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Sunday, June 11, 2017

राष्ट्रवादियों में अब अवसाद बढ़ता दिख रहा हे-हिन्दी संपादकीय

                             हमने यह लेख एक राष्ट्रवादी का लेख पढ़कर लिखा है जिसमें वह उदित भारत के एक मंत्री को महत्व न मिलने से दुःखी हैं। उन्हें लगता है कि वह होते तो सरकार का रूप अलग होता। हमारा मानना है कि वह भी एक नकारा मंत्री था जो पूंजीपतियों के हित में काम करता था। वैसे भी मेंत्री नहीं वरन् अधिकारी काम करते हैं। सामान्य राष्ट्रवादियों में यह भ्रम है कि उनके वरिष्ठ ज्यादा बौद्धिक हैं इसलिये कुशल प्रबंधक भी हैं। 
ओलंपिक में पचास सौ पदक ले लिये होते तो मान लेते कि मांस खाने से शक्ति व पराक्रम मिलता है। मांस खाने की वकालत करने का हक केवल रूस, चीन, अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका जर्मनी, फ्रांस तथा आस्ट्रेलिया जैसे देशों के विद्वानों को है। हमारे देश की हालत ओलंपिक में क्या है सभी जानते हैं? यह मांस खाने वाले वहां कौन तीर मारते हैं जो यहां जानवारों को मरवाकर पार्टियां मना रहे हैं। इनके अनुसार तो यह धरती केवल मनुष्यो के लिये जबकि हमारा दर्शन मानता है कि यह सभी जीवों के लिये है।  जीवहत्या पाप है चाहे वह कुत्ते की हो या गाय की।
                        अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने ही देश की मीडिया पर आरोप लगाया है कि वह असली समाचार छिपाकर फर्जी  दिखा रहा है।  हम अपने देश के मीडिया का चालचलन देखें तो वह अमेरिका राह पर ही चलता है। जिस तरह गोरक्षकों की गुंडागर्दी, सामूहिक मांसभक्षण मेला या महिलाओं के प्रति अपराध के वीडियो मीडिया पर लाकर पूरी सरकार वह समाज पर छींटाकशी की जाती है उससे संदेह भी होता हैं। अभी एक लड़की के साथ बदतमीजी हुई।  अपराधियों ने ही वीडियो अपलोड किया। मीडिया में आया तो पुलिस सक्रिय हुई। अपराधी पकड़े जा रहे हैं।  कुछ दिन तक लोगों को याद रहेगा फिर भूल जायेंगे।  यह देखने फिर कौन जा रहा है कि वहां अब क्या हो रहा है? अपराधी स्वयं वीडियो अपलोड कर रहे हैं।  अभी दक्षिण में कुछ जगह मांसभक्षण मेले लगे।  मीडिया ऐसे बता रहा था जैसे कि पूरे दक्षिण में यह हो रहा है-सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह कि यह तक बड़ी शिद्दत से दिया जा रहा था कि हिन्दू भी गौमांस खाते है।  गोरक्षकों की गुंडागदी के र्वीडयो तो इस तरह दिखते हैं जैसे कि स्वयं उन्होंने मीडिया के लिये प्रायोजित सेवा की है।  यह कैसे संभव है कि गोरक्षक गुंडागदी कर रहे हों और वह किसी दूसरे को इतने आराम से फोटो खींचने दें।  फिर दूसरा शक यह भी है कि दिन में एक दो घटनायें ही ऐसी आती है जिनका वीडियो होता है। ऐसी खबर क्यों नही आती जिसका वीडिया न बना हो। मतलब यह कि कैमरा सामने होने पर ही यह घटनायें होती हैं।  कभी कभी तो लगता है कि आपसी मारपीट की खबर भी गौरक्षकों से जोड़ दी जाती है।  ऐसेक में शक होता है कि कहीं योजनाबद्ध ढंग से खबरें बनवायी तो नहीं जा रही ताकि देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, महंगाई तथा अपराधों पर कम ही चर्चा हो । अगर हो तो सतही तरह से।
                                 एक भारतीय पूंजीपति की लाहौर यात्रा पर भारत व पाकिस्तान के प्रचार माध्यमों में बहुत चर्चा है-कोई इसे व्यक्त्रिगत तो कोई इसे पर्दे के पीछे की राजनीति मान रहा है। हमारा सबसे अलग विचार है-इस विचार को कार्ल मार्क्स से प्रभावित कतई न समझें।  हमें तो ऐसा लगता है कि विश्व के सभी राष्ट्र अब पूंजीपतियों के क्लब बन गये हैं। जिस तरह हमें यहां मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई, दिल्ली तथा अन्य बड़े शहरों के नामो पर क्रिकेट टीमें बनाकर क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में लोगों की भावनाओं को उबारा जाता है यही स्थिति अब राष्ट्र के नामों पर भी हो रही है। सीधी बात कहें तो राष्ट्रवाद के नाम पर स्वार्थवाद चल रहा है। हमने देखा कि अमेरिका में राष्ट्रवाद के नारे पर आये ट्रम्प अब पुराने मार्ग पर ही चल दिये।  भारत के जिस पूंजीपति ने लाहौर की यात्रा की उस पर पाक मीडिया यह आपत्ति उठा रहा है कि उसने अपने वीजा नियमों से अलग जाकर उस जगह जाकर पाक प्रधानमंत्री शरीफ  से मुलाकत की जहां उन्हें अनुमति नहीं दी। पाक मीडिया तो अपने ही प्रधानमंत्री पर नियम तोड़ने कर आरोप लगा रहा है।  हमें इस तरह की घटनाओं पर आश्चर्य नहीं है।  दुनियां में कंपनी नाम के दैत्य ने सभी राष्ट्रों को  क्लब बना लिया है।  राष्ट्रप्रमुखों ने इस कपंनी दैत्यों से मित्रता की है या वह उसकी नौकरी करते हैं यह अलग से बहस का विषय है इतना तय है कि तानाशाह शी जिनपिंग हो या पुतिन वह भी इन पूंजीपतियों में प्रभाव या दबाव में है।  यही कारण है कि हम कहते हैं कि तीसरे विश्वयुद्ध की संभावना नहीं है। सुविधाभोगी कभी युद्ध नहीं कर सकते अलबत्ता आमलोगों को मरवाकर अपना शौक जरूर पूरा करते हैं।

राष्ट्रवादियों को तो लोहा तब मानते जब भारत पाक के एक समूह में होने पर सवाल उठाते (Nationalism and India-HindiArticle)


                          किसी भी अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में यह जरूरी नहीं कि भारत का पाकिस्तान से मुकाबला हो। दरअसल नाकआउट दौर में पहुंचने से पहले लगी मैच होते है जिसमें सदस्य देशों के वरीयता सूची के  आधार पर होता है। हॉकी में भारत सदैव दूसरे समूह में रहता था और दोनों टीमें सेमीफायनल फायनल में टकराती थीं। कम से कम तीन विश्व क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत पाकिस्तान आपस में सामने नहीं खेले।  अब हालत यह है कि हर क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत पाकिस्तान के एक ही समूह में रहते हैं। सच बात तो यह है कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट प्रतियोगिता में सबसे ज्यादा राजस्व भारत पाक मैच से मिलता है। लगता है कि टीम की वरीयतायें छोड़कर आयोजक अधिक राजस्व कमाने के लिये भारत पाक मैच अनिवार्य बनाते हैं। अगर पाकिस्तान या भारत अलग अलग समूहों में रहें तो इसकी संभावना रहती है कि कोई एक या  दोनों ही नाकआउट दौर में पहुंचे ही नहीं और राजस्व की हानि हो जाये। अगर राष्ट्रवादी यह पूछते कि आखिर भारत व पाकिस्तान एक ही समूह में कैसे रखे जाते हैं तो बात जमती भी।  दरअसल राष्ट्रवादियों के शिखर पुरुष कभी भी अपने अनुयायियों को तार्किक बनते देखना नहीं चाहते क्यों तब राजकाज के संबंध में कठिन सवाल वह उठाने लगेंगे जो कि विरोधियों को भी रास आयेंगे। हम राष्ट्रवादियों  को समझाते रहें हैं कि क्रिकेट खेल नहीं व्यापार है जिसमें पूंजीपति और सट्टेबाज साथ साथ मिले हैं। देशभक्ति का रस इसमें मिलाया जाता है ताकि लोग भ्रम में रहें।
                    कल हमने मैचा देखा पर परिणाम से अधिक हमारी रुचि खिलाड़ियों के हावभाव में ही थी-पाकिस्तान के पुराने दिग्गजों ने पहले ही कह  दिया था कि उनके कम से तीन खिलाड़ी चमत्कारिक प्रदर्शन करें तभी भारत से जीत पायेंगे पर इसकी संभावना नगण्य है। कल भारतीय खिलाड़ियों के हावभाव ऐसे लग रहे थे जैसे कि सेठ हों तो पाकिस्तानी रोजंदारी वाले मजदूर दिख रहे थे। न उन पर हार के तनाव का भय था न भारतीयों से परंपरागत प्रतिद्वंद्वता वाला भाव था। भारत के अधिकतर खिलाड़ी करोड़ों में खेलने वाले हैं जबकि पाकिस्तानी अब रूखे सूखे से ही काम चलाते नज़र आ रहे थे। अब तो स्थिति यह है कि बीसीसीआई सरकार से दबाव डालकर कहीं पाकिस्तान से द्विपक्षीय श्रृंखला खेलना भी चाहे तो अनेक बड़े खिलाड़ी यह कहकर अलग हो सकते हैं कि इतनी स्तरहीन टीम से हम नहीं खेलेंगे तब दोयम दर्जे की टीम उसके यहां भेजी जायेगी-जैसा जिम्मबाब्बे व वेस्टइंडीज में भेजी जाती है।
जीन्यूज को अतिराष्ट्रवाद से बचना चाहिये।
            जी न्यूज चैनल अतिराष्ट्रवाद की तरफ बढ़ता जा रहा है जो कि बोरियत पैदा करता है। बात पाकिस्तान से चैंपियंस ट्राफी में खेलने की है। भारत ने तय किया है कि वह पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय क्रिकेट श्रृखला नहीं खेलेगा।  ऐसा पहले भी कई बार हुआ पर ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में पाकिस्तान से भारत खेलता है। जीन्यूज अब चैंपियंस ट्राफी में चाहता है कि भारत पाकिस्तान से न खेले और उसे दो अंक ले जाने दे। हम सदा ही पाकिस्तान से द्विपक्षीय श्रृंखला के विरोधी हैं पर अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में उससे मुकाबले रोकने का समर्थन नहीं करते।  हमारी राय में यह अतिराष्ट्रवाद है जो सोच को कुंद कर देता है।
हवाला पर फौजदारी कार्यवाही के बिना कहीं किसी भी समस्या का हल मिलना संभव नहीं है। यह समन वमन से कुछ नहीं होने वाला!  नोटबंदी के बाद सब जगह अपराध लगभग थम गये थे पर जैसे ही बाज़ार में पैसा आ गया। सब कुछ वैसा ही हो गया।  हमें तो ऐसा लग रहा है कि इस देश में हवाला कारोबारी ही सबसे ज्यादा प्रभावी है। वह इधर भी खिलाते हैं उधर भी खिलाते हैं।  इसलिये न वह पकड़े जाते हैं न उनके ग्राहक!  खालीपीली टीवी पर बहसें देखते रहो।

Thursday, April 14, 2016

पेट भरकर भूखों के लिये बवाल करते-दीपकबापूवाणी (DeepakbapuWani)

चंद पलों की खुशी में जीवन लगा देते, सुख की अनवरत भूख जगा देते।
‘दीपकबापू’ कामनायें खूब मन में पाले, यह अलग बात अपने कर्म दगा देते।।
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कभी जीत कभी हार खेल जारी है, पहले से तय जीत हार की बारी है।
‘दीपकबापू’ पैसे के माहिर खिलाड़ी, कमाते चाहे उन्होंने नीयत हारी है।।
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पेट भरकर भूखों के लिये बवाल करते, अपनी रोटी छिनने से दलाल डरते।
‘दीपकबापू’ समाज का ठेका लेकर, सात पुश्तों के लिये घर में माल भरते।।
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सब जानते दिया तले अंधेरा होता, सामने लगी तस्वीर पीछे खाली होता।
‘दीपकबापू’ दौड़े दौलत की राह, देह के शत्रु बाग का जैसे माली होता।
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बाहर भीड़ में लगाते जोरदार नारे, कमरे के अंदर महफिल सजाते सारे।
‘दीपकबापू’ चतुरों के प्रशंसक बहुत, रोज धोखा खाते लोग नसीब के मारे।।
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धर्म बढ़ाने के लिये उन्हें धन चाहिये, समाज बचाने के लिये चंदा चाहिये।
‘दीपकबापू’ भरोसे का बाज़ार लगाते, मु्फ्त सौदे की भी कीमत चाहिये।।
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एतिहासिक योद्धाओं जैसा होने की चाहत, कर देती दिल दिमाग आहत।
‘दीपकबापू’ लगवाते नारे अपनी जय के, बरसों से बेबस ढूंढ रहा राहत।।
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भाषण में नारों से दिल बहलाते, राशन न मिलने का दर्द भी सहलाते।
‘दीपकबापू’ शब्द खाते अर्थ पी जाते, बक्ता जो बकें श्रेष्ठ वही कहलाते।।
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बहुत है घाव पर नमक छिड़कने वाले, बहुत हैं चेहरे काली नीयत वाले।
‘दीपकबापू’ फंसाये सोच मतलब में, परोपकारी की उपाधि गले में डाले।।
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आम आदमी अपना दर्द स्वयं झेले, नया भूल पुराने खिलौने से खेले।
‘दीपकबापू’ कभी बने छोटे कभी खास, हर सवाल पर जवाब मौन ठेले।।
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सोचें दिमाग से दिल की बात करें, इश्क के नाम इज्जत पर घात करें।
‘दीपकबापू’ नयेपन का ओढ़ा लबादा, फिर भी पुरानी आदतें मात करें।।
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जल्दी बदलता परिधान का प्रचलन, अपना पुराना देख होती जलन।
‘दीपकबापू’ पोतकर चमका बूढ़ा चेहरा, नयी जवानी का यही चलन।।
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पेट में खाना भरें कि पचे नहीं, घर में सामान इतना कि जचे नहीं।
‘दीपकबापू’ भरे ढेर सपने दिमाग में, तंग सोच से लोग बचे नहीं।।
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ज्ञान की तिलक पहचान नहीं होता, मतलब से मिला मान नहीं होता।
‘दीपकबापू’ निहारते गुलाब की तरफ, कांटों का उसे भान नहीं होता।।
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माया की कृपा भी डर से छिपातेहैं, लोग लूट को कमाई दिखाते हैं।
‘दीपकबापू’ सिद्धांत टांगे दीवार पर, पीछे अपनी अनैतिकता छिपाते हैं।।
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अन्न जल का मोल समझे लोग कहां, अपनी आंखें गढ़ाते सोना दिखे जहां।
‘दीपकबापू’ थाली लोटा सजा जब सामने, भूख प्यास पर अच्छी बहस हो वहां।।
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वादे करने का सिलसिला नहीं टूटता, बदले चेहरे तो भरोसा नहीं टूटता।
‘दीपकबापू’ अपनी करनी की सजा भोगते, राजा या रंक कोई नहीं  छूटता।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Sunday, February 14, 2016

भारतीय समाज अब भी चेतनावान है (bhartiy samaj ab bhi chentawan hai)

              जवाहरलालनेहरुविश्वविद्यालय में हुए देशविरोधी प्रदर्शनों से एक बात साफ हो गयी है कि प्रगति व जनवादी विचारधारा के ध्वजवाहक भयानक रूप से कुंठित हैं। प्रगतिशील  व जनवादी विचारधारा के यह नये जमूरे देश में वर्तमान प्रबंध व्यवस्था में शामिल विपरीत दृष्टिकोण वाले लोगों को विरोधी नहीं शत्रु मान रहे है। इनकी कुंठा इतनी भयानक है कि आतंकवादी उन्हें सेनानी और आत्मघाती शहीद लगते हैं। वह अहंकार और अज्ञान के ऐसे वैचारिक अंधेरे में जी रहे हैं जिससे उनका निकलना मुश्किल है।
                        अध्यात्मिक विचाराधारा होने के कारण हमें प्रगतिशील व जनवादी विचारकों के चिंत्तन में कोई आकर्षण नहीं दिखता पर शैक्षणिक संस्थाओं में इनका  प्रभाव अब भी जबरदस्त है जबकि वह  स्वयं  भयानक अज्ञान के अंधेरे में विराजमान लगते हैं। लोकतंत्र सिद्धांतों के अनुसार वर्तमान प्रबंध व्यवस्था का विरोध करने की सभी को आजादी है पर इस आड़ में अपने ही देश  विरोध करना पागलपन नहीं अपराध है यह बात उन्हें समझना होगी।
             एक ऐसे विश्वविद्यालय में जो जनता के पैसे से चल रहा है वहां शिक्षा लेते हुए भारत की बर्बादी देखने की चाहत देखने वालों को कैसे समाज बर्दाश्त करे जब उस पर वैसे ही असहिष्णु होने का आरोप लग रहा हो। देशविरोधी नारे तथा आतंकी की फांसी का विरोध करने के कार्यक्रम को वह समाज कैसे बर्दाश्त करेगा जिसे असहिष्णुता कहकर निर्लज्ज कर दिया गया है। सच बात तो यह है कि पिछले दिनों जिस तरह असहिष्णुता का आरोप लगाकर जिस तरह पूरे भारतीय समाज को वैश्विक स्तर पर बदनाम किया गया है उससे यह डर समाप्त हो गया है| अब लोग सोचते हैं  कि इससे ज्यादा बदनामी तो हो नहीं सकती।  इसलिये जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में सक्रिय कथित क्रांतिकारियों को अब ज्यादा उम्मीद नहीं रखना चाहिये। उनके समर्थक या मार्गदर्शक बुद्धिजीवी यह बात समझ लें। वह कह रहे हैं कि जेएनयू का मसला देश में दक्षिणपंथियों के विरुद्ध जायेगा, यह भी तो सोचें कि पूरा भारतीय समाज चेतनावान है और तमाम वैचारिक हमलों के बावजूद वहा प्राचीन तत्वों से जुड़ा है। सीधी बात कहें तो समाज में दक्षिणपंथियों की जड़ें प्रगतिशील और जनवादियों से कहीं जयादा गहरी हैं। संभव है यह समाज  अपने अपमान का प्रतिकार करने के लिये दक्षिणपंथियों का अधिक पुरजोर ढग से साथ देने लगें।
     दूसरा तथ्य यह भी है कि  भारत व हिन्दू धर्म के विरुद्ध जाकर इस देश में कोई क्रांति नहीं हो सकती यह बात प्रगति व जनवादी विद्वानों को समझ लेना चाहिये। जहां तक भारतीय समाज का सवाल है उसे असहिष्णु कहकर वैसे ही बदनाम कर दिया तो वह देश व धर्म विरोधियों से क्यों सहानुभूति दिखायेगा? सच बात तो यह है कि अभी तक राजकीय संस्थाओं से प्रगतिशील व जनवादियों को जो प्रश्रय मिल रहा था वह समाप्त हो रहा है जिससे निराशा होकर प्रचार पाने के लिये वह अनेक तरह की नाटक बाजी कर रहे हैं यह उसी का हिस्सा है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Wednesday, January 20, 2016

संसार के जीवों में भिन्नता रहना स्वाभाविक-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(Sansar ki jivon mein Bhinnta rahana SwaBhavik-Bhartrihari Neeti Shatak ka Adhar pa chinttan lekh)

          हमारे देश में आजादी के बाद कथित रूप से बौद्धिक जगत में अनेक विचाराधारायें प्रवाहित हुईं है जिसमें लोगों के मस्तिष्क हरण कर उन्हें मौलिक चिंत्तन से दूर रखने का प्रयास इस उद्देश्य से किया गया कि वह यथास्थिति में परिवर्तन का विचार ही न करें। गरीब तथा असहाय के कल्याण का नारा इतना लोकप्रिय रहा है कि इसके सहारे अनेक लोगों ने समाज में श्रेष्ठ पद प्राप्त किया।  इसके बावजूद गरीब, असहाय तथा श्रमिकवर्ग की स्थिति में बदलाव नहीं हुआ।  यह अलग बात  है कि नारों के सहारे लोकप्रिय हुए कथित आदर्श पुरुषों का अनुसरण करने के लिये अनेक युवक युवतियां आज भी सक्रिय हैं।  सभी का एक ही लक्ष्य है कि गरीब को धनी, असहाय को शक्तिशाली और श्रमिक को सेठ बनायें। इस काल्पनिक लक्ष्य की पूर्ति के लिये अनेक लोग बौद्धिक साधना करते है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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वैराग्य सञ्चरत्येको नीती भ्रमति चापरः।
श्रृङ्गारे रमते कश्चिद् भुवि भेदाः परस्परम्।।
                              हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में भिन्न प्रकार के लोग होते ही हैं। कोई वैराग्य साधना के साथ मोक्ष के लिये प्रयासरत है तो नीति शास्त्र के सिद्धांतों में लीन है तो कोई श्रृंगार रस में लीन है।
                              हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार इस संसार के जीवों के स्वभाव में भिन्नता सदैव रहती है। स्वभाव के अनुसार ही सभी कर्म करते हैं तो परिणाम भी वैसा ही होता है। जो लोग सारे संसार के जीवों को एक रंग में देखना चाहते हैं उन्हें तो मनोरोगी ही माना जा सकता है। समाज सुधारने की मुहिम में अनेक लोगों ने प्रतिष्ठा प्राप्त की जबकि सच यह है इस संसार के चाल चलन में परिवर्तन स्वभाविक रूप से आता है। इसके बावजूद लोगों में भिन्नता बनी ही रहती है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, December 12, 2015

भारतीय धर्म ही पंथनिरपेक्ष है-हिन्दी चिंत्तन लेख (Indian relgion is natural panthnirpeksh-Hindu spritual thought article)

                           इस समय देश में धर्मनिरपेक्षता पर बहस चल रही है। कुछ पेशेवर विचारक कहते हैं कि हमारी संस्कृति धर्म निरपेक्ष है जबकि अध्यात्मिक चिंत्तकों का मानना है कि धर्म धारण करने का विषय है।
                           गीता में कर्म ही धर्म का पर्याय है जिससे मनुष्य निरपेक्ष नहीं रह सकता। उसमें भक्ति के तीन प्रकार पंथनिरपेक्षता का सटीक प्रमाण है। भारतीय ज्ञान के अनुसार कर्म ही धर्म रूप है जिससे निरपेक्षता संभव नहीं है पर भक्ति के किसी भी रूप से भेद न रखकर पंथनिरपेक्ष होना ही चाहिये।
                            भारतीय अध्यात्मिक दर्शन पर चलने वाले कर्म में ही धर्म देखते हैं इसलिये निरपेक्ष नहीं होते। भक्ति के प्रथक रूप स्वीकार करने कारण पंथरिनपेक्ष तो स्वाभाविक रूप से होते ही हैं।
                          विश्व में अकेला भारतीय ज्ञान ही कर्म निर्वाह ही धर्म मानता है तो भक्ति के अनेक रूप को स्वीकार कर पंथनिरपेक्ष रहने की प्रेरणा भी देता। आपकीबात आज भी आम भारतीय धर्मनिरपेक्षता शब्द से आत्मीय संबंध नहीं जोड़ पता क्योंकि वह स्वाभाविक रूप से पंथनिरपेक्ष होता ही है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Thursday, November 19, 2015

पश्चिम व पूर्व की अध्यात्मिक विचाराधाराओं को आधार प्रथक-हिन्दी चिंत्तन लेख(Pashchim Poorava ki Adhyatmik vichardharaon ko Adhar Prathak-Hindu Thought article)


                           एक अखबार में यह किस्सा पढ़ने को मिला कि एक कार्यक्रम में अमेरिका के राष्ट्रपति ने चीन के उद्योगपति से पूछा-‘जुनून की हद तक संघर्ष व्यवसाय में किस तरह मदद करता है?’
                           जेक मा ने कहा-‘यह जुनून नहीं दूसरों के लिये की गयी चिंता है।’
                           यह एक सामान्य वार्तालाप है पर गौर से सवाल करने और जवाब देने वाले का व्यक्तित्व देखा जाये तो इसमें पूर्व पश्चिम के दृष्टिकोण दिखाई देंगे।  पश्चिमी विचाराधारा के अनुसार अपना कर्म अपनी निजता के लिये किया जाना चाहिये जबकि पूर्वी विचाराधारा के अनुसार अपना कर्म सभी के हित के लिये हो तो निजी लाभ स्वयं होता है। पश्चिमी में लोग अपना लक्ष्य अपने लिये तय करते हुए सक्रिय होते हैं जबकि पूर्व में युवक समाज, परिवार तथा अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिये अपना अभियान प्रारंभ करते हैं। चीन  भले ही राजनीतिक रूप से साम्यवादी विचाराधारा पर चलता हो पर वहां आज भी उस बौद्ध धर्म का प्रचलन है जो भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा से निकला है।  सच तो यह है कि एक तरह से साम्यवादी विचाराधारा और तानाशाही के कारण ही वहां बौद्ध धर्म संरक्षित है वरना तो पश्चिमी विचाराधाराओं ने उसे भी ध्वस्त कर दिया होता
                           भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा के अनुसार अपने मन, विचार और देह के विकार भक्ति, ज्ञान तथा योग के अभ्यास से निकालने के बाद सांसरिक विषयों में कार्य करने की सात्विक शैली स्वयं ही हो जाती है। प्रातः धर्म, दोपहर अर्थ, सांय काम या मनोरंजन तथा रात्रि मोेक्ष का समय होता है।  प्रातः अपने मन, विचार और बुद्धि के विकार निकालना ही धर्म है और दोपहर के अर्थ का विषय केवल जीवन निर्वाह के लिये न कि उस समय किये जाने वाले कर्म तथा लक्ष्य को हृदय से लगाकर उसमें चिपककर कर स्वयं को मानसिक संताप देने से हैं।
                           कोई भौतिक विषय, वस्तु तथा विषय किसी का माईबाप नहीं हो सकता।  सांसरिक विषयों में सफलता वह असफलता लगी रहती है उसे लेकर अधिक चिंता नहीं करना चाहिये। हमारा ध्येय अध्यात्मिक साधना से अपना ही मनोबल बनाये रखना हो तो सांसरिक विषयों से जूझने की कला भी आ ही जाती है। सबसे बड़ी बात यह कि उच्च पद, लंबे कद और धन के मद के आकर्षण का शिकार पूर्व का आदमी नहीं होता।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Wednesday, November 11, 2015

कामना अर्थ व रूप की कभी उपेक्षा भी करना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन लेख(Kamna Arth Roop ki kabhi upeksha karna chahiye-Hindi thought article)


               भौतिक साधनों के नितांत उपभोग से जहां लोगों में बौद्धिक तीक्ष्णता का प्रमाण मिलता है वहीं सुविधा के संपर्क से मस्तिष्क के आलस्य से  आंतरिक चेतना शक्ति भी कम हो रही है।  प्रश्न यह नहीं है कि लोग उपभोग से विरक्त क्यों नहीं हो रहे वरन् समस्या यह है कि लोग अपने मस्तिष्क को विराम नहीं दे रहे। उपभोग की एकरसता के बीच उन्हें अध्यात्मिक रस का आनंद लेने की इच्छा होती है पर ज्ञान के अभाव में वह पूरी कर नहीं पाते। मन की कामनायें, अर्थ का अनर्थ से भरा मोह तथा आकर्षक वस्तुओं को देखने की नितांत इच्छा के बीच मनुष्य को थकाने वाला मनोरंजन मिल जाता हे पर उससे उबरने की इच्छा अंततः निराशा कर देती है।
अष्टावक्रगीता में कहा गया है कि
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विहाय वैरिणं काममर्थ चानर्थसङ्कुलम्।
धर्ममप्येतयोहेंतुं सर्वत्रानादरं कुरु।।
 
                                   हिन्दी में भावार्थ-वैर स्वरूप कामनायें तथा अनर्थ से भरे अर्थ का त्याग कर रूप धर्म को भी छोड़कर उनकी उपेक्षा करें।
                                   अध्यात्मिक चेतना के लिये कुछ समय सांसरिक विषयों की उपेक्षा करना होती है।  मन की चंचलता को नियंत्रित कर स्वयं में दृष्टा का भाव लाना हो्रता है।  उपभोग की तरफ केंद्रित प्रवृत्ति का निवृत्ति मार्ग अपनाये बिना दृष्टा होना सहज नहीं है।  हम मिठाई खायें या करेला वह पेट में अंततः कचड़ा ही बनता है जिसका निष्कासन हमें करना ही है।  उसी तरह दृश्यों का भी है। मनभावन हो या सताने वाला दृश्य आंखें देखती हैं पर दोनों ही अंततः मन में तनाव का कारण बन जाते हैं। उन्हें भुलाकर निष्पादन करना आवश्यक है। जो धन आया है उसमें से हम जितना व्यय करते हैं वही सार्थक है जो बचा रहा वह निरर्थक हैं।  जिसका हम उपयोग नहंी कर उस धन पर अहंकार करना व्यर्थ है।  हम धन का सेवक के रूप में उपभोग करते हैं न कि वह हमारा स्वामी है जिसे हम अपने मस्तिष्क पर धारणकर घूमें।  जीवन निर्वाह के लिये उपभोग सीमा के बाद कामना, अर्थ और रूप की उपेक्षा करना ही योग है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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