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Friday, January 23, 2009

कबीर के दोहे: वक्ता तो वाद सुनाये, श्रोता अनसुना कर जाए

संत शिरोमणि कबीरदास जी के अनुसार
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करनी का रजमा नहीं, कथनी मेरू समान
कथता बकता मर गया, मूरख मूढ़ अजान

कुछ लोग अपनी आत्मप्रवंचना अधिक ही करते हैं-खासतौर से वह लोग जिन्होंने धार्मिक किताबों को तोते की तरह रट लिया होता है। उनके कथन तो पहाड़ के समान होते हैं पर उनके कर्म का कुछ अता पता नहीं होता। वह अपनी बात बकते हुए इस दुनियां से विदा हो जाते हैं।
स्त्रोता तो घर ही नहीं, वक्ता बकै सो बाद
स्त्रोता वक्ता एक घर, तब कथनी को स्वाद

वक्ता अपनी बात करता रहे पर श्रोता कुछ सुने ही नहीं तो ऐसी बकवाद किस काम की। फिर जो लोग अपनी विद्वता दिखाते हैं उनके घर के लोग ही उनकी बात नहीं मानते। सही मायने में सत्संग तो तभी हो सकता है जब वक्ता और श्रोता का ध्यान अपने ठिकाने पर हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-देश में जगह जगह धार्मिक कार्यक्रम होते हैं पर फिर भी नफरत और हिंसा को जोर बढ़ रहा है। अनेक कथित धर्मों के आचार्य अपने धर्मों के लोगों के शांति, अहिंसा,प्रेम और दया का संदेश देते फिरते हैं पर वह निष्प्रभावी होता है क्योंकि न तो सुनने वाला हृदय से सुनता है और न कहने वाला ही अपने ज्ञान को धारण किये रहता है। समाज को अनेक भागों में बांटकर उनका नेतृत्व करने वाले सभी धर्मों के विद्वान केवल कहने के लिये कहते हैं पर उनको सुनने वालों का ध्यान कहीं अन्यत्र होता है। यही कारण है कि जितने धार्मिक कार्यक्रम होते हैं उनका परिणाम शून्य ही होता है।
कई बार तो अजीब बात होती है। कहीं तनाव होता है तो वहां समस्त समूहों के धार्मिक विद्वान सड़क पर आकर शान्ति यात्रा निकालते हैं। उनसे पूछिये कि वह प्रतिदिन लोगों को शिक्षित करते हैं पर ऐसी नौबत आती क्यों है?
इसका उत्तर किसी के पास नहीं होता। वजह! ज्ञान देने वाले तोते की तरह उसे रटे होते हैं पर उसको धारण नहीं कर पाते। वह पुराने प्रसंगों को पुराने ही ढंग से सुनाते हैं। नये ढंग से नये संदर्भ में उनको व्याख्या करना ही नहीं आती। यह तभी संभव है जब वह कथित ज्ञानी विद्वान अपने किताबों के लिखे ज्ञान को धारण किये हुए हों साथ ही उनकी कथनी और करनी में अंतर श्रोताओं को नहीं दिखता हो।

धार्मिक विद्वानों की कथनी और करनी के अंतर के कारण ही जो लोग उनके कार्यक्रमों में जाते हैं उनका उद्देश्य समय पास करना होता है न कि ज्ञान प्राप्त करना। यही कारण है कि वक्ता तो अपनी बात कहते हैं पर श्रोता का दिमाग अपने घर में नहीं होता। और अच्छे खासे सत्संग केवल दिखावा बनकर रह जाते हैं। समाज सेवा और अध्यात्मिक ज्ञान देना एक तरह से व्यवसाय बन गया है। समाज सेवा करे या नहीं पर प्रचार कर कोई भी शिखर पर बैठ जाता है और इसी तरह ज्ञान बेचने वाले कथित रूप से धार्मिक गुरु कहलाते हैं।
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1 comment:

Dr.Parveen Chopra said...

अच्छा लगा।

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