौती जरूरत रोटी होती है उसे वह मिल जाये तो वही ठीक बाकी बाद की बात उसे सोचना नहंी चाहिये वह तो केवल राज्य प्रबंध का काम है। इसके बाद वामपंथी शीर्ष पुरुष सारे बड़े पद हड़प कर प्रजा को बंधुआ बना लेते हैं।
वामपंथी तानाशाह मनुष्य को पशु पक्षियों की तरह केवल रोटी तक ही सीमित देखना चाहते हैं। वाणी की अभिव्यक्ति प्रतिकूल होने पर वह किसी की हत्या भी करवा देते हैं।  कास्त्रो एक खूंखार व्यक्ति माना जाता था।  हमारे  देश के वामपंथी विचाराकों का वह आदर्श है।  यह अलग बात है कि उसके मरने के बाद अपने ही देश के लोगों पर किये गये अनाचार की कथायें जब सामने आयेंगी तब वह उसे दुष्प्रचार कहेंगे। कास़्त्रों ने क्यूबा को एक जेल बनाकर रखा था। उसके राज्यप्रबंध की नाकामियों से ऊबे लाखों शरणार्थी अमेरिका जाते रहे हैं।  हम उम्मीद करते हैं कि कास्त्रो की मौत के बाद क्यूबा एक ताजी आजादी की सांस ले सकेगा।
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Thursday, November 24, 2016

एटीएम अपडेट होने पर नोटबंदी से पैदा मंदी खत्म हो जायेगी-हिन्दी संपादकीय (bazar woulld Standup After ATM UpDate-HindiEditorial)

                            जरूरतें समाप्त नहीं होने वालीं और वह व्यापार चलाती हैं।  जितनी इस समय मंदी है उतनी ही कुछ समय बाद तेजी आयेगी। वैसे पैसा वही लोग रोक रहे हैं जिन्हें सौ रुपये एटीएम से मिले हैं। जब सभी एटीएम अपडेट हो जायेंगे और उसमं से पांच सौ और दो हजार के नोट निकलेंगे तब झख मारकर लोग खर्च करेंगे।  कुछ लोगों ने हमारे साथ बातचीत में माना कि हां पांच सौ और दोहजार रुपये के नोट निकल रहे हैं उन पर भीड़ शहर के मुख्य स्थानों  के एटीमों से ज्यादा हैं-वहां के एटीएम अपडेट हो गये हैं। वह पांच सौ और दो हजार के नोट निकल रहे हैं। हमारा अनुमान है कि एक दिसम्बर के बाद बाज़ार में रुपया तेजी से आयेगा और पुरानी मंदी की भरपाई करते हुए तेजी आयेगी।
                नोटबंदी पर उत्पात की संभावना त्वरित रूप से थी जो खत्म हो गयी है। अब अगर कहीं होता है तो वह कालेधन वालों से प्रायोजित व उनके उनके बौद्धिकों से प्रेरित माना जा सकता है। हमने अपने शहर का दौरा  किया। बाहर रहने वाले मित्रों से बात की।  परेशानी है पर कहीं खर्च का संकट नहीं है। आज सरकार ने पता नहीं कौनसा दाव खेला कि लाईने बीस फीसदी रह गयी।  शायद यह अपने ही बैंक में नोट बदलने तक सीमित रखने  या केवल वरिष्ठ नागरिकों को नोट बदलने की सुविधा देने के निर्णय का परिणाम था कि लाईन एकदम कम हो गयी इसका पता नहीं। एटीएम पर अधिकतर लोग ऐसे मिले जो पहले निकाल चुके थे। इनमें तो कुछ ऐसे थे जो आज ही पहले से कहीं निकलवाकर आ गये तो उनका एटीएक कार्ड काम नहीं कर रहा था।  लोगों में न उत्साह है न उकताहट।  ऐसे में एक बासी हो चुके फैसले पर किसी कठोर प्रतिक्रिया की संभावना नहीं है। 
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Wednesday, November 23, 2016

कौटिल्य और चाणक्य के ज्ञान बिना अर्थशास्त्र-लघु हिन्दी व्यंग्य (What Econmics without Kautilya and chanakya-Hindi Short Satire


                          देश के कुछ बड़े अर्थशास्त्री यह सोचकर परेशान है कि नोटबंदी जैसा बड़ा फैसला उनसे पूछे बगैर ले लिया।  वैसेे हमारे देश में अनेक लोग अर्थशास्त्र पढ़ते हैं पर जिनको कोई बड़ा ओहदा मिलता है तो उनको ही अर्थशास्त्री की पदवी  संगठित प्रचार माध्यम देते हैं। जैसे हम हैं। वाणिज्य स्नातक की उपाधि प्राप्त करने में हमें अर्थशास्त्र से दो चार होना पड़ा था।  लेखक होने के नाते हमें अर्थशास्त्री  मानना चाहिये पर कोई बड़ा पद नहीं मिला तो कोई मानना तो दूर हमारी कोई बात सुनता भी नहीं।  नोटबंदी हमने खूब अंतर्जाल पर लिखा पर कहीं कोई संदेश हिट नहीं हो पाया।  वजह साफ है कि कोई बड़ा पद नहीं मिला जिससे लोग हमको गूगल पर ढूंढते। 
               अब कहना तो नहीं चाहते पर सच यह है कि भारत में इतने पढ़ेलिखे अर्थशास्त्री हुए पर कुछ नहीं कर पाये। देश में गरीबी, भ्रष्टाचार और बेईमानी बढ़ती रही। आधारगत ढांचा-बिजली, पानी और आवागमन के लिये सड़कें पूरी तरह से बनी नहीं। बहुत पहले इस पर राजनीतिक चर्चाओं में मशगूल रहने वाले  एक चायवाले ने हमसे कहा था कि ‘ऐसे पढ़े लिखे अर्थशास्त्रियों से हम अच्छे हैं जो बड़े पदों पर बैठकर भी देश की असली समस्याओं का निराकरण नही कर पा रहे। मुझे बिठा दो पूरे देश का उद्धार कर दूं।’
          वह चायवाला इतनी अच्छी चाय बनाता था कि नगर निगम और जिला कार्यालय के अधिकारी तक उसके यहां चाय पीने आते थे। यह अलग बात है कि अतिक्रमण विरोधी अभियान के चलते उसकी गुमटी उठाकर फैंक दी गयी तब उसने दूसरी जगह जाकर लस्सी की दुकान खोली।  हमने हमेशा उसे प्रसन्नचित्त देखा। वह लस्सी के व्यापार में भी हिट रहा। उसकी राजनीति टिप्पणियों से हम सदा प्रभावित रहे।  उसके व्यवहार से हमने सीखा था कि जागरुक तथा विद्वान  होने के लिये पढ़ालिखा होना जरूरी नहीं है।  जो अपना व्यापार चला ले वह देश को भी चला सकता है। यहां यह भी स्पष्ट कर दें कि नोटबंदी के विरोधी भी केवल गरीबों, किसानों और मजदूरों की परेशानी की आड़ लेकर जूझ रहे हैं।  यहां तक कि जनवादी भी अपना पुराना रोना रो रहे हैं। विरोध में कहने के लिये उनसे ज्यादा तो हमारे पास ज्यादा भारी भरकम तर्क हैं पर हम इंतजार कर रहे हैं कि आखिर यह नोटबंदी देश में किस तरह का परिणाम देती है।
                  वैसे भी अपने यहां कौटिल्य तथा चाणक्य जैसे अर्थशास्त्री हुए है। यकीन मानिये उनमें से किसी ने एडमस्मिथ और माल्थस को नहीं पढ़ा था जिसे पढ़कर आज के अर्थशास्त्री अपने श्रेष्ठ होने का दावा करते हैं। वैसे हम स्वयं को संपूर्ण अर्थशास्त्री मानते हैं क्योंकि हमने एडमस्मिथ, माल्थस के साथ कौटिल्य तथा चाणक्य का अर्थशास्त्री भी पढ़ा है। हमारा मानना है कि देशी अर्थशास्त्र समझने वाला ही देश का भला कर सकता है और वह कोई मजदूर भी हो सकता है और कारीगर भी।

Thursday, November 03, 2016

आत्महत्या करने वाला कभी समाज नायक नहीं होता-हिन्दीेलेख (Suicider not be Hero For Society-Hindi Article)

                   एक पूर्व सैनिक ने वन रैंक वन पैंशन को लेकर आत्महत्या कर ली।  इसको लेकर देश में तमाम तरह का  विवाद चल रहा है। हमारा मानना है कि चाहे कुछ भी इस विषय को  सरकार के विरुद्ध आंदोलन से जोड़ना गलत है क्योंकि इसके पीछे घरेलू, सामाजिक तथा आर्थिक कारण अधिक जिम्मेदार हैं जिसकी चर्चा पुरुष बहुत कम लोग करते हैं-इस भय से कि उनके बेकार या कमाऊ न मान लिया जाये। हमने अपने सेवानिवृत्त साथियों से चर्चा की। उन्होंने एक पैंशनधारी के अधिक राशि की मांग लेकर आत्महत्या के प्रकरण को वैसा मानने के लिये तैयार नहीं है जैसा कि बताया जा रहा है।  सबसे बड़ी बात आप सेना की छह वर्ष क नौकरी पर जिंदगी पर इतना निर्भर नहीं रह सकते जितना सोचते हैं।  यहां पैंतीस से चालीस वर्ष नौकरी करने वाले भी हैं वह जानते हैं कि सभी को एक जैसी पैंशन इसलिये भी नहीं मिल सकती है क्योंकि नौकरी की अवधि अब मायने नहीं रखती पर अंतिम वेतन का महत्व भी नकारा नहीं जा सकता।  पांच वर्ष पूर्व नौकरी छोड़ने वाला आज नौकरी छोड़ने वाले जितनी पैंशन नहीं पा सकता-प्रोत्साहन के रूप में कुछ रकम बढ़ायी जाये यह बात अलग है। एक अन्य फेसबुक पर हमारे सेवानिवृत साथियों ने आत्महत्या करने वाले पैंशनधारी का समर्थन करने से इंकार तक किया है।
                  वर्तमान सरकार पर जवानों या कर्मचारियों के प्रति उदासीनता का आरोप लगाना गलत है।  पिछली सरकारों ने वेतन आयोग की सिफारिशें लागू कर अच्छा एरियर इसलिये दिया क्योंकि वह देर से लागू की गयीं-उसमें भी पुराने भत्तों का एरियर नहीं दिया गया था। इस सरकार ने तत्काल वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू की इसलिये एरियर अधिक नहीं दिया। भत्तों पर विवाद की वजह से अभी पुराने वेतनमान से दिया जा रहा है और जल्दीउसका निर्णय भी हो जायेगा।  ठीक है भत्ते कुछ देर से मिलेंगे पर उनका एरियर भी तो मिलेगा।  जबकि पहले नहीं मिलते थे।  पैंशन से पूरा घर नहीं संभल सकता पर पति पत्नी तो सहजता से पल जाते हैं-यही पैंशन देने का मकसद है।  इससे आगे की जिम्मेदारी सरकार पर डालना गलती है।  किसी की पैंशन इतनी कम नही है कि वह आत्महत्या करे ओर सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाये।
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Sunday, October 16, 2016

भारत को अपनी हिन्दू छवि के साथ आगे बढ़ना होगा-हिन्दी लेख (India Should Go ahead with his Hindu Imege-HindiArticle & Editorial)


अमेरिका में राष्ट्रपति के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि ‘मैं हिन्दू तथा भारत का प्रशंसक हूं।’ विश्व के किसी बड़े विदेशी नेता ने ‘हिन्दू’ शब्द से प्रेम का जो प्रदर्शन किया है उससे अनेक लोगों की छाती पार सांप लौट जायेगा। वैसे आज तक हमने किसी भारतीय नेता के मुख से नहीं सुना कि वह हिन्दू धर्म का प्रशंसक है इसलिये डोनाल्ड ट्रम्प के बयान ने चौंका दिया-हालांकि वह सीधे अरेबिक विरोधी छवि के माने जाते हैं इसलिये हिन्दू धर्म की प्रशंसा का यही अर्थ है कि वह मानकर चल रहे हैं कि दोनों की विचाराधारा में कहीं न कहीं संघर्ष है। भारत में अन्य की तो छोड़िये हिन्दू धर्म की रक्षा का दावा करने वाले राष्ट्रवादी भी यह सच कहने से संकोच करते हैं।
अब हम पाकिस्तान की चर्चा करें। पाकिस्तान के टीवी चैनलों पर चर्च सुने तो वहां विद्वान स्पष्टतः हिन्दू धर्म के प्रति घृणा व्यक्त करते हैं। अगर हम उनकी तर्कों का विश्लेषण करें तो यह साफ हो जाता है कि भारत के हिन्दू बाहुल्य रहते कभी मित्रता तो हो ही नहीं सकती। पाकिस्तान आतंकवादी देश है कहकर हम बच निकलते हैं पर सच यह है कि वह हिन्दू विरोधी विचार का संवाहक है। वह आतंकवाद को संरक्षण इसलिये देता है कि हिन्दू बाहूल्य भारत को तबाह किया जा सके। भारत के नेता यह सच बताने में डरते हैं कि पाकिस्तान भारत के साथ हिन्दू धर्म का भी बैरी है। वह कश्मीर पर कब्जा इसलिये करना चाहता है कि वहां हिन्दू जनसंख्या कम है-इतना ही नहीं आतंकवाद के प्रवाह के चलते वहां से पंडितों का सामूहिक पलायन भी हुआ। हैरानी इस बात की कि आज भी हिन्दूत्व के रक्षक पंडितों की वापसी के बिना कश्मीर समस्या के हल की बात नहीं कह पाते।
हमारा मानना है कि वह हिन्दू हिन्दू कहकर अमारे पीछे पड़ा है तो फिर हम क्यों पंथनिरपेक्षता की दुहाई देकर अपना मुंह छिपाते हैं। अगर पाकिस्तान का नाम विश्व के पटल से मिटाना है तो हमें भी हिन्दू की तरह दृढ़ता से योद्धा बनकर उसे न केवल अस्त्र शस्त्र वरन् शास्त्र के ज्ञान से उसके सामने खड़ा होगा। इतना ही नहीं चीन को भी यह समझाना होगा कि बौद्ध बाहुल्य होने के कारण हम उसके प्रति सद्भाव रखते हैं-यह तभी संभव है जब हम हिन्दू छवि के साथ उसके साथ व्यवहार करें।
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एक सच्चा हिन्दू वैश्विकवादी होता है जो भक्ति भाव से समाज के लिये निष्काम भाव से काम करता है। वह संकीर्ण विचार का नहीं होता। हिन्दू हमेशा ही अपने जीवन में संघर्ष तथा समाज के लिये कल्याण के लिये तत्पर रहता है। वह स्त्री-पुरुष का भेद नहीं करता।

Monday, October 10, 2016

भारत की शक्तिमान छवि से चीन की बौखलाहट सामने आने लगी-हिन्दी संपादकेीय( China feel Tension form Powerful Imege of India-Hindi Editorial)

                                        चीन का यह कहना कि आतंकवाद की लड़ाई का राजनीतिक लाभ नहीं लेना चाहिये-अब समझ आ गया कि जब पाकिस्तानी हरकतों का जवाब पहले भारतीय सेना देती तो उसका प्रचार किसके दबाव में क्यों नहीं किया जाता था? मतलब यह कि जनता के खून पसीने की कमाई से जो सेना ताकतवर हो रही है उसका प्रचार कर देश का मनोबल न बढ़ाओ।  वह हमेशा सहमी सहमी चीनी सामानों को खरीदती रहें। इतना ही नहीं भारतीय जनमानस का मनोबल इतना गिरा रहे कि वहां वामपंथ तथा उग्र अरेबिक विचाराधारा का मुकाबला करने वाले विद्वान आगे न आयें।  भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा में पूरे विश्व का बौद्धिक परिवर्तन की संभावनायें रहती हैं जिससे वामपंथी और अरेबिक विचारधारा के विद्वान बहुत डरते हैं। हमारा मानना है कि सरकार ने अच्छा किया कि उरी हमले का बदला लेने का जमकर प्रचार किया।  भारत की एक ताकतवर छवि बनने से त्रस्त चीन का बौखलाना अच्छा लग रहा है।
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                 पाकिस्तान के बारे में देश का बुद्धिमान समूह भ्रमित रखता है। वहां सज्जन से सज्जन आदमी भी हिन्दूओं से दोस्ताना निबाहने की बात ऐसे कहता है जैसे कि पराये हों-उसकी नज़र में हिन्दू दोयम दर्जे का इंसान है।  पता नहीं इन बुद्धिमानों को यह समझ में क्यों नहीं समझ में आ रहा है कि वहां के जनमानस में हिन्दूओं को मिटते देखने का विचार रहता ही है।  अरेबिक विचारधारा, कथा साहित्य, तथा महापुरुषों के अलावा संसार में कुछ भी अच्छा नहीं है।  उर्दु शायरों की क्षणिक आवेश में रची गयी शायरियां उनका दर्शन है।  हमने तो वहां के टीवी चैनलों को देखकर मान लिया है कि भारत पाकिस्तान में दोस्ताना संबंध इस प्रथ्वी पर युग परिवर्तन से पूर्व संभव नहीं है। कथित रूप से निरपेक्ष विद्वान अगर पेशेवर लाभ के लिये यह सपना दिखा रहे हैं तो ठीक है पर अगर स्वयं भी उसका शिकार है तो उन्हें बचना चाहिये।
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                               19 जवानों की शहादत! जवाबी कार्यवाही! बहस में ढेर सारे विज्ञापन! जवाब पूरा नहीं होता कि ब्रेक! फिर एक सवाल कि फिर ब्रेक! अगर इसी तरह पाकिस्तान पर हर महीने एक कार्यवाही हो जाये तो प्रचार जगत को सनसनी खबरों की जरूरत नही होगी।
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               दो भारतीय जवानों के सिर के बदल पाकिस्तान के तीन सिर काटे गये। अंतर्राष्ट्रीय तौर पर भारत अपनी छवि देखते हुए कभी स्वीकार नहीं कर सकता था, यह सत्य है। पाकिस्तानी तो बद होने के साथ बदनाम है और वह अपनी करतूतों को अराजकीय तत्वों की बताकर छिप जाता है पर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार इस तरह सिर काटना अपराध है अतः इस खबर को अब प्रकाशित करने वाले देश का नाम बदनाम कर रहे हैं। 2011 की इस कार्यवाही पर अधिक सरकार नहीं बोल सकती पर उरी के बदले की कार्यवाही पर चाहे जितना डंका पीट सकती है क्योंकि वह अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार सही है।
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