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Tuesday, June 30, 2015

समुद्र मंथन के समय अमृत पाये बिना देवता संतुष्ट नहीं हुए-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(samudra manthan ke samay amrit paye bina devta santusht nahin hue-A Hindu hindi thought ariticle based on bhartrihari neeti shatak)

                              मनुष्य मन का भटकाव उसे कभी लक्ष्य तक नहीं पहुंचने देता। जीवन संघर्ष में अनेक अच्छे और बुरे अवसर आते हैं पर ज्ञानी मनुष्य अपने लक्ष्य पथ से अलग नहीं होता।  कहा जाता है कि इस संसार में समय और प्रकृति बलवान है और उनके नियमों के अनुसार ही जीवन चक्र चलता है।  मनुष्य में उतावलपन अधिक रहता है इसलिये वह अपने परिश्रम का परिणाम जल्दी प्राप्त कर लेना चाहता है। ऐसा न होने पर वह निराश और हताश होकर अपने लक्ष्य से अलग हो जाता है या फिर अपना पथ बदल देता है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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रत्नेर्महार्हस्तुतुंषुर्न देवा न भेजिरेभीमविषेण भीतिम्।
सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीरा।
                              हिन्दी में भावार्थ-समुद्र मंथन के समय अनमोल निकलने पर भी देवता प्रसन्न नहीं हुए। न विष निकलने पर विचलित हुए। वह तब तक नहीं रुके जब तक अमृत निकलकर उनके हाथ नहीं आया। धीर पुरुष अपना लक्ष्य प्राप्त किये बिना कभी अपना काम बीच में नहीं छोड़ते।
          वर्तमान काल में शीघ्र तथा संक्षिप्त मार्ग से सफलता पाने का विचार करने में ही लोग अपना समय गंवा देते हैं।  किसी काम में दो दिन लगते हों पर लोग उसे दो घंटे में करने की सोचते हुए पांच दिन गंवा देते हैं।  प्रकृत्ति का सिद्धांत कहता है कि हर कार्य अपने समय के अनुसार ही होता है।  मनुष्य को बस अपने कर्म करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये। 
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Thursday, June 25, 2015

देह का स्वास्थ्य आकर्षण बल और संगठन बाह्य संपदा की तरह होता है-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(fitnes, glamor, power and organigesion is outer assets in life-A Hindu hindu thought article based on patanjali yoga sahitya)

                              हमारा बाह्य रूप सारा संसार देखता है इसलिये उसे आकर्षक बनाये रखने का प्रयास भी करना चाहिये। मनुष्य के पास ढेर  सारा धन हो पर उसका रूप और आकृति प्रभावी न हो तो लोग उसकी तरफ आकर्षित नहीं होते।  बल न हो तो मनुष्य दूसरे की क्या अपनी ही रक्षा नहीं कर पाता। अधिकतर लोग धन संपदा के फेर में यह सोचकर पड़े रहते हैं कि भौतिक वैभव उन्हें प्रभावी बना देगा।  जिनके पास धन आ जाता है वह तो यही मानते हैं कि सर्वशक्तिमान की उन पर सारी कृपा है इसलिये पूरा समाज उसका सम्मान करेगा।  इसी सोच का परिणाम यह है कि हमारे देश में विकास के बढ़ते स्तर के साथ ही स्वास्थ्य, नैतिकता और बौद्धिक क्षमता में पतन देखा जा रहा है।  लोग छोटी बात पर भारी उत्तेजना में आकर वर्जित काम कर बैठते हैं।  संपत्ति के संग्रह हो जाने पर धनी लोग समाज से स्वयं को प्रथक मानते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में सामाजिक संगठन कमजोर हो गये हैं। इसलिये समाज के हर वर्ग पर जीवन का संकट मुंह बायें खड़ा दिखता है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि----------------रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्यत्।।                              हिन्दी में भावार्थ-रूप, देह की  आकृति, बल और वज्र जैसा संगठन कार्य संपत्ति है।
                              श्रीमद्भागवत् गीता में जिस कर्मयोग की प्रेरणा दी गयी है वह आध्यात्मिक रूप से दृढ़ होने के बाद सांसरिक विषयों में सक्रिय रहने की कला भी सिखाती है।  हमारे यहां कुछ लोग योग को केवल अध्यात्मिक तो कुछ दैहिक साधना मानते हैं पर इसके अभ्यास से साधक आंतरिक तथा बाह्य दोनों ही दृष्टि से मजबूत होता है। मनुष्य भले ही योग साधना एकांत में करे पर अपनी दिनचर्या में बाह्य तत्वों का भी अध्ययन करते रहना चाहिये। कर्म के बिना किसी का जीवन निर्वाह नहीं हो सकता इसलिये उसे अपने साथ सहयोगी या संगठन रखना ही होता है। जहां उसे अपनी देह का स्वास्थ्य, आकर्षण तथा बल बनाये रखने का प्रयास के साथ ही वअपने साथ जीवन क्षेत्र में सक्रिय सहयोगियों को संगठित करना चाहिये। देह का स्वास्थ्य, आकर्षण तथा संगठन भौतिक संपदा की तरह होता है, यह मानना चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Sunday, June 21, 2015

योग को दिनचर्या का हिस्सा बनायें-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख(yog ko dincharya ka hissa banayeh(hindu hindi article on 21 june international yoga day, world yoga day,yoga divas,yoga divas)

                                    21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर सभी देशों में आयोजनों की तैयारियां चल रही हैं।  अनेक प्रकार की चर्चायें चल रही हैं पर उनका संबंध इसके दैहिक लाभ से ही है।  इसके अध्यात्मिक शक्ति मिलने की बात बहुत कम लोग कर रहे हैं। योग साधक भी अनेक प्रकार हैं। एक तो वह जो कभी कभार ही करते हैं। दूसरे वह जो अक्सर करते हैं। ऐसे योग साधकों की संख्या नगण्य है जो इसे नियमित करते हैं। जिन लोगों के लिये यह एक आदत या नशा है पर मौसम की परवाह नहीं करते है। हम जैसे योग साधकों के लिये तो यह सुबह का नशा है। प्रातः अगर शुद्ध वायु का सेवन न करें तो पूरा दिन ऐसा लगता है जैसे कि नींद से उठे ही नहीं।
                                    हमारी दृष्टि से तो योग साधना के अभ्यास से शरीर का तेल निकल जाता है-डरने की बात नहीं जब हम पूर्ण साधना कर लेते हैं तब  शरीर में मक्खन बनने की अनुभूति भी आती है।  गर्मी में तो हवा चलती है इसलिये थोड़ी राहत मिलती है पर जब वर्षा ऋतु में  बादल मुंह फेरे रहते हैं तब तो आसनों के समय पसीना इस तरह निकलता है कि चिढ़ भी आने लगती है। शरीर में गर्मी लाने वाले आसनों से उस समय परहेज की जा सकती है पर तब यह आदत छूटने की आशंका से यह विचार छोड़ना पड़ता है।
                                    इस समय चहूं ओर योग साधना की बात हो रही है। अंग्रेजी महीना जून और भारतीय माह आषाढ़ एक साथ चल रहे हैं।  जब हम योग साधना करते हैं तब 21 जून विश्व योग दिवस वाली बात तो भूल ही जाते हैं। कभी कभी हवा राहत देती है तो कभी शरीर में इतनी उष्णता लगती है कि सोचते हैं जितना कर लिया ठीक है।  फिर हवा चलती है तो धीरे धीरे अपनी साधना भी बढ़ती है।  अंत में जब मंत्र जाप करते हैं तो मन में यह उत्साह पैदा होता है कि चलो हमने किसी तरह अपनी साधना तो पूरी कर ली। स्नान और पूजा से निवृत होकर जब चाय पीते समय टीवी पर कहीं योग का कार्यक्रम देखते हैं तभी ध्यान आता है कि हम भी यही कर आ रहे हैं।  इन कार्यक्रमों में योग स्थान देखकर लगता है कि काश! हम भी वहीं जाकर साधना करें। अब उन स्थानों तक पहुंचने के लिये रेल या बस यात्रा तो करनी ही होगी-तब यह सोचकर खुश होते हैं कि जहां भी कर ली वहीं ठीक है।
                                    आमतौर से लोग सुबह के भ्रमण या व्यायाम को योग के समकक्ष रखते हैं पर यह दृष्टिकोण उन्हीं लोगों का है जो इसे केवल शारीरिक अभ्यास के रूप में पहचानते हैं।  हमने अपने अभ्यास से तो यही निष्कर्ष निकाला है कि योग साधना के नियमपूर्वक आसनप्राणायाम और ध्यान करने से मानसिक तथा वैचारिक लाभ भी होते हैं।  अनेक लोग इसे धर्मनिरपेक्ष बताकर प्रचारित कर रहे हैं जबकि हमारी दृष्टि से योग स्वयं एक धर्म है।  विश्व में जितने भी संज्ञाधारी धर्म है वह वास्तव में आर्त भाव में स्थिति हैं जिसमें सर्वशक्तिमान से जीवन सुखमय बनाने के लिये प्रार्थना की जाती है। समय के साथ मनुष्य सांसरिक विषयों में निरंतर लिप्त रहने के कारण कमजोर हो जाता है इसलिये वह अपना मन हल्का करने के लिये आर्त भाव अपना लेता है जबकि योग से न केवल ऊर्जा का क्षरण रुकता है वरन नयी स्फूर्ति भी आती है इसलिये मनुष्य आर्त भाव की तरफ नहीं जाता। इसलिये वह सर्वशक्तिमान से याचना की बजाय उसे अध्यात्मिक संयोग बनाने का प्रयास करता है। यही कारण है कि सभी कथित धार्मिक विद्वान इसके केवल शारीरिक लाभ की बात कर रहे हैं ताकि लोग अध्यात्मिक रूप से इस पर विचार न करें।
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Sunday, June 14, 2015

सहज योग तो धर्म है-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख(sahaj yog A religion-A hindi thought article on internation world day 21 june 2015)

                                    21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर सभी देशों में आयोजनों की तैयारियां चल रही हैं।  अनेक प्रकार की चर्चायें चल रही हैं पर उनका संबंध इसके दैहिक लाभ से ही है।  इसके अध्यात्मिक शक्ति मिलने की बात बहुत कम लोग कर रहे हैं। योग साधक भी अनेक प्रकार हैं। एक तो वह जो कभी कभार ही करते हैं। दूसरे वह जो अक्सर करते हैं। ऐसे योग साधकों की संख्या नगण्य है जो इसे नियमित करते हैं। जिन लोगों के लिये यह एक आदत या नशा है पर मौसम की परवाह नहीं करते है। हम जैसे योग साधकों के लिये तो यह सुबह का नशा है। प्रातः अगर शुद्ध वायु का सेवन न करें तो पूरा दिन ऐसा लगता है जैसे कि नींद से उठे ही नहीं।
                                    हमारी दृष्टि से तो योग साधना के अभ्यास से शरीर का तेल निकल जाता है-डरने की बात नहीं जब हम पूर्ण साधना कर लेते हैं तब  शरीर में मक्खन बनने की अनुभूति भी आती है।  गर्मी में तो हवा चलती है इसलिये थोड़ी राहत मिलती है पर जब वर्षा ऋतु में  बादल मुंह फेरे रहते हैं तब तो आसनों के समय पसीना इस तरह निकलता है कि चिढ़ भी आने लगती है। शरीर में गर्मी लाने वाले आसनों से उस समय परहेज की जा सकती है पर तब यह आदत छूटने की आशंका से यह विचार छोड़ना पड़ता है।
                                    इस समय चहूं ओर योग साधना की बात हो रही है। अंग्रेजी महीना जून और भारतीय माह आषाढ़ एक साथ चल रहे हैं।  जब हम योग साधना करते हैं तब 21 जून विश्व योग दिवस वाली बात तो भूल ही जाते हैं। कभी कभी हवा राहत देती है तो कभी शरीर में इतनी उष्णता लगती है कि सोचते हैं जितना कर लिया ठीक है।  फिर हवा चलती है तो धीरे धीरे अपनी साधना भी बढ़ती है।  अंत में जब मंत्र जाप करते हैं तो मन में यह उत्साह पैदा होता है कि चलो हमने किसी तरह अपनी साधना तो पूरी कर ली। स्नान और पूजा से निवृत होकर जब चाय पीते समय टीवी पर कहीं योग का कार्यक्रम देखते हैं तभी ध्यान आता है कि हम भी यही कर आ रहे हैं।  इन कार्यक्रमों में योग स्थान देखकर लगता है कि काश! हम भी वहीं जाकर साधना करें। अब उन स्थानों तक पहुंचने के लिये रेल या बस यात्रा तो करनी ही होगी-तब यह सोचकर खुश होते हैं कि जहां भी कर ली वहीं ठीक है।
                                    आमतौर से लोग सुबह के भ्रमण या व्यायाम को योग के समकक्ष रखते हैं पर यह दृष्टिकोण उन्हीं लोगों का है जो इसे केवल शारीरिक अभ्यास के रूप में पहचानते हैं।  हमने अपने अभ्यास से तो यही निष्कर्ष निकाला है कि योग साधना के नियमपूर्वक आसन, प्राणायाम और ध्यान करने से मानसिक तथा वैचारिक लाभ भी होते हैं।  अनेक लोग इसे धर्मनिरपेक्ष बताकर प्रचारित कर रहे हैं जबकि हमारी दृष्टि से योग स्वयं एक धर्म है।  विश्व में जितने भी संज्ञाधारी धर्म है वह वास्तव में आर्त भाव में स्थिति हैं जिसमें सर्वशक्तिमान से जीवन सुखमय बनाने के लिये प्रार्थना की जाती है। समय के साथ मनुष्य सांसरिक विषयों में निरंतर लिप्त रहने के कारण कमजोर हो जाता है इसलिये वह अपना मन हल्का करने के लिये आर्त भाव अपना लेता है जबकि योग से न केवल ऊर्जा का क्षरण रुकता है वरन नयी स्फूर्ति भी आती है इसलिये मनुष्य आर्त भाव की तरफ नहीं जाता। इसलिये वह सर्वशक्तिमान से याचना की बजाय उसे अध्यात्मिक संयोग बनाने का प्रयास करता है। यही कारण है कि सभी कथित धार्मिक विद्वान इसके केवल शारीरिक लाभ की बात कर रहे हैं ताकि लोग अध्यात्मिक रूप से इस पर विचार न करें।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Tuesday, June 09, 2015

योग विरोधियों के सामने उपेक्षासन करें-21 जून विश्व योग दिवस पर हिन्दी चिंत्तन लेख(yog virodhiyon ke samane upekshasan karen-hindi thought article on world yoga day, yoga diwas on 21 june)

                  21 जून विश्व योग दिवस जैसे जैसे करीब आता जा रहा है वैसे वैसे भारतीय प्रचार माध्यम भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा न मानने वाले समुदायों के कुछ लोगों को ओम शब्द, गायत्री मंत्र तथा सूर्यनमस्कार के विरोध करने के लिये बहस में निष्पक्षता के नाम पर बहसों में आगे लाकर अपने विज्ञापन का समय पास कर रहे हैं। हमारा मानना है कि भारतीय योग विद्या को विश्व पटल पर स्थापित करने के इच्छुक लोगों को ऐसी तुच्छ बहसों से दूर होना चाहिये। उन्हें विरोध पर कोई सफाई नहीं देना चाहिये।
                 योग तथा ज्ञान साधक के रूप में हमारा मानना है कि ऐसी बहसों में न केवल ऊर्जा निरर्थक जाती है वरन् तर्क वितर्क से कुतर्क तथा वाद विवाद से भ्रम उत्पन्न होता है।  भारतीय प्रचार माध्यमों की ऐसे निरर्थक बहसों से योग विश्वभर में विवादास्पद हो जायेगा। विश्व योग दिवस पर तैयारियों में लगी संस्थायें अब विरोध की सफाई की बजाय उसके वैश्विक प्रचार के लिये योग प्रक्रिया तथा विषय का प्रारूप बनाने का कार्य करें। जिन पर इस योग दिवस का जिम्मा है वह अगर आंतरिक दबावों से प्रभावित होकर योग विद्या से छेड़छाड़ करते हैं तो अपने ही श्रम को व्यथ कर देंगे।
           हम यहां बता दें कि भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा का देश में ही अधिक विरोध होता है। इसका कारण यह है कि जिन लोगों ने गैर भारतीय विचाराधारा को अपनाया है वह कोई सकारात्मक भाव नहीं रखते। इसके विपरीत यह कहना चाहिये कि नकारात्मक भाव से ही वह भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा से दूर हुए हैं।  उन्हें समझाना संभव नहीं है।  ऐसे समुदायों के सामान्य जनों को समझा भी लिया जाये पर उनके शिखर पुरुष ऐसा होने नहीं देंगे। इनका प्रभाव ही भारतीय विचाराधारा के विरोध के कारण बना हुआ है। वैसे हम एक बात समझ नहीं पाये कि आखिर चंद लोगों को गैर भारतीय विचाराधारा वाले समुदायों का प्रतिनिधि कैसे माना जा सकता हैसमझाया तो भारतीय प्रचार माध्यमों के चंद उन लोगों को भी नहीं जा सकता जो निष्पक्षता के नाम पर समाज को टुकड़ों में बंटा देखकर यह सोचते हुए प्रसन्न होते हैं कि विवादों पर बहसों से उनके विज्ञापन का समय अव्छी तरह पास हो जाता है।
योग एक विज्ञान है इसमें संशय नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता संसार में एक मात्र ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान है। यह सत्य भारतीय विद्वानों को समझ लेना चाहिये।  विरोध को चुनौती समझने की बजाय 21 जून को विश्व योग दिवस पर समस्त मनुष्य योग विद्या को सही ढंग से समझ कर इस राह पर चलें इसके लिये उन्हें मूल सामग्री उलब्ध कराने का प्रयास करना चाहिये।  विरोधियों के समक्ष उपेक्षासन कर ही उन्हें परास्त किया जा सकता है। उनमें  योग विद्या के प्रति सापेक्ष भाव लाने के लिये प्रयास करने से अच्छा है पूरी ऊर्जा भारत तथा बाहर के लोगों में दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक रूप से स्वस्था रहने के इच्छुक लोगों को जाग्रत करने में लगायी जाये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

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Friday, June 05, 2015

जीभ के लिये स्वादिष्ट नहीं पेट में पाचक भोजन ग्रहण करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(jeebh ke liye swadisht nahin pet ke liye pachak bhojan grahan karen-hindi thought aritcle)


भोजन के विषय पर हमारे समाज में जागरुकता और ज्ञान का नितांत अभाव देखा जाता है। सामान्य लोग यह मानते हैं कि भोजन तो पेट भरने के लिये है उसका मानसिकता से कोई संभव नहीं है। जबकि हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार उच्छिष्ट और बासी पदार्थ तामसी बुद्धि तथा प्रवृत्ति वाले को प्रिय होते हैं-यह हमारे पावन ग्रंथ में कहा गया है।  हम इसके आगे जाकर यह भी कह सकते हैं कि उच्छिष्ट और बासी पदार्थ के सेवन से बुद्धि और प्रवृत्ति तामसी हो ही जाती है। जिस तरह भारत में बड़ी कंपनियों के आकर्षक पैक में रखे भोज्य पदार्थ हैं उसे हम इन्हीं श्रेणी का मानते हैं।  स्वयं इसका सेवन कभी नहीं किया क्योंकि भगवत्कृपा से घरेलू भोजन हमेशा मिला। बाहर भी गये तो ऐसे स्थानों पर भोजन किया जो घर जैसे ही थे। इसलिये इन दो मिनट में तैयार होने वाले भोज्य पदार्थों के  स्वाद का पता नहीं पर भारतीय जनमानस में उनकी उपस्थिति अब पता लगी जब एक बड़ी उत्पाद कंपनी के भोज्य पदार्थ पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव आया।

हैरानी है सारे प्रचार माध्यम कागज में बंद बड़ी कंपनियों के भोज्य पदार्थों पर संदेह जता रहे हैं तब भी कुछ लोग उसका सेवन करते हुए कैमरे के सामने कह रहे हैं कि उनके बिना नहीं रह सकते। इनका स्वाद अच्छा है।
हमारा तो यह भी मानना है कि कुछ दिन में जब बड़ी कंपनियों के भोज्य उत्पाद का विवाद थम जायेगा जब लोग फिर इसका उपयोग पूर्ववत् करने लगेंगे जैसे कि कथित शीतल पेय का करते हैं।
21 जून पर आने वालेे योग दिवस पर जिन महानुभावों को प्रचार माध्यमों पर चर्चा के लिये आना है वह श्रीमद्भागवत् गीता के संदेशों की चर्चा अवश्य करें।  एक योग साधक  भोजन पेट में दवा डालने की तरह प्रयुक्त करता है। वह स्वादिष्ट नहीं पाचक भोजन पर ध्यान देता है। पता नहीं हमारी यह बात  उन तक पहुंचेगी कि नहीं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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Saturday, May 30, 2015

लोकतंत्र में मध्यम वर्ग का योगदान-हिन्दी चिंत्तन लेख(participation in demicracy of middile class-hindi thought article)


      आमतौर से यह माना जाता है कि राजनीति कोई भी कर सकता है पर विद्वान मानते हैं कि शास्त्र का ज्ञाता ही यह काम करे तो बहुत अच्छा रहेगा। राजनीति का सबसे पहला सिद्धांत यह है कि अपने लोगों को खुश करो और उसके बाद दूसरों की सोचो। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि दूसरों को खुश करने से पहले अपने लोगों को खुश करो और यह भी कि अपनो को खुश करने के बाद दूसरों पर भी कृपा करो। एक बात तय रही कि राजनीति शिखर पर बैठकर अपनी प्रसन्नता के लिये काम करना संभव नहीं है। अगर कोई ऐसा करेगा तो वह पूरे समाज में प्रतिष्ठा भी गंवा सकता है।
     विश्व के अधिकतर देशों में  आधुनिक लोकतांत्रिक पद्धति से राजकीय व्यवस्थाओं का निर्माण होता है।  लोकतांत्रिक पद्धति से व्यवस्थापकों का चुनाव होता है जिनमें प्रचार के लिये ढेर सारा पैसे खर्च होता है। इसके लिये प्रत्याशियों को धनपतियों से सहायता लेनी पड़ती है। चुनाव बाद यही धनपति चुने गये प्रतिनिधियों से अपने पैसे की अप्रत्यक्ष वापसी के रूप में व्यवसाय के लिये अनेक सुविधायें चाहते हैं। देखा यह गया है कि अनेक बुद्धिजीवी इन धनपतियों पर ही असली शासक होने का आरोप लगाते हैं। समाज के मध्यम और निम्न वर्ग के लोग तब बहुत निराश होने लगते हैं।  गरीब लोग तो आह भरकर रहते हैं पर मध्यम वर्ग अपनी बौद्धिक क्षमता का उपयोग करते हुए विरोध करता है।
    कभी कभी तो यह लगता है कि मध्यम वर्ग लोकतंत्र की वह धुरी है जो अभिव्यक्ति के सिद्धांत का भरपूर उपयोग करता है। इतना ही नहीं यही मध्यम वर्ग अपनी उपभोग प्रवृत्तियों से पूंजीपतियों का भी सहायक है। यह अलग बात है कि लोकतंत्र में गरीब के साथ मध्यम वर्ग भी शोषित होता है। अगर इस वर्ग का कोई सदस्य शिकायत करता है तो प्रतिवाद करने भी समवर्ग का ही व्यक्ति सामने आता है।  अभिव्यक्ति के मैदान पर द्वंद्व हमेशा मध्यम वर्ग के सदस्यों के ही बीच होता है।
देखा यह गया है कि जो राजसी पुरुष मध्यम वर्ग के दिल दिमाग में जगह बनाता है वही अंततः लोकप्रियता की सीढ़ियां चढ़ता है। जिससे मध्यम वर्ग रुष्ट होता है उसे प्रचार में अपयश का सामना करना पड़ता है। सच बात तो यह है कि मध्यम लोकतंत्र और पूंजीवाद दोनों को बैसाखी प्रदान करता है। वह विभिन्न वस्तुओं के उपभोग के दाम के रूप में पूंजीपति और कर के रूप में राज्य की सहायता करता है। ऐसे में मध्यम वर्ग की उपेक्षा करना ठीक नहीं है। हमारे देश में गरीबों का कल्याण करने वाले बहुत से शिखर पुरुष हैं पर लोकप्रियता मध्यम वर्ग के समर्थन से ही मिलती है। हालांकि अब कुछ शिखर पुरुष मध्यम वर्ग के हित की बात कर रहे हैं पर दबी जुबान से क्योंकि यह आम प्रचलित गरीबों के कल्याण सिद्धांत से कुछ अलग हैं। सच बात तो यह है कि शिखर पुरुष के गरीबों के कल्याण का नारा मध्यम वर्ग के ही सदस्य होते हैं जो प्रचार संस्थानों में सेवा करते हैं। यही कारण है कि अनेक समझदार शिखर पुरुष पूंजीवाद तथा लोकतंत्र के आधार रूप मध्यम वर्ग की अप्रसन्नता से बचने का प्रयास करते हैं।
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