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Thursday, November 24, 2011

संत कबीर दर्शन-भक्ति के लिये इधर उधर भटकने की आवश्यकता नहीं ( sant kabir darshan-bhakti ke liye bhatakna vyarth)

                     आखिर मनुष्य को भक्ति क्यों करना चाहिए? इसके लाभ क्या हैं? इस प्रश्न के अनेक उत्तर दिये जा सकते हैं। आर्ती प्रवृत्ति वाले भक्त अपना कष्ट दूर होने की आशा से भगवान को पुकारते हैं तो अर्थार्थी हमेशा ही इस आशा से भगवान का भजन करते हैं कि उनके सांसरिक कार्य सिद्ध होते रहें।  जिज्ञासु केवल निष्काम भाव से भक्ति करते हैं यह सोचक कि अगर इससे फायदा नहीं हुआ  तो हानि भी नहीं होगी पर देखें कि इससे क्या लाभ होता है? इन सबसे अलग ज्ञानी इस तर्क के साथ ध्यान, योग, तथा मंत्र जाप आदि करते हैं कि इससे उनका का मन कुछ देर के लिये सांसरिक पदार्थों के चिंत्तन से परे होकर विश्राम करता है। चतुराई करते हुए एकरसता से ऊबी बुद्धि सरल भाव से आत्मा के साथ बात करती है।
आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान भी मानता है कि एक ही काम करते रहने से अनेक मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं जो अततः देह के पतन का कारण बनते हैं। पश्चिमी स्वास्थ्य विज्ञान ने तो यह बात अब जानी है जबकि भारतीय अध्यात्म ज्ञानियों ने यह बात पहले ही समझ ली थी इसलिये ही भक्ति, ध्यान, योग तथा मंत्रोच्चार के लिये लोगों को प्रेरित करते रहे। यह अलग बात है कि अनेक लोग भक्ति करते हैं पर उनके में दिखावा अधिक होता है। वह चाहते हैं कि वह भक्त कहलायें। अनेक भक्तगण तो दूसरे को अपने इष्ट को पूजने के लिये उकसाते हैं।
इस विषय पर संत कबीरदास कहते हैं कि
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बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जानिए राम
कहा काज संसार से, तुझे घनी से काम
          "बाहर दिखाकर भगवान् का स्मरण करने से क्या लाभ, राम का स्मरण तो अपने ह्रदय में करना चाहिए। जब भगवान् के भक्ति करनी है फिर इस संसार से क्या काम ।
प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय
चाहे घर में बात कर, चाहे बन को जाय
        " अगर भगवान की भक्ति करनी है तो घर-गृहस्थी में रहते हुए भी की जा सकती है उसके लिए वेशभूषा बदलने की कोई जरूरत नहीं है और न वन जाने की। बस मन में प्रेमभाव होना चाहिए।" 
            भक्ति के प्रकार पर बहस करने की बजाय उसके किसी भी स्वरूप में अपना मन और मस्तिष्क स्थिर रखने पर विचार करना चाहिए।  चित्त की चंचलता पर अगर नियंत्रण नहीं किया गया तो सारी भक्ति इसलिये व्यर्थ है क्योंकि उससे हमारे मन के विचारों के विकार नहीं निकल पाते।  भक्ति से कोई इस संसार में स्वर्ग नहीं मिल जाता न ही सांसरिक कार्यों में सिद्धि की आशा पूर्ण होती है। दरअसल सांसरिक कार्य तो अपने आप समय पर सिद्ध होते हैं मनुष्य आशा और निराशा का भाव तो व्यर्थ ही पालता है। 
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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1 comment:

वन्दना said...

वाह वाह बेहतरीन्………बिल्कुल सटीक कहा है।

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