समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Thursday, September 27, 2012

योग साधना से तन, मन और विचार का मेल निकलता है-हिंदी चिंत्तन

 
         तन का मैल नहाने और मन का मैल भक्ति से निकलता है, अक्सर प्रवचनकर्ता यह बात कहते हैं।  यह बरत सही भी है। जब हम अपनी देह और मन के विषय पर आत्ममंथन करते हैं तो पाते हैं कि कछ कमी रह जाती है। हम जमकर नहायें और हृदय से भक्ति करने का प्रयास भी करें तब भी लगता है कि कुछ छूट रहा है। इसका उपाय हमारे समझ में नहीं आता। यह कमी क्या है? क्यों रह जाती है।
    दरअसल हमारी देह गुणों के वशीभूत है। हम प्रतिदिन जो खाते हैं वह मल के रूप में हमारे अंदर विराजमान रहता ही है। महान नीति विशारद चाणक्य का कहते हैं कि हमारे निष्कासन अंग कभी पूरी तरह स्वच्छ नहीं रहते।
    यह मल हमारे मन मस्तिष्क को प्रभावित करता है। इससे बचने का उपाय है योग साधना।  सुबह या शाम हम जब मल विसर्जन करते हैं तब लगता है कि हमारी देह अंदर से स्वच्छ हो गयी पर ऐसा होता नहीं है। योग साधना का अनुभव होने पर यह पता चलता है कि हमारे अंदर मल बहुत बड़ी मात्रा में रह जाता है जो अंततः दैहिक तथा मन के विकारों को उत्पन्न करता है। श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार मनुष्य का मन, बुद्धि तथा देह गुणों के वशीभूत है। जब देह में विकार होत तो मन और बुद्धि में शुद्धता और पवित्रता की आशा करना व्यर्थ है।  दरअसल अपनी देह को एक दुष्टा की तरह देखने की आवश्यकता है।  हम अनेक बार तनाव तथा अशांति के दौर में पहुंच जाते हैं तब मानसिक संताप से स्वयं को कष्ट पहुंचाने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। इससे बचने के उपाय के रूप  में योग साधना एक महत्वपूर्ण उपाय है।
  
नियमित योग साधना को अनेक लाभ होते है। एक समय ऐसा भी आता है जब हमारी देह इतनी आदी हो जाती है तब यह लगता है कि अब कोईलाभ नहीं हो रहा है, पर यह सोच गलत है। दरअसल कोई दवाई लेने से आदमी स्वस्थ होता है तो उसकी अनुभूति प्रत्यक्ष की जा सकते है मगर योगासन, ध्यान और प्राणायाम से जो स्वास्थ में निरंतरता बनी रहती है इसलिए कुछ नयापन नहीं लगता।  नियमित योग साधना करते हुए हमें यह भी सोचना चाहिये   हम उन हानियों से भी बचे रहते हैं जो इसका अभ्यास न करने पर पहुंचती हैं।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका




Saturday, September 15, 2012

कौटिलय का अर्थशास्त्र-बिना ज्ञान के राजकर्म करना भी अनुचित (politcs activty without knowledge-economics of kautilya)

           मूलतः हर मनुष्य में दूसरे पर शासन करने की प्रवृत्ति होती है जो अंततः अहंकार की अग्नि से पैदा होती है। यह बुरा भी नहीं है पर जिस मनुष्य में अपने शासित लोगों का हित करने की बजाय उनका दोहन करने का लक्ष्य होता है  वह उसको भ्रष्ट, निकृष्ट और दुष्ट बना देता है। आधुनिक लोकतंत्र ने पूरे विश्व में राजनीति शास्त्र की बजाय केवल नारे देने वालों को राज्य पद पर प्रतिष्ठित करना प्रारंभ किया है।  इतना ही नहीं राजनीति की बजाय अन्यत्र विषयों में पारंगत और प्रतिष्ठित लोगों के लिये राजकाज में आने की प्रवृत्ति बढ़ी है।  कहने का अभिप्राय यह है कि राजनीति से अनभिज्ञ लोग राजधर्म से भी अनभिज्ञ होते हैं और जब वह राजकाज करते हैं तो वह उसमें वह सफल नहीं हो पाते।  इसके परिणाम प्रजा को भोगने पड़ते हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
-----------------
शास्त्रचक्षुनृपस्तस्मान्महामात्यमते स्थितः।
धर्मार्थप्रतिपातीनि व्यसननि परित्येत्।।

                ‘हिन्दी में भावार्थ-किसी भी राज्य प्रमुख के पास शास्त्रों का ज्ञान होना आवश्यक है।  उसे हमेशा ही योग्य मंत्रियों के साथ दिखना चाहिए।  धर्म और अर्थ के लिये घातक व्यसनों को वह त्याग दे।
      राज्य करना भी एक तरह से कला है।  जिस तरह समाज में कला का व्यवसायीकरण हुआ है वैसे ही राजनीति भी पेशा बन गयी है।  अनेक लोग तो अपने राजनीति से इतर व्यवसायों, संगठनों तथा सामाजिक हितों की रक्षा के लिये पदारूढ़ होने की  कामना करते हैं।  वह सफल भी होते हैं। उनका लक्ष्य केवल पद पर बैठकर अपने तथा परिवार की रक्षा करना होता है इसलिये प्रजाहित की न तो उनमें दिलचस्पी रहती है न ही कोई वह योजना बनाते हैं।  इसी कारण पूरे विश्व में भ्रष्टाचार और अराजकता का वातावरण बन गया है।  अलबत्ता पद बचाये रखने के लिये ऐसे लोग  नारे अवश्य दिया करते हैं।  यही कारण है कि इस समय विश्व के अनेक देशों में असंतोष का वातावरण बन गया है।  अनेक जगह खूनी संघर्ष चल रहे हैं।  अनेक राज्य प्रमुख अपने ही देश के विद्रोहियों से जान बचाते फिर रहे हैं। यह राज्य प्रमुख केवल बंदूक के सहारे पदों पर आ गये पर जनहित करने की समझ उनमें कभी नहीं दिखी। हमारे देश को अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता मिले साठ साल से अधिक समय हो गया है पर आज भी अनेक विद्वान मानते हैं कि अधूरी आजादी ही मिली है।  इसलिये राजनीति में सक्रिय होने वाले लोगों को पहले राजनीति शास्त्र का अध्ययन करना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Sunday, September 09, 2012

पतंजलि योग विज्ञान-सुख का योग दुःख से है (patanjali yog vigyan or scince-sukh aur dukh ka yoga)

         पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार प्रकृति स्वतः विराजती हैं। मनुष्य का मन तो अत्यंत चंचल माना जाता है। यही मन मनुष्य का स्वामी बन जाता है और जीवात्मा का ज्ञान नहीं होने देता। अध्यात्म के ज्ञान के अभाव में सांसरिक क्रियाओं के अनुकूल मनुष्य प्रसन्न होता है तो प्रतिकूल होने पर भारी तनाव में घिर जाता है। मकान नहीं है तो दुःख है और है उसके होने पर सुख होने के बावजूद उसके रखरखाव की चिंता भी होती है। धन अधिक है तो उसके लुटने का भय और कम है नहीं है या कम है, तो भी सांसरिक क्रियाओं को करने में परेशानी आती है मनुष्य सारा जीवन इन्हीं  अपनी कार्यकलापों के अंतद्वंद्वों में गुजार देता है। विरले ज्ञानी ही इस संसार में रहकर हर स्थिति में आनंद लेते हुए परमात्मा की इस संसार रचना को देखा करते हैं। अगर किसी वस्तु का सुख है तो उसके प्रति मन में राग है और यह उसके छिन जाने पर क्लेश पैदा होता है। कोई वस्तु नहीं है तो उसका दुःख इसलिये है कि वह दूसरे के पास है। यह द्वेष भाव है जिसे पहचानना सरल नहीं है। मृत्यु का भय तो समस्त प्राणियों को रहता है चाहे वह ज्ञानी ही क्यों न हो। मनुष्य का पक्षु पक्षियों में भी यह भय देखा जाता है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
-------------------
सुखानुशयी रागः।
‘‘सुख के अनुभव के पीछे रहने वाला क्लेश राग है।’’
‘‘दुःखानुशयी द्वेषः।
‘‘दुःख के अनुभव पीछे रहने वाला क्लेश द्वेष है।’’
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूडोऽभिनिवेशः।।
            ‘‘मनुष्य जाति में परंपरागत रूप से स्वाभाविक रूप से जो चला आ रहा है वह मृत्यु का क्लेश ज्ञानियों में भी देखा जाता है। उसे अभिनिवेश कहा जाता है।’’
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।
           ‘‘ये सभी सूक्ष्मावस्था से प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करने योग्य हैं।’’
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।
‘‘उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नष्ट करने योग्य हैं।’’
       इस तरह अंतद्वंद्वों में फंसी अपनी मनस्थिति से बचने का उपाय बस ध्यान ही है। ध्यान में जो शक्ति है उसका बहुत कम प्रचार होता है। योगासन, प्राणायाम और मंत्रजाप से लाभ होते हैं पर उनकी अनुभूति के लिये ध्यान का अभ्यास होना आवश्यक है। दरअसल योग साधना भी एक तरह का यज्ञ है। इससे कोई भौतिक अमृत प्रकट नहीं होता। इससे अन्तर्मन   में जो शुद्ध होती है उसकी अमृत की तरह अनुभूति केवल ध्यान से ही की जा सकती है। इसी ध्यान से ही ज्ञान के प्रति धारणा पुष्ट होती है। हमें जो सुख या दुःख प्राप्त होता है वह मन के सूक्ष्म में ही अनुभव होते हैं और उनका निष्पादन ध्यान से ही करना संभव है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, August 29, 2012

शरीर की सफाई से बीमारी दूर होती है-ऋग्वेद से सन्देश (rigved se sandesh-sharir ki safai se bimari door hotee hai)

                      हमारे वेदों में अनेक ऐसी बातें कही गयी हैं जिनका महत्व इस संसार में कभी महत्व नहीं होता।  इसका कारण यह है कि इस संसार में समय के साथ भौतिक स्वरूप के साथ ही लोगों के रहन सहन, चाल चलन तथा कार्य करने के तरीकों में बदलाव तो संभव है पर उसके अंदर की मूल प्रकृतियों का निवास स्थाई रूप से रहता है।  इन मूल प्रकृतियों तथा उनकी निवृति के ज्ञान का (जिसे हम अध्यात्मिक विज्ञान भी कह सकते हैं) जो वर्णन इन वेदों में वर्णित है।  उनकी विषय सामग्री का  अध्ययन चाहे जब किया जाये उनमें नवीनता बनी रहती है।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
---------------
ब्रह्माद्विषः अवजहि।
हिन्दी में अर्थ-‘‘ज्ञान से द्वेष करने वाले को मार।’’
अहः अहःशुन्ध्युः परिपदां।।’’
हिन्दी में अर्थ-‘‘नित्य स्वच्छता रखने वाला रोगों को दूर करता है।’’
             अधिकतर लोग धार्मिक कर्मकांडों को ही अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं पर आध्यात्मिक ज्ञान उनके लिये बुढ़ापे में जानने वाला विषय होता है जबकि इसका ज्ञान अगर बचपन से हो जाये तो जिंदगी आराम से बिताई जा सकती है। इसका कारण यह है कि सांसरिक विषयों से संबंध तो बचपन से ही हो जाता है और अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव आम मनुष्य उसमें इस तरह लिप्त हो जाता है कि उसके लिये सुख कम दुःख अधिक प्रकट होते हैं।  अधिकतर मनुष्यों के  अंदर अहंकार मोह तथा लोभ की  प्रकृतियां विद्यमान रहती हैं जो उसे ज्ञान से परे रखती है।  यह प्रकृतियां ज्ञान से द्वेष करती हैं।  ज्ञानी से चिढ़ाती हैं।
           अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में आदमी की न  केवल देह  बल्कि मन तथा विचारों में भी अस्वच्छता का वास हो जाता है।  इस तरह की समस्या से बचने का उपाय यही है कि  हम अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर अपनी बुद्धि, विचार तथा मन को शुद्ध रखने का प्रयास करें।
---------------
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Sunday, August 19, 2012

पतंजलि योग विज्ञान सूत्र-चित्त को एकाग्र कर मानसिक क्लेश कम करें (patanjali yog vigyan sootra-chitta aur klesh)

         पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार प्रकृति स्वतः विराजती हैं। मनुष्य का मन तो अत्यंत चंचल माना जाता है। यही मन मनुष्य का स्वामी बन जाता है और जीवात्मा का ज्ञान नहीं होने देता। अध्यात्म के ज्ञान के अभाव में सांसरिक क्रियाओं के अनुकूल मनुष्य प्रसन्न होता है तो प्रतिकूल होने पर भारी तनाव में घिर जाता है। मकान नहीं है तो दुःख है और है उसके होने पर सुख होने के बावजूद उसके रखरखाव की चिंता भी होती है। धन अधिक है तो उसके लुटने का भय और कम है नहीं है या कम है, तो भी सांसरिक क्रियाओं को करने में परेशानी आती है मनुष्य सारा जीवन इन्हीं  अपनी कार्यकलापों के अंतद्वंद्वों में गुजार देता है। विरले ज्ञानी ही इस संसार में रहकर हर स्थिति में आनंद लेते हुए परमात्मा की इस संसार रचना को देखा करते हैं। अगर किसी वस्तु का सुख है तो उसके प्रति मन में राग है और यह उसके छिन जाने पर क्लेश पैदा होता है। कोई वस्तु नहीं है तो उसका दुःख इसलिये है कि वह दूसरे के पास है। यह द्वेष भाव है जिसे पहचानना सरल नहीं है। मृत्यु का भय तो समस्त प्राणियों को रहता है चाहे वह ज्ञानी ही क्यों न हो। मनुष्य का पक्षु पक्षियों में भी यह भय देखा जाता है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
-------------------
सुखानुशयी रागः।
‘‘सुख के अनुभव के पीछे रहने वाला क्लेश राग है।’’
‘‘दुःखानुशयी द्वेषः।
‘‘दुःख के अनुभव पीछे रहने वाला क्लेश द्वेष है।’’
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूडोऽभिनिवेशः।।
            ‘‘मनुष्य जाति में परंपरागत रूप से स्वाभाविक रूप से जो चला आ रहा है वह मृत्यु का क्लेश ज्ञानियों में भी देखा जाता है। उसे अभिनिवेश कहा जाता है।’’
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।
           ‘‘ये सभी सूक्ष्मावस्था से प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करने योग्य हैं।’’
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।
‘‘उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नष्ट करने योग्य हैं।’’
       इस तरह अंतद्वंद्वों में फंसी अपनी मनस्थिति से बचने का उपाय बस ध्यान ही है। ध्यान में जो शक्ति है उसका बहुत कम प्रचार होता है। योगासन, प्राणायाम और मंत्रजाप से लाभ होते हैं पर उनकी अनुभूति के लिये ध्यान का अभ्यास होना आवश्यक है। दरअसल योग साधना भी एक तरह का यज्ञ है। इससे कोई भौतिक अमृत प्रकट नहीं होता। इससे अन्तर्मन   में जो शुद्ध होती है उसकी अमृत की तरह अनुभूति केवल ध्यान से ही की जा सकती है। इसी ध्यान से ही ज्ञान के प्रति धारणा पुष्ट होती है। हमें जो सुख या दुःख प्राप्त होता है वह मन के सूक्ष्म में ही अनुभव होते हैं और उनका निष्पादन ध्यान से ही करना संभव है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, August 14, 2012

पलटू महाराज का सन्देश-बराबरी करने से अच्छा है हार मन लेना

              वर्तमान युग के बाज़ार और प्रचारतंत्र के शक्तिशाली हथियारों के आगे आम आदमी लाचार और बेबस होता जा रहा है। टीवी, अखबार, मोबाइल, कंप्यूटर और फिल्मों का प्रभाव समाज में इस तरह हो गया है कि आम इंसान के अंदर स्वचिंत्तन का अभाव हो गया है। वह प्रचार के माध्यम से थोपे जा रहे विषयों को ही सबकुछ मानकर उसमें लिप्त होकर अपने मस्तिष्क में तनाव ला रहा है जिस कारण अनेक रोग पैदा हो रहे हैं। इधर भोग विलासिता की वस्तुओं में नित नित नये मॉडल आ जाते हैं तो एक माह पहले ही खरीदे गये सामान प्राचीन युग के प्रतीत होते है। इस कारण लोग विषयों के पीछे भागते जा रहे हैं। ऐसे में अपने चरित्र पर विचार करने का किसी के पास समय नहीं है पर समाज में सम्मान पाने का मोह सभी को है। इसका उपाय लोगों ने यह ढूंढ लिया है कि दूसरे की निंदा कर अपने को बड़ा साबित करो। यह निहायत घटिया प्रयास है जिसे करते हुए हम लोगों को देख सकते हैं। आत्म मंथन करें तो अपने अंदर भी यह दोष दिखाई देगा।
             पलटू महाराज कहते हैं कि
                 --------------------
           ‘पलटू’ यह सांची कहैं, अपने मन को फेर।
            तुझे पराई क्या परी, अपनी ओर निबेर।।
           ‘‘सच बात तो यह है कि मनुष्य अपने मन का विचार करे। पराई बातों में रुचि लेने से कोई लाभ नहीं बल्कि अपने गुण दोष पर दृष्टिपात करना ही ठीक है।                                                 सरबरि कबहूं न कीजिये, सबसे रहिये हार।
                                                      ‘पलटू’ ऐसे दास सों, डरिये बारबार।।
         ‘‘सबसे बराबरी करने का विचार छोड़कर हार मान लेना ही बेहतर हैं। जो ऐसा करता है व्यक्ति से डरना चाहिए क्योंकि दूसरों के घर की रौशनी देखकर अपना घर न चलाने वाला ही मानसिक रूप से शक्तिशाली होता है।’’
           चाणक्य महाराज का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति को लोकप्रिय होना है तो वह निंदा करना छोड़ दे। हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि दूसरों के सुख को ईर्ष्या न करें। जो लोग ज्ञानी हैं वह सादगी से जीवन जीते हैं उनको कमजोर या गरीब मानने वालों की आज के समाज में कमीनहीं है पर सच यह है कि ऐसे त्यागी और ज्ञानी आम इंसान से अधिक शक्तिशाली होते है। विषयों में आसाक्ति मनुष्य को मानसिक रूप से कमजोर बनाती है पर निष्काम भाव से हृदय में साहस का भाव आता है। अतः उनका सम्मान करना चाहिए। एक बात याद रखें उपभोग प्रवृत्ति कभी शक्ति और स्वास्थ्य का प्रमाण नहीं होती।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Thursday, August 02, 2012

सामवेद से सन्देश-ज्ञानी कभी आलसी नहीं होते (samved se sandeh-gyani kabhee aasli nahin hote)

           श्रीमद्भागवत गीता के आलोचक उसे युद्ध से उपजा मानकर उसे तिरस्कार करते हैं पर शायद वह नहीं जानते कि आधुनिक सभ्यता में भी युद्ध एक व्यवसाय है जिसे कर्म की तरह किया जाता है। सारे देश अपने यहां व्यवसायिक सेना रखते हैं ताकि समय आने पर देश की रक्षा कर सकें।
         भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के समय श्री अर्जुन से कहा था कि अभी तू युद्ध छोड़ देगा पर बाद में तेरा स्वभाव इसके लिये फिर विवश करेगा। अर्जुन एक योद्धा थे और उनका नित्य कर्म ही युद्ध करना था। जब श्रीकृष्ण उसे युद्ध करने का उपदेश दे रहे थे तो एक तरह से वह कर्मप्रेरणा थी। मूलतः योद्धा को क्षत्रिय माना जाता है। इसे यूं भी कहें कि योद्धा होना ही क्षत्रिय होना है। इसलिये श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म प्रेरणा दी है यह अलग बात है कि युद्ध करना उसका स्वाभाविक कर्म था। श्रीमद्भागवत में कृष्ण यह भी कहते हैं कि अपने स्वाभाविक कर्म में लगा कोई भी व्यक्ति हो-कर्म के अनुसार क्षत्रिय, ब्राह्मण वैश्य और शुद्र का विभाजन माना जाता है-मेरी भक्ति कर सकता है। इस तरह श्रीमद्भागवत गीता को केवल युद्ध का प्रेरक मानना गलत है बल्कि उसके अध्ययन से तो अपने कर्म के प्रति रुचि पैदा होती है। इसी गीता में अकुशल और कुशल श्रम के अंतर को मानना भी अज्ञान कहा गया है। आजकल हम देखते हैं कि नौकरी के पीछे भाग रहे युवक अकुशल श्रम को हेय मानते हैं। इसी कारण समाज में सफ़ेद कालर वाला काम करने की परिवृति बढती जा रही है।
सामवेद में कहा गया है कि
------------
अभि विश्वानि काव्या
‘‘सारे सुकर्म कर।’
दिवे दिवे वाजं सस्निः।
‘‘प्रतिदिन तुम युद्ध करते हो।’’
मो षु ब्रह्मेव तन्द्रर्भवो।
‘‘आत्मज्ञानी बनकर कभी आलसी मत बनना।’’
             मनुष्य अपनी देह पालन के लिये कर्म करता है जो युद्ध का ही रूप है। हम आजकल सामान्य बातचीत में यह बात मानते भी हैं कि अब मनुष्य का जीवन पहले की बनस्पित अधिक संघर्षमय हो गया है। जबकि हमारे वेदों के अनुसार तो हमेशा ही मनुष्य का जीवन युद्धमय रहा है। जब हम भारतीय अध्यात्म में वर्णित युद्ध विषयक संदर्भों का उदाहरण लेते हैं तो यह भी देखना चाहिए कि उन युद्धों को तत्कालीन कर्मप्रेरणा के कारण किया गया था। इतना ही नहीं इन युद्धों को जीतने वाले महान नायकों ने अपने युद्ध कर्म का नैतिक आधार भी प्रस्तुत किया था। वह इनको जीतने पर राजकीय सुविधायें भोगने में व्यस्त नहीं हुए वरन् उसके बाद समाज हित के लिये काम करते रहे।
      संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

अध्यात्मिक पत्रिकायें

वर्डप्रेस की संबद्ध पत्रिकायें

लोकप्रिय पत्रिकायें