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Tuesday, January 13, 2015

साधक ज्ञान के पर्वत पर चढ़कर अज्ञानियों पर हंसता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(sadhak gyan ke parvat par chadhkar agyaniyon ko hansta hai-hindi chinntan article)



            इस संसार में योग सभी कर रहे हैं-कोई स्वेच्छा से सहज योग में तल्लीन है  तो कोई परवश असहज योग में फंसा है। आम तौर से योग साधक और सामान्य जन में अंतर नहीं दिखता पर तत्वज्ञान होने पर इसका आभास स्वाभाविक रूप से होता है।  नित्य प्रतिदिन योग साधक अपने अभ्यास से जैसे जैसे प्रवीण होते हैं उन्हें लगने लगता है कि उनके सपंर्क में आने वाले लोग उनकी अपेक्षा कुछ भिन्न हैं।  कभी कभी योग साधकों को अपने अंदर सहजता का भाव यह विचार उत्पन्न होने सताने लगता है कि उनके मस्तिष्क में सांसरिक विषयों के प्रति वैसी रुचि नहीं है जैसे सामान्यजनों में प्रकट दिखती है।
            इसलिये योग साधकों को श्रीमद्भागवत गीता का भी अध्ययन कर तत्वज्ञान प्राप्त करना चाहिये।  मनुष्य देह त्रिगुणात्मक माया के बंधन में है।  इस देह में स्थित बुद्धि और मन बाह्य विषयों से प्रभावित होकर कार्य करती है।  इसलिये देह स्वामी बाह्य विषयों, वस्तुओं और व्यक्तियों से अपने स्वार्थ भाव होने से बाध्य होकर जुड़ता है।  यह असहज योग की स्थिति है जो प्रारंभ में उसे अमृत तुल्य लगती है मगर कालंातर में उसका प्रभाव विषैला ही रहता है।  इसके विपरीत योग साधक अभ्यास करते हुए बौद्धिक प्रवीणता होने पर बाह्य विषयों के उचित अनुचित का भेद करने के बाद  अपनी सामान्य आवश्यकता पूर्ति होने तक ही उनसे जुड़कर अपना काम निकलने के  बाद में विरक्त हो जाता है। योग साधक  किसी एक वस्तु, विषय और व्यक्ति से जुड़कर अपना संपूर्ण जीवन दाव पर नहीं लगाता।

पतंजलि योग सूत्र में कहा गया है

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निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसाद।



            हिन्दी में भावार्थ- विचार के अभाव रखने की प्रवीणता अध्यात्म का प्रसाद होता है।

महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि

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प्रज्ञाप्रासादमारुह्यशोच्यः शोचतो जनान्।

भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति।।

            हिन्दी में भावार्थ-ज्ञान के प्रसाद पर चढ़कर विषयों में आसक्ति से रहित विद्वान सांसरिक विषयों में कष्ट भोग रहे सामान्य जनों को ऐसे ही देखता है जैसे पहाड़ पर चढ़ने वाला नीचे चल रहे लोगों को देखता है।

            जैसे जैसे योग साधक अभ्यास करता है वैसे वैसे उसे सामान्य जनों के अनेक कार्य अज्ञान से किये गये लगते हैं। योगाभ्यास और अध्ययन से जुड़ने पर मनुष्य को ज्ञान रूपी जो प्रसाद मिलता है वह अनुपम हैं।  उसके अंतर्चक्षु इस तरह खुल जाते हैं कि उसे अच्छे और बुरे की पहचान करने में अधिक समय नष्ट नहीं करना पड़ता।  किसी कार्य के परिणाम का वह पहले ही अनुमान कर लेता है न कि फल के अच्छे होने की कामना लेकर जीवन के युद्ध में बिना किसी योजना के उतरकर कष्ट उठाता है। इतना ही नहीं वह अंधेरे में तीर चलाने वालों को देखकर हंसता भी है। हम आजकल समाज में मानसिक, शारीरिक तथा वैचारिक दृष्टि से विकारों से युक्त लोगों की बढ़ती संख्या देखकर यह अनुमान कर सकते हैं कि लोगों ने मन बुद्धि और विचार भौतिकवाद के पास गिरवी रख दिये हैं।  वह बाहर से सुख अंदर आने की कामना करते हैं जबकि ज्ञानी जानते हैं सुख एक अनुभूति है जिसे हाथ से पकड़ा नहीं जा सकता।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Thursday, January 08, 2015

आस्था के नाम पर धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध अभियान को पूर्ण स्वतंत्रता होना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन लेख(astha ke naam par dharmik kattarta ke viruddh abhiyan ko poorn swatantrata hona chahiye-hindi thought article)





            फ्रांस में शार्ली हेब्दो पत्रिका पर हमले से मध्य एशिया के उन्मादी समूहों को बरसों तक प्रचारात्मक ऊर्जा मिलेगी।  पहले यह ऊर्जा सलमान रुशदी की पुस्तक के बाद उन पर ईरान के एक धार्मिक नेता खुमैनी के फतवे से मिली थी।  इसके बाद मध्य एशिया का धार्मिक उन्माद बढ़ता ही गया।  वह धार्मिक नेता बरसों तक अमेरिका में रहा और उसी ने ही ईरान की राजशाही के बाद धार्मिक ठेकेदार होने के साथ ही वहां के शासन को भी अपने हाथ में ले लिया। प्रत्यक्ष अमेरिका का खुमैनी से कोई संबंध नहीं दिखता था मगर उसके नेतृत्व में उस समय ईरान में राजशाही के विरुद्ध चल रहे लोकतात्रिक आंदोलन से उसकी सहमति थी। राजशाही के पतन के बाद वहां खुमैनी के धार्मिक नेतृत्व में बनी सरकार कट्टरपंथी ही थी। दिखाने के लिये अमेरिका ने ईरान में लोकतंत्र स्थापित किया पर सच यह है कि वहां एक उस व्यक्ति को सत्ता मिली जो बाद में उसका   दुश्मन बना।
            धार्मिक उन्मादी प्रचार के भूखे होते हैं।  जिस तरह चार्ली हेब्दों के कार्टूनिस्टों की हत्या हुई है वह मध्य एशिया के धर्म की ताकत बनाये रखने के लिये की गयी है जो केवल प्रचार से मिलती है।     इस धार्मिक उन्माद का सामना करने के लिये पूरे विश्व में धार्मिक आस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक ही रूप रखना चाहिये।  यह नहीं हो सकता कि एक देश में आस्था के नाम पर किसी धर्म पर कटाक्ष अपराध तो किसी में एक सामान्य प्रक्रिया मानना चाहिये।  हमारे देश में स्थिति यह है कि भारतीय धर्मोंे पर आक्रमण तो एक सामान्य प्रक्रिया और दूसरे धर्म पर कटाक्ष अपराध मानने की प्रचारजीवियों की प्रवृत्ति हो गयी है।  समस्या यह है कि भारतीय धर्म के ठेकेदार भी कर्मकांडों के ही संरक्षक होते हैं और अध्यात्मिक ज्ञान को एक फालतू विषय मानते हैं।  अध्यात्मिक ज्ञानी अंतर्मुखी होते हैं इसलिये कटाक्ष की परवाह नहीं करते कर्मकांडियों बहिर्मुखी होने के कारण चिंत्तन प्रक्रिया से पर होते इसलिये कटाक्ष सहन नहीं कर पाते।  हमारा तो यह मानना है कि विदेशी विचाराधाराओं के मूल तत्वों पर कसकर टिप्पणी हो सकती है और सहज मानव जीवन के लिये  भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा पर चलने के अलावा कोई विकल्प हो ही नहीं सकता, पर यह ऐसी सोच संकीर्ण मानसिकता की मानी जाती है।  हम इस पर बहस कर सकते हैं और कोई कटाक्ष करे तो उसका शाब्दिक प्रतिरोध भी हो सकता है पर कर्मकांडी किसी कटाक्ष को सहन नहीं करना चाहते। वह बहस में किसी अध्यात्मिक ज्ञानी का नेतृत्व स्वीकार नहीं कर सकते। इसलिये चिल्लाते हैं ताकि शोर हो जिससे वह प्रचार प्रचार पायें।
            फ्रांस की चार्ली हेब्दो पत्रिका पर हमले को सामान्य समझना उसी तरह भूल होगी जैसे सलमान रुशदी की किताब पर ईरान के धार्मिक तानाशाह खुमैनी के उनके खिलाफ मौत की फतवे को मानकर की गयी थी। शिया बाहुल्य होने के कारण ईरान के वर्तमान शासक  मध्य एशिया में प्रभावी गुट के विरोधी हैं पर वह इस हत्याकांड की निंदा नहीं करेंगे क्योंकि कथित धार्मिक आस्था पर आक्रमण पर स्वयं ही हिंसक कार्यवाहियों के समर्थक हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि इस विषय पर मध्य एशिया की विचारधारा पर बने सभी समूह वैचारिक रूप से एक धरातल पर खड़ मिलेंगे।
            इनका प्रतिकार वैचारिक आक्रमण से किया जा सकता है पर अलग अलग देशों  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नियमों में विविधिता है। जहां आस्था के नाम पर छूट है वहां बहस की गुंजायश कम रह जाती है। इसलिये फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों के बुद्धिमान सीधे धार्मिक अंधवश्विास पर आक्रमण करते हैं जबकि एशियाई देशों में  दबी जुबान से यह काम होता है। भारत में तो यह संभव ही नहीं है।  आज भी हमारे देश के बुद्धिजीवी दिवंगत कार्टूनिस्टों की मौत पर सामान्य शोक जरूर जता रहे हैं पर अपने यहां आस्था के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी सीमित रखने का विरोध नहीं कर रहे। शायद उनके लियं यहां भारतीय धर्मों में ही दोष हैं जिन पर गाह बगाहे वह हंसते ही हैं।  कट्टर धार्मिक विचाराधाराओं के विरुद्ध वैचारिक अभियान में पश्चिमी देशों का अनुसरण हमारे देश के बुद्धिजीवी करना ही नहीं चाहते। संभवत भारतीय प्रचार माध्यम सनसनी के सतही आर्थिक लाभ से संतुष्ट हैं और चाहते हैं कि यहां वैचारिक जड़ता बनी रहे।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Thursday, December 25, 2014

उत्तम राज्य प्रबंध से ही धर्म की रक्षा संभव-सुशासन पर विशेष हिन्दी लेख(uttam rajya prabandh se hi raksha sambhav-special hindi article on sushasan diwas,good governes for people




            आज 25 दिसम्बर 2014 श्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म दिन सुशासन दिवस में रूप में मनाया जा रहा है। हमारे देश में आज राज्य व्यवस्थाओं में राम राज्य की कल्पना के साकार प्रकट होने की अपेक्षा की जाती है। यह तो पता नहीं कि हमारे देश के धाार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विषयों के विशेषज्ञ सुशासन के स्वरूप और महत्व से क्या आशय लेते हैं, पर हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार शासन की व्यवस्था ही सतयुग और कलियुग की स्थिति  परिभाषित करती है।  हमारे महान विद्वान चाणक्य जी का कहना है कि राज्य के अच्छे बुरे प्रबंध से  ही प्रजा में सतयुग और कलियुग का भाव निर्मित होता है। हमारा देश बौद्धिक रूप से तत्वज्ञान के भंडार की वजह से विश्व का अध्यात्मिक गुरु माना जाता है और उसके अनुसार भी मनुष्य की दैनिक आवश्यकतायें भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती इसलिये राजधर्म में स्थित लोगोें  यह दायित्व होता है कि वह प्रजा के प्रति हमेशा सजग रहें।  हमारे यहां धर्म से आशय अच्छे व्यवहार तथा अपने कर्म का निर्वाह करने से ही है।
            हमारे यहां भगवान विष्णु के अनेक अवतार माने जाते हैं उनमें भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की चर्चा सबसे अधिक होती है।  इसका कारण यह है कि उन्होंने न केवल अध्यात्मिक रूप से समाज को संदेश दिया वरन् सांसरिक विषयों मेें भी नैतिक सिद्धांतों से कार्य करने की प्रेरणा दी।  दोनों ने ही राजधर्म का निर्वाह किया। भगवान विष्णु भी पालनहार होने की वजह से भारतीय समाज में सक्रिय इष्ट का सम्मान पाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन केवल भगवान की आराधना के लिये ही प्रेरित नहीं करता वरन् सांसरिक विषयों में भी सिद्धांतों के पालन की बात कहता है।  हमारे यहां कर्म ही धर्म माना जाता है। यही कारण है कि राज धर्म का महत्व अत्यंत बढ़ जाता है।
            हमारे यहां अभी धर्मांतरण पर बहस चल रही है।  एक प्रश्न आता है कि हमारे यहां इतने लोग धर्मांतरण क्यों कर गये? इतिहास बताता है कि मध्य युग में हमारे यहां के राजा अपने कर्तव्य से विमुख हो गये। उनके परस्पर संबंध कटु रहे।  प्रजा के प्रति उनके असंतोष का परिणाम ही रहा है कि लोग विदेशी शासकों के प्रति भी सद्भावना दिखाते रहे। हमने देखा होगा कि अनेक पुराने लोग आज भी कहते हैं कि अंग्रेजों का राज्य आज की अपेक्षा अच्छा था।  हमारे यहां विदेशी विचाराधारा और शासन के प्रति यह मोह अपने राज्य प्रबंधकों के कुशासन से उत्पन्न निराशा की वजह से विद्रोह के रूप में परिवर्तित होता रहा।  यह विद्रोह की प्रवृत्ति इतनी रही कि राज्य प्रबंधक के इष्ट और पूजा पद्धति से प्रथक जाकर समाज में अलग पहचान दिखने की प्रेरक बन गयी।
            अध्यात्मिक ज्ञान के अभ्यास से हमारी समझ तो यह बनी है कि संसार में जितने भी कथित संज्ञाधारी धर्म बने हैं वह राज्य के प्रेरणा से बने हैं।  दरअसल ऐसे संज्ञाधारी धर्म भ्रम फैलाने के लिये ही प्रकट किये गये हैं ताकि पूजा पद्धति के माध्यम से लोगों में आपसी संघर्ष कराकर राज्य प्रबंध की नाकामियों से उनका ध्यान हटाया जाये।  हमारे देश में धर्म से आशय कर्म तथा व्यवहार से है। किसी भी प्राचीन ग्रंथ में धर्म का कोई नाम नहीं है।  अच्छा राजा भगवान का दूसरा  रूप माना गया है। इसके विपरीत विदेशी विचारधाराओं के शीर्ष पुरुषं पूजा पद्धतियों से नये लोग जोड़कर अपने समाज को यह जताते रहे है कि वह अपने कथित धर्म को ही श्रेष्ठ माने। यही कारण है कि आज विदेशों में धर्म के नाम पर संघर्ष आज भी जारी है।
            हमारे यहां राजधर्म बृहद धर्म का ही एक उपभाग माना जाता है।  राजधर्म में स्थित लोग अगर अपने कर्म का निर्वाह उचित रूप से करें तो प्रजा में उनकी छवि अच्छी बन सकती है।  धर्म की रक्षा में मध्यम वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है पर हम देख रहे हैं कि वह अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है। धनिक वर्ग अपनी प्रभुता के मोह तथा अहकार में तल्लीन है।  निम्म वर्ग के लिये भी हर पल संकट मुंह बायें रहता है। हमारा मानना है कि हमारे यहां इस समय संकट इसलिये अधिक क्योंकि समाज को स्थिर रखने वाला मध्यम वर्ग स्वयं ही अस्थिर हो गया है।  हमारा यह भी मानना है कि राज्य प्रबंध सुशासन का रूप ले तो हमारे देश में विदेशी विचारधाराओं के साथ उनके प्रवाह के लिये लालायित लोगों का प्रभाव स्वतः कम हो जायेगा तब किसी अन्य प्रयास की आवश्यकता नहीं होगी। अगर इस प्रयास में कमी रहेगी तो बाकी अन्य प्रयास न केवल विवाद खड़े करेंगे बल्कि मजाक भी बनेगा।
            माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनके जन्म दिन पर बधाई।
)
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, December 20, 2014

दूसरे को सुधारने की बजाय स्वयं सुधरें-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(doosron ko sudharne ki bajay swayan sudhren-A Hindu hindi religion article)



            जब राज्य समाज या धार्मिक विषय पर नियंत्रण करता है तब क्या स्थिति होती है यह अब विश्व में व्याप्त आतंकवाद के रूप में देख सकते हैं।  विश्व में राज्य कर्म का निर्वाह करने वालों में सामर्थ्य का अभाव होता है और वह अपना पद बचाये रखने के लिये लोगों को धर्म के आधार पर नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं।  अनेक स्थानों पर आधुनिक  राज्य व्यवस्थाओं में अपात्रों का प्रवेश हो गया है। धन, बल और चतुराई से राजपद पाने वालों को राजनीति के जनहित सिद्धांत का ज्ञान ही नहीं होता। इस विश्व के 180 देशों में साठ से अधिक देश धर्म आधारित होने का दावा करते हैं और इन्हीं देशों में हिंसक वातावरण बना हुआ है। इन देशों में धर्म के नाम पर जो ध्ंाधा चल रहा है उससे पूरा विश्व आतंकवाद की चपेट में है। इनकी विचारधारा की दृष्टि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन मूर्तिपूजा समर्थक है इसलिये अवांछनीय है जबकि इन्हीं देशों में सर्वशक्तिमान के नाम पर सबसे अधिक पाखंड है।
            हमारे देश में भारतीय समाज में अनेक विरोधाभास है पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के प्रभाव के चलते यहां हिंसक द्वंद्व अधिक नहीं होते। हमारे भारतीय धर्म की रक्षा का दावा अनेक  लोग तथा उनके समूह करते हैं पर सत्य यह है कि वह भारत में व्याप्त भ्रमों के निवारण का प्रयास नहीं करते। अक्सर कहा जाता है कि भारत में दूसरे देशों की जनता से अधिक सोना है।  यह हैरानी की बात है कि कथित बहुमूल्य धातुऐं भी पत्थर समान है यह बात कोई नहीं समझता।  प्रकृति ने हमें अन्य देशों की अपेक्षा अधिक संपन्न बनाया है पर उसके जल और अन्न को मूल्यवान मानने की बजाय सोना और हीरा पर  अपना हृदय न्यौछावर करते हैं।  विवाह और शोक के अवसर पर धन खर्च कर कथित सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का ऐसा प्रयास करते हैं जिसका कोई तार्किक आधार नहीं होता।
चाणक्य नीति में कहा गया है
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पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
मूढैं: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।
            हिन्दी में भावार्थ-इस धरती पर जल, अन्न और मधुर वचन यह तीन प्रकार के ही रत्न हैं मूर्ख लोग पत्थरों को रत्न कहते हैं।
            हमारे यहां जाति के आधार पर बहुत वैमनस्य रहा है।  यही कारण है कि हमारे यहां विदेशी धार्मिक विचाराधाराओं ने पदार्पण किया।  यहां अल्प धनिक, श्रमिक तथा निम्न वर्ण के लोगों को अपमानित करने की भयंकर प्रवृत्ति है। दूसरे के  दोषों पर कठाक्ष कर अपनी योग्यता प्रमाणित करने का प्रयास सभी करते हैं पर किसी की प्रशंसा करने का मन किसी का नहीं करता। हमारा मानना तो यह है कि  विदेशी धार्मिक विचाराधारा के धारकों  पर टिप्पणियां करने या उनमें सद्भाव पैदा करने के प्रयासों से अच्छा है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन पर चलने वाले समाजों में मानसिक शक्ति का प्रवाह करें।  हम दूसरे को सुधारने की बजाय स्वयं दृढ़ पथ का अनुसरण करें।  यह पथ उपभोग के शिखर पर पहुंचकर पताका फहराने वाला नहीं वरन् त्याग का है।  जहां विदेशी धार्मिक विचाराधारायें मनुष्य, प्रकृत्ति तथा अध्यात्मिक ज्ञान से परे हैं वहीं हमारा दर्शन तत्वज्ञान का ऐसा भंडार है जिसे कोई प्राप्त कर ले तो उसका जीवन धन्य हो जाये।  विदेशी विचाराधाराऐं मनुष्य की पहचान एक छतरी के नीचे दिखाना चाहती हैं पर प्रकृति तथा जीव विज्ञान विविधताओं के आधार पर सृष्टि की जानकारी देता है।  हर जीवन का स्वभाव, रहन सहन तथा आचार विचार धरती पर  अलग अलग समय पर सक्रिय भिन्न भिन्न तत्वों से संपर्क होने से बदलता रहता है। सभी मनुष्य एक जैसे  नहीं हो सकते और सभी समय एक जैसे भी नहीं हो सकते।
            अतः जहां तक हो सके देश के साधु, संतो, बुद्धिमानो तथा समाज सुधारक अपने समाज में ज्ञान चक्षु खोलने का काम करें।  यही सच्चा धर्म ज्ञानियों का है।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Sunday, December 07, 2014

योग के आठ भागों में चरम शिखर है समाधि-हिन्दी चिंत्तन लेख(yog ka aath bhagon mein charam shikhar hai samadhi-hindi thought article)



            पतंजलि योग साहित्य के अनुसार सात भागों से गुजरने के बाद आठवां और अंतिम भाग समाधि है। योग के विषय के व्यापक संदर्भों में पतंजलि योग साहित्य ही एकमात्र प्रमाणिक सामग्री प्रदान करता है।  हमने कथित रूप से अनेक लोगों से सुना है कि अमुक गुरु समाधि में प्रवीण थे या अमुक संत को इस विषय में विशेषज्ञता प्राप्त है।  अनेक लोग तो कहते हैं कि हिमालय की कंदराओं में कई ऐसे योगी है जो समाधि में दक्ष हैं।  जब हम पतंजलि योग साहित्य का अध्ययन करते हैं तो लगता है कि इस तरह की बातें केवल प्रमाणिक नहीं है।  समाधि योग का चरम शिखर है।  एक तरह से योग साधना की आहुति समाधि ही है।
            ऐसे में अनेक प्रश्न दिमाग में आते हैं। हम जिन लोगों की समाधि विषयक योग्यता के बारे में सुना है उनकी बाकी सात भागों में सक्रियता की चर्चा नहीं होती।  आसन और प्राणायाम का भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है।  वैसे हम आसनों की बात करें तो अब अनेक प्रकार के व्यायाम भी इनके साथ वैज्ञानिक ढंग से इसलिये जोड़े गये हैं क्योंकि पहले समाज श्रम आधारित था पर अब सुविधा भोगी हो गया जिससे लोगों को दैहिक शुद्ध करायी जा सके।  यह व्यायाम रूपी आसान इसलिये वैज्ञानिक हैं क्योंकि इस दौरान सांसो के उतार चढ़ाव का-जिसे प्राणायाम भी कहा जाता है- अभ्यास भी कराया जाता है।  एक तरह से आसन और प्राणायाम का संयुक्त रूप बनाया गया है। पतंजलि योग में प्राणायाम में प्राण रोकने और छोड़ने का अभ्यास ही एक रूप माना गया है। आसन से आशय भी सुखासन, पद्मासन या वज्रासन पर बैठना है। बहुत सहज दिखने वाली आसन और प्राणायाम की प्रक्रिया तब बहुत कठिन हो जाती है जब मनुष्य के मन और देह पर भोग प्रभावी होते हैं। योगाभ्यास के  दौरान देह से पसीना निकलता ही जिससे देह के विकार बाहर आते हैं पर सवाल यह है कि इसे करते कितने लोग हैं? जिनके बारे में समाधि लगाने का दावा किया जाता है वह पतंजलि योग के कितने जानकार होते हैं यह पता ही नहीं लगता।
            यहां हम बता दें कि भक्ति के चरम को छूने वाले अनेक संतों ने तो योग साधना को भी बेकार की कवायद बताया है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन संतों ने भक्ति का शिखर अपने तप से पाया पर सच यह है कि वह भक्ति भी उसी तरह सभी के लिये कठिन है जैसे कि योग साधना।  दूसरी बात यह है कि इन महापुरुषों ने योग साहित्य का अध्ययन न कर केवल तत्कालीन समाज में ऐसे योगियों को देखा था जिनका स्वयं का ज्ञान अल्प था।  अगर इन महापुरुषों ने योग साधना का अध्ययन किया होता तो वह जान पाते कि जिस भक्ति के शिखर को उन्होंने पाया है वह समाधि का ही रूप है और कहीं न कहीं उन्होंने अनजाने में ही योग के आठों भागों को पार किया था।  योग साहित्य से इन महापुरुषों की अनभिज्ञता का प्रमाण यह है कि वह योग को तीव्र या धीमी गति से प्राणवायु को ग्रहण या त्यागने की प्रक्रिया  ही मानते थे जो कि योग साधना का केवल एक अंशमात्र है।  यह अलग बात है कि इन महापुरुषों के  कथनों को भक्ति की सर्वोपरिता बताने वाले आज के पेशेवर संत उन भक्तों के सामने दोहराकर वाहवाही लूटते हैं जो देह मन और बुद्धि के विकारों से ग्रसित हैं। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है।  जब वात, पित और कफ के कुपित से पीड़ित समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग हो तब हार्दिक भक्ति करने वाले मिल जायेंगे यह सोचना भी व्यर्थ है।
            हमने ऐसे लोग भी देखें हैं जो योग साधना प्रारंभ करते हैं तो कथित धार्मिक गुरू उन्हें ऐसा करने से रोक देते हैं।  अनेक गुरु तो यह कहते हैं कि योग साधना से कुछ नहीं होता। बीमारी दवा से जाती है और भगवान भक्ति से मिलते हैं।  यह प्रचार भयभीत और कमजोर लोगों के दिमाग की देन है।  मूलतः सभी जानते हैं योग साधना से व्यक्ति में एक नयी स्फूर्ति आने के साथ ही उसके मन मस्तिष्क में आत्मविश्वास पैदा होता है जिससे वह किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहता। इसलिये कायर और कमजोर लोग आलस्यवश न केवल स्वयं योग साधना से दूर रहते हैं बल्कि दूसरों में भी नकारात्मक भाव पैदा करते हैं।
            योग साधना की बातें सभी करते हैं पर महर्षि पतंजलि योग के सूत्रों का पढ़ने और समझने की समझ किसमें कितनी है यह तो विद्वान लोग ही बता सकते हैं।  हमारा एक अनुभव है कि जो नित्य योग साधना करते हैं उन्हें इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिये। जिस तरह आसना के समय सांसों के अभ्यास से दोनों काम होते हैं उसी तरह योग सूत्र पढ़ने पर हम उनसे होने वाले लाभों को पढ़कर अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि समाधि विषयक भ्रम दूर हो जाते हैं।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, November 28, 2014

स्वयं खुद समझे नहीं दूसरों को ज्ञानी बनाते हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख(swyan samajhe nahin doosron ko samjhate hain-hindi thought article)



            अभी हाल ही में शैक्षणिक जगत में संस्कृत को एच्छिक भाषा के रूप में पढ़ाने के  एक सरकारी निर्णय पर प्रचार माध्यमों ने बहुत शोर मचाया था।  दरअसल हमारे यहां आजादी के बाद प्रगतिशील तथा जनवादी लेखकों के प्रभाव के चलते बौद्धिक क्षेत्र में एक ऐसी विचाराधारा का निर्माण हुआ है जो मानती है कि मुगल, फ्रांसिसी और अंग्रेजों के आने से पहले यहां का समाज असभ्य था।  आज की सभ्यता विदेशी कृपा का परिणाम है। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को एकदम असभ्य तथा जंगली मान लेने की प्रवृत्ति के कारण हमारे देश के व्यवसायिक बौद्धिक क्षेत्र में ऐसे लोगों की बहुलता है जिनको अंग्रेजी, जर्मन, फ्रैंच महान भाषायें लगती हैं तो संस्कृत बीते समय की एक खंडहर लगती है।

            हमारे देश में समाज का बौद्धिक वर्ग दो भागों में बंटा है। एक तो जिसने आधुनिक शिक्षा प्राप्त की पर आज भी वह भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के आधारों पर चलना पसंद करता है दूसरा वह है जो पूरी तरह से अंग्रेेज दिखना चाहता है।  भारतीय बौद्धिक क्षेत्र में ऐसे ही लोगों की बाहुल्ता है। यही कारण है कि शिक्षा पद्धति में जहां भी प्राचीन भारतीय तत्व जोड़ने का विचार आता है वहां उसका विरोध प्रारंभ हो जाता है।
संत कबीर कहते हैं कि
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धरती अम्बर न हता, को पंडित था पास।
कौन मुहूरत था थापिया, चांद सूरज आकास।।
            हिन्दी में भावार्थ-जब न धरती थी न यह आकाश तब कौन सा पंड़ित था जब आकाश में सूरज और आकाश स्थापित किये गये।
पढ़ि पढ़ि और समुझावई, खोजि न आप सरीर।
आपहि संशय में पड़े, यूं कहि दास कबीर।।
            हिन्दी में भावार्थ-किताब पढ़कर स्वयंभू विद्वान दूसरों को समझाते हैं पर उन्हें अपने शरीर का ज्ञान नहीं रहता। वह तो स्वयं ही संशय में पड़े रहते हैं।

            हमारे देश में बौद्धिक क्षेत्र में सक्रिय पेशेवर लोग स्वयं को सिद्ध मानते हैं।  आधुनिक शिक्षा में संपन्न होने के बाद धनवान, उच्च पदस्थ तथा कुशल बौद्धिक प्रबंधकों के सानिध्य की वजह से उनको लगता है वह पश्चिमी तात्विक ज्ञान धारण करने में सक्षम हो गये हैं और भारतीय ज्ञान तो केवल उन पेशेवर संतों की पूंजी है जिन पर अक्सर वह सनसनी खेज सामग्री प्रसारित करने का अवसर पाते हैं। समाज सुधार के प्रति अपनी निष्ठ यह लोग इस तरह दिखाते हैं कि उनसे पहले कोई ऐसा प्रयास नहीं हुआ।  हमारे देश के ही अध्यात्मिक विद्वानों ने समय समय पर देश के अंधविश्वासों तथा रूढ़वादिता को निशाना बनाया है यह बात उनके समझ में नहीं आती।  यह अलग बात है कि इन बुद्धिमानों के सानिध्य में ही प्रचार माध्यम ज्योतिष के नाम पर अंधविश्वास का प्रचार करते हैं।  अपनी व्यवसयिक बाध्यताओं को वह छिपाते हैं पर अंततः वह बाहर दिख ही जाती हैं। एक तरफ समाज सुधार से कथित प्रतिबद्धता का पाखंड दूसरी तरफ विज्ञापनों प्रसारण की बाध्यता कि बीच इनका सतही ज्ञान सहजता से देखा जा सकता है।
            

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Saturday, November 15, 2014

म्लेच्छ लोगों से सतर्क रहें-हिन्दी चिंत्तन लेख(mlechchha logon se satark rahen-hindi though article)



            आजकल हम अपने देश में एक खराब प्रवृत्ति देख रहे हैं कि अपनी समस्याओं, दुर्घटनाओं तथा बुरे व्यवहार से उपजे क्रोध का का लोग सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं-इस दौरान वाहनों को जलाने, प्रहरियों पर पत्थर फैंकने तथा राहगीरों का मार्ग अवरूद्ध कर उन्हें मारने पीटने तक के समाचार आते हैं।  अनेक ऐसे भी समाचार आये कि अनेक शहरों में सेना तथा पुलिस भर्ती के लिये आये युवकों ने अपनी  निराशा का आक्रामकता का प्रदर्शन  करते हुए  सार्वजनिक संपत्ति को न केवल हानि पहुंचाई वरन् राहगीर महिलाओं के साथ अभद्रता भी की।  अनेक बार ऐसे समाचार भी आते हैं कि किसी वाहन से कोई राहगीर कुचल जाता है तो वहां के स्थानीय निवासियों में शािमल कुछ असामाजिक तत्व वाहन जलाने, दुकाने लूटने और प्रहरियों पर पत्थर बरसाने लगते हैं। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन इस तरह की प्रवृत्ति को म्लेच्छ प्रवृत्ति का मानता है। यह बात समझ लेना चाहिये।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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वापल-कूप-तडागानामारा-सुर-वेश्मनाम्।
उच्छेदने निराऽशङ्कः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते।।
            हिन्दी में भावार्थ-बावडी, कुंआ, वाटिका तथा देवालय में तोड़ फोड़ करने पर जिसे डर नहीं उसे म्लेच्छ कहा जाता है।

            समाज के निराशा का वातावरण जो बना है उसके लिये लोगों का अति आशावाद भी जिम्मेदार है। सभी लोग यह चाहते हैं कि  वह धनी और सुविधासंपन्न हो जायें।  हर कोई नौकरी करना चाहता है।  स्वाभिमानी सभी दिखना चाहते हैं पर स्वामित्व की प्रवृत्ति बहुत कम लोग में पाई जाती है। दूसरे के सामान पर विलासिता मिल जाये या फिर चाहे जैसे भी हो हमारी सभी जगह तूती बोले, इस तरह की सोच ने लोगों का अन्मयस्क बना दिया है।  जैसा कि देखा गया है कि धनी तथा प्रसिद्ध लोगों प्रभाव राजकीय संस्थाओं पर है जिसका लाभ उन्हें मिलता है, वैसा स्वयं को न मिलने पर आमजन क्रुद्ध रहते हैं।  इसलिये स्वयं को शक्तिशाली दिखाने के लिये  अनेक असामाजिक तत्व सदैव तत्पर रहते हैं और जहां आमजन को उत्तेजत करने का अवसर मिले वह अपने साथ साफ करते हैं।  इस तरह के हिंसक प्रदर्शन को  जन उपद्रव का नाम दिया जाता है पर सच  यह है कि दुकानें लूटना और आग लगाने का काम अपराधी ही करते हैं जिनका लक्ष्य अपना हित साधना होता है।  हमें ऐसे म्लेच्छ प्रवृत्ति के लोगों की पहचान कर उनसे सतर्क रहना चाहिये।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Saturday, October 04, 2014

पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन-नया विषय सामने आने पर विवेक संयम योग करें(naya vishay samane ane par vivek sanyam yog karen-A hindu hindi thohght article on patanjali yog sahitya)



            यह मानवीय स्वभाव है कि जब वह अपने सामने किसी दृश्य, व्यक्ति या वस्तु को देखता है तो उस पर अपनी तत्काल प्रतिक्रिया देने या राय कायम करने को तत्पर हो जाता है। इस उतावली में अनेक बार मनुष्य के मन, बुद्धि तथा विचारों में भ्रम तथा तनाव के उत्पन्न होता है।  इस तरह की प्रतिक्रिया अनेक बार कष्टकर होती है और बाद में उसका पछतावा भी होता है।
            वर्तमान समय में हमारे यहां युवा वर्ग में जिस तरह रोजगार, शिक्षा तथा कला के क्षेत्र में शीघ्र सफलता प्राप्त करने के लिये सामूहिक प्रेरणा अभियान चल रहा है उसमें धीरज से सोचकर काम करने की कला का कोई स्थान ही नहीं है।  लोग अनेक तरह के सपने तो देखते हैं पर उन्हें पूरा करने की उनको उतावली भी रहती है। यही कारण है कि सामान्य लोगों में  धीरज रखने की प्रवृत्ति करीब करीब समाप्त ही हो गयी है।  जिस कारण नाकामी मिलने पर अनेक लोग भारी कष्ट के कारण मानसिक संताप भोगते हैं।

पतंजलि योग में कहा गया है कि
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क्षणत्तक्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम्।
            हिन्दी में भावार्थ-क्षण क्षण के क्रम से संयम करने पर विवेकजनित ज्ञान उत्पन्न होता है।

जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः।
            हिन्दी में भावार्थ-जिन विषयों का जाति, लक्षण और क्षेत्र का भेद नहीं किया जा सकता उस समय जो दो वस्तुऐं एक समान प्रतीत होती हैं उनकी पहचान विवेक ज्ञान से की जा सकती है।

            प्रकृति ने मनुष्य और पशुओं के बीच अंतर केवल विवेक शक्ति का ही रखा है।  मन, बुद्धि तथा अहंकार तो पशुओं में भी पाये जाते हैं पर अपने से संबद्ध विषय की भिन्नता, उनके  लक्षण तथा  उपयोग करने की इच्छा का निर्धारण करने की क्षमता केवल मनुष्य में ही है।  इसके लिये आवश्यक है कि जब मनुष्य के सामने कोई वस्तु, विषय या व्यक्ति दृश्यमान होता है तब उस पर संयम के साथ हर क्षण दृष्टि जमाये रखना चाहिये। यह क्रिया तब तक करना चाहिये जब तक यह तय न हो जाये कि उस दृष्यमान विषय की प्रकृत्ति, लक्षण तथा उससे संपर्क रखने का परिणाम किस तरह का हो सकता है?
            इसे हम विवेक संयम योग भी कह सकते हैं।  ऐसा अनेक बार होता है कि हमाने सामने दृश्यमान विषय के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती।  एक साथ दो विषय समान होने पर यह निर्णय लेना कठिन हो जाता है कि उनकी प्रकृति समान है या नहीं! अनेक अवसर पर किसी भी विषय, वस्तु तथा व्यक्ति की मूल प्रंकृत्ति, रूप तथा भाव को छिपाकर उसे हमारे सामने इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि वह हमें अनुकूल लगे जबकि वह भविष्य में उसके हमारे प्रतिकूल होने की आशंका होती है।
            इनसे बचने का एक ही उपाय है कि हमारे सामने जब कोई नया विषय, वस्तु या व्यक्ति आता है तो पहले उस पर बाह्य दृष्टि के साथ ही अंतदृष्टि भी लंबे क्षणों तक केंद्रित करें।  प्रतिक्रिया देने से पहले निरंतर हर क्षण संयम के साथ उस पर विचार करें। धीमे धीमे हमारा विवेक ज्ञान जाग्रत होता है  जिससे दृश्यमान विषय के बारे में वह ज्ञान स्वाभाविक रूप से  होने लगता है जो उसके पीछे छिपा रहता है। इस हर क्षण संयम रखने की प्रक्रिया को हम विवेक योग भी कह सकते हैं।     

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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