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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Friday, June 12, 2009

संत कबीर के दोहे: प्रीति के चक्कर में सुख चला जाता है

प्रीति कर सुख लेने को सुख गया हिराय
जैसे पाइ छछुंदरी, पकडि सींप पछिताय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सुख प्राप्त करने के लिये लोग गलत संपर्क बना लेते हैं और फिर कष्ट उठाते हैं। उस समय उनकी दशा ऐसी होती है जैसे सांप छछुंदर को पकड़ कर पछताता है

कबीर विषधर बहु मिले, मणिधन मिला न कोय
विषधर को मणिधर मिले, विष तजि अमृत होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में विषधर सर्प बहुत मिलते हैं, पर मणि वाला सर्प नहीं मिलता। यदि विषधर को मणिधर मिल जाये तो विष भी अमृत बन जाये।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संगति का प्रभाव आदमी पर अवश्य होता है। भले ही लोग स्वार्थ के लिये बुरे लोगों की संगति यह विचार कर करते हैं कि उसका कोई प्रभाव नहीं होगा पर यह उनका केवल विचार होता है। जब दुर्गुणी व्यक्ति की संगति की जाती है तो उसकी बातों का प्रभाव धीरे-धीरे पड़ता ही हैं और मन में कलुषिता का भाव आता ही है। इसके अलावा उसकी संगति से लोगों की दृष्टि में ही गिरते हैं और उसक द्वारा पापकर्म करने पर उसका सहभागी का संदेह भी किया जाता है। इससे अच्छा है कि दुष्ट और दुर्गुणी व्यक्ति के साथ संगति हीं नहीं की जाये। ऐसे लोगों के साथ ही अपना संपर्क बढ़ाया जाये जो भक्ति और ज्ञान रस के सेवन करने में दिलचस्पी लेते हों।
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1 comment:

seema gupta said...

संगति का प्रभाव आदमी पर अवश्य होता है।
" very true and ell said"
Regards

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