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Friday, April 18, 2014

चालाकियों से धन कमाकर दान करना अमीरों की सामान्य प्रवृति -संत कबीर दास क्र दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(chalaki se dhan kamakar daan karna amiron ki samanya pruvirti-sant kabir darshan)



   हमारे देश भारत में जैसे जैसे आर्थिक विकास बढ़ता गया है वैसे ही लोगों में धार्मिक प्रवृत्ति के प्रति अधिक रुझान भी देखा जा रहा है।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कथित रूप से धर्म प्रचार करने वाले न केवल लोगों से चंदा और दान लेते हैं वरन् अपने ज्ञान सुनाने के लिये आधुनिक महंगे तथा अत्यंत तकनीकी साधनों का भरपूर उपयोग भी करते हैं।  सबसे बड़ा ज्ञानी वही है जिसके पास धन है। सबसे प्रभावशाली वह माना जाता है जिसके चरण कमल उच्च पद पर स्थित हैं।  सबसे शक्तिशाली वही है जो अपने बाहुबल का उपयोग कमजोर को दबाने के लिये करता है।  कभी कभी तो यह लगता है कि आधुनिक सभ्यता में शीर्ष पर पहुंचे लोग भौतिक रूप से तो जितने शक्तिशाली हो गये हैं उतने ही मानसिक रूप से कमजोर हुए हैं।  उनका पूरा श्रम, समय तथा चिंत्तन अपनी स्थिति बनाये रखने तक ही सिमट गया है।  यही कारण है कि सामाजिक रूप से बदलाव की बातें सभी करते हैं पर उनके शब्द महत्वहीन ही रहते हैं। यह शक्तिशीली शीर्ष पुरुष समाज के हित का दिखावा केवल इसलिये करते हैं ताकि उनके विरुद्ध लोगों में मन वैमनस्य का भाव बढ़ न जाये।

संत कबीर दास ने कहा है कि
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अहिरन की चोरी करै, करे सुई का का दान
ऊंचा चढि़ कर देखता, केतिक दूर विमान

      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में तमाम तरह के अपराध और चालाकियां कर धन कमाता है पर उसके अनुपात में नगण्य धन दान कर अपने मन में प्रसन्न होते हुए फिर आसमान की ओर दृष्टिपात करता है कि उसको स्वर्ग में ले जाने वाला विमान अभी कितनी दूरी पर रह गया है।

आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनै नहिं कान
सिर के केस उज्जल भये, अबहुं निपट अजान

      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं आंखों से देख नहीं पाता, कानों से शब्द दूर ही  रह जाते हैं और सिर के बाल  सफेद होने के बावजूद भी मनुष्य अज्ञानी रह जाता है  साथ ही माया के जाल में फंसा रहता है।

      हमारे देश आधुनिक समय में अंग्रेजों की सृजित अर्थ, राजकीय, शैक्षिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था पद्धति का अनुकरण कर रहा है उसके ही एक प्रमुख विद्वान का मानना है कि  कोई भी धनी नहीं बन सकता है-ऐसा मानने वाले बहुत हैं तो हम स्वयं देख भी सकते हैं। धनी होने के बाद समाज में प्रतिष्ठा पाने के मोह से लोग दान करते हैं। कहीं मंदिर में घंटा चढ़ाकर, पंखे या कूलर लगवाकर या बैंच बनवाकर उस पर अपना नाम खुदवाते हैं। एक तीर से दो शिकार-दान भी हो गया और नाम भी हो गया। फिर मान लेते हैं कि उनको स्वर्ग का टिकट मिल गया। यह दान कोई सामान्य वर्ग के व्यक्ति नहीं कर पाते बल्कि जिनके पास तमाम तरह के छल कपट और चालाकियों से अर्जित माया का भंडार है वही करते हैं। उन्होंने इतना धन कमाया होता है कि उसकी गिनती वह स्वयं नहीं कर पाते। अगर वह इस तरह अपने नाम प्रचारित करते हुए दान न करें तो समाज में उनका कोई नाम भी न पहचाने। कई धनपतियों ने अपने मंदिरों के नाम पर ट्रस्ट बनाये हैं। वह मंदिर उनकी निजी संपत्ति होते हैं और वहां कोई इस दावे के साथ प्रविष्ट नहीं हो सकता कि वह सार्वजनिक मंदिर है। इस तरह उनके और कुल का नाम भी दानियों में शुमार हो जाता है और जेब से भी पैसा नहीं जाता। वहां भक्तों का चढ़ावा आता है सो अलग। ऐसे लोग हमेशा इस भ्रम में जीते हैं कि उनको स्वर्ग मिल जायेगा।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Friday, April 11, 2014

श्रीगुरुवाणी के आधार पर चिंत्तन लेख-दहेज परपरा देश और समाज के अनुकूल नहीं (a hindi thought based on shriguruwani -dahej pratha desh aur samaj ke anukul nahin)



     हमारे देश में दहेज परंपरा अब एक विकृत रूप ले चुकी है| सच बात यह है हमारे यहं लड़की के जन्म पर लोग इतने खुश नहीं होते जितना लड़के के समय होते हैं| इसकी मुख्य वजह यह है कि लड़की का बाप होने पर दूसरे के सामने झुकना पड़ता है जबकि लड़के कि वजह से दूसरे अपने सामने झुकते हैं| हमारे सामाजिक तथा अध्यात्मिक चिन्त्तक समाज का अनेक वर्षों से सचेत कर रहे हैं पर कोई सुधार नहीं हो रहा है| पहले तो कहा जाता था कि समाज अशिक्षित है पर अब तो यह देखा जा रहा है कि अधिक शिक्षित होने पर दहेज कि रकम अधिक मिलती है|
गुरुवाणी में कहा गया है
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होर मनमुख दाज जि रखि दिखलाहि,सु कूड़ि अहंकार कच पाजो
      हिंदी में भावार्थ-श्री गुरू ग्रन्थ साहिब के अनुसार लड़की के विवाह में  ऐसा दहेज दिया जाना चाहिए जिससे मन का सुख मिले और जो सभी को दिखलाया जा सके। ऐसा दहेज देने से क्या लाभ जिससे अहंकार और आडम्बर ही दिखाई दे।
हरि प्रभ मेरे बाबुला, हरि देवहु दान में दाजो।

           
हिन्दी में भावार्थ-श्री गुरुग्रंथ साहिब में दहेज प्रथा का आलोचना करते हुए कहा गया है कि वह पुत्रियां प्रशंसनीय हैं जो दहेज में अपने पिता से हरि के नाम का दान मांगती हैं।
     दहेज हमारे समाज की सबसे बड़ी बुराई है। चाहे कोई भी समाज हो वह इस प्रथा से मुक्त नहीं है। अक्सर हम दावा करते हैं कि हमारे यहां सभी धर्मों का सम्मान होता है और हमारे देश के लोगों का यह गुण है कि वह विचारधारा को अपने यहां समाहित कर लेते हैं। इस बात पर केवल इसलिये ही यकीन किया जाता है क्योंकि यह लड़की वालों से दहेज वसूलने की प्रथा उन धर्म के लोगों में भी बनी रहती है जो विदेश में निर्मित हुए और दहेज लेने देने की बात उनकी रीति का हिस्सा नहीं है। कहने का आशय यह है कि दहेज लेने और देने को हम यह मानते हैं कि यह ऐसे संस्कार हैं जो हमारी पहचान हैं  मिटने नहीं चाहिए।  कोई भी धर्म या  समाज हो  कथित रूप से इसी पर इतराता है।
      इस प्रथा के दुष्परिणामों पर बहुत कम लोग विचार करते हैं। इतना ही नहीं आधुनिक अर्थशास्त्र की भी इस पर नज़र नहीं है क्योंकि यह दहेज प्रथा हमारे यहां भ्रष्टाचार और बेईमानी का कारण है और इस तथ्य पर कोई भी नहीं देख पाता। अधिकतर लोग अपनी बेटियों की शादी अच्छे घर में करने के लिये ढेर सारा दहेज देते हैं इसलिये उसके संग्रह की चिंता उनको नैतिकता और ईमानदारी के पथ से विचलित कर देती है। केवल दहेज देने की चिंता ही नहीं लेने की चिंता में भी आदमी अपने घर पर धन संग्रह करता है ताकि उसकी धन संपदा देखकर बेटे की शादी में अच्छा दहेज मिले। यह दहेज प्रथा हमारी अध्यात्मिक विरासत की सबसे बड़ी शत्रु हैं और इससे बचना चाहिये। यह अलग बात है कि अध्यात्मिक, धर्म और समाज सेवा के शिखर पुरुष ही अपने बेटे बेटियों की शादी कर समाज को चिढ़ाते हैं। सच बात तो यह है कि यह पर्थ हमारे समाज के अस्तित्व पर संकर खड़ा किये हुए है और अगर यह ख़त्म नहीं हुए तो एक दिन यह समाज भी कह्तं हो जाएगा।
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Monday, April 07, 2014

चाणक्य नीति-आदमी अपने से जुड़े विषयों से प्रभावित होता है( chankya neeti-aadmi apne se jude vishayon se prabhaavit hain hai)



            विश्व में अनेक प्रकार के आदर्शवाद प्रचलित हैं जिसमें मानव समाज को एक व्यवस्थित ढंग के संचालन के लिये प्रणालियां बताई जाती है। सबसे मजे बी बात यह है कि हर मनुष्य को देवता बनाने का प्रयास अनेक विचाराधाराओं के ठेकेदार है। जबकि सच्चाई यह है कि एक बार मनुष्य में बाल्यकाल में जो संस्कार आ गये फिर उनसे वह मुक्ति नहीं पा सकता। वह अपने स्वभाव के अनुसार ही संगत का चुनाव करता है तथा वैसे ही उसका खानपान भी हो जाता है। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार यह माना जाता है कि मानव अपने स्वभाव के अनुसार ही विषयों का चयन करता है और कालांतर में वही विषय उसके मस्तिष्क तथा निजी व्यवहार को प्रभावित करता हैं।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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दीपो भक्षयते थ्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते।
यदन्नं भक्षयतेन्नित्यं जायते तादृशी प्रजा।।

     हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह दीपक अंधेरे को खाकर काजल को उत्पन्न करता है वैसे ही इंसान जिस तरह का अन्न खाता है वैसे उसके विचार उत्पन्न होते हैं और उसके इर्दगिर्द लोग भी वैसे ही आते हैं। उनकी संतान भी वैसी ही होती है।
अधमा धनमिच्छन्ति धनं माने च मध्यमा।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।

     हिंदी में भावार्थ-अधम केवल धन की कामना करता है जबकि मध्यम पुरुष धन और मान दोनों की इच्छा करता है किन्तु उत्तम पुरुष केवल मान की कामना करते हुए अपन कर्म करता है। उसके लिये मान ही धन  है।

     भारतीय आध्यात्मिक दर्शन के सिद्धांत  एक तरह का दर्पण होते  है जिसमें हर इंसान अपने चरित्र का चेहरा देख सकता है। केवल धन की कामना पूरी करने के लिये कोई भी कार्य करने के लिये तैयार होना निम्नकोटि होने का प्रमाण है। कहने को तो सभी कहते हैं कि यह पेट के लिये कर रहे हैं पर जिनके पास वास्तव में धन और अन्न का अभाव है वह आजकल किसी अपराध में नहीं लिप्त दिखते जितने धन धान्य से संपन्न वर्ग के लोग बुरे कामों में व्यस्त हैं। धन का आकर्षण लोगों को लिये इतना है कि वह उसके लिये अपना धर्म बदलने और बेचने के लिये तैयार हो जाते हैं। उनके लिये मान और अपमान का अंतर नहीं रह जाता। आजकल शिक्षित और सभ्रांत वर्ग के लोगों ने यह मान्यता पाल ली है कि धन से सम्मान होता है और वह स्वयं भी निर्धनों से घृणा करते हैं। सच बात तो यह है कि अधम प्रकृति के लोग धन प्राप्त कर उच्चकोटि का दिखने का प्रयास करते हैं।
    समाज में अनैतिक धनार्जन की बढ़ती प्रवृति ने नैतिक ढांचे को ध्वस्त कर दिया है और जिस वर्ग के लोगों पर समाज का मार्गदर्शन करने का दायित्व है वही कदाचार और ठगी में लगे हुए हैं। परिणामतः उनके इर्दगिर्द ऐसे ही लोगों का समूह एकत्रित हो जाता है और उनकी संतानें भी अब ऐसे काम करने लगी हैं जो पहले नहीं सुने जाते थे। नयी पीढ़ी की बौद्धिक और चिंतन क्षमता का हृास हो गया है और कहीं पुत्र तो कहीं पुत्री ही माता पिता पर दैहिक आक्रमण के लिये आरोपित हो जाती है। नित प्रतिदिन समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर ऐसे समाचार आते हैं जिसमें संतान ही उस माता पिता को तबाह कर देती है जिसकों उन्होंने जन्म दिया है।
      ऐसे में ज्ञानी लोगों को यह ध्यान रखना चाहिये कि जो धन वह कमा रहे हैं उनका स्त्रोत पवित्र हो। अल्प धन होने से कोई समस्या नहीं है क्योंकि चरित्र से सम्मान सभी जगह होता है पर बेईमानी और ठगी से कमाया गया धन अंततः स्वयं के लिये कष्टदायी होता है।
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Saturday, April 05, 2014

भर्तृहरि नीति शतक-रोजी रोटी के चक्कर में ज्ञान लुप्त हो जाता है(bhartrihari neeti shatak-roji roti ke chakkar mein gyan lupt ho jaata hai)




      आधुनिक समय में जितना आर्थिक तथा विकास ने अपना बृहद स्वरूप दिखाया है वहीं नैतिक तथा चारित्रिक रूप से विनाश भी उससे कम नहीं हुआ  है। धन और भौतिक सुविधाओं की अतिउपलब्धता ने आदमी को न केवल शरीर बल्कि मस्तिष्क से भी आलसी बना दिया है और कभी कभी तो ऐसे लगता है कि जैसी मानव सभ्यता विवेकशून्य हो रही है। मनुष्य का मन उसे भटकाता है। अगर आदमी महल में है तो मन उसे झौंपड़ी की तरफ आकर्षित करता है और वह झौंपड़ी में है तो महल पाने का ख्वाब देखता है। कहने का तात्पर्य है कि मन असीमित विचारों वाला है और वही मनुष्य को इधर उधर घुमाता और भटकाता भी है। मगर आदमी ने अपने आपको सीमाओं में कैद कर लिया है। न वह केवल वैचारिक रूप से बल्कि शारीरिक रूप से भी कम भी मेहनत करता हैं।  सच बात तो यह है कि मनुष्य की जिन गुणों के कारण अन्य जीवों से भिन्नता दिखती थी वह अब एक तरह से तुप्त हो रहे हैं| एक तरह से मनुष्य पशु और पक्षियों जैसे व्यवहार कर रह है जो कि जीवन में भोग तक ही अपने दैहिक सक्रियता दिखाते हैं|


भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमश्यनं धात्रा मरुत्कल्पितं
व्यालानां पशवस्तृणांकुरभुजस्तुष्टाः स्थलीशायिनः
संसारार्णवलंधनक्षमधियां वृत्तिः कृता सां नृणां
तामन्वेषयतां प्रर्याति सततं सर्व समाप्ति गुणाः

            हिंदी में भावार्थ- परमात्मा ने सांपों के भोजन के रूप में हवा को बनाया जिसे प्राप्त करने में उनको   बगैर हिंसा और विशेष प्रयास किए बिना प्राप्त हो जाती है। पशु के भोजन के लिए घास का सृजन किया और सोने के लिए धरती को बिस्तर बना दिया परंतु जो मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक से मोक्ष प्राप्त कर सकता है उसकी रोजीरोटी ऐसी बनायी जिसकी खोज में उसके सारे गुण व्यर्थ चले जाते हैं।

                  आधुनिक  काल में इंसान बस धन,दौलत और प्रतिष्ठा के संचय में ही लिप्त हो गया है। उसका मन उसे कहीं निष्काम कर्म या निष्प्रयोजन दया के लिये प्रेरित भी करे तो वह तैयांर नहीं होत्ता  क्योंकि उसक मस्तिष्क की नस नारियाँ  अब केवल सीमित दायरे में ही कार्य करती हैं। ऐसे में लोगों का मानसिक तनाव बढ़ रहा है पर जिन लोगों को ज्ञान है वह संतोषी सदा सुखी की नीति पर चलते हुए कुछ ऐसे काम भी करते हैं जिनसे मन को प्रसन्नता हो। संचय करने वालों की हालत यह है कि उन्होंने इतना कमा लिया है कि उनकी सात पीढि़यां भी बैठकर खायें पर वह अपने जीवन में धनार्जन करने के अलावा उन्होंने कुछ सीखा ही नहीं है ऐसे में उनका मन उन्हें इतना भटकाता है कि उनका पूरा जीवन व्यर्थ जाता है। इस तरह उनके जो स्वाभाविक गुण होते हैं वह व्यर्थ हो जाते हैं। न वह अपने जीवन में भगवान की भक्ति कर पाते हैं न ही उनको कोई ज्ञान प्राप्त होता है। अध्ययन,चिंतन,श्रवण और मनन के जो गुण उनमें रहते हैं वह कभी उनका उपयोग नहीं कर पाते|
      जिन लोगों को लगता है कि जीवन को केवल भोग तक रखना ठीक नहीं हैं उन्हें अपना प्रात: का समय योग साधना तथा भगवन स्मरण में लगाना चाहिए|

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Wednesday, April 02, 2014

किसी की भी चाटुकारिता और चमचागिरी करना व्यर्थ-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(kisi ki bhi chatukarita aur chamachagiri karna vyarth-a hindu religion thought on bhartirihari neeti shatak)



      दूसरों से प्रशंसा पाने की  महत्वाकांक्षा मनुष्य को हास्यास्पद स्थितियों में पहुंचा देती है।  चाटुकारिता और चमचागिरी जैसे शब्द हमारे समाज में प्रचलित हैं जो इस बात के द्योतक हैं कि हमारे बीच ऐसे लोग हैं जो अनावश्यक रूप से अपने स्वामी, अधिकारी अथवा उस व्यक्ति को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं जिससे उनको थोड़े भी लाभ की आशा होती है।  स्वयं को श्रेष्ठ, वफादार, ईमानदार तथा कर्तव्यपरायण प्रमाणित करने के लिये अनेक लोग दूसरे की निंदा या शिकायत करते हैं।  जिन लोगों को अपने स्वामी या अधिकारी को प्रसन्न करना होता है वह उनके सामने हमेशा ही अपने ही सहयोगियों को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं।  उनको यह  लगता है कि ऐसा कर वह अपने स्वामी या अधिकारी का विश्वास जीत लेंगे। दरअसल इस तरह की नीति उन लोगों की होती है जो अपने ही कर्म की शुद्धता के प्रति सशंकित  होते हैं। उनकी नीयत में ही खोट होता है आर तब वह अपने ही साथी की छवि खराब कर अपनी श्रेष्ठता का प्रचार करते हैं।
      हमारे यहां आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा पद्धति, विदेशी राजकीय कार्यप्रणाली, पाश्चात्य आर्थिक तथा सामाजिक नीतियां तथा संस्कृति अपनाये जाने के बाद समाज में चाटुकारिता तथा चमचागिरी करने  की प्रवृत्ति बढ़ी है। इस पाश्चात्य संस्कृति का एक ही सिद्धांत हैं कि सामंत, स्वामी और साहब कभी गलत नहीं होते-यानि जिसके पास धन का बाहुल्य, उच्च पद और प्रतिष्ठा है उसे तो उसकी योग्यता के अभाव में भी सम्मानीय मानना चाहिये। आर्थिक उदारीकरण के चलते राजकीय क्षेत्र की बजाय निजी क्षेत्र में रोजगार या नौकरियां के अवसर बढ़े है जिस कारण समाज में त्रिवर्गीय समाज-उच्च, मध्यम और निम्न-की बजाय द्विवर्गीय समाज-साहब और गुलाम-में बदल रहा है। समाज में आर्थिक और सामजिक रूप से गुणात्मक अंतर स्पष्ट होने लगा है जिससे छोटे लोगों को अपने अस्तित्व बचाने के लिये कथित बड़े लोगों की जीहुजूरी करनी पड़ती है।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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परेषां चेतांसि प्रतिदिवसमाराध्य बहुधा प्रसादं किं नेतुं विशसि हृदय क्लेशकलितम्।
प्रसन्ने त्वथ्यन्तः स्वयंमुदिरचिन्तामणिगणो विविक्तः सङ्कल्पः किमभिलषितं पुष्यति न ते।।
     हिन्दी में भावार्थ-हे मन! तू प्रतिदिन दूसरों के प्रसन्न करने का प्रयास क्यों करता है? अपने अंदर ही क्यों नहीं झांकता? जब तू अंतर्मन में झांकेगा तब सभी प्रकार के इच्छित फल देने वाले परमात्मा तेरे हृदय में प्रकट होगा तो क्या वह तेरी इच्छायें पूर्ति नहीं करेगा?

      एक तो सामान्य रूप से ही किसी को प्रसन्न करना वैसे  कठिन है और उस पर आजकल के सामंत, स्वामी और साहब का तो कहना ही क्या जो अपनी उपलिब्धयों के मद में लिप्त रहते हैं। कथित उदारीकरण ने मध्यम वर्ग को करीब करीब ध्वस्त कर दिया है ऐसे में उच्च वर्ग के लोगों को लगता है कि निम्म आय वर्ग वाला आदमी उनके सामने मानव रूप पशु ही है। उन पर अपने धन, पद और प्रतिष्ठा का अहंकार इतना रहता है कि अपनी आलोचना तो वह सहन ही नहीं कर सकते।  उनसे हित की कामना रखने वाला कोई व्यक्ति उनकी आलोचना कर जोखिम भी नहीं उठाता पर जिनको कोई उनसे अपेक्षा नहीं है वह उनकी छवि पर प्रतिकूल टिप्पणियां करने से बाज भी नहीं आते।  देखा जाये तो खरी या स्पष्ट बात कहने वाले लोगों की छवि अच्छी होने की बजाय समाज खराब ही मानता है।  स्पष्टवादी को अहंकारी तथा अपना ही शत्रु घोषित कर दिया जाता है।
      भारतीय अध्यात्म दर्शन के अनुसार सभी का दाता भगवान ही हैं उसने पेट बाद में दिया पहले ही अन्न के दानों पर नाम लिख दिया। इसलिये कभी भी किसी की चाटुकारिता अथवा चमचागिरी नहीं करना चाहिये।  यहां कोई भी मनुष्य असाधारण, उच्च अथवा निम्म नहीं है।  यह अलग बात है कि जो लोग हमसे उच्च स्थान होने पर हमसे परे हैं हमें देवता लगते हैं पर उनमें भी सामान्य मानवीय कमजोरियां होती हैं।  यह सत्य जानकर सभी से सामान्य और सम्माजनक व्यवहार करना चाहिये।

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Friday, March 28, 2014

दंड प्रणाली के नरम होने पर समाज अधम हो जाता है-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन संदेश(dand pranali ke naram hone par samaj adham ho jaata hai-manu smriti ka aadhar par chinttan lekh)



      हमारे यहां लोकसभा चुनाव 2014  की चुनाव प्रक्रिया चल रही है। मनुष्य समाज के लिये एक राज्य व्यवस्था का होना आवश्यक है और इस समय पूरे विश्व में राजतंत्र की जगह लोकतांित्रक प्रणाली अपनायी गयी जिसमेें राज्य व्यवस्था जनता से निर्वाचित प्रतिनिधि देखते हैं।  यह राज्य व्यवस्था उन अधिकारियों के हाथ में होती है जो जनता से सीधी जुड़े नहीं होते पर जनप्रतिनिधियों मेें राज्य प्रबंधन के ज्ञान के अभाव उन्हें अपना मुख बना लेते हैं। सारे काम अधिकारी करते हैं और उनके लिखे शब्दों को जनप्रतिनिधि अपना स्वर देते हैं। जनप्रतिनिधियों के पास प्रत्यक्ष अधिकार न होने से राज्य व्यवस्थाओं में अनेक प्रकार के विरोधाभास उत्पन्न होते देखे गये हैं।  जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हैं पर उनके पास कार्यप्रबंध का कोई प्रत्यक्ष अधिकार नहीं होता जिसे उन्हें अपने मातहत अधिकारियों पर निर्भर होना पड़ता है जो उन्हें चाहे जैसा समझाते हैं उनको मानना पड़ता है। फिर हमारे देश में अंग्रेजी राज्य व्यवस्था का ही अनुकरण हो रहा है जिसमें कागजी कार्यवाही जरूरत से अधिक होती है। यह प्रणाली लंबी तथा उबाऊ होती है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि
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अद्यात्काककः पुरीडार्श श्वा च लिह्याद्धविस्तथाः।
स्वाम्यं च न स्वात्कस्मिश्चित्प्रवर्तेतधरोत्तरम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-यदि राजा अपराधियों को दंड नहींदेगा तो  कौआ पुरोडाश और श्वान हवि खायेगा। कोई किसी को स्वामी नहीं मानेगा तथा समाज उत्तम से मध्यम और उसके बाद अधम बन जायेगा।
यदि न प्रणवेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्श्वतन्द्रितः।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः।।
     हिन्दी में भावार्थ-यदि अपराधियों को सजा देने में राजा सदैव सावधानी से काम नहीं लेता तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं जैसे बड़ी मछली छोटी को खा जाती है।

      सबसे बड़ी समस्या अपराधियों को दंड देने को लेकर खड़ी होती है।  आधुनिक सभ्यता के  नाम पर अपराधियों को सरल दंड दिये जाने लगे हैं तो न्यायिक प्रक्रिया को लेकर मानवाधिकार संगठन भी कम मखौलबाजी नहीं करते। यह मानवाधिकार संगठन आमतौर से ऐसे अपराधियों का प्रचार करते दिखते हैं जिन्होंने समाज के प्रति जघन्य अपराध कर अधिक बदनामी पायी होती है।  कभी अप्रचारित अपराधी का पक्ष यह मानवाधिकार संगठन कभी करते दिखते नहीं है। इतना ही नहीं भारत में तो सीमावर्ती प्रदेशों में जो आतंकवादी संगठन कार्यरत हैं उनके लिये इन मानवाधिकार संगठनों में अत्यंत सहानुभूति पाई जाती है पर देश के  बिल्कुल मध्य भाग में जो निर्दोष लोग परेशान हैं उनके लिये कभी इन लोगों ने आंदोलन नहीं किया।
      इधर यह भी देखा जा रहा है कि अपराधियों में दंड की बात तो दूर प्रतिकूल कार्यवाही तक का भय नहीं रहा जिस कारण देश में अपराध बढ़ते जा रहे हैं। हमारे देश में जब कोई अपराध बृहद रूप में प्रकट होता है तो उसके लिये अलग से कानून बनाने की मांग होती है जबकि समस्या देश में उचित ढंग से मौजूदा कानून लागू करने की है। जब देश में दंड व्यवस्था शक्तिशाली नहीं होगी तब तक कोई सुखद कल्पना करना ही व्यर्थ है।

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Monday, March 24, 2014

बड़े लोगों को छोटों की प्रीति रास नही आती-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(bade logon ko chhoton ki preeti ras nahin aatee-rahim darshan par aadharit chinttan lekh)



      विश्व में राज्य से मुक्त अर्थव्यवस्था ने समाज में अनेक प्रकार के विरोधाभास पैदा किये हैं। कृषि, लघु उद्योग तथा व्यापार में लगे लोगों की संख्या कम होती जा रही है। अधिकतर लोग नौकरियों के लिये कंपनियों की तरफ दौड़े जा रहे हैं। एक तरह से मध्यम वर्ग का दायरा सिमट रहा है। समाज में अधिक अमीरों की संख्या नगण्य मात्रा  जबकि गरीबों की संख्या गुणात्मक रूप से बढ़ रही है।  इन दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाला मध्यम वर्ग जहां संख्यात्मक दृष्टि से सिमटा है वहीं उसका आत्मविश्वास भी कम हुआ है।  वह गरीब कहलाना नहीं चाहता और अमीर बन नहीं पाता।  इतना ही नहीं अपने अस्तित्व के लिय संघर्ष कर रहे लोगों से यह अपेक्षा भी नहीं की जा सकती कि वह समाज में सामंजस्य का वातावरण बनाये।
      भौतिकवाद के चक्कर मे फंसा समाज हार्दिक प्रेम, निष्प्रयोजन मित्रता तथा आदर्श व्यवहार के भाव से परे होता जा रहा है।  देखा जाये तो हमारे देश में जिस तरह धनिकों का भंडार बढ़ने के साथ ही  ही समाज में व्यसन, अपराध तथा शोषण की प्रवृत्ति भी तेजी बढ़ती  जा रही है।  कथित आर्थिक विकास ने नैतिकता का जहां विध्वंस करने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान की धारा को अवरुद्ध कर दिया है। सबसे बड़ी बात तो यह कि विभिन्न समाजों के बीच ही नहीं बल्कि उनक अंदर ही सद्भाव काम कर दिया है। लोग औपचारिक रूप से आपसी संपर्क तो रखते हैं पर हार्दिक प्रेम का नितांत अभाव है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
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रहिमन कीन्ही प्रीति, साहब को भावै नहीं,
जिनके अनगिनत भीत, हमैं, गरीबन को गनै।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-धनियों के अनेक मित्र बन जाते हैं। उनको गरीब लोगों से मित्रता करना अच्छा नहीं लगता। बड़े लोगों को छोटे लोगों की प्रीति अच्छी नहीं लगती।
      कंपनी नाम की व्यवस्था ने साहब, सचिव और सहायक का अंतर इस तरह स्थापित किया है कि लगता है कि यह कोई आधुनिक विभाजन है। विभिन्न पदों के लिये होने वाले प्रशिक्षण में यह बता दिया जाता है कि अपने से निचले स्तर के व्यक्ति के साथ समान सबंध स्थापित न करें वरना आपको अपने काम में ही परेशानी उठानी पड़ेगी।  धनिका परिवारों में भी निम्न वर्ग के लोगों को अपना अनुचर मानकर व्यवहार करने के संस्कार स्वाभाविक रूप से ही मिलते हैं।  अमीरों के अनुचर बनने वाले मध्यम और निम्न वर्ग के युवक युवतियों को यह आभास नहीं होता कि उन्हें उच्च वर्ग से हार्दिक प्रेम की आशा नहंी करनी चाहिये।  जीवन का यथार्थ यही है कि हर बड़ी मछली छोटी को ही खा जाती है।


संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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