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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Saturday, December 20, 2014

दूसरे को सुधारने की बजाय स्वयं सुधरें-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(doosron ko sudharne ki bajay swayan sudhren-A Hindu hindi religion article)



            जब राज्य समाज या धार्मिक विषय पर नियंत्रण करता है तब क्या स्थिति होती है यह अब विश्व में व्याप्त आतंकवाद के रूप में देख सकते हैं।  विश्व में राज्य कर्म का निर्वाह करने वालों में सामर्थ्य का अभाव होता है और वह अपना पद बचाये रखने के लिये लोगों को धर्म के आधार पर नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं।  अनेक स्थानों पर आधुनिक  राज्य व्यवस्थाओं में अपात्रों का प्रवेश हो गया है। धन, बल और चतुराई से राजपद पाने वालों को राजनीति के जनहित सिद्धांत का ज्ञान ही नहीं होता। इस विश्व के 180 देशों में साठ से अधिक देश धर्म आधारित होने का दावा करते हैं और इन्हीं देशों में हिंसक वातावरण बना हुआ है। इन देशों में धर्म के नाम पर जो ध्ंाधा चल रहा है उससे पूरा विश्व आतंकवाद की चपेट में है। इनकी विचारधारा की दृष्टि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन मूर्तिपूजा समर्थक है इसलिये अवांछनीय है जबकि इन्हीं देशों में सर्वशक्तिमान के नाम पर सबसे अधिक पाखंड है।
            हमारे देश में भारतीय समाज में अनेक विरोधाभास है पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के प्रभाव के चलते यहां हिंसक द्वंद्व अधिक नहीं होते। हमारे भारतीय धर्म की रक्षा का दावा अनेक  लोग तथा उनके समूह करते हैं पर सत्य यह है कि वह भारत में व्याप्त भ्रमों के निवारण का प्रयास नहीं करते। अक्सर कहा जाता है कि भारत में दूसरे देशों की जनता से अधिक सोना है।  यह हैरानी की बात है कि कथित बहुमूल्य धातुऐं भी पत्थर समान है यह बात कोई नहीं समझता।  प्रकृति ने हमें अन्य देशों की अपेक्षा अधिक संपन्न बनाया है पर उसके जल और अन्न को मूल्यवान मानने की बजाय सोना और हीरा पर  अपना हृदय न्यौछावर करते हैं।  विवाह और शोक के अवसर पर धन खर्च कर कथित सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का ऐसा प्रयास करते हैं जिसका कोई तार्किक आधार नहीं होता।
चाणक्य नीति में कहा गया है
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पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
मूढैं: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।
            हिन्दी में भावार्थ-इस धरती पर जल, अन्न और मधुर वचन यह तीन प्रकार के ही रत्न हैं मूर्ख लोग पत्थरों को रत्न कहते हैं।
            हमारे यहां जाति के आधार पर बहुत वैमनस्य रहा है।  यही कारण है कि हमारे यहां विदेशी धार्मिक विचाराधाराओं ने पदार्पण किया।  यहां अल्प धनिक, श्रमिक तथा निम्न वर्ण के लोगों को अपमानित करने की भयंकर प्रवृत्ति है। दूसरे के  दोषों पर कठाक्ष कर अपनी योग्यता प्रमाणित करने का प्रयास सभी करते हैं पर किसी की प्रशंसा करने का मन किसी का नहीं करता। हमारा मानना तो यह है कि  विदेशी धार्मिक विचाराधारा के धारकों  पर टिप्पणियां करने या उनमें सद्भाव पैदा करने के प्रयासों से अच्छा है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन पर चलने वाले समाजों में मानसिक शक्ति का प्रवाह करें।  हम दूसरे को सुधारने की बजाय स्वयं दृढ़ पथ का अनुसरण करें।  यह पथ उपभोग के शिखर पर पहुंचकर पताका फहराने वाला नहीं वरन् त्याग का है।  जहां विदेशी धार्मिक विचाराधारायें मनुष्य, प्रकृत्ति तथा अध्यात्मिक ज्ञान से परे हैं वहीं हमारा दर्शन तत्वज्ञान का ऐसा भंडार है जिसे कोई प्राप्त कर ले तो उसका जीवन धन्य हो जाये।  विदेशी विचाराधाराऐं मनुष्य की पहचान एक छतरी के नीचे दिखाना चाहती हैं पर प्रकृति तथा जीव विज्ञान विविधताओं के आधार पर सृष्टि की जानकारी देता है।  हर जीवन का स्वभाव, रहन सहन तथा आचार विचार धरती पर  अलग अलग समय पर सक्रिय भिन्न भिन्न तत्वों से संपर्क होने से बदलता रहता है। सभी मनुष्य एक जैसे  नहीं हो सकते और सभी समय एक जैसे भी नहीं हो सकते।
            अतः जहां तक हो सके देश के साधु, संतो, बुद्धिमानो तथा समाज सुधारक अपने समाज में ज्ञान चक्षु खोलने का काम करें।  यही सच्चा धर्म ज्ञानियों का है।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Sunday, December 07, 2014

योग के आठ भागों में चरम शिखर है समाधि-हिन्दी चिंत्तन लेख(yog ka aath bhagon mein charam shikhar hai samadhi-hindi thought article)



            पतंजलि योग साहित्य के अनुसार सात भागों से गुजरने के बाद आठवां और अंतिम भाग समाधि है। योग के विषय के व्यापक संदर्भों में पतंजलि योग साहित्य ही एकमात्र प्रमाणिक सामग्री प्रदान करता है।  हमने कथित रूप से अनेक लोगों से सुना है कि अमुक गुरु समाधि में प्रवीण थे या अमुक संत को इस विषय में विशेषज्ञता प्राप्त है।  अनेक लोग तो कहते हैं कि हिमालय की कंदराओं में कई ऐसे योगी है जो समाधि में दक्ष हैं।  जब हम पतंजलि योग साहित्य का अध्ययन करते हैं तो लगता है कि इस तरह की बातें केवल प्रमाणिक नहीं है।  समाधि योग का चरम शिखर है।  एक तरह से योग साधना की आहुति समाधि ही है।
            ऐसे में अनेक प्रश्न दिमाग में आते हैं। हम जिन लोगों की समाधि विषयक योग्यता के बारे में सुना है उनकी बाकी सात भागों में सक्रियता की चर्चा नहीं होती।  आसन और प्राणायाम का भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है।  वैसे हम आसनों की बात करें तो अब अनेक प्रकार के व्यायाम भी इनके साथ वैज्ञानिक ढंग से इसलिये जोड़े गये हैं क्योंकि पहले समाज श्रम आधारित था पर अब सुविधा भोगी हो गया जिससे लोगों को दैहिक शुद्ध करायी जा सके।  यह व्यायाम रूपी आसान इसलिये वैज्ञानिक हैं क्योंकि इस दौरान सांसो के उतार चढ़ाव का-जिसे प्राणायाम भी कहा जाता है- अभ्यास भी कराया जाता है।  एक तरह से आसन और प्राणायाम का संयुक्त रूप बनाया गया है। पतंजलि योग में प्राणायाम में प्राण रोकने और छोड़ने का अभ्यास ही एक रूप माना गया है। आसन से आशय भी सुखासन, पद्मासन या वज्रासन पर बैठना है। बहुत सहज दिखने वाली आसन और प्राणायाम की प्रक्रिया तब बहुत कठिन हो जाती है जब मनुष्य के मन और देह पर भोग प्रभावी होते हैं। योगाभ्यास के  दौरान देह से पसीना निकलता ही जिससे देह के विकार बाहर आते हैं पर सवाल यह है कि इसे करते कितने लोग हैं? जिनके बारे में समाधि लगाने का दावा किया जाता है वह पतंजलि योग के कितने जानकार होते हैं यह पता ही नहीं लगता।
            यहां हम बता दें कि भक्ति के चरम को छूने वाले अनेक संतों ने तो योग साधना को भी बेकार की कवायद बताया है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन संतों ने भक्ति का शिखर अपने तप से पाया पर सच यह है कि वह भक्ति भी उसी तरह सभी के लिये कठिन है जैसे कि योग साधना।  दूसरी बात यह है कि इन महापुरुषों ने योग साहित्य का अध्ययन न कर केवल तत्कालीन समाज में ऐसे योगियों को देखा था जिनका स्वयं का ज्ञान अल्प था।  अगर इन महापुरुषों ने योग साधना का अध्ययन किया होता तो वह जान पाते कि जिस भक्ति के शिखर को उन्होंने पाया है वह समाधि का ही रूप है और कहीं न कहीं उन्होंने अनजाने में ही योग के आठों भागों को पार किया था।  योग साहित्य से इन महापुरुषों की अनभिज्ञता का प्रमाण यह है कि वह योग को तीव्र या धीमी गति से प्राणवायु को ग्रहण या त्यागने की प्रक्रिया  ही मानते थे जो कि योग साधना का केवल एक अंशमात्र है।  यह अलग बात है कि इन महापुरुषों के  कथनों को भक्ति की सर्वोपरिता बताने वाले आज के पेशेवर संत उन भक्तों के सामने दोहराकर वाहवाही लूटते हैं जो देह मन और बुद्धि के विकारों से ग्रसित हैं। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है।  जब वात, पित और कफ के कुपित से पीड़ित समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग हो तब हार्दिक भक्ति करने वाले मिल जायेंगे यह सोचना भी व्यर्थ है।
            हमने ऐसे लोग भी देखें हैं जो योग साधना प्रारंभ करते हैं तो कथित धार्मिक गुरू उन्हें ऐसा करने से रोक देते हैं।  अनेक गुरु तो यह कहते हैं कि योग साधना से कुछ नहीं होता। बीमारी दवा से जाती है और भगवान भक्ति से मिलते हैं।  यह प्रचार भयभीत और कमजोर लोगों के दिमाग की देन है।  मूलतः सभी जानते हैं योग साधना से व्यक्ति में एक नयी स्फूर्ति आने के साथ ही उसके मन मस्तिष्क में आत्मविश्वास पैदा होता है जिससे वह किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहता। इसलिये कायर और कमजोर लोग आलस्यवश न केवल स्वयं योग साधना से दूर रहते हैं बल्कि दूसरों में भी नकारात्मक भाव पैदा करते हैं।
            योग साधना की बातें सभी करते हैं पर महर्षि पतंजलि योग के सूत्रों का पढ़ने और समझने की समझ किसमें कितनी है यह तो विद्वान लोग ही बता सकते हैं।  हमारा एक अनुभव है कि जो नित्य योग साधना करते हैं उन्हें इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिये। जिस तरह आसना के समय सांसों के अभ्यास से दोनों काम होते हैं उसी तरह योग सूत्र पढ़ने पर हम उनसे होने वाले लाभों को पढ़कर अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि समाधि विषयक भ्रम दूर हो जाते हैं।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, November 28, 2014

स्वयं खुद समझे नहीं दूसरों को ज्ञानी बनाते हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख(swyan samajhe nahin doosron ko samjhate hain-hindi thought article)



            अभी हाल ही में शैक्षणिक जगत में संस्कृत को एच्छिक भाषा के रूप में पढ़ाने के  एक सरकारी निर्णय पर प्रचार माध्यमों ने बहुत शोर मचाया था।  दरअसल हमारे यहां आजादी के बाद प्रगतिशील तथा जनवादी लेखकों के प्रभाव के चलते बौद्धिक क्षेत्र में एक ऐसी विचाराधारा का निर्माण हुआ है जो मानती है कि मुगल, फ्रांसिसी और अंग्रेजों के आने से पहले यहां का समाज असभ्य था।  आज की सभ्यता विदेशी कृपा का परिणाम है। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को एकदम असभ्य तथा जंगली मान लेने की प्रवृत्ति के कारण हमारे देश के व्यवसायिक बौद्धिक क्षेत्र में ऐसे लोगों की बहुलता है जिनको अंग्रेजी, जर्मन, फ्रैंच महान भाषायें लगती हैं तो संस्कृत बीते समय की एक खंडहर लगती है।

            हमारे देश में समाज का बौद्धिक वर्ग दो भागों में बंटा है। एक तो जिसने आधुनिक शिक्षा प्राप्त की पर आज भी वह भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के आधारों पर चलना पसंद करता है दूसरा वह है जो पूरी तरह से अंग्रेेज दिखना चाहता है।  भारतीय बौद्धिक क्षेत्र में ऐसे ही लोगों की बाहुल्ता है। यही कारण है कि शिक्षा पद्धति में जहां भी प्राचीन भारतीय तत्व जोड़ने का विचार आता है वहां उसका विरोध प्रारंभ हो जाता है।
संत कबीर कहते हैं कि
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धरती अम्बर न हता, को पंडित था पास।
कौन मुहूरत था थापिया, चांद सूरज आकास।।
            हिन्दी में भावार्थ-जब न धरती थी न यह आकाश तब कौन सा पंड़ित था जब आकाश में सूरज और आकाश स्थापित किये गये।
पढ़ि पढ़ि और समुझावई, खोजि न आप सरीर।
आपहि संशय में पड़े, यूं कहि दास कबीर।।
            हिन्दी में भावार्थ-किताब पढ़कर स्वयंभू विद्वान दूसरों को समझाते हैं पर उन्हें अपने शरीर का ज्ञान नहीं रहता। वह तो स्वयं ही संशय में पड़े रहते हैं।

            हमारे देश में बौद्धिक क्षेत्र में सक्रिय पेशेवर लोग स्वयं को सिद्ध मानते हैं।  आधुनिक शिक्षा में संपन्न होने के बाद धनवान, उच्च पदस्थ तथा कुशल बौद्धिक प्रबंधकों के सानिध्य की वजह से उनको लगता है वह पश्चिमी तात्विक ज्ञान धारण करने में सक्षम हो गये हैं और भारतीय ज्ञान तो केवल उन पेशेवर संतों की पूंजी है जिन पर अक्सर वह सनसनी खेज सामग्री प्रसारित करने का अवसर पाते हैं। समाज सुधार के प्रति अपनी निष्ठ यह लोग इस तरह दिखाते हैं कि उनसे पहले कोई ऐसा प्रयास नहीं हुआ।  हमारे देश के ही अध्यात्मिक विद्वानों ने समय समय पर देश के अंधविश्वासों तथा रूढ़वादिता को निशाना बनाया है यह बात उनके समझ में नहीं आती।  यह अलग बात है कि इन बुद्धिमानों के सानिध्य में ही प्रचार माध्यम ज्योतिष के नाम पर अंधविश्वास का प्रचार करते हैं।  अपनी व्यवसयिक बाध्यताओं को वह छिपाते हैं पर अंततः वह बाहर दिख ही जाती हैं। एक तरफ समाज सुधार से कथित प्रतिबद्धता का पाखंड दूसरी तरफ विज्ञापनों प्रसारण की बाध्यता कि बीच इनका सतही ज्ञान सहजता से देखा जा सकता है।
            

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, November 22, 2014

कबीर पंथ पर फकीर ही चल सकते हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख(kabir pant par faqir hi chal sakte hain-hindi thought article)




            हमारे देश में महापुरुषों के नाम पर बहुत सारे पंथ बन गये हैं। इसमें आजकल कबीर पंथ की बहुत चर्चा है।  संत कबीर दास जी ने हमेशा ही भक्ति तथा ज्ञान साधना को एकांत का विषय बताया है। इतना ही नहीं उन्होंने धर्म के नाम पर ठेकेदारी करने वाले कथित संतों पर भी तीखे कटाक्ष किये हैं।  हैरानी की बात यह है कि भगवान नाम स्मरण से ही संसार सागर को पार करने का संदेश देने वाले संत कबीर के नाम पर भी पंथ चलाकर भीड़ का एकत्रीकरण होता रहा है।  संत कबीर ने कभी कोई अपना संगठन या आश्रम बनाया  अथवा शिष्यों को दीक्षा देने का कोई नाटक किया हो इसका उदाहरण नहीं मिलता।  उनकी रचनायें भी शिष्यों की बजाय संपूर्ण समाज को संबोधित करती हैं।
            हरियाणा के एक कथित संत ने पूज्यनीय कबीर का जितना मखौल बनाया है उसका उदाहरण आज तक नहीं देखा गया। कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिये उन्होंने अपने आश्रम के बाहर भक्तों और शिष्यों को एकत्रित कर लिया है ताकि वहां पुलिस प्रविष्ट न हो सके। हथियार बंद लोग न केवल अपने कथित गुरू को बचाने का प्रयास करते वरन् पुलिस पर हमले भी कर रहे थे।  संत के पकड़े जाने के बाद उनके महलनुमा आश्रम से अनेक प्रकार के हथियार तथा अन्य आपत्तिजनक वस्तुऐं बरामद होने के समाचार आ रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम का न तो अध्यात्मिक दर्शन और नही  उन महान संत कवि कबीर दास जी के संदेशों से संबंध है जिन्हें हमारा ज्ञानी समाज अपनी अनमोल धरोहर मानता है।

संत कबीर कहते हैं कि
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गुरुवा तो घर घर फिरै, दीक्षा हमरी लेहु।
कै बूड़ौं कै ऊबरौ, टका पर्दनी देहु।।
            हिन्दी में भावार्थ-गुरू तो घर घर फिर अपनी दीक्षा देने के लिये फिरते हैं। उनका केवल धन से मतलब होता है शिष्य उबरे या डूबे इससे उनका कोई मतलब नहीं होता।
सतगुरु ऐसा कीजिये, जाके पूरन मन्न।
अनतोले ही देत है नाम सरीखा धन्न।
            हिन्दी में भावार्थ-गुरु तो वही हो सकता है जिसका मन भरा हुआ है तथा वह बिना तोले ही नाम स्मरण जैसा धन देते हैं।

            कबीर ने संपूर्ण भारतीय समाज को एक इकाई माना है।  वह एक छोटे समूह का प्रतिनिघित्व नहीं करते थे वरन् उन्हें भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में एक ऐसा महापुरुष माना जाता है जिसकी चर्चा के बिना कोई ज्ञानी संत वाणी से से निकले शब्द समूह को अधूरा ही मानता है। आज हम जब कबीर पंथ के नाम पर चले ऐसे धार्मिक संगठनों या कथित संतों की क्रियायें देखते हैं तो लगता है कि वह दोहरे अपराध में लिप्त हैं-एक तो उनका नाम लेकर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के सिद्धांतों की आड़ में भ्रम फैलाना दूसरा कानून से  अपने आप को बड़ा समझकर न्याय सिद्धांतों का अपमान करना।  इस दोहरे अपराध की सजा भी दोहरी होना चाहिये। जिस अपराध पर कानूनी कार्यवाही होनी है वह तो करना ही चाहिये साथ ही उन पर धर्म को अपमानित करने का मामला भी दर्ज किया जा सकता है। हालांकि इसी बची यह भी खबर आयी है कि जिस तरह आश्रम से पुलिस पर आक्रमण किया गया उससे उस कथित संत पर राष्ट्रद्रोह का मामला दर्ज किया गया है।  एक कथित कबीर पंथी अगर वास्तव में अपनी राह चला होता तो कभी भी ऐसी नौबत नहीं आती।  अब तो उनके भक्त भी उन्हें छोड़कर जाते हुए यह कह रहे हैं कि वह कभी इस आश्रम में नहीं आयेंगे।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, November 15, 2014

म्लेच्छ लोगों से सतर्क रहें-हिन्दी चिंत्तन लेख(mlechchha logon se satark rahen-hindi though article)



            आजकल हम अपने देश में एक खराब प्रवृत्ति देख रहे हैं कि अपनी समस्याओं, दुर्घटनाओं तथा बुरे व्यवहार से उपजे क्रोध का का लोग सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं-इस दौरान वाहनों को जलाने, प्रहरियों पर पत्थर फैंकने तथा राहगीरों का मार्ग अवरूद्ध कर उन्हें मारने पीटने तक के समाचार आते हैं।  अनेक ऐसे भी समाचार आये कि अनेक शहरों में सेना तथा पुलिस भर्ती के लिये आये युवकों ने अपनी  निराशा का आक्रामकता का प्रदर्शन  करते हुए  सार्वजनिक संपत्ति को न केवल हानि पहुंचाई वरन् राहगीर महिलाओं के साथ अभद्रता भी की।  अनेक बार ऐसे समाचार भी आते हैं कि किसी वाहन से कोई राहगीर कुचल जाता है तो वहां के स्थानीय निवासियों में शािमल कुछ असामाजिक तत्व वाहन जलाने, दुकाने लूटने और प्रहरियों पर पत्थर बरसाने लगते हैं। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन इस तरह की प्रवृत्ति को म्लेच्छ प्रवृत्ति का मानता है। यह बात समझ लेना चाहिये।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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वापल-कूप-तडागानामारा-सुर-वेश्मनाम्।
उच्छेदने निराऽशङ्कः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते।।
            हिन्दी में भावार्थ-बावडी, कुंआ, वाटिका तथा देवालय में तोड़ फोड़ करने पर जिसे डर नहीं उसे म्लेच्छ कहा जाता है।

            समाज के निराशा का वातावरण जो बना है उसके लिये लोगों का अति आशावाद भी जिम्मेदार है। सभी लोग यह चाहते हैं कि  वह धनी और सुविधासंपन्न हो जायें।  हर कोई नौकरी करना चाहता है।  स्वाभिमानी सभी दिखना चाहते हैं पर स्वामित्व की प्रवृत्ति बहुत कम लोग में पाई जाती है। दूसरे के सामान पर विलासिता मिल जाये या फिर चाहे जैसे भी हो हमारी सभी जगह तूती बोले, इस तरह की सोच ने लोगों का अन्मयस्क बना दिया है।  जैसा कि देखा गया है कि धनी तथा प्रसिद्ध लोगों प्रभाव राजकीय संस्थाओं पर है जिसका लाभ उन्हें मिलता है, वैसा स्वयं को न मिलने पर आमजन क्रुद्ध रहते हैं।  इसलिये स्वयं को शक्तिशाली दिखाने के लिये  अनेक असामाजिक तत्व सदैव तत्पर रहते हैं और जहां आमजन को उत्तेजत करने का अवसर मिले वह अपने साथ साफ करते हैं।  इस तरह के हिंसक प्रदर्शन को  जन उपद्रव का नाम दिया जाता है पर सच  यह है कि दुकानें लूटना और आग लगाने का काम अपराधी ही करते हैं जिनका लक्ष्य अपना हित साधना होता है।  हमें ऐसे म्लेच्छ प्रवृत्ति के लोगों की पहचान कर उनसे सतर्क रहना चाहिये।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Thursday, November 06, 2014

भारतीय अध्यात्मिक पंरपरा में श्रीगुरुनानक देव का महान योगदान अविस्मरणीय-प्रकाश पर्व पर विशेष हिन्दी लेख(bhartiya adhyatmik parampara mein shri guru nanak dev ka mahan yogadan avismarniy-prakash parva par visheh hindu lekh, A Specila hindi article on birth day of shri guru nanak dev prakash parva)



           
            आज श्री गुरुनानक देव जी का 546 वां प्रकाश पर्व मनाया जा रहा है। गुरूनानक देव जी ने भारतीय अध्यात्मिक परंपरा की रक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वैसे तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन प्रारंभ से ही तत्वज्ञान धारण कर उसक अनुसार जीवन जीने के संदेश देता है पर कथित विद्वान इसकी आड़ में कर्मकांडों के नाम पर समाज को अंधविश्वास की तरफ ढकेल देते हैं। श्रीगुरुनानक देव ने इन्हीं अंधविश्वासों पर प्रहार करते हुए हृदय से परमात्मा की भक्ति करने की जो प्रेरणा के साथ ही समाज के कमजोर तथा गरीब वर्ग की सहायता की जो प्रेरणा दी वह अनुकरणीय है।
            श्रीगुरुनानक देव जी ने स्वयं किसी धर्म की स्थापना नहीं की। उनके बाद आये गुरुओं ने अपने समय की संक्रमित स्थितियों  को देखकर सिख पंथ की स्थापना का भी  भारतीय धर्म और संस्कृति कि रक्षा के लिये ही  की थी। श्रीगुरुनानक देव जी का जीवन सदैव समाज चिंतन और सुधार में बीता। बहुत कम लोग हैं जो आज के सभ्य भारतीय समाज में उनकी भूमिका का सही आंकलन कर पाते हैं। उनके काल में भारतीय समाज अंधविश्वासों और कर्मकांडों के मकड़जाल में फंसा हुआ था। कहने को लोग भले ही समाज की रीतियां निभा रहे थे पर अपने धर्म और संस्कृति कि  रक्षा के लिये उनके पास कोई ठोस योजना नहीं थी। राजनीतिक रूप से विदेशी आक्रांता अपना दबाव इस देश पर बढ़ा रहे थे। इन्हीं आक्रान्ताओं  के  साथ आये कथित विद्वान सामान्य जनों  को अपनी विचारधारा के अनुरूप माया मोह की तरफ दौड़ाते दिखे। देश के अधिकतर राजाओं का जीवन प्रजा की भलाई की बजाय अपने निजी राग द्वेष में बीत रहा था। वह राज्य के व्यवस्थापक का कर्तव्य निभाने की बजाय उसके उपभोग के अधिकार में अधिक संलग्न थे। यही कारण था कि जन असंतोष के चलते विदेशी राजाओं ने उनको हराने का सिलसिला जारी रखा। इधर सामान्य लोग भी अपने कर्मकांडो में ऐसे लिप्त रहे उनके लिये कोई नृप हो हमें का हानिकी नीति ही सदाबहार थी।
      मुख्य विषय यह था कि समाज धीरे धीरे विदेशी मायावी लोगों के जाल में फंसता जा रहा था और अपने अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति उसका कोई रुझान नहीं था। ऐसे में महान संत श्री गुरुनानक देव जी ने प्रकट होकर समाज में अध्यात्मिक चेतना जगाने का जो काम किया वह अनुकरणीय है। वैसे महान संत कबीर भी इसी श्रेणी में आते हैं। हम इन दोनों महापुरुषों का जीवन देखें तो न वह केवल रोचक, प्रेरणादायक और समाज के लिये कल्याणकारी है बल्कि सन्यास के नाम पर समाज से बाहर रहने का ढोंग करते हुए उसकी भावनाओं का दोहन करने वाले ढोंगियों के लिये एक आईना भी है| गुरुनानक देव और कबीरदास जी  के भक्त ही उनका ज्ञान धारण  कर इस असलियत को समझ  सकते हैं। इन दोनों महापुरुषों ने पूरा जीवन समाज में रहकर समाज के साथ व्यतीत किया। भारतीय अध्यात्मिक संदेश अपने पांवों पर अनेक स्थानों घूमते हुए सभी जगह फैलाया। श्री गुरुनानक देव जी तो मध्य एशिया तक की यात्रा कर आये।
श्री गुरुनानक देव जी के सबसे निकटस्थ शिष्य मरदाना को माना जाता है जो कि जाति से मुसलमान थे। आप देखिये गुरुनानक देव जी के तप का प्रभाव कि  उन्होंने अपना पूरा जीवन गुरुनानक जी के सेवा में गुजारा। इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि मरदाना ने कभी  अपना धर्म छोड़ने या पकड़ने का नाटक किया। दरअसल उस समय तक धर्म शब्द के साथ कोई संज्ञा या नाम नहीं था। मनुष्य यौनि मिलने पर संयम, परोपकार, दया तथा समभाव से जीवन व्यतीत किया जाये-यही धर्म का आशय था।
      आज धर्मों के जो नाम मिलते हैं वह पेशेवर धार्मिक ठेकेदारों एक सोचीसमझी साजिश के तहत समाज को बांटकर उस पर शासन करने की नीति का परिणाम है।
श्रीगुरुनानक देव जी के समय इस देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक दृष्टि से संक्रमण काल था। वह जानते थे कि भौतिकवाद की बढ़ती प्रवृत्ति ही इस समाज के लिये सबसे बड़ा खतरा है, जिसमें धार्मिक कर्मकांड और अंधविश्वास अपनी बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इससे व्यक्ति की चिंतन क्षमता का ह्रास  होता है और वह बहिर्मुखी होकर दूसरे का गुलाम बन जाता है। भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता मनुष्य को दास बना देती है। अधिक संचय की प्रवृत्ति से बचते हुए दान, सेवा और परोपकार करने से ही समाज समरसता आयेगी जिससे शांति और एकता का निर्माण होगा-यही उनके संदेशों का सार था। सबसे बड़ी बात उनका जोर व्यक्ति निर्माण पर था। हम अगर इस पर विचार करें तो पायेंगे कि व्यक्ति मानसिक रूप से परिपक्व, ज्ञानी और सजग होगा तो भले ही वह निर्धन हो उसे कोई भी दैहिक तथा मानसिक रूप से बांध नहीं सकता। यदि व्यक्ति में अज्ञान, अहंकार तथा विलासिता का भाव होगा तो कोई भी उसे पशु की तरह बांध कर ले जा सकता है। आज हम देख सकते हैं कि टीवी चैनलों पर कल्पित पात्रों पर लोग किस तरह थिरक रहे हैं। उसी में अपने नये भगवान बना लेते हैं। कई युवक युवतियों यह कहते हुए टीवी पर देखे जा सकते हैं कि हम तो अमुक बड़ी हस्ती को प्यार करते हैं। यह अध्यात्मिक ज्ञान से दूरी का परिणाम है। इसलिये आवश्यकता इस बात है कि बजाय हम इस बात पर विचार करें कि दूसरे धर्म के लोग हमारे विरोधी हैं इस बात पर अधिक जोर देना चाहिये कि हमारे समाज का हर सदस्य दिमागी रूप से परिपक्व हो। अध्यात्मिक रूप से अपरिपक्व युवक हो युवती समाज रक्षा में सहयोगी नहीं बन सकते।
      इस देश की मुख्य समस्या यह है कि मनुष्य ही मनुष्य का पशु रूप में दोहन करता है।

श्री गुरुनानक देव जी ने इसी तरफ इशारा करते हुए कहा है कि
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जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु।

     हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य का ही रक्त पीता है उसका चित कैसे निर्मल हो सकता है।

      खावहि खरचहि रलि मिलि भाई।
तोटि न आवै वधदो जाई।।;;

     हिंदी में भावार्थ- भाई, सभी मिलकर खर्च करो और खाओ। इससे टोटा नहीं पड़ता बल्कि वृद्धि होती है।
      ऐसे एक नहीं हजारों संदेश है जो आज के संदर्भ में ही उतने प्रासंगिक हैं जितने उनके इस धरती पर प्रकट रहते हुए थे। ऐस महान संत श्री गुरुनानक देव जी का स्मरण करने मात्र से हृदय प्र्फुल्लित हो उठता है। उनका जीवन इसलिये भी प्रेरक है क्योंकि उन्होंने उसे सामान्य मनुष्य की तरह बिताया। ऐसे महान संत को कोटि कोटि प्रणाम। वाहे गुरु की जय, वाहे गुरु की फतह।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Wednesday, October 29, 2014

सात्विक जीवन जीना भी तप है-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(satwik jeevan jeena bhee tap hai-A hindu hindi religion thought based on manusmriti)




            हमारे देश में श्रीमद्भागवत गीता जैसे पवित्र ग्रंथ भी है जो जीवन जीने की कला सिखाता है पर आश्चर्य इस बात का है कि धर्म के कथित ज्ञाता उसी के ज्ञान के नाम पर भारी भ्रम फैलाते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में गुरु की सेवा करने की बात कही गयी है यह उचित भी है। यह अलग बात है कि श्रीमद्भागवत गीता में तत्वज्ञान देने वालों को ही गुरु मानने का संकेत दिया गया है।  दैहिक गुरु न होने पर श्रीगीता का अध्ययन करने पर भी जीवन सुख मिलने की प्रेरणा भी दी गयी है। यह अलग बात है कि श्रीमद्भागवत गीता में गुरु सेवा के संदेश की आड़ में अनेक पाखंडी अपने पांव छुआकर लोगों को स्वर्ग दिलाने का आश्वासन देते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में पवित्र ग्रंथों के अध्ययन को भी तप माना गया है।  उनके शब्दों को ही गुरु रूप भी कहा गया है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि
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वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्स्यन् द्विजोनामः।
वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते।।
            हिन्दी में भावार्थ-संसार में वेदों की शिक्षानुसार अपने जीवन को व्यतीत करने से बड़ा कोई तप नहीं है, यदि कोई मनुष्य वास्तव में तप करना चाहता है तो उसे वेदों का अध्ययन करना चाहिये।

            तप के नाम पर द्रव्यमय हवन और यज्ञों को ही प्रचारित किया जाता है ताकि उससे धर्म से चलने वाले व्यापार में आथ्रिक लाभ हो।  श्रीमद्भागवत गीता में प्राणायाम को भी यज्ञ कहा गया है। योग साधना में अपनी ही देह में उत्पन्न ऊर्जा से हवन करने पर अमृत की अनुभूति का अनुभव वाले साधक को भी एक तपस्वी माना गया है। जबकि देखा यह गया है कि द्रव्यमय यज्ञ में खीर या अन्य खाद्य पदार्थ को प्रसाद को अमृत कहकर खाने के लिये लोग तत्पर रहते हैं। अमृत का केवल भौतिक स्वरूप मानने वाले ज्ञानी नहीं हो सकते यह बात तय है। अमृत का आशय है कि सुखानुभूति से भी है यह बात ज्ञान साधक जानते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है। ज्ञानमय यज्ञ से पैदा अमृत मुख से नहीं वरन् आज्ञा चक्र से ग्रहण किया जाता है।
            हमारे यहां अनेक ऐसे महापुरुष ऐसे हुए हैं जिन्हें दैहिक गुरु की बजाय परमात्मा या फिर पवित्र ग्रंथों को अपना गुरु बनाकर तप किया और समाज को एक नयी दिशा दी। उनसे प्रेरणा लेकर  कभी भी दैहिक गुरु न मिलने से निराश होकर बैठने की बजाय पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिये।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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