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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Thursday, May 18, 2017

विज्ञापनों में भी दिखती है हिन्दूत्व विरुद्ध धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई (War in Adversiment on Hindutv Vs Secularis)

            फिल्मी व टीवी उद्योग के  लोग भले ही दावे करें कि उनके यहां सब सामान्य है पर जानकार लोग मानते हैं कि यह सब दिखावा है।  गैर हिन्दू देशों का पैसा भारतीय मनोरंजन व्यवसाय में आता है इसलिये ही उसमें पीर फकीर संस्कृति की आड़ लेकर भारतीय धर्मो का आकर्षण कम करने वाली कहानियां लिखी जाती हैं। इस पर बहस अलग से कर सकते हैं पर हमें तो यह विज्ञापनों में भी दिखाई देने लगा है।
अभी हाल ही में बाहूबली फिल्म की सफलता ने पूरे विश्व में झंडे गाड़े। हमारे मुंबईया फिल्म के तीन कथित नायकों की-यह धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक माने जाते हैं-सफलता उसके आगे फीकी हो गयी। वैसे में अनेक जानकार यह सवाल उठाते हैं कि फिल्म उद्योग को अक्षयकुमार व अजय देवगन कोई कम कमा कर नहीं देते पर उन्हें सुपर स्टार कहते हुए गैर हिन्दू देशों के पूंजीपतियों से प्रायोजित प्रचार माध्यम उस तरह महत्व नहीं देता। बहरहाल बाहूबली पर पाकिस्तानी प्रचार माध्यमों ने भी रोना रोया-यह अलग बात है कि वहां यह फिल्म भी जमकर चल रही है।  ऐसे में जब धर्मनिरपेक्ष महानायकों की छवि धूमिल हो रही थी तो एक विज्ञापननुमा समाचार एक चैनल में देखा जिसमें दंगल फिल्म की चीन में सफलता की चर्चा की गयी थी और धर्मनिरपेक्ष नायक दिखाया जा रहा था। देखा जाये तो बाहूबली से पहले ही दंगल फिल्म बाज़ार में आयी है। बाहुबली चीन में भी सफल मानी जा रही है। जिस चैनल पर यह समाचानुमा विज्ञापन आया वह धर्मनिरपेक्षता का झंडाबरदार है। ऐसे में दंगल की चीन में सफलता की बात वह कर रहा था तो लगा कि कहीं नि कहीं विज्ञापननुमा समाचारों की भी रचना की जाती है कि धर्मनिरपेक्षता कहीं हिन्दुत्व से पिछड़ न जाये।


Tuesday, May 02, 2017

आम आदमी से परे चल रहे हैं शिखर पुरुष-हिन्दी वैचारिक लेख (comnan man and Very importent parson-HindiThought artifcle)


                                         भारत में जमीन पर रैंगने वाला आम आदमी कला, पत्रकारिता मीडिया राजनीति, धर्म, तथा संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय सभी संगठनों के शिखर पुरुषों के लिये प्रयोक्ता है। इन संगठनों में सक्रिय लोग ी कभी आदमी रहे होते हैं फिर भी जब इन पर विशिष्ट पद होने का अहंकार चढ़ता है। तब उनकी सोच बदल जाती है। वह विशिष्ट सोचते हैं दिखते हैं और बोलना चाहते हैं-उनको अपनी विशिष्टता की अनुभूति तभी होती है किसी को पांव तले कुचलकर निकलते हैं।  वातानुकूलित यंत्रों में विलासिता से सुस्त हुई देह के कारण मस्तिष्क का चिंत्तन कुंद हो जाता हैं। तब वह आम आदमी की सुनना नहीं चाहते और नतीजा यह कि वह जो बोलते हैं वह आम आदमी समझता नहीं है। नतीजा यह कि व्यक्ति निर्माण का कार्य लगभग ठप्प हो गया है। 
                                 संड़कें संकरी रहीं पर वाहन चौड़े हो गये। रास्ते पर लोग टकराने लगे हैं। जंगल जैसी जंग है जहां हर शक्तिशाली पशु कमजोर को खाना चाहता हैं। आमआदमी की औकात प्रयोक्ता जैसे है उसे सृजक तो माना ही नहीं जा सकता। सृजक वही है जो पद, पैसे और प्रतिष्ठा के सहारे शिखर पर बैठा है।  संगठित मीडिया ने अपनी चाटुकारिता से सोशलमीडिया का भी अपहरण कर लिया है। एक गायक का टिवटर विवादास्पद हो सकता है पर किसी आम आदमी की खास टिप्पणी आज तक नहीं दिखाई गयी।  किसी ऐसे व्यक्ति को सोशलमीडिया से पर्दे पर बहस के लिये नहीं लाया गया जिसके पास पद, पैसे और प्रतिष्ठा का शिखर नही है। अगर यकीन न हो तो समाचार चैनलों की बहस देख लें जहां केवल दस या पंद्रह चेहरे ही हैं जो इधर उधर घूमकर अपनी वाक्चातुर्य कला का प्रदर्शन करते हैं-न उनकी तथ्यों पर गहन दृष्टि होती है न ही स्वयं का चिंत्तन होता है।  एक तय प्रारूप में सब चल रहा है। सब कुछ क्रिकेट की तरह फिक्स लगता है।  
                           ऐसे में हम जैसे लोगों के लिये यही उपाय है कि वह अपने सीमित क्षेत्र में ही मौज करते रहें।  अपनी नियंत्रण रेखा स्वयं नहीं दूसरों की ताकत से तय करें। घर से बाहर निकलते ही समझें कि वह पराये देश मे आ गये हैं।  हर जगह ताकतवर लोगों के दलाल बैठे हैं। कहीं दलाल ही ताकतवर हो गये हैं। घर से बाहर जाने के बाद सुरक्षित, सम्मानित और संतोष के साथ लौट आने पर माने कि आपने विदेश यात्रा कर दी। भीड़ में कोई अपना नहीं है और जो सामने है उनसे विवाद में तपना नहीं है।  धर्म, कला, पत्रकारित, राजनीति, समाजसेवा और जनकल्याण के नाम पर शिखर पुरुषों ने हड़प ली है और वह इस तरह वहां विराजे हैं जैसे कि वहां के राजा हों। निराशा के इस वातावरण में भी धन्य है वह आम आदमी जो भगवान भक्ति करते हुए सारे संकट सहजता से झेल लेता है। वह जानता है कि इस धरती पर अप्रत्यक्ष भगवान का ही कब्जा है भले ही प्रत्यक्ष राक्षसों ने इस हड़प रखा है। 

Sunday, April 16, 2017

सत्तर साल में सबसे अच्छे छ महीने तो जियो फ्री ने दिलवा ही दिये (Jio Free Internet Service Best Day In Las 70 years)


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                                             जियो ने छह महीने तक फ्री इंटरनेट चलाया पर हम तो अंतिम दिनों में उससे जुड़ पाये। दरअसल नोटबंदी के दौरान भी लोग इस फ्री सेवा का मजे लेते रहे और उन्हें चार्ज कराने के लिये कहीं पैसे नहीं देने पड़े। अगर नोटबंदी के दौरान जियो फ्री नहीं होता तो शायद उससे ज्यादा हाहाकार मचता जितना मचा।  देखा जाये तो पिछले तीन साल में उन लोगों ने ही अच्छे दिन देखे जिन्होंने जियो फ्री के मजे लूटे। हमारे देश में अच्छा दिन तभी होता है जब फ्री में कुछ मिल जाता है।  कहें तो जियो फ्री ने तीन साल में छह महीने में जो अच्छे दिन दिखाये वह सत्तर साल में नहीं दिखे।  भक्तों के पास यह इकलौता उदाहरण ही जो यह कह सकते हैं कि हमने तो अच्छ दिन दिखाये।  
            हम अच्छे दिन का पूरा लाभ नहीं उठा सके इसमें हमारा ही दोष है। भक्त यह भी कह सकते हैं कि हमने तो अच्छे दिन लाने का वादा किया था ले जाने का काम तुम्हारा था। नहीं किया तो अब हमारा क्या दोष?
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याद रखें इससे ज्यादा बताने को कुछ नहीं है क्योंकि बाकी चीजें तो प्रचार के लिये ही ठीक हैं। वैसे जियो वाले जिस तरह जनता में पैठ बनाये हुए हैं उससे तो वह सीधे किसी के पज्ञ़ा में राजनीतिक जनमत भी बना सकते हैं यह अलग बात है कि ऐसा प्रत्यक्ष करने की बजाय वह अप्रत्यक्ष रूप से वैसे ही सभी संगठन अपनी मुट्ठी में रखते हैं।

Sunday, March 12, 2017

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों में जनमानस का सही विश्लेषण जरूरी-हिन्दी संपादकीय (thinker not seen real India public opinian-Hindi Editorial)


                              प्रगतिशील तथा जनवादियों के लिये उत्तरप्रदेश चुनाव दक्षिणपंथियों की जीत महाराष्ट्र के निकाय चुनावों के बाद दूसरा बहुत बड़ा झटका है। राज्य प्रबंध के माध्यम से समाज में बदलाव का-जिसका स्वरूप कभी स्पष्ट नहीं कर पाये-सपना देखने वाले इन दोनों प्रकार के बुद्धिजीवियों के लिये इस तरह दक्षिणपंथ का भारत में स्थापित हो जाना चिंता का विषय है।  दरअसल इन दोनों प्रकार के बुद्धिजीवियों को पिछले 70 वर्षों से राज्य प्रबंध इसलिये मदद करता रहा ताकि यह आमजनों में एक सपना बेचते रहे जिसमें वह क्रांति के सहारे धनी हो जाये। इन लोगों ने कभी राज्य प्रबंध की सामान्य गतिविधियों में भ्रष्टाचार या लापरवाही को कभी चर्चा का मुख्य विषय बनाने की बजाय मानवता के पश्चिमी सिद्धांतों पर वैचारिक समागमों में समच बिताना बेहतर समझा।  मनुष्यों की जरूरतों से ज्यादा उसकी अस्मिता का विषय महत्वपूर्ण समझा।  कार्ल मार्क्स ने भले ही कहा हो कि आदमी की सबसे बड़ी जरूरत रोटी है पर इन लोगों ने चिकनी चुपड़ी रोटी खिलाने के सपने दिखाये। यह न हो सकता था न हुआ पर इन लोगों की वजह से राज्यप्रबंध पर लोगों का ध्यान नहीं गया जिसमें शनैःशनैः दलाल घुसते रहे।
          दक्षिणपंथियों की उत्तरप्रदेश विजय दोनों की धाराओं के विचारकों के लिये अब अस्तित्व का संकट पैदा करेगी। मणिपुर में इरोम शर्मिला ने बरसों तक भूखहड़ताल कर नाम कमाया। अचानक चुनाव लड़ने पर उतरी पर हुआ क्या? उसे केवल नब्बे वोट मिले। वह मणिपुर में आफसा कानून खत्म करने के लिये लड़ रही थी पर लोगों ने उसे महत्व नहीं दिया पर दोनों धाराओं के विचाकर उसका नाम जपते रहे। वह क्यों हारी? वजह हम बता देते हैं कि लोग चाहे कितने भी परेशान हों पर वह राज्य को अस्थिर करने वाली ताकतों को पसंद नहीं करते। इरोम शर्मिला ने भले ही राज्य को अस्थिर करने का प्रयास नहीं किया पर अप्रत्यक्ष रूप से उनकी मांग संभवत ऐसे ही तत्वों की मदद करने वाली रही होगी। यही कारण है कि वह बहुत बुरी तरह से  हारी-उसे केवल नब्बे वोट मिले वहां पड़े नाटो वोटों से भी कम। 
                           बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने नोटबंदी को लेकर यह सही कहा है कि अमीरों की बुरी हालत देखकर गरीबो को आत्मसंतोष हुआ जिसे कोई भी पढ़ नहीं सका। हमने नोटबंदी होने के तत्काल बाद लिखा था कि इससे गरीबों को सीधे कुछ नहीं मिल रहा पर मदांध अमीरों की कुछ हेकड़ी कम होगी इससे उनको संतोष होगा। अगर आप उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम देखें तो कुछ लोगों को हैरानी है कि मुसलमानों ने भक्तों की पार्टी को वोट कैसे दे दिया? दरअसल हमारे देश के पेशेवर विद्वान मुसलमानों का बाह्य रूप देखते रहे हें उन्हें यह अनुमान नहीं है कि उनका शोषण भी उसी तरह होता है जैसे समुदायों का होता है। उनमें भी उतनी ही गरीबी है जितनी दूसरों में। उनका भी मन वैसा ही जैसा दूसरों का।  ऐसे में अगर उन्हें नोटबंदी से आत्मसंतोष हुआ तो उसमें चौंकने वाली बात नहीं है। हमें आपत्ति इस पर है कि  किसी भी समुदाय को अपना बौद्धिक गुलाम या बंधुआ समझकर उसे संबोधित किया जाये।  शायद उत्तरप्रदेश में यही हुआ कि सभी समुदायों के गरीबों के मन में यह बात आई कि उन्हें बपौती समझने वालों को अब सबक सिखाया जाये-यही हुआ भी। भक्तों के इष्ट ने शायद यह समझा तभी आगे बढ़कर प्रचारकर जानमानस को अपनी दल की तरफ खींच लिया।
अब हमारे समझ में आ गया है कि उत्तर प्रदेश में भक्तों ने विजय क्यों हासिल की? दरअसल भक्तों के विरोधी सामान्यजन को गूंगा, बहरा और अंधा समझते हैं इसलिये दलित, अल्पसंख्यक तथा पिछड़ा वर्ग में बांटकर यह समझते हैं कि वह उनकी बपौती है। यह लोग भी समझ गये हैं कि भक्तों का दल भले ही उनका सीधे भला न करे पर बुरा भी नहीं करेगा।  कम से कम भक्त अपनी पहचान छिपाते नहीं तो दूसरी की से बचते भी नहीं।  महत्वपूर्ण बात यह कि  किसी भी वर्ग को लल्लू नहीं समझते। शायद यही कारण है कि उत्तरप्रदेश के लोगों ने उनको खुलकर वोट दिये हैं। हालांकि भक्त तथा उनके इष्ट को यह समझ लेना चाहिये कि राज्यप्रबंध की प्रचलित प्रणाली में अगर बदलाव नहीं हुए तो फिर पूरा देश बहुत निराश होगा। 
इरोम शर्मिला को पता होना चाहिये था कि भूख हड़ताल तथा चुनावी राजनीति में फर्क होता है
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                                   इरोम शर्मिला 16 साल तक भूख हड़ताल पर रही। चुनाव लड़ तो हार गयीं तो कथित विद्वान पूरे भारतीय समाज पर पिल पड़े। अरे, गुजरात के एक योगी के बारे में हमने पढ़ा सुना और देखा था। उसने तो 70 वर्ष से न खाना खाया न पानी पिया है पर वह अपने महान कर्म का आंकलन करने के लिये चुनाव लड़ने नहीं गया। आत्ममुग्धतावश आंदोलन कर प्रचार में प्रसिद्धि पाना अलग बात है पर चुनाव में जाकर प्रजा का मन जीतना दूसरी बात है।  फिर आप यह क्यों सोचते हैं कि आप आंदोलन कर समाचार जगत में छा गये हैं तो पूरी जनता आपकी जयजयकार करने लगे-आपका यह पता नहीं इस देश मे आमजनों का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो न अखबार पढ़ता है टीवी देखता है और वहां तक पहुंचने के लिये अलग से प्रयास करने होते हैं-यही चुनावी राजनीति है।  यह किसी के बूते की भी नहीं है। अगर आप उसे कोस रहे हैं तो कहना चाहिये कि ‘नाच न आवै, आंगन टेढ़ा बतावै’।
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Friday, January 20, 2017

संस्कृत से अनुवादित रचनाओं ने हिन्दी को बाल्यकाल में ही संपन्न बना दिया-हिन्दी लेख (Sanskrit and Hindi-HindiArticle


                         वैसे तो हमने श्रीमद्भागवत को बीच बीच में खोलकर अनेक बार पढ़ा था पर अब प्रथम स्कंध से ही विधिवत प्रांरभ किया है।  दरअसल हमारे दिमाग में आधुनिक हिन्दी की रचनाओं को लेकर अनेक विचार घुमड़ रहे होते हैं।  अनेक लोग कहते हैं कि हिन्दी में विश्व स्तरीय रचनाओं का संकलन नहीं मिलता। वर्तमान में अनेक रचनाकार कवितायें, कहानियां, उपन्यास तथा अन्य विधाओं में रचनायें कर रहे हैं पर उन पर स्तरीय न होने का आरोप लगाकर वास्तविकता से बचा नही जा सकता। हमारा मानना है कि हिन्दी में संस्कृत सहित अन्य भाषाओं से हुए अनुवादों ने उत्तरभारतीयों का मन मस्तिष्क इतना स्तरीय बना दिया है कि उन्हें सामान्य स्तर सुहाता नहीं है।  गीताप्रेस गोरखपुर ने अकेले ही संस्कृत से अनुवाद कर हिन्दी को इतना संपन्न कर दिया है कि उसके स्तर तक पहुंचना अभी संभव नहीं है।
           महर्षि बाल्मीकी रामायण, वेदव्यासकृत महाभारत और शुकदेव की अनुपम रचना श्रीमद्भागवत ऐसी ग्रंथ हैं जिनका हिन्दी क्या विश्व के किसी भाषा की रचना में समानता नहीं है।  संस्कृत में होने के बावजूद अनुवाद के कारण यह सभी महान ग्रंथ हिन्दी की संपत्ति भी माने जाते हैं। समस्या यही से शुरु होती है।  जिन लोगों ने संस्कृत से अनुदित ग्रंथों को पढ़ा है उन्हें कोई भी रचना पढ़ा दीजिये वह अधिक प्रभावित नहीं होगा। जिन लोगों न नहीं पढ़ा या फिर परिवर्तित परिवेश में नहीं पढ़ पाये वह अंग्रेजी के दत्तक पाठक हो गये हैं। वह आज के हिन्दी लेखकों को एक ऐसा व्यक्ति मानते हैं जिसे अभिव्यक्त होने का अवसर नहीं मिलता है इसलिये वह कागज रंगता है।
           अनेक लोग हमसे कहते हैं कि अपनी किताब छपवाओ। हम मना कर देते हैं। हमारा तर्क होता है कि हम कितना भी अच्छा लिख दें बाल्मीकी, वेदव्यास, शुक्राचार्य, तुलसीदास, कबीर, रहीम और मीरा जैसे नहीं हो सकते। हमारे प्राचीन महान रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में अध्यात्मिक ज्ञान के साथ मन बहलाने के लिये इतनी महान कथाओं की रचना की है कि लगता नहीं कि उनके स्तर तक कोई पहुंच सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अध्यात्मिक ज्ञान इतना परिपूर्ण  कि उसके आगे आप कुछ नहीं रच ही नहीं सकते।
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Wednesday, January 18, 2017

तात्कालिक राजनीतिक प्रसंगों पर स्वतंत्र लेखकों के पाठ बेगार करने जैसे-हिन्दी लेख (Freelancer writter word unneccary on Current Political Afair-Hindi Article)

               समसामयिक विषय में चुनावी राजनीति पर लिखना समय खराब करना है।  यहां हम बता दें कि राजनीति एक व्यापक शब्द है जिसका दायरा राजकाज से दूर समाज ही नहीं वरन् पारिवारिक विषयों तक व्यापक रूप से फैला रहता है।  केवल समाज पर नियंत्रण करने वाली संस्थाओं के कार्य ही नहीं वरन् हर मनुष्य का अर्थकाल राजसी विषयों में बीतता है। हमारा लिखना राजसी कर्म है और उसके लिये हमने अपनी नीति भी बना रखी है जिस कारण किसी भी चुनावी राजनीति के दल विशेष से संबंध नही रखा। 
मूल विचार राष्ट्रवादियों से मिलता जुलता लिखता है पर सच यह है कि हम विशुद्ध रूप से भारतीय अध्यात्मिक दर्शन वादी है-मानते हैं कि हमारा दर्शन हर विषय पर-यौगिक, सात्विक, राजसी तथा तामसी-पर अपनी स्पष्टतः राय रखता है और हमें विदेशों से वैचारिक सिद्धांतों का आयात नहीं रहना चाहिये। राष्ट्रवादियों के हिन्दूत्व सिद्धांत से भले ही यह विचार मिलता जुलता दिखे पर वास्तव में यह अलग है। चुनावी राजनीति में प्रगतिशील, जनवादी और राष्ट्रवादी विचाराधाराओं का द्वंद्व दिखता है पर वास्तव में वह केवल प्रचार तक ही सीमित है। राजकाज की अंग्रेजों ने जो शैक्षणिक, आर्थिक, संविधानिक तथा प्रबंध व्यवस्था हमें गुलाम बनाये रखने के लिये बनायी उसमें जरा भी बदलाव नहीं आया। संविधान की रक्षा करने वाली पुलिस का कानून अंग्रेजों के समय का बना है जिसमें बदलाव की मांग करते हुए सात दशक बीत गये पर हुआ कुछ नहीं।  इसका कारण यह है कि हमारे देश में चुनाव का समर सिंहासन पाने के लिये लड़ा जाता है न कि व्यवस्था सुधार के लिये।  सुधार में बौद्धिक मंथन जरूरी है जबकि चुनाव के सिंहासन पर बैठने से मिलने वाली सुविधायें मस्तिष्क को आलसी बना देती है। सत्ता  से समाज सेवा करने का नारा जनवादियों  का है जिसे प्रगतिशील और राष्ट्रवादी दोनों ने अपना लिया।
1971 से अखबार पढ़ना प्रारंभ किया। 1975 का आपातकाल हमें याद है। बाद में जनतापार्टी की सरकारी बनी तब हम बहुत खुश हुए थे कि चलो बदलाव आया।  फिर एक के बाद एक चुनाव देखते रहे।  व्यवस्था वही ढाक के तीन पात रही।  अनेक ऐसे नेताओं को जो भारी बदलाव का नारा लगाते हुए आये। चुनाव जीते और फिर कुछ समय बाद देखा तो वह उन्हीं लोगों के साथ हो गये जिनके विरुद्ध चुनाव लड़ा था।  अच्छा खासा व्यक्ति सांप्रदायिक होने का आरोप लेकर चुनाव जीता और फिर धर्मनिरपेक्ष हो गया।  अनेक धर्मनिरपेक्ष बंधु सांप्रदायिक पार्टी को असली धर्मनिरपेक्ष बताते हुए उसमें शामिल हो गये।
33 वर्ष हम सरकारी नौकरी में रहे। जीवन का प्रारंभ पत्रकारिता से किया।  स्थानीय अखबारों में प्रथम पृष्ठ का संपादन के साथ ही संपादकीय लिखने का काम भी किया। एक अखबार में अपनी सहविचाराधारा के समर्थन में लिखा तो दूसरे में जाकर विपरीत विचारधारा का समर्थन भी किया। सरकारी नौकरी के पच्चीस वर्ष बाद  एक बड़े अखबार के प्रबंध निदेशक से एक मंदिर में भेंट हुई तो उन्होंने हमे सेवानिवृत्ति लेकर अपने अखबार में आने का निमंत्रण दिया। जिस पर हंस पड़े और उनके लिये प्रशंसात्मक वाक्य कहकर निकल लिये। तब तब हमें अंतर्जाल पर लिखने में ही संतोष होने लगा था फिर एक स्थाई नौकरी छोड़कर वहां जाना ठीक नहीं लगा। सरकारी नौकरी में बाबू थे पर वास्तविकता में यह भी लगा कि पत्रकारिता में भी हमने एक तरह से बाबूगिरी की थी जहां बौद्धिक स्वतंत्रता एक छलावा भर है।
यही कारण है कि अपना लेखन हम कभी एक दल की तरफ नहीं झुका पाते।  दूसरी बात राजनेताओं का नाम लेकर टिप्पणी नहीं करते क्योंकि अधिकतर इसमें  व्यवसायी की तरह इसे करते हैं।  पहले नेता कार्यकर्ताओं के भरोसे रहते थे जो चने खाकर पानीपीकर उन्हें चुनाव जिताते थे। अब हालत यह है कि चुनाव से पूर्व अनेक जगह पैसा और शराब पकड़ी जाती है-तय बात है कि कार्यकर्ताओं के साथ मतदाता को भी प्रलोभन देने का प्रयास होता है।  राजकीय सेवा में दौरान हमने चुनाव भी कराये। उसके अनुभव तत्काल बाद कहीं लिखने का साहस नहीं हुआ। बहरहाल यह पता चल गया कि दलीय लोकतंत्र में विचाराधारा का समर्थन या विरोध एक हल्की प्रतिक्रिया है जिसका राज्य प्रबंधक बनने के बाद कोई अर्थ नहीं रह जाता।
आजकल समाचार देखना भी बंद कर दिया है क्योंकि लगता है कि सब कुछ प्रायोजित है तो उस पर क्यों अपनी मानसिक ऊर्जा नष्ट की जाये।  टीवी समाचार चैनलों को देखना ही बेकार है। सुबह अखबार देखते हैं उससे सब हाल पता लग जाता है। अभी पिता पुत्र की विवाद लीला चल रही थी।  लोग तमाम तरह के कयास लगा रहे थे पर हम तो देश के प्रचार प्रबंधकों की पटकथा तथा उस पर अभिनय करने वालों की कला पर अचंभित थे। पूरे तीन महीने से टीवी चैनलों के विज्ञापन का समय पास करा दिया। जहां तक देश की व्यवस्था का सवाल है तो हमें खुशी है कि यह देवभूमि है और भगवान स्वतः इसका संचालन करते हैं। अतः तात्कालिक चुनावी राजनीतिक प्रसंगों पर लिखना हमें बेगार लगती है।
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Thursday, January 05, 2017

सरकार को बजट 1 फरवरी को पेश करना चाहिये-हिन्दी संपादकीय (Central Govt new budget Should teble on Parliament on 1-20216-Hindi Editorial)

                 केंद्र सरकार को बजट अपनी घोषणा के अनुसार 1 फरवरी को ही रखना चाहिये क्योंकि इससे मध्यम वर्ग आयकर में अपने लिये सुविधा की आशा कर रहा है। इतना ही नहीं यह भी अपेक्षा है कि नोटबंदी के बाद सरकार करढांचे को सरल बनाने का प्रयास इस बजट में करेगी। यदि यह बजट टाला जाता है तो मध्यम वर्ग यह मानेगा कि उसे चुनाव से पहले भरमाने का प्रयास होगा मगर बाद में उसे पहले की तरह सब कुद  झेलना पड़ेगा। इतना ही नहीं भक्तों के इष्ट के हार्दिक भावों पर भी संदेह खड़ा हो जायेगा।  हम याद दिला दें कि जिस मध्यम वर्गीय भक्तों के सहारे इष्ट सिंहासन के शीर्ष पर पहुंचे हैं वह उनके अभी तक के राजकीय बजटों से भारी निराश हुआ है। यह तो नोटबंदी थी जिसने उनकी छवि को वापस प्रतिष्ठित किया है पर अगर बजट निराशाजनक हुआ और मध्यम वर्ग ने जो अभी तक तकलीफ उठाई है वह यथावत रहीं तो फिर कहना मुश्किल है कि अच्छे दिन आने वाले हैं।  जो करना है इसी बजट में किया जा सकता है। फिर तो अवसर मिलना संभव नहीं लगता।  हो सकता है कि नोटबंदी से जो प्रतिष्ठा मिली है वह एक सामान्य मध्मय वर्गीय विरोधी बजट से मिट्टी में मिल  जाये। उनके वित्तमंत्री तो साफ कह चुके हैं कि मध्यमवर्ग अपनी रक्षा स्वयं करे-जिसका अर्थ का अनर्थ कर लोगों ने उसमें जोड़ा कि हम तो अमीर और गरीब के लिये ही काम करते रहेंगे। 
               जिस तरह शक्तिशाली लोग मुद्रा की स्थिति सामान्य होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं उससे तो लगता है कि वह नई मुद्रा के काली होने की राह देख रहे हैं और जब वह सफल होंगे तो पहले से अधिक भयावह होंगे।  अभी उनके चेहरे लटके हुए हैं पर अगर बजट में मध्यम वर्ग को सहारा नहीं मिला तो यह मान लीजिये कि इस शक्तिशाली वर्ग के पास कालेधन की वापसी हो जायेगी। मध्यम वर्ग कर चुकाता रहेगा और वह करचोरी कर सीनातानकर चलेगा।  ऐसे में भक्तों के इष्ट का काम केवल शाब्दिक चातुर्य से चलने वाला नहीं है क्योंकि अभी तक उनके सद्प्रयासों का धरातल पर अवतरण नहीं हुआ और नायक की छवि बचाने रखने के लिये मध्यम वर्ग का प्रसन्न रहना जरूरी है।  अभी भी सब कुछ पहले की तरह चल रहा है और अगर आगे भी चला तो सवाल पूछा ही जायेगा कि ‘अच्छे दिनों का क्या हुआ?
           यह ध्यान अवश्य रखना होगा कि भक्त अधिकतर मध्यम वर्ग के हैं-वह केवल उनके दल के सदस्य होने तक ही सीमित नहीं है वरन् हर क्षेत्र में सक्रिय हैं-अतः उसके प्रसन्न होने पर ही अब आगे इष्ठ की छवि प्रतिष्ठित रह सकती है।
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