दिल के दरवाजे
बंद कर लिये
प्यार की दस्तक
अब वह कहां सुनेंगे।
संबंध के बिगड़े हिसाब
दोस्त तब वफा के
वादे क्यों बुनेंगे।
कहें दीपकबापू जज़्बात से
जीने की आदत
नहीं रही इंसानों में
लाशों में ढूंढ रहे दुआ
जिंदादिली वह क्यों चुनेंगे।
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संकलक,लेखक संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर(मध्यप्रदेश) Writer and Editor-Deepak Raj Kukreja, BharatDeep, Gwalior (Madhya Pradesh)
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अष्टावक्रगीता में कहा गया है कि-----------विहाय वैरिणं काममर्थ चानर्थसङ्कुलम्।धर्ममप्येतयोहेंतुं सर्वत्रानादरं कुरु।।हिन्दी में भावार्थ-वैर स्वरूप कामनायें तथा अनर्थ से भरे अर्थ का त्याग कर रूप धर्म को भी छोड़कर उनकी उपेक्षा करें।
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अष्टावक्र गीता में कहा गया है कि-------------मोक्षस्य न हि वासीऽस्ति न ग्राम्यान्तरमेव वा।अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः।।हिन्दी में भावार्थ-मोक्ष का किसी लोक, गृह या ग्राम में निवास नहीं है किन्तु अज्ञानरूपी हृदयग्रंथि का नाश मोक्ष कहा गया है।
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