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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Monday, September 26, 2016

नवाज शरीफ का चेहरा पनामालीक्स की वजह से फुंके बल्ब की तरह लगता है-हिन्दी संपादकीय (NawarSharif fece see as fuse Bulbe cause his Name in Panama Leask-Hindi Editorial)

     पनामा लीक्स में नाम आने के बाद नवाज शरीफ का चेहरा फुंके बल्ब की तरह लगता है पर इसे भारतीय रणनीति का दबाव नहीं समझना चाहिये।  उनको एक डर तो राहिल शरीफ से है जिसे चीन उनसे ज्यादा महत्व देता है। दूसरा संकट इमरान खान है जो भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा खोले हुए हैं।  पाकिस्तान के टीवी चैनलों पर अनेक वक्ता अपने प्रधानमंत्री की कमजोरी पर कटाक्ष करते हैं कि ‘वह तो धंधेपानी वाला आदमी है क्या हिन्दुस्थान से लड़ेगा।’
                                        अलबत्ता संयुक्त राष्ट्र की बोरिंग सभा में निहायत लचर भाषण ने ही नवाज शरीफ को एक नया संबल दिया है क्योंकि पाक टीवी चैनलों ने कश्मीर के एक मरे आतंकी को अपना राष्ट्रनायक घोषित करने पर हाथोंहाथ उठा लिया। नवंबर में सेवानिवृत्ति की लटक रही तलवार से बचने के लिये राहिल शरीफ के पास अभी उन्हें बेदखल करने का अवसर भी नहीं है।  एक तरह से वह आतंकी भारतीय सेना के हाथ से मरकर नवाज शरीफ की आगे प्रधानंमत्री पद पर बने रहने की संभावनाओं को जिंदा कर गया।
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                               वैसे संयुक्तराष्ट्रसंघ में अधिकतर बोरिंग भाषण दिये जाते हैं। इस सभा के समाचारों विश्व के प्रचार माध्यम ज्यादा महत्व नहीं देते।  भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के भाषण इसलिये ज्यादा प्रचारित होते हैं क्योंकि वह आपसी विवादास्पद मसालों को वहां उठाते हैं।

Friday, September 23, 2016

पाक के विरुद्ध कार्यवाही का समय भारत के हाथ से निकल रहा है-हिन्दीसंपादकीय (Pak ke Viruddha karyavahi ka Samay Bharat ke Hath se nikla rah hai-HindiEditorial

                        तात्कालिक रूप से सैन्य कार्यवाही करने की बात तो किसी ने नहीं कहीं थी।  अब तो वह देर बाद भी संभव नहीं लगती। पानी रोकते या नहीं पहले घोषणा तो कर देतें! व्यापार में अत्यधिक प्रिय राष्ट्र का दर्जा पहले छीनने की घोषणा तो कर देतें! जरूरत समझते तो बाद मेें वापस कर देतें। यह घोषणा नहीं की। ऐसा लगता है कि कड़ी कार्यवाही का वक्त भारत के हाथ से निकल रहा है। केवल शाब्दिक जमा खर्च पहले ही तरह ही जारी है।
            दो बातें सामने आयीं। एक टीवी चैनल पर बहस के समय भारत के  एक पूर्व सैन्य अधिकारी ने बड़ी बात कहीं।  उसने कहा कि पानी के मसले पर तो वह पिछले दस बारह वर्ष से पर्दे की पीछे बातचीत कराता रहा है। पानी रोकने का मतलब यह है कि सीधे युद्ध को निमंत्रण देना। हफीज सईद कह चुका है कि पानी रोका तो हम सीधस हमला कर देंगे। 
               उसकी बात हमने सुनी पर लगता है कि एंकर को ब्रंेक की जल्दी थी वह समझी कि नहीं भगवान जाने।  इन चैनल वालों को अपने व्यवसायिक हित से मतलब है शब्दों के अर्थ समझने से नहीं। अब जब युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं और हम से पाक डरा हुआ है कि हमला कर सकते हैें तब पानी रोकने पर उसके हमले से क्या डरना? ऐसा लगता है कि ऐसे ही लोग पर्दे के पीछे रणनीति को प्रभावित करते हैं। उसकी बात से तो यह लगा कि वह नवाज शरीफ की बजाय हफीज सईद को ज्यादा महत्वपूर्ण मानता है। 
               उरी हमले का मामला गर्म था तब रूस ने पाक के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास से मना कर दिया था पर अब उसकी सेना पाकिस्तान पहुंच गयी है। इसका मतलब यह कि रूस से यह मान लिया है कि भारत कुछ करने वाला नहीं है।  अगर उसे अपने निर्णय पर कायम रखना था तो भारत कम से कम पानी रोकने तथा व्यापार मित्र राष्ट्र का दर्जा तो छीन लेना था।  जनता के गुस्से की लीपापोती हो गयी। दो चार दिन में सब ठंडा हो जायेगा। प्रचारमाध्यमों को विज्ञापन पास करने का समय मिल गया। रूसी सेना का पाकिस्तान पहुंचने का सीधा मतलब यह कि अब कुछ होने वाला नहीं है। 26 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र में भारत के जवाबी भाषण पर वाहवाही के बाद सबकुछ थम जायेगा। चार दिन तक पाकिस्तान तथा टीवी के चैनलों पर बहसों का छुटपुट अध्ययन किया तो पाया कि इन्हीं की सुनो अपनी तरफ से कुछ सोचो मत!
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Friday, September 16, 2016

संसार ‘प’ से चले या ‘एम’ से पता नहीं-हिन्दी व्यंग्य (Wolrd and men-HindiSatire)


यह संसार प्राकृतिक नियंत्रक परमात्मा के हाथ में है-ऐसा हमारा दर्शन मानता है। दर्शन के विपरीत भी कुछ विचाराधारायें हैं जिनमें एक मानती है कि यह सारा संसार पूंजीपतियों के हाथ में है। अनेक तरह के अंधविश्वासों तथा भ्रमों के बीच यह एक सत्य है कि इस संसार में मायापतियों का वर्चस्प बना रहता है। पहले मायापतियों का अपने ही क्षेत्र में वर्चस्व होता था पर अब वैश्वीकरण हो गया है। टीवी चैनलों पर अक्सर कहा जाता है कि तीसरा विश्व युद्ध होगा। हम नहीं मानते क्योंकि लगता है कि मायापति अब कला, साहित्य, पत्रकारिता, धर्म, समाजसेवा तथा राज्य प्रबंध के शीर्ष पुरुषों पर प्रभाव रखते है। यह तो पता नहीं कि कितना प्रभाव है पर इतना जरूर दिखता है कि वह इतना जरूर है कि वह अपनी शर्तें मनवा सके।
हिन्दी में कहें तो यह संसार का संचालन अब चार ‘प’-पूंजीपति, प्रचारक, पराक्रमी पद प्रबंधक तथा पतित मनुष्यों और अंग्रेजी में कहें चार ‘एम’-मनीमेकर, मीडिया, मेनैजर, माफिया के ( 4M-MoneyMaker, Media,MenManager and Mafia)संयुक्त उद्यम से ही प्रायोजित हो रहा है। पूंजीपतियों के पास प्रचार का प्रबंधन भी है तो पराक्रमियो के समूह भी उन निर्भर है। इसलिये अनेक बार प्रचार के पर्दे हम समाचार या वादविवाद देखते हैं तो लगता है सह प्रायोजित है। अनेक बार तो यह लगता है कि अनेक पराक्रमी इन पूंजीपतियों के प्रचारपर्दे को सजाने के लिये आपस में पहले द्वंद्व फिर वार्तालाप करने लगते हैं। हमने अनेक पश्चिमी बैंकों की सूची देखी है जिसमें अनेक बड़े देशों के पराक्रमी पद प्रबंधकों के नाम उसमें शोभायमान थे। अतः निष्कर्ष निकाला कि जब यह पराक्रमी अपने ही लोगों के प्रति अविश्वास रखते के अलावा उनका शोषण करते हैं तब उनके इतना नैतिक बल हो ही नहीं सकता कि युद्ध लड़कर अपनी गर्दन फंसायें। पूंजीधारी दिखने में कैसा भी लगे पराक्रमी नहीं हो सकता।
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Po1971 में जनतापार्टी की सरकार बनी थी। उसके एक स्वास्थ्यमंत्री समाजवादी थे। वह अपनी ही सरकार गिराने पर उतारु हो गये। उस समय समाचारों का ऐसा दौर चला कि हर पल उनके आने जाने और मिलने की खबर मिलने लगी। यहां तक कि वह किससे मिलने जा रहे हैं, उसके घर से कितनी दूर उनकी कार है, वह किसके परिसर में दाखिल हो रहे है तथा कितनी देर वहां बैठे आदि समाचार आ रहे थे। उस समय आश्चर्य हो रहा था। अब अनेक बार ऐसे अनेक समाचार आते हैं जिसमें किसी के घर से निकलने, रास्ते में होने, किसी के दरवाजे के अंदर तक पहुंचने फिर अंदर बैठक के समय तक का हिसाब आने लगता है। स्थिति यह हो गयी है कि दो व्यक्ति एक मकान में रहते हैं पर एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने की खबर आने लगी हैं। लड़ाई और प्रेम का यह खेल प्रायोजित है या नहीं पर इतना तय है कि इस खबर के प्रचार में विज्ञापनों का अच्छा समय पास हो रहा है। ऊपर लिखे गये हमारे विचार पुराने हैं और उसका इन नयी घटनाओं से कोई संबंध नहीं है।


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Monday, September 12, 2016

हिन्दी दिवस में पुराने ढोल पर नयी थाप लगेगी-हिन्दी दिवस पर विशेष संपादकीय लेख #Special Hindi Article on Hindi Day Hindi Diwas)14SeptemberHindiDay,


                     हिन्दी दिवस आने वाला है। अपने ब्लॉगस्पाट तथा वर्डप्रेस के ब्लॉगों पर पाठकों की संख्या उन पाठों पर अधिक देख रहे हैं जो हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में लिखी हैं।  इस दौरान पाठकों की संख्या आठ से दस गुना बढ़ जाती है। इसका कारण यह है कि लोग हिन्दी दिवस का  भाषण देने तथा निबंध लिखने की तैयारी के लिये अंतर्जाल पर विचरण करते हैं।  इस दौरान हम देखते हैं कि हिन्दी दिवस पर लिखी गयी हास्य कवितायें सर्वाधिक प्रशंसित होती हैं।  पिछले कुछ दिनों से हमने हास्य कवितायें लिखना कम कर दिया था क्योंकि समय की कमी के कारण अध्यात्मिक के अलावा अन्य विषयों पर लिखना कठिन हो रहा था। सबसे बड़ी बात यह कि हिन्दी लेखकों के लिये अंतर्जालीय संपर्क बनाये रखने वाला कोई ऐसा समूह नहीं बन पाया जिसमें सामान्य लेखक के लिये कोई प्रेरणा पैदा हो सके।  हमने देखा है कि अनेक नये लोग अंतर्जाल पर हिन्दी में लिख रहे हैं-यह अलग बात है कि इनमें से कई ऐसे लगते हैं जैसे किसी कम पढ़े जा रहे अंतर्जालीय लेखक की रचनायें  उठा कर रख रहे हैं।  हमारी अनेक रचनायें ऐसे ही हमें मिल जाती हैं जिसके बारे में हम यह सोचना पड़ता है कि हमने उसे कब लिखा था। अपना नाम न देखकर हमें दुःख होता है। फिर भी हमारी अपनी फितरत है लिखते हैं पर एक बात तय है कि उन नये लेखकों के मन में कुंठा होती होगी जिन्हें अपनी रचना बेनामी देखने को मिलने।
           पिछले दस साल अंतर्जाल पर हमने हिन्दी को बढ़ते देखा है पर यहां से प्रसिद्धि पाने वाला कोई लेखक अभी जनमानस में नहीं है। जिस तरह देश मेें मजदूर संगठित तथा असंगठित क्षेत्रों के माने जाते हैं वही स्थिति लेखकों की है। संगठित क्षेत्र के लेखकों के पास लिखने से अधिक प्रबंध कौशल होता है जो प्रसिद्धि पा लेते हैं।  राजकीय तथा निजी संस्थायें उनके ही पास है।  असंगठित क्षेत्र के लेखकों को तो कोई पूछता भी नहीं है पर हमने अंतर्जाल पर देखा है कि अनेक स्वांत सुखाय लेखक इनसे कई गुना अच्छा लिखते हैं।  बहरहाल इस हिन्दी क्षेत्र में इसी संगठित क्षेत्र के विद्वान अपना ज्ञान बघारते नज़र आयेंगे।  टीवी चैनलों पर शोर रहेगा। आखिर में इन्हीं टीवी चैनलों  पर अब हिन्दी का भार आ पड़ा है जो आशंका, आशा तथा संभावना जैसे शब्दों का अर्थ ही नहीं जानते-उर्दू में भी उम्मीद, डर तथा अनुमान जैसे शब्द का यही हाल है। अलबत्ता हमारा इस वर्ष यह पहला लेखक है और आगामी दो दिवस इस पर अन्य रचनायें लिखेंगे। यह तो केवल भूमिका भर है।
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-दीपक ‘भारतदीप’-

Monday, August 15, 2016

ओलम्पिक खेल संस्कृति भारत की परंपराओं से एकदम अलग-हिन्दी लेख (Olympic Sports culture difrent with Indian Tredition-Hindi Article on Rio2016)

अगर हम ओलंपिक को देखें तो एक तरह से अलग तरह की खेल संस्कृति है जिसने अनेक रूप  बदले हैं और प्राकृतिक की बजाय वहां कृत्रिम मैदानों का निर्माण हुआ है। हम अपने देश के खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर निराश अवश्य होते हैं पर यह कभी नहीं सोचते कि पश्चिम जैसी व्यवसायिक स्पर्धा की सोच हमारे देश के लोगों की खेलों में तो नहीं है। हो भी तो वैसा वातावरण खिलाड़ियों को नहीं मिलता जैसा कि पश्चिम के लोगों के पास होता है। पश्चिम की खेल संस्कृति हमारे भारत की स्वाभाविक परंपरा से मेल नहीं खाती जिसमेें प्रकृतिक मैदान ही मिल सकते हैं।  जब तक हॉकी प्राकृतिक मैदान पर होती थी हमारे यहां बच्चे इसे खेलते थे।  अब कृत्रिम मैदान ने जनमानस को इससे विरक्त कर दिया। बैटमिंटन, टेनिस तथा अनेक खेल कृत्रिम मैदानों पर खेले जा रहे हैं-जो कि सहजता से उपलब्ध नहीं होते। कृत्रिम मैदानों ने खेलों को अकादिमक रूप दिया है जिसमें सामान्य जनमानस एक दर्शक भर रह गया है।  पहले खिलाड़ी सहजता से आगे बढ़ता था पर अब उसे अकादिमक होना पड़ता है-पहले तय करना पड़ता है कि वह कौनसे खेल में शामिल होगा फिर उसे अकादमी ढूंढनी पड़ती है।
हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर जब हमारे देश के अज्ञानी लोग अपने देश के खिलाड़ियों को हारता और दूसरों को जीतता देखते हैं तो आत्मग्लानि को बोध दिखाते हैं तब उन्हें समझाना पड़ता है। हम चीन की बात करते हैं जो खेलों मेे अमेरिका को चुनौती दे रहा है पर सवाल यह है कि उस जैसी हमारे यहां तानाशाही नहीं है। उसने खेलों में अकादिमक रूप को सहजता से अपनाया है पर उसका श्रेय वहां के राज्य प्रबंध को है जिसकी मानसिकता पश्चिम को हर कीमत पर चुनौती देने की है। वहां की जनता के क्या हाल हैं-इसका विश्व में किसी को पता नहीं। हमारे यहां लोकतंत्र है इसलिये जबरन अकादिमक होना सहज नहीं है।
आज श्रीकांत को बैटमिंटन में खेलते देखा।  जिस मैदान पर वह खेल रहा था उसके बारे में बताया गया कि खिलाड़ी के पसीने की बूंद अगर गिरने पर उसे साफ न किया जाये तो वहां उसी का ही जूता इस तरह चिपक जाता है कि वह गिरकर घायल भी हो सकता है। अनेक बार खिलाड़ी अपना पसीना गिरने पर मैदान साफ कराते हैं। श्रीकांत  ने अकादिमक प्रशिक्षण भी लिया है पर यह सभी नहीं कर सकते। ऐसे में हम सामान्य बच्चों को यह भी तो नहीं कह सकते कि सामान्य मैदानों पर बैटमिंटन न खेलकर अकादमी में जाओ। अतः खेल जीवन में रोचकता तथा रोमांच पैदा करने के लिये हैं-हमेशा विश्व चैंपियन का सपना लेकर खेला नहीं जाता।  ऐसे में जो भी भारतीय ओलंपिक में खेलते हैं उनकी इस बात के लिये ही प्रशंसा की जाना चाहिये कि वह अपनी विपरीत खेल संस्कृति में जाकर भी नाम कमा सके।
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Thursday, July 28, 2016

(Ghar mein hi khol len man Ki pryogshala)

घर में ही खोल लें मन की प्रयोगशाला
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मनुष्य दो शब्दों मन व उष्णा शब्द से बना है। इसका आशय यह है कि इस धरी तरह जितने भी जीवन उसमें सबसे अधिक अग्नि मनुष्य के मन में ही है। मन के बाद माया का खेल शुरु होता है जिसमें मनुष्य पूरा जीवन बिता देता है।
हमारा मन तथा बुद्धि इंद्रियों के वश किस तरह काम करते हैं इसका अनुसंधान अपने ही घर में कर सकते हैं।  हमारे टीवी पर अनेक प्रकार के चैनल आते हैं। मनोरंजन, अध्यात्म, संगीत, कार्टून तथा ज्ञानविज्ञानवर्धक सामग्री प्रसारित करने वाले इन चैनलों को बदल बदल कर हम उसका मन पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करें।  हर बार मन में अलग प्रकार का रस पैदा होगा।
समाचार चैनलों को सुनेंगे तो पायेंगे कि संसार में हिंसा, कत्ल तथा अपराध का बोलबाला है। मन में क्लेशपूर्ण विचार तथा बुद्धि में कटु सोच पैदा होती है। संगीत सुनने पर मन मयूर की तरह नाचने लगता है। कार्टून चैनल से मन एकदम बच्चा हो जाता है। ज्ञान विज्ञान की खोज वाले चैनल मन मेें जिज्ञासा का भाव पैदा करते हैं। अध्यात्म चैनल मन को शांत कर देते हैं। किसी भी संत का प्रवचन हो भजन मन में एक अजीब प्रकार की स्थिरता पैदा करता है। हमारे यहां अनेक कथित विद्वान लोग संतों के वैभव, शिष्य समुदाय तथा अन्य राजसी कार्यों पर प्रश्न उठाया  करते हैं पर बाह्य आंखें बंद तथा मन की खुली रखने वाले इनके प्रवचन का लाभ उठाते हैं।  हमें क्या मतलब किस संत का आचरण या व्यवहार कैसा है? हां, सामने पर्दे पर उनके प्रवचन अगर मन को शांति प्रदान करने वाले होते हैं तो हमें लाभ उठाना चाहिये।  आजकल गुरु बनाने के लिये किसी के आश्रम पर जाने की आवश्यकता ही नहीं है। घर बैठे ही किसी को भी गुरु बनाकर शिष्यत्व का आनंद प्राप्त करें।
कहनेे का अभिप्राय है कि भले ही आजकल के भौतिक साधनों के उपभोग को कुछ लोग गलत माने पर अगर सदुपयोग किया जाये तो हमें घर बैठे ही तीर्थस्थानों जैसा आनंद प्राप्त कर सकते हैं। एक बात याद रखिये इस जीवन में मनुष्य के स्वयं के दृष्टिकोण का ही महत्व है। इसलिये अगर कुछ लोग विद्रोह या परिवर्तन के नाम  पर वर्तमान युग के नकारात्मक पक्ष पर ही ध्यान देते हैं तो उन पर ध्यान देने की बजाय हमें अपने ही मस्तिष्क के द्वार खोलकर मन को उसी राह पर ले जाना  चाहिये जहां सकारात्मक दृष्टिकोण बने।
ओम तत् सत्
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Wednesday, July 13, 2016

लाशों में ढूंढ रहे दुआ-हिन्दी व्यंग्य कविता(Lashon mein DhoonDh rahe Duaa-HindiSatirePoem)


दिल के दरवाजे
बंद कर लिये
प्यार की दस्तक
अब वह कहां सुनेंगे।

संबंध के बिगड़े हिसाब
दोस्त तब वफा के
वादे क्यों बुनेंगे।

कहें दीपकबापू जज़्बात से
जीने की आदत
नहीं रही इंसानों में
लाशों में ढूंढ रहे दुआ
जिंदादिली वह क्यों चुनेंगे।
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