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Sunday, January 10, 2010

श्रीमद्भागवत गीता-ज्ञानी के लिये मिट्टी, पत्थर और सोना एक समान (shri madbhagvat geeta in hindi)

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रिय।
युक्त इत्युच्यते योगी समोलोष्टाश्मकांचनः।।
हिंदी में भावार्थ-
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि जो ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकार रहित है, जिसकी इंद्रियां भलीभांति जीती हुई है और जिसके लिये मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान है वह योगी, युक्त अर्थात भगवत्प्राप्त ऐसा कहा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अनेक कथित विद्वान भगवान श्रीकृष्ण के निष्काम भाव से कर्म के संदेश का गलत भाव ही लेते हैं। दरअसल इसका स्पष्ट आशय यह है कि मनुष्य कभी स्थिर नहीं रह सकता और इसलिये समाज भी परिवर्तन शील है और सभी मनुष्यों को भक्ति और ज्ञान के साथ अपना दायित्व निर्वाह भी करना चाहिए। वह ज्ञान के साथ विज्ञान की प्राप्ति पर भी अपना मत व्यक्त करते हैं। इसका अर्थ स्पष्ट है कि मनुष्य को निंरतर सक्रिय रहना चाहिये तभी वह अपनी रक्षा कर सकता है। उसमें नित नयी चीजों के निर्माण और उनके प्रयोग की प्रवृत्ति हो न कि रूढ़ियों और अंधविश्वासों में बंधकर यथास्थितिवादी होकर वह रहे।
वह एक सक्रिय समाज चाहते हैं। आपने सुना होगा कि अनेक मूर्ख लोग कहते हैं कि ‘अमुक ज्ञानी है तो फिर काम क्यों करता है?’
जो वास्तव में ज्ञानी होगा वह हमेशा सक्रिय रहेगा। हां, वह अपने दैहिक कर्म से मिलने वाले फलरूपी धन या साधन को अंतिम नहीं मानता क्योंकि उससे प्राप्त फल तो अन्य दैहिक दायित्वों की पूर्ति में लगाता है। जो लोग श्रीगीता को सन्यास के लिये प्रवृत्त करने वाली बताते हैं वह घोर अज्ञानी है यह इसी श्लोक से समझा जा सकता है। सन्यास निष्क्रियता में नहीं वरन् फल के स्वरूप को समझने में है। सच बात तो यह है कि कुछ विद्वान श्रीगीता की सही व्याख्या न कर उसे केवल भक्ति करने वाला ही ग्रंथ इसलिये प्रचारित करते हैं क्योंकि उनको नहीं लगता कि समाज में चेतना आये।
हमारा अध्यात्मिक दर्शन ज्ञान के साथ विज्ञान में भी पारंगत होने की प्रेरणा देता है ताकि इस पृथ्वी पर जीवन का सहजता से विचरण हो। श्रीमद्भागवतगीत हमारा ऐसा आधार ग्रंथ है जिस पर पूरा विश्व यकीन करता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anantraj.blogspot.com

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1 comment:

वन्दना said...

bilkul sahi kaha aapne aur bilkul sahi vyakhya ki hai.......yahi to antar hai gyani mein wo sab janta hai magar tab bhi karm karta hai kyunki use pata hai ki yadi karm nhi karega to duniya bhi usi ka anusaran karke nishkriya ho jayegi ..........karm karna to jeevan ke sath juda hai aur koi bhi manushya ek bhi pal karm kiye bina nhi rah sakta to phir gyani ka to kehna hi kya........aapne ek sarthak aur upyogi vyakhya ki hai.

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