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Saturday, April 25, 2009

भर्तृहरि नीति शतक: योगियों की साधना और कामियों का काम बढ़ा देता है ज्ञान

राजा भर्तृहरि कहते हैं कि
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ज्ञानं सतां मानमदादिननाशं केषांचिदेतन्मदमानकारणम्
स्थानं विविक्त्तं यमिनां विमुक्त्तये कामातुराणामपिकामकारणम्

हिंदी में भावार्थ-संत और सज्जन पुरुषों जब ज्ञान को धारण करते हैं तो उनके मन में सम्मान का मोह और मद नष्ट हो जाता है पर वही ज्ञान दुष्टों को अहंकारी बना देता है। जिस प्रकार एकांत स्थान योगियों को साधना के लिये प्रेरित करता है वैसे कामी पुरुषों की काम भावना को बढ़ा देता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय अध्यात्म ज्ञान की यही खूबी है कि वह ज्ञानी आदमी को महाज्ञानी बना देता है पर अगर दुष्ट हो तो वह उसे अहंकारी बना देता है। शायद यही कारण है कि श्रीगीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अपना ज्ञान केवल भक्तों में प्रचारित करने के लिये कहा है। ‘यह जीवन नश्वर है’-यह भाव जब सज्जन में आता है तब वह यही प्रयास करता है कि वह उसका सदुपयोग करते हुए उसे परोपकार,ज्ञानार्जन और दान करते बिताये पर यही ज्ञान जब किसी दुष्ट को प्राप्त हो जाये तो वह हिंसा,लूट और भोग विलास में लगा देता है यह सोचकर कि यह जीवन तो कभी न कभी नष्ट हो जायेगा।
कथित साधु संत भारतीय धर्म ग्रंथों से ज्ञान रटकर देश विदेश में घूमते हैं अपने लिये धनार्जन करते हुए वह इस बात का ध्यान नहीं करते कि इस तरह सार्वजनिक रूप से ज्ञान चर्चा नहीं की जाती। अनेक योग शिक्षक भी भारत की इस विद्या का प्रचार उन लोगों में कर रहे हैं जो भारतीय अध्यात्म ज्ञान को समझते नहीं है। सच बात तो यह है कि योगासन करने से देह में एक स्फूर्ति आती है पर अगर ज्ञान नहीं है तो कोई भी भटक सकता है। देह के साथ मन की शुद्धि के लिये मंत्रादि जपना चाहिये और विचारों की शुद्धता के लिये ध्यान करना अनिवार्य है। योग शिक्षक इसका महत्व नहीं समझते बस! शरीर को स्वस्थ रखने के लिये योगासन का प्रचार करते हैं जबकि इसके लिये यह अनिवार्य है कि साधक भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परिचित हो। जो भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परिचित नहीं है तो वह योगासन से अच्छा स्वास्थ प्राप्त कर भी कोई भला काम करे यह संभव नहीं है पर कोई बुरा काम तो कर ही सकता है। इसलिये भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा उन्हें ही दिया जाना चाहिये जो सज्जन हो। दुष्ट लोगों को देने से कोई लाभ नहीं क्योंकि या तो वह उसका मजाक बनाते हैं या दुरुपयोग करने के लिये तैयार हो जाते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

1 comment:

Anil said...

अकेले में ही इंसान अपनी असली शक्ल धारण करता है।

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