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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Wednesday, March 23, 2011

वाणी और धन के बीमार अपने वश में नहीं होते-हिन्दी धार्मिक चिंत्तन

जैसे जैसे मनुष्य का अध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता जाता है वैसे वैसे उसे इस संसार के भोग विलास की वास्तविकता समझ में आती है। उपभोग की प्रवृत्ति किस तरह मनुष्य को पशु बनाकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये इस संसार में बांधे रहती है इसका आभास तत्वज्ञानी को हो जाता है। ‘दिल मांगे मोर’ का नारा बाज़ार में प्रचार के माध्यम से इसलिये उछाला जाता है कि लोग विज्ञापित वस्तु का क्रय करने के लिये लालायित हों।
समाज में बाज़ार तथा उसके परचार माध्यमों से उपभोग कि प्रवृति बढ़ाई जा रही है रोज देखा जा सकता है।
  एक विज्ञापन में तो भारतीय फिल्मों का एक अभिनेता साफ कहता है कि ‘आदमी को कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए। जो लोग संतुष्ट होते हैं वह जिंदगी में कुछ नहीं कर पाते।’
कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य की लालच का कोई अंत नहीं है। अक्सर समाचारों में यह चर्चा आती है कि भारत के उच्च वर्ग का बहुत सारा काला धन विदेशी बैंकों में जमा है। यह उच्च वर्ग ऐसा है जो यहां भारत में रहकर आदर्शवाद, नैतिकतावाद तथा कल्याण वाद की राह पर चलने का दावा करते हुए समाज पर नियंत्रण रखता है मगर उसकी पैसे की हवस मिटती नहीं। अनेक राजकीय अधिकारी पकड़े गये हैं जिन्होंने इतना धन अर्जित किया कि उनकी आगे की दस पीढ़ियां भी नहीं खा सकती। इतने सारे आवास बना लिये कि उनकी पचास पीढ़ियों के वंशज भी उसमें रह जायें तो कम लगें। यह केवल उच्च वर्ग ही नहीं सामान्य वर्ग पर भी लागू है। लोगों में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति रुझान ही नहीं रहा। समाज में भौतिकवाद का इतना बोलाबाला है कि अगर तत्वज्ञानी उनमें बैठकर ज्ञानचर्चा करे तो उसे पागल समझा जाता है। जिनके पास अध्यात्मिक ज्ञान है वह सांसरिक विषय में चर्चा करने में रुचि नहीं लेते तो उनको अज्ञानी मान लिया जाता है।
पुण्यैर्मूलफलैस्तथा प्रणयिनीं वृत्तिं कुरुष्वाधुना
भूश्ययां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
क्षधद्राणामविवेकमूढ़मनसां यन्नश्वाराणां सदा
वित्तव्याधिविकार विह्व्लगिरां नामापि न श्रूयते।।
"भर्तृहरि महाराज अपने प्रजाजनों से कहते हैं कि अब तुम लोग पवित्र फल फूलों खाकर जीवन यापन करो। सजे हुए बिस्तर छोड़कर प्रकृति की बनाई शय्या यानि धरती पर ही शयन करो। वृक्ष की छाल को ही वस्त्र बना लो लो। अब यहां से चले चलो क्योंकि वहां उन मूर्ख और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों का नाम भी सुनाई नहीं देगा जो अपनी वाणी और संपत्ति से रोगी होने के कारण अपने वश में नहीं है।"
ऐसे में ज्ञानियों के लिये मौन ही अच्छा है। अपने नियमित कर्मं करने के साथ ही ज्ञानियों के लिये यह भी जरूरी है कि वह भौतिकवादी लोगों के बाहुल्य वाले समाज में अर्थ, प्रतिष्ठा या उच्च पद के अभाव में सम्मान या इनाम की आशा न करें। वह तो दृष्टा की तरह इस संसार को देखें और अपना काम करते जायें।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

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1 comment:

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (24-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

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