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Monday, July 18, 2011

मनुस्मृति-अपनी आंखों का पानी से आचमन करते रहना चाहिए (pani se ankhon ka achman-manu smriti)

          वायु तथा जल को न केवल जीवन का आधार माना गया है कि बल्कि उनको ओषधि भी कहा जाता है। जिस तरह प्रातः प्राणायाम से शुद्ध वायु के प्रवेश से शरीर और मन के आंतरिक विकार बाहर निकलते हैं उसी तरह नहाने के दौरान जल के उपयोग से बाहरी अंगों पर शुद्धता आती है। आधुनिक विज्ञान जल की उपयोगिता को लेकर अनेक अनुंसधान कर चुका है। हालांकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में भी इस विषय पर अनेक बातें कही गयी है।
          मनु स्मृति में कहा गया है कि
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            कृत्वा मूत्रं पूरीपं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत्।
            वेदमध्येध्माणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा
       "मल मूत्र करने के बाद व्यक्ति को सदैव हाथ धोकर आचमन करने के साथ ही पानी का स्पर्श आंखों पर करना चाहिए। सदैव वेद पढ़ने तथा भोजन करने से पहले भी हाथ धोकर आचमन करना चाहिए।"
                आजकल कंप्यूटर का उपयोग बढ़ता जा रहा है पर उससे होने वाली हानियों से रोकने और बचने के उपाय बहुत कम  लोग जानते हैं। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि कंप्यूटर का उपयोग करने वालों को बीस मिनट से अधिक उस पर काम करने के बाद दो मिनट आंखें बंद रखना चाहिए। इसके अलावा कंप्यूटर से उठकर बाहर आसमान में ताकना चाहिए ताकि आंखों के उन सूक्ष्म तंतुओं का विस्तार होता है जो काम के दौरान सिकुड़ जाते है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गयी है कि कंप्यूटर पर काम करने वालों को अपनी आंखों में पानी की छींटें मारते रहना चाहिए। कंप्यूटर पर काम करते हुए आंखों में जल सूखने लगता है और आंखों में छींटे मारने से वहां ताजगी आती है। मनृस्मृति में भी कहा गया है कि वेद आदि का अध्ययन करने से पहले और बाद दोनों ही समय आंखों में जल का प्रवेश कराना चाहिए। यही बात हम कंप्यूटर पर काम करते समय भी लागू कर सकते हैं। ऐसे प्रयासों से बहुत सीमा तक कंप्यूटर से होने वाली हानियों से बचा जा सकता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Friday, September 04, 2009

मनुस्मृति-अधिक खट्टे पदार्थ खाने योग्य नहीं (manu smriti-khatti shay khane yoggya nahin)

दधिभक्ष्यं च शुक्तेषु सर्वे च दधिसम्भवम्।
यानि चैवाभियूशयन्ते पुष्पमूलफलैः शुभैः।।
हिंदी में भावार्थ-
शुक्तों में दही तथा उससे बनने वाले पदार्थ-मट्ठा तथा छाछ आदि-तथा शुभ नशा न करने वाले फूल, जड़ तथा फल से निर्मित पदार्थ-अचार,चटनी तथा मुरब्बा आदि-भक्षण करने योग्य है।
आरण्यानां च सर्वेषां मृगानणां माहिषां बिना।
स्त्रीक्षीरं चैव वन्र्यानि सर्वशक्तुनि चैव हि।।
हिंदी में भावार्थ-
भैंस के अतिरिक्त सभी वनैले पशुओं तथा स्त्री का दूध पीने योग्य नहीं होता। सभी सड़े गले या बहुत खट्टे पदार्थ खाने योग्य नहीं होते। इस सभी के सेवन से बचना चाहिये।
वृथाकृसरसंयावं पायसायूपमेव च।
अनुपाकृतमासानि देवान्नानि हर्वषि च।।
हिंदी में भावार्थ
-तिल, चावल की दूध में बनी खीर,दूध की रबड़ी,मालपुआ आदि स्वास्थ्य के हानिकाकाकर हैं अतः उनके सेवन से बचना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-आजकल जिस तरह हमारा खानपान हो गया है उससे एक बात साफ लगती है कि स्वास्थ्य के प्रति हमारा बिल्कुल ध्यान नहीं है। लोग उन्हीं चीजों का सेवन कर रहे हैं जो स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोग नहीं है। बहुत खट्टे तथा दूध से बनने वाले पदाथों के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है जो कि स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। दूध से बना घी ही केवल स्वास्थ्य के लिये अच्छा है बाकी उससे बने अन्य पदार्थों के लिये यह बात नहीं कही जा सकती। रबड़ी खाने का शौक कई लोगों को होता है जबकि उसे मनुस्मृति में अच्छा नहीं माना जाता।
यह अजीब बात है कि अनेक धार्मिक कार्यक्रमों में दुग्ध से बने ऐसे ही पदार्थ ही प्रसाद के रूप में दिये जाते हैं जिनको स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता जबकि उनका आयोजन अपने ही धर्म के प्रचार के लिये करते हैं जिसकी पुस्तकों में ऐसी वस्तुओं को निषेध किया गया है।
सच बात तो यह है कि खानपान में ही अगर सावधानी बरती जाये तो स्वास्थ्य अच्छा रह सकता है और कभी अपनी देह लेकर पश्चिमी चिकित्सा पद्धति से काम करने वाले चिकित्सकों के पास उसे बिचारगी का भाव लेकर प्रस्तुत नहीं करना पड़ता। बीमार पड़ने के बाद तो हमारी देह चिकित्सकों के अधीन हो जाती है इसलिये अच्छा है कि पचने योग्य पदार्थ ही सेवना किये जायें।
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Monday, August 10, 2009

मनु स्मृति- भोगी से त्यागी ही श्रेष्ठ माना जाता है (manu smruti-tyagi vyakti shreshth)

यश्चैतान्प्राघ्नु यात्सर्वान्यश्चैतान्केवलांस्त्यजेत्
प्रापणात्सर्वकामानां परित्यागों विशिष्यते

हिन्दी में भावार्थ-एक व्यक्ति जो सब विषयों को प्राप्त कर ले और दूसरा जो सबका त्याग कर दे उनमें त्यागी को ही श्रेष्ठ कहा जा सकता है।

न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति
हविपा कृष्णावत्र्मेव भूव एवाभिवर्धते

हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकार अग्नि में घी डालने से वह और अधिक जल उठती है उसी प्रकार आदमी सतत इच्छाओं की पूर्ति जैसे जैसा होती जाती है वैसे ही वह और अधिक बढ़ जातीं हैं।
आज के संदर्भ में व्याख्या-मनुस्मृति के इन दोनों श्लोंकों का आशय यही है कि हमें अपनी इच्छाओं का दास बनने की बजाय उनका मालिक होना चहिए। जब हम अपने अंदर तमाम तरह की इच्छाएं पाल लेते हैं तो उनको पूरा करने के लिये इधर-उधर भटकने लगते हैं और तब हमारें सामने अनेक प्रकार के तनाव उपस्थित हो जाते हैं। हमारा काम कई चीजों के बिना भी चल सकता है पर हम उनको पाने की चेष्टा करते है। कई चीजें तो हमारे लिये क्षणिक काम या समय के लिये उपयोग में आतीं हैं और बाद में उनको कबाड़ में रख दिया जाता है पर हम उसे पाने में अपनी बेशकीमती समय और ऊर्जा नष्ट कर देते हैं। इसकी बजाय हम अपनी उन व्यर्थ की इच्छाओं और कामनाओं के स्वामी बनकर उन्हें रोंकें तो हम अपने जीवन में न केवल अपार आनन्द प्राप्त करेंगे बल्कि अपने आसपास ही दूसरे मनुष्यों के लिये आदर्श भी बन सकते है।
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Sunday, July 26, 2009

मनु स्मृति-अपशब्द बोलने वाले को दंड देना जरूरी ( manu smruti-apshabd bolne par dand jaroori)

काणं वाप्यथवा खंजमन्यं वाणि तथाविधम्।
तथ्येनापि ब्रुपन्दाप्यो दण्डं कार्षापणा वरम्।।

हिंदी में भावार्थ-मनु महाराज के अनुसार किसी विकलांग व्यक्ति को उसके अंगदोष से पुकारने वाले को-काना या लंगड़ा कहकर बुलाने वाला- दंडित किया जाना चाहिये।
मातरं पितरं जायां भ्रातरं तनयं गुरुम्।
आक्षारयच्छत दाप्यः पन्थानं चाददद्गुरोः।।

हिंदी में भावार्थ-मनु महाराज के अनुसार जो व्यक्ति माता पिता, पत्नी, और भाई को अपशब्द कहता है तथा अपने गुरु के आने पर उसे सम्मान नहीं देता उसे भी दंडित किया जाना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे समाज में जन्मजात अंगदोष वाले व्यक्ति को घृणित दृष्टि से देखने की बहुत बुरी भावना है। मनु महाराज इसका विरोध करते हैं। होता यह है कि अंगदोष वाले व्यक्ति कहीं बैठते हैं और किसी की बात का प्रतिकार करते हैं तो सामने वाला व्यक्ति हाल ही उसे अंगदोष से पुकारने लगता है। यह पापकर्म और अपराध है। देखा तो यह गया है कि इस तरह अंगदोष वाले लोग समाज से हमेशा अपमानित होने के कारण हीनभावना से भर जाते हैं। कहने को तो हमारा देश संस्कारवान लोगों से संपन्न कहा जाता है पर गांव हो या शहर अंगदोष वाले व्यक्तियों से कई बार बदतमीजी की जाती है। ऐसे लोगों की निंदा करने के साथ मनुमहाराज के अनुसार उनको आर्थिक दंड भी देना चाहिये।
वर्तमान विश्व समाज का एक वर्ग अपशब्दों के प्रयोग में अपने को सभ्य समझने लगा है। अभी हाल ही में प्रचार माध्यमों में आए एक विश्लेषण के अनुसार आजकल के युवक युवतियां वार्तालाप में अपशब्द बोलना फैशन की तरह अपनान लगे हैं। तय बात है कि वह कोई अपने से ताकतवर या समकक्ष व्यक्ति के प्रति ऐसा अपराध करने का साहस नहीं कर सकते और उनकी अभद्रता का शिकार उनसे छोटे वर्ग और सज्जन प्रकृति के लोग होते हैं। ऐसे लोगों की भी निंदा करने के साथ मनु महाराज के अनुसार दंड की व्यवस्था करना चाहिये।
वैसे यहां इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि अधिकतर देशों में अंगदोष का उल्लेख कर बुलाना या अपशब्दों का प्रयोग करना कानूनी अपराध है। यह अलग बात है कि पीड़ित लोग झमेले में फंसने की बजाय खामोश रहना पसंद करते हैं पर उनके मन की पीड़ा से निकली हाय अपराधी को कभी न कभी लगती ही है।
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Thursday, July 23, 2009

मनु स्मृति-दान कर उपभोग करना उचित

यानाश्य्यासनान्यस्य, कूपोद्यान ग्रह्यणि च।
अदत्तान्युपयु´्जानः एनसः स्वात्तुरीभाक्।।
हिंदी में भावार्थ-
वाहन, शैय्या, आसन, कुआं, उद्यान और भवन आदि का उपभोग कुछ दान कर ही करना लाभदायक होता है।

परकीयनियानुषु न स्नायाद्धि कदाचन।
नियानकत्र्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अन्य व्यक्तियों द्वारा बनवाये गये स्नान के लिये बनाये गये स्थानों-स्नानगृहों,सरोवरों और कुऐं आदि-पर नहाना नहीं चाहिए। वह स्नानगृह अगर पापों के धन से बनाये गये हैं तो उसमें नहाने वाला भी उसका भागी बनता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल की व्यस्त एवं दीर्घसूत्रीय जिंदगी में यह देखना कठिन काम है कि हम कहीं बाहर जाकर रुक रहे हैं तो वहां का स्थान किस प्रकार के धन से बनाया गया है। वैसे भी आजकल बिना काले धन के यह कैसे संभव है कि समाज का भौतिक विकास इतनी तीव्र गति से हो। ऐसे में भ्रष्ट और अनैतिक रूप से कमाये गये धन से बने आवास और स्नानगृहों में रहने और नहाने का प्रतिबंध स्वीकार करना संभव नहीं लगता। बड़े बड़े शहरों में बड़े और आलीशान होटल बन गये हैं जिनमें स्वीमिंग पूल भी होते हैं। अब यह कैसे कहा जा सकता है कि वह भ्रष्ट या अनैतिक धन से बने हैं या सात्विक धन से। वैसे तो आजकल धर्नाजन के कई ऐसे óात पवित्र माने जाते हैं जिनको पहले अपवित्र माना जाता था। अतः इस बारे में अपने विवेक से विचार करना चाहिये।

मगर सच तो यह है कि जिस प्रकार हम अपने जीवन में जिस प्रकार के व्यक्ति या वस्तु के संपर्क में आते हैं उसके पाप पुण्य का प्रभाव हम पर होता है। कहा जाता है कि ‘जैसे खायें अन्न वैसा हो मन’। इसका आशय यह तो है ही कि जिस प्रकार की वस्तु का हम उपभोग करेंगे वैसे ही प्रभाव हमारी देह के साथ ही हमारे मन और विचारों पर होगा। साथ ही यह भी कि उसके आने का सात्विक मार्ग है या असात्विक इस बात का प्रभाव भी उसके उपभोग करने वाले पर होता है। तात्पर्य यह है कि अगर हमें लगता है कि कोई व्यक्ति या वस्तु-जिसके बारे में यह यकीन हो कि वह असात्विक प्रकृत्ति की है तो उससे अपने आपको दूर रखना चाहिये। यह ठीक है कि आजकल की भागम भाग जिंदगी में यह कहना कठिन है कि किसका धन एक नंबर का है या दो नंबर का पर थोड़ा विवेक का इस्तेमाल करें तो सभी समझ में आ जाता है। दूसरा सच यह भी कि हम किसी बड़े शहर में जाकर अपने लिये सस्ता और अच्छा स्थान रहने के लिये ढूंढते हैं पर तब यह देखने का न तो समय होता है न जरूरत कि वह किस प्रकार के धन से बना है। हालांकि अनजान रहने पर किसी वस्तु का उपभोग करने पर उसके पाप का भागी नहीं बनते यह भी हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है।
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Wednesday, July 15, 2009

मनु स्मृति-काम और क्रोध की जननी है लालच

द्वयोरप्येत्योर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः
तं त्यनेन ज्येल्लोभं त्ज्जावेतातुभौ गणौ
हिंदी में भावार्थ- काम तथा क्रोध से ही सारे व्यवसन होते हैं। इनकी जननी लालच है अतः सभी लोगों को अपने मन पर आने वाली लालच की भावना पर नियंत्रण करना चाहिये।

पैशुन्यं साहसं मोहं ईष्र्याऽसूयार्थ दूषणाम्
वाग्दण्डजं च पारुघ्यं क्रोधजोऽपिगणोष्टकः

हिंदी में भावार्थ- क्रोध से आठ प्रकार के दोष उत्पन्न होते हैं-चुगली या निंदा करना, दुस्साहस, नकारात्मक विचार,ईष्र्या,दूसरों में दोष देखना,पराये धन के अपहरण की प्रवृत्ति,अभद्र शब्द बोलना और दुव्र्यवहार करना।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सच बात यह है कि इस विश्व में जितने भी प्रकार के अपराध हैं वह काम और क्रोध से उत्पन्न होते हैं। उनकी जननी लालच है। मनुष्य अपने जीवन में जितना कमाता है उतना व्यय नहीं करता पर धन और संपत्ति संग्रह की लालच उसे कही भी रुकने नहीं देती। अगर यह लालच का भाव मनुष्य में नहीं होता तो शायद कोई अपराध इस संसार में नहीं होता। लोग कहते हैं कि भुखमरी से अपराध बढ़ते हैं पर सामाजिक और अपराध विशेषज्ञ इसे नहीं मानते क्योंकि जो अपराधी पकड़े जाते हैं उनमें से कोई ही शायद भूख की वजह से अपराध करता हो। हम देश में फैले सार्वजनिक, सामाजिक और निजी क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार को देखें तो उस अपराध में कोई छोटा आदमी नहीं होता। लोगों के अच्छे खासे वेतन मिलते हैं पर वह फिर भी अपने से कमजोर आदमी से पैसा मांगते या उनको ठगते हुए शर्म नहीं अनुभव करते। जिन लोगों पर दया करना चाहिये उनका ही जेब काटने में उनकी रुचि होती हैं। कल्याण कामों के लिये दान या भाग में रूप में दिया उपलब्ध धन या सामान का अपहरण करने वाले भ्रष्टाचारी लोग केवल उससे अपने घर भरते हैं। समाजसेवा एक तरह से व्यापार हो गया है। दान लेने वाले कुपात्र हैं तो देने वाले भ्र्रष्ट।

हम अपने धर्म,संस्कृति और संस्कारों की दुहाई देते नहीं थकते पर लालच की प्रवृत्ति ने आदमी को लालची बना दिया है। इससे वह कामी और क्रोधी हो गया है। सामाजिक और निजी भ्रष्टाचार में आदमी अगर स्वयं लिप्त हो तो उसे नजर नहीं आता और दूसरा हो तो वह उस पर क्रोध करता है।
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Monday, July 06, 2009

मनुस्मृति-ज्ञान के बिना मन को वश में करना संभव नहीं ( manu smruti )

वशे कृत्वेन्दिियग्रामं संयम्य च मनस्तथा।
सर्वान्संसाधयेर्थानिक्षण्वन् योगतस्तनुम्।।

हिंदी में भावार्थ-मनुष्य के लिये यही श्रेयस्कर है कि वह अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखे जिससे धर्म,अर्थ,काम तथा मोक्ष चारों प्रकार का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।

न तथैंतानि शक्यन्ते सन्नियंतुमसेवया।
विषयेषु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः

हिन्दी में भावार्थ-जब तक इंद्रियों और विषयों के बारे में जानकारी नहीं है तब तब उन पर निंयत्रण नहीं किया जा सका। इंद्रियों पर नियंत्रण करना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिये यह आवश्यक है कि विषयों की हानियों और दोषों पर विचार किया जाये
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इंद्रियों पर नियंत्रण और विषयों से परे रहने का संदेश देना आसान है पर स्वयं उस पर नियंत्रण करना कोई आसान काम नहीं है। आप चाहें तो पूरे देश में ऐसे धार्मिक मठाधीशों को देख सकते हैं जो श्रीगीता का ज्ञान देते हुए निष्काम भाव से कर्म करने का संदेश देते हैं पर वही अपने प्रवचन कार्यक्रमों के लिये धार्मिक लोगों से सौदेबाजी करते हैं। लोगों को सादगी का उपदेश देने वाले ऐसे धर्म विशेषज्ञ अपने फाइव स्टार आश्रमों से बाहर निकलते हैं तो वहां भी ऐसी ही सुविधायें मांगते हैं। देह को नष्ट और आत्मा को अमर बताने वाले ऐसे लोग स्वयं ही नहीं जानते कि इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए विषयों से परे कैसे रहा जाता है। उनके लिये धार्मिक संदेश नारों की तरह होते हैं जिसे वह लगाये जाते हैं।
दरअसल ऐसे लोगों से शास्त्रों से अपने स्वार्थ के अनुसार संदेश रट लिये हैं पर वह इंद्रियों और विषयों के मूलतत्वों को नहीं जानते। इंद्रियों पर नियंत्रण तभी किया जा सकता है जब विषयों से परे रहा जाये। यह तभी संभव है जब उसके दोषों को समझा जाये। वरना तो दूसरा कहता जाये और हम सुनते जायें। ढाक के तीन पात। सत्संग सुनने के बाद घूम फिरकर इस साँसससिक दुनियां में आकर फिर अज्ञानी होकर जीवन व्यतीत करें तो उससे क्या लाभ?
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Saturday, June 13, 2009

मनु स्मृति-गुस्सा आठ रोगों का जन्मदाता

पैशुन्यं साहसं मोहं ईष्र्याऽसूयार्थ दूषणाम्
वाग्दण्डजं च पारुघ्यं क्रोधजोऽपिगणोष्टकः

हिंदी में भावार्थ- क्रोध से आठ प्रकार के दोष उत्पन्न होते हैं-चुगली या निंदा करना, दुस्साहस, नकारात्मक विचार,ईष्र्या,दूसरों में दोष देखना,पराये धन के अपहरण की प्रवृत्ति,अभद्र शब्द बोलना और दुव्र्यवहार करना।
द्वयोरप्येत्योर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः
तं त्यनेन ज्येल्लोभं त्ज्जावेतातुभौ गणौ
हिंदी में भावार्थ- काम तथा क्रोध से ही सारे व्यवसन होते हैं। इनमी जननी लालच है अतः सभी लोगों को अपने मन पर आने वाली लालच की भावना पर नियंत्रण करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सच बात यह है कि इस विश्व में जितने भी प्रकार के अपराध हैं वह काम और क्रोध से उत्पन्न होते हैं। उनकी जननी लालच है। मनुष्य अपने जीवन में जितना कमाता है उतना व्यय नहीं करता पर धन और संपत्ति संग्रह की लालच उसे कही भी रुकने नहीं देती। अगर यह लालच का भाव मनुष्य में नहीं होता तो शायद कोई अपराध इस संसार में नहीं होता। लोग कहते हैं कि भुखमरी से अपराध बढ़ते हैं पर सामाजिक और अपराध विशेषज्ञ इसे नहीं मानते क्योंकि जो अपराधी पकड़े जाते हैं उनमें से कोई ही शायद भूख की वजह से अपराध करता हो। हम देश में फैले सार्वजनिक, सामाजिक और निजी क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार को देखें तो उस अपराध में कोई छोटा आदमी नहीं होता। लोगों के अच्छे खासे वेतन मिलते हैं पर वह फिर भी अपने से कमजोर आदमी से पैसा मांगते या उनको ठगते हुए शर्म नहीं अनुभव करते। जिन लोगों पर दया करना चाहिये उनका ही जेब काटने में उनकी रुचि होती हैं। कल्याण कामों के लिये दान या भाग में रूप में दिया उपलब्ध धन या सामान का अपहरण करने वाले भ्रष्टाचारी लोग केवल उससे अपने घर भरते हैं। समाजसेवा एक तरह से व्यापार हो गया है। दान लेने वाले कुपात्र हैं तो देने वाले भ्र्रष्ट।

हम अपने धर्म,संस्कृति और संस्कारों की दुहाई देते नहीं थकते पर लालच की प्रवृत्ति ने आदमी को लालची बना दिया है। इससे वह कामी और क्रोधी हो गया है। सामाजिक और निजी भ्रष्टाचार में आदमी अगर स्वयं लिप्त हो तो उसे नजर नहीं आता और दूसरा हो तो वह उस पर क्रोध करता है।
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Tuesday, May 12, 2009

मनु स्मृतिः झूठ बोलने के बाद अपनी शुद्धि पानी पीकर करना चाहिए

सुष्त्वा क्षुत्वा च भुक्तवा च निष्ठीव्योक्त्वाऽनुतानि च।
पीत्वाऽध्येघ्यमाणश्च आचामेत्प्रयतोऽपि सन्।।
हिंदी में भावार्थ-
सोने, छींकने,खाने,और झूठ बोलने के बाद अपनी शुद्धि पानी पीकर करनी चाहिऐ। इसके बाद ही अध्ययन करने से पहले एक बार पानी का आचमन करें।
वान्तो विरिक्तिः स्नात्वा तृ घृतप्राशनमारेत्।
आचामेदेव भुक्तवाऽन्नं स्नानं मैथुनिनः स्मृतम्।।
हिंदी में भावार्थ-
उल्टी तथा दस्त करने वाला व्यक्ति नहाकर घी खाने से शुद्धता को प्राप्त कर लेता है। भोजन ग्रहण कर कै करने वाला आचमन करने तथा संभोग करने वाला स्नान करने से शुद्धता को प्राप्त कर लेता है।
उच्छिष्टे तु संस्पृष्टो द्रव्यहस्तः कथंचन।
अनिधायैव तद्द्रव्यमाचान्तः शुचितामियात्।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि जूठे मूंह वाले व्यक्ति ने हाथ से किसी द्रव्य को छू लिया तो भी उस द्रव्य को हाथ में लेकर पानी से आचमन करने से मनुष्य की अपवित्रता नष्ट हो जाती है।
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Monday, May 11, 2009

मनुस्मृति-दूध से बनी चावल की खीर और रबड़ी हानिकारक

वृथाकृसरसंयावं पायसायूपमेव च।
अनुपाकृतमासानि देवान्नानि हर्वषि च।।
हिंदी में भावार्थ
-तिल, चावल की दूध में बनी खीर,दूध की रबड़ी,मालपुआ आदि स्वास्थ्य के हानिकाकाकर हैं अतः उनके सेवन से बचना चाहिये।
आरण्यानां च सर्वेषां मृगानणां माहिषां बिना।
स्त्रीक्षीरं चैव वन्र्यानि सर्वशक्तुनि चैव हि।।
हिंदी में भावार्थ-
भैंस के अतिरिक्त सभी वनैले पशुओं तथा स्त्री का दूध पीने योग्य नहीं होता। सभी सड़े गले या बहुत खट्टे पदार्थ खाने योग्य नहीं होते। इस सभी के सेवन से बचना चाहिये।
दधिभक्ष्यं च शुक्तेषु सर्वे च दधिसम्भवम्।
यानि चैवाभियूशयन्ते पुष्पमूलफलैः शुभैः।।
हिंदी में भावार्थ-
शुक्तों में दही तथा उससने वाले पदार्थ-मट्ठा तथा छाछ आदि-तथा शुभ नशा न करने वाले फूल, जड़ तथा फल से निर्मित पदार्थ-अचार,चटनी तथा मुरब्बा आदि-भक्षण करने योग्य है।
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Wednesday, May 06, 2009

मनुस्मृतिः ज्ञान के बिना इन्द्रियों को काबू करना संभव नहीं

वशे कृत्वेन्दिियग्रामं संयम्य च मनस्तथा।
सर्वान्संसाधयेर्थानिक्षण्वन् योगतस्तनुम्।।

हिंदी में भावार्थ-मनुष्य के लिये यही श्रेयस्कर है कि वह अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखे जिससे धर्म,अर्थ,काम तथा मोक्ष चारों प्रकार का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।
न तथैंतानि शक्यन्ते सन्नियंतुमसेवया।
विषयेषु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः

हिन्दी में भावार्थ-जब तक इंद्रियों और विषयों के बारे में जानकारी नहीं है तब तब उन पर निंयत्रण नहीं किया जा सका। इंद्रियों पर नियंत्रण करना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिये यह आवश्यक है कि विषयों की हानियों और दोषों पर विचार किया जाये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इंद्रियों पर नियंत्रण और विषयों से परे रहने का संदेश देना आसान है पर स्वयं उस पर नियंत्रण करना कोई आसान काम नहीं है। आप चाहें तो पूरे देश में ऐसे धार्मिक मठाधीशों को देख सकते हैं जो श्रीगीता का ज्ञान देते हुए निष्काम भाव से कर्म करने का संदेश देते हैं पर वही अपने प्रवचन कार्यक्रमों के लिये धार्मिक लोगों से सौदेबाजी करते हैं। लोगों को सादगी का उपदेश देने वाले ऐसे धर्म विशेषज्ञ अपने फाइव स्टार आश्रमों से बाहर निकलते हैं तो वहां भी ऐसी ही सुविधायें मांगते हैं। देह को नष्ट और आत्मा को अमर बताने वाले ऐसे लोग स्वयं ही नहीं जानते कि इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए विषयों से परे कैसे रहा जाता है। उनके लिये धार्मिक संदेश नारों की तरह होते हैं जिसे वह लगाये जाते हैं।
दरअसल ऐसे लोगों से शास्त्रों से अपने स्वार्थ के अनुसार संदेश रट लिये हैं पर वह इंद्रियों और विषयों के मूलतत्वों को नहीं जानते। इंद्रियों पर नियंत्रण तभी किया जा सकता है जब विषयों से परे रहा जाये। यह तभी संभव है जब उसके दोषों को समझा जाये। वरना तो दूसरा कहता जाये और हम सुनते जायें। ढाक के तीन पात। सत्संग सुनने के बाद घूम फिरकर इस साँसससिक दुनियां में आकर फिर अज्ञानी होकर जीवन व्यतीत करें तो उससे क्या लाभ?
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Tuesday, March 03, 2009

मनु स्मृति: पानी के आचमन से देह में शुद्धि होती है

सुप्त्वा क्षुत्वा च भुक्तवा च निष्ठीव्योक्त्वाऽनतानि च।
पीत्वाऽपोध्यध्यमाणश्च आचामेत्प्रयतोऽपि सन्।।


हिंदी में भावार्थ-सोने, छींकने, खाने, थूकने और झूठ बोलने के बाद अपनी शुद्धि पानी पीकर करनी चाहिए। इसके बाद भी अध्ययन करने से पहले एक बार जल का आचमन करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय के साथ हमने कई पुराने संदेशों को भुला दिया है। पानी का सेवन करने से शरीर में कई प्रकार से शुद्धता आती है और तन की शुद्धता से ही मन में शुद्धता का भाव स्थापित हो पाता है। आजकल तो लोग अपने शरीर के साथ अधिक खिलवाड़ करते हैं। कंप्यूटर और टीवी में अपनी आंखों से निरंतर देखते रहते हैं इससे जो तन और मन में हानि होती है उसकी जानकारी उनको नहीं होती है। अनेक जानकार कहते हैं कि कंप्यूटर और टीवी पर एक संक्षिप्त अवधि से दृष्टिपात करने के बाद पानी पीना चाहिए और मूंह में कुल्ला भरकर आंखों में छींटे मारना चाहिए। हमारे देश में किसी भी वस्तु के उपभोग पर लोग उतारू तो हो जाते है पर उससे संबंधित सावधानियों पर ध्यान नहीं देते। कंप्यूटर पर काम करने के बाद अपनी आंखों पर पानी के छींटे मारने से जो राहत मिलती है उससे मस्तिष्क में आये तनाव से मुक्ति मिलती है। सबसे बड़ी बात यह है कि लोगों को यही पता नहीं होता कि तनाव क्या होता है? जब इस तरह पानी के छींटें मारें तब जो राहत मिलती है उस से ही पता लगता है कि कोई तनाव भी होता है।
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