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Wednesday, October 29, 2014

सात्विक जीवन जीना भी तप है-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(satwik jeevan jeena bhee tap hai-A hindu hindi religion thought based on manusmriti)




            हमारे देश में श्रीमद्भागवत गीता जैसे पवित्र ग्रंथ भी है जो जीवन जीने की कला सिखाता है पर आश्चर्य इस बात का है कि धर्म के कथित ज्ञाता उसी के ज्ञान के नाम पर भारी भ्रम फैलाते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में गुरु की सेवा करने की बात कही गयी है यह उचित भी है। यह अलग बात है कि श्रीमद्भागवत गीता में तत्वज्ञान देने वालों को ही गुरु मानने का संकेत दिया गया है।  दैहिक गुरु न होने पर श्रीगीता का अध्ययन करने पर भी जीवन सुख मिलने की प्रेरणा भी दी गयी है। यह अलग बात है कि श्रीमद्भागवत गीता में गुरु सेवा के संदेश की आड़ में अनेक पाखंडी अपने पांव छुआकर लोगों को स्वर्ग दिलाने का आश्वासन देते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में पवित्र ग्रंथों के अध्ययन को भी तप माना गया है।  उनके शब्दों को ही गुरु रूप भी कहा गया है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि
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वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्स्यन् द्विजोनामः।
वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते।।
            हिन्दी में भावार्थ-संसार में वेदों की शिक्षानुसार अपने जीवन को व्यतीत करने से बड़ा कोई तप नहीं है, यदि कोई मनुष्य वास्तव में तप करना चाहता है तो उसे वेदों का अध्ययन करना चाहिये।

            तप के नाम पर द्रव्यमय हवन और यज्ञों को ही प्रचारित किया जाता है ताकि उससे धर्म से चलने वाले व्यापार में आथ्रिक लाभ हो।  श्रीमद्भागवत गीता में प्राणायाम को भी यज्ञ कहा गया है। योग साधना में अपनी ही देह में उत्पन्न ऊर्जा से हवन करने पर अमृत की अनुभूति का अनुभव वाले साधक को भी एक तपस्वी माना गया है। जबकि देखा यह गया है कि द्रव्यमय यज्ञ में खीर या अन्य खाद्य पदार्थ को प्रसाद को अमृत कहकर खाने के लिये लोग तत्पर रहते हैं। अमृत का केवल भौतिक स्वरूप मानने वाले ज्ञानी नहीं हो सकते यह बात तय है। अमृत का आशय है कि सुखानुभूति से भी है यह बात ज्ञान साधक जानते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है। ज्ञानमय यज्ञ से पैदा अमृत मुख से नहीं वरन् आज्ञा चक्र से ग्रहण किया जाता है।
            हमारे यहां अनेक ऐसे महापुरुष ऐसे हुए हैं जिन्हें दैहिक गुरु की बजाय परमात्मा या फिर पवित्र ग्रंथों को अपना गुरु बनाकर तप किया और समाज को एक नयी दिशा दी। उनसे प्रेरणा लेकर  कभी भी दैहिक गुरु न मिलने से निराश होकर बैठने की बजाय पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिये।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Wednesday, October 22, 2014

श्रमिक तथा बुद्धिजीवियों का संरक्षण करने पर ही सामाजिक समरसता संभव-दिवाली पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख(shramik tathaa buddhijiviyon ka sanrakshan karne par hi samajik samrasata sambhav-spechial hindu article on diwali or dipawali festival)



            गुजरात के एक प्रसिद्ध  हीरा व्यापारी ने अपनी कंपनी के  1200 कर्मचारियों को-जिन्हें वह  हीरा अभियन्ता या इंजीनियर कहते हैं-दीपावली के अवसर पर बोनस में कार तथा फ्लेट देने की घोषणा कर पूरे देश के धनपतियों के लिये आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है। वैसे गुजरात के बारे में हमारा मानना यह है कि वहां के लोग धन और धर्म में समान दिलचस्पी रखते हैं।  सांस्कृतिक रूप से भी उनकी गतिविधियां अत्यंत रुचिकर हैं।  बहुत समय पहले गुजरात के ही एक धनी सेठ ने अपना सब कुछ दान कर सन्यास अपना लिया था। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को संपन्न बनाने वाले भगवान श्रीकृष्ण ने भी अपना निवास गुजरात में ही  द्वारका में बनाया। महाभारत युद्ध के समय उन्होंने  कुरुक्षेत्र में आकर श्रीमद्भागवत गीता में महान संदेश दिया जो आज उतना ही प्रासांगिक है जितना उस समय था, जब दिया गया। माया और सत्य के बीच जीवन में वही इंसान सामंजस्य बनाकर चल सकता है जो श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञाता हो।
            श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है कि अकुशल श्रम को कभी हेय नहीं समझना चाहिये। इसका भावनात्मक अर्थ यही है कि कोई अपनी रोटी रोटी कमाने के लिये छोट या बड़ा काम करता है तो उसका आंकलन इस आधार पर नहीं करना चाहिये कि वह कितना कमा रहा है? वरन् हर व्यक्ति के आचरण, व्यवहार तथा विचार के आधार पर उसकी योग्यता का आंकलन करना चाहिये।  हमारे देश में श्रमजीवियों का शोषण करने के साथ ही उनको अपमानित करने की प्रवृत्ति देखी जाती है।  उससे भी ज्यादा बुरा यह कि यह माना जाता है कि उनमें ईमानदारी तो हो ही नहीं सकती। हमारे समाज में अर्थ के आधार पर हमेशा ही विषम हालात रहे हैं। यही कारण है कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथ हमेशा निष्प्रयोजन दया का संदेश सामाजिक समरसता बनाने रखने का प्रयास करते रहे हैं। सामाजिक समरसता बनाने के लिये श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने वेदों का सार प्रस्तुत कर अपना संदेश स्थापित किया।
            भारत में आर्थिक द्वंद्व के इतना रहा कि विदेशियों के लिये यहां फूट डालकर आसान रहा है। एक तरफ धनी लोग अपने अहंकार में सामाजिक कार्यक्रमों में अपने धन का प्रदर्शन करते रहे तो दूसरी तरह अल्प धनी और श्रमिक मन ही मन कुड़ते रहे। यही कारण है कि विदेशी आक्रांताओं ने यहीं के लोगों को सपने दिखाकर अपनी तरफ किया और देश को लूटते रहे।  मोहम्मद गौरी ने तो सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण ढेर सारी दौलत लूटी जो गुजरात में ही था।  हम यह कहते हैं कि मुगल और अंग्रेजों ने हम पर शासन किया पर आज तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि दोनों के समय पुलिस तथा सेना में उनके स्वयं के देश में जन्मे लोग  थे या भारतीय ही उनकी सेवा कर रहे थे। हमारा मानना है कि नाम विदेशी शासकों का भले ही रहा हो पर वास्तव में कहीं न कहीं भारत के अंसतुष्ट वर्ग ने ही उनकी सत्ता बनाये रखने में सहायता की और लाभ उठाने वाला मध्यस्थ भी यहीं का बुद्धिजीवी वर्ग  रहा था।
            कहने का अभिप्राय यह है कि अगर हम चाहते हैं कि हमारे धर्म, संस्कृति तथा क्षेत्र की एकता तभी बनी रह सकती है जब धनिक वर्ग उदार रवैया अपनायेगा। वह अपने साथ कम करने वाले श्रमिक तथा बुद्धिजीवी वर्ग को वैसी ही भौतिक सुविधायें स्वयं उपलब्ध कराकर ही सामाजिक समरसता का वातावरण बनाये रह सकता है।  इसी से उसकी संपत्ति, व्यवसाय तथा परिवार की भी रक्षा हो सकती है। जिस तरह विश्व में मुद्रा ने बृहद रूप धारण कर लिया उसमें अब यह संभव नहीं है उसमें से थोड़ा श्रमिक या बुद्धिजीवी कर्मी को दे दिया और वह प्रसन्न होकर चला गया।  ऐसे में बृहर उपहार देना ही चाहिये।  इस दीपावली पर देश के धनिक वर्ग को आत्ममंथन करना चाहिये। अपना काम बनता भाड़ में जाये जनताका सिद्धांत चलना अब संभव नहीं।
            इस दीपावली पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों, पाठकों तथा शुभचिंत्तकों को हार्दिक बधाई।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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Thursday, October 09, 2014

हम अमृतसर की यात्रा पर निकलने वाले हैं(my tour for amritsar)


कल से 14 अक्टूबर तक अपना अमृतसर दौरा प्रस्तावित है।  यह पहला अवसर है कि जब अपनी यात्रा की चर्चा अंतर्जार पर कर रहे हैं। इस तरह फेसबुक पर सूचना देते हुए थोड़ा संकोच हो रहा है।  वैसे तो फेसबुक, ब्लॉग और ट्विटर पर एक आभासी दुनियां है जिसकी सत्यता पर विश्वास करना कठिन है।  इस अंतर्जाल पर एक भी ऐसा मित्र नहीं है जो इस लेखक से मिलने को उत्सुक हो।  अमृतसर से कुछ फेसबुकिया मित्र हैं पर उनका नाम पता 635 लोगों की सूची में ढूंढना कठिन है। फिर प्रश्न है कि हमसे कौन मिलना चाहेगा?  अमृतसर में स्वर्ण मंदिर, जलियांवाला बाग तथा कुछ प्रतिष्ठत स्थान हम देखने जायेंगे। कुछ लोग कह रहे हैं कि सीमावर्ती इलाका भी देख आना।  जिस तरह जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान गोलीाबारी कर रहा है उससे सीमावर्ती इलाका शब्द सुनते ही शरीर में सिहरन दौड़ जाती है।
      हालांकि यह गोलीबारी सामान्यतः होती रहती है पर इस बार इसके बड़े युद्ध बदल जाने की आशंकायें लग रही है। रक्षा विशेषज्ञ इससे इंकार कर रहे हैं।  कहा जाता है कि कश्मीर मुद्दा ही पाकिस्तान में सेना को सम्माजनक स्थान दिलाता है इसलिये वह गाहेबगाहे यहां अपने कारनामे करती रहती है।  इस बार वह अधिक ही सक्रिय हुई है। इसका कारण यह भी लगता है कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संध में स्पष्ट रूप से कह दिया कि यह द्विपक्षीय विषय है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाने से कोई लाभ नहीं है।  ऐसा पहली बार हुआ है कि अंतर्राष्ट्रीय संस्था में ही पाकिस्तान के मुद्दे को तो   नकारा गया साथ ही  संयुक्त राष्ट्र संघ के अस्तित्व और महत्व को भी अनेक बातें कहकर चुनौती दी गयी।  जबकि पाकिस्तान इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बनाये रखना चाहता है।  अगर वह ऐसा नहीं करेगा तो मामला गौण हो जायेगा और पाकिस्तानी सेना जो इसकी आड़ में लोकतांित्रक ढांचे को सामने रखकर अभी तक जो शासन चलाती रही है अपना अस्तित्व खो बैठेगी।
      पाकिस्तान की सेना के पीछे भारत के छद्म मित्र देश भी हो सकते हैं जिन्हें प्रधानमंत्री श्री मोदी का संयुक्त राष्ट्र संघ के महत्व सीमित रह जाने के कारण उसे विस्तृत रूप देने की सलाह  देना भी अखरा हो।  जिस संयुक्त राष्ट्रसंघ को कश्मीर मामले में माई बाप मान रहा हो उसे ही भारत चुनौती दे रहा है तो इस बात की आश्ंाका पैदा होती ही है कि ऐसी हरकत के पीछे किसी दूसरे देश का इशारा भी हो सकता है।  विश्व के शक्तिशाली देशों ने अभी तक संयुक्त राष्ट्र संघ की आड़ में मानमानी की है जिससे भारत में नाराजगी रहती है और अब  पाकिस्तान के रणनीतिकारों को यह बात समझनी होगी कि भारत से टकराव में अंततः हानि उसी की होनी है।
      इधर उड़ीसा में तूफानी आने की सूचनायें भी मिल रही हैं।  ऐसा लगता है कि अमृतसर की यात्रा से हम जब लौटेंगे तो मौसम में कुछ ठंडक आ जायेगी।  अभी दोपहर की गर्मी पसीना निकाल देती है।  अमृतसर में जो देखेंगे उस पर अपना कोई लेख जरूर लिखेंगे।

Saturday, October 04, 2014

पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन-नया विषय सामने आने पर विवेक संयम योग करें(naya vishay samane ane par vivek sanyam yog karen-A hindu hindi thohght article on patanjali yog sahitya)



            यह मानवीय स्वभाव है कि जब वह अपने सामने किसी दृश्य, व्यक्ति या वस्तु को देखता है तो उस पर अपनी तत्काल प्रतिक्रिया देने या राय कायम करने को तत्पर हो जाता है। इस उतावली में अनेक बार मनुष्य के मन, बुद्धि तथा विचारों में भ्रम तथा तनाव के उत्पन्न होता है।  इस तरह की प्रतिक्रिया अनेक बार कष्टकर होती है और बाद में उसका पछतावा भी होता है।
            वर्तमान समय में हमारे यहां युवा वर्ग में जिस तरह रोजगार, शिक्षा तथा कला के क्षेत्र में शीघ्र सफलता प्राप्त करने के लिये सामूहिक प्रेरणा अभियान चल रहा है उसमें धीरज से सोचकर काम करने की कला का कोई स्थान ही नहीं है।  लोग अनेक तरह के सपने तो देखते हैं पर उन्हें पूरा करने की उनको उतावली भी रहती है। यही कारण है कि सामान्य लोगों में  धीरज रखने की प्रवृत्ति करीब करीब समाप्त ही हो गयी है।  जिस कारण नाकामी मिलने पर अनेक लोग भारी कष्ट के कारण मानसिक संताप भोगते हैं।

पतंजलि योग में कहा गया है कि
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क्षणत्तक्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम्।
            हिन्दी में भावार्थ-क्षण क्षण के क्रम से संयम करने पर विवेकजनित ज्ञान उत्पन्न होता है।

जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः।
            हिन्दी में भावार्थ-जिन विषयों का जाति, लक्षण और क्षेत्र का भेद नहीं किया जा सकता उस समय जो दो वस्तुऐं एक समान प्रतीत होती हैं उनकी पहचान विवेक ज्ञान से की जा सकती है।

            प्रकृति ने मनुष्य और पशुओं के बीच अंतर केवल विवेक शक्ति का ही रखा है।  मन, बुद्धि तथा अहंकार तो पशुओं में भी पाये जाते हैं पर अपने से संबद्ध विषय की भिन्नता, उनके  लक्षण तथा  उपयोग करने की इच्छा का निर्धारण करने की क्षमता केवल मनुष्य में ही है।  इसके लिये आवश्यक है कि जब मनुष्य के सामने कोई वस्तु, विषय या व्यक्ति दृश्यमान होता है तब उस पर संयम के साथ हर क्षण दृष्टि जमाये रखना चाहिये। यह क्रिया तब तक करना चाहिये जब तक यह तय न हो जाये कि उस दृष्यमान विषय की प्रकृत्ति, लक्षण तथा उससे संपर्क रखने का परिणाम किस तरह का हो सकता है?
            इसे हम विवेक संयम योग भी कह सकते हैं।  ऐसा अनेक बार होता है कि हमाने सामने दृश्यमान विषय के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती।  एक साथ दो विषय समान होने पर यह निर्णय लेना कठिन हो जाता है कि उनकी प्रकृति समान है या नहीं! अनेक अवसर पर किसी भी विषय, वस्तु तथा व्यक्ति की मूल प्रंकृत्ति, रूप तथा भाव को छिपाकर उसे हमारे सामने इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि वह हमें अनुकूल लगे जबकि वह भविष्य में उसके हमारे प्रतिकूल होने की आशंका होती है।
            इनसे बचने का एक ही उपाय है कि हमारे सामने जब कोई नया विषय, वस्तु या व्यक्ति आता है तो पहले उस पर बाह्य दृष्टि के साथ ही अंतदृष्टि भी लंबे क्षणों तक केंद्रित करें।  प्रतिक्रिया देने से पहले निरंतर हर क्षण संयम के साथ उस पर विचार करें। धीमे धीमे हमारा विवेक ज्ञान जाग्रत होता है  जिससे दृश्यमान विषय के बारे में वह ज्ञान स्वाभाविक रूप से  होने लगता है जो उसके पीछे छिपा रहता है। इस हर क्षण संयम रखने की प्रक्रिया को हम विवेक योग भी कह सकते हैं।     

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Sunday, September 28, 2014

संत कबीर दर्शन-माटी कहे कुम्हार से एक दिन रौंदूंगी तोहे(mati kahe kumhar se ek din raondung tohe-sant kabir darshan)



            हम दूसरों से व्यवहार करते समय इस बात का ध्यान बहुत ही कम रखते हैं कि हमारे मुख से निकले शब्दों या क्रियाओं का फल  एक दिन हमारे चक्षुओं केे सामने ही प्रकट होगा। यह संसार चक्र हैं इसे ं समय अपनी शक्ति के अनुसार घुमाता है।  राजा के अगर कर्म खोटे हैं तो एक दिन वह अधोेगति को प्राप्त होकर संकट भोगता है और रंक अगर सात्विक प्रकृत्ति का है तो एक दिन वह संसार में मायावी शिखर पर पहुंचता है। विनम्रता का सम्मान भले ही न हो पर अहंकारी का पतन अवश्य प्रकट होता है।  त्यागी कभी कुछ नहीं खोता तो भोगी सदैव संकट में रहता है।

संत कबीरदास कहते हैं कि
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माटी कहै कुम्हार से, क्या तू रौंदे मोहि।
एक दिन ऐसा होयगा, मैं रौंदूंगी तोहि।।
            हिन्दी में भावार्थ-जब कुम्हार मिट्टी को रौंदकर उनसे सामान बनाता है तब एक तरह से वह उससे कहती है कि आज तू मुझे रौंद रहा है एक दिन ऐसा आयेगा जब मैं तुझे रौंदूंगी।

            मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह विलासिता तथा व्यसनों की तरफ आकर्षित बहुत जल्दी होता है जबकि अध्यात्मिक साधना में उसे आलस्य आता है।  जिनको भोगों ने घेर लिया है उनके लिये अध्यात्मिक साधना एक निरर्थक कार्य होता। भोगी मनुष्य विषयों को सत्य समझकर उनमें लिप्त हो जाते हैं।   फल पर मोहित ऐसे लोग अपने कर्म के प्रकार को नहीं समझते और एक दिन ऐसा आता है जब अधिक मात्रा में  भोग साधन एकत्रित करने पर भी वह उनके संकट निवारण के काम नहीं आते हैं।
            इस संसार में दो ही विषय हैं एक अध्यात्मिक दूसरा भौतिक! हमारे अध्यात्मिक दर्शन में भी दिन के समय को चार भागों में बांटा गया है-धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष।  प्रातः धर्म, दोपहर अर्थ, सांय काम यानि मनोरंजन और रात्रि मोक्ष यानि निद्रा के लिये है।  कर्म तो सभी करते हैं पर योग तथा ज्ञान साधक समय के साथ ही चलते हैं। जिनको ज्ञान नहीं है उनके लिये दिन का एक ही भाग है और चाहे जब निद्रा में रहते हैं और चाहे जब कर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं। अच्छे बुरे काम की उंन्हें पहचान न होती है और न ही वह अहकारवश करना चाहते हैं। जिन लोगों को अपना जीवन शांति से बिताना है उन्हें समय और स्थिति के अनुसार अपना काम करना चाहिये।
          

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, September 20, 2014

संस्कार मस्तिष्क की स्मृतियों का ही एक भाग-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(sanskar masitishk ki smritiyon ka hi ek bhag-A Hindu hindi religion thought based on patanjali yog sichnce)




            आमतौर से सामान्य भाषा में स्मृति तथा संस्कार एकरूप नहीं होते।  स्मृतियों को पुराने विषय, व्यक्ति, दृश्य अथवा अनुभूतियों के स्मरण का भंडार माना जाता है जबकि संस्कार मस्तिष्क में स्थापित मानवीय व्यवहार के स्थापित सिद्धांतों के रूप में समझा जाता है। पतंजलि योग का अध्ययन करें तो लगता है कि संस्कार स्मृति का ही एक भाग है।  जीवन व्यवहार के सिद्धांत अंततः स्मृति समूह का ही वह भाग है जो मानव मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं।

पतंजलि  योग सूत्र  में कहा गया है
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जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानष्यानन्तर्य स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्।।

     हिन्दी में भावार्थ-पतंजलि योग सूत्र के अनुसार जाति, देश काल इन तीनों से संपर्क टूटने पर भी स्वाभाविक कर्म संस्कारों में बाधा नहीं आती क्योंकि स्मृति और संस्कारों का एक ही रूप होता है।

     हम इस श्लोक में योग के संस्कारिक रूप को समझ सकते हैं। जब मनुष्य बच्चा होता है तब उसके अपने घर परिवार, रिश्तेदारी, विद्यालय तथा पड़ौस के लोगों से स्वाभाविक संपर्क बनते हैं। वह उनसे संसार की अनेक बातें ऐसी सीखता है जो उसके लिये नयी होती हैं। वह अपने मन और बुद्धि के तत्वों में उन्हें स्वाभाविक रूप से इस तरह स्थापित करता है जीवन भर वह उसकी स्मृतियों में बनी जाती हैं। कहा भी जाता है कि बचपन में जो संस्कार मनुष्य में आ गये फिर उनसे पीछा नहीं छूटता और न छोड़ना चाहिए क्योंकि वह कष्टकर होता है।
      यही कारण है कि माता पिता तथा गुरुओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दें। संभव है बाल्यकाल में अनेक बच्चे उनकी शिक्षा पर ध्यान न दें पर कालांतर में जब वह उनकी स्थाई स्मृति बनती है तब वह उनका मार्ग प्रशस्त करती है। इसलिये बच्चों के लालन पालन में मां की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण मानी गयी है क्योंकि बाल्यकाल में वही अपने बच्चे के समक्ष सबसे अधिक रहती है और इसका परिणाम यह होता है कि कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जो अपनी मां को भूल सके।
      इसलिये हमारे अध्यात्मिक संदेशों में अच्छी संगत के साथ ही अच्छे वातावरण में भी निवास बनाने की बात कहीं जाती है। अक्सर लोग कहते हैं कि पास पड़ौस का प्रभाव मनुष्य पर नहीं पड़ता पर यह गलत है। अनेक बच्चे तो इसलिये ही बिगड़ जाते हैं क्योंकि उनके बच्चे आसपास के गलत वातावरण को अपने अंदर स्थापित कर लेते हैं।
      यही नहीं आज के अनेक माता पिता बाहर जाकर कार्य करते हैं और सोचते हैं कि उनका बच्चा उनकी तरह ही अच्छा निकलेगा तो यह भ्रम भी उनको नहीं पालना चाहिये क्योंकि किसी भी मनुष्य की प्रथम गुरु माता की कम संगत बच्चों को अनेक प्रकार के संस्कारों से वंचित कर देती है। ऐसे लोग सोचते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर ठीक हो जायेगा या हम उसे संभाल लेंगे तो यह भी भ्रामक है क्योंकि जो संस्कार कच्चे दिमाग में स्मृति के रूप में स्थापित करने का है वह अगर निकल गया तो फिर अपेक्षायें करना निरर्थक है। युवा होने पर दिमाग पक्का हो जाता है और सभी जानते हैं कि पक्की मिट्टी के खिलोने नहीं बन सकते-वह तो जैसे बन गये वैसे बन गये। दरअसल हम जिससे संस्कार कहते हैं वह प्रारम्भिक काल में स्थापित स्मृतियों का विस्तार ही हैं इसलिये अगर हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे बच्चे आगे चलकर वह काम करें जो हम स्वयं चाहते हैं तो उसकी शिक्षा पहले ही देना चाहिए। यह स्मृतियां इस तरह की होती हैं कि देश, काल तथा जाति से कम संपर्क रहने न बिल्कुल न होने पर भी बनी रहती हैं और मनुष्य अपने संस्कारों से भ्रष्ट नहीं होता है अगर किसी लोभवश वह अपना पथ छोड़ता भी है तो उसे भारी कष्ट उठाना पड़ता है और फिर अपने स्थान पर वापस आता है।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, September 12, 2014

भर्तृहरि नीति शतक-राहु बृहस्पति से बैर नहीं लेता(bhartrihari neeti shatak-rahju brihaspati se bair nahin leta)



            हा जाता है कि धनी लोगों की संघर्ष तथा पाचन शक्ति अत्यंत क्षीण होती है।  आज जब हम विश्व में भौतिक प्रगति का दावा कर रहे हैं तब यह बात हमारे विचार में नहीं आती कि मनुष्य दैहिक तथा मानसिक रूप से शक्तिहीन होता जा रहा है। खासतौर से युवा वर्ग में आत्मविश्वास की भारी कमी हो गयी है। उनको लगता है कि शारीरिक श्रम से अब अधिक धन नहीं कमाया जा सकता। इसलिये वह किसी व्यवसाय का स्वामी बनने की बजाय कहीं किसी नौकरियां ढूंढ रहे हैं।  जो छोटे व्यवसाय में लगे हैं उन्हें लगता है कि वह समाज में सम्मानजनक छवि वाले नहीं माने जाते हैं।  आधुनिक पूंजीतंत्र ने समूचे समाज का निंयत्रण चंद हाथों में सौंप दिया है जिसकी वजह से से धन, पद और बल संपन्न लोगों के द्वार पर याचकों की भीड़ बढ़ा दी है।  जिन्होंने भौतिक क्षेत्र का शिखर पा लिया उसमें मद न आये यह संभव नहीं है इसलिये उनसे समाज सेवा की अपेक्षा करना भारी अज्ञान का प्रमाण है।


भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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सन्तपन्येऽपि बृहस्पतिप्रभृतयः सम्भाविताः पञ्चषास्तान्प्रत्येष विशेष विक्रमरुची राहुर्न वैरायते।
द्वावेव प्रसते दिवाकर निशा प्रापोश्वरौ भास्करौ भ्रातः! पर्वणि पश्य दानवपतिः शीर्षावशेषाकृतिः।।

     हिन्दी में भावार्थ-आसमान में बृहस्पति समेत अनेक शक्तिशाली ग्रह हैं किन्तु पराक्रम में दिलचस्पी रखने वाला राहु उनसे कोई लड़ाई मोल नहीं लेता क्योंकि वह तो पूर्णिमा और अमावस्या के दिन अति देदीप्यमान सूर्य तथा चंद्र को ही ग्रसित करता है।
असन्तो नाभ्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः प्रियान्यारूया वतिर्मलिनमसुभंगेऽप्यसुकरं।
विपद्युच्चैः स्थेयं पदमनुविधेयं च महतां सतां केनोद्दिष्टं विषमसिधाराव्रतमिदम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-सदाशयी मनुष्यों के लिये कठोर असिधारा व्रत का आदेश किसने दिया? जिसमें दुष्टों से किसी प्रकार की प्रार्थना नहीं की जाती। न ही मित्रों से धन की याचना की जाती है। न्यायिक आचरण का पालन किया जाता है। मौत सामने आने पर भी उच्च विचारों की रक्षा की जाती है और महान पुरुषों के आचरण की ही अनुसरण किया जाता है।

     हर मनुष्य को अपने पराक्रम में ही यकीन करना चाहिए न कि अपने लक्ष्यों को दूसरों के सहारे छोड़कर आलस्य बैठना चाहिए। इतना ही नहीं मित्रता या प्रतिस्पर्धा हमेशा अपने से ताकतवर लोगों की करना चाहिये न कि अपने से छोटे लोगों पर अन्याय कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए।
      अनेक मनुष्य अपने आसपास के लोगों को देखकर अपने लिये तुच्छ लक्ष्य निर्धारित करते हैं। थोड़ा धन आ जाने पर अपने आपको धन्य समझते हुए उसका प्रदर्शन करते हैं। यह सब उनके अज्ञान का प्रमाण है। अगर स्थिति विपरीत हो जाये तो उनका आत्मविश्वास टूट जाता है और दूसरों के कहने पर अपना मार्ग छोड़ देते हैं। अनेक लोग तो कुमार्ग पर चलने लगते हैं। सच बात तो यह है कि हर मनुष्य को भगवान ने दो हाथ, दो पांव तथा दो आंखों के साथ विचारा करने के लिये बुद्धि भी दी है। अगर मनुष्य असिधारा व्रत का पालन करे-जिसमें दुष्टों ने प्रार्थना तथा मित्रों से धना की याचना न करने के साथ ही किसी भी स्थिति में अपने सिद्धांतों का पालन किया जाता है-तो समय आने पर अपने पराक्रम से वह सफलता प्राप्त करता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

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