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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Wednesday, October 29, 2008

शायद तब सच ढूंढना कठिन होगा-संपादकीय

भारत के किसी भी भाग में जाकर वहां रह रहे किसी ऐसे आदमी से बात करिये जिस पर अपने परिवार के पालन पोषण और रक्षा का जिम्मा है। उससे सवाल करिये कि क्या वह अपने समाज से विपत्ति के समय सहायता की आशा करता है तो उसका जवाब होगा ‘‘नहीं’
उससे पूछिये कि ‘क्या वह अपने समाज के शीर्षस्थ लोगों से कभी किसी प्रकार के सहयोग या रक्षा की आशा करता है? तब भी उसका जवाब होगा ‘नहीं’’।

यह आश्चर्य की बात है कि इस देश में एक भी आदमी अपनी भाषा,धर्म,जाति,और क्षेत्र के नाम पर बने हुए समूहों के प्रति एक सीमित सद्भाव रखता है वह भी भविष्य में किसी प्रकार बच्चों आदि के विवाह के समय। सामान्य आदमी अपने कार्य के सिलसिले में प्रतिदिन अपने से पृथक समूहों और समुदायों के संपर्क में आता है पर उस समय उसका ध्यान केवल अपने काम तक ही सीमित रहता है न तो उसके दिमाग में अपने समूह का ध्यान रहता है न ही दूसरे का। शायद उसे कभी अपने समूहों या समाज याद भी न आये-क्योंकि लोग आपस बातचीत में भी किसी के समूह में रुचि नहंी दिखाते- पर कहीं न कहीं कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इन समूहों को नाम लेकर चर्चा करते हैं क्योंकि उनके अपने स्वार्थ होते हैं।
आजकल तो दूसरी स्थिति है कि प्रचार माध्यमों मेें विभिन्न समूहों और समाजों के आपसी झगड़ों का जमकर प्रचार हो रहा है। अगर न ध्यान हो तो भी आदमी के सामने उनके नाम आ जाते हैं। कितनी मजे की बात है कि जितनी एकता की बात की जाती है उतनी समाजों के बीच विभाजन रेखा बढ़ती जाती है। अब यह समझना कठिन है कि यह विभाजन रेखा कहीं इसलिये तो नहंी बढ़ाई जा रही कि एकता की बात करते रहना चाहिये या वास्तव में एकता की बात इसलिये की जा रही है कि क्योंकि विभाजन रेखा बढ़ रही है।

पिछले एक डेढ़ वर्ष से विभिन्न समाजों, जातियों,भाषाओं,धर्मों और क्षेत्रों के बीच जिस तरह तनाव बढ़ रहा है वह आश्चर्य का विषय है। इधर भारत की प्रगति की चर्चा हो रही है-अभी भारत ने चंद्रयान छोड़ा है और उसके कारण विज्ञान जगत मं उसका रुतबा बढ़ा है-उधर ऐसे विवाद बढ़ते जा रहे हैं। पहले अनेक घटनाओं में विदेशी हाथ होने का संदेह किया जाता था पर अब तो ऐसा लगता है कि इस देश के ही कुछ लोग भी अब सक्रिय है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब तो कोई विदेशी हाथ की बात अब कम ही हो रही है अंंदरूनी संघर्ष में कुछ लोग खुलेआम सक्रिय हैंं। विदेशी हस्तक्षेप की संभावना को तो अब नकारा भी नहीं जा सकता-क्योंकि भारत के बढ़ती ताकत कई अन्य देशों के लिये ईष्र्या का विषय है।

प्रसंगवश याद आया कि पाकिस्तान अभी विदेशी मुद्रा की कमी के कारण दिवालिया होने की हालत में था पर उसके संरक्षक अमेरिका ने उसे मदद नहीं दी। उसके राष्ट्रपति ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोश और विश्व बैंक से मदद मांगी तो उन्होंने कड़ी शर्तें रख दीं। इससे पहले वह अपने चीन से भी निराश होकर आये थे। फिर अचानक ही क्या हुआ कि चीन ने उसकी मदद करना स्वीकार कर लिया। उसने उसके 1.5 अरब डालर की मदद तत्काल रूप से दी और वर्ष 2009 तक के अंत तक चार अरब डालर वहां संचार क्षेत्र में विनिवेश करना स्वीकार कर लिया। इसी दौरान चीन के पत्रकारों का एक दल भी वहां गया और उसने एक सेमीनार में भारत के खिलाफ विषवमन किया। यह समाचार तो कई अखबारों ने दिया पर इस पर अपने विचार विस्तार रूप से नहीं लिखे गये। शायद यह पहला अवसर है कि चीन ने पहली बार पाकिस्तान को आर्थिक मदद दी है और इसकी वजह से जो राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं-क्योंकि अभी तक पाकिस्तान अमेरिका की शरण में था। वहां गये पत्रकारों ने नाईजिरिया और पाकिस्तान में चीनी इंजीनियरों की हत्या में भी किसी देश का हाथ होने की बात कही गयी पर उसमें किसी का नाम नहीं लिया गया।
चीन अपना वार खामोशी से करता है। पाकिस्तान को दिया गया पैसा हमेशा ही भारत में आतंक का वातावरण बनाने के काम आता है। अभी तक भारत अमेरिका से कहता था पर चीन से तो यह कहना भी संभव नहीं है। अमेरिका अभी तक विश्व का सर्वशक्तिमान राष्ट्र था इसलिये अपनी रक्षा के लिये इधर-उधर अशंाति फैलाता था। अब चीन भी इस श्रेणी में आ गया है और हो सकता है वह भी ऐसे काम करने लगे जिससे उसकी ताकत बनी रहे। पाकिस्तान को दिवालिया होने से बचाकर चीन ने अमेरिका के कम होते प्रभुत्व का संकेत दिया है। विश्व में चल रही आर्थिक मंदी को लेकर पहले ही यह आशंका बनी थी कि इससे विश्व में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं और उसकी शुरुआत हो चुकी है। ऐसे में देश के बुंिद्धजीवी वर्ग को इस पर ध्यान रखना चाहिये था पर देश में इतने विवाद हो रहे है कि उससे उनका ध्यान ही नहीं हट रहा है।

वैसे तो पूरे विश्व में उथल पुथल है पर भारत में कुछ अधिक ही लग रही है। पहले कहा जाता था कि भारत में जाति,भाषा,धर्म,और क्षेत्रों के नाम बने समूहों के आपसी तनावों की वजह से विकास नहंीं हो रहा है क्योंकि लोग अपनी अशिक्षा के वजह से इन झगड़ों में फंसे रहते हैं पर अब तो उल्टी ही हालत लग रही है। जिन लोगों को हम अशिक्षित और गंवार कहते हैं वह तो चुप बैठे हैं पर जो पढ़े लिखे हैं वही ऐसे झगड़े का काम रहे हैं। आखिर यह शिक्षा किस काम की?
दरअसल हमारे देश की शिक्षा तो गुलाम पैदा करती है और नौकरी के लिये आदमी इधर से उधर भाग रहे हैं। इतनी नौकरियां हैं नहीं जितनी लोग ढूंढ रहे हैं और इसलिये बेरोजगार युवकों में कुंठा बढ़ रही है और वह उन्हीं समूहों और समाजों के आधार पर चल रहे संघर्षों में शामिल हो जाते हैं जिनसे वह स्वयं नफरत करते हैं।
सच तो यह है कि जाति,भाषा,धर्म,और क्षेत्रों के नाम पर बने समूहों का अस्तित्व शायद अभी तक समाप्त ही हो जाता पर लगता है कि कुछ लोग अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति पर चलते हुए उनको बनाये रखना चाहते हैं। यही कारण है कि वर्तमान युग में अस्तित्व हीन हो चुके समाज और समूह केवल नाम से चल रहे हैं। सभी लोग धन कमाने में लगे हैं-सभी को अपने लिये रोटी के साथ सुख साधन भी चाहिये-किसी को अपने समाज या समूह से कोई मतलब नहीं है पर कुछ लोग ऐसे हैं जो ऐसे द्वंद्वों से लाभ उठाते हैं। यह लाभ सीधे आर्थिक रूप से होता है या धुमाफिराकर यह अलग बात है पर उसी के लिये यह सब कर रहे है। ऐसे में भारत की प्रगति से चिढ़ने वाले अन्य देश भी अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से लाभ दे सकते हैं।

अक्सर विदेशी हाथ में पाकिस्तान का नाम लिया जाता है पर वह तो केवल मुहरा है। अभी तक पश्चिम देश उसकी पीठ पर हाथ रखे हुए थे और अब जिस तरह चीन इस तरफ बढ़ा है वह ध्यान देने योग्य है। ऐसे में देश के बुद्धिजीवी वर्ग को गहनता से विचार करना चाहिये कि देश की स्थिति में जो इस तरह के उतार-चढ़ाव हैं उसकी वजह क्या है? जबकि हो रहा है उसका उल्टा! सभी बुद्धिजीवी हमेशा की तरह अपने पक्षों की बात ही आंखें बंद कर रख रहे हैं। गहन चिंतन और मनन का अभाव है। वह अपने आसपास चल रही घटनाओं को अनदेखा करते हैं जबकि उनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे देश की स्थिति पर प्रभाव पड़ता है। अगर देश के अंदरूनी विषयों पर ही विचार करते हुए वादविवाद करते रहेंगे और बाहरी घटनाओं का अध्ययन नहीं करेंगे तो शायद तब सच ढूंढना कठिन होगा कि आखिर क्या कोई अन्य देश हैं जो हमारे देश को अस्थिर करना चाहते हैं। इसलिये बुद्धिजीवी वर्ग को देश में एकता और सद्भाव बनाये रखने के लिये काम करना चाहिये। शेष अगले अंक में।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

2 comments:

संगीता पुरी said...

सही कहा। बुद्धिजीवी वर्ग को देश में एकता और सद्भाव बनाये रखने के लिये काम करना चाहिये।

ummed Singh Baid "saadahak " said...

देश-समाज की बात हो, तो करना चिन्तन दोस्त.
उपर उठकर स्वार्थ से,कुछ कर जाना दोस्त.
कुछ कर जाना दोस्त, तभी तुम अमर बनोगे.
देह छूट जाने पर भी, तुम बचे रहोगे.
कह साधक आलस करके मत देना कोई घात.
करना पूरा चिन्तन जब हो देश समाज की बात.

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