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Tuesday, January 03, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-विरक्ति का भाव मनुष्य को निडर बनाता है (bharathari niti shatak-viraki ka bhav nidar banata hai)

             श्रीमद्भागवत गीता में निष्काम भाव का जो संदेश है उसका अधिकतर लोग गलत अर्थ निकालते हैं। कुछ लोग उसे काम का त्याग करना मानकर सन्यास से जोड़ते हैं तो कुछ कहते हैं कि बिना कामना के काम किया ही नहीं जा सकता। यह अज्ञान का प्रमाण है।  कर्म करना मनुष्य का धर्म है पर उसके फल के प्रति विरक्ति भाव अपनाना ही निष्काम भाव है।हमारे अध्यात्म ज्ञान में निष्काम भाव का महत्व प्रतिपादित किया गया है। दरअसल इसमें कर्मफल के प्रति विरक्ति दिखाने के लिये प्रेरित किया गया है। जबकि हमारे प्रवचनकर्ता इसका अर्थ इस तरह प्रतिपादित करते हैं जैसे कि संसार की वस्तुओं से ही पूरी तरह विरक्त हुआ जाये। अक्सर यह कहा जाता है कि मोह, लोभ, काम क्रोध तथा कामनायें ही मनुष्य की शत्रु होती हैं। आज तक लोगों को कोई यह समझा नहीं पाया कि कर्मफल है क्या? यही कारण है कि सामान्य जन कहते हैं कि फल की इच्छा के बिना कर्म करना संभव नहीं है। इसका मतलब यह है कि लोग सांसरिक क्रियाओं के कर्म का फल भौतिक पदार्थ की उपलब्धि ही समझते हैं। नौकरी, व्यवसाय या अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों से मिलने वाले धन को आज भी फल समझना इस बात का प्रमाण है कि कथित भारतीय अध्यात्मिक गुरु समाज को निष्काम कर्म का यह अर्थ नहंीं समझा पाये जिसका आशय भक्ति, दया और दान और दान से है।
                मनुष्य अपनी दैहिक बाध्यताओं की वजह से प्रतिदिन कर्म करता है। नौकरी, व्यवसाय या मजदूरी से जिन लोगों को पैसा मिलता है वह उससे अपने घर परिवार का संचालन करते हैं। बच्चों की फीस, परिवार के लिये भोजन तथा अपनी जेब का खर्च करता हुआ कोई भी आदमी यह नहीं समझ पाता कि उसके पास आया धन फल नहीं है। इसका आशय यह है कि पैसा अपने हाथ में आना हमारे जीवन के ही कर्म का विस्तार है। वह पैसा हमारी जेब में नहीं रहता। अधिक है तो अल्मारी या बैंक में जमा रहता है। उस पैसे से खरीदा गया भोजन और वस्त्र भी फल नहीं है क्योंकि हम उसे अपनी देह का संचालन करते हैं। ऐसे सांसरिक कर्म हमेशा धन की चाह से किये जाते हैं और ऐसा जो न करे वह मूर्ख ही कहलायेगा। दरअसल उस धन का उपयोग जब किसी पर दया करने या दान देने के लिये किया जाता है तब उसे निष्काम कर्म कहा जा सकता है। जहां धन की वापसी की चाहत न हो वही निष्काम कर्म है। इस चाहत से विरक्ति ही त्याग है।
महाराज भर्तृहरि के नीति शतक में कहा गया है कि
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भोगे रोगभयं कुल च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं
मानं दैन्यभयं वाले रिपुभयं रूपे जरायाः भयमः।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं कावे कृतान्ताद् भयं
सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्।।
                            ‘‘इस दैहिक जीवन में भोगों से रोग, उच्च परिवार में जन्म लेने पर निम्न आचरण में फंसने, अधिक धन होने पर राज्य, अधिक मौन रहने पर दीनता, शक्तिवान होने पर शत्रु, सौंदर्य से बुढ़ापे, ज्ञानी होने पर वाद विवाद में पराजय, विनम्रता से दुष्टों से आक्रमण और देह रहने पर मृत्यु का भय रहता है। एक मात्र विरक्त का भव ही भय से निरापद बना सकता है।
             जहां दैहिक और भौतिक जीवन को ही स्वीकार किया जाता है वहां भय की संभावना अधिक रहती है। यहां हर वस्तु पतनशील और नष्टप्रायः है। अगर हम अपने अध्यात्म दर्शन को समझें तो यह ज्ञान प्राप्त होगा कि सांसरिक उपलब्धियों का फल समझना ही भय का कारण है। यह ज्ञान होने पर आदमी भय से रहित हो जाता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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