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Sunday, May 30, 2010

श्रीमदभगवद्गीता गीता एक स्वर्णिम ग्रंथ है-रविवारीय चिंतन (shri madbhagvat geeta a golden book)

अपना अपना विचार है और उसके अभिव्यक्त होने की भी अलग अलग शैली होती है। इसलिये किसी के कुछ लिखने और पढ़ने पर उस आदमी के आंतरिक मनस्थिति की भी जानकारी मिल जाती है। इस देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग पढ़ते कम हैं लिखने और कहने के लिये लालायित अधिक रहते हैं। समझते कम हैं दूसरे को समझाने के लिये दौड़ पड़ते हैं। सो जैसे लेखक वैसे पाठक, जैसे गुरु वैसे चेले और जैसे बुद्धिजीवी वैसे आम श्रोताओं का एक समाज यहां बन गया है जो अंततः जड़ता की स्थिति में हैं। जहां अनेक लोग मैंढक की तरह टर्र टर्र करते हुए समाज में बदलाव की बात करते हैं पर कहीं पता खड़कता तक नहीं दिखाई देता। समाज को बदलने की बात करने वाले स्वयं में बदलाव नहीं लाते केवल नारे लगाते हैं। जिनमें एक यह भी कि दुनियां के सारे धार्मिक ग्रंथ मानवता का संदेश देते हैं मगर दुनियां है कि सुधरती नहीं है।
यही कारण है कि दुनियां का स्वर्णिम ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता जितना प्रसिद्धि है उसकी सामग्री के बारे में बहुत कम लोग समझते हैं। स्थिति यह है कि एक धार्मिक संस्था के कैलेंडर पर बहुत अच्छी बातें लिखी गयी थीं और संदर्भ दिया गया श्रीगीता का मगर उसमें एक भी बात प्रमाणिक रूप से मौजूद नहीं है।
एक आदमी कभी पार्क के अंदर नहीं गया। वह तो उसके पास से गुजरता भर था। उसका पार्क के चारो और के मार्ग पर आना जाना था पर अंदर झांकने की उसने कोशिश नहीं की क्योंकि वह ऊंची झाड़ियों से घिरा हुआ था। इसके बावजूद दूसरों से वह बखान करता है कि उस पार्क में अनेक प्रकार के  फूलों की जोरदार खुशबू फैलती है। अनेक प्रकार के वृक्ष हैं।
एक ने पूछा-‘वहां कौनसे फूल खिलते हैं?
उस आदमी ने जवाब दिया कि-‘गुलाब, कमल, चंद्रमुखी तथा और भी बहुत से किस्म के फूल हैं जिनकी खुशबू से मन खुश हो जाता है।
इस तरह वह पार्क का एक बहुत बड़ा प्रचारक बन गया था। जहां भी जाता उस पार्क के लोगों को बताता, अलबत्ता वहां के फूल और पेड़ पौद्यों की वास्तविक जानकारी उसके पास नहीं थी। एक दिन एक वनस्पति ज्ञानी उस पार्क में गया और उसने वहां का अध्ययन कर एक बहुत बड़ा लेख अखबार में लिख डाला। उसकी चर्चा लोग उस आदमी से करने लगे तो वह कहने लगा कि ‘उंह, उससे ज्यादा तो हम जानते हैं क्योंकि उसने जितना लिखा है उससे ज्यादा तो हम लोगों को बता चुके हैं। जितने लोगों का  उसे पढ़कर इस पार्क में जाना नहीं होगा उससे ज्यादा तो हमारे मुंह से सुनकर लोग वहां आते हैं।
श्रीमद्भागवत गीता के बारे में जो उसके ज्ञान की चर्चा करते हैं उनकी स्थिति उस आदमी की तरह ही है जो कभी पार्क के अंदर नहीं गया। फिर अपने समाज में व्यवसायिक रूप से धार्मिक विचारक सक्रिय हैं। देश में जातीय,धार्मिक तथा भाषाई समुदायों में उनको अपने ग्राहक या भक्त ढूंढने होते हैं इसलिये वह एकता कराने के लिये भी प्रयास करते हैं ताकि वह सर्वप्रिय हो सकें।
कई संत या विचारक तो इतने शुद्ध व्यवसायिक हैं कि वह श्रीमदभगवद्गीता की तुलना अन्य धर्म ग्रंथों के साथ भी करते हैं तो कई ऐसे भी हैं जो अन्य धर्म ग्रंथ के ज्ञान जैसा ही श्रीमद्भागवत गीता का भी ज्ञान बताते हैं। चार पांच अन्य धर्म ग्रंथों की पुस्तकों का नाम लेकर श्रीगीता का नाम उसमें जोड़कर कह दिया जाता है कि ‘सारे ग्रंथ भाई चारे, प्रेम तथा अंिहसा का उपदेश देते हैं।
सच बात तो यह है कि यह सभी ऐसे संत और बुद्धिजीवी उस आदमी तरह हैं जो उस पार्क में गया ही नहीं जिसका प्रचार करते हैं। उनके मुख से श्रीमद्भागवत गीता का नाम सुनकरा हैरानी होती है क्योंकि इसका मतलब यह है कि वह उसे पढ़ते नहीं और पढ़ते है तो समझते नहीं। जबकि सत्य यह है कि एक बार जो पवित्र भाव से श्रीगीता का अध्ययन करेगा तो फिर उसे अन्य धर्म पुस्तकों से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता । जिस तरह पार्क का प्रचाकर तो तो केवल उसके चारों ओर बाहर से घूमकर निकल जाता था वही स्थिति उन धार्मिक प्रचारकों की है जो दूसरे धर्म ग्रंथों के साथ श्रीमद्भागवत गीता की तुलना करते हैं।
जो वास्तव में श्रीगीता का ज्ञान रखते हैं वह वनस्पति ज्ञानी की तरह हैं जो केवल इसी पर बोला और लिखा करते हैं।
वैसे श्रीमदभगवद्गीतादुनियां का ऐसा अकेला ग्रंथ है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान है। श्रीगीता में भी प्रेम, भाईचारे, दया, सहिष्णुता तथा परोपकार की बात तो कही गयी है पर यह भी बताया गया है कि जब तक सहज योग की शरण नहीं लेंगे तब यह सब आप नहीं कर पायेंगे। शरीर के विकार निकाले बिना मन के विकार निकालना कठिन काम है। भक्त चार प्रकार के बताये गये हैं-आर्ती, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी।
दो तरह की प्रकृत्तियों के मनुष्य बताये हैं-आसुरी और देवीय।
तीन प्रकार के कर्म तथा कर्ता बताये गये हैं-सात्विक, राजस और तामसी।
सामाजिक समन्वय तथा स्वयं को तनाव रहित रखने के लिये निष्काम कर्म भक्ति, निष्प्रयोजन दया तथा योग में रत रहने के साधन बताये गये हैं।
श्रीमदभगवद्गीता के संदेशों का अध्ययन करें तो यह बात सामने आती है कि मनुष्य और उसके कर्म के उतने प्रकार इस धरती पर हमेशा रहेंगे और उनकी विविधता को मिटाना संभव नहीं है। मुख्य विषय यह है कि आप अपने कर्म और निश्चय पर ध्यान दें। इसके विपरीत अन्य धार्मिक पुस्तकें इस सत्य से परे हैं और वह सभी मनुष्यों की प्रकृत्तियों और कर्म में साम्यता लाने का असंभव सा प्रयास करने का संदेश देती हैं। व्यक्ति को अपने सुधार के बाद समाज में सुधार लाने का प्रयास करने का संदेश देती हैं जो कि एक तरह का तामसिक प्रयास है। जब आप दूसरे को अपनी तरह से भक्ति करने का ज्ञान देते हैं तो इसका आशय यह है कि आपने अपनी भक्ति का अहंकार दिखाया-‘मैं ऐसा करता हूं तू भी ऐसा कर तो तर जायेगा’, या ‘ऐसा करेगा तो तुझे स्वर्ग मिलेगा’-जो कि तामसी प्रवृत्ति का परिचायक है। इतना ही नहीं श्रीगीता में एकांत साधना करने की बात कही जाती है जबकि अन्य धर्म पुस्तकें सामूहिक प्रार्थनाओं का संदेश देती हैं।
ऐसी बहुत अन्य बातें हैं जो श्रीमद्भागवत गीता को अलौकिक तथा असाधारण प्रमाणित करती हैं। इसकी तुलना अन्य किसी भी धार्मिक पुस्तक से नहीं की जा सकती क्योंकि वह सभी सकाम भक्ति की प्रवर्तक हैं जिसका कोई लाभ अधिक नहीं होता क्योंकि मनुष्य अर्थार्थी होकर मतलबी हो जाता है। कुछ अज्ञात महापुरुषों ने इस शाब्दिक रूप से लघु तथा अर्थ की दृष्टि  से अत्यंत व्यापक इस ग्रंथ को इसलिये महाभारत जैसे महाग्रंथ से प्रथक किया क्योंकि वह जानते थे कि यह स्वर्णिम ज्ञान की खदान है। ऐसे महापुरुषों का आभारी इस समाज को रहना चाहिए जिन्होंने इस स्वर्णिम ज्ञान की खदान की खोज कर उसे प्रथक स्थापित किया।
shri madbhagavat geeta,bhagvan shri krishna
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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3 comments:

zeal said...

Wonderful post !

RAJENDRA said...

श्रीमान जी कृपया लेख का शीर्षक सुधार देवें
"श्रीमद्भागवद्गीता"नहीं "श्रीमदभगवद्गीता" है है

RAJENDRA said...

श्रीमान जी कृपया लेख का शीर्षक सुधार देवें
"श्रीमद्भागवद्गीता"नहीं "श्रीमदभगवद्गीता" है है

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