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Sunday, August 02, 2015

मित्रता दिवस मनाना अस्वाभाविक लगता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(uneasynes for friendship day-hindi thought article)


                              आज पूरे विश्व में मित्रता दिवस(फ्रैंडशिप डे-friendship day) मनाया जा रहा है। तय बात है कि पश्चिम से आयातित यह विचार आधुनिक बाज़ार में-होटल, व्यवसायिक उद्यान तथा आधुनिक बड़े विक्रय केंद्र-नये ग्राहक जुटाने के प्रयास से अधिक कुछ नहीं है।  पश्चिम में हमेशा ही एकल परिवार के साथ ही सार्वजनिक सामाजिक संबंधों की दृष्टि से कहीं न कहीं अकेलापन रहा है।  इसलिये वहां मित्र तथा रिश्तों से मुलाकात करने के लिये दिन निकालना पड़ता है।  देखा जाये तो वहां एक मनुष्य का दूसरे से संबंध स्वाभाविक सहज सिद्धांत से नहीं देखे जाते। भारत में स्थिति अलग है।  दो मनुष्य के बीच संबंध सहज माने जाते हैं।  मित्र और रिश्ते की बात छोड़िये किसी भी सार्वजनिक जगह पर दो व्यक्ति अकेले आते हैं तो बिना किसी औपचारिकता के आपस में चर्चा के लिये तैयार हो जाते हैं। बस या ट्रेन में यात्रा करते हुए पता नहीं कितने यात्री आपस में मानवीय आधार पर इस तरह संबंध बनाते हैं जैसे कि बरसों से एक दूसरे को जानते हैं।  यह अलग बात है कि पथ आते ही वह सभी अलग हो जाते हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय अध्यात्मिक दृष्टि से मित्रता या अन्य रिश्तों का कोई दिवस मनाने की कोई प्रेरणा नहीं है क्योंकि हमारे प्राचीन ग्रंथ सभी जीवों के बीच संबंधों को स्वाभाविक मानते हैं। यही कारण है कि हम भारत में हम मित्रता दिवस मनाना एक तरह से मजाक समझते हैं।
                             
                              भारत समाज में  मित्रता की दृष्टि से बाल्य और शैक्षणिक काल सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस दौरान जो मित्र बनते हैं वह बरसों बाद भी जब मिलते हैं तो भाव में ताजगी लगती है।  इस काल के बाद बने मित्र केवल स्वार्थ के कारण बनते और बिगड़ते हैं। हम पश्चिम से आयातित जिस मित्रता दिवस को मना रहे हैं उसमें एक युवक और युवतियों के बीच ज्यादा देखने की कोशिश ज्यादा होती है। यह अलग बात है कि कुछ सभ्रांत लोग समय काटने के लिये सार्वजनिक रूप से कार्यक्रम करते हैं पर बाजार के प्रबंधकों का ध्यान केवल प्रेम संबंधो को मित्रता का जामा पहनाने के अलावा कुछ नहीं होता।
कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय अध्यात्मिक दृष्टि से मित्रता या अन्य रिश्तों का कोई दिवस मनाने की कोई प्रेरणा नहीं है क्योंकि हमारे प्राचीन ग्रंथ सभी जीवों के बीच संबंधों को स्वाभाविक मानते हैं।

हमारे यहां मित्रता के रूप में हमेशा ही भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा का उदाहरण दिया जाता है। किसी के प्रति मित्रता का भाव हृदय में एक बार स्थित हो जाये तो वह सहजता से विलोपित नहीं होता। इतना ही यह अन्य रिश्तों की तरह इतना गहरा होता है कि दिमाग में किसी का नाम होता है पर मित्र शब्द नहीं होता।  जिस तरह माता, पिता, भाई तथा बहिन के नाम दिमाग में कभी बजते हैं पर रिश्ते का स्वर उनमें नहीं होता। कहने का अर्थ है यह है कि संबंध हृदय की गहराई में होते हैं। घरेलू कार्यक्रमों में मित्रों और रिश्तेदारों को हार्दिक रूप से आमंत्रित किया जाता है पर उनके लिये रिश्ते के नाम से अलग कार्यक्रम करने की कोई परंपरा नहीं है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Thursday, July 30, 2015

दैहिक गुरु न मिले तो श्रीमद्भागवत् गीता का शिष्य की तरह अध्ययन करें-गुरूपूर्णिमा पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख(daihik guru na mile to shrimadbhagwat geeta ka shishya ki tarah adhyayan karen-A Special hindi thought article)


     भारत सहित पूरे विश्व के अनेक देशों में रहने वाले भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से संबद्ध सभी विचाराधाराओं के लोग  31 जुलाई 2015 को गुरूपूर्णिमा का पर्व अत्यंत उत्साह से मनायेंगे। भारतीय धार्मिक विचाराधाराओं में गुरु की महिमा अत्यंत बताने के  साथ ही उसकी योग्यता का भी व्यापक आधार स्थापित किया गया है। केवल देह का आकर्षण, आश्रम की विशालता तथा भारी शिष्य समूह देखकर किसी को गुरू नहीं बनाना चाहिये।  आजकल हम देख रहे हैं कि जिन गुरुओं के पास धन संपदा के साथ ही प्रचार के लिये भारी साधन हैं वह आधुनिक तकनीकी के सहारे शिष्य बना रहे हैं। इतना ही नहीं अब तो आधुनिक तकनीकी से ज्ञान हर जगह ऐसे पहुंचाया जा रहा है जैसे कि वह कोई पकड़कर जमा करने की चीज हो।  इतना ही नहीं आधुनिक यंत्रों से लोगों के मन मस्तिष्क पर भी इतना बुरा प्रभाव हुआ है कि लोग ज्ञान पढ़ने, सुनने और कहने से अधिक तक भी सीमित मानते हैं।

संत कबीर दास कहते हैं कि

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गुरु किया है देह का, सतगुरु चीन्हा नाहिं।
भवसागर के जाल में, फिर फिर गोता खांहि।।
                              हिन्दी में भावार्थ-जिन्होंने देह का आकर्षण  देखकर किसी को गुरू बनाया है वह परमात्मा का चिंत्तन सहजता से नहीं कर सकते। बार बार संसार के विषयों में जाकर फंसते हैं
जा गुरु ते भ्रम न मिटै, भ्रान्ति न जिवकी जाय।
सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाव।।
                              हिन्दी में भावार्थ- जिसे गुरु से सांसरिक विषयों के प्रति मन में बैठा भ्रम न मिटे न ही भक्ति के प्रति फैली भ्रांति मिटे वह गुरु झूठा ही समझें। उसे त्यागने में देरी नहीं करना चाहिये।
         तत्व ज्ञानी होने का आशय यह कदािप नहीं है कि आदमी हर विषय से सन्यास लेकर चुप बैठ जाये।  संसार के भौतिक तथा अध्यात्मिक दोनेां तत्वों का जानना ही ज्ञान है।  भौतिक तत्व की नश्वरता और अध्यात्मिक तत्व की अमरता को जो समझ ले वही तत्व ज्ञानी है। गुरु का मतलब यह भी कदापि नहीं है कि कोई देहधारी हो वरन् ग्रंथ या सामूहिक सत्संग भी हो सकता है जहां से ज्ञान मिले। हमारे जीवन में भौतिक तथा अध्यात्मिक तत्व दोनों का ही महत्व है पर ज्ञान के अभाव में लोग भौतिकता को ही स
सत्य समझते हैं। यहां तक कि उनके गुरु भी उनका भ्रम दूर नहीं कर पाते।
                              बहरहाल गुरुपूर्णिमा का पर्व अत्यंत प्रसन्नता देने वाला है। कोई दैहिक गुरू न हो तो श्रीमद्भागवत गीता का एक शिष्य की तरह अध्ययन करना चाहिये।  पढ़ते और समझते ज्ञान आ ही जाता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Monday, July 27, 2015

आतंकवाद के प्रचार में समाचार तथा बहस से मदद न करें.हिन्दी चिंत्तन लेख(atankwad muft ke vyapar par chal raha hai-hindi thought article)


             हमारा तो मानना है कि विश्व में आतंक एक ऐसा व्यापार बन गया है जो प्रचार की वजह से पनपा है। अगर प्रचार माध्यम आतंक की खबरों को लघु या संक्षिप्त रूप से प्रसारित करें और किसी तरह की बहस न आयोजित करें तो यकीनन आतंकवाद के व्यापारी ठंडे हो जायेंगे। अनेक अपराध विशेषज्ञ आतंकवाद के सीधे प्रसारण का विरोध करते रहें हैं पर लगता नहीं कि उनकी सुनी जाती है।  एक बात दूसरी बात यह भी है कि आतंकवाद के धनदाता भी संदेहास्पद हैं। हम देख रहे हैं कि सारे विश्व में पैसा चंद धनपतियों के हाथ में है। उन्हीं के पास प्रचार माध्यमों का स्वामित्व है। इतना ही नहीं टेलीफोन सहित समस्त संचार माध्यम भी उनके नियंत्रण मे हैं।  ऐसे में तो कभी कभी लगता है कि आतंकवादियों को यही धनपति अपने दो लक्ष्यों की पूर्ति के लिये पैसा देते हैं.एक तो इसलिये कि समाज उनके प्रचार माध्यमों की सनसनीखेज सामग्री से बंधा रहे दूसरा यह कि प्रशासन आतंक से लड़ने में लगा रहे और उसकी आड़ में धनपतियों के ही संरक्षण में चल रहे काले धंधे चलते रहें।
                              वैसे भी देखा गया है कि यह हमले भीड़ वाली जगहों पर किये जाते हैं जहां सामान्य लोगों के साथ ही छोटे पद वाले सुरक्षाकर्मी होते हैं। अधिक संख्या में हताहतों की संख्या होने से आतंकवादियों के दुष्कृत्य को प्रचार भी खूब मिलता है।  इन आतंकवादियों के प्रायोजित करने वालों के नाम पता करना कठिन जरूर है पर असंभव नहीं है पर जरूरत इच्छा शक्ति की है। इन आतंकियों को कीमती सामान की तस्करीए नशे के व्यापार तथा खेलों के सट्टे से अधिक धन मिलता है।  भारत में बढ़ते धन के साथ  अपराध भी बढ़े है साथ ही युवाओं में सट्टे और नशे की आदत बढ़ती जा रही है।  इससे जुड़े काली नीयत के व्यापारियों के लिये प्रशासन की सख्ती एक चुनौती होती है जब उसका ध्यान किसी बड़ी घटना की तरफ जाता है तो उनके संरक्षित अपराधी अपना काम करने लगते हैं। इतना ही नहीं आतंक और काले धंधे के व्यापारियों का गठजोड़ संभवत इतना शक्तिशाली है कि उसे अलग धनपति भी उनके दबाव के आगे बेबस होकर उन्हें हफ्ता देते हैं।
                              इस तरह के आतकंवाद से मुक्त होने के लिये यह आवश्यक है कि इसके प्रचार पर अधिक समय नहीं व्यय करना चाहिये। कम से कम सीधा प्रसारण तो किया ही नहीं जाना चाहिये।  अततः आतंकवाद का व्यापार मुफ्त के विज्ञापन पर ही चल रहा है। लोग इस प्रचार से डरते हैं और आतंकवादियों के प्रति कोई प्रतिकूल कदम उठाने का ख्याल नहीं करते। युवाओं को भी यह बात समझाना चाहिये वह नशे तथा खेलों के सट्टे से दूर रहें।
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Monday, July 20, 2015

पेशेवर बुद्धिमान श्रीगीता से कतराते हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख(peshewar buddhiman shrigeeta se katrate hain-hindi thought article)

                              एक मनोरोगी और शराबी 24 वर्षीय हत्यारे ने छह वर्षों में 14-15 बच्चों की हत्या कर उनसे दुष्कर्म किया। अब पकड़ा गया। इस पर देश भर के मनोवैज्ञानिक, अपराध शास्त्री तथा समाज के जानकार बहस करते नज़र आ रहे हैं।  बताया जाता है कि पुलिस ने एक बार उसे पकड़ा भी था पर वह जमानत पर छूट गया।  उस पर भी तमाम तर्क दिये जा रहे हैं। इस बहस पर अगर श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों के आधार पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि कोई यह आज  तक इस तथ्य को स्वीकर  नहीं कर पाया कि इस संसार में आसुरी तथा दैवीय प्रकृत्ति के लोग हमेशा ही विद्यमान रहेंगे।  अपनी प्रकृत्ति का कोई भी मनुष्य उल्लंघन नहीं कर सकता।  एक बार अगर किसी के बारे में यह पता लग जाये कि वह आसुरी प्रकृत्ति का हो तो उसे कैसे रोका जाये यह तो बहस का विषय हो सकता है-क्योंकि आज के सभ्य विश्व समाज के कानून मानवाधिकारों का भ्रम भी पालते हैं-पर मनोविज्ञान और समाज की दृष्टि से इसमें कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता।
                              किसी भी प्रकार की विषय पर व्यवसायिक बहस लंबी जारी रखनी होती पर  श्रीमद्भागवत गीता का इकलौता के तर्क उसे रोक देगा।  बहसें प्रायोजित और विद्वान पेशेवर होते हैं उन्हें लंबी बहस खींचकर प्रचार माध्यमों का विज्ञापन समय पास करने के लिये तर्क से अधिक कुतर्क देते हैं। ।  अगर कोई श्रीमद्भागवत गीता का तर्क देगा तो फिर अंग्रेजी पद्धति से शिक्षित समाज उसे पौगापंथी कहकर ठुकरा देगा। यही कारण है कि व्यवसायिक अभिव्यक्ति में लगे संस्थान श्रीमद्भागवत गीता से दूर  भागते हैं क्योंकि तब सांसरिक विषयों में भी तर्क वितर्क की गुंजायश नहीं रह जाती जो समय पास करने के लिये जरूरी है।
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Friday, July 17, 2015

आदमी को चूहा बनने से बचना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन लेख(admi ko chuha banane se bahchan chahiye-hindi thought article)

                              सब जानते हैं कि लालच बुरी बला है पर बहुत कम लोग हैं जो इस ज्ञान को धारण कर चलते हैं। हम में से अनेक लोगों ने पिंजरे में चूहे को फंसाकर घर से बाहर जाकर छोड़ा होगा।  सभी जानते हैं कि चूहे को पकड़ने के लिये पिंजरे में रोटी का एक टुकड़े डालना होता है।  चूहा जैसे ही उस रोटी के टुकड़े को पकड़ता है वह पिंजरे में बंद हो जाता है। चूहे में वह बुद्धि नहीं होती जिसे प्रकृत्ति ने भारी मात्रा में इंसान को सौंपा है।  फिर भी सामान्य मनुष्य इसका उपयोग नहंी करते।  अनेक लोग यह शिकायत करते हैं कि हमें अमुक आदमी ने ठग लिया है अथवा धोखा दिया है। इस तरह की शिकायत करने वाले लोग इस आशा में रहते हैं कि अपने साथ हुई ठगी या धोखे का बयान दूसरों से करेंगे तो सहानुभूति मिलेगी पर यह नहीं सोचते कि सुनने वाले उन्हीं की बुद्धि पर हंसते हैं-मन में कहते हैं कि यह चूहा बन गया।
                              कहा जाता है कि पशु पक्षियों तथा मनुष्य में भोजन, निद्रा तथा काम की प्रवृत्ति एक जैसी रहती है पर उसके पास उपभोग के  अधिक विकल्प चुनने वाली सक्षम बुद्धि होती है।  यह अलग बात है कि अनेक ज्ञान और योग साधक अपनी बुंिद्ध का उपयोग ज्ञान के साथ करने की योग्यता अर्जित कर लेते हैं जबकि सामान्य मनुष्य उसी तरह ही विषयों के पिंजरे में फंसा रहता है जैसे चूहा रोटी के टुकड़े में ठगा जाता है।  कहा जाता है कि आजकल तो मनुष्य अधिक शिक्षित हो गया है पर हम इसके विपरीत स्थिति देख रहे हैं।  निरर्थक शिक्षा नौकरी की पात्रता तो प्रदान करती है पर जीवन के सत्य मार्ग से विचलित कर देती है।  पढ़े लिखे लोग अशिक्षित लोगों से अधिक ठगी या धोखे का शिकार हो रहे हैं।  हमारे देश में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से जुड़ी शिक्षा को धर्म से जोड़कर शैक्षणिक संस्थानों से दूर रखा गया है पर अनुभव तो यह है कि इसके अभाव में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से पढ़े लोग अनपढ़ लोगों से ज्यादा दूसरों के बहकावे में आ जाते हैं। इसलिये यह भ्रम भी नहीं रखना चाहिये कि आधुनिक शिक्षा से व्यक्ति अध्यात्मिक ज्ञानी हो जाता है।
                              इसलिये जिन लोगों का अपना जीवन सुखद बनाना है वह नित्य भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्यययनर अवश्य करें। जीवन में सांसरिक विषयों के साथ अध्यात्मिक सिद्धांतों के अनुसार संपर्क करने का तरीका चाणक्य और विदुर नीति में अत्यंत सरलता से समझाया गया है।     
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Sunday, July 12, 2015

ज्ञानियों का त्याग ही इस देश को बचाये हुए है-हिन्दी चिंत्तन लेख(guaniyon ka tyag hi is desh ko bachaye hue hai-hindi thought article)

                एक बार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जूनियर जार्जबुश ने विश्व में बढ़ती महंगाई को भारतीय जनता में व्याप्त अधिक खाने की प्रवृत्ति को बताया था।  उस समय अनेक विद्वानों ने इसका मजाक उड़ाया था। अंतर्जाल पर सक्रियता में नवीन व्यक्ति होने के कारण  हमने भी अधिक पाठक बटोरने की दृष्टि से बुश साहब से अपनी असहमति जताई थी। यह सात वर्ष पहले की बात थी। उस समय निजी टीवी चैनल और अंतर्जाल दोनों ही संचार जगत में एक नयी शुरुआत कर रहे थे। जैसे जैसे संचार की शक्ति बढ़ी तो नयी नयी जानकारियां आने लगीं। भारत में इस दौरान खानपान की आदतों में भारी बदलावा भी आया। उस समय हमने लिखा था कि चूंकि भारत के चाट भंडारों में भीड़ रहती है इसलिये कोई भी यह सोच सकता है कि भारत में लोग खाते बहुत हैं।  सात वर्ष बाद अब तो  भारत में मॉल के रूप में आधुनिक बाज़ार का रूप लिया है और आकार में बड़े होने के कारण वहां भी भीड़ अधिक दिखती है। यह अलग बात है कि वहां खाद्य पदार्थों के अलावा फिल्मों के उपभोक्ता और दर्शक ही अधिक आते हैं। इस तरह उपभोग प्रवृत्ति में बदलाव तथा उपभोक्ताओं की बड़ी संख्या किसी विकास का परिचायक नहीं  है क्योंकि इसके पीछे हमारा कोई नवीन निर्माण नहीं है।  रोजगार, स्वास्थ्य तथा नैतिक आचरण का पैमाना बहुत नीचे चला गया है। कर्ज लेकर घी पीने के जिस सिद्धांत पर समाज चला है उसे देखकर तो अब विदेशी यह भी कह सकते हैं कि भारतीय कमाते कम हैं खाते ज्यादा हैं।
                              सब कुछ बदला है पर यहां के धनपितयों की प्रवृत्ति जस की तस है। खाद्य पदार्थों में मिलावट तथा पहनने ओढ़ने में नकली सामान बनाने  की वही कहानी अब भी जारी है। पहले बाज़ार से अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थों में मिलावट के समाचार आते थे पर अब तो एक टीवी समाचार चैनल ने प्लास्टिक के चावल बनने की बात कहकर हैरान ही कर दिया है। हम सभी जानते हैं कि अन्न से मन और मन से मनुष्य का अस्तित्व है। अगर इसी तरह अन्न से प्लास्टिक का मेल होने की बात आगे बढ़ी तो फिर हमें शुद्ध मनुष्य ढूंढना ही मुश्किल हो जायेगा।
                              हमने पहले भी कहा था और अब भी कह रहे हैं कि भारत में प्रकृत्ति की कृपा अन्य देशों से कहीं अधिक है।  यहां भूजल का बेहतर स्तर, हर तरह के अन्न की फसल और विभिन्न खनिजों संपदा को देखकर कोई नहीं कह सकता कि भारत अभिशप्त देश है। यह अलग बात है कि यहां लोभ की ऐसी प्रवृत्ति है कि कोई धनपति अपनी कमाई से संतुष्ट होने की बजाय दूसरे के मुंह से निवाला निकालकर या खींचकर अपनी तरफ करने पर ही प्रसन्न होता है। यही कारण है कि हमारा देश सब कुछ होते हुए भी गरीब और अविकसित कहा जाता है। मजे की बात यह है कि जितना अज्ञानी समुदाय है उससे ज्यादा ज्ञानी लोगों का समूह है।  शायद यही कारण है कि यह देश चल रहा है। अज्ञानी के लोभ की प्रवृत्ति के बावजूद ज्ञानियों का त्याग भाव हमारे देश को बचाये हुए है।
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Monday, July 06, 2015

जल की पवित्रता से जीवन में आनंद संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(jali ki pavitrata se jeevan mien aanand sambhav-hindi thought article)

          एक टीवी चैनल गंगा की स्वच्छता को लेकर अभियान चला रहा है।  उसके कार्यक्रम में कुछ ऐसे कथित श्रद्धालू दिखाये गये जो नदी की सीढ़ियों पर खड़े होक साबुन लगाकर कपड़े धो रहे थे। एक व्यक्ति उन श्रद्धालुओं को ऐसा करने से रोक रहा है पर वह जैसे सुन ही नहीं रहे।  ढोंग इसत रह कर रहे थे जैसे कि समाधिस्थ हों। एक कथित श्रद्धालु तो नदी में ही साबुन लगाकर नहा रहा था। कहने पर वह भी नहीं सुन रहा था।  धर्म के नाम पुण्य कमाने का यह स्वार्थी रूप शर्मिंदा करने वाला है। हम यहां एक बात बता दें कि नदियों में नहाने पर पुण्य कमाने की चर्चा तो हमारी जनश्रृतियों में है पर यह साबुन लगाना की बात कहीं न कही गयी है।  इसके विपरीत स्वच्छता को भगवान की पूजा का एक महत्वपूर्ण भाग माना गया है।  आमतौर से पहले शरीर की मिट्टी हटाने के लिये प्राकृत्तिक चीजें उपयोग में लायी जाती थीं, पर आजकल साबुन प्रचलन में  आ गया है इसलिये कथित श्रद्धालु नये जमाने के अनुकरण के साथ पुरानी पंरपराओं को निभा कर विश्वास को अंधविश्वास में बदल रहे हैं।
                              इस नदियों को गंदा करना ही हमारी दृष्टि से भारतीय धर्म से द्रोह करने जैसा है जो कि किसी पूजा से पहले ही अंदर और बाहरी शुद्धता पर जोर देता है। हमारी राय से ज्ञानी श्रद्धालुओं जो इन नदियों पर नहाने जाते हैं वह न स्वयं ही नदियों में विसर्जित करने से बचें वरन् दूसरों के करने पर उन्हें दृढ़ता पूर्वक रोकें।  अपने आसपास ही खड़े अपने जैसे लोगों से आव्हान करें कि वह भी उनके साथ स्वर मिलायें। नदियों को स्वच्छ रखने का सबसे पहला दायित्व तो भारतीय धर्म के श्रद्धालुओं का है यह हम मानते हैं। नदियां स्वच्छ होंगी तो जल पवित्र होगा। जल की पवित्रता ही जीवन में सुख का भाव ला सकती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि अन्न जल का मनुष्य जीवन पर बहुत प्रभाव रहता है।
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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