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Wednesday, July 13, 2016

लाशों में ढूंढ रहे दुआ-हिन्दी व्यंग्य कविता(Lashon mein DhoonDh rahe Duaa-HindiSatirePoem)


दिल के दरवाजे
बंद कर लिये
प्यार की दस्तक
अब वह कहां सुनेंगे।

संबंध के बिगड़े हिसाब
दोस्त तब वफा के
वादे क्यों बुनेंगे।

कहें दीपकबापू जज़्बात से
जीने की आदत
नहीं रही इंसानों में
लाशों में ढूंढ रहे दुआ
जिंदादिली वह क्यों चुनेंगे।
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Thursday, April 14, 2016

पेट भरकर भूखों के लिये बवाल करते-दीपकबापूवाणी (DeepakbapuWani)

चंद पलों की खुशी में जीवन लगा देते, सुख की अनवरत भूख जगा देते।
‘दीपकबापू’ कामनायें खूब मन में पाले, यह अलग बात अपने कर्म दगा देते।।
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कभी जीत कभी हार खेल जारी है, पहले से तय जीत हार की बारी है।
‘दीपकबापू’ पैसे के माहिर खिलाड़ी, कमाते चाहे उन्होंने नीयत हारी है।।
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पेट भरकर भूखों के लिये बवाल करते, अपनी रोटी छिनने से दलाल डरते।
‘दीपकबापू’ समाज का ठेका लेकर, सात पुश्तों के लिये घर में माल भरते।।
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सब जानते दिया तले अंधेरा होता, सामने लगी तस्वीर पीछे खाली होता।
‘दीपकबापू’ दौड़े दौलत की राह, देह के शत्रु बाग का जैसे माली होता।
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बाहर भीड़ में लगाते जोरदार नारे, कमरे के अंदर महफिल सजाते सारे।
‘दीपकबापू’ चतुरों के प्रशंसक बहुत, रोज धोखा खाते लोग नसीब के मारे।।
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धर्म बढ़ाने के लिये उन्हें धन चाहिये, समाज बचाने के लिये चंदा चाहिये।
‘दीपकबापू’ भरोसे का बाज़ार लगाते, मु्फ्त सौदे की भी कीमत चाहिये।।
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एतिहासिक योद्धाओं जैसा होने की चाहत, कर देती दिल दिमाग आहत।
‘दीपकबापू’ लगवाते नारे अपनी जय के, बरसों से बेबस ढूंढ रहा राहत।।
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भाषण में नारों से दिल बहलाते, राशन न मिलने का दर्द भी सहलाते।
‘दीपकबापू’ शब्द खाते अर्थ पी जाते, बक्ता जो बकें श्रेष्ठ वही कहलाते।।
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बहुत है घाव पर नमक छिड़कने वाले, बहुत हैं चेहरे काली नीयत वाले।
‘दीपकबापू’ फंसाये सोच मतलब में, परोपकारी की उपाधि गले में डाले।।
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आम आदमी अपना दर्द स्वयं झेले, नया भूल पुराने खिलौने से खेले।
‘दीपकबापू’ कभी बने छोटे कभी खास, हर सवाल पर जवाब मौन ठेले।।
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सोचें दिमाग से दिल की बात करें, इश्क के नाम इज्जत पर घात करें।
‘दीपकबापू’ नयेपन का ओढ़ा लबादा, फिर भी पुरानी आदतें मात करें।।
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जल्दी बदलता परिधान का प्रचलन, अपना पुराना देख होती जलन।
‘दीपकबापू’ पोतकर चमका बूढ़ा चेहरा, नयी जवानी का यही चलन।।
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पेट में खाना भरें कि पचे नहीं, घर में सामान इतना कि जचे नहीं।
‘दीपकबापू’ भरे ढेर सपने दिमाग में, तंग सोच से लोग बचे नहीं।।
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ज्ञान की तिलक पहचान नहीं होता, मतलब से मिला मान नहीं होता।
‘दीपकबापू’ निहारते गुलाब की तरफ, कांटों का उसे भान नहीं होता।।
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माया की कृपा भी डर से छिपातेहैं, लोग लूट को कमाई दिखाते हैं।
‘दीपकबापू’ सिद्धांत टांगे दीवार पर, पीछे अपनी अनैतिकता छिपाते हैं।।
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अन्न जल का मोल समझे लोग कहां, अपनी आंखें गढ़ाते सोना दिखे जहां।
‘दीपकबापू’ थाली लोटा सजा जब सामने, भूख प्यास पर अच्छी बहस हो वहां।।
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वादे करने का सिलसिला नहीं टूटता, बदले चेहरे तो भरोसा नहीं टूटता।
‘दीपकबापू’ अपनी करनी की सजा भोगते, राजा या रंक कोई नहीं  छूटता।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Sunday, February 14, 2016

भारतीय समाज अब भी चेतनावान है (bhartiy samaj ab bhi chentawan hai)

              जवाहरलालनेहरुविश्वविद्यालय में हुए देशविरोधी प्रदर्शनों से एक बात साफ हो गयी है कि प्रगति व जनवादी विचारधारा के ध्वजवाहक भयानक रूप से कुंठित हैं। प्रगतिशील  व जनवादी विचारधारा के यह नये जमूरे देश में वर्तमान प्रबंध व्यवस्था में शामिल विपरीत दृष्टिकोण वाले लोगों को विरोधी नहीं शत्रु मान रहे है। इनकी कुंठा इतनी भयानक है कि आतंकवादी उन्हें सेनानी और आत्मघाती शहीद लगते हैं। वह अहंकार और अज्ञान के ऐसे वैचारिक अंधेरे में जी रहे हैं जिससे उनका निकलना मुश्किल है।
                        अध्यात्मिक विचाराधारा होने के कारण हमें प्रगतिशील व जनवादी विचारकों के चिंत्तन में कोई आकर्षण नहीं दिखता पर शैक्षणिक संस्थाओं में इनका  प्रभाव अब भी जबरदस्त है जबकि वह  स्वयं  भयानक अज्ञान के अंधेरे में विराजमान लगते हैं। लोकतंत्र सिद्धांतों के अनुसार वर्तमान प्रबंध व्यवस्था का विरोध करने की सभी को आजादी है पर इस आड़ में अपने ही देश  विरोध करना पागलपन नहीं अपराध है यह बात उन्हें समझना होगी।
             एक ऐसे विश्वविद्यालय में जो जनता के पैसे से चल रहा है वहां शिक्षा लेते हुए भारत की बर्बादी देखने की चाहत देखने वालों को कैसे समाज बर्दाश्त करे जब उस पर वैसे ही असहिष्णु होने का आरोप लग रहा हो। देशविरोधी नारे तथा आतंकी की फांसी का विरोध करने के कार्यक्रम को वह समाज कैसे बर्दाश्त करेगा जिसे असहिष्णुता कहकर निर्लज्ज कर दिया गया है। सच बात तो यह है कि पिछले दिनों जिस तरह असहिष्णुता का आरोप लगाकर जिस तरह पूरे भारतीय समाज को वैश्विक स्तर पर बदनाम किया गया है उससे यह डर समाप्त हो गया है| अब लोग सोचते हैं  कि इससे ज्यादा बदनामी तो हो नहीं सकती।  इसलिये जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में सक्रिय कथित क्रांतिकारियों को अब ज्यादा उम्मीद नहीं रखना चाहिये। उनके समर्थक या मार्गदर्शक बुद्धिजीवी यह बात समझ लें। वह कह रहे हैं कि जेएनयू का मसला देश में दक्षिणपंथियों के विरुद्ध जायेगा, यह भी तो सोचें कि पूरा भारतीय समाज चेतनावान है और तमाम वैचारिक हमलों के बावजूद वहा प्राचीन तत्वों से जुड़ा है। सीधी बात कहें तो समाज में दक्षिणपंथियों की जड़ें प्रगतिशील और जनवादियों से कहीं जयादा गहरी हैं। संभव है यह समाज  अपने अपमान का प्रतिकार करने के लिये दक्षिणपंथियों का अधिक पुरजोर ढग से साथ देने लगें।
     दूसरा तथ्य यह भी है कि  भारत व हिन्दू धर्म के विरुद्ध जाकर इस देश में कोई क्रांति नहीं हो सकती यह बात प्रगति व जनवादी विद्वानों को समझ लेना चाहिये। जहां तक भारतीय समाज का सवाल है उसे असहिष्णु कहकर वैसे ही बदनाम कर दिया तो वह देश व धर्म विरोधियों से क्यों सहानुभूति दिखायेगा? सच बात तो यह है कि अभी तक राजकीय संस्थाओं से प्रगतिशील व जनवादियों को जो प्रश्रय मिल रहा था वह समाप्त हो रहा है जिससे निराशा होकर प्रचार पाने के लिये वह अनेक तरह की नाटक बाजी कर रहे हैं यह उसी का हिस्सा है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Wednesday, January 20, 2016

संसार के जीवों में भिन्नता रहना स्वाभाविक-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(Sansar ki jivon mein Bhinnta rahana SwaBhavik-Bhartrihari Neeti Shatak ka Adhar pa chinttan lekh)

          हमारे देश में आजादी के बाद कथित रूप से बौद्धिक जगत में अनेक विचाराधारायें प्रवाहित हुईं है जिसमें लोगों के मस्तिष्क हरण कर उन्हें मौलिक चिंत्तन से दूर रखने का प्रयास इस उद्देश्य से किया गया कि वह यथास्थिति में परिवर्तन का विचार ही न करें। गरीब तथा असहाय के कल्याण का नारा इतना लोकप्रिय रहा है कि इसके सहारे अनेक लोगों ने समाज में श्रेष्ठ पद प्राप्त किया।  इसके बावजूद गरीब, असहाय तथा श्रमिकवर्ग की स्थिति में बदलाव नहीं हुआ।  यह अलग बात  है कि नारों के सहारे लोकप्रिय हुए कथित आदर्श पुरुषों का अनुसरण करने के लिये अनेक युवक युवतियां आज भी सक्रिय हैं।  सभी का एक ही लक्ष्य है कि गरीब को धनी, असहाय को शक्तिशाली और श्रमिक को सेठ बनायें। इस काल्पनिक लक्ष्य की पूर्ति के लिये अनेक लोग बौद्धिक साधना करते है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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वैराग्य सञ्चरत्येको नीती भ्रमति चापरः।
श्रृङ्गारे रमते कश्चिद् भुवि भेदाः परस्परम्।।
                              हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में भिन्न प्रकार के लोग होते ही हैं। कोई वैराग्य साधना के साथ मोक्ष के लिये प्रयासरत है तो नीति शास्त्र के सिद्धांतों में लीन है तो कोई श्रृंगार रस में लीन है।
                              हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार इस संसार के जीवों के स्वभाव में भिन्नता सदैव रहती है। स्वभाव के अनुसार ही सभी कर्म करते हैं तो परिणाम भी वैसा ही होता है। जो लोग सारे संसार के जीवों को एक रंग में देखना चाहते हैं उन्हें तो मनोरोगी ही माना जा सकता है। समाज सुधारने की मुहिम में अनेक लोगों ने प्रतिष्ठा प्राप्त की जबकि सच यह है इस संसार के चाल चलन में परिवर्तन स्वभाविक रूप से आता है। इसके बावजूद लोगों में भिन्नता बनी ही रहती है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, December 27, 2015

राजा को किसान की तरह होना चाहिये-मनुस्मृत्ति के आधार पर चिंत्तन लेख (A King Should As Farmer-A Hindi Article based on ManuSmriti)


           भारतीय अध्यात्मिक दृष्टि प्रजा हित के लिये राज्य प्रमुख को किसान से सबक लेना वैसे हर मनुष्य को अपने आश्रितों की रक्षा के लिये संघर्ष करना चाहिये।  उसी तरह राजसी पदों पर कार्य करने वालों को अपनी कार्यप्रणाली किसानों की तरह ही अपनाना चाहिये जो अपनी फसल के उत्पादन के लिये जमकर मेहनत करने के बाद भी उसकी रक्षा के लिये प्रयास करते हैं।  खेतों में खड़ी फसल कोई पशु न खाये इसके लिये वह उसे भगा देते हैं। फसल के शत्रु कीड़ोें का नाश करते हैं।  राजसी पदों पर कार्य करने वाले लोगों को भी अपने क्षेत्र की प्रजा की रक्षा के लिये ऐसे ही प्रयास करना चाहिये।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यथेद्धरति निदांता कक्ष धान्यं च रक्षति।
तथा रक्षेन्नृपोराष्ट्रं हन्याच्च परिपन्विनः।।
                           हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकार किसान अपने धन की रक्षा के लिये खरपतवार उखाड़ फैंकता है वैसे ही राजा को प्रजा के विरोधियों का समूल नाश करना चाहिये।
                           राजनीति में आजकल हिंसक प्रयासों से अधिक कूटनीति को भी महत्व दिया जाता है इसलिये राजसी पुरुषों को ऐसे प्रयास करना चाहिये जिससे अपराधी तथा प्रजाविरोधी तत्व सक्रिय न हों। जो राजसी पुरुष ऐसा नहीं कर पाते उनकी प्रजा भयंकर संकट में घिर जाती है। हम मध्य एशिया में जिस तरह के हालत देख रहे हैं उसका यही निष्कर्ष है कि वहां के राजसी पुरुषों ने ऐसा नहीं किया जिससे अब वहां तबाही का दौर चल रहा है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Saturday, December 12, 2015

भारतीय धर्म ही पंथनिरपेक्ष है-हिन्दी चिंत्तन लेख (Indian relgion is natural panthnirpeksh-Hindu spritual thought article)

                           इस समय देश में धर्मनिरपेक्षता पर बहस चल रही है। कुछ पेशेवर विचारक कहते हैं कि हमारी संस्कृति धर्म निरपेक्ष है जबकि अध्यात्मिक चिंत्तकों का मानना है कि धर्म धारण करने का विषय है।
                           गीता में कर्म ही धर्म का पर्याय है जिससे मनुष्य निरपेक्ष नहीं रह सकता। उसमें भक्ति के तीन प्रकार पंथनिरपेक्षता का सटीक प्रमाण है। भारतीय ज्ञान के अनुसार कर्म ही धर्म रूप है जिससे निरपेक्षता संभव नहीं है पर भक्ति के किसी भी रूप से भेद न रखकर पंथनिरपेक्ष होना ही चाहिये।
                            भारतीय अध्यात्मिक दर्शन पर चलने वाले कर्म में ही धर्म देखते हैं इसलिये निरपेक्ष नहीं होते। भक्ति के प्रथक रूप स्वीकार करने कारण पंथरिनपेक्ष तो स्वाभाविक रूप से होते ही हैं।
                          विश्व में अकेला भारतीय ज्ञान ही कर्म निर्वाह ही धर्म मानता है तो भक्ति के अनेक रूप को स्वीकार कर पंथनिरपेक्ष रहने की प्रेरणा भी देता। आपकीबात आज भी आम भारतीय धर्मनिरपेक्षता शब्द से आत्मीय संबंध नहीं जोड़ पता क्योंकि वह स्वाभाविक रूप से पंथनिरपेक्ष होता ही है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Wednesday, September 02, 2015

आज ट्विटर पर चर्चा के विषयों पर संक्षिप्त लेख(today disscusion on Twitter public subject)


         मजदूर नेता निंरतर आंदोलन चलाने में दैहिक तथा मानसिक श्रम से बचने के लिये हड़ताल करवाते हैं। मजदूरनेता अब कमरे के अंदर और बाहर अलग रवैये के कारण श्रमजीवियों के विश्वासपात्र नहीं रहे। श्रम संगठनों के नेता भारतीय इतिहास में मजदूरों के हित के लिये हुए एक भी सफल आंदोलन का नाम नहीं बता सकते। हमारा मानना है कि प्रबंधक अगर श्रमिक वर्ग से से  सीधे संपर्क में रहकर उनकी समस्यायें हल करें तो मजदूर नेता बेकार हो जायेंगे। कथित श्रमिकनेता अधिकारी तथा कर्मचारी के बीच सेतु की बजाय दलाल बनकर अपना हित साधते हैं। उनकी विश्वसनीयता कम हुई है। हालांकि हमारा मध्यम तथा मजदूर वर्ग की खुशहाली के बिना देश खड़ा नहीं रह सकता इसलिये उस पर ध्यान देना चाहिये। बंद और हड़ताल से जनमानस में कर्मचारियों की छवि खराब होने के साथ सहानुभूति भी खत्म होती है।
          देश का प्रबंध दिल्ली से चले या नागपुर से आम आदमी को तो अपने हित से मतलब है। राष्ट्रीयस्वयंसेवकसंघ एक सामाजिक संगठन है। समाज निर्माण में राजसीकर्म आवश्यक है जो राजसी बुद्धि से ही होते हैं। वनरैंकवनपैंशन पर राष्ट्रीयस्वयंसेवक संध के प्रयासों से यह जाहिर हो गया है कि वह राष्ट्रवाद का पोषक है। आमभारतीय नागरिक की दृष्टि में राष्ट्रीयस्वयंसेवकसंघ में एक ऐसा संगठन है जो भारतीय ज्ञान, दर्शन और समाज की रक्षा के लिये काम करता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Thursday, August 27, 2015

सरकारी सेवाओं में अब कुशल प्रबंध की योग्यता वाले होना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन लेख(best menager apoint in Governement service of country devlopment-hindi article)


                                   किसी जाति, भाषा या धर्म के लोगों को सरकारी सेवाओें में आरक्षण दिलाने के नाम पर आंदोलनकारी लोग कभी अपने अपने समाज के नेताओं से यह पूछें कि क्या वास्तव में देश के सरकारी क्षेत्र  उनके लिये नौकरियां कितनी हैं? सरकार में नौकरियों पहले की तरह मिलना क्या फिर पहले की तरह तेजी से होंगी? क्या सभी लोगों को नौकरी मिल जायेगी।
                                   सच बात यह है कि सरकारी क्षेत्र के हिस्से का बहुत काम निजी क्षेत्र भी कर रहा है इसलिये स्थाई कर्मचारियों की संख्या कम होती जा रही है।  सरकारी पद पहले की अपेक्षा कम होते जा रहे हैं। इस कमी का प्रभाव अनारक्षित तथा आरक्षित दोनों पदों पर समान रूप से हो रहा है।  ऐसे में अनेक जातीय नेता अपने समुदायों को आरक्षण का सपना दिखाकर धोखा दे रहे हैं।  समस्या यह है कि सरकारी कर्मचारियों के बारे में लोगों की धारणायें इस तरह की है उनकी बात कोई सुनता नहीं।  पद कम होने के बारे में वह क्या सोचते हैं यह न कोई उनसे पूछता है वह बता पाते है।  यह सवाल  सभी करते भी हैं कि सरकारी पद कम हो रहे हैं तब इस  तरह के आरक्षण आंदोलन का मतलब क्या है?
                                   हैरानी की बात है कि अनेक आंदोलनकारी नेता अपनी तुलना भगतसिंह से करते है।  कमाल है गुंलामी (नौकरी) में भीख के अधिकार (आरक्षण) जैसी मांग और अपनी तुलना भगतसिंह से कर रहे हैं। भारत में सभी समुदायों के लोग शादी के समय स्वयं को सभ्रांत कहते हुए नहीं थकते  और मौका पड़ते ही स्वयं को पिछड़ा बताने लगते हैं।
             हमारा मानना है कि अगर देश का विकास चाहते हैं तो सरकारी सेवाओं में व्याप्त अकुशल प्रबंध की समस्या से निजात के लिय में कुशलता का आरक्षण होना चाहिये। राज्य प्रबंध जनोन्मुखी होने के साथ दिखना भी चाहिये वरना जातीय भाषाई तथा धार्मिक समूहों के नेता जनअसंतोष का लाभ उठाकर उसे संकट में डालते हैं। राज्य प्रबंध की अलोकप्रियता का लाभ उठाने के लिये जातीय आरक्षण की बात कर चुनावी राजनीति का गणित बनाने वाले नेता उग आते हैं। जातीय आरक्षण आंदोलन जनमानस का ध्यान अन्य समस्याओं से बांटने के लिये प्रायोजित किये लगते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Saturday, August 22, 2015

निष्काम भाव ही आनंद से रहने का उपाय-हिन्दी चिंत्तन लेख(mishkam bhaw hi anand se rahane ka upay-hindi religion thought article)


                                   कर्म तीन प्रकार होता है-सात्विक, राजसी और तामसी। हम यहां राजसी कर्म  फल और गुण की चर्चा करेंगे।  अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह तथा काम के वशीभूत ही राजसी कर्म होते हैं। अतः ज्ञानी लोग कभी भी राजसी कर्म में तत्पर लोगों से सात्विकता की आशा नहीं करते। आज के संदर्भ में देखा जाये तो प्रचार माध्यमों में राजसी कर्म में स्थित लोग विज्ञापन के माध्यम से सात्विकता का प्रचार करते हैं पर उनके इस जाल को ज्ञानी समझते हैं।  पंचसितारा सुविधाओं से संपन्न भवनों में रहने वाले लोग सामान्य जनमानस के हमदर्द बनते हैं।  उनके दर्द पर अनेक प्रकार की  संवदेना जताते हैं।  सभी कागज पर स्वर्ग बनाते हैं पर जमीन की वास्तविकता पर उनका ध्यान नहीं होता।  हमने देखा है कि अनेक प्रकार के नारे लगाने के साथ ही वादे भी किये जाते हैं पर उनके पांव कभी जमीन पर नहीं आते।
                                   इसलिये जिनका हमसे स्वार्थ निकलने वाला हो उनके वादे पर कभी यकीन नहीं करना चाहिये। सात्विकता का सिद्धांत तो यह है कि निष्काम कर्म करते हुए उनका मतलब निकल जाने दें पर उनसे कोई अपेक्षा नहीं करे। आजकल के भौतिक युग में संवेदनाओं की परवाह करने वाले बहुत कम लोग हैं पर उन पर अफसोस करना भी ठीक नहीं है।  सभी लोगों ने अपनी बुद्धि पत्थर, लोहे, प्लास्टिक और कांच के रंगीन ढांचों पर ही विचार लगा दी है।  मन में इतना भटकाव है कि एक चीज के पीछे मनुष्य पड़ता है तो उसे पाकर अभी दम ही ले पाता है कि फिर दूसरी पाने की इच्छा जाग्रत होती है।  जिन लोगों को लगता है कि उन्हें सात्विकता का मार्ग अपनाना ठीक है उन्हें सबसे पहले निष्काम कर्म का सिद्धांत अपनाना चाहिये।  किसी का काम करते समय उससे कोई अपेक्षा का भाव नहीं रखना चाहिये चाहे भले ही वह कितने भी वादे या दावा करे।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Saturday, August 15, 2015

सांसरिक विषय तथा अध्यात्मिक ज्ञान के सिद्धांत नहीं बदलते(sansrik vishay tathaa adhyatmik gyan ke siddhant nahin badalte)


                                   क्या कंप्यूटर पर काम करने से मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है? पड़ता होगा हमें क्या? पिछले तेरह वर्ष से कंप्यूटर पर काम करते हुए हो गये पर हमें ऐसा नहीं लगा कि कोई मस्तिष्क पर हानि हो रही हो।  इसका कारण यह भी हो सकता है कि हमने कंप्यूटर पर सतत आंखें गढ़ाने का काम नहीं किया।  रचनात्मक काम करने वाले फालतू की साईटों पर दिमाग नहीं खपाते।  दूसरा यह कि जब हम कंप्यूटर पर पर टकण करते हैं तो मस्तिष्क शब्द चिंत्तन पर भी रहता है इसलिये आंखें पर्दे पर कम ही देखती हैं।  बहरहाल हमारा सवाल यह है कि कंपनियों के बासी फूड खाने से ज्यादा कंप्यूटर पर काम करना खतरनाक हैलोगों ने आजकल खाने पीने के साथ ही रहन सहन  का तरीका ही बदल दिया है जिससे देह में स्वास्थ्य का स्तर कम हो गया है जिसका मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव पड़ना ही है ऐसे में कंप्यूटर पर काम करते हुए वह बढ़ भी सकता है।
                                   हमें कंप्यूटर से ज्यादा थकाने का काम तो स्मार्ट फोन से जूझना लगता है।  कंप्यूटर पर दोनों हाथों से काम करते हुए इतना दबाव नहीं रहता जितना स्मार्टफोन पर होता है।  इधर समस्यायें भी आ रही हैं। कुछ रचनात्मक मित्र ईमेल पर संदेश देते थे अब वह कहते हैं कि स्मार्टफोन पर व्हाटसअप पर देखो।  उनको तो बस फोटो भेजने हैं पर उनको देखना हमें कष्टप्रद लगता है।  इधर समाज में शिकायत है कि हम कंप्यूटर पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और मनुष्य जाति के प्रति उपेक्षा का भाव हो गया है।  अनेक बार हम इससे हटकर सामाजिकता भी करने चले जाते हैं पर इधर योग साधना और श्रीगीता के अभ्यास ने हमें इतना एकाकी बना दिया है कि निरर्थक विषयों पर चर्चा करना अजीब लगता है। अनेक बार तो लगता है कि हमने सामूहिक वार्तालाप में समय व्यर्थ ही बरबाद किया। इससे तो अच्छा होता कि कंप्यूटर पर कविता लिख कर अपने रचनाधर्मी होने का भ्रम ही पाल लेते।  हालांकि जब हमें व्यंग्य की तलाश होती है तो वह समाज में सामूहिक जगह पर ही मिलता है। एकांत में चिंत्तन से निकले निष्कर्ष का प्रयोग भी भीड़ में करना अच्छा रहता है।
                                   हमने ज्ञान की साधना से यह निष्कर्ष तो निकाला ही है कि सांसरिक व्यवहार में चेहरे, रिश्ते और विषय समय के हिसाब से जरूर बदलते पर  हमेशा प्रकृति के निश्चित सिद्धांतों के अनुसार ही हमारे सामने वह आते हैं।  संसार का मूल रूप वही है जो हजारों वर्ष पहले था।  सांसरिक विषयों के सिद्धांत उसी तरह नहीं बदल सकते जैसे अध्यात्मिक ज्ञान के नहीं बदले।  जो दोनों विषयों के सिद्धांतों को समझ लेगा वह हमेशा ही आनंद में रहेगा।
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Tuesday, August 11, 2015

श्रीमद्भागवत गीता-एकलव्य की तरह शिष्य बनकर शिक्षा ग्रहण करें(shrimadbhagwat gita-eklavya ki tarah shishya bankar shiksha bankar grahan karen)


                         श्रीमद्भागवत गीता में सांख्ययोग की अपेक्षा कर्मयोग को श्रेष्ठ बताया गया है। इतना ही सांख्या योग से सन्यास अत्यंत कठिन बताते हुए कर्म येाग सन्यास का महत्व प्रतिपादित किया गया है। हमारे यहां सन्यास पर अनेक तरह के भ्रम फैलाये जाते हैं।  सन्यास का यह अर्थ कदापि नही हैं कि संसार के विषयों का त्याग कर कहीं एकांत में बैठा जाये। यह संभव भी नहीं है क्योंकि देह में बैठा मन कभी विषयों से परे नहीं रहने देता।  उसके वश में आकर मनुष्य कुछ न कुछ करने को तत्पर हो ही जाता है। भारतीय धर्म में सन्यास से आशय सांसरिक विषयों से संबंध होने पर भी उनमें भाव का त्याग करना  ही माना गया गया है। इसे सहज योग भी कहा जाता है। जीवन में भोजन करना अनिवार्य है पर पेट भरने के लिये स्वाद के भाव से रहित होकर पाचक भोजन ग्रहण करने वाला सन्यासी है। लोभ करे तो सन्यासी भी ढोंगी है।
                                   इस संसार में मनुष्य की देह स्थित मन के चलने के दो ही मार्ग हैं-सहज योग या उसके विपरीत असहज योग। अगर श्रीमद्भागवत् गीता को गुरु मानकर उसका अध्ययन किया जाये तो धीरे धीरे जीवन जीने की ऐसी कला आ जाती है कि मनुष्य सदैव सहज योग में स्थित हो जाता है। जिन लोगों के पास ज्ञान नहीं है वह मन के गुलाम होकर जीवन जीते हैं। अपना विवेक वह खूंटी पर टांग देते हैं। यह मार्ग उन्हें असहज योग की तरफ ले ही जाता है।
                                   एक बात निश्चित है कि हर मनुष्य योग तो करता ही है। वह चाहे या न चाहे अध्यात्मिक तथा सांसरिक विषयों के प्रति उसके मन में चिंत्तन और अनुसंधान चलता रहता है। अंतर इतना है कि ज्ञानी प्राणायाम, ध्यान और मंत्रजाप से अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए अपने विवेक से अध्यत्मिक ज्ञान धारण कर संसार के विषयों से जुड़ता है जबकि  सामान्य मनुष्य ज्ञान के पंच दोषों के प्रभाव के वशीभूत होकर कष्ट उठाता है। इसलिये अगर दैहिक गुरु न मिले तो श्रीमद्भागवत्गीता का अध्ययन उसी तरह करना चाहिये जैसे एकलव्य ने द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर धनुर्विद्या सीखी थी।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Friday, August 07, 2015

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन स्वर्णमय सिद्धांतों पर आधारित-समाचारों पर किये गये ट्विटर(bhatiya adhyatmik darshan swarnmay siddhantona par adharti-twitter)

                 भारतीय धर्म की आड़ में स्वर्णिम बाबा और अम्मा का रूप रचकर कमाया जा सकता है। यही कमजोरी भी है और ताकत भी। देखने वाले का नजरिया है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में सत्य और माया दोनों का आकर्षण पर अध्ययन किया गया है।  सत्य  प्रारंभ में कठोर लगता है पर जब उसे जान लिया जाता है तो आनंद आता है। माया से संपर्क रखने पर प्रांरभ में अच्छा लगता है पर बाद में पता लगता है कि हमने स्वयं को धोखा दिया है।  चुनने वाले अपने हिसाब से फूल और कांटे चुनते हैं।  ज्ञानी केवल दृष्टा बनकर न केवल अपना बल्कि संसार का जीवन चक्र चलता देख आनंद उठाते हैं।
            प्रातःकाल योग साधना के साथ ही भजन वगैरह कर पूरे दिन की यज्ञवेदी बनाओ न कि आतंकवाद, अपराध तथा अधर्म के  समाचार सुनकर सपने की अर्थी सजाओ।

                अगर सभी पोर्न साईट पर प्रतिबंध नहीं लग सकता तो कम से कम चेतावनी लिखने का निर्देश तो दिया ही जा सकता है कि इसे देखना मनोरोग का कारण बन सकता है। इससे कथित अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थक परबुद्धिजीवी भी प्रसन्न हो जायेंगे और नागरिकों में चेतना लाने का काम भी स्वतः होगा। इस संबंध में हमारा एक विचार यह भी है कि पहले भी समाज में यौन साहित्य धड़ल्ले से बिकता था। तब भी ऐसी मांग होती थी पर किसी ने उस पर प्रतिबंध लगाया।  अब इंटरनेट पर भी इसी तरह की प्रवृत्ति दिख रही है तो यह समझना चाहिये कि मनुष्य समाज में कुछ स्वाभाविक कमजोरियां हैं जिन्हें प्रतिबंध से दबाना न्यायासंगत नहीं भी हो सकता।  वैसे हमारी सलाह तो हमेशा यही रहती है कि जहां तक हो सके यौन साहित्य, दृश्यांकन के साथ ही इस पर आपसी वार्तालाप में चर्चा अधिक करना ही दिमाग का भट्टा बिठाना है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Sunday, August 02, 2015

मित्रता दिवस मनाना अस्वाभाविक लगता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(uneasynes for friendship day-hindi thought article)


                              आज पूरे विश्व में मित्रता दिवस(फ्रैंडशिप डे-friendship day) मनाया जा रहा है। तय बात है कि पश्चिम से आयातित यह विचार आधुनिक बाज़ार में-होटल, व्यवसायिक उद्यान तथा आधुनिक बड़े विक्रय केंद्र-नये ग्राहक जुटाने के प्रयास से अधिक कुछ नहीं है।  पश्चिम में हमेशा ही एकल परिवार के साथ ही सार्वजनिक सामाजिक संबंधों की दृष्टि से कहीं न कहीं अकेलापन रहा है।  इसलिये वहां मित्र तथा रिश्तों से मुलाकात करने के लिये दिन निकालना पड़ता है।  देखा जाये तो वहां एक मनुष्य का दूसरे से संबंध स्वाभाविक सहज सिद्धांत से नहीं देखे जाते। भारत में स्थिति अलग है।  दो मनुष्य के बीच संबंध सहज माने जाते हैं।  मित्र और रिश्ते की बात छोड़िये किसी भी सार्वजनिक जगह पर दो व्यक्ति अकेले आते हैं तो बिना किसी औपचारिकता के आपस में चर्चा के लिये तैयार हो जाते हैं। बस या ट्रेन में यात्रा करते हुए पता नहीं कितने यात्री आपस में मानवीय आधार पर इस तरह संबंध बनाते हैं जैसे कि बरसों से एक दूसरे को जानते हैं।  यह अलग बात है कि पथ आते ही वह सभी अलग हो जाते हैं।
                      कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय अध्यात्मिक दृष्टि से मित्रता या अन्य रिश्तों का कोई दिवस मनाने की कोई प्रेरणा नहीं है क्योंकि हमारे प्राचीन ग्रंथ सभी जीवों के बीच संबंधों को स्वाभाविक मानते हैं। यही कारण है कि हम भारत में हम मित्रता दिवस मनाना एक तरह से मजाक समझते हैं।
                             
                              भारत समाज में  मित्रता की दृष्टि से बाल्य और शैक्षणिक काल सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस दौरान जो मित्र बनते हैं वह बरसों बाद भी जब मिलते हैं तो भाव में ताजगी लगती है।  इस काल के बाद बने मित्र केवल स्वार्थ के कारण बनते और बिगड़ते हैं। हम पश्चिम से आयातित जिस मित्रता दिवस को मना रहे हैं उसमें एक युवक और युवतियों के बीच ज्यादा देखने की कोशिश ज्यादा होती है। यह अलग बात है कि कुछ सभ्रांत लोग समय काटने के लिये सार्वजनिक रूप से कार्यक्रम करते हैं पर बाजार के प्रबंधकों का ध्यान केवल प्रेम संबंधो को मित्रता का जामा पहनाने के अलावा कुछ नहीं होता।
कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय अध्यात्मिक दृष्टि से मित्रता या अन्य रिश्तों का कोई दिवस मनाने की कोई प्रेरणा नहीं है क्योंकि हमारे प्राचीन ग्रंथ सभी जीवों के बीच संबंधों को स्वाभाविक मानते हैं।

हमारे यहां मित्रता के रूप में हमेशा ही भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा का उदाहरण दिया जाता है। किसी के प्रति मित्रता का भाव हृदय में एक बार स्थित हो जाये तो वह सहजता से विलोपित नहीं होता। इतना ही यह अन्य रिश्तों की तरह इतना गहरा होता है कि दिमाग में किसी का नाम होता है पर मित्र शब्द नहीं होता।  जिस तरह माता, पिता, भाई तथा बहिन के नाम दिमाग में कभी बजते हैं पर रिश्ते का स्वर उनमें नहीं होता। कहने का अर्थ है यह है कि संबंध हृदय की गहराई में होते हैं। घरेलू कार्यक्रमों में मित्रों और रिश्तेदारों को हार्दिक रूप से आमंत्रित किया जाता है पर उनके लिये रिश्ते के नाम से अलग कार्यक्रम करने की कोई परंपरा नहीं है।
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Monday, July 27, 2015

आतंकवाद के प्रचार में समाचार तथा बहस से मदद न करें.हिन्दी चिंत्तन लेख(atankwad muft ke vyapar par chal raha hai-hindi thought article)


             हमारा तो मानना है कि विश्व में आतंक एक ऐसा व्यापार बन गया है जो प्रचार की वजह से पनपा है। अगर प्रचार माध्यम आतंक की खबरों को लघु या संक्षिप्त रूप से प्रसारित करें और किसी तरह की बहस न आयोजित करें तो यकीनन आतंकवाद के व्यापारी ठंडे हो जायेंगे। अनेक अपराध विशेषज्ञ आतंकवाद के सीधे प्रसारण का विरोध करते रहें हैं पर लगता नहीं कि उनकी सुनी जाती है।  एक बात दूसरी बात यह भी है कि आतंकवाद के धनदाता भी संदेहास्पद हैं। हम देख रहे हैं कि सारे विश्व में पैसा चंद धनपतियों के हाथ में है। उन्हीं के पास प्रचार माध्यमों का स्वामित्व है। इतना ही नहीं टेलीफोन सहित समस्त संचार माध्यम भी उनके नियंत्रण मे हैं।  ऐसे में तो कभी कभी लगता है कि आतंकवादियों को यही धनपति अपने दो लक्ष्यों की पूर्ति के लिये पैसा देते हैं.एक तो इसलिये कि समाज उनके प्रचार माध्यमों की सनसनीखेज सामग्री से बंधा रहे दूसरा यह कि प्रशासन आतंक से लड़ने में लगा रहे और उसकी आड़ में धनपतियों के ही संरक्षण में चल रहे काले धंधे चलते रहें।
                              वैसे भी देखा गया है कि यह हमले भीड़ वाली जगहों पर किये जाते हैं जहां सामान्य लोगों के साथ ही छोटे पद वाले सुरक्षाकर्मी होते हैं। अधिक संख्या में हताहतों की संख्या होने से आतंकवादियों के दुष्कृत्य को प्रचार भी खूब मिलता है।  इन आतंकवादियों के प्रायोजित करने वालों के नाम पता करना कठिन जरूर है पर असंभव नहीं है पर जरूरत इच्छा शक्ति की है। इन आतंकियों को कीमती सामान की तस्करीए नशे के व्यापार तथा खेलों के सट्टे से अधिक धन मिलता है।  भारत में बढ़ते धन के साथ  अपराध भी बढ़े है साथ ही युवाओं में सट्टे और नशे की आदत बढ़ती जा रही है।  इससे जुड़े काली नीयत के व्यापारियों के लिये प्रशासन की सख्ती एक चुनौती होती है जब उसका ध्यान किसी बड़ी घटना की तरफ जाता है तो उनके संरक्षित अपराधी अपना काम करने लगते हैं। इतना ही नहीं आतंक और काले धंधे के व्यापारियों का गठजोड़ संभवत इतना शक्तिशाली है कि उसे अलग धनपति भी उनके दबाव के आगे बेबस होकर उन्हें हफ्ता देते हैं।
                              इस तरह के आतकंवाद से मुक्त होने के लिये यह आवश्यक है कि इसके प्रचार पर अधिक समय नहीं व्यय करना चाहिये। कम से कम सीधा प्रसारण तो किया ही नहीं जाना चाहिये।  अततः आतंकवाद का व्यापार मुफ्त के विज्ञापन पर ही चल रहा है। लोग इस प्रचार से डरते हैं और आतंकवादियों के प्रति कोई प्रतिकूल कदम उठाने का ख्याल नहीं करते। युवाओं को भी यह बात समझाना चाहिये वह नशे तथा खेलों के सट्टे से दूर रहें।
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Monday, July 20, 2015

पेशेवर बुद्धिमान श्रीगीता से कतराते हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख(peshewar buddhiman shrigeeta se katrate hain-hindi thought article)

                              एक मनोरोगी और शराबी 24 वर्षीय हत्यारे ने छह वर्षों में 14-15 बच्चों की हत्या कर उनसे दुष्कर्म किया। अब पकड़ा गया। इस पर देश भर के मनोवैज्ञानिक, अपराध शास्त्री तथा समाज के जानकार बहस करते नज़र आ रहे हैं।  बताया जाता है कि पुलिस ने एक बार उसे पकड़ा भी था पर वह जमानत पर छूट गया।  उस पर भी तमाम तर्क दिये जा रहे हैं। इस बहस पर अगर श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों के आधार पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि कोई यह आज  तक इस तथ्य को स्वीकर  नहीं कर पाया कि इस संसार में आसुरी तथा दैवीय प्रकृत्ति के लोग हमेशा ही विद्यमान रहेंगे।  अपनी प्रकृत्ति का कोई भी मनुष्य उल्लंघन नहीं कर सकता।  एक बार अगर किसी के बारे में यह पता लग जाये कि वह आसुरी प्रकृत्ति का हो तो उसे कैसे रोका जाये यह तो बहस का विषय हो सकता है-क्योंकि आज के सभ्य विश्व समाज के कानून मानवाधिकारों का भ्रम भी पालते हैं-पर मनोविज्ञान और समाज की दृष्टि से इसमें कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता।
                              किसी भी प्रकार की विषय पर व्यवसायिक बहस लंबी जारी रखनी होती पर  श्रीमद्भागवत गीता का इकलौता के तर्क उसे रोक देगा।  बहसें प्रायोजित और विद्वान पेशेवर होते हैं उन्हें लंबी बहस खींचकर प्रचार माध्यमों का विज्ञापन समय पास करने के लिये तर्क से अधिक कुतर्क देते हैं। ।  अगर कोई श्रीमद्भागवत गीता का तर्क देगा तो फिर अंग्रेजी पद्धति से शिक्षित समाज उसे पौगापंथी कहकर ठुकरा देगा। यही कारण है कि व्यवसायिक अभिव्यक्ति में लगे संस्थान श्रीमद्भागवत गीता से दूर  भागते हैं क्योंकि तब सांसरिक विषयों में भी तर्क वितर्क की गुंजायश नहीं रह जाती जो समय पास करने के लिये जरूरी है।
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Friday, July 17, 2015

आदमी को चूहा बनने से बचना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन लेख(admi ko chuha banane se bahchan chahiye-hindi thought article)

                              सब जानते हैं कि लालच बुरी बला है पर बहुत कम लोग हैं जो इस ज्ञान को धारण कर चलते हैं। हम में से अनेक लोगों ने पिंजरे में चूहे को फंसाकर घर से बाहर जाकर छोड़ा होगा।  सभी जानते हैं कि चूहे को पकड़ने के लिये पिंजरे में रोटी का एक टुकड़े डालना होता है।  चूहा जैसे ही उस रोटी के टुकड़े को पकड़ता है वह पिंजरे में बंद हो जाता है। चूहे में वह बुद्धि नहीं होती जिसे प्रकृत्ति ने भारी मात्रा में इंसान को सौंपा है।  फिर भी सामान्य मनुष्य इसका उपयोग नहंी करते।  अनेक लोग यह शिकायत करते हैं कि हमें अमुक आदमी ने ठग लिया है अथवा धोखा दिया है। इस तरह की शिकायत करने वाले लोग इस आशा में रहते हैं कि अपने साथ हुई ठगी या धोखे का बयान दूसरों से करेंगे तो सहानुभूति मिलेगी पर यह नहीं सोचते कि सुनने वाले उन्हीं की बुद्धि पर हंसते हैं-मन में कहते हैं कि यह चूहा बन गया।
                              कहा जाता है कि पशु पक्षियों तथा मनुष्य में भोजन, निद्रा तथा काम की प्रवृत्ति एक जैसी रहती है पर उसके पास उपभोग के  अधिक विकल्प चुनने वाली सक्षम बुद्धि होती है।  यह अलग बात है कि अनेक ज्ञान और योग साधक अपनी बुंिद्ध का उपयोग ज्ञान के साथ करने की योग्यता अर्जित कर लेते हैं जबकि सामान्य मनुष्य उसी तरह ही विषयों के पिंजरे में फंसा रहता है जैसे चूहा रोटी के टुकड़े में ठगा जाता है।  कहा जाता है कि आजकल तो मनुष्य अधिक शिक्षित हो गया है पर हम इसके विपरीत स्थिति देख रहे हैं।  निरर्थक शिक्षा नौकरी की पात्रता तो प्रदान करती है पर जीवन के सत्य मार्ग से विचलित कर देती है।  पढ़े लिखे लोग अशिक्षित लोगों से अधिक ठगी या धोखे का शिकार हो रहे हैं।  हमारे देश में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से जुड़ी शिक्षा को धर्म से जोड़कर शैक्षणिक संस्थानों से दूर रखा गया है पर अनुभव तो यह है कि इसके अभाव में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से पढ़े लोग अनपढ़ लोगों से ज्यादा दूसरों के बहकावे में आ जाते हैं। इसलिये यह भ्रम भी नहीं रखना चाहिये कि आधुनिक शिक्षा से व्यक्ति अध्यात्मिक ज्ञानी हो जाता है।
                              इसलिये जिन लोगों का अपना जीवन सुखद बनाना है वह नित्य भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्यययनर अवश्य करें। जीवन में सांसरिक विषयों के साथ अध्यात्मिक सिद्धांतों के अनुसार संपर्क करने का तरीका चाणक्य और विदुर नीति में अत्यंत सरलता से समझाया गया है।     
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Sunday, July 12, 2015

ज्ञानियों का त्याग ही इस देश को बचाये हुए है-हिन्दी चिंत्तन लेख(guaniyon ka tyag hi is desh ko bachaye hue hai-hindi thought article)

                एक बार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जूनियर जार्जबुश ने विश्व में बढ़ती महंगाई को भारतीय जनता में व्याप्त अधिक खाने की प्रवृत्ति को बताया था।  उस समय अनेक विद्वानों ने इसका मजाक उड़ाया था। अंतर्जाल पर सक्रियता में नवीन व्यक्ति होने के कारण  हमने भी अधिक पाठक बटोरने की दृष्टि से बुश साहब से अपनी असहमति जताई थी। यह सात वर्ष पहले की बात थी। उस समय निजी टीवी चैनल और अंतर्जाल दोनों ही संचार जगत में एक नयी शुरुआत कर रहे थे। जैसे जैसे संचार की शक्ति बढ़ी तो नयी नयी जानकारियां आने लगीं। भारत में इस दौरान खानपान की आदतों में भारी बदलावा भी आया। उस समय हमने लिखा था कि चूंकि भारत के चाट भंडारों में भीड़ रहती है इसलिये कोई भी यह सोच सकता है कि भारत में लोग खाते बहुत हैं।  सात वर्ष बाद अब तो  भारत में मॉल के रूप में आधुनिक बाज़ार का रूप लिया है और आकार में बड़े होने के कारण वहां भी भीड़ अधिक दिखती है। यह अलग बात है कि वहां खाद्य पदार्थों के अलावा फिल्मों के उपभोक्ता और दर्शक ही अधिक आते हैं। इस तरह उपभोग प्रवृत्ति में बदलाव तथा उपभोक्ताओं की बड़ी संख्या किसी विकास का परिचायक नहीं  है क्योंकि इसके पीछे हमारा कोई नवीन निर्माण नहीं है।  रोजगार, स्वास्थ्य तथा नैतिक आचरण का पैमाना बहुत नीचे चला गया है। कर्ज लेकर घी पीने के जिस सिद्धांत पर समाज चला है उसे देखकर तो अब विदेशी यह भी कह सकते हैं कि भारतीय कमाते कम हैं खाते ज्यादा हैं।
                              सब कुछ बदला है पर यहां के धनपितयों की प्रवृत्ति जस की तस है। खाद्य पदार्थों में मिलावट तथा पहनने ओढ़ने में नकली सामान बनाने  की वही कहानी अब भी जारी है। पहले बाज़ार से अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थों में मिलावट के समाचार आते थे पर अब तो एक टीवी समाचार चैनल ने प्लास्टिक के चावल बनने की बात कहकर हैरान ही कर दिया है। हम सभी जानते हैं कि अन्न से मन और मन से मनुष्य का अस्तित्व है। अगर इसी तरह अन्न से प्लास्टिक का मेल होने की बात आगे बढ़ी तो फिर हमें शुद्ध मनुष्य ढूंढना ही मुश्किल हो जायेगा।
                              हमने पहले भी कहा था और अब भी कह रहे हैं कि भारत में प्रकृत्ति की कृपा अन्य देशों से कहीं अधिक है।  यहां भूजल का बेहतर स्तर, हर तरह के अन्न की फसल और विभिन्न खनिजों संपदा को देखकर कोई नहीं कह सकता कि भारत अभिशप्त देश है। यह अलग बात है कि यहां लोभ की ऐसी प्रवृत्ति है कि कोई धनपति अपनी कमाई से संतुष्ट होने की बजाय दूसरे के मुंह से निवाला निकालकर या खींचकर अपनी तरफ करने पर ही प्रसन्न होता है। यही कारण है कि हमारा देश सब कुछ होते हुए भी गरीब और अविकसित कहा जाता है। मजे की बात यह है कि जितना अज्ञानी समुदाय है उससे ज्यादा ज्ञानी लोगों का समूह है।  शायद यही कारण है कि यह देश चल रहा है। अज्ञानी के लोभ की प्रवृत्ति के बावजूद ज्ञानियों का त्याग भाव हमारे देश को बचाये हुए है।
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Monday, July 06, 2015

जल की पवित्रता से जीवन में आनंद संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(jali ki pavitrata se jeevan mien aanand sambhav-hindi thought article)

          एक टीवी चैनल गंगा की स्वच्छता को लेकर अभियान चला रहा है।  उसके कार्यक्रम में कुछ ऐसे कथित श्रद्धालू दिखाये गये जो नदी की सीढ़ियों पर खड़े होक साबुन लगाकर कपड़े धो रहे थे। एक व्यक्ति उन श्रद्धालुओं को ऐसा करने से रोक रहा है पर वह जैसे सुन ही नहीं रहे।  ढोंग इसत रह कर रहे थे जैसे कि समाधिस्थ हों। एक कथित श्रद्धालु तो नदी में ही साबुन लगाकर नहा रहा था। कहने पर वह भी नहीं सुन रहा था।  धर्म के नाम पुण्य कमाने का यह स्वार्थी रूप शर्मिंदा करने वाला है। हम यहां एक बात बता दें कि नदियों में नहाने पर पुण्य कमाने की चर्चा तो हमारी जनश्रृतियों में है पर यह साबुन लगाना की बात कहीं न कही गयी है।  इसके विपरीत स्वच्छता को भगवान की पूजा का एक महत्वपूर्ण भाग माना गया है।  आमतौर से पहले शरीर की मिट्टी हटाने के लिये प्राकृत्तिक चीजें उपयोग में लायी जाती थीं, पर आजकल साबुन प्रचलन में  आ गया है इसलिये कथित श्रद्धालु नये जमाने के अनुकरण के साथ पुरानी पंरपराओं को निभा कर विश्वास को अंधविश्वास में बदल रहे हैं।
                              इस नदियों को गंदा करना ही हमारी दृष्टि से भारतीय धर्म से द्रोह करने जैसा है जो कि किसी पूजा से पहले ही अंदर और बाहरी शुद्धता पर जोर देता है। हमारी राय से ज्ञानी श्रद्धालुओं जो इन नदियों पर नहाने जाते हैं वह न स्वयं ही नदियों में विसर्जित करने से बचें वरन् दूसरों के करने पर उन्हें दृढ़ता पूर्वक रोकें।  अपने आसपास ही खड़े अपने जैसे लोगों से आव्हान करें कि वह भी उनके साथ स्वर मिलायें। नदियों को स्वच्छ रखने का सबसे पहला दायित्व तो भारतीय धर्म के श्रद्धालुओं का है यह हम मानते हैं। नदियां स्वच्छ होंगी तो जल पवित्र होगा। जल की पवित्रता ही जीवन में सुख का भाव ला सकती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि अन्न जल का मनुष्य जीवन पर बहुत प्रभाव रहता है।
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