जब केवल प्राक्रृतिक मिट्टी से बना तेल का दीपक रौशनी करता था तो लोगों की लालसायें और आकांक्षायें इतनी अधिक नहीं थी। जैसे रौशनी के लिये कृत्रिम सामान बनते गये वैसे वह उसकी आकांक्षायें और लालसायें बढाती गयीं।
बस आदमी को रौशनी चाहिये। पद,पैसा और प्रतिष्ठा में ही अपने जीवन की रौशनी ढूंढने वाला आदमी उनको पाकर भी संतुष्ट नहीं रह पाता। उसके मन में अंधेरा ही रहता है क्योंकि वह ज्ञान के दीपक नहीं जलाता। पहले यह चाहिये! वह मिल गया तो वह चाहिये। बस चाहिये। किसी को कुछ देना नहीं है। आदमी का सोच बस एक ही है कि ‘मुझे को खुश करे’ पर वह स्वयं किसी को खुश न तो करता और न देख पाता है। ज्ञान प्राप्त करने वालों ने तेल से जलते हुए दीपक में अपना काम चलाया और जिनको केवल माया प्राप्त करनी है उनका मन तेज रौशनी की ट्यूबलाईट में भी बुझा रहता है। जितना धन उतनी उसकी रक्षा की चिंता, जितना बड़ा पद वहां से नीचे गिरने का भय और जितनी अधिक प्रतिष्ठा उतनी अधिक बदनामी की आशंका आदमी को अंधेरे में डाल देती है। वह घबड़ाता हुआ रौशनी की तरफ भागता है। कभी टीवी देखता है कभी शराब पीता है तो कभी अन्य व्यसनों के सहारे अपने लिये खुशी जुटाना चाहता है। वह बढ़ता जाता है अंधेरे की तरफ।
पश्चिम की मायावी संस्कृति में अपनी सत्य संस्कृति मिलाकर जीवन बिताने वाले इस देश के लोगों के लिये दीपावली अब केवल रौशनी करने और मिठाई खाने तक ही सीमित रह गयी है। अंधेरे में डूबा आदमी रौशनी कर रहा है-वह आंखों से दिखती है पर उसका अहसास नहीं कर पाता। पर्यावरण प्रदूषण,मिलावटी सामान और चिंताओं से जर्जर होते जा रहे शरीर वाला आदमी अपनी आंखों से रौशनी लेकर अंदर कहां ले जा पाता है। अपने हाथों से आदमी ने काटा है अपने स्वस्थ और प्रसन्न जीवन का सामान।
मनुष्य के अपने मन के भटकाव को नहीं समझ पाता। वह उस आध्यात्म ज्ञान से घबड़ाता है जिसकी वजह से पश्चिम आज भी भारत को अध्यात्मक गुरु मानता है। इतनी संपन्नता के बाद भी वह अपने मन से नहीं भागता तो इस देश में व्यवसायी साधु,संतों,फकीरों और सिद्धों के दरवाजे पर भीड़ नहीं लगती। स्वयं ज्ञान से रहित लोग उनके गुरू बनकर उनका दोहन नहीं करते। अपने पुराने ग्रंथों में लिखी हर बात को पौंगापंथी कहने वाले लोग नहीं जानते कि इस प्रकृति के अपने नियम हैं। वह यहां हर जीव को पालती है। हर जीव अपने जीवन में विकास कर फिर दुनियां से विदा हो जाता है।
यहां के आदमी को सुना दिये गये हैं कुछ ऐसे श्लोक और दोहे जो अपने समय में प्रासंगिक थे पर अब नहीं। यह योजनापूर्वक किया गया ताकि वह आज भी प्रासंगिक ज्ञान से वंचित रहे। उसके सामने रख दी गयी हैं विदेशों से आयातित कुछ पंक्तियां जिन पर लिखी जा रही है आधुनिकता और विकास की नयी कहानियां। जीवन के सत्य नहीं बदलते पर उन्हें समझता कौन है? पूरा का पूरा समाज अव्यवस्था की चपेट में हैं। कहते हैं कि यह समाज पहले बंटा हुआ था इसलिये गुलाम रहा पर आज तो उसे और अधिक बांट दिया गया है। परिवारों में महिला,पुरुष,बालक और वृद्ध के विभाजन करते हुए उनकी रक्षा के लिये नियम बनाये गये। समाज को नियंत्रित करने के लिये राज्य से अपेक्षा की जा रही है-मान लिया गया है कि इस देश में अब भले लोग नहीं हैंं। इतना बड़ा विश्वास लोग स्वीकार कर रहे हैंं। डंडे के जोर पर आदमी को अपने परिवार से निर्वाह करने के प्रयास दर्शाते हैं कि देश के आदमी पर भरोसा नहीं रहा।
विज्ञान में प्रगति आवश्यक है यह बात तो हमारा अध्यात्म मानता है पर जीवन ज्ञान के बिना मनुष्य प्रसन्न नहीं रह सकता यह बात भी कही गयी है। जीवन का ज्ञान न तो बड़ा है न गुढ़ जैसा कि इस देश के कथित महापुरुष और विद्वान कहते हैं। वह सरल और संक्षिप्त है पर बात है उसे धारण करने की। अगर उनको धारण कर लो तो ज्ञान का ऐसा अक्षुण्ण और दिव्य दीपक प्रकाशित हो उठेगा जिसका प्रकाश न केवल इस देह के धारण करते हुए बल्कि उससे विदा होती आत्मा के साथ भी जायेगा। इस दिव्य दीपक की रौशनी से प्रतिदिन दीपावली की अनुभूति होगी फिर देख सकते हो कि किस तरह वर्ष में केवल एक दिन लोग दीपावली मनाते हुए भी उसकी अनुभूति नहीं कर पाते। फिर जाकर देखो वहां जहां सफेद और गेहुंऐ वस्त्र पहने उन ज्ञान के व्यापरियों को जो स्वयं अंधेरे में हैं और लोग उनसे रौशनी खरीद रहे हैं। देखो उनके सत्संग के उपक्रम को जो ऐसे स्वर्ग को दिलवाता है जो कहीं बना ही नहीं।
देखो जाकर सन्यासियों को्! इस धरा पर सन्यास लेना संभव है ही नहीं। हां, भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में इसको एक तरह से खारिज कर दिया है क्योंकि यह संभव नहीं है कि इस धरती पर रहते हुए आदमी अपनी इंद्रियों से काम न ले। सन्यास का अर्थ है कि आदमी अपनी सभी इंद्रियों को शिथिल कर केवल भगवान के नाम का स्मरण कर जीवन गुजार दे। मगर आजकल के सन्यासी कहते हैं कि आजकल यह संभव नहीं हैं कि केवल भगवान का स्मरण करने के लिये पूरा जीवन कंदराओं में गुजार दे क्योंकि समाज को मार्ग दिखाने का भी तो उनका जिम्मा है। वह झूठ बोलते हैं कंदराओं में केवल बुढ़ापे में जाया जाता है और उसे सन्यास नहीं बल्कि वानप्रस्थ कहा जाता है क्योंकि उसमें वन में आदमी अपनी इंद्रियों से कार्य करता है।
ज्ञान और ध्यान बेचने वाले व्यापारी ढोंग करते हैं। उनसे दीक्षा लेने से अच्छा है तो बिना गुरु के रहा जाये या फिर एकलव्य बनकर किसी गुरू की तस्वीर रखकर ज्ञान का अभ्यास किया जाये। गलत गुरु की दीक्षा अधिक संकटदायक होती है। यह गुरु मोह और मायाजाल के भंवर में ऐसा फंसे कि वहां से स्वयं नहीं निकल सकते तो किसी अन्य को क्या निकालेंगे। वहां जाकर देखो कि किस तरह शारीरिक और मानसिक विकारों से ग्रस्त लोग किस तरह वहां अपने लिये औषधि ढूंढ रहे हैं।
निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया ही वह शक्ति जो आदमी के अंदर प्रज्जवलित ज्ञान के दिव्य दीपक की रौशनी के रूप में बाहर फैलती दिखाई देती है। ज्ञान खरीदा नहीं जा सकता जबकि गुरु उसे बेच रहे हैं। कहते हैं कि हम कुछ देर के लिये आदमी के लिये आदमी का संताप कम कर देते हैं पर देखा जाये तो अगर थोड़ी देर के लिये ध्यान बंट जाये तो कुछ स्फूर्ति अनुभव होती है पर अगर यह ध्यान किसी प्रस्तर की प्रतिमा के सामने बैठकर स्वयं प्रतिदिन लगाया जाये तो वह पूरा दिन ऊर्जा देती है। जब भी कहीं मानसिक संताप हो तो भृकुटि पर दृष्टि कर बंद आखों से ध्यान किया जाये तो एकदम राहत अनुभव होती है। इसके लिये ज्ञान और ध्यान बेचने वालों के पास जाने की आवश्यकता नहीं क्योंकि वहां आप प्रतिदिन नहीं जा सकते। अगर गये तो वह अपनी फीस मांगेंगे या फिर उनके खास चेले आपत्ति करेंगे।
यह लेखक कोई सिद्ध नहीं है पर अपने अनुभव सुनाते हुए अच्छा लगता हैं। दीपावली पर ढेर सारे बधाई संदेश मिले। उनका यह जवाब है। यह लेखक देखना चाहता है ज्ञानी के दिव्य दीपक की रौशनी से ओतप्रोत लोगों का एक समूह जिससे पूरा समाज प्रकाशित हो। दिखावा कर तो एक दिन भी प्रसन्नता नहीं मिल सकती। अपने अंदर जला लो ज्ञान और ध्यान का दिव्य दीपक तो जीवन पर दीपावली की अनुभूति होगी। किसी एक दिन किसी की शुभकामनाओं की प्रतीक्षा नहीं रहेगी। बल्कि बाकी दिनों में मिलने वाला हर शुभकामना संदेश वैसा ही लगेगा जिससे दिल प्रसन्न हो उठेगा। अपने अंतर्मन में ज्ञान और ध्यान के जलते दीपक की रौशनी में देख सकते हो और खुलकर हंस भी सकते हो और सुख की अनुभूति ऐसी होगी जो अंदर तक स्फूर्ति प्रदान करेगी।
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