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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Wednesday, April 15, 2015

भक्ति विरुद्ध आसक्ति-हिन्दी कविता(bhakti viruddh aasakti-hindi poem)

हमने तो भक्ति भाव से
प्रेम करने को कहा था
वह उसका अर्थ आसक्ति भाव से
लेने लगे थे।

कहें दीपक बापू मनुष्य मन
अब उंगलियों से
स्वचालित हो गया है,
उस पर काबू कर सके
ऐसा मस्तिष्क खो गया है,
हमने तो सामानों का मोल
बताकर विरक्ति के लिये कहा था
वह पैसे से खरीदकर
अपने त्याग की
शक्ति तोलने लगे थे।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Friday, April 03, 2015

मध्यम वर्ग के सरंक्षण बिना समाज में स्थिरता संभव नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख(middile class and indian society-hindi thought article)

ओले तथा असमय बरसात ने भारत के ग्रामीण अंचलों में बुरा प्रभाव डाला है। फसल नष्ट होने से बड़ी संख्या में किसानों की आत्महत्या के समाचार आये हैं।  यकीनन अधिकतर किसान मध्यमवर्गीय से जुड़े होंगें।  बड़े किसानों के ढेर सारे व्यवसाय भी होते इसलिये उन्हें इस हानि की चिंता नहीं होती। खेतिहर मजदूर भी दूसरी जगह खेती कर काम चला लेते हैं। संकट मध्यम वर्गीय किसान का है जिसके पास अपनी जमीन है और वह उसी पर निर्भर है। उस पर वह अपने घर के काम काज के  साथ बीज आदि के लिये कर्ज भी लेता है जिनका सीधा संबंध उनकी फसल से होता है। वही नष्ट हो गयी तो उसके सामने अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा खोने का भय आता है जिससे वह तनाव ग्रस्त होकर आत्महत्या करता है या फिर दिल के दौर से मर जाता है।
          देखा जाये तो जिस तरह शहर और गांवों की दूरी मिट रही है वैसे ही दोनों जगह का मध्यम वर्ग भी तनाव की राह पर जा रहा है।  शहर भले ही गांव से अधिक चमकदार दिखते हैं पर आधुनिक सुविधायें-टीवी, मांेबाईल तथा कंप्यूटर अब गांव में में पाये जाने लगे हैं-गांवों में भी पहुंच रही हैं। उसके साथ ही इनके साथ आने वाली मानसिक बीमारियां भी वहां अपना घर बना रही हैं।  अभी तक हम भौतिक सुविधाओं से शहर वालों के मानसिक रोगी होने की बात कहते थे पर गांवों में भी-जहां के निवासियों के परिश्रम तथा संघर्ष की शक्ति पर यह देश टिका है-शहरों जैसा मानसिक तनाव निवास करने लगा है।
          आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में मध्यम वर्ग का संघर्ष पहले से अधिक कहीं कठिन हो गया है। पैसा उसके पास अधिक नहीं होता पर सामान्य सुख सुविधाओं की उसके पास उपस्थिति उसे धनिक प्रचारित करती हैं तो समाज भी उसे प्रतिष्ठित लोगों जैसे व्यवहार की आशा करता है। इसके लिये धन होना आवश्यक है और मध्यम वर्ग कहीं से ऋण लेकर या संपत्ति बेचकर अपने सामाजिक दायित्वों को निभाना चाहता है।  जब सरकारी नौकरियों की बहुतायत थी तब एक स्थिर मध्यम वर्ग का निर्माण हुआ था जिसे अपनी नियमित आय की आशा तो रहती थी।  उदारीकरण के चलते अब निजी क्षेत्र में मध्यम वर्ग के लोग अपना रोजगार ढूंढ रहे हैं। निजी क्षेत्र में रोजगार के स्थायित्व का अभाव रहता है। यही मध्यम वर्ग धर्म, संस्कृति, कला तथा सामाजिक परंपराओं के निरंतर प्रवाह में सबसे अधिक सहायक है। हमारे देश में मध्यम वर्ग की अस्थिरता के चलते हम किसी भी समाज मूलतत्व बचने की आशा नहीं कर सकते।  हमारे यहां गरीब, मजदूर, महिला, वृद्ध, बालक तथा किसान कल्याण के नारे लगते हैं पर जिस मध्यम वर्गीय पुरुष से समाज की रक्षा हो सकती है उसका संघर्ष इतना बढ़ा हो गया है कि वह घर परिवार से आगे कुछ सोच भी नहीं सकता। ऐसे में जो धर्म, संस्कृति और समाज के नारे लगा रहे हैं उन्हें पहले देश की व्यवस्था में ऐसे तत्व लाना चाहिये जिससे मध्यम वर्ग स्थिर रह सके। मध्यम वर्ग से कलाकार, पत्रकार, लेखक, वकील, शिक्षक तथा बौद्धिक लोग संरक्षित होते है तभी वह समाज के लिये काम करता है।  अगर उसे अपने भरोसे रहने के लिये कहा जाये तब यह अपेक्षा छोड़ देना चाहिये कि समाज के लिये अपना समय और श्रम व्यय कर पायेगा।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, March 27, 2015

लोगों के रुदन का प्रायोजित प्रचार-हिन्दी लेख(A Hindi article on world cricket cup in australia)



          अगर प्रचार माध्यमों की बात माने तो एसीबी से बीसीसीआई की क्रिकेट टीम-प्रचार माध्यम ही इन्हें आस्ट्रेलिया तथा भारत की टीम कहकर पुकारते हैं-हारने पर लोग दुःखी और अप्रसन्न है। हमारा मानना है कि यह भी प्रायोजित प्रचार हैं।  अगर सच में लोग दुःखी हैं तो चार अप्रैल से प्रारंभ क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में स्टेडियम खाली मिलेंगे। लोग उन विज्ञापनों का सामान खरीदना बंद कर देंगे जिनके प्रचार क्रिकेट खिलाड़ी हैं।  ऐसा होगा नहीं! टीवी चैनलों पर क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का प्रचार जारी है।  जिन खिलाड़ियों पर लोग नाराज है वह हंसते हुए इस प्रतियोगता में आने की प्रेरणा देते हुए विज्ञापनों में नज़र आ रहे हैं।  आप देखना इन पिटे हुए हुए खिलाड़ियों को देखने लोग फिर टीवी पर जुटेंगे।
          अनेक लोगों ने अपने टीवी तोड़ डाले। कई लोग रो रहे थे। हैरानी है यह देखकर लोग कितने हल्के विषयों पर अपना दिल लगा देते हैं।  हारने वाले खिलाड़यों को शायद इतनी परवाह नहीं होगी क्योंकि वह तो क्लब स्तरीय प्रतियोगिता से होने वाली कमाई की सोचना शुरु कर चुके होंगे।  एक बार विज्ञापन कंपनियां नये नये अनुबंधों के लिये उनके पास जुटना शुरु होंगी।  सच तो क्रिकेट मैचों में दिल लगाकर उनको देखना ऐसे ही जैसे किसी बारात में दूल्हा निश्चिंत हो और बाराती परेशानी में इधर उधर डोल रहे हों।  बीसीसीआई के क्रिकेट खिलाड़ी ऐसे दूल्हे हैं जिनकी बारात यहां से हटी तो दूसरी जगह जायेगी।  वह बेपरवाह हैं तो क्यों आम लोग अपना दिमाग खराब कर रहे हैं।
बीसीसीआई की टीम के दूल्हों की दैवीय शक्ति का प्रचार खूब हुआ।  कल सभी नाकाम हो गये।  कल जिसे तूफानी बल्लेबाज को खेलना था वह एक रन बनाकर ही लौट गया।  भले ही सामान्य मैचों में उसने शतक बनाये हों पर अवसर पर अगर वह कुछ खास नहीं कर सका तो इसका मतलब कि उसे प्रचार माध्यम ही महान बनाये दे रहे थे वरना तो वह एक सामान्य खिलाड़ी ही है।  हमारा मानना है कि क्रिकेट एक खेल है पर जिसे हम पर्दे पर देख रहे हैं वह व्यवसायिक मनोरंजन ही है। जिस तरह किसी फिल्म के पिटने पर कोई दर्शक दुःखी नहीं होता उसी तरह विश्व कप नाम की इस फिल्म में बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की भूमिका पिटने पर ही अफसोस कर अपना खूना जलाना अज्ञान का प्रमाण है। वैसे हमारा मानना है कि इस हार पर लोगों के रुदन का भी प्रचार विज्ञापन का समय पास करने के लिये है।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, March 20, 2015

परीक्षा में छात्रों को अध्ययन की किताब लेने की छूट देकर ही नकल की बुराई से मुक्ति पायें-हिन्दी चिंत्तन लेख(pariksha meih adhyayan kee chhoot dekar hi nakal se mukti paayen-hindi thought article)




          बिहार में माध्यमिक मंडल की परीक्षा के दौरान नकल करने और कराने के जो दृश्य टीवी चैनलों पर देखने को मिले वह कम से कम हमें नहीं चौंकाते हैं। इसका कारण यह है कि यह समस्या उतनी ही पुरानी लगती है जितनी हमारी शिक्षा पद्धति।  मुख्य बात यह है कि हमारे यहां अध्ययन किताब से सर्वांगीण विकास के लिये कराया जाता है पर परीक्षा के समय केवल स्मरण शक्ति या कहें रटने की कला का ही परीक्षण होता है। हम कबीर, रहीम, तुलसी या मीरा के दोहों को कभी रटकर नहीं सुना पाये पर उनका अर्थ हमेशा ही दिमाग में बसा रहा।  कैसे? हम किसी को बुरा नहीं कहते क्योंकि  पता है कि जब अपनी बुराईयां ढूंढेगे तो सबसे बुरे स्वयं ही लगेंगे। अब यहां कबीर का बुरा जो देख मैं चलावाला दोहा कहने की आवश्यकता नहीं लगती।  हम परीक्षा के समय जिस शब्द को रट लेते थे तो केवल इतना ही ध्यान रखते थे वह वैसे ही लिखें जैसा किताब में है-इस दबाव में उस शब्द के अर्थ का भाव रखना संभव नहीं था। एक तरह से किताब से संबंध शब्द रटने से अधिक था।  हिन्दी में लिखना तो हमने शैक्षणिक काल में प्रारंभ किया पर रहीम, कबीर, तुलसी और चाणक्य के संदेशों पर मंथन बहुत समय बाद प्रारंभ किया।  अध्ययन के दौरान कभी इन महानुभावों के प्रति सद्भाव दिमाग में नहीं आया क्योंकि वहां तो केवल इनके पवित्र शब्द रट कर लिखने थे।  समझ से उस परीक्षा का कोई संबंध नहीं था
          हमने अनेक लोगों को नकल करते देखा है।  अपने ही समकालीनों को अपने से कम योग्य छात्रों को अधिक नंबर पाते देखा है। इसमें कुछ किस्से तो ऐसे भी आये कि छात्रों ने किसी प्रश्न के उत्तर मेें दूसरे की नकल की और अपना रटा भूलना बेहतर समझा। बाद में पता चला कि उससे गलती हुई।  कुछ विद्वान तो यह तक कहते हैं कि इस तरह की स्मरण शक्ति की परीक्षा लेना ही व्यर्थ है वरन् इसकी बजाय परीक्षा के दौरान किताबें ले जाने की छूट छात्रों को दी जाये।  जब हमने देखा है कि नौकरी की परीक्षा के लिये अलग से परीक्षायें होती हैं और उसमें इस शिक्षा का कोई लाभ केवल प्रमाण पत्र के रूप में ही है तब छात्रों की स्मरण शक्ति की परीक्षा बेकार है।
          हमारा तो मानना है कि विद्यालयीन और महाविद्यालयीन शिक्षा तो केवल साक्षर और विद्वान बनाने के लिये ही समझा जाना चाहिये।  जब किताबें ले जाने की छूट होगी तब छात्र दूसरे दाव पैंच नहीं लगायेंगे।  यहां यह भी बता दें कि किताब के आधार पर भी प्रश्न के उत्तर ढूंढना तब ज्यादा कलात्मक हो जाता है जब विषय सामग्री में व्यापकता होती है।  सभी छात्र उत्तर एक जैसा लिखें यह संभव नहीं है। अलबत्ता प्रतिभावान छात्रों के सामने तब रट्टा लगाने का तनाव नहीं होगा और वह सामान्य छात्रों से अधिक बेहतर उत्तर लिख पायेंगे।  हमारा मानना है कि स्मरण शक्ति का प्रतिभा से अधिक संभव नहीं है। बल्कि जो ज्यादा प्रतिभावान होते हैं वह अपने शब्दों का रट्टा लगाने की बजाय उसके अर्थ तथा भाव से ज्यादा संबंध स्थापित कर लेते हैं।
          इस सुझाव का विरोध शिक्षा व्यवसाय से जुड़े लोग अवश्य करेंगे क्योंकि तब ट्यूशन और नकल का धंधा चौपट हो जायेगा-अनुमान है कि यह व्यवसाय भी हजारों करोड़ों का है।  व्यवसाय चौपट हो जायेगे तो उससे एक वह दो नंबर में धन कमाने वाले दलाल भी निष्क्रिय होंगे जो कि हमारे समाज में प्रतिष्ठित हैं।  इससे भी आगे हमारे यहां कुछ ऐसे उदारवादी विद्वान है जो मानते हैं कि हर छात्र को नियमित शिक्षा देकर बिना परीक्षा ही उपाधि देना चाहिये क्योंकि उससे होना जाना कुछ नहीं है।  नौकरी के लिये अलग से परीक्षायें होती हैं-अनेक विद्वान तो वहां भी किताबें ले जाने की छूट देने की बात करते हैं-क्योंकि वह मानते हैं कि अनेक नकल कर पास होने वाले छात्र किताब पास होने पर सारी चौकड़ी भूल ही जायेंगे। ले देकर मुर्गे की एक ही टांग!  इससे शैक्षणिक मध्यस्थों का व्यवसाय चौपट आयेगा और अच्छे नंबर दिलाने के नाम छात्र और छात्राओं का शोषण संभव नहीं रहेगा-जिनके सहारे अनेक लोग अपनी समाज में छवि बनाये हुए हैं।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, March 06, 2015

कभी कभी उपेक्षासन भी कर लिया करो-हिन्दी लघु व्यंग्य चिंत्तन(labhi kabhi upekshasan bhi kar liya karo-hindi short satire thought article)



            निर्भया बलात्कार कांड पर बनाये गये बीबीसी के लघुवृत्त चित्र पर इतना हंगामा मचना इस बात का प्रमाण है कि हमारे देश में लोगों में धैर्य के साथ किसी विषय पर चिंत्तन कर उस पर अपने विचार व्यक्त करने की प्रवृत्ति का अभाव है। इस लघुवृत्त चित्र के बारे में हम जैसे आम लोगों को जानकारी तभी मिली जब पर चारों तरफ हंगामा मचा।  इस हंगामे का यह परिणाम हुआ कि बीबीसी ने यह वृत्त चित्र निर्धारित तारीख से चार दिन पहले प्रसारित कर दिया।  प्रचार जगत में समय का महत्व होता है और चार दिन पूर्व प्रसारण की यह प्रेरणा भारत में मचे हंगामें से बीबीसी को मिली।  हमारे यहां का हंगामा एक तरह से इसी वृत्त चित्र के लिये अधिक दर्शक जुटाने में एक विज्ञापन की तरह मददगार हुआ।
            इससे पहले ही भी एक मुंबईया फिल्म में कथित रूप से हिन्दू धर्म के कथित अपमान को लेकर बवाल मचा।  उसमें भी हंगामाकार उसके लिये दर्शक जुटाने में सहायक हुए।  इन दोनों प्रकरणों में हमारे जैसे स्वतंत्र और मौलिक चिंतक मानते हैं कि हंगामा नहीं होता तो बीबीसी का वृत्त चित्र और कथित मुंबईया फिल्म एक तरह से फ्लाप शो साबित होते।  हमारी चिंत्ता इस बात की नही है कि प्रचार माध्यम इस तरह की योजना बनाते होंगे जिससे आमजन फंस जाता है बल्कि जिस तरह भारत में  संस्थागत आधार पर ऐसे विवादों में विज्ञापन का काम होता दिखता है वह परेशानी का कारण है।  टीवी चैनल अपना विज्ञापन का समय पास करने के लिये भले ही इस तरह तरह के तयशुदा आयोजन करें।  उन पर कहना बेकार है पर जिस तरह अनेक सामाजिक तथा धार्मिक संस्थायें अपने साथ की भीड़ चौराहों पर लाकर उनकी सहायक बनती हैं वह दुःख से अधिक गुस्से का कारण बनता है।
            इस पर अधिक लिखने से कोई फायदा नहीं है पर हमारी सलाह है कि कभी कभी उपेक्षासन भी कर लिया करो।  कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उपेक्षासन करने का सिद्धांत है। अपनी बहिन रुकमणी हरण के समय भगवान श्रीकृष्ण के साथ युद्ध में पराजित होने पर रुक्मा ने यही आसन किया था।  हमारे यहां का मनोरंजन क्षेत्र अजेय है। उसे अंदर बाहर से हर की शक्ति प्राप्त है।  इस पेशे में लोग विवाद के माध्यम से अपनी विक्रय सामग्री के लिये ग्राहक जुटाते हैं। उन्हें हराना कठिन है।  क्रुद्ध होकर हम उनके कटाक्षों पर टिप्पणियां या प्रदर्शन कर उनके ही जाल में फंसते हैं।  न उनके वृत्त चित्र रुकते हैं न फिल्म बंद होती है।  कभी कभी तो हंगामा बचने से  नवधानाढ्य तथा मनोरंजन के भूखे लोग बिना सोचे समझे दर्शक बनकर उन्हें हिट बनाते हैं।  विरोधी लोग  क्रुद्ध होकर अपना खून जलाते हैं पर नतीजा वही ढाक के तीन पात!  हमारे यहां  अनेक कथित ज्ञानी हैं जो दावा करते हैं कि उन्हें भारतीय ग्रंथों का पूरा ज्ञान है पर जिस तरह सतही विषयों पर भडकते हैं उससे नहीं लगता कि उनका दावा सही है।  हमारी उनको भी सलाह है कि वह कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा चाणक्य नीति का अध्ययन करना चाहिये।  हमारा मानना है कि मौन की तरह उपेक्षासन भी काम का विषय है।  जिन विवादों में हार निश्चित है वहां से मुंह फेर लेना चाहिये।
          

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Tuesday, February 17, 2015

भगवान शिव तो सत्य मार्ग पर विराजते हैं-महाशिवरात्रि पर विशेष हिन्दी लेख(bhagawan shiv to satya marga par virajte hain-A Special hindi article on mahashivratri)



         आज पूरे देश में महाशिवरात्रि का पर्व बड़े उल्लास से मनाया जा रहा है।  हमारे प्राचीन ग्रंथों में भगवान शिव की अनेक लीलायें वर्णित हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में ब्रह्म के तीन रूप मान गये हैं-ब्रह्मा जन्म, विष्णु धारण-पालन तथा शिव या रुद्र सहंार के प्रतीक माने गये हैं।  हर मनुष्य में मृत्यु या संहार का भय रहता ही है इसलिये रुद्र या शिव के प्रति भी अनेक लोग अपनी श्रद्धा इस आशा से प्रकट करते हैं कि वह हमेशा प्र्रसन्न रहे।  वैसे भी उन्हें अत्यंत भोला माना जाता है जो नाम स्मरण से कृपा करने वाले हैं।
            धारणा तथा पालन के रूप भगवान विष्णु के अनेक अवतार माने जाते हैं पर भगवान शिव का एक ही रूप रहां है। यह अलग बात है कि हमारे यहां कथित अनेक बाबा उनके अवतार होने का दावा करते हैं। सबसे बड़ी महत्वपूर्ण बात यह कि हमने कहीं भी यह नहीं पढ़ा कि भगवान शिवजी भांग या नशे का सेवन करते थे जबकि देखा यह जाता है कि अनेक व्यसनी लोग तंबाकू, शराब, भांग, अफीम या मादक द्रव्य पदार्थों का सेवन करते हुए भगवान शिव का संदर्भ मजाक में देकर अपने को सही साबित करने का प्रयास करते हैं।  इतना ही नहीं कुछ लोग मादक पदार्थों के सेवन मदहोश होकर ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि कोई विशिष्ट व्यक्तित्व के स्वामी हों।  पतंजलि योग साहित्य में औषधि से समाधि की बात कही गयी है यह सत्य है पर उसे कोई श्रेष्ठ नहीं कहा गया है।  श्रीमद्भागवत गीता और पतंजलि योग में किसी वस्तु, विषय या व्यक्ति को अच्छा या बुरा नहीं कहा गया है। इनमें तो इतना बताया गया है कि किसी भी कर्म की प्रकृत्ति के अनुसार परिणाम होता है, तय तो यह हमें करना है कि वह हमारे अनुकूल है या नहीं।  औषधियों का निंरतर सेवन दैहिक, मानसिक और वैचारिक से विकृतियां लाता है यह अंतिम सत्य है।  इसलिये व्यसनी धर्म के ठेकेदारों से परे ही रहना चाहिये।
            ब्रह्मा जन्म, विष्णु कर्म तथा शिव मोक्ष के रूप हैं।  हम प्रतिदिन इनके प्रभाव में रहते हैं।  प्रातः धर्म, दोपहर धर्म, सांय काम या मनोरंजन तथा रात्रि मोक्ष के लिये बनी है।  अगर हम यह चाहते हैं कि रात्रि को निद्रा सहजता से आये तो यह आवश्यक है कि हम पूरे दिन ऐसे काम करें जो हमारे अनुकूल परिणाम देने वाले हों। शिव सत्य का प्रतीक माना जाता है।  सात्विक लोगों को सत्य ही प्रिय होता है।  ऐसा नहीं है कि अध्यात्मिक ज्ञानी या सात्विक लोग सांसरिक विषयों को त्याग देते हैं वरन् वह उसमें पूर्ण लिप्तता का त्याग करते हैं।  अपनी भौतिक, सामाजिक तथा भौतिक उपलब्धियों को अपने मन पर सवार नहीं होते।  न ही भगवान के किसी भी रूप की आराधना से कोई भौतिक सफलता की आशा करते हैं।  उनका आशय पूजा या आराधना करन अपने मन की शुद्धि करना होता है। ही शुद्धि सत्य मार्ग पर ले जाती है जहां भगवान शिव विराजमान रहते हैं। 
       इस महाशिवरात्रि पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों, पाठकों तथा फेसबुक सहयोगियेां को हार्दिक बधाई।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, February 07, 2015

धन्य है वह लोग जो निष्कामभाव से समाज सेवा करते हैं-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(dhanaya hain vah log jo nishkam bhav se samaj sewa kanrte hain-A Hindu hindi religion thought based on bhartrihari neeti shatak)




            आज के विज्ञापन युग में प्रचार माध्यम पैसा लेकर अनेक प्रतिष्ठित लोगों को देवता बना देते हैं।  इतना ही नहीं अब तो ऐसे कथित स्वयंभू समाजसेवी हो गये हैं जो धनिकों से चंदा लेकर गरीब तथा बेसहारा लोगों में दानवीर बन जाते हैं।  देश में अनेक अशासकीय स्वयंसेवी संगठन बन गये हैं जिनके शीर्ष पुरुष यह दावा करते हैं कि वह निष्काम भाव से समाज सेवा कर रहे हैं।  यह अलग बात है कि वह समाज सेवा के लिये प्राप्त धन से ही अपने गृह खर्च चलाते हैं। उससे ही समाज सेवा के लिये  यात्रायें करते हैं।  अपनी जेब से पैसा निकालकर खर्च करने की बात तो वह स्वयं  कहते भी नहीं है जो कि वास्तव में निष्काम भावी होने का प्रमाण होता है।  अगर हम ऐसे समाजसेवी संगठनों की संख्या देखें तो हमारे देश में गरीबो, मरीजों तथा बेसहारा लोगों की संख्या नगण्य रहना चाहिये पर आंकड़े इस को प्रमाणित नहीं करते। 

भर्तृहरि नीति शतक

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किं तेन हेमगिरिणा रजतांद्रिणा वा यत्राश्रिताश्च तरवस्तरवस्त एव।

मन्यामहे मलयमेव यदाश्रवेणा कङ्कोलनिन्बकुटजा अपि चन्दनाः स्यूः।।



            हिन्दी में भावार्थ-उस स्वर्ण पर्वत सुमेरु और रजत पर्वत हिमालय से भी क्या लाभ जहां के पेड़ तो पेड़  रहते है। हम तो उस मलय पेड़ को महान मानते हैं जिसके आश्रय में रहने वाले कंकोल, नीम और कुटज आदि वृक्ष चंदनमय हो जाते हैं।

            भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में अंधविश्वासों का कोई स्थान नहीं है यह अलग बात है कि पेशेवर धार्मिक ठेकेदारों ने कर्मकांडों के नाम पर अनेक प्रकार के अंधविश्वास समाज में स्थापित कर दिये हैं जिसे लोग चाहे अनचाहे उनका बोझ ढोते हैं।  इन अंधविश्वासों के विरुद्ध अनेक कथित विद्वान अभियान भी छेड़ देते हैं पर उनका प्रभाव इसलिये नहीं होता क्योंकि वह भारतीय अध्यात्म के तत्वज्ञान का अध्ययन नहीं करते।  उन्हें लगता है कि केवल नारे लगाने से लोग उनकी बात मान लेंगे।  ऐसे लोग भी अपने अभियान के लिये चंदा लेते हैं।  हमारी दृष्टि में तो अगर अंधविश्वास समाप्त करना है तो सत्य का विश्वास कायम करना चाहिये पर यह भी निश्चित है कि पेशेवर लोगों के लिये समाज में भावनात्मक परिवर्तन लाना सहज नहीं है।  भावनात्मक परिवर्तन के लिये हार्दिक प्रयास आवश्यक हैं जिसे आर्य अर्जन की भावना होने पर सहजता से नहीं किया जा सकता।
            ऐसे में धन्य है वह लोग जो प्रचार से परे होकर समाज में न केवल निष्काम भाव से सेवा करते हैं वरन् हार्दिक भाव से उनमें ज्ञान का प्रचार करते हैं।  इन्हीं लोगों की वजह से आज भी भारतीय समाज की पहचान विश्व में बनी हुई है।

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