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Wednesday, January 20, 2016

संसार के जीवों में भिन्नता रहना स्वाभाविक-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(Sansar ki jivon mein Bhinnta rahana SwaBhavik-Bhartrihari Neeti Shatak ka Adhar pa chinttan lekh)

          हमारे देश में आजादी के बाद कथित रूप से बौद्धिक जगत में अनेक विचाराधारायें प्रवाहित हुईं है जिसमें लोगों के मस्तिष्क हरण कर उन्हें मौलिक चिंत्तन से दूर रखने का प्रयास इस उद्देश्य से किया गया कि वह यथास्थिति में परिवर्तन का विचार ही न करें। गरीब तथा असहाय के कल्याण का नारा इतना लोकप्रिय रहा है कि इसके सहारे अनेक लोगों ने समाज में श्रेष्ठ पद प्राप्त किया।  इसके बावजूद गरीब, असहाय तथा श्रमिकवर्ग की स्थिति में बदलाव नहीं हुआ।  यह अलग बात  है कि नारों के सहारे लोकप्रिय हुए कथित आदर्श पुरुषों का अनुसरण करने के लिये अनेक युवक युवतियां आज भी सक्रिय हैं।  सभी का एक ही लक्ष्य है कि गरीब को धनी, असहाय को शक्तिशाली और श्रमिक को सेठ बनायें। इस काल्पनिक लक्ष्य की पूर्ति के लिये अनेक लोग बौद्धिक साधना करते है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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वैराग्य सञ्चरत्येको नीती भ्रमति चापरः।
श्रृङ्गारे रमते कश्चिद् भुवि भेदाः परस्परम्।।
                              हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में भिन्न प्रकार के लोग होते ही हैं। कोई वैराग्य साधना के साथ मोक्ष के लिये प्रयासरत है तो नीति शास्त्र के सिद्धांतों में लीन है तो कोई श्रृंगार रस में लीन है।
                              हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार इस संसार के जीवों के स्वभाव में भिन्नता सदैव रहती है। स्वभाव के अनुसार ही सभी कर्म करते हैं तो परिणाम भी वैसा ही होता है। जो लोग सारे संसार के जीवों को एक रंग में देखना चाहते हैं उन्हें तो मनोरोगी ही माना जा सकता है। समाज सुधारने की मुहिम में अनेक लोगों ने प्रतिष्ठा प्राप्त की जबकि सच यह है इस संसार के चाल चलन में परिवर्तन स्वभाविक रूप से आता है। इसके बावजूद लोगों में भिन्नता बनी ही रहती है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Thursday, November 19, 2015

पश्चिम व पूर्व की अध्यात्मिक विचाराधाराओं को आधार प्रथक-हिन्दी चिंत्तन लेख(Pashchim Poorava ki Adhyatmik vichardharaon ko Adhar Prathak-Hindu Thought article)


                           एक अखबार में यह किस्सा पढ़ने को मिला कि एक कार्यक्रम में अमेरिका के राष्ट्रपति ने चीन के उद्योगपति से पूछा-‘जुनून की हद तक संघर्ष व्यवसाय में किस तरह मदद करता है?’
                           जेक मा ने कहा-‘यह जुनून नहीं दूसरों के लिये की गयी चिंता है।’
                           यह एक सामान्य वार्तालाप है पर गौर से सवाल करने और जवाब देने वाले का व्यक्तित्व देखा जाये तो इसमें पूर्व पश्चिम के दृष्टिकोण दिखाई देंगे।  पश्चिमी विचाराधारा के अनुसार अपना कर्म अपनी निजता के लिये किया जाना चाहिये जबकि पूर्वी विचाराधारा के अनुसार अपना कर्म सभी के हित के लिये हो तो निजी लाभ स्वयं होता है। पश्चिमी में लोग अपना लक्ष्य अपने लिये तय करते हुए सक्रिय होते हैं जबकि पूर्व में युवक समाज, परिवार तथा अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के लिये अपना अभियान प्रारंभ करते हैं। चीन  भले ही राजनीतिक रूप से साम्यवादी विचाराधारा पर चलता हो पर वहां आज भी उस बौद्ध धर्म का प्रचलन है जो भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा से निकला है।  सच तो यह है कि एक तरह से साम्यवादी विचाराधारा और तानाशाही के कारण ही वहां बौद्ध धर्म संरक्षित है वरना तो पश्चिमी विचाराधाराओं ने उसे भी ध्वस्त कर दिया होता
                           भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा के अनुसार अपने मन, विचार और देह के विकार भक्ति, ज्ञान तथा योग के अभ्यास से निकालने के बाद सांसरिक विषयों में कार्य करने की सात्विक शैली स्वयं ही हो जाती है। प्रातः धर्म, दोपहर अर्थ, सांय काम या मनोरंजन तथा रात्रि मोेक्ष का समय होता है।  प्रातः अपने मन, विचार और बुद्धि के विकार निकालना ही धर्म है और दोपहर के अर्थ का विषय केवल जीवन निर्वाह के लिये न कि उस समय किये जाने वाले कर्म तथा लक्ष्य को हृदय से लगाकर उसमें चिपककर कर स्वयं को मानसिक संताप देने से हैं।
                           कोई भौतिक विषय, वस्तु तथा विषय किसी का माईबाप नहीं हो सकता।  सांसरिक विषयों में सफलता वह असफलता लगी रहती है उसे लेकर अधिक चिंता नहीं करना चाहिये। हमारा ध्येय अध्यात्मिक साधना से अपना ही मनोबल बनाये रखना हो तो सांसरिक विषयों से जूझने की कला भी आ ही जाती है। सबसे बड़ी बात यह कि उच्च पद, लंबे कद और धन के मद के आकर्षण का शिकार पूर्व का आदमी नहीं होता।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Wednesday, November 11, 2015

कामना अर्थ व रूप की कभी उपेक्षा भी करना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन लेख(Kamna Arth Roop ki kabhi upeksha karna chahiye-Hindi thought article)


               भौतिक साधनों के नितांत उपभोग से जहां लोगों में बौद्धिक तीक्ष्णता का प्रमाण मिलता है वहीं सुविधा के संपर्क से मस्तिष्क के आलस्य से  आंतरिक चेतना शक्ति भी कम हो रही है।  प्रश्न यह नहीं है कि लोग उपभोग से विरक्त क्यों नहीं हो रहे वरन् समस्या यह है कि लोग अपने मस्तिष्क को विराम नहीं दे रहे। उपभोग की एकरसता के बीच उन्हें अध्यात्मिक रस का आनंद लेने की इच्छा होती है पर ज्ञान के अभाव में वह पूरी कर नहीं पाते। मन की कामनायें, अर्थ का अनर्थ से भरा मोह तथा आकर्षक वस्तुओं को देखने की नितांत इच्छा के बीच मनुष्य को थकाने वाला मनोरंजन मिल जाता हे पर उससे उबरने की इच्छा अंततः निराशा कर देती है।
अष्टावक्रगीता में कहा गया है कि
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विहाय वैरिणं काममर्थ चानर्थसङ्कुलम्।
धर्ममप्येतयोहेंतुं सर्वत्रानादरं कुरु।।
 
                                   हिन्दी में भावार्थ-वैर स्वरूप कामनायें तथा अनर्थ से भरे अर्थ का त्याग कर रूप धर्म को भी छोड़कर उनकी उपेक्षा करें।
                                   अध्यात्मिक चेतना के लिये कुछ समय सांसरिक विषयों की उपेक्षा करना होती है।  मन की चंचलता को नियंत्रित कर स्वयं में दृष्टा का भाव लाना हो्रता है।  उपभोग की तरफ केंद्रित प्रवृत्ति का निवृत्ति मार्ग अपनाये बिना दृष्टा होना सहज नहीं है।  हम मिठाई खायें या करेला वह पेट में अंततः कचड़ा ही बनता है जिसका निष्कासन हमें करना ही है।  उसी तरह दृश्यों का भी है। मनभावन हो या सताने वाला दृश्य आंखें देखती हैं पर दोनों ही अंततः मन में तनाव का कारण बन जाते हैं। उन्हें भुलाकर निष्पादन करना आवश्यक है। जो धन आया है उसमें से हम जितना व्यय करते हैं वही सार्थक है जो बचा रहा वह निरर्थक हैं।  जिसका हम उपयोग नहंी कर उस धन पर अहंकार करना व्यर्थ है।  हम धन का सेवक के रूप में उपभोग करते हैं न कि वह हमारा स्वामी है जिसे हम अपने मस्तिष्क पर धारणकर घूमें।  जीवन निर्वाह के लिये उपभोग सीमा के बाद कामना, अर्थ और रूप की उपेक्षा करना ही योग है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, October 31, 2015

मोक्ष या स्वर्ग कहीं भौतिक रूप में निवास नहीं करते-अष्टावक्र गीता के आधार पर चिंत्तन लेख(Moksh ya Swarg kahin Niwas nahin karta-Hindi Spiritual Thoguht)

                                   हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के भ्रम फैलाये गये हैं। खासतौर से स्वर्ग और मोक्ष के नाम पर ऐसे प्रचारित किये गये हैं जैसे वह  देह त्यागने के बाद ही प्राप्त होते हैें।  श्रीमद्भागवतगीता के संदेशों का सीधी अर्थ समझें तो यही है कि जब तक देह है तभी तक इंसान अपने जीवन में स्वर्ग तथा मोक्ष की स्थिति प्राप्त कर सकता है। देह के बाद कोई जीवन है, इसे हमारा अध्यात्मिक दर्शन मनुष्य की सोच पर छोड़ता है। अगर माने तो ठीक न माने तो भी ठीक पर उसे अपनी इस देह में स्थित तत्वों को बेहतर उपयोग करने के लिये योग तथा भक्ति के माध्यम से प्रयास करने चाहिये-यही हमारे अध्यात्मिक दर्शन का मानना है।
अष्टावक्र गीता में कहा गया है कि
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मोक्षस्य न हि वासीऽस्ति न ग्राम्यान्तरमेव वा।
अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः।।
                                   हिन्दी में भावार्थ-मोक्ष का किसी लोक, गृह या ग्राम में निवास नहीं है किन्तु अज्ञानरूपी हृदयग्रंथि का नाश मोक्ष कहा गया है।
                                   जिस व्यक्ति को अपना जीवन सहजता, सरलता और आनंद से बिताना हो वह विषयों से वहीं तक संपर्क जहां तक उसकी दैहिक आवश्यकता पूरी होती है।  उससे अधिक चिंत्तन करने पर उसे कोई लाभ नहीं होता।  अगर अपनी आवश्यकताआयें सीमित रखें तथा अन्य लोगों से ईर्ष्या न करें तो स्वर्ग का आभास इस धरती पर ही किया जा सकता है। यही स्थिति मोक्ष की भी है।  जब मनुष्य संसार के विषयों से उदासीन होकर ध्यान या भक्ति में लीन में होने मोक्ष की स्थिति प्राप्त कर लेता है।  सीधी बात कहें तो लोक मेें देह रहते ही स्वर्ग तथा मोक्ष की स्थिति प्राप्त की जाती है-परलोक की बात कोई नहीं जानता।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Wednesday, October 21, 2015

प्राचीन ग्रंथों के संदेश समझने के बात ही उस पर लिखें-हिन्दी चिंत्तन लेख(PrachinGranthon ke sandesh samjhane ka baat hi us par likhe-Hindi Spiritual thought article)

                                   
                                   अभी हाल ही में एक पत्रिका में वेदों के संदेशों के आधार पर यह संदेश प्रकाशित किया गया कि ‘गाय को मारने या मांस खाने वाले को मार देना चाहिये’।  इस पर बहुत विवाद हुआ। हमने ट्विटर, ब्लॉग और फेसबुक पर यह अनुरोध किया था कि उस वेद का श्लोक भी प्रस्तुत किया गया है जिसमें इस तरह की बात कही गयी है। चूंकि हम अव्यवसायिक लेखक हैं इसलिये पाठक अधिक न होने से  प्रचार माध्यमों तक हमारी बात नहीं पहंुंच पाती। बहरहाल हम अपनी कहते हैं जिसका प्रभाव देर बाद दिखाई भी देता है।
बहुत ढूंढने पर ही अथर्ववेद सि यह श्लोक मिला
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आ जिह्वाया मूरदेवान्ताभस्व क्रव्यादो वृष्टबापि धत्सवासन।
हिन्दी में भावार्थ-मूर्खों को अपनी जीभ रूपी ज्वाला से सुधार और बलवान होकर मांसाहारी हिसंकों को अपनी प्रवृत्ति से निवृत्त कर।
                                   हमें संस्कृति शुद्ध रूप से नहीं आती पर इतना ज्ञान है कि श्लोक और उसका हिन्दी अर्थ मिलाने का प्रयास करते हैं।  जहां तक हम समझ पाये हैं वेदों में प्रार्थनाऐं न कि निर्देश या आदेश दिये गये हैं।  उपरोक्त श्लोक का अर्थ हम इस तरह कर रहे हैं कि ‘हमारी जीभ के मूढ़ता भाव को आग में भस्म से अंत कर। अपने बल से हिंसक भाव को सुला दे।’
                                   हम फिर दोहराते हैं कि यह परमात्मा से प्रार्थना या याचना है कि मनुष्य को दिया गया आदेश। यह भी स्पष्ट कर दें कि यह श्लोक चार वेदों का पूर्ण अध्ययन कर नहीं वरन एक संक्षिप्त संग्रह से लिया गया है जिसमें यह बताया गया है कि यह चारो वेदों की प्रमुख सुक्तियां हैं।
                                   हम पिछले अनेक वर्षों से देख रहे हैं कि अनेक वेदों, पुराणों तथा अन्य ग्रंथों से संदेश लेकर कुछ कथित विद्वान ब्रह्मज्ञानी होने का प्रदर्शन करते हैं। अनेक प्रचार पाने के लिये धार्मिक ग्रंथों की आड़ में विवाद खड़ा करते हैं।  जिस तरह पाश्चात्य प्रचारक यह मानते हैं कि पुरस्कार या सम्मान प्राप्त करने वाला साहित्यकार मान जायेगा वैसे ही भारतीय प्रचारक भी यह मानते हैं कि गेरुए या सफेद वस्त्र पहनकर आश्रम में रहने वाले ही ज्ञानी है।  उनके अनुसार हम दोनों श्रेणी में नहीं आते पर सच यही है कि ग्रंथों का अध्ययन श्रद्धा करने पर ही ज्ञान मिलता है और वह प्रदर्शन का विषय नहीं वरनृ स्वयं पर अनुंसधान करने के लिये होता है। हमने लिखा था सामवेद में कहा गया है कि ‘ब्रह्मद्विष आवजहि’ अर्थात ज्ञान से द्वेष करने वाले को परास्त कर। हमारा मानना है कि बिना ज्ञान के धर्म रक्षा करने के प्रयास विवाद ही खड़ा करते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Sunday, October 11, 2015

विशेष रविवारीय दीपकबापू वाणी (Super Sundya Deepak Bapu Wani)



अपने साथी का मनोबल बढ़ायें, कमजोर कंघे भी बोझ उठा लेंगे।
‘दीपकबापू’ अहंकार में जीते, लोग संकट में क्यों भीड़ जुटा लेेंगे।
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कोई अंडा चबाये या खाये हलवा, पेशेवर जरूर करेंगे बलवा।
‘दीपकबापू’ शेर की खायें जूठन, शातिर भेड़िये पेलते जलवा।।
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लिख लिख कागज किये काले, दूजा तुलसी भया न कोय।
दीपकबापू पाया मान चाकरी से, इतराये जैसे महाकवि होय।।
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पकड़े जायें  नाम होता चोर, छुपे रहे तो कहलाते साहूकार।
‘दीपकबापू’ बदनाम डरते हैं, नामी कुकर्म कर भरें हुंकार।।
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भारत की आबादी है जवान, झेले हंसकर सट्टे नशे के बान।
दीपकबापू न रखें बुरा हिसाब, चिंता छोड़ सोयें चादर तान।।
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सड़ा सामान सभी खा रहे, शुद्धता गा गाना भी बजा रहे।
‘दीपकबापू’ तन मैला मन छैला, सोई सोच समाज जगा रहे।।
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जिंदगी में बहुत विषय हैं, समझते जिंदगी निकल जायेगी।
‘दीपकबापू’ करें ओम जाप, समझदानी चमक चमक जायेगी।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
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Friday, October 02, 2015

स्वच्छता अभियान के एक वर्ष पूर्ण होने पर आंकलन जरूरी(One Year complite of SwaChchhata Abhiyan-A Report)

                                   आज गांधी जयंती पर 25 सितंबर से प्रारंभ स्वच्छता सप्ताह  का समापन हो रहा है।  पिछले 2 अक्टूबर को जो स्वच्छता अभियान प्रारंभ हुआ था उसका आंकलन करें तो परिणाम ठीकठाक रहे हैं। कम से कम राज्य प्रबंध के  स्तर पर संस्थायें स्वच्छता को एक आवश्यक विषय मान रही हैं जबकि पहले उनमें अधिक जागरुकता नहीं थी।  लोगों में भी चेतना आयी है पर जितनी अपेक्षित थी नहीं दिखाई दे रही।
                                   हम जब स्वच्छता की बात करते हैं तो यह बता दें कि बाह्य तथा आंतरिक स्वच्छता जीवन का अभिन्न हिस्सा है।  एक योग साधक तथा गीता ज्ञानाभ्यासी होने पर अगर हम लिखने बैठें तो पूरा ग्रंथ लिख जायें पर उससे समाज लाभान्वित होगा इसकी संभावना नहीं है।  जब हमारी देह, मन और विचार में अस्वच्छता होती है उसे हम स्वयं नहीं देख पाते।  स्वयं की दुर्गंध अनुभूति मनुष्य के चेतनभाव से संपर्क नहंी कर पाती वरन् दूसरे परेशान होते हैं। श्रीमद्भागवत गीता में स्वच्छ स्थान का चयन करने वाला ज्ञानी माना गया है। अब ज्ञानी को स्वच्छ स्थान नहीं मिलेगा तो वह स्वयं तो करेगा ही वरना वह अपने अंतर्मन में  आत्मग्लानि के बोध से ग्रस्त होगा। ज्ञानी का यह भी काम है कि वह जहां गंदगी करे वहां सफाई भी करे।  उसे इस बात की परवाह नहीं करना चाहिये कि उसके परिश्रम का दूसरे को लाभ मिलेगा।
                                   हमने देखा है कि प्रातःकाल ही नहा धोकर पूजा पाठ करने वालों के चेहरे पर एक अजीब प्रकार का आत्मविश्वास दिखता है।  जबकि देर से उठने और नित्य क्रिया करने वालों में वैसी ऊर्जा नहीं दिखाई देती।  बड़े बड़े शहरों के अनेक आधुनिक इलाके जरूर चमकते हैं पर उनके दूरदराज के इलाके छोटे शहरों की अपेक्षा अत्यंत गंदे होते हैं।  अनेक बड़े शहरों में तो श्रमजीवी इतने गंदे इलाके में रहते हैं कि वहां स्वस्थ जीवन की कल्पना करना ही निरर्थक लगती है।  अभी दिल्ली में डेंगू बुखार की चर्चा हो रही है पर हमारा अनुमान है कि उससे कई गुना तो मलेरिया सहित अन्य मौसमी बीमारियों के लोगों की संख्या अधिक होगी जिनके कीटाणु गंदगी पर ही ज्यादा पनपते हैं।
                                   बहरहाल हमारा मानना है कि स्वच्छता अभियान में निरंतर सक्रियता जरूरी है और इसमें राजकीय लोगों से अधिक निजी रूप से जनता को चेतना के साथ गंदगी का निपटारा करना चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Wednesday, September 16, 2015

छिपाने के बहाने करते-हिन्दी कविता(Chhipane ke bahane karate-HindiPoem)


काम करना आता नहीं
अपनी कमजोरी
छिपाने के बहाने करते।

ज़माने के भले का ठेका लिया
कमजोर नीयत है
छिपाने के बहाने करते।

कहें दीपकबापू नकारा लोगों की
मधुर बातों से
कई बार धोखा खाया
अब तो डराती है
सभ्य चेहरे की भी छाया
होठों पर हंसी होती
वही दिल के कुटिल इरादे
छिपाने के बहाने करते।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Friday, September 11, 2015

हिन्दी में लिखना भी एक तरह से व्यसन है-14 सितंबर 2015 पर हिन्दी दिवस पर नया पाठ(Writting ih Hindi As Adiction-New post on hindi diwas, hindi day,specil hindi article)

                                    एक सप्ताह में अगर किसी ब्लॉग लेखक के पाठ अगर अंतर्जाल पर दो लाख से ज्यादा पाठकों के सामने दिखते हैं तो उसकी लोकप्रियता की कौनसी श्रेणी में रखना चाहिये?
14 सितम्बर हिन्दी दिवस मनाया जाता है। हम अंतर्जाल पर सन् 2007 से हिन्दी दिवस पर अनेक पाठ लिख चुके हैं। हमें यह पता नहीं है कि इंटरनेट पर अन्य हिन्दी लेखकों की क्या स्थिति है पर इतना जानते हैं कि अगर हिन्दी की बात हो तो कम से कम हमें प्रोत्साहित करने वाला एक भी शख्स नहीं मिला।  अगर स्वप्रेरणा और लेखन का व्यसन न होता तो शायद निरंतर नहीं लिख पाते।  आखिर हमने अंतर्जाल पर लिखते हुए क्या पाया? अगर अर्थ की बात है तो सब निरर्थक रहा पर अगर ज्ञान की बात है तो वह स्वर्णिम भंडार बढ़ता ही रहा है।  कबीर, चाणक्य, विदुर, भर्तृहरि, रहीम, मनु और कौटिल्य के अर्थशास्त्र पर जितना समझा उससे कम ही लिख पाये।  श्रीमद्भागवत गीता और गुरुग्रंथसाहिब के अभ्यास ने तो मानसिक रूप से इतना परिपक्व बना दिया है कि अपने लिखे पाठों की प्रतिक्रिया के इंतजार अब आंखें या मन नहीं थकाते। लिखने में परिश्रम बहुत होता है पर लेखन के व्यसन ने हमेशा ही साथ दिया।
                                   दरअसल हमने यह पाठ 14 सितंबर हिन्दी दिवस 2015 के अवसर पर अपने ब्लॉगों पर पाठक संख्या की बढ़ती संख्या को देखते हुए लिखा। कल सभी ब्लाग पर करीब 20 हजार पाठ पाठन पाठक संख्या थी।  13 सितंबर तक यह संख्या चालीस हजार तक पहुंच सकती है।  करीब एक सप्ताह में दो लाख से अधिक पाठक इस लेखक के पाठों के संपर्क में आयेंगे। असंगठित, स्वतंत्र और अध्यात्मिक लेखक होने के नाते इतनी संख्या अंतर्जाल पर जुटाना अपने आप में एक जोरदार अनुभव होगा। हिन्दी में लिखने के व्यसन का आनंद इसी हिन्दी सप्ताह में अधिक ही आता है।
इधर विश्व हिन्दी सम्मेलन हो रहा है इसमें इस बात पर अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिये कि अगली पीढ़ी कागज पर नहीं वरन् कंप्यूटर अंतर्जाल के लिये लिखेगी। अंतर्जाल पर हिन्दी लिखने की स्वाभाविक सुविधायें जुटाने का विचार विश्वहिन्दीसम्मेलन में होना चाहिये। शेष लिखते ही रहेेंगे।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Wednesday, September 02, 2015

आज ट्विटर पर चर्चा के विषयों पर संक्षिप्त लेख(today disscusion on Twitter public subject)


         मजदूर नेता निंरतर आंदोलन चलाने में दैहिक तथा मानसिक श्रम से बचने के लिये हड़ताल करवाते हैं। मजदूरनेता अब कमरे के अंदर और बाहर अलग रवैये के कारण श्रमजीवियों के विश्वासपात्र नहीं रहे। श्रम संगठनों के नेता भारतीय इतिहास में मजदूरों के हित के लिये हुए एक भी सफल आंदोलन का नाम नहीं बता सकते। हमारा मानना है कि प्रबंधक अगर श्रमिक वर्ग से से  सीधे संपर्क में रहकर उनकी समस्यायें हल करें तो मजदूर नेता बेकार हो जायेंगे। कथित श्रमिकनेता अधिकारी तथा कर्मचारी के बीच सेतु की बजाय दलाल बनकर अपना हित साधते हैं। उनकी विश्वसनीयता कम हुई है। हालांकि हमारा मध्यम तथा मजदूर वर्ग की खुशहाली के बिना देश खड़ा नहीं रह सकता इसलिये उस पर ध्यान देना चाहिये। बंद और हड़ताल से जनमानस में कर्मचारियों की छवि खराब होने के साथ सहानुभूति भी खत्म होती है।
          देश का प्रबंध दिल्ली से चले या नागपुर से आम आदमी को तो अपने हित से मतलब है। राष्ट्रीयस्वयंसेवकसंघ एक सामाजिक संगठन है। समाज निर्माण में राजसीकर्म आवश्यक है जो राजसी बुद्धि से ही होते हैं। वनरैंकवनपैंशन पर राष्ट्रीयस्वयंसेवक संध के प्रयासों से यह जाहिर हो गया है कि वह राष्ट्रवाद का पोषक है। आमभारतीय नागरिक की दृष्टि में राष्ट्रीयस्वयंसेवकसंघ में एक ऐसा संगठन है जो भारतीय ज्ञान, दर्शन और समाज की रक्षा के लिये काम करता है।
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Saturday, August 22, 2015

निष्काम भाव ही आनंद से रहने का उपाय-हिन्दी चिंत्तन लेख(mishkam bhaw hi anand se rahane ka upay-hindi religion thought article)


                                   कर्म तीन प्रकार होता है-सात्विक, राजसी और तामसी। हम यहां राजसी कर्म  फल और गुण की चर्चा करेंगे।  अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह तथा काम के वशीभूत ही राजसी कर्म होते हैं। अतः ज्ञानी लोग कभी भी राजसी कर्म में तत्पर लोगों से सात्विकता की आशा नहीं करते। आज के संदर्भ में देखा जाये तो प्रचार माध्यमों में राजसी कर्म में स्थित लोग विज्ञापन के माध्यम से सात्विकता का प्रचार करते हैं पर उनके इस जाल को ज्ञानी समझते हैं।  पंचसितारा सुविधाओं से संपन्न भवनों में रहने वाले लोग सामान्य जनमानस के हमदर्द बनते हैं।  उनके दर्द पर अनेक प्रकार की  संवदेना जताते हैं।  सभी कागज पर स्वर्ग बनाते हैं पर जमीन की वास्तविकता पर उनका ध्यान नहीं होता।  हमने देखा है कि अनेक प्रकार के नारे लगाने के साथ ही वादे भी किये जाते हैं पर उनके पांव कभी जमीन पर नहीं आते।
                                   इसलिये जिनका हमसे स्वार्थ निकलने वाला हो उनके वादे पर कभी यकीन नहीं करना चाहिये। सात्विकता का सिद्धांत तो यह है कि निष्काम कर्म करते हुए उनका मतलब निकल जाने दें पर उनसे कोई अपेक्षा नहीं करे। आजकल के भौतिक युग में संवेदनाओं की परवाह करने वाले बहुत कम लोग हैं पर उन पर अफसोस करना भी ठीक नहीं है।  सभी लोगों ने अपनी बुद्धि पत्थर, लोहे, प्लास्टिक और कांच के रंगीन ढांचों पर ही विचार लगा दी है।  मन में इतना भटकाव है कि एक चीज के पीछे मनुष्य पड़ता है तो उसे पाकर अभी दम ही ले पाता है कि फिर दूसरी पाने की इच्छा जाग्रत होती है।  जिन लोगों को लगता है कि उन्हें सात्विकता का मार्ग अपनाना ठीक है उन्हें सबसे पहले निष्काम कर्म का सिद्धांत अपनाना चाहिये।  किसी का काम करते समय उससे कोई अपेक्षा का भाव नहीं रखना चाहिये चाहे भले ही वह कितने भी वादे या दावा करे।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Monday, July 27, 2015

आतंकवाद के प्रचार में समाचार तथा बहस से मदद न करें.हिन्दी चिंत्तन लेख(atankwad muft ke vyapar par chal raha hai-hindi thought article)


             हमारा तो मानना है कि विश्व में आतंक एक ऐसा व्यापार बन गया है जो प्रचार की वजह से पनपा है। अगर प्रचार माध्यम आतंक की खबरों को लघु या संक्षिप्त रूप से प्रसारित करें और किसी तरह की बहस न आयोजित करें तो यकीनन आतंकवाद के व्यापारी ठंडे हो जायेंगे। अनेक अपराध विशेषज्ञ आतंकवाद के सीधे प्रसारण का विरोध करते रहें हैं पर लगता नहीं कि उनकी सुनी जाती है।  एक बात दूसरी बात यह भी है कि आतंकवाद के धनदाता भी संदेहास्पद हैं। हम देख रहे हैं कि सारे विश्व में पैसा चंद धनपतियों के हाथ में है। उन्हीं के पास प्रचार माध्यमों का स्वामित्व है। इतना ही नहीं टेलीफोन सहित समस्त संचार माध्यम भी उनके नियंत्रण मे हैं।  ऐसे में तो कभी कभी लगता है कि आतंकवादियों को यही धनपति अपने दो लक्ष्यों की पूर्ति के लिये पैसा देते हैं.एक तो इसलिये कि समाज उनके प्रचार माध्यमों की सनसनीखेज सामग्री से बंधा रहे दूसरा यह कि प्रशासन आतंक से लड़ने में लगा रहे और उसकी आड़ में धनपतियों के ही संरक्षण में चल रहे काले धंधे चलते रहें।
                              वैसे भी देखा गया है कि यह हमले भीड़ वाली जगहों पर किये जाते हैं जहां सामान्य लोगों के साथ ही छोटे पद वाले सुरक्षाकर्मी होते हैं। अधिक संख्या में हताहतों की संख्या होने से आतंकवादियों के दुष्कृत्य को प्रचार भी खूब मिलता है।  इन आतंकवादियों के प्रायोजित करने वालों के नाम पता करना कठिन जरूर है पर असंभव नहीं है पर जरूरत इच्छा शक्ति की है। इन आतंकियों को कीमती सामान की तस्करीए नशे के व्यापार तथा खेलों के सट्टे से अधिक धन मिलता है।  भारत में बढ़ते धन के साथ  अपराध भी बढ़े है साथ ही युवाओं में सट्टे और नशे की आदत बढ़ती जा रही है।  इससे जुड़े काली नीयत के व्यापारियों के लिये प्रशासन की सख्ती एक चुनौती होती है जब उसका ध्यान किसी बड़ी घटना की तरफ जाता है तो उनके संरक्षित अपराधी अपना काम करने लगते हैं। इतना ही नहीं आतंक और काले धंधे के व्यापारियों का गठजोड़ संभवत इतना शक्तिशाली है कि उसे अलग धनपति भी उनके दबाव के आगे बेबस होकर उन्हें हफ्ता देते हैं।
                              इस तरह के आतकंवाद से मुक्त होने के लिये यह आवश्यक है कि इसके प्रचार पर अधिक समय नहीं व्यय करना चाहिये। कम से कम सीधा प्रसारण तो किया ही नहीं जाना चाहिये।  अततः आतंकवाद का व्यापार मुफ्त के विज्ञापन पर ही चल रहा है। लोग इस प्रचार से डरते हैं और आतंकवादियों के प्रति कोई प्रतिकूल कदम उठाने का ख्याल नहीं करते। युवाओं को भी यह बात समझाना चाहिये वह नशे तथा खेलों के सट्टे से दूर रहें।
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Monday, July 20, 2015

पेशेवर बुद्धिमान श्रीगीता से कतराते हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख(peshewar buddhiman shrigeeta se katrate hain-hindi thought article)

                              एक मनोरोगी और शराबी 24 वर्षीय हत्यारे ने छह वर्षों में 14-15 बच्चों की हत्या कर उनसे दुष्कर्म किया। अब पकड़ा गया। इस पर देश भर के मनोवैज्ञानिक, अपराध शास्त्री तथा समाज के जानकार बहस करते नज़र आ रहे हैं।  बताया जाता है कि पुलिस ने एक बार उसे पकड़ा भी था पर वह जमानत पर छूट गया।  उस पर भी तमाम तर्क दिये जा रहे हैं। इस बहस पर अगर श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों के आधार पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि कोई यह आज  तक इस तथ्य को स्वीकर  नहीं कर पाया कि इस संसार में आसुरी तथा दैवीय प्रकृत्ति के लोग हमेशा ही विद्यमान रहेंगे।  अपनी प्रकृत्ति का कोई भी मनुष्य उल्लंघन नहीं कर सकता।  एक बार अगर किसी के बारे में यह पता लग जाये कि वह आसुरी प्रकृत्ति का हो तो उसे कैसे रोका जाये यह तो बहस का विषय हो सकता है-क्योंकि आज के सभ्य विश्व समाज के कानून मानवाधिकारों का भ्रम भी पालते हैं-पर मनोविज्ञान और समाज की दृष्टि से इसमें कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता।
                              किसी भी प्रकार की विषय पर व्यवसायिक बहस लंबी जारी रखनी होती पर  श्रीमद्भागवत गीता का इकलौता के तर्क उसे रोक देगा।  बहसें प्रायोजित और विद्वान पेशेवर होते हैं उन्हें लंबी बहस खींचकर प्रचार माध्यमों का विज्ञापन समय पास करने के लिये तर्क से अधिक कुतर्क देते हैं। ।  अगर कोई श्रीमद्भागवत गीता का तर्क देगा तो फिर अंग्रेजी पद्धति से शिक्षित समाज उसे पौगापंथी कहकर ठुकरा देगा। यही कारण है कि व्यवसायिक अभिव्यक्ति में लगे संस्थान श्रीमद्भागवत गीता से दूर  भागते हैं क्योंकि तब सांसरिक विषयों में भी तर्क वितर्क की गुंजायश नहीं रह जाती जो समय पास करने के लिये जरूरी है।
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Friday, July 17, 2015

आदमी को चूहा बनने से बचना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन लेख(admi ko chuha banane se bahchan chahiye-hindi thought article)

                              सब जानते हैं कि लालच बुरी बला है पर बहुत कम लोग हैं जो इस ज्ञान को धारण कर चलते हैं। हम में से अनेक लोगों ने पिंजरे में चूहे को फंसाकर घर से बाहर जाकर छोड़ा होगा।  सभी जानते हैं कि चूहे को पकड़ने के लिये पिंजरे में रोटी का एक टुकड़े डालना होता है।  चूहा जैसे ही उस रोटी के टुकड़े को पकड़ता है वह पिंजरे में बंद हो जाता है। चूहे में वह बुद्धि नहीं होती जिसे प्रकृत्ति ने भारी मात्रा में इंसान को सौंपा है।  फिर भी सामान्य मनुष्य इसका उपयोग नहंी करते।  अनेक लोग यह शिकायत करते हैं कि हमें अमुक आदमी ने ठग लिया है अथवा धोखा दिया है। इस तरह की शिकायत करने वाले लोग इस आशा में रहते हैं कि अपने साथ हुई ठगी या धोखे का बयान दूसरों से करेंगे तो सहानुभूति मिलेगी पर यह नहीं सोचते कि सुनने वाले उन्हीं की बुद्धि पर हंसते हैं-मन में कहते हैं कि यह चूहा बन गया।
                              कहा जाता है कि पशु पक्षियों तथा मनुष्य में भोजन, निद्रा तथा काम की प्रवृत्ति एक जैसी रहती है पर उसके पास उपभोग के  अधिक विकल्प चुनने वाली सक्षम बुद्धि होती है।  यह अलग बात है कि अनेक ज्ञान और योग साधक अपनी बुंिद्ध का उपयोग ज्ञान के साथ करने की योग्यता अर्जित कर लेते हैं जबकि सामान्य मनुष्य उसी तरह ही विषयों के पिंजरे में फंसा रहता है जैसे चूहा रोटी के टुकड़े में ठगा जाता है।  कहा जाता है कि आजकल तो मनुष्य अधिक शिक्षित हो गया है पर हम इसके विपरीत स्थिति देख रहे हैं।  निरर्थक शिक्षा नौकरी की पात्रता तो प्रदान करती है पर जीवन के सत्य मार्ग से विचलित कर देती है।  पढ़े लिखे लोग अशिक्षित लोगों से अधिक ठगी या धोखे का शिकार हो रहे हैं।  हमारे देश में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से जुड़ी शिक्षा को धर्म से जोड़कर शैक्षणिक संस्थानों से दूर रखा गया है पर अनुभव तो यह है कि इसके अभाव में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से पढ़े लोग अनपढ़ लोगों से ज्यादा दूसरों के बहकावे में आ जाते हैं। इसलिये यह भ्रम भी नहीं रखना चाहिये कि आधुनिक शिक्षा से व्यक्ति अध्यात्मिक ज्ञानी हो जाता है।
                              इसलिये जिन लोगों का अपना जीवन सुखद बनाना है वह नित्य भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्यययनर अवश्य करें। जीवन में सांसरिक विषयों के साथ अध्यात्मिक सिद्धांतों के अनुसार संपर्क करने का तरीका चाणक्य और विदुर नीति में अत्यंत सरलता से समझाया गया है।     
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Sunday, July 12, 2015

ज्ञानियों का त्याग ही इस देश को बचाये हुए है-हिन्दी चिंत्तन लेख(guaniyon ka tyag hi is desh ko bachaye hue hai-hindi thought article)

                एक बार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जूनियर जार्जबुश ने विश्व में बढ़ती महंगाई को भारतीय जनता में व्याप्त अधिक खाने की प्रवृत्ति को बताया था।  उस समय अनेक विद्वानों ने इसका मजाक उड़ाया था। अंतर्जाल पर सक्रियता में नवीन व्यक्ति होने के कारण  हमने भी अधिक पाठक बटोरने की दृष्टि से बुश साहब से अपनी असहमति जताई थी। यह सात वर्ष पहले की बात थी। उस समय निजी टीवी चैनल और अंतर्जाल दोनों ही संचार जगत में एक नयी शुरुआत कर रहे थे। जैसे जैसे संचार की शक्ति बढ़ी तो नयी नयी जानकारियां आने लगीं। भारत में इस दौरान खानपान की आदतों में भारी बदलावा भी आया। उस समय हमने लिखा था कि चूंकि भारत के चाट भंडारों में भीड़ रहती है इसलिये कोई भी यह सोच सकता है कि भारत में लोग खाते बहुत हैं।  सात वर्ष बाद अब तो  भारत में मॉल के रूप में आधुनिक बाज़ार का रूप लिया है और आकार में बड़े होने के कारण वहां भी भीड़ अधिक दिखती है। यह अलग बात है कि वहां खाद्य पदार्थों के अलावा फिल्मों के उपभोक्ता और दर्शक ही अधिक आते हैं। इस तरह उपभोग प्रवृत्ति में बदलाव तथा उपभोक्ताओं की बड़ी संख्या किसी विकास का परिचायक नहीं  है क्योंकि इसके पीछे हमारा कोई नवीन निर्माण नहीं है।  रोजगार, स्वास्थ्य तथा नैतिक आचरण का पैमाना बहुत नीचे चला गया है। कर्ज लेकर घी पीने के जिस सिद्धांत पर समाज चला है उसे देखकर तो अब विदेशी यह भी कह सकते हैं कि भारतीय कमाते कम हैं खाते ज्यादा हैं।
                              सब कुछ बदला है पर यहां के धनपितयों की प्रवृत्ति जस की तस है। खाद्य पदार्थों में मिलावट तथा पहनने ओढ़ने में नकली सामान बनाने  की वही कहानी अब भी जारी है। पहले बाज़ार से अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थों में मिलावट के समाचार आते थे पर अब तो एक टीवी समाचार चैनल ने प्लास्टिक के चावल बनने की बात कहकर हैरान ही कर दिया है। हम सभी जानते हैं कि अन्न से मन और मन से मनुष्य का अस्तित्व है। अगर इसी तरह अन्न से प्लास्टिक का मेल होने की बात आगे बढ़ी तो फिर हमें शुद्ध मनुष्य ढूंढना ही मुश्किल हो जायेगा।
                              हमने पहले भी कहा था और अब भी कह रहे हैं कि भारत में प्रकृत्ति की कृपा अन्य देशों से कहीं अधिक है।  यहां भूजल का बेहतर स्तर, हर तरह के अन्न की फसल और विभिन्न खनिजों संपदा को देखकर कोई नहीं कह सकता कि भारत अभिशप्त देश है। यह अलग बात है कि यहां लोभ की ऐसी प्रवृत्ति है कि कोई धनपति अपनी कमाई से संतुष्ट होने की बजाय दूसरे के मुंह से निवाला निकालकर या खींचकर अपनी तरफ करने पर ही प्रसन्न होता है। यही कारण है कि हमारा देश सब कुछ होते हुए भी गरीब और अविकसित कहा जाता है। मजे की बात यह है कि जितना अज्ञानी समुदाय है उससे ज्यादा ज्ञानी लोगों का समूह है।  शायद यही कारण है कि यह देश चल रहा है। अज्ञानी के लोभ की प्रवृत्ति के बावजूद ज्ञानियों का त्याग भाव हमारे देश को बचाये हुए है।
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