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Saturday, November 22, 2014

कबीर पंथ पर फकीर ही चल सकते हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख(kabir pant par faqir hi chal sakte hain-hindi thought article)




            हमारे देश में महापुरुषों के नाम पर बहुत सारे पंथ बन गये हैं। इसमें आजकल कबीर पंथ की बहुत चर्चा है।  संत कबीर दास जी ने हमेशा ही भक्ति तथा ज्ञान साधना को एकांत का विषय बताया है। इतना ही नहीं उन्होंने धर्म के नाम पर ठेकेदारी करने वाले कथित संतों पर भी तीखे कटाक्ष किये हैं।  हैरानी की बात यह है कि भगवान नाम स्मरण से ही संसार सागर को पार करने का संदेश देने वाले संत कबीर के नाम पर भी पंथ चलाकर भीड़ का एकत्रीकरण होता रहा है।  संत कबीर ने कभी कोई अपना संगठन या आश्रम बनाया  अथवा शिष्यों को दीक्षा देने का कोई नाटक किया हो इसका उदाहरण नहीं मिलता।  उनकी रचनायें भी शिष्यों की बजाय संपूर्ण समाज को संबोधित करती हैं।
            हरियाणा के एक कथित संत ने पूज्यनीय कबीर का जितना मखौल बनाया है उसका उदाहरण आज तक नहीं देखा गया। कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिये उन्होंने अपने आश्रम के बाहर भक्तों और शिष्यों को एकत्रित कर लिया है ताकि वहां पुलिस प्रविष्ट न हो सके। हथियार बंद लोग न केवल अपने कथित गुरू को बचाने का प्रयास करते वरन् पुलिस पर हमले भी कर रहे थे।  संत के पकड़े जाने के बाद उनके महलनुमा आश्रम से अनेक प्रकार के हथियार तथा अन्य आपत्तिजनक वस्तुऐं बरामद होने के समाचार आ रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम का न तो अध्यात्मिक दर्शन और नही  उन महान संत कवि कबीर दास जी के संदेशों से संबंध है जिन्हें हमारा ज्ञानी समाज अपनी अनमोल धरोहर मानता है।

संत कबीर कहते हैं कि
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गुरुवा तो घर घर फिरै, दीक्षा हमरी लेहु।
कै बूड़ौं कै ऊबरौ, टका पर्दनी देहु।।
            हिन्दी में भावार्थ-गुरू तो घर घर फिर अपनी दीक्षा देने के लिये फिरते हैं। उनका केवल धन से मतलब होता है शिष्य उबरे या डूबे इससे उनका कोई मतलब नहीं होता।
सतगुरु ऐसा कीजिये, जाके पूरन मन्न।
अनतोले ही देत है नाम सरीखा धन्न।
            हिन्दी में भावार्थ-गुरु तो वही हो सकता है जिसका मन भरा हुआ है तथा वह बिना तोले ही नाम स्मरण जैसा धन देते हैं।

            कबीर ने संपूर्ण भारतीय समाज को एक इकाई माना है।  वह एक छोटे समूह का प्रतिनिघित्व नहीं करते थे वरन् उन्हें भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में एक ऐसा महापुरुष माना जाता है जिसकी चर्चा के बिना कोई ज्ञानी संत वाणी से से निकले शब्द समूह को अधूरा ही मानता है। आज हम जब कबीर पंथ के नाम पर चले ऐसे धार्मिक संगठनों या कथित संतों की क्रियायें देखते हैं तो लगता है कि वह दोहरे अपराध में लिप्त हैं-एक तो उनका नाम लेकर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के सिद्धांतों की आड़ में भ्रम फैलाना दूसरा कानून से  अपने आप को बड़ा समझकर न्याय सिद्धांतों का अपमान करना।  इस दोहरे अपराध की सजा भी दोहरी होना चाहिये। जिस अपराध पर कानूनी कार्यवाही होनी है वह तो करना ही चाहिये साथ ही उन पर धर्म को अपमानित करने का मामला भी दर्ज किया जा सकता है। हालांकि इसी बची यह भी खबर आयी है कि जिस तरह आश्रम से पुलिस पर आक्रमण किया गया उससे उस कथित संत पर राष्ट्रद्रोह का मामला दर्ज किया गया है।  एक कथित कबीर पंथी अगर वास्तव में अपनी राह चला होता तो कभी भी ऐसी नौबत नहीं आती।  अब तो उनके भक्त भी उन्हें छोड़कर जाते हुए यह कह रहे हैं कि वह कभी इस आश्रम में नहीं आयेंगे।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, November 15, 2014

म्लेच्छ लोगों से सतर्क रहें-हिन्दी चिंत्तन लेख(mlechchha logon se satark rahen-hindi though article)



            आजकल हम अपने देश में एक खराब प्रवृत्ति देख रहे हैं कि अपनी समस्याओं, दुर्घटनाओं तथा बुरे व्यवहार से उपजे क्रोध का का लोग सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं-इस दौरान वाहनों को जलाने, प्रहरियों पर पत्थर फैंकने तथा राहगीरों का मार्ग अवरूद्ध कर उन्हें मारने पीटने तक के समाचार आते हैं।  अनेक ऐसे भी समाचार आये कि अनेक शहरों में सेना तथा पुलिस भर्ती के लिये आये युवकों ने अपनी  निराशा का आक्रामकता का प्रदर्शन  करते हुए  सार्वजनिक संपत्ति को न केवल हानि पहुंचाई वरन् राहगीर महिलाओं के साथ अभद्रता भी की।  अनेक बार ऐसे समाचार भी आते हैं कि किसी वाहन से कोई राहगीर कुचल जाता है तो वहां के स्थानीय निवासियों में शािमल कुछ असामाजिक तत्व वाहन जलाने, दुकाने लूटने और प्रहरियों पर पत्थर बरसाने लगते हैं। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन इस तरह की प्रवृत्ति को म्लेच्छ प्रवृत्ति का मानता है। यह बात समझ लेना चाहिये।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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वापल-कूप-तडागानामारा-सुर-वेश्मनाम्।
उच्छेदने निराऽशङ्कः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते।।
            हिन्दी में भावार्थ-बावडी, कुंआ, वाटिका तथा देवालय में तोड़ फोड़ करने पर जिसे डर नहीं उसे म्लेच्छ कहा जाता है।

            समाज के निराशा का वातावरण जो बना है उसके लिये लोगों का अति आशावाद भी जिम्मेदार है। सभी लोग यह चाहते हैं कि  वह धनी और सुविधासंपन्न हो जायें।  हर कोई नौकरी करना चाहता है।  स्वाभिमानी सभी दिखना चाहते हैं पर स्वामित्व की प्रवृत्ति बहुत कम लोग में पाई जाती है। दूसरे के सामान पर विलासिता मिल जाये या फिर चाहे जैसे भी हो हमारी सभी जगह तूती बोले, इस तरह की सोच ने लोगों का अन्मयस्क बना दिया है।  जैसा कि देखा गया है कि धनी तथा प्रसिद्ध लोगों प्रभाव राजकीय संस्थाओं पर है जिसका लाभ उन्हें मिलता है, वैसा स्वयं को न मिलने पर आमजन क्रुद्ध रहते हैं।  इसलिये स्वयं को शक्तिशाली दिखाने के लिये  अनेक असामाजिक तत्व सदैव तत्पर रहते हैं और जहां आमजन को उत्तेजत करने का अवसर मिले वह अपने साथ साफ करते हैं।  इस तरह के हिंसक प्रदर्शन को  जन उपद्रव का नाम दिया जाता है पर सच  यह है कि दुकानें लूटना और आग लगाने का काम अपराधी ही करते हैं जिनका लक्ष्य अपना हित साधना होता है।  हमें ऐसे म्लेच्छ प्रवृत्ति के लोगों की पहचान कर उनसे सतर्क रहना चाहिये।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Thursday, November 06, 2014

भारतीय अध्यात्मिक पंरपरा में श्रीगुरुनानक देव का महान योगदान अविस्मरणीय-प्रकाश पर्व पर विशेष हिन्दी लेख(bhartiya adhyatmik parampara mein shri guru nanak dev ka mahan yogadan avismarniy-prakash parva par visheh hindu lekh, A Specila hindi article on birth day of shri guru nanak dev prakash parva)



           
            आज श्री गुरुनानक देव जी का 546 वां प्रकाश पर्व मनाया जा रहा है। गुरूनानक देव जी ने भारतीय अध्यात्मिक परंपरा की रक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वैसे तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन प्रारंभ से ही तत्वज्ञान धारण कर उसक अनुसार जीवन जीने के संदेश देता है पर कथित विद्वान इसकी आड़ में कर्मकांडों के नाम पर समाज को अंधविश्वास की तरफ ढकेल देते हैं। श्रीगुरुनानक देव ने इन्हीं अंधविश्वासों पर प्रहार करते हुए हृदय से परमात्मा की भक्ति करने की जो प्रेरणा के साथ ही समाज के कमजोर तथा गरीब वर्ग की सहायता की जो प्रेरणा दी वह अनुकरणीय है।
            श्रीगुरुनानक देव जी ने स्वयं किसी धर्म की स्थापना नहीं की। उनके बाद आये गुरुओं ने अपने समय की संक्रमित स्थितियों  को देखकर सिख पंथ की स्थापना का भी  भारतीय धर्म और संस्कृति कि रक्षा के लिये ही  की थी। श्रीगुरुनानक देव जी का जीवन सदैव समाज चिंतन और सुधार में बीता। बहुत कम लोग हैं जो आज के सभ्य भारतीय समाज में उनकी भूमिका का सही आंकलन कर पाते हैं। उनके काल में भारतीय समाज अंधविश्वासों और कर्मकांडों के मकड़जाल में फंसा हुआ था। कहने को लोग भले ही समाज की रीतियां निभा रहे थे पर अपने धर्म और संस्कृति कि  रक्षा के लिये उनके पास कोई ठोस योजना नहीं थी। राजनीतिक रूप से विदेशी आक्रांता अपना दबाव इस देश पर बढ़ा रहे थे। इन्हीं आक्रान्ताओं  के  साथ आये कथित विद्वान सामान्य जनों  को अपनी विचारधारा के अनुरूप माया मोह की तरफ दौड़ाते दिखे। देश के अधिकतर राजाओं का जीवन प्रजा की भलाई की बजाय अपने निजी राग द्वेष में बीत रहा था। वह राज्य के व्यवस्थापक का कर्तव्य निभाने की बजाय उसके उपभोग के अधिकार में अधिक संलग्न थे। यही कारण था कि जन असंतोष के चलते विदेशी राजाओं ने उनको हराने का सिलसिला जारी रखा। इधर सामान्य लोग भी अपने कर्मकांडो में ऐसे लिप्त रहे उनके लिये कोई नृप हो हमें का हानिकी नीति ही सदाबहार थी।
      मुख्य विषय यह था कि समाज धीरे धीरे विदेशी मायावी लोगों के जाल में फंसता जा रहा था और अपने अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति उसका कोई रुझान नहीं था। ऐसे में महान संत श्री गुरुनानक देव जी ने प्रकट होकर समाज में अध्यात्मिक चेतना जगाने का जो काम किया वह अनुकरणीय है। वैसे महान संत कबीर भी इसी श्रेणी में आते हैं। हम इन दोनों महापुरुषों का जीवन देखें तो न वह केवल रोचक, प्रेरणादायक और समाज के लिये कल्याणकारी है बल्कि सन्यास के नाम पर समाज से बाहर रहने का ढोंग करते हुए उसकी भावनाओं का दोहन करने वाले ढोंगियों के लिये एक आईना भी है| गुरुनानक देव और कबीरदास जी  के भक्त ही उनका ज्ञान धारण  कर इस असलियत को समझ  सकते हैं। इन दोनों महापुरुषों ने पूरा जीवन समाज में रहकर समाज के साथ व्यतीत किया। भारतीय अध्यात्मिक संदेश अपने पांवों पर अनेक स्थानों घूमते हुए सभी जगह फैलाया। श्री गुरुनानक देव जी तो मध्य एशिया तक की यात्रा कर आये।
श्री गुरुनानक देव जी के सबसे निकटस्थ शिष्य मरदाना को माना जाता है जो कि जाति से मुसलमान थे। आप देखिये गुरुनानक देव जी के तप का प्रभाव कि  उन्होंने अपना पूरा जीवन गुरुनानक जी के सेवा में गुजारा। इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि मरदाना ने कभी  अपना धर्म छोड़ने या पकड़ने का नाटक किया। दरअसल उस समय तक धर्म शब्द के साथ कोई संज्ञा या नाम नहीं था। मनुष्य यौनि मिलने पर संयम, परोपकार, दया तथा समभाव से जीवन व्यतीत किया जाये-यही धर्म का आशय था।
      आज धर्मों के जो नाम मिलते हैं वह पेशेवर धार्मिक ठेकेदारों एक सोचीसमझी साजिश के तहत समाज को बांटकर उस पर शासन करने की नीति का परिणाम है।
श्रीगुरुनानक देव जी के समय इस देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक दृष्टि से संक्रमण काल था। वह जानते थे कि भौतिकवाद की बढ़ती प्रवृत्ति ही इस समाज के लिये सबसे बड़ा खतरा है, जिसमें धार्मिक कर्मकांड और अंधविश्वास अपनी बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इससे व्यक्ति की चिंतन क्षमता का ह्रास  होता है और वह बहिर्मुखी होकर दूसरे का गुलाम बन जाता है। भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता मनुष्य को दास बना देती है। अधिक संचय की प्रवृत्ति से बचते हुए दान, सेवा और परोपकार करने से ही समाज समरसता आयेगी जिससे शांति और एकता का निर्माण होगा-यही उनके संदेशों का सार था। सबसे बड़ी बात उनका जोर व्यक्ति निर्माण पर था। हम अगर इस पर विचार करें तो पायेंगे कि व्यक्ति मानसिक रूप से परिपक्व, ज्ञानी और सजग होगा तो भले ही वह निर्धन हो उसे कोई भी दैहिक तथा मानसिक रूप से बांध नहीं सकता। यदि व्यक्ति में अज्ञान, अहंकार तथा विलासिता का भाव होगा तो कोई भी उसे पशु की तरह बांध कर ले जा सकता है। आज हम देख सकते हैं कि टीवी चैनलों पर कल्पित पात्रों पर लोग किस तरह थिरक रहे हैं। उसी में अपने नये भगवान बना लेते हैं। कई युवक युवतियों यह कहते हुए टीवी पर देखे जा सकते हैं कि हम तो अमुक बड़ी हस्ती को प्यार करते हैं। यह अध्यात्मिक ज्ञान से दूरी का परिणाम है। इसलिये आवश्यकता इस बात है कि बजाय हम इस बात पर विचार करें कि दूसरे धर्म के लोग हमारे विरोधी हैं इस बात पर अधिक जोर देना चाहिये कि हमारे समाज का हर सदस्य दिमागी रूप से परिपक्व हो। अध्यात्मिक रूप से अपरिपक्व युवक हो युवती समाज रक्षा में सहयोगी नहीं बन सकते।
      इस देश की मुख्य समस्या यह है कि मनुष्य ही मनुष्य का पशु रूप में दोहन करता है।

श्री गुरुनानक देव जी ने इसी तरफ इशारा करते हुए कहा है कि
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जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु।

     हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य का ही रक्त पीता है उसका चित कैसे निर्मल हो सकता है।

      खावहि खरचहि रलि मिलि भाई।
तोटि न आवै वधदो जाई।।;;

     हिंदी में भावार्थ- भाई, सभी मिलकर खर्च करो और खाओ। इससे टोटा नहीं पड़ता बल्कि वृद्धि होती है।
      ऐसे एक नहीं हजारों संदेश है जो आज के संदर्भ में ही उतने प्रासंगिक हैं जितने उनके इस धरती पर प्रकट रहते हुए थे। ऐस महान संत श्री गुरुनानक देव जी का स्मरण करने मात्र से हृदय प्र्फुल्लित हो उठता है। उनका जीवन इसलिये भी प्रेरक है क्योंकि उन्होंने उसे सामान्य मनुष्य की तरह बिताया। ऐसे महान संत को कोटि कोटि प्रणाम। वाहे गुरु की जय, वाहे गुरु की फतह।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Wednesday, October 29, 2014

सात्विक जीवन जीना भी तप है-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(satwik jeevan jeena bhee tap hai-A hindu hindi religion thought based on manusmriti)




            हमारे देश में श्रीमद्भागवत गीता जैसे पवित्र ग्रंथ भी है जो जीवन जीने की कला सिखाता है पर आश्चर्य इस बात का है कि धर्म के कथित ज्ञाता उसी के ज्ञान के नाम पर भारी भ्रम फैलाते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में गुरु की सेवा करने की बात कही गयी है यह उचित भी है। यह अलग बात है कि श्रीमद्भागवत गीता में तत्वज्ञान देने वालों को ही गुरु मानने का संकेत दिया गया है।  दैहिक गुरु न होने पर श्रीगीता का अध्ययन करने पर भी जीवन सुख मिलने की प्रेरणा भी दी गयी है। यह अलग बात है कि श्रीमद्भागवत गीता में गुरु सेवा के संदेश की आड़ में अनेक पाखंडी अपने पांव छुआकर लोगों को स्वर्ग दिलाने का आश्वासन देते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में पवित्र ग्रंथों के अध्ययन को भी तप माना गया है।  उनके शब्दों को ही गुरु रूप भी कहा गया है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि
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वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्स्यन् द्विजोनामः।
वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते।।
            हिन्दी में भावार्थ-संसार में वेदों की शिक्षानुसार अपने जीवन को व्यतीत करने से बड़ा कोई तप नहीं है, यदि कोई मनुष्य वास्तव में तप करना चाहता है तो उसे वेदों का अध्ययन करना चाहिये।

            तप के नाम पर द्रव्यमय हवन और यज्ञों को ही प्रचारित किया जाता है ताकि उससे धर्म से चलने वाले व्यापार में आथ्रिक लाभ हो।  श्रीमद्भागवत गीता में प्राणायाम को भी यज्ञ कहा गया है। योग साधना में अपनी ही देह में उत्पन्न ऊर्जा से हवन करने पर अमृत की अनुभूति का अनुभव वाले साधक को भी एक तपस्वी माना गया है। जबकि देखा यह गया है कि द्रव्यमय यज्ञ में खीर या अन्य खाद्य पदार्थ को प्रसाद को अमृत कहकर खाने के लिये लोग तत्पर रहते हैं। अमृत का केवल भौतिक स्वरूप मानने वाले ज्ञानी नहीं हो सकते यह बात तय है। अमृत का आशय है कि सुखानुभूति से भी है यह बात ज्ञान साधक जानते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है। ज्ञानमय यज्ञ से पैदा अमृत मुख से नहीं वरन् आज्ञा चक्र से ग्रहण किया जाता है।
            हमारे यहां अनेक ऐसे महापुरुष ऐसे हुए हैं जिन्हें दैहिक गुरु की बजाय परमात्मा या फिर पवित्र ग्रंथों को अपना गुरु बनाकर तप किया और समाज को एक नयी दिशा दी। उनसे प्रेरणा लेकर  कभी भी दैहिक गुरु न मिलने से निराश होकर बैठने की बजाय पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिये।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Wednesday, October 22, 2014

श्रमिक तथा बुद्धिजीवियों का संरक्षण करने पर ही सामाजिक समरसता संभव-दिवाली पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख(shramik tathaa buddhijiviyon ka sanrakshan karne par hi samajik samrasata sambhav-spechial hindu article on diwali or dipawali festival)



            गुजरात के एक प्रसिद्ध  हीरा व्यापारी ने अपनी कंपनी के  1200 कर्मचारियों को-जिन्हें वह  हीरा अभियन्ता या इंजीनियर कहते हैं-दीपावली के अवसर पर बोनस में कार तथा फ्लेट देने की घोषणा कर पूरे देश के धनपतियों के लिये आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है। वैसे गुजरात के बारे में हमारा मानना यह है कि वहां के लोग धन और धर्म में समान दिलचस्पी रखते हैं।  सांस्कृतिक रूप से भी उनकी गतिविधियां अत्यंत रुचिकर हैं।  बहुत समय पहले गुजरात के ही एक धनी सेठ ने अपना सब कुछ दान कर सन्यास अपना लिया था। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को संपन्न बनाने वाले भगवान श्रीकृष्ण ने भी अपना निवास गुजरात में ही  द्वारका में बनाया। महाभारत युद्ध के समय उन्होंने  कुरुक्षेत्र में आकर श्रीमद्भागवत गीता में महान संदेश दिया जो आज उतना ही प्रासांगिक है जितना उस समय था, जब दिया गया। माया और सत्य के बीच जीवन में वही इंसान सामंजस्य बनाकर चल सकता है जो श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञाता हो।
            श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है कि अकुशल श्रम को कभी हेय नहीं समझना चाहिये। इसका भावनात्मक अर्थ यही है कि कोई अपनी रोटी रोटी कमाने के लिये छोट या बड़ा काम करता है तो उसका आंकलन इस आधार पर नहीं करना चाहिये कि वह कितना कमा रहा है? वरन् हर व्यक्ति के आचरण, व्यवहार तथा विचार के आधार पर उसकी योग्यता का आंकलन करना चाहिये।  हमारे देश में श्रमजीवियों का शोषण करने के साथ ही उनको अपमानित करने की प्रवृत्ति देखी जाती है।  उससे भी ज्यादा बुरा यह कि यह माना जाता है कि उनमें ईमानदारी तो हो ही नहीं सकती। हमारे समाज में अर्थ के आधार पर हमेशा ही विषम हालात रहे हैं। यही कारण है कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथ हमेशा निष्प्रयोजन दया का संदेश सामाजिक समरसता बनाने रखने का प्रयास करते रहे हैं। सामाजिक समरसता बनाने के लिये श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने वेदों का सार प्रस्तुत कर अपना संदेश स्थापित किया।
            भारत में आर्थिक द्वंद्व के इतना रहा कि विदेशियों के लिये यहां फूट डालकर आसान रहा है। एक तरफ धनी लोग अपने अहंकार में सामाजिक कार्यक्रमों में अपने धन का प्रदर्शन करते रहे तो दूसरी तरह अल्प धनी और श्रमिक मन ही मन कुड़ते रहे। यही कारण है कि विदेशी आक्रांताओं ने यहीं के लोगों को सपने दिखाकर अपनी तरफ किया और देश को लूटते रहे।  मोहम्मद गौरी ने तो सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण ढेर सारी दौलत लूटी जो गुजरात में ही था।  हम यह कहते हैं कि मुगल और अंग्रेजों ने हम पर शासन किया पर आज तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि दोनों के समय पुलिस तथा सेना में उनके स्वयं के देश में जन्मे लोग  थे या भारतीय ही उनकी सेवा कर रहे थे। हमारा मानना है कि नाम विदेशी शासकों का भले ही रहा हो पर वास्तव में कहीं न कहीं भारत के अंसतुष्ट वर्ग ने ही उनकी सत्ता बनाये रखने में सहायता की और लाभ उठाने वाला मध्यस्थ भी यहीं का बुद्धिजीवी वर्ग  रहा था।
            कहने का अभिप्राय यह है कि अगर हम चाहते हैं कि हमारे धर्म, संस्कृति तथा क्षेत्र की एकता तभी बनी रह सकती है जब धनिक वर्ग उदार रवैया अपनायेगा। वह अपने साथ कम करने वाले श्रमिक तथा बुद्धिजीवी वर्ग को वैसी ही भौतिक सुविधायें स्वयं उपलब्ध कराकर ही सामाजिक समरसता का वातावरण बनाये रह सकता है।  इसी से उसकी संपत्ति, व्यवसाय तथा परिवार की भी रक्षा हो सकती है। जिस तरह विश्व में मुद्रा ने बृहद रूप धारण कर लिया उसमें अब यह संभव नहीं है उसमें से थोड़ा श्रमिक या बुद्धिजीवी कर्मी को दे दिया और वह प्रसन्न होकर चला गया।  ऐसे में बृहर उपहार देना ही चाहिये।  इस दीपावली पर देश के धनिक वर्ग को आत्ममंथन करना चाहिये। अपना काम बनता भाड़ में जाये जनताका सिद्धांत चलना अब संभव नहीं।
            इस दीपावली पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों, पाठकों तथा शुभचिंत्तकों को हार्दिक बधाई।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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Thursday, October 09, 2014

हम अमृतसर की यात्रा पर निकलने वाले हैं(my tour for amritsar)


कल से 14 अक्टूबर तक अपना अमृतसर दौरा प्रस्तावित है।  यह पहला अवसर है कि जब अपनी यात्रा की चर्चा अंतर्जार पर कर रहे हैं। इस तरह फेसबुक पर सूचना देते हुए थोड़ा संकोच हो रहा है।  वैसे तो फेसबुक, ब्लॉग और ट्विटर पर एक आभासी दुनियां है जिसकी सत्यता पर विश्वास करना कठिन है।  इस अंतर्जाल पर एक भी ऐसा मित्र नहीं है जो इस लेखक से मिलने को उत्सुक हो।  अमृतसर से कुछ फेसबुकिया मित्र हैं पर उनका नाम पता 635 लोगों की सूची में ढूंढना कठिन है। फिर प्रश्न है कि हमसे कौन मिलना चाहेगा?  अमृतसर में स्वर्ण मंदिर, जलियांवाला बाग तथा कुछ प्रतिष्ठत स्थान हम देखने जायेंगे। कुछ लोग कह रहे हैं कि सीमावर्ती इलाका भी देख आना।  जिस तरह जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान गोलीाबारी कर रहा है उससे सीमावर्ती इलाका शब्द सुनते ही शरीर में सिहरन दौड़ जाती है।
      हालांकि यह गोलीबारी सामान्यतः होती रहती है पर इस बार इसके बड़े युद्ध बदल जाने की आशंकायें लग रही है। रक्षा विशेषज्ञ इससे इंकार कर रहे हैं।  कहा जाता है कि कश्मीर मुद्दा ही पाकिस्तान में सेना को सम्माजनक स्थान दिलाता है इसलिये वह गाहेबगाहे यहां अपने कारनामे करती रहती है।  इस बार वह अधिक ही सक्रिय हुई है। इसका कारण यह भी लगता है कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संध में स्पष्ट रूप से कह दिया कि यह द्विपक्षीय विषय है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाने से कोई लाभ नहीं है।  ऐसा पहली बार हुआ है कि अंतर्राष्ट्रीय संस्था में ही पाकिस्तान के मुद्दे को तो   नकारा गया साथ ही  संयुक्त राष्ट्र संघ के अस्तित्व और महत्व को भी अनेक बातें कहकर चुनौती दी गयी।  जबकि पाकिस्तान इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बनाये रखना चाहता है।  अगर वह ऐसा नहीं करेगा तो मामला गौण हो जायेगा और पाकिस्तानी सेना जो इसकी आड़ में लोकतांित्रक ढांचे को सामने रखकर अभी तक जो शासन चलाती रही है अपना अस्तित्व खो बैठेगी।
      पाकिस्तान की सेना के पीछे भारत के छद्म मित्र देश भी हो सकते हैं जिन्हें प्रधानमंत्री श्री मोदी का संयुक्त राष्ट्र संघ के महत्व सीमित रह जाने के कारण उसे विस्तृत रूप देने की सलाह  देना भी अखरा हो।  जिस संयुक्त राष्ट्रसंघ को कश्मीर मामले में माई बाप मान रहा हो उसे ही भारत चुनौती दे रहा है तो इस बात की आश्ंाका पैदा होती ही है कि ऐसी हरकत के पीछे किसी दूसरे देश का इशारा भी हो सकता है।  विश्व के शक्तिशाली देशों ने अभी तक संयुक्त राष्ट्र संघ की आड़ में मानमानी की है जिससे भारत में नाराजगी रहती है और अब  पाकिस्तान के रणनीतिकारों को यह बात समझनी होगी कि भारत से टकराव में अंततः हानि उसी की होनी है।
      इधर उड़ीसा में तूफानी आने की सूचनायें भी मिल रही हैं।  ऐसा लगता है कि अमृतसर की यात्रा से हम जब लौटेंगे तो मौसम में कुछ ठंडक आ जायेगी।  अभी दोपहर की गर्मी पसीना निकाल देती है।  अमृतसर में जो देखेंगे उस पर अपना कोई लेख जरूर लिखेंगे।

Saturday, October 04, 2014

पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन-नया विषय सामने आने पर विवेक संयम योग करें(naya vishay samane ane par vivek sanyam yog karen-A hindu hindi thohght article on patanjali yog sahitya)



            यह मानवीय स्वभाव है कि जब वह अपने सामने किसी दृश्य, व्यक्ति या वस्तु को देखता है तो उस पर अपनी तत्काल प्रतिक्रिया देने या राय कायम करने को तत्पर हो जाता है। इस उतावली में अनेक बार मनुष्य के मन, बुद्धि तथा विचारों में भ्रम तथा तनाव के उत्पन्न होता है।  इस तरह की प्रतिक्रिया अनेक बार कष्टकर होती है और बाद में उसका पछतावा भी होता है।
            वर्तमान समय में हमारे यहां युवा वर्ग में जिस तरह रोजगार, शिक्षा तथा कला के क्षेत्र में शीघ्र सफलता प्राप्त करने के लिये सामूहिक प्रेरणा अभियान चल रहा है उसमें धीरज से सोचकर काम करने की कला का कोई स्थान ही नहीं है।  लोग अनेक तरह के सपने तो देखते हैं पर उन्हें पूरा करने की उनको उतावली भी रहती है। यही कारण है कि सामान्य लोगों में  धीरज रखने की प्रवृत्ति करीब करीब समाप्त ही हो गयी है।  जिस कारण नाकामी मिलने पर अनेक लोग भारी कष्ट के कारण मानसिक संताप भोगते हैं।

पतंजलि योग में कहा गया है कि
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क्षणत्तक्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम्।
            हिन्दी में भावार्थ-क्षण क्षण के क्रम से संयम करने पर विवेकजनित ज्ञान उत्पन्न होता है।

जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः।
            हिन्दी में भावार्थ-जिन विषयों का जाति, लक्षण और क्षेत्र का भेद नहीं किया जा सकता उस समय जो दो वस्तुऐं एक समान प्रतीत होती हैं उनकी पहचान विवेक ज्ञान से की जा सकती है।

            प्रकृति ने मनुष्य और पशुओं के बीच अंतर केवल विवेक शक्ति का ही रखा है।  मन, बुद्धि तथा अहंकार तो पशुओं में भी पाये जाते हैं पर अपने से संबद्ध विषय की भिन्नता, उनके  लक्षण तथा  उपयोग करने की इच्छा का निर्धारण करने की क्षमता केवल मनुष्य में ही है।  इसके लिये आवश्यक है कि जब मनुष्य के सामने कोई वस्तु, विषय या व्यक्ति दृश्यमान होता है तब उस पर संयम के साथ हर क्षण दृष्टि जमाये रखना चाहिये। यह क्रिया तब तक करना चाहिये जब तक यह तय न हो जाये कि उस दृष्यमान विषय की प्रकृत्ति, लक्षण तथा उससे संपर्क रखने का परिणाम किस तरह का हो सकता है?
            इसे हम विवेक संयम योग भी कह सकते हैं।  ऐसा अनेक बार होता है कि हमाने सामने दृश्यमान विषय के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती।  एक साथ दो विषय समान होने पर यह निर्णय लेना कठिन हो जाता है कि उनकी प्रकृति समान है या नहीं! अनेक अवसर पर किसी भी विषय, वस्तु तथा व्यक्ति की मूल प्रंकृत्ति, रूप तथा भाव को छिपाकर उसे हमारे सामने इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि वह हमें अनुकूल लगे जबकि वह भविष्य में उसके हमारे प्रतिकूल होने की आशंका होती है।
            इनसे बचने का एक ही उपाय है कि हमारे सामने जब कोई नया विषय, वस्तु या व्यक्ति आता है तो पहले उस पर बाह्य दृष्टि के साथ ही अंतदृष्टि भी लंबे क्षणों तक केंद्रित करें।  प्रतिक्रिया देने से पहले निरंतर हर क्षण संयम के साथ उस पर विचार करें। धीमे धीमे हमारा विवेक ज्ञान जाग्रत होता है  जिससे दृश्यमान विषय के बारे में वह ज्ञान स्वाभाविक रूप से  होने लगता है जो उसके पीछे छिपा रहता है। इस हर क्षण संयम रखने की प्रक्रिया को हम विवेक योग भी कह सकते हैं।     

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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