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Wednesday, January 07, 2009

विदुर नीति: रूखी वाणी मर्म को दग्ध कर देती है

1.दूसरों के अभद्र शब्द सुनकर भी स्वयं उन्हें न कहे। क्षमा करने वाला अगर अपने क्रोध को रोककर भी बदतमीजी करने वाले का नष्ट कर और उसके पुण्य भी स्वयं प्राप्त कर लेता है।
2.दूसरों से न तो अपशब्द कहे न किसी का अपमान करें, मित्रों से विरोध तथा नीच पुरुषों की सेवा न करें।सदाचार से हीन एवं अभिमानी न हो। रूखी तथा रोष भरी वाणी का परित्याग करं।
3.इस जगत में रूखी या शुष्क वाणी, बोलने वाले मनुष्य के ही मर्मस्थान हड्डी तथा प्राणों को दग्ध करती रहती है। इस कारण धर्मप्रिय लोग जलाने वाली रूखी वाणी का उपयोग कतई न करें।
4.जिसकी वाणी रूखी और शुष्क है, स्वभाव कठोर होने के साथ ही वह जो दूसरों के मर्म कटु वचन बोलकर दूसरों के मन पर आघात और मजाक उड़ाकर पीड़ा पहुंचाता है वह मनुष्यों में महादरिद्र है और वह अपने साथ दरिद्रता और मृत्यु को बांधे घूम रहा है।
5.कोई मनुष्य आग और सूर्य के समान दग्ध करने वाले तीखे वाग्बाणों से बहुत चोट पहुंचाए तो विद्वान व्यक्ति को चोट खाकर अत्यंत वेदना सहते हुए भी यह समझना कि बोलने वाला अपने ही पुण्यों को नष्ट कर रहा है।
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Tuesday, January 06, 2009

रहीम संदेश: ताकत की पहचान है नम्रता का गुण

रहिमन करि सम बल नहीं, मानत प्रभू की धाक
दांत दिखावत दी ह्यै, चलत घिसावत नाक


कविवर रहीम जी के मतानुसार हाथी के समान किसी में बल नहीं है पर वह भी भगवान की शक्ति को मानता है और अपनी नाक जमीन पर रगड़ता हुआ चलता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यहां रहीम ने विनम्रता के गुण का बखान किया है। भौतिकतावाद ने लोगों के संस्कारों को एकदम नष्ट कर दिया है। यही कारण है कि लोगों मेें अहंकार की प्रवृत्ति भयानक रूप से बढ़ गयी है। अपने आगे कोई किसी को समझता ही नहीं। सभी अपना सिर उठाये ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि उनके पास ही सारी दुनियां के सुख साधन हैं। हालत यह है कि सुविधाओं की उपलब्धि के कारण शारीरिक व्यायाम तो कम हो गया है पर किसी को पकड़ कर जमीन पर पटकने की प्रवृत्ति जोर मारने लगी है। ताकत कम गुस्सा ज्यादा मार खाने की निशानी। यही कारण है कि छोटा हो या बड़ा किसी में सहनशीलता नहीं है। जहां देखो वही झगड़े पर आमदा लोग देखे जा सकते हैं। बातचीत में विनम्रता तो है ही नहीं। सभी के शब्दों में अहंकार भरा पड़ा है।

हाथी जो सभी जीवों में शक्तिशाली है वह जमीन पर सूंढ़ को रगड़ता हुआ चलता है। यह इस बात का प्रमाण है कि शक्तिशाली व्यक्ति को विनम्र होना चाहिये। जिसमें विनम्रता नहीं है वह शक्तिशाली नहीं होता। बरगत को पेड़ झुका है तभी किसी को छाया दे पाता है। यानि शक्तिशाली लोग दूसरों को आसरा देते हैं न कि किसी को डरा घमका कर काम चलाते हैं। अगर कोई अकड़ दिखाता है समझ लो कि वह कमजोर आदमी है और उससे संपर्क रखना ही गलत है। अगर कोई विनम्रता से व्यवहार कर रहा है तो समझ लो कि वह शक्तिशाली है और ऐसे व्यक्ति से संपर्क बढ़ाने से जीवन में सहयोग की आशा भी की जा सकती है। एक बात और है कि अगर हमारे अंदर कोई विशेष गुण या वस्तु है तो उसका भी अहंकार न कर दूसरों के साथ उसका लाभ बांटना चाहिये। यही होता है आदमी की शक्ति का प्रमाण कि वह दूसरे में हौंसला और विश्वास बढ़ाये न कि उसे गिराये।
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Monday, January 05, 2009

भर्तृहरि संदेश: मदक्षीण होते हुए भी हाथी की शोभा नहीं जाती

मणिः शाणोल्लीढः समर विजयी हेतिदलितो
मदक्षीणो नागः शरदि सरितः श्यानपुलिनाः


हिंदी में भावार्थः शान (खराद) द्वारा तराशा गया मणि, हथियारों से घायल होने पर युद्धविजेता, मदक्षीण हाथी,शरद ऋतु में किनारे सूखे होने पर नदियां, कलाशेष चंद्रमा, और पवित्र कार्यों में धन खर्च कर निर्धन हुए मनुष्य की शोभा नहीं जाती।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोग अपने चेहरे पर निखार लाने के लिये श्रृंगार का सामान उपयोग लाते हैं। पहले तो स्त्रियों ही अपनी सजावट के लिये श्रृंगार का उपयोग करती थीं पर अब तो पुरुष भी उनकी राह चलने लगे हैं। अपने शरीर पर कोई पसीना नहीं देखना चाहता। लोग दिखावे की तरफ अधिक आकर्षित हो रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि शारीरिक श्रम को लोग पहले से अधिक हेय समझने लगे हैं। स्मार्ट दिखने के लिये सभी जगह होड़ लगी है। सच तो यह है कि दैहिक आकर्षण थोड़ी देर के लिये प्रभाव डालता है पर अपने हाथों से निरंतर पवित्र कार्य किये जायें तो चेहरे और व्यक्तित्व में स्वयं ही निखार आ जाता है। जो लोग सहजता पूर्वक योग साधना, ध्यान, सत्संग और दान के कार्य मेें लिप्त होते हैं उनका व्यक्ति इतना प्रभावी हो जाता है कि अपरिचित भी उनको देखकर आकर्षित होता है।

कितना भी आकर्षक क्यों न हो धनी होते हुए भी अगर वह परोपकार और दान से परे हैं तो उसका प्रभाव नहीं रहता। खालीपीली के आकर्षण में कोई बंधा नहीं रहता। धनी होते हुए भी कई लोगों को दिल से सम्मान नहीं मिलता और निर्धन होते हुए भी अपने पूर्व के दान और पुण्र्य कार्यों से अनेक दानवीरों को सम्मान मिलता है। सच तो यह है कि अपने सत्कर्मों से चेहरे में स्वतः ही निखार आता है और स्वार्थी और ढोंगी लोग चाहे कितना भी श्रृंगार कर लें उनके चेहरे पर चमक नहीं आ सकती।
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Sunday, January 04, 2009

कबीर के दोहे: दुविधा में पड़कर अन्य स्वरूप की भक्ति न करें


मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग
कहु धौं कौन कुफेर तें, नाहीं लागत रंग

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि साधुओं के साथ नियमित संगत करने और रात दिन भगवान का नाम जाप करते हुए भी उसका रंग इसलिये नहीं चढ़ता क्योंकि आदमी अपने अंदर के विकारों से मुक्त नहीं हो पाता।

सौं बरसां भक्ति करै, एक दिन पूजै आन
सौ अपराधी आतमा, पड़ै चैरासी खान


कई बरस तक भगवान के किसी स्वरूप की भक्ति करते हुए किसी दिन दुविधा में पड़कर उसके ही किसी अन्य स्वरूप में आराधना करना भी ठीक नहीं है। इससे पूर्व की भक्ति के पुण्य का नाश होता है और आत्मा अपराधी होकर चैरासी के चक्कर में पड़ जाती है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भगवान का नाम लेना और साधुओं के आश्रमों मेंे जाकर हाजिरी देना कोई भक्ति का प्रमाण नहीं हैं। भीड़ में बैठकर भगवान का नाम लेकर शोर मचाने से भी कोई भक्ति नहीं हो जाती। लोग बरसों तक ऐसा करते हैं पर मन में फिर भी चैन नहीं पाते। मन में शांति तभी संभव है जब एकाग्र होकर हृदय भगवान के नाम का स्मरण किया जाये। ऐसा नहीं कि आंखें बंद कर मूंह से भगवान का नाम जाप कर रहे हैं और अंदर कुछ और ही विचार आ रहे हैं। कुछ लोग विशेष अवसर पर प्रसिद्ध मंदिरों और आश्रमों में जाकर मत्था टेक कर अपनी भक्ति को धन्य समझते हैं-ऐसा करना भगवान को नहीं बल्कि अपने आपको धोखा देना है। सबसे बड़ी बात यह है कि अगर अपने आचरण में पवित्रता नहीं है तो इसका मतलब यह है कि भक्ति एक धोखा है। जब तक आचार विचार और व्यवहार में पवित्रता नहीं रहेगी तब तक भगवान के नाम लेने का सकारात्मक प्रभाव नहीं हो सकता।

कुछ लोग अपने जीवन में बरसोंे तक भगवान के किसी एक ही स्वरूप की आराधना करते हैं। धीरे धीरे उनके अंदर भक्ति का रंग चढ़ने लगता है पर अचानक ही उनको कोई दूसरे स्वरूप या गुरु को पूजने के लिये प्रेरित करता है तो वह उसकी तरफ मुड़ जाते हैं। यह उनकी बरसों से की गयी भक्ति की कमाई को नष्ट कर देता है। जब सभी कहते हैं कि भगवान तो एक ही फिर उसके लिये स्वरूप में बदलाव करना केवल धोखा है यह अलग बात है कि उसकी प्रेरणा देने वाला भक्त को दे रहा है या भक्त स्वयं ही उसकी लिये उत्तरदायी है।
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Saturday, January 03, 2009

श्रीसीता जी ने अहिंसा धर्म का प्रतिपादन किया था-आलेख

बाल्मीकी रामायण एक प्राचीनतम ग्रंथ है। देखा जाये तो भगवान श्री रामचंद्र जी का चरित्र अत्यंत प्राचीनतम माना जाता है। वैसे तो हमारे यहां भगवान के अवतार उनसे पूर्व भी हुए हैं पर भगवान श्रीरामचंद्र जी से एक ऐसी सभ्यता प्रारंभ होती है जिसे आचरण की दृष्टि से मजबूत माना जाता है। हम इस समय विश्व में प्रचलित धर्म या विचाराधाराओं को देखें तो उसमें भगवान श्रीरामचंद्र जी का चरित्र सबसे अधिक प्राचीन है। एक बात जो महत्वपूर्ण है वह यह कि विश्व में अहिंसा धर्म की बहुत चर्चा होती है तो उसकी चर्चा भी उसी में मिलती है। वैसे भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी अहिंसा धर्म का प्रतिपादन किया है पर भगवान श्रीरामचंद्र के काल में उनकी पत्नी श्रीसीता जी ने भी अपने पति को अहिंसा धर्म के प्रेरित किया था। इस संबंध में इस लेखक ने एक पाठ लिखा था जो आज प्रस्तुत किया जा रहा है। वैसे अधिकतर लोग कहते हैं कि सभी प्रकार के विचार या धर्म पुरुषों द्वारा सृजित किये गये हैं। उनका यह तर्क भारतीय दृष्टिकोण से तो ठीक नहीं हैं क्योंेकि हमारे यह सभी धार्मिक महानायकों के साथ उनकी स्त्रियों को भी उतनी ही श्रद्धा से देखा जाता है क्योंकि वह अपने समय कोइ निष्क्रिय भूमिका में नहीं रहतीं थीं। यह अलग बात है कि कालांतर में उनको ऐसा प्रस्तुत किया गया। ऐसे में यह पाठ इस आशय से प्रस्तुत किया जा रहा है कि हमारे समाज के निर्माण में स्त्रियों की भूमिका भी कोई कम नहीं है।

इस पाठ को पढ़ने से तो यह लगता है कि अहिंसा धर्म की एक तरह से प्रतिपादक थीं। उन्होेंने भगवान श्रीरामचंद्र जी को अहिंसा धर्म में प्रवृत्त रहने का आग्रह किया। भले ही यह स्त्रियो के सुकोमल भाव के कारण उन्होंने ऐसा किया पर फिर भी अहिंसा धर्म के प्रतिपादकों में उनका नाम सबसे पहले आता है। फिर अनेक ज्ञानी और विद्वान लोग अहिंसा के प्रतिपादकों में उनका नाम पहले क्यों नहीं लेते? श्रीसीता जी की तो स्पष्ट मान्यता थी कि हथियार रखने मात्र से ही आदमी के मन में हिंसा का भाव आता है। फिर उन्होंने अहिंसा का धर्म सही रूप में प्रस्तुत किया कि अपने प्रति अपराध न करने वाले व्यक्ति के प्रति हिंसा अनुचित है। अर्थात जो अपराध करता है उसको दंड देने का वह विरोध नहीं करती। ऐसा विचार शायद ही किसी ने रखा हो। बहरहाल यह लेख पुनः प्रस्तुत है।
वाल्मीकि रामायण से-शस्त्रों का संयोग ह्रदय में विकार का उत्पादक
अपने वन प्रवास के दौरान सुतीक्षण के आश्रम से निकलकर जब श्री राम अपनी धर्म पत्नी सीताजी और भ्राता लक्ष्मण में साथ आगे चले। अपने पति द्वारा राक्षसों के वध करने के प्रतिज्ञा से वह दुखी थीं इसलिए उन्होने इससे हटने के लिए उनसे हिंसा छोड़ने का आग्रह किया और निम्नलिखित कथा सुनाई

पूर्वकाल की बात है किसी पवित्र वन में जहाँ मृग और पक्षी बडे आनंद से रहते थे वहीं एक सत्यवादी एवं पवित्र तपस्वी निवास करते थे। उन्हीं की तपस्या में विघ्न डालने के लिए शचिपति इन्द्र किसी योद्धा का रूप धारण कर हाथ में तलवार एक दिन उनके आश्रम पर आये। उन्होने मुनि के आश्रम में अपना उतम खड्ग रख दिया। पवित्र तपस्या में लगे हुए मुनि को धरोहर के रूप में वह खड्ग दे दिया। उस शस्त्र को पाकर मुनि प्रसन्नता के साथ उस धरोहर की रक्षा में लग गए, वे अपने विश्वास की रक्षा के लिए वन में विचरते समय भी उसे अपने साथ रखते थे। धरोहर की रक्षा में तत्पर रहने वाले वे मुनि फल-मूल लेने के लिए जहाँ-कहीं भी जाते, उस खड्ग की साथ लिए बिना नहीं जाते। तप ही जिनका धन था उस मुनि ने प्रतिदिन शस्त्र ढोते रहने के कारण क्रमश: तपस्या का निश्चय छोड़कर अपनी बुद्धि को क्रूरतापूर्ण बना लिया। फिर तो अधर्म ने उन्हें आकृष्ट कर लिया। वे मुनि प्रमादवश रोद्र कर्म में तत्पर हो गये और उस शस्त्र के सहवास से अंतत: उनको में नरक जाना पडा।

इस प्रकार शस्त्र का संयोग होने के कारण पूर्वकाल में उन तपस्वी मुनि को ऐसी दुर्दशा भोगनी पडी। जैसे आग का संयोग ईंधन के जलाने का कारण होता है उसी प्रकार शस्त्रों का संयोग शस्त्रधारी के हृदय में विकार का उत्पादक कहा गया है।

आगे सीता जी कहतीं हैं कि-'मेरे मन में आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटना की याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना कारण के ही वन में रहने वाले राक्षसों के वध का विचार नहीं करना चाहिए। आपका बिना किसी अपराध के किसी को मारना संसार के लोग अच्छा नहीं समझेंगे। अपने मन और इन्दिर्यों को वश में रखने वाले वीरों के लिए वन में धनुष धारण करने का इतना प्रयोजन है कि वे संकट में पड़े हुए प्राणियों की रक्षा करें।''

अरण्यकाण्ड के नौवें सर्ग से लिए गया यह वृतांत इस उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है कि लोग अस्त्रों-शस्त्रों को शौक के लिए अपने पास भी रखते है और उसके जो परिणाम आते हैं वह बहुत भयावह होते हैं ।
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Friday, January 02, 2009

कबीर के दोहे:हाथी के मुहँ से दाना गिरे तो उसे अन्तर नहीं पड़ता

कुंजी मुख से कन गिरा, खुटै न वाको आहार
कौड़ी कन लेकर चली, पोषन दे परिवार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि खाते हुए हाथी के मुख से यदि अन्न का दाना गिर जाये तो उसके आहार पर कोई अंतर नहीं पड़ता पर उसे चींटी ले जाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करती है। इस तरह यह संसार दया भाव पर चलता है।
भावे जाओ बादरी, भावै जावहु गया
कहै कबीर सुनो भाई साधो, सब ते बड़ी दया

संंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि चाहे बद्रीनाथ जाओ या गया धाम, जहां अच्छा लगे वहां जाओं पर इस संसार में मन को प्रसन्न करने का केवल एक ही तरीका है कि दूसरे पर दया करो।
जहां दया वहां धर्म है, जहां लोभ तहं पाप
जहां क्रोध वहां काल है, वहां क्षमा वहां आप

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जहां दया है वहीं धर्म स्थित होता है और जहां लोभ है वहां पाप है। जहां क्रोध है वहां काल और जहां क्षमा है वहां परमात्मा का वास है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अधिकतर लोग अपने स्वार्थ की सिद्धि कर ही यह मानते हैं कि उन्होंने अपनी कर्तव्य को पूरा कर लिया। अपने परिवार का भरण भोषण करते हुए उसके सदस्यों की मांगों की पूर्ति करने का अर्थ यह नहीं कि हम संसार चला रहे हैं। सुख और दुःख से कोई मुक्त नहीं है। आपत्ति और प्रसन्नता समय के अनुसार सभी को प्राप्त होती है पर फिर भी हमारे लिये परीक्षा के क्षण तब आते हैं जब कि अन्य व्यक्ति को हमारी जरूरत होती है।

समय आने पर दूसरे की मदद करने वाले लोग भी हो्रते हैं। हम समय पड़ने पर किसी की सहायता न करें पर कोई तो किसी की मदद करता ही है। काम किसी का रुकता नहीं है पर हम अगर यह सोचकर किसी की सहायता नहीं करते कि कोई अन्य आकर कर लेगा तो हम अपने धर्म से विमुख होते हैं।
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Thursday, January 01, 2009

भृतहरि संदेश: मद्यपान से लज्जा समाप्त हो जाती है

दौर्मन्त्र्यान्नृपतिर्विनष्यति यतिः सङगात्सुतालालनात् विप्रोऽन्ध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात्
ह्यीर्मद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्रयान्मैत्री चाप्रणयात्सृद्धिरनयात् त्यागपमादाद्धनम्


हिंदी में भावार्थ-कुमित्रता से राजा, विषयासक्ति और कामना योगी, अधिक स्नेह से पुत्र, स्वाध्याय के अभाव से विद्वान, दुष्टों की संगत से सदाचार, मद्यपान से लज्जा, रक्षा के अभाव से कृषि, परदेस में मित्रता, अनैतिक आचरण से ऐश्वर्य, कुपात्र को दान देने वह प्रमाद से धन नष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ संक्षिप्त व्याख्या-आशय यह है कि जीवन में मनुष्य जब कोई कर्म करता है तो उसका अच्छा और बुरा परिणाम यथानुसार प्राप्त होता है। कोई मनुष्य ऐसा नहीं है जो हमेशा बुरा काम करे या कोई हमेशा अच्छा काम करे। कर्म के अनुसार फल प्राप्त होता है। अच्छे कर्म से अर्थ और सम्मान की प्राप्ति होती है। ऐसे में अपनी उपलब्ध्यिों से जब आदमी में अहंकार या लापरवाही का भाव पैदा होता है तब अपनी छबि गंवाने लगता है। अतः सदैव अपने कर्म संलिप्त रहते हुए अहंकार रहित जीवन बिताना चाहिये।

यह मानकर चलना चहिये कि हमें मान, सम्मान तथा लोगों का विश्वास प्राप्त हो रहा है वह अच्छे कर्मों की देन है और उनमें निरंतरता बनी रहे उसके लिये कार्य करना चाहिये। अगर अपनी उपलब्धियों से बौखला कर जीवन पथ से हट गये तो फिर वह मान सम्मान और लोगों का विश्वास दूर होने लगता है।
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