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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Sunday, June 11, 2017

राष्ट्रवादियों में अब अवसाद बढ़ता दिख रहा हे-हिन्दी संपादकीय

                             हमने यह लेख एक राष्ट्रवादी का लेख पढ़कर लिखा है जिसमें वह उदित भारत के एक मंत्री को महत्व न मिलने से दुःखी हैं। उन्हें लगता है कि वह होते तो सरकार का रूप अलग होता। हमारा मानना है कि वह भी एक नकारा मंत्री था जो पूंजीपतियों के हित में काम करता था। वैसे भी मेंत्री नहीं वरन् अधिकारी काम करते हैं। सामान्य राष्ट्रवादियों में यह भ्रम है कि उनके वरिष्ठ ज्यादा बौद्धिक हैं इसलिये कुशल प्रबंधक भी हैं। 
ओलंपिक में पचास सौ पदक ले लिये होते तो मान लेते कि मांस खाने से शक्ति व पराक्रम मिलता है। मांस खाने की वकालत करने का हक केवल रूस, चीन, अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका जर्मनी, फ्रांस तथा आस्ट्रेलिया जैसे देशों के विद्वानों को है। हमारे देश की हालत ओलंपिक में क्या है सभी जानते हैं? यह मांस खाने वाले वहां कौन तीर मारते हैं जो यहां जानवारों को मरवाकर पार्टियां मना रहे हैं। इनके अनुसार तो यह धरती केवल मनुष्यो के लिये जबकि हमारा दर्शन मानता है कि यह सभी जीवों के लिये है।  जीवहत्या पाप है चाहे वह कुत्ते की हो या गाय की।
                        अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने ही देश की मीडिया पर आरोप लगाया है कि वह असली समाचार छिपाकर फर्जी  दिखा रहा है।  हम अपने देश के मीडिया का चालचलन देखें तो वह अमेरिका राह पर ही चलता है। जिस तरह गोरक्षकों की गुंडागर्दी, सामूहिक मांसभक्षण मेला या महिलाओं के प्रति अपराध के वीडियो मीडिया पर लाकर पूरी सरकार वह समाज पर छींटाकशी की जाती है उससे संदेह भी होता हैं। अभी एक लड़की के साथ बदतमीजी हुई।  अपराधियों ने ही वीडियो अपलोड किया। मीडिया में आया तो पुलिस सक्रिय हुई। अपराधी पकड़े जा रहे हैं।  कुछ दिन तक लोगों को याद रहेगा फिर भूल जायेंगे।  यह देखने फिर कौन जा रहा है कि वहां अब क्या हो रहा है? अपराधी स्वयं वीडियो अपलोड कर रहे हैं।  अभी दक्षिण में कुछ जगह मांसभक्षण मेले लगे।  मीडिया ऐसे बता रहा था जैसे कि पूरे दक्षिण में यह हो रहा है-सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह कि यह तक बड़ी शिद्दत से दिया जा रहा था कि हिन्दू भी गौमांस खाते है।  गोरक्षकों की गुंडागदी के र्वीडयो तो इस तरह दिखते हैं जैसे कि स्वयं उन्होंने मीडिया के लिये प्रायोजित सेवा की है।  यह कैसे संभव है कि गोरक्षक गुंडागदी कर रहे हों और वह किसी दूसरे को इतने आराम से फोटो खींचने दें।  फिर दूसरा शक यह भी है कि दिन में एक दो घटनायें ही ऐसी आती है जिनका वीडियो होता है। ऐसी खबर क्यों नही आती जिसका वीडिया न बना हो। मतलब यह कि कैमरा सामने होने पर ही यह घटनायें होती हैं।  कभी कभी तो लगता है कि आपसी मारपीट की खबर भी गौरक्षकों से जोड़ दी जाती है।  ऐसेक में शक होता है कि कहीं योजनाबद्ध ढंग से खबरें बनवायी तो नहीं जा रही ताकि देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, महंगाई तथा अपराधों पर कम ही चर्चा हो । अगर हो तो सतही तरह से।
                                 एक भारतीय पूंजीपति की लाहौर यात्रा पर भारत व पाकिस्तान के प्रचार माध्यमों में बहुत चर्चा है-कोई इसे व्यक्त्रिगत तो कोई इसे पर्दे के पीछे की राजनीति मान रहा है। हमारा सबसे अलग विचार है-इस विचार को कार्ल मार्क्स से प्रभावित कतई न समझें।  हमें तो ऐसा लगता है कि विश्व के सभी राष्ट्र अब पूंजीपतियों के क्लब बन गये हैं। जिस तरह हमें यहां मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई, दिल्ली तथा अन्य बड़े शहरों के नामो पर क्रिकेट टीमें बनाकर क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में लोगों की भावनाओं को उबारा जाता है यही स्थिति अब राष्ट्र के नामों पर भी हो रही है। सीधी बात कहें तो राष्ट्रवाद के नाम पर स्वार्थवाद चल रहा है। हमने देखा कि अमेरिका में राष्ट्रवाद के नारे पर आये ट्रम्प अब पुराने मार्ग पर ही चल दिये।  भारत के जिस पूंजीपति ने लाहौर की यात्रा की उस पर पाक मीडिया यह आपत्ति उठा रहा है कि उसने अपने वीजा नियमों से अलग जाकर उस जगह जाकर पाक प्रधानमंत्री शरीफ  से मुलाकत की जहां उन्हें अनुमति नहीं दी। पाक मीडिया तो अपने ही प्रधानमंत्री पर नियम तोड़ने कर आरोप लगा रहा है।  हमें इस तरह की घटनाओं पर आश्चर्य नहीं है।  दुनियां में कंपनी नाम के दैत्य ने सभी राष्ट्रों को  क्लब बना लिया है।  राष्ट्रप्रमुखों ने इस कपंनी दैत्यों से मित्रता की है या वह उसकी नौकरी करते हैं यह अलग से बहस का विषय है इतना तय है कि तानाशाह शी जिनपिंग हो या पुतिन वह भी इन पूंजीपतियों में प्रभाव या दबाव में है।  यही कारण है कि हम कहते हैं कि तीसरे विश्वयुद्ध की संभावना नहीं है। सुविधाभोगी कभी युद्ध नहीं कर सकते अलबत्ता आमलोगों को मरवाकर अपना शौक जरूर पूरा करते हैं।

राष्ट्रवादियों को तो लोहा तब मानते जब भारत पाक के एक समूह में होने पर सवाल उठाते (Nationalism and India-HindiArticle)


                          किसी भी अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में यह जरूरी नहीं कि भारत का पाकिस्तान से मुकाबला हो। दरअसल नाकआउट दौर में पहुंचने से पहले लगी मैच होते है जिसमें सदस्य देशों के वरीयता सूची के  आधार पर होता है। हॉकी में भारत सदैव दूसरे समूह में रहता था और दोनों टीमें सेमीफायनल फायनल में टकराती थीं। कम से कम तीन विश्व क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत पाकिस्तान आपस में सामने नहीं खेले।  अब हालत यह है कि हर क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत पाकिस्तान के एक ही समूह में रहते हैं। सच बात तो यह है कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट प्रतियोगिता में सबसे ज्यादा राजस्व भारत पाक मैच से मिलता है। लगता है कि टीम की वरीयतायें छोड़कर आयोजक अधिक राजस्व कमाने के लिये भारत पाक मैच अनिवार्य बनाते हैं। अगर पाकिस्तान या भारत अलग अलग समूहों में रहें तो इसकी संभावना रहती है कि कोई एक या  दोनों ही नाकआउट दौर में पहुंचे ही नहीं और राजस्व की हानि हो जाये। अगर राष्ट्रवादी यह पूछते कि आखिर भारत पाकिस्तान एक ही समूह में कैसे रखे जाते हैं तो बात जमती भी।  दरअसल राष्ट्रवादियों के शिखर पुरुष कभी भी अपने अनुयायियों को तार्किक बनते देखना नहीं चाहते क्यों तब राजकाज के संबंध में कठिन सवाल वह उठाने लगेंगे जो कि विरोधियों को भी रास आयेंगे। हम राष्ट्रवादियों  को समझाते रहें हैं कि क्रिकेट खेल नहीं व्यापार है जिसमें पूंजीपति और सट्टेबाज साथ साथ मिले हैं। देशभक्ति का रस इसमें मिलाया जाता है ताकि लोग भ्रम में रहें।
                    कल हमने मैचा देखा पर परिणाम से अधिक हमारी रुचि खिलाड़ियों के हावभाव में ही थी-पाकिस्तान के पुराने दिग्गजों ने पहले ही कह  दिया था कि उनके कम से तीन खिलाड़ी चमत्कारिक प्रदर्शन करें तभी भारत से जीत पायेंगे पर इसकी संभावना नगण्य है। कल भारतीय खिलाड़ियों के हावभाव ऐसे लग रहे थे जैसे कि सेठ हों तो पाकिस्तानी रोजंदारी वाले मजदूर दिख रहे थे। न उन पर हार के तनाव का भय था न भारतीयों से परंपरागत प्रतिद्वंद्वता वाला भाव था। भारत के अधिकतर खिलाड़ी करोड़ों में खेलने वाले हैं जबकि पाकिस्तानी अब रूखे सूखे से ही काम चलाते नज़र आ रहे थे। अब तो स्थिति यह है कि बीसीसीआई सरकार से दबाव डालकर कहीं पाकिस्तान से द्विपक्षीय श्रृंखला खेलना भी चाहे तो अनेक बड़े खिलाड़ी यह कहकर अलग हो सकते हैं कि इतनी स्तरहीन टीम से हम नहीं खेलेंगे तब दोयम दर्जे की टीम उसके यहां भेजी जायेगी-जैसा जिम्मबाब्बे व वेस्टइंडीज में भेजी जाती है।
जीन्यूज को अतिराष्ट्रवाद से बचना चाहिये।
            जी न्यूज चैनल अतिराष्ट्रवाद की तरफ बढ़ता जा रहा है जो कि बोरियत पैदा करता है। बात पाकिस्तान से चैंपियंस ट्राफी में खेलने की है। भारत ने तय किया है कि वह पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय क्रिकेट श्रृखला नहीं खेलेगा।  ऐसा पहले भी कई बार हुआ पर ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में पाकिस्तान से भारत खेलता है। जीन्यूज अब चैंपियंस ट्राफी में चाहता है कि भारत पाकिस्तान से न खेले और उसे दो अंक ले जाने दे। हम सदा ही पाकिस्तान से द्विपक्षीय श्रृंखला के विरोधी हैं पर अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में उससे मुकाबले रोकने का समर्थन नहीं करते।  हमारी राय में यह अतिराष्ट्रवाद है जो सोच को कुंद कर देता है।
हवाला पर फौजदारी कार्यवाही के बिना कहीं किसी भी समस्या का हल मिलना संभव नहीं है। यह समन वमन से कुछ नहीं होने वाला!  नोटबंदी के बाद सब जगह अपराध लगभग थम गये थे पर जैसे ही बाज़ार में पैसा आ गया। सब कुछ वैसा ही हो गया।  हमें तो ऐसा लग रहा है कि इस देश में हवाला कारोबारी ही सबसे ज्यादा प्रभावी है। वह इधर भी खिलाते हैं उधर भी खिलाते हैं।  इसलिये न वह पकड़े जाते हैं न उनके ग्राहक!  खालीपीली टीवी पर बहसें देखते रहो।

Thursday, May 18, 2017

विज्ञापनों में भी दिखती है हिन्दूत्व विरुद्ध धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई (War in Adversiment on Hindutv Vs Secularis)

            फिल्मी व टीवी उद्योग के  लोग भले ही दावे करें कि उनके यहां सब सामान्य है पर जानकार लोग मानते हैं कि यह सब दिखावा है।  गैर हिन्दू देशों का पैसा भारतीय मनोरंजन व्यवसाय में आता है इसलिये ही उसमें पीर फकीर संस्कृति की आड़ लेकर भारतीय धर्मो का आकर्षण कम करने वाली कहानियां लिखी जाती हैं। इस पर बहस अलग से कर सकते हैं पर हमें तो यह विज्ञापनों में भी दिखाई देने लगा है।
अभी हाल ही में बाहूबली फिल्म की सफलता ने पूरे विश्व में झंडे गाड़े। हमारे मुंबईया फिल्म के तीन कथित नायकों की-यह धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक माने जाते हैं-सफलता उसके आगे फीकी हो गयी। वैसे में अनेक जानकार यह सवाल उठाते हैं कि फिल्म उद्योग को अक्षयकुमार व अजय देवगन कोई कम कमा कर नहीं देते पर उन्हें सुपर स्टार कहते हुए गैर हिन्दू देशों के पूंजीपतियों से प्रायोजित प्रचार माध्यम उस तरह महत्व नहीं देता। बहरहाल बाहूबली पर पाकिस्तानी प्रचार माध्यमों ने भी रोना रोया-यह अलग बात है कि वहां यह फिल्म भी जमकर चल रही है।  ऐसे में जब धर्मनिरपेक्ष महानायकों की छवि धूमिल हो रही थी तो एक विज्ञापननुमा समाचार एक चैनल में देखा जिसमें दंगल फिल्म की चीन में सफलता की चर्चा की गयी थी और धर्मनिरपेक्ष नायक दिखाया जा रहा था। देखा जाये तो बाहूबली से पहले ही दंगल फिल्म बाज़ार में आयी है। बाहुबली चीन में भी सफल मानी जा रही है। जिस चैनल पर यह समाचानुमा विज्ञापन आया वह धर्मनिरपेक्षता का झंडाबरदार है। ऐसे में दंगल की चीन में सफलता की बात वह कर रहा था तो लगा कि कहीं नि कहीं विज्ञापननुमा समाचारों की भी रचना की जाती है कि धर्मनिरपेक्षता कहीं हिन्दुत्व से पिछड़ न जाये।


Tuesday, May 02, 2017

आम आदमी से परे चल रहे हैं शिखर पुरुष-हिन्दी वैचारिक लेख (comnan man and Very importent parson-HindiThought artifcle)


                                         भारत में जमीन पर रैंगने वाला आम आदमी कला, पत्रकारिता मीडिया राजनीति, धर्म, तथा संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय सभी संगठनों के शिखर पुरुषों के लिये प्रयोक्ता है। इन संगठनों में सक्रिय लोग ी कभी आदमी रहे होते हैं फिर भी जब इन पर विशिष्ट पद होने का अहंकार चढ़ता है। तब उनकी सोच बदल जाती है। वह विशिष्ट सोचते हैं दिखते हैं और बोलना चाहते हैं-उनको अपनी विशिष्टता की अनुभूति तभी होती है किसी को पांव तले कुचलकर निकलते हैं।  वातानुकूलित यंत्रों में विलासिता से सुस्त हुई देह के कारण मस्तिष्क का चिंत्तन कुंद हो जाता हैं। तब वह आम आदमी की सुनना नहीं चाहते और नतीजा यह कि वह जो बोलते हैं वह आम आदमी समझता नहीं है। नतीजा यह कि व्यक्ति निर्माण का कार्य लगभग ठप्प हो गया है। 
                                 संड़कें संकरी रहीं पर वाहन चौड़े हो गये। रास्ते पर लोग टकराने लगे हैं। जंगल जैसी जंग है जहां हर शक्तिशाली पशु कमजोर को खाना चाहता हैं। आमआदमी की औकात प्रयोक्ता जैसे है उसे सृजक तो माना ही नहीं जा सकता। सृजक वही है जो पद, पैसे और प्रतिष्ठा के सहारे शिखर पर बैठा है।  संगठित मीडिया ने अपनी चाटुकारिता से सोशलमीडिया का भी अपहरण कर लिया है। एक गायक का टिवटर विवादास्पद हो सकता है पर किसी आम आदमी की खास टिप्पणी आज तक नहीं दिखाई गयी।  किसी ऐसे व्यक्ति को सोशलमीडिया से पर्दे पर बहस के लिये नहीं लाया गया जिसके पास पद, पैसे और प्रतिष्ठा का शिखर नही है। अगर यकीन न हो तो समाचार चैनलों की बहस देख लें जहां केवल दस या पंद्रह चेहरे ही हैं जो इधर उधर घूमकर अपनी वाक्चातुर्य कला का प्रदर्शन करते हैं-न उनकी तथ्यों पर गहन दृष्टि होती है न ही स्वयं का चिंत्तन होता है।  एक तय प्रारूप में सब चल रहा है। सब कुछ क्रिकेट की तरह फिक्स लगता है।  
                           ऐसे में हम जैसे लोगों के लिये यही उपाय है कि वह अपने सीमित क्षेत्र में ही मौज करते रहें।  अपनी नियंत्रण रेखा स्वयं नहीं दूसरों की ताकत से तय करें। घर से बाहर निकलते ही समझें कि वह पराये देश मे आ गये हैं।  हर जगह ताकतवर लोगों के दलाल बैठे हैं। कहीं दलाल ही ताकतवर हो गये हैं। घर से बाहर जाने के बाद सुरक्षित, सम्मानित और संतोष के साथ लौट आने पर माने कि आपने विदेश यात्रा कर दी। भीड़ में कोई अपना नहीं है और जो सामने है उनसे विवाद में तपना नहीं है।  धर्म, कला, पत्रकारित, राजनीति, समाजसेवा और जनकल्याण के नाम पर शिखर पुरुषों ने हड़प ली है और वह इस तरह वहां विराजे हैं जैसे कि वहां के राजा हों। निराशा के इस वातावरण में भी धन्य है वह आम आदमी जो भगवान भक्ति करते हुए सारे संकट सहजता से झेल लेता है। वह जानता है कि इस धरती पर अप्रत्यक्ष भगवान का ही कब्जा है भले ही प्रत्यक्ष राक्षसों ने इस हड़प रखा है। 

Sunday, April 16, 2017

सत्तर साल में सबसे अच्छे छ महीने तो जियो फ्री ने दिलवा ही दिये (Jio Free Internet Service Best Day In Las 70 years)


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                                             जियो ने छह महीने तक फ्री इंटरनेट चलाया पर हम तो अंतिम दिनों में उससे जुड़ पाये। दरअसल नोटबंदी के दौरान भी लोग इस फ्री सेवा का मजे लेते रहे और उन्हें चार्ज कराने के लिये कहीं पैसे नहीं देने पड़े। अगर नोटबंदी के दौरान जियो फ्री नहीं होता तो शायद उससे ज्यादा हाहाकार मचता जितना मचा।  देखा जाये तो पिछले तीन साल में उन लोगों ने ही अच्छे दिन देखे जिन्होंने जियो फ्री के मजे लूटे। हमारे देश में अच्छा दिन तभी होता है जब फ्री में कुछ मिल जाता है।  कहें तो जियो फ्री ने तीन साल में छह महीने में जो अच्छे दिन दिखाये वह सत्तर साल में नहीं दिखे।  भक्तों के पास यह इकलौता उदाहरण ही जो यह कह सकते हैं कि हमने तो अच्छ दिन दिखाये।  
            हम अच्छे दिन का पूरा लाभ नहीं उठा सके इसमें हमारा ही दोष है। भक्त यह भी कह सकते हैं कि हमने तो अच्छे दिन लाने का वादा किया था ले जाने का काम तुम्हारा था। नहीं किया तो अब हमारा क्या दोष?
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याद रखें इससे ज्यादा बताने को कुछ नहीं है क्योंकि बाकी चीजें तो प्रचार के लिये ही ठीक हैं। वैसे जियो वाले जिस तरह जनता में पैठ बनाये हुए हैं उससे तो वह सीधे किसी के पज्ञ़ा में राजनीतिक जनमत भी बना सकते हैं यह अलग बात है कि ऐसा प्रत्यक्ष करने की बजाय वह अप्रत्यक्ष रूप से वैसे ही सभी संगठन अपनी मुट्ठी में रखते हैं।

Sunday, March 12, 2017

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों में जनमानस का सही विश्लेषण जरूरी-हिन्दी संपादकीय (thinker not seen real India public opinian-Hindi Editorial)


                              प्रगतिशील तथा जनवादियों के लिये उत्तरप्रदेश चुनाव दक्षिणपंथियों की जीत महाराष्ट्र के निकाय चुनावों के बाद दूसरा बहुत बड़ा झटका है। राज्य प्रबंध के माध्यम से समाज में बदलाव का-जिसका स्वरूप कभी स्पष्ट नहीं कर पाये-सपना देखने वाले इन दोनों प्रकार के बुद्धिजीवियों के लिये इस तरह दक्षिणपंथ का भारत में स्थापित हो जाना चिंता का विषय है।  दरअसल इन दोनों प्रकार के बुद्धिजीवियों को पिछले 70 वर्षों से राज्य प्रबंध इसलिये मदद करता रहा ताकि यह आमजनों में एक सपना बेचते रहे जिसमें वह क्रांति के सहारे धनी हो जाये। इन लोगों ने कभी राज्य प्रबंध की सामान्य गतिविधियों में भ्रष्टाचार या लापरवाही को कभी चर्चा का मुख्य विषय बनाने की बजाय मानवता के पश्चिमी सिद्धांतों पर वैचारिक समागमों में समच बिताना बेहतर समझा।  मनुष्यों की जरूरतों से ज्यादा उसकी अस्मिता का विषय महत्वपूर्ण समझा।  कार्ल मार्क्स ने भले ही कहा हो कि आदमी की सबसे बड़ी जरूरत रोटी है पर इन लोगों ने चिकनी चुपड़ी रोटी खिलाने के सपने दिखाये। यह न हो सकता था न हुआ पर इन लोगों की वजह से राज्यप्रबंध पर लोगों का ध्यान नहीं गया जिसमें शनैःशनैः दलाल घुसते रहे।
          दक्षिणपंथियों की उत्तरप्रदेश विजय दोनों की धाराओं के विचारकों के लिये अब अस्तित्व का संकट पैदा करेगी। मणिपुर में इरोम शर्मिला ने बरसों तक भूखहड़ताल कर नाम कमाया। अचानक चुनाव लड़ने पर उतरी पर हुआ क्या? उसे केवल नब्बे वोट मिले। वह मणिपुर में आफसा कानून खत्म करने के लिये लड़ रही थी पर लोगों ने उसे महत्व नहीं दिया पर दोनों धाराओं के विचाकर उसका नाम जपते रहे। वह क्यों हारी? वजह हम बता देते हैं कि लोग चाहे कितने भी परेशान हों पर वह राज्य को अस्थिर करने वाली ताकतों को पसंद नहीं करते। इरोम शर्मिला ने भले ही राज्य को अस्थिर करने का प्रयास नहीं किया पर अप्रत्यक्ष रूप से उनकी मांग संभवत ऐसे ही तत्वों की मदद करने वाली रही होगी। यही कारण है कि वह बहुत बुरी तरह से  हारी-उसे केवल नब्बे वोट मिले वहां पड़े नाटो वोटों से भी कम। 
                           बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने नोटबंदी को लेकर यह सही कहा है कि अमीरों की बुरी हालत देखकर गरीबो को आत्मसंतोष हुआ जिसे कोई भी पढ़ नहीं सका। हमने नोटबंदी होने के तत्काल बाद लिखा था कि इससे गरीबों को सीधे कुछ नहीं मिल रहा पर मदांध अमीरों की कुछ हेकड़ी कम होगी इससे उनको संतोष होगा। अगर आप उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम देखें तो कुछ लोगों को हैरानी है कि मुसलमानों ने भक्तों की पार्टी को वोट कैसे दे दिया? दरअसल हमारे देश के पेशेवर विद्वान मुसलमानों का बाह्य रूप देखते रहे हें उन्हें यह अनुमान नहीं है कि उनका शोषण भी उसी तरह होता है जैसे समुदायों का होता है। उनमें भी उतनी ही गरीबी है जितनी दूसरों में। उनका भी मन वैसा ही जैसा दूसरों का।  ऐसे में अगर उन्हें नोटबंदी से आत्मसंतोष हुआ तो उसमें चौंकने वाली बात नहीं है। हमें आपत्ति इस पर है कि  किसी भी समुदाय को अपना बौद्धिक गुलाम या बंधुआ समझकर उसे संबोधित किया जाये।  शायद उत्तरप्रदेश में यही हुआ कि सभी समुदायों के गरीबों के मन में यह बात आई कि उन्हें बपौती समझने वालों को अब सबक सिखाया जाये-यही हुआ भी। भक्तों के इष्ट ने शायद यह समझा तभी आगे बढ़कर प्रचारकर जानमानस को अपनी दल की तरफ खींच लिया।
अब हमारे समझ में आ गया है कि उत्तर प्रदेश में भक्तों ने विजय क्यों हासिल की? दरअसल भक्तों के विरोधी सामान्यजन को गूंगा, बहरा और अंधा समझते हैं इसलिये दलित, अल्पसंख्यक तथा पिछड़ा वर्ग में बांटकर यह समझते हैं कि वह उनकी बपौती है। यह लोग भी समझ गये हैं कि भक्तों का दल भले ही उनका सीधे भला न करे पर बुरा भी नहीं करेगा।  कम से कम भक्त अपनी पहचान छिपाते नहीं तो दूसरी की से बचते भी नहीं।  महत्वपूर्ण बात यह कि  किसी भी वर्ग को लल्लू नहीं समझते। शायद यही कारण है कि उत्तरप्रदेश के लोगों ने उनको खुलकर वोट दिये हैं। हालांकि भक्त तथा उनके इष्ट को यह समझ लेना चाहिये कि राज्यप्रबंध की प्रचलित प्रणाली में अगर बदलाव नहीं हुए तो फिर पूरा देश बहुत निराश होगा। 
इरोम शर्मिला को पता होना चाहिये था कि भूख हड़ताल तथा चुनावी राजनीति में फर्क होता है
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                                   इरोम शर्मिला 16 साल तक भूख हड़ताल पर रही। चुनाव लड़ तो हार गयीं तो कथित विद्वान पूरे भारतीय समाज पर पिल पड़े। अरे, गुजरात के एक योगी के बारे में हमने पढ़ा सुना और देखा था। उसने तो 70 वर्ष से न खाना खाया न पानी पिया है पर वह अपने महान कर्म का आंकलन करने के लिये चुनाव लड़ने नहीं गया। आत्ममुग्धतावश आंदोलन कर प्रचार में प्रसिद्धि पाना अलग बात है पर चुनाव में जाकर प्रजा का मन जीतना दूसरी बात है।  फिर आप यह क्यों सोचते हैं कि आप आंदोलन कर समाचार जगत में छा गये हैं तो पूरी जनता आपकी जयजयकार करने लगे-आपका यह पता नहीं इस देश मे आमजनों का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो न अखबार पढ़ता है टीवी देखता है और वहां तक पहुंचने के लिये अलग से प्रयास करने होते हैं-यही चुनावी राजनीति है।  यह किसी के बूते की भी नहीं है। अगर आप उसे कोस रहे हैं तो कहना चाहिये कि ‘नाच न आवै, आंगन टेढ़ा बतावै’।
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Friday, January 20, 2017

संस्कृत से अनुवादित रचनाओं ने हिन्दी को बाल्यकाल में ही संपन्न बना दिया-हिन्दी लेख (Sanskrit and Hindi-HindiArticle


                         वैसे तो हमने श्रीमद्भागवत को बीच बीच में खोलकर अनेक बार पढ़ा था पर अब प्रथम स्कंध से ही विधिवत प्रांरभ किया है।  दरअसल हमारे दिमाग में आधुनिक हिन्दी की रचनाओं को लेकर अनेक विचार घुमड़ रहे होते हैं।  अनेक लोग कहते हैं कि हिन्दी में विश्व स्तरीय रचनाओं का संकलन नहीं मिलता। वर्तमान में अनेक रचनाकार कवितायें, कहानियां, उपन्यास तथा अन्य विधाओं में रचनायें कर रहे हैं पर उन पर स्तरीय न होने का आरोप लगाकर वास्तविकता से बचा नही जा सकता। हमारा मानना है कि हिन्दी में संस्कृत सहित अन्य भाषाओं से हुए अनुवादों ने उत्तरभारतीयों का मन मस्तिष्क इतना स्तरीय बना दिया है कि उन्हें सामान्य स्तर सुहाता नहीं है।  गीताप्रेस गोरखपुर ने अकेले ही संस्कृत से अनुवाद कर हिन्दी को इतना संपन्न कर दिया है कि उसके स्तर तक पहुंचना अभी संभव नहीं है।
           महर्षि बाल्मीकी रामायण, वेदव्यासकृत महाभारत और शुकदेव की अनुपम रचना श्रीमद्भागवत ऐसी ग्रंथ हैं जिनका हिन्दी क्या विश्व के किसी भाषा की रचना में समानता नहीं है।  संस्कृत में होने के बावजूद अनुवाद के कारण यह सभी महान ग्रंथ हिन्दी की संपत्ति भी माने जाते हैं। समस्या यही से शुरु होती है।  जिन लोगों ने संस्कृत से अनुदित ग्रंथों को पढ़ा है उन्हें कोई भी रचना पढ़ा दीजिये वह अधिक प्रभावित नहीं होगा। जिन लोगों न नहीं पढ़ा या फिर परिवर्तित परिवेश में नहीं पढ़ पाये वह अंग्रेजी के दत्तक पाठक हो गये हैं। वह आज के हिन्दी लेखकों को एक ऐसा व्यक्ति मानते हैं जिसे अभिव्यक्त होने का अवसर नहीं मिलता है इसलिये वह कागज रंगता है।
           अनेक लोग हमसे कहते हैं कि अपनी किताब छपवाओ। हम मना कर देते हैं। हमारा तर्क होता है कि हम कितना भी अच्छा लिख दें बाल्मीकी, वेदव्यास, शुक्राचार्य, तुलसीदास, कबीर, रहीम और मीरा जैसे नहीं हो सकते। हमारे प्राचीन महान रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में अध्यात्मिक ज्ञान के साथ मन बहलाने के लिये इतनी महान कथाओं की रचना की है कि लगता नहीं कि उनके स्तर तक कोई पहुंच सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अध्यात्मिक ज्ञान इतना परिपूर्ण  कि उसके आगे आप कुछ नहीं रच ही नहीं सकते।
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