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Sunday, December 27, 2015

राजा को किसान की तरह होना चाहिये-मनुस्मृत्ति के आधार पर चिंत्तन लेख (A King Should As Farmer-A Hindi Article based on ManuSmriti)


           भारतीय अध्यात्मिक दृष्टि प्रजा हित के लिये राज्य प्रमुख को किसान से सबक लेना वैसे हर मनुष्य को अपने आश्रितों की रक्षा के लिये संघर्ष करना चाहिये।  उसी तरह राजसी पदों पर कार्य करने वालों को अपनी कार्यप्रणाली किसानों की तरह ही अपनाना चाहिये जो अपनी फसल के उत्पादन के लिये जमकर मेहनत करने के बाद भी उसकी रक्षा के लिये प्रयास करते हैं।  खेतों में खड़ी फसल कोई पशु न खाये इसके लिये वह उसे भगा देते हैं। फसल के शत्रु कीड़ोें का नाश करते हैं।  राजसी पदों पर कार्य करने वाले लोगों को भी अपने क्षेत्र की प्रजा की रक्षा के लिये ऐसे ही प्रयास करना चाहिये।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यथेद्धरति निदांता कक्ष धान्यं च रक्षति।
तथा रक्षेन्नृपोराष्ट्रं हन्याच्च परिपन्विनः।।
                           हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकार किसान अपने धन की रक्षा के लिये खरपतवार उखाड़ फैंकता है वैसे ही राजा को प्रजा के विरोधियों का समूल नाश करना चाहिये।
                           राजनीति में आजकल हिंसक प्रयासों से अधिक कूटनीति को भी महत्व दिया जाता है इसलिये राजसी पुरुषों को ऐसे प्रयास करना चाहिये जिससे अपराधी तथा प्रजाविरोधी तत्व सक्रिय न हों। जो राजसी पुरुष ऐसा नहीं कर पाते उनकी प्रजा भयंकर संकट में घिर जाती है। हम मध्य एशिया में जिस तरह के हालत देख रहे हैं उसका यही निष्कर्ष है कि वहां के राजसी पुरुषों ने ऐसा नहीं किया जिससे अब वहां तबाही का दौर चल रहा है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Saturday, September 21, 2013

मनुस्मृति-रात्रि भोजन के बाद मनोरंजन करना चाहिये(manu smriti-ratru bhojan ke baad manoranjan karna aawashyak)



      आमतौर से लोग यह समझते हैं कि भारतीय अध्यात्म दर्शन इंद्रियों पर नियंत्रण करने के लिये हर विषय का त्याग करने की बात करता है। वह मनोरंजन तथा खेल आदि का विरोधी है।  यकीनन यह विचार किसी के भी अज्ञानी होने का ही प्रमाण है।  यह अलग बात है कि जहां भारतीय अध्यात्मिक दर्शन जहां भक्ति तथा ध्यान साधना को एकांत करने की बात कहता है वहीं वह सांसरिक विषयों के साथ निर्लिप्त भाव से  जुड़ने की राय भी देता है।  इस देह की सभी इंद्रियां हमेशा सक्रिय रहती हैं। इंद्रियों का यह स्वभाव है कि वह विभिन्न रसों में लिप्त होने के लिये हमेशा उत्सुक रहती हैं। एकरसता उनको उबा देती है। इसलिये समय और स्थिति कंे अनुसार इंद्रियों पथ बदलना चाहिये पर उनके विषयों से जुड़ने का भी एक समय होता है। हमेशा भक्ति और साधना नहीं हो सकती तो हमेशा मनोरंजन भी नहीं हो सकता।  हमारी देह है तो उसे सांसरिक विषयों से जोड़ना ही पड़ता हैं। प्रातःकाल योग साधना के दौरान आसन, ध्यान, मंत्र जाप तथा पूजा करने से जहां देह, मन और विचारों की शुद्धि होती है वहीं सांयकाल मनोरंजन के दौरान गीत संगीत सुनने से भी मनोविकार दूर होने के साथ ही थकान भी दूर होती है। आदमी की थकी देह में बैठा मन जब मयूर की तरह नाचता है उसमें वह दोपहर अर्थोपार्जन के दौरान एकत्रित विष का नाश होता है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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तत्र भुजत्वा पुनः किञ्चित्तूर्वघोषैः प्रहर्षितः।
संविशेत्तु यथाकालमत्तिष्ठेच्य यतवलमः।।
                        हिन्दी में भावार्थ-भोजन करने के बाद कुछ समय हृदय को प्रसन्न करने के लिये गीत संगीत सुनने के बाद अपनी थकान दूर करने के लिये शयन करना चाहिये।
                        हमारे यहां भक्ति और साधना के साथ ही मनोरंजन का भी समय तय कर जीवन नहीं बिताया जाता।  प्रातःकाल गीत संगीत के साथ मनोंरजन के नाम पर भक्ति होती है तो सांयकाल भी कहीं भक्ति संगीत के नाम पर मनोरंजन कार्यक्रम होते हैं।  हैरानी तब होती है जब अनेक जगह भक्ति संध्या के नाम पर लगते हैं। भक्ति संध्या अर्थात यह  दो शब्द  ज्ञानसाधकों को हतप्रभ कर देते हैं। तब उनके मन में यह विचार भी आता है कि क्या संध्या को भी भक्ति होती है क्या? हां, इतना अवश्य है कि अनेक अध्यात्मिक ज्ञानी रात्रि शयन से पूर्व ध्यान कर सोने की सलाह देते हैं पर वास्तव में इससे निद्रा अच्छी आती है। ध्यान करने से दिन भर जो मन में एकत्रित विष  नष्ट हो जाता है।  शयन करते समय उन विषयों का विचार नहीं आता पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि भक्ति के नाम पर मनोरंजन कर उस स्थिति को पाया जा सकता है।
                        कहने का अभिप्राय है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन किसी विषय से जुड़ने पर प्रतिबंध लगाने की राय नहीं देता पर समय तथा सीमा के अनुसार काम करने की राय देता है।  प्रातःकाल जहां एकांत साधना जीवन में पवित्रता लाती है वहीं सांयकाल मनोरंजन करना भी मन को प्रसन्नता देता है। यह मनोरंजन भी एकांत में या सीमित समूह में होना चाहिये न कि उसके लिये भारी भीड़ एकत्रित की जाये।  भीड़ में मनोरंजन का लाभ वैसे ही कम होता है जैसे कि सार्वजनिक रूप से भक्ति करने पर मिलता है। किसी भी भाव की सुखद अनुभूति अंदर केवल एकांत में ही जा सकती है भीड़ में मचा शोर मनोरंजन कम तनाव का कारण अधिक होता है।


संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, June 01, 2013

चाणक्य नीति-धनियों को समाज में सम्मान मिलना स्वाभाविक (chankya neeti-dhanwan ko samaj mein samman swabhavik roop se milen)



       बहुत प्रयास करने के बाद भी जिन लोगों के पास धन बहुतायत मात्रा में नहीं आता वह अफसोस कर अपना खून जलाने की बजाय भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का अध्ययन करें। उसके अध्ययन करने से  ज्ञान होने पर उन्हें धनवानों की सभा में प्रवेश करने की इच्छा से मुक्ति मिल जायेगी।  हमारे प्राचीन  नीति विशारद हमेशा ही योग्यता, विद्वता तथा परिश्रमी मनुष्य का ही  जीवन धन्य मानते रहे हैं पर समाज के लोग धनी आदमी में देवताओं जैसे गुण देखते हैं।  अल्पधनी, परिश्रमी तथा अध्यात्मिक ज्ञानी को समाज सामान्य दृष्टि से देखता है।  कोई धनी किसी को धन बिना स्वार्थ के धन देता नहीं है पर उसकी तरफ आशा से ताक रहे लोग उसके इर्दगिर्दं रौशनी के आगे पतंगे मंडराते  हैं।  धनी लोगों के पास भीड़ देखकर अल्पधनी और निर्धन दोनों ही यह सोचते हैं कि वह उनकी अपेक्षा अधिक सम्मानीय हैं।  इतना ही नहीं कुछ लोग तो अर्थोपार्जन में सफल लोगों को विद्वान भी मानते हैं।  ऐसे में अगर अल्पधन या निर्धनता के रहते किसी को सम्मान नहीं मिलता तो उसे चिंता नहीं करना चाहिये। 
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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यस्याऽर्थास्तिस्य मित्राणि यस्याऽर्थास्तस्य बान्धवा।
यस्याऽर्थः स पुर्माल्लोकेयस्याऽर्थाः स च पंडितः।।
           हिन्दी में भावार्थ-जिस व्यक्ति के पास धन है लोग स्वतः ही उसके पास आकर मित्र बन जाते हैं। रिश्तेदार भी उसे सम्मान देते हैं। आधुनिक मानव समाज की दृष्टि में विद्वान और सम्मानित माना जाता है।
      सच बात तो यह है कि जहां से अर्थ प्राप्त की आशा मनुष्य  को रहती है वहीं वह जाता है। वह उन धनोत्पादक स्थानों पर अपना वर्चस्व कायम करने के साथ ही धनी लोगों से अपने मधुर संपर्क बनाना चाहता है।  इसलिये अर्थ स्तोत्रों पर मनुष्य समुदाय की बहुतायत होने पर हैरानी नहीं होना चाहिये। जिन स्थानों या व्यक्तियों के पास अधिक धन है उनकी प्रतिष्ठा भी इसी कारण से बढ़ती है क्योंकि वहां से मनुष्य अकेला या समूह बनाकर अपने अंदर अर्थ की भावना शांत करने के लिये सक्रियता के साथ वहां जाता है। इसलिये जिनके घरों या जेबों में धन अल्प मात्रा में है उन्हें धनिकों केा मिलने वाले सम्मान के प्रति ईर्ष्या भाव त्याग कर अपने काम में लगे रहना चाहिये। वह अपने विचार बदल सकते हैं पर चाणक्य ने जो समाज की सच्चाई बताई है उससे कोई इंकार नहीं कर सकता।
  

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, April 28, 2013

विदुरनीति के आधार पर चिंत्तन-क्लेश से धन प्राप्त करने का विचार न करें (vidru neeti ke adhara par sandesh-klesh se dhan prapt karne ka vichar na karen)



          मनुष्य जीवन को धारण करने वालों के मन मस्तिष्क में  यह भ्रम रहता कि वह केवल धनर्जान करने के लिये ही पैदा हुए हैं।   संसार के अधिकतर मनुष्य  धन को ही सत्य मानते हैं।  धन कमाने के बाद  उसके व्यय का प्रदर्शन कर समाज में अपनी श्रेष्ठता साबित करने का मोह कोई नहीं छोड़ पाता। हमारे देश में धर्म तथा  समाज के नाम पर ऐसी परम्पराएं  बनायीं गयी हैं जिनका निर्वाह बिना धन के संभव नहीं हो सकता।  पुत्र  के लिये व्यवसाय तथा पुत्री के लिये वर ढूंढते हुए हमारे देश के अधिकतर लोगों का जीवन ही निकल जाता है।  हमारे देश के लोगों में धन संचय की प्रवृत्ति इतनी गहरी है कि आधुनिक समय में चालाक बुद्धिमानों के लिये उनके साथ  ठगी करना आसान हो गया है। 
         देश भर में अनेक चिटफंड कंपनियां यह काम इस तरह कर रही है कि लोग अपनी सारी जमा पूंजी उनके पास जमा कर आते हैं।  अधिक व्याज का लोभ लोगो के लिये संकट का कारण तब बनता है जब उनका मूल धन भी हाथ से निकल जाता है।  पीड़ित लोग अधिकतर अपने पृत्र के व्यवसाय या नौकरी तथा बेटी की शादी के लिये धन जमा करने की बात कहते है।  हमारे यहां विवाह तथा मृत्यु के अवसर पर जितनी नाटकबाजी होती है वह धन से ही संभव है।  यही कारण है कि भारत में लोग बच्चों के भविष्य के लिये अधिक से अधिक संचय करते हैं। इतना ही नहीं अपने बुजुर्गों की मृत्यु पर उनके दाह संस्कार के बाद भोज के प्रबंध का जिम्मा भी उन पर रहता है।  समाज में अपनी कथित छवि बचाये रखने के लिये भारत के लिये हर आम आमदी जूझता रहता है।  हमारे देश में सीध सच्चे धंधे में अधिक धनवान होने के अवसर करीब करीब बंद कर दिये गये हैं, जिसका परिणाम यह हुआ है कि अपने पास मौजूद धन की वृद्धि के लिये ऐसे ठगों के जाल में आमजन  आसान से फंस जाते हैं।
                      विदुरनीति में कहा गया है कि
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            अतिक्लेशेन येऽर्याः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेश वा।
            अरेवां प्रणपातेन मा स्म तेषु मन‘ कृथाः।।
        हिंदी  में भावार्थ-जिस धन को अर्जित करने में मन तथा शरीर को अत्यंत क्लेश हो, धर्म का उल्लंघन  करना पड़े या फिर शत्रु के सामने अपना सिर झुकाने की बाध्यता उपस्थित हो, उसे प्राप्त  करने का विचार ही त्याग देना श्रेयस्कर है।
                          
            सहस्त्राणिऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनानथा।
            धृतराष्ट्र निमुंचेच्छां न कथंचिन्न जीव्यते।
       हिन्दी में भावार्थ-जिनके पास हजार है वह जिंदा रहते हैं पर जिनके पास सौ वह भी जिंदा  रहते हैं। धन का लोभ छोड़ने वाले लोग भी हर हालत में अपना जीवन धारण किये रहते ही  हैं।
        हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार  जिस जीव में परमात्मा ने प्राणवायु प्रवाहित की है माया उसकी सेवा करने के लिये बाध्य है। कहा भी जाता है कि जिसने पेट दिया है वह दाना भी देगा।  परमात्मा की दासी माया है न कि उसकी स्वामिनी।  यह भी कहा जाता है कि जिसके भाग्य में माया का जितना भाग आना लिखा है उतना ही मिलेगा। इसके बावजूद धर्मभीरुता का दावा करने वाले हमारे भारतीय समाज के अधिकांश लोगों  को इस पर विश्वास नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता से कथित रूप से कर्मप्रेरणा मिलने का दावा करने वाले यहां अनेक लोग मिल जायेंगे पर यह कोई नहीं समझ पाया कि उसमें निष्कर्म की बात कही गयी है न कि सकाम कर्म का सिद्धांत स्थापित किया गया है।  स्थिति यह है कि लोग धन के लिये देह तथा मन को भारी संताप देने के लिये तैयार हो जाते हैं। अपने ही धन के शत्रुओं की चिकनी चुकडी बातों में आकर उसे सौंप देते हैं।  परिणाम यह है कि बाद में जब धोखा मिलता है तो सिवाय आर्तनाद करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प् नहीं रहता। 
         अतः अपने नियमित स्वाभाविक कर्म करते हुए परमात्मा का स्मरण ही करते रहना चाहिये।  संसार के विषयों का चक्र माया की कृपा से चलता ही रहता है।  उसमें एक दृष्टा की तरह शामिल होना चाहिये। समय आने पर सारे काम हो जाते हैं यह विश्वास धारण कर जीवान आनंद से बिताना चाहिये।   

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Wednesday, November 14, 2012

पतंजलि योग विज्ञान-अभाव के ज्ञान का अवलम्बन करने वाली वृत्ति निद्रा है(patanjali yog vigyan-abhav ke gyan ko dharan karane wali vritti nidra hai)

       पतंजलि योग वास्तव में ऐसा विज्ञान है जिस पर नवीन युग में अनुसंधान करना आवश्यक है।  हम यह नहीं कह सकते कि  इसका वर्तमान समय में  कोई महत्वनहीं है क्योंकि हम देख रहे हैं कि आधुनिक विज्ञान अभी भी पूर्णता का दावा नहीं कर सकता।   विषय चाहे अध्यात्मिक हो या सांसरिक उसे अपनी इस देह के साथ ही जोड़ा जा सकता है इसलिये किसी भी विषय को जीव से प्रथम नहीं किया जा सकता।   यह देह पूरे संसार से जुड़ी है और अगर हम पाश्चात्य विज्ञान की बात माने तो इस प्रथ्वी पर मौजूद हर वस्तु का अंश इस देह में होता है।  इसलिये संसार को समझने के लिये अपनी देह को समझना जरूरी है। उसमें मौजूद प्रकृतियों का अध्ययन करने पर इस संसार का रहस्य सहजता से समझा जा सकता है। निष्कर्ष निकालने के लिये कहीं अन्यत्र प्रयोग करने की आवश्कता नहीं है उन्हें हम स्वतः अनुभव कर सकते हैं।  इतना ही नहीं इसके सूत्रों को समझने पर जब व्यवहार में उसे देखते हैं तो लगता है कि वास्तव में यह ऐसा विज्ञान है जिसके बिना मनुष्य का ज्ञान अधूरा है।
       पतंजलि में चित्त के यह सूत्र मनोविज्ञान की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वृत्तयः पञ्चतथ्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः।।
             हिन्दी भावार्थ-क्लिष्ट और अक्लिष्ट वृत्तियां पांच प्रकार की होती हैं।
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः
         हिन्दी में भावार्थ-यह है प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति।
प्रत्यक्षानुमानागामः प्रमाणानि।।
        हिन्दी में भावार्थ-प्रमाण के तीन प्रकार हैं प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम
       विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतदृुप्रतिष्ठम्।।
         हिन्दी में भावार्थ-वह वस्तु वैसी नहीं है जैसी समझ रहे हैं यह भ्रम विपर्यय है।
शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः।।
           हिन्दी में भावार्थ-जो ज्ञान शब्द के साथ होने वाला है जिसका विषय वास्तव में नहीं वह विकल्प है।
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिनिंद्रा।।
           हिन्दी में भावार्थ-अभाव के ज्ञान का अवलम्बन करने वाली वृत्ति निद्रा है।
अनुभूतविषयास्पभ्प्रभोषः स्मृतिः।।
         हिन्दी में भावार्थ-अनुभव किये हुए विषय का प्रकट हो जाना स्मृति है।
         इस संसार में अनेक प्रकार के भ्रम प्रचलित है।  अनेक प्रकार के मंत्र तंत्र करने वाले समाज में भ्रम पैदा करते हैं।  देखा जाये तो यह संसार चलायमान है। अनेक विषय ऐसे हैं जिनका संबंध समय से है  जिसकी वजह से लोगों को सांसरिक कार्य स्वतः होते हैं।  कहा जाता है कि परमात्मा पहले दाना बनाता है फिर जीव में पेट लगाता है। अगर किसी आदमी के मन में यह इच्छा कि उसका धंधा लग जाये तो समय आने पर वह सफल भी होता है पर अगर उसने इस दौरान कहीं मन्नत मांगी होती है या किसी ने सिद्धि का मंत्र बताया होता है तो वह मानने लगता है कि यह सब चमत्कार है। योग साधक और अध्यात्मिक ज्ञान के छात्र इस बात को जानते हैं यही कारण है कि वह चमत्कार आदि में यकीन नहीं करते।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ ग्वालियर मध्यप्रदेश

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Friday, April 27, 2012

विदुर दर्शन-उचित अनुचित का भान न करने वाला ज्ञान व्यर्थ

              हमारे देश में कहीं भी चले जायें जहां चार लोग मिल बैठेंगे वहां अपने अध्यात्म ज्ञान का बखान जरूर करेंगे। अगर हम इन चर्चाओं को देखें तो लगेगा कि इस देश में भ्रष्टाचार, बेकारी, भुखमरी जैसी समस्याओं के साथ ही समाज को नष्ट करने वाली पुरानी रूढ़िवादिता का अस्तित्व दिखना ही नहीं चाहिए। ऐसा हो नहीं रहा है। यहां तक कि पाश्चात्य शिक्षा पद्धति का अनुसरण भी इसलिये किया गया ताकि हमारा समाज विश्व के अन्य देशों की बराबर कर सके। हो इसका उल्टा रहा है। पाश्चात्य प्रणाली पर आधारित शिक्षा में नैतिक ज्ञान का अभाव है और इस कारण अधिक शिक्षित आदमी एक तरह से न तो घर का रह जाता है न घाट का! इसके विपरीत अशिक्षित तथा अल्प शिक्षित कम से कम अपने अध्यात्म दर्शन से तो जुड़े रहने का पाखंड तो कर ही लेते हैं। जहां तक ज्ञान और उसके अनुसरण का प्रश्न है तो समाज की स्थिति देखकर नहीं लगता कि हमारा नैतिक स्तर कोई ऊंचा है। भ्रष्टाचार के विषय में हमारा देश अग्रणी देशों में गिना जाता है।
                       विदुर नीति में कहा गया है कि
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                     असभ्यगपयुक्तं हि ज्ञानं सुकुशलैरपि।
                    उपलभ्यं चाविदितं विदितं चाननुष्ठिम्।।
             ‘‘विद्वान चाहे कितना भी प्रतिष्ठित क्यों न हो यदि उससे कर्तव्य का ज्ञान नहीं हुआ अथवा उस ज्ञान से उचित अनुष्ठान नहीं हुआ तो वह व्यर्थ ही है।
              नष्टं समुद्रे पतितं नष्टं वाक्यमश्रृ्ण्वति।
              अनामास्मनि श्रृतं नष्ट नष्ट हुतमनाग्निकम्।।
           ‘‘समुद्र में गिरी हुई कोई भी वस्तु नष्ट हो जाती है उसी तरह जो सुनता नहीं है उससे कही हुई बात भी नष्ट हो जाती है। अजितेंद्रिय पुरुष का शास्त्र ज्ञान और राख में किया हुआ हवन भी नष्ट हो जाता है।
           अगर एक राष्ट्र के रूप में चिंत्तन करें तो भले ही विश्व में हमारे देश को अध्यात्मिक गुरु माना जाता है पर जिस ज्ञान के आधार पर यह छवि बनी है उसके अनुरूप हमारे अनुष्ठान नहीं है। देश में जगह जगह धार्मिक कार्यक्रम और प्रवचन होते हैं। वहां आने वाले असंख्य लोगों को देखें तो पूरा देश ही धर्ममय लगता है पर जब अखबार या टीवी चैनल देखते हैं तो लगता है कि इतना अधर्म शायद ही विश्व में कहीं अन्यत्र होता हो। अपने अध्यात्मिक ज्ञान पर गर्व करने वाले अनेक महानुभाव मिल जायेंगे पर उसका अनुसरण करने वालों की संख्या नगण्य है। एक तरह से हम अपने महापुरुषों से प्राप्त ज्ञान को नष्ट करने में लगे हैं। सच बात तो यह है कि जब तक हमारा नैतिक और अध्यात्मिक स्तर नीचे हैं हमारे यज्ञ, हवन तथा अन्य धार्मिक कर्मकांड व्यर्थ है।
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Wednesday, March 21, 2012

रहीम के दोहे-निंदक को दया का पात्र समझना चाहिए

             आधुनिक युग में भौतिकतवाद ने अनेक ऐसे प्रायोजित नायकों को स्थापित किया है जो धर्म, कला, साहित्य, समाज तथा आर्थिक जगत के शिखर पर पहुंचकर लोगों को सिखाने लगते हैं कि जीवन कैसे जिया जाये? वह वस्तुओं का विज्ञापन करते हैं तो समाज की व्यवस्था में भी अपना दखल इस तरह देते हैं कि जैसे उन जैसा महाज्ञानी कोई न हो। यह प्रायोजित नायक अगर वस्तुओं के उत्पादों का विज्ञापन करते हैं तो समाज पर नियंत्रण करने वाले ठेकेदारों के साथ खड़े होकर उनको लोगों पर नियंत्रण करने में भी सहायक बनते हैं। आकर्षण तथा विश्वास के जाल में फंसा आम जनमानस अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में अच्छे बुरे की पहचान नहीं कर पाता। यही कारण कि आजकल के युवा गीत, संगीत तथा नृत्य के जाल में फंसा है। अभी हाल ही में एक तमिल अंग्रेजी मिश्रित कोलेवरी डी को हिन्दी भाषी क्षेत्रों में भारी लोकप्रियता हासिल हुई। शब्द किसी के समझ में नहीं आते पर संगीत पर ही लोग थिरक रहे हैं। एक प्रेमिका से निराश प्रेमी के शब्दों को समझे बिना केवल संगीत की धुन पर थिरकना इस बात का प्रमाण है कि लोग आत्मज्ञान से इतने परे हैं कि उन्हें उछलकूद की जिंदगी जीकर मन बहलाना पड़ रहा है।
कविवर रहीम के अनुसार
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अनुचित वचन न मानिए, जदपि गुराइस गाढ़ि।
है ‘रहीम’ रघुनाथ तें, सुजस भरत को बाढ़ि।।
              ‘‘कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हों उसकी गलत बात नहीं मानिए भले ही वह कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हो। भगवान श्री राम ने अपने पिता की बात मानते हुए वनगमन किया पर फिर भी उनसे अधिक यश उस भरत को प्राप्त हुआ जिन्होंने मां की आज्ञा ठुकराकर राज्य त्याग दिया।’’
‘‘अब ‘रहीम’ मुश्किल बढ़ी, गाढ़े दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलें न राम।।
‘‘दुनियां में दो महत्वपूर्ण काम एकसाथ करना अत्यंत कठिन है। सच का साथ लो तो जग नहीं मिलता और झूठ बोलो तो परमात्मा से साक्षात्कार नहीं हो पाता।
         आत्म ज्ञान के अभाव झूठ का इतना बोलबाला हो गया है कि लोग यह सोचकर चलते हैं कि भगवान उनके दुष्कर्मों को नहीं देख रहा है। धर्म और अध्यात्म का प्रचार करने वाले लोग पर्दे के पीछे विलासिता का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। स्वयं कभी परमात्मा का स्वरूप जो लोग समझ नहीं पाये वह दूसरों को समझा रहे हैं। जीवन की सच्चाई यह है कि अगर सत्य की राह चलो तो लोग साथ नहीं होते। जब लोग साथ होते हैं तो वह असत्य की राह पर चलने को विवश करते हैं ऐसे में शुद्ध भाव से भक्ति अत्यंत कठिन है। शुद्ध भाव से भक्ति न होने पर मन को शांति नहीं मिलती। यही कारण है कि आज आधुनिक साधनों से सुसज्तित आदमी के मन में भी शांति नहीं है।
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Tuesday, March 13, 2012

चाणक्य नीति-कायरों की सेवा से बहादुरों की संगत भली (chnkya niti in hindi-kayron se bahaduron se sangat bhali)

                     पूरे  विश्व की समस्त धार्मिक विचारधारों में स्वर्ग और नर्क की कल्पना को लेकर अनेक धारणाएँ  प्रचलित हैं।  ऐसा नहीं है कि स्वर्ग या नरक की स्थिति केवल मरने के बाद ही दिखाई देती है। अपने पास अगर ज्ञान हो तो इसी पृथ्वी पर स्वर्ग भोग जाता है। आजकल भौतिकवाद के चलते मनुष्यों की अनुभूतियों की शक्तियां कम हो गयी हैं। वह तुच्छ उपलब्धियों पर इतराते हैं तो थोड़ी परेशानियों में भारी तनाव उन पर छा जाता है। आजकल कहा भी जाता है कि इस संसार में कोई सुखी नहीं है। दरअसल लोग सुख का अर्थ नहीं जानते। सुख के साधनों के नाम अपने घर में ही कबाड़ जमा कर रहे हैं। संबंधों के नाम पर स्वार्थ की पूर्ति चाहते हैं। स्वार्थों के लिये संबंध बनाते और बिगाड़ते हैं। क्रोध को शक्ति, कटु वाणी को दृढ़ता और दुःख के नाम पर दूसरे के वैभव से ईर्ष्या पालकर मनुष्य स्वयं ही अपने दैहिक जीवन को नरक बना देता है। किसी को यह बात समझाना कठिन है कि वह अपने जीवन की स्थितियों के लिये स्वयं जिम्मेदार हैं। लोग भाग्यवादी इतने हैं कि अपने ही कर्म को भी उससे प्रेरित मानते है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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                                   अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्।
                                  नीचप्रसंङ्गा कुलहीनसेवा चिह्ननि देहे नरकास्थितानाम्।।
               ‘‘अत्यंत क्रोध करना अति कटु कठोर तथा कर्कश वाणीक होना, निर्धनता, अपने ही बंधु बांधवों से बैर करना, नीचों की संगति तथा कुलहीन की सेवा करना यह सभी स्थितियां प्रथ्वी पर ही नरक भोगने का प्रमाण है।’’  
                        गम्यते यदि मृगेन्द्र-मंदिर लभ्यते करिकपोलमौक्तिम्।
                      जम्बुकाऽऽलयगते च प्राप्यते वत्स-पुच्छ-चर्म-खुडनम्।।
             ‘‘कोई मनुष्य यदि सिंह की गुफा में पहुंच जाये तो यह संभव है कि वहां हाथी के मस्तक का मोती मिल जाये पर अगर वह गीदड़ की गुफा में जायेगा तो वहां उसे बछड़े की पूंछ तथा गधे के चमड़ का टुकड़ा ही मिलता है।’’
                     हमें अपने जीवन को अगर आनंद से बिताना है तो अपने आचरण, विचार तथा व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। कायर, कलुषित व बीमार मानसिकता वाले, व्यसनी तथा लालची लोगों से संबंध रखने से कभी हित नहीं होता है। ऐसे स्थानों पर जाना जहां तनाव के अलावा कुछ नही मिलता हो वर्जित करना ही श्रेयस्कर हैै। जिनका छवि खराब है उनसे मिलना अपने लिये ही संकट बुलाना है। इस संसार में ऐसे पाखंडी लोगों की कमी नहीं है जो अपना काम निकालने के लिये दयनीय चेहरा बना लेते हैं पर समय आने पर सांप की तरह फुंफकारने लगते हैं। इसलिये उत्साही, संघर्षशील तथा अध्यात्मिक रुचि वालों की संगत करना ही जीवन के लिये लाभप्रद है। अच्छे लोगों से संगत करने पर अपने विचार भी शुद्ध होते हैं तो मन के संकल्प भी दृढ़ होते हैंे जो आनंदमय जीवन की पहली और आखिरी शर्त है।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Thursday, January 26, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-निष्काम भाव होने पर निर्भय रहना संभव (bharathari niti shatak-nishkam bhav aur nidarta)

             हमारे अध्यात्म ज्ञान में निष्काम भाव का महत्व प्रतिपादित किया गया है। दरअसल इसमें कर्मफल के प्रति विरक्ति दिखाने के लिये प्रेरित किया गया है। जबकि हमारे प्रवचनकर्ता इसका अर्थ इस तरह प्रतिपादित करते हैं जैसे कि संसार की वस्तुओं से ही पूरी तरह विरक्त हुआ जाये। अक्सर यह कहा जाता है कि मोह, लोभ, काम क्रोध तथा कामनायें ही मनुष्य की शत्रु होती हैं। आज तक लोगों को कोई यह समझा नहीं पाया कि कर्मफल है क्या? यही कारण है कि सामान्य जन कहते हैं कि फल की इच्छा के बिना कर्म करना संभव नहीं है। इसका मतलब यह है कि लोग सांसरिक क्रियाओं के कर्म का फल भौतिक पदार्थ की उपलब्धि ही समझते हैं। नौकरी, व्यवसाय या अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों से मिलने वाले धन को आज भी फल समझना इस बात का प्रमाण है कि कथित भारतीय अध्यात्मिक गुरु समाज को निष्काम कर्म का यह अर्थ नहंीं समझा पाये जिसका आशय भक्ति, दया और दान और दान से है।
                मनुष्य अपनी दैहिक बाध्यताओं की वजह से प्रतिदिन कर्म करता है। नौकरी, व्यवसाय या मजदूरी से जिन लोगों को पैसा मिलता है वह उससे अपने घर परिवार का संचालन करते हैं। बच्चों की फीस, परिवार के लिये भोजन तथा अपनी जेब का खर्च करता हुआ कोई भी आदमी यह नहीं समझ पाता कि उसके पास आया धन फल नहीं है। इसका आशय यह है कि पैसा अपने हाथ में आना हमारे जीवन के ही कर्म का विस्तार है। वह पैसा हमारी जेब में नहीं रहता। अधिक है तो अल्मारी या बैंक में जमा रहता है। उस पैसे से खरीदा गया भोजन और वस्त्र भी फल नहीं है क्योंकि हम उसे अपनी देह का संचालन करते हैं। ऐसे सांसरिक कर्म हमेशा धन की चाह से किये जाते हैं और ऐसा जो न करे वह मूर्ख ही कहलायेगा। दरअसल उस धन का उपयोग जब किसी पर दया करने या दान देने के लिये किया जाता है तब उसे निष्काम कर्म कहा जा सकता है। जहां धन की वापसी की चाहत न हो वही निष्काम कर्म है। इस चाहत से विरक्ति ही त्याग है।
महाराज भर्तृहरि के नीति शतक में कहा गया है कि
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भोगे रोगभयं कुल च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं
मानं दैन्यभयं वाले रिपुभयं रूपे जरायाः भयमः।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं कावे कृतान्ताद् भयं
सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्।।
‘‘इस दैहिक जीवन में भोगों से रोग, उच्च परिवार में जन्म लेने पर निम्न आचरण में फंसने, अधिक धन होने पर राज्य, अधिक मौन रहने पर दीनता, शक्तिवान होने पर शत्रु, सौंदर्य से बुढ़ापे, ज्ञानी होने पर वाद विवाद में पराजय, विनम्रता से दुष्टों से आक्रमण और देह रहने पर मृत्यु का भय रहता है। एक मात्र विरक्त का भव ही भय से निरापद बना सकता है।
             जहां दैहिक और भौतिक जीवन को ही स्वीकार किया जाता है वहां भय की संभावना अधिक रहती है। यहां हर वस्तु पतनशील और नष्टप्रायः है। अगर हम अपने अध्यात्म दर्शन को समझें तो यह ज्ञान प्राप्त होगा कि सांसरिक उपलब्धियों का फल समझना ही भय का कारण है। यह ज्ञान होने पर आदमी भय से रहित हो जाता है।
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Sunday, January 08, 2012

मनुस्मृति-जाति के आधार पर किसी पर व्यंग्य करना अनुचित (manu smriti-jati ka adhar par vyangya karna anuchit)

            यह कहना कठिन है कि पूरी दुनियां में ही अहंकार के भाव का बोलबाला है या भारतीय समाज में ही यह विकट रूप में दिखाई देता है। अलबत्ता इतना अवश्य है कि भारतीय समाज में अपने अहंकार में आकर दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति कुछ अधिक ही दिखाई देती है। हम जैसे चिंत्तक तो मानते हैं कि भारत का अध्यात्मिक दर्शन इसलिये ही अधिक समृद्ध हुआ है क्योंकि ऋषियों और मुनियों को अपने आसपास अज्ञान में लिपटा एक बृहद समाज मिला जिसे सुधारने के लिये उन्होंने तत्वज्ञान स्थापित किया। इसके लिये उनको एक सहज जमीन मिल गयी जहां वह अनुसंधान, चिंत्तन, मनन और अध्ययन से अध्यात्मिक ज्ञान का सृजन करने के साथ ही उसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी कर सके। अगर सभी ज्ञानी होते तो आखिर वह किस पर अनुसंधान कर रहस्यों का पता लगाते। उनकी बात कौन सुनता? एक ज्ञानी के रूप में कौन उनको प्रतिष्ठत करता? एक टांग वाले को लंगड़ा, एक आंख वाले को काना, अक्षरज्ञान से रहित को गंवार और और काले रंग वाले को कुरूप कहकर उनका मजाक उड़ाना तो आम बात है। इसके अलावा हर आदमी अपनी जाति को श्रेष्ठ बताकर दूसरी जाति का मजाक उड़ाता है। कभी कभी तो अपने प्रथक जाति वाले को नीच बताकर उसका अपमान किया जाता है। सच बात तो यह है कि कोई जाति नीच नहीं होती अलबत्ता जिनके पास धन, पद और बाहुबल है वह दूसरे की जाति को नीच बताते हैं। यह एक दम अधर्म और अज्ञान का प्रमाण है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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हीनांगनतिरिक्तांगहीनाव्योऽधिकान्।
रूपद्रव्यविहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत्।।
           ‘‘ऐसे व्यक्तियों का मजाक  उड़ाना या अपमानित करना निंदनीय है जो किसी अंग से हीन, अधिक अंग वाले, शिक्षा से रहित, आयु में बड़े, कुरूप, निर्धन तथा छोटी जाति या वर्ण के हों।’’
         वैसे मनुमहाराज पर भारतीय समाज में जाति पांति स्थापित करने का आरोप लगता है। ऐसा लगता है कि आधुनिक शिक्षा से ओतप्रोत समाज नहीं चाहता कि भारत की प्राचीन शिक्षा का यहां प्रचार प्रसार हो। यही कारण एक तो वह लोग हैं जो मनुस्मृति के चंद उदाहरण देकर देश में उसे जातिपाति का प्रवर्तक मानते हैं बिना पढ़े ही उनका प्रतिकार यह कहते हुए करते हैं कि भारतीय समाज कभी उनके संदेशों के मार्ग पर नहीं चला। यह हैरानी की बात है कि इन्हीं मनुमहाराज ने अंगहीन, अशिक्षित, बूढ़े, असुंदर तथा जाति के आधार पर किसी के मजाक उड़ाने या अपमानित करने को वर्जित बताया है। लार्ड मैकाले की शिक्षा में रचेबसे आधुनिक बुद्धिजीवी चाहे वह जिस विचारधारा के हों मनुस्मृति का पूर्ण अध्ययन किये बिना ही अपना बौद्धिक ज्ञान बघारते हैं।
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Tuesday, January 03, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-विरक्ति का भाव मनुष्य को निडर बनाता है (bharathari niti shatak-viraki ka bhav nidar banata hai)

             श्रीमद्भागवत गीता में निष्काम भाव का जो संदेश है उसका अधिकतर लोग गलत अर्थ निकालते हैं। कुछ लोग उसे काम का त्याग करना मानकर सन्यास से जोड़ते हैं तो कुछ कहते हैं कि बिना कामना के काम किया ही नहीं जा सकता। यह अज्ञान का प्रमाण है।  कर्म करना मनुष्य का धर्म है पर उसके फल के प्रति विरक्ति भाव अपनाना ही निष्काम भाव है।हमारे अध्यात्म ज्ञान में निष्काम भाव का महत्व प्रतिपादित किया गया है। दरअसल इसमें कर्मफल के प्रति विरक्ति दिखाने के लिये प्रेरित किया गया है। जबकि हमारे प्रवचनकर्ता इसका अर्थ इस तरह प्रतिपादित करते हैं जैसे कि संसार की वस्तुओं से ही पूरी तरह विरक्त हुआ जाये। अक्सर यह कहा जाता है कि मोह, लोभ, काम क्रोध तथा कामनायें ही मनुष्य की शत्रु होती हैं। आज तक लोगों को कोई यह समझा नहीं पाया कि कर्मफल है क्या? यही कारण है कि सामान्य जन कहते हैं कि फल की इच्छा के बिना कर्म करना संभव नहीं है। इसका मतलब यह है कि लोग सांसरिक क्रियाओं के कर्म का फल भौतिक पदार्थ की उपलब्धि ही समझते हैं। नौकरी, व्यवसाय या अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों से मिलने वाले धन को आज भी फल समझना इस बात का प्रमाण है कि कथित भारतीय अध्यात्मिक गुरु समाज को निष्काम कर्म का यह अर्थ नहंीं समझा पाये जिसका आशय भक्ति, दया और दान और दान से है।
                मनुष्य अपनी दैहिक बाध्यताओं की वजह से प्रतिदिन कर्म करता है। नौकरी, व्यवसाय या मजदूरी से जिन लोगों को पैसा मिलता है वह उससे अपने घर परिवार का संचालन करते हैं। बच्चों की फीस, परिवार के लिये भोजन तथा अपनी जेब का खर्च करता हुआ कोई भी आदमी यह नहीं समझ पाता कि उसके पास आया धन फल नहीं है। इसका आशय यह है कि पैसा अपने हाथ में आना हमारे जीवन के ही कर्म का विस्तार है। वह पैसा हमारी जेब में नहीं रहता। अधिक है तो अल्मारी या बैंक में जमा रहता है। उस पैसे से खरीदा गया भोजन और वस्त्र भी फल नहीं है क्योंकि हम उसे अपनी देह का संचालन करते हैं। ऐसे सांसरिक कर्म हमेशा धन की चाह से किये जाते हैं और ऐसा जो न करे वह मूर्ख ही कहलायेगा। दरअसल उस धन का उपयोग जब किसी पर दया करने या दान देने के लिये किया जाता है तब उसे निष्काम कर्म कहा जा सकता है। जहां धन की वापसी की चाहत न हो वही निष्काम कर्म है। इस चाहत से विरक्ति ही त्याग है।
महाराज भर्तृहरि के नीति शतक में कहा गया है कि
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भोगे रोगभयं कुल च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं
मानं दैन्यभयं वाले रिपुभयं रूपे जरायाः भयमः।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं कावे कृतान्ताद् भयं
सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्।।
                            ‘‘इस दैहिक जीवन में भोगों से रोग, उच्च परिवार में जन्म लेने पर निम्न आचरण में फंसने, अधिक धन होने पर राज्य, अधिक मौन रहने पर दीनता, शक्तिवान होने पर शत्रु, सौंदर्य से बुढ़ापे, ज्ञानी होने पर वाद विवाद में पराजय, विनम्रता से दुष्टों से आक्रमण और देह रहने पर मृत्यु का भय रहता है। एक मात्र विरक्त का भव ही भय से निरापद बना सकता है।
             जहां दैहिक और भौतिक जीवन को ही स्वीकार किया जाता है वहां भय की संभावना अधिक रहती है। यहां हर वस्तु पतनशील और नष्टप्रायः है। अगर हम अपने अध्यात्म दर्शन को समझें तो यह ज्ञान प्राप्त होगा कि सांसरिक उपलब्धियों का फल समझना ही भय का कारण है। यह ज्ञान होने पर आदमी भय से रहित हो जाता है।
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Sunday, December 25, 2011

तुलसी के दोहे-मीठे बोल सुनकर बहकना नहीं चाहिए (tusli ke dohe-meethe bol suykar bahakna nahin chahiye)

           आजकल बाज़ार का प्रभाव धर्म तथा समाज के विषयों में बहुत अधिक हो गया है। उपभोग संस्कृति ने लोगों के अंदर अध्यात्म ज्ञान के प्रति विरक्ति पैदा की है जिसके कारण उनके पास सामान्य व्यवहारिक ज्ञान भी नहीं रहा है। लोगों के अंदर पैसा पाने का मोह इतना अधिक हो गया है कि दूसरों की बातों में आकर अपना कमाया भी सब कुछ गंवा बैठते हैं। हमने ऐसे अनेक समाचार सुने और देखे होंगे कि लोगों को अतिशीघ्र अपने धन का दोगुना या चार गुना देकर उनसे भारी रकम की ठगी की गयी। अनेक कंपनियों ने तो शहर में एक नहंी बल्कि चार पांच सौ लोगों को चूना सामूहिक रूप से चूना लगा लिया। यह समाज में अपराध बढ़ने की प्रवृत्ति का परिचायक है पर साथ ही आम जनमानस में बौद्धिक सोच के अभाव का प्रमाण भी है। इस तरह की घटनायें चिंताजनक हैं। दो चार व्यक्ति हों तो ठीक पर यहां तो हजारों के हजारों एक साथ ठगे जाते हैं।
          ठगी करने वाले लोग अपनी मीठी बातों के साथ ही आकर्षण प्रलोभन भी देते हैं। कहीं तो आरंभ में ही उपहार भी दे दिया जाता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर इतने सारे लोग कैसे जाल में फंस जाते हैं। इसमें फंसने वाले लोग ग्रामीण या अशिक्षित पृष्ठभूमि वाले नहीं वरन् पढ़े लिखे और नौकरीशुदा लोग ही होते हैं। इस तरह आधुनिक शिक्षा को लेकर भी संशय पैदा होता है।
महाकवि तुलसी दास जी कहते हैं कि
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‘तुलसी’ खल बानी मधुर, मुनि समुझिअं हियं हेरि।
राम राज बाधक भई, मूढ़ मंथरा चेरि।।
‘‘कभी किसी की मधुर वाणी सुनकर उस पर मोहित नहीं होना चाहिए। दासी मंथरा ने कैकयी को मधुर वाणी में समझाकार भगवान श्री राम के राज्याभिषेक में बाधा डाली थी।’’
         कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हमारे देश के ग्रामीण तथा अशिक्षित लोग कथित आधुनिक समाज से अधिक चतुर हैं। वह भी ठगे अवश्य जाते हैं पर सामूहिक रूप से उनको कोई चूना नहीं लगा सकता। ऐसे में यह सवाल उठता है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे रहकर आधुनिक समाज कहीं बौद्धिक क्षमता खो तो नहीं बैठा है?
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Tuesday, December 13, 2011

मनुस्मृति-जिस खेल में धन की हार या जीत हो वह जुआ कहलाता है (fixing is gamling in paly-manu smriti in hindi)

            हमारे देश में क्रिकेट खेल को लेकर अनेक प्रकार की चर्चायें होती हैं। सच तो यह है कि इसे खेलने वाले बहुत कम हैं उससे ज्यादा अधिक तो इसे देखने वाले हैं। यह शुद्ध रूप से मनोरंजन का खेल है और इसके साथ ऐसे लोग भी जुड़ गये हैं जो इस पर सट्टा लगाते हैं।  आजकल खेलों में अनेक प्रकार की फिक्सिंग की चर्चा होती है। अभी हाल में पाकिस्तान के तीन क्रिकेट खिलाड़ियों को स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में सजा भी हुई थी। ऐसा नहीं भारत कोई इस समस्या से बचा हुआ है। भारत के भी दो खिलाड़ियों पर इस अपराध में आजीवन खेलने पर प्रतिबंध लगाया गया था। विश्व में भारत की आर्थिक शक्ति पर ही क्रिकेट खेल चल रहा है। जिन पाकिस्तानियों को ब्रिटेन में क्रिकेट खेल फिक्स करने के आरोप में सजा हुई हैए बताया जा रहा है कि भारत के सट्टेबाज भी उनसे संबंधित हैं। इधर हम देख रहे हैं कि भारत में भी अनेक सट्टेबाज पकड़े जा रहे हैं। कहने को क्रिकेट एक खेल है पर जैसे जैसे इससे जुड़े काले कारनामों का पर्दाफाश हो रहा है उससे तो जुंआ ही अधिक दिखने लगा है। अनेक परिवार इसके चक्कर में बरबाद हो गये हैं। हैरानी तो इस बात की है कि इस खेल में पैसा लगाने वाले वह लोग भी हैं जो इसको कभी खेले ही नहीं है। भले ही वह इसे मनोरंजन मानते हों पर अंततः यह जुआ है।
इस विषय पर मनु स्मृति में कहा गया है कि
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अप्राणिभिर्यत्क्रियते तल्लोके द्यूतमच्यते।
प्राणिभिः क्रियतेयस्तु सः विज्ञेयः समाह्वयः।।
             ‘‘जिस खेल में धन आदि निर्जीव वस्तुओं से हार या जीत का निर्णय हो वह खेल जुआ कहलाता है। पशु-पक्षी या अन्य सजीव प्राणियों को दांव पर रखकर खेले जाने वाले खेल का नाम समाह्व्य है।’’
एते राष्ट्रे वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्नत्सकराः।
विकर्म क्रियर्यानित्य बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः।।
          ‘‘जो लोग  जुआ या समाह्वय जैसे कर्म करवाते हैं वह राष्ट्र के लिये डाकू की तरह होते हैं और सदैव अपने कुकर्मों से प्रजा को कष्ट देते हैं।’’
         देश में एक बहुत बड़ा सट्टा समूह सक्रिय हैं। ऐसा कोई मैच नहीं होता जिसके होने पर कहीं न कहीं सट्टेबाज न पकड़े जाते हों। हैरानी इस बात की है कि यह केवल भारतीय टीम के खेलने पर ही नही होता बल्कि प्रसिद्धि विदेशी टीमों के मैच पर भी हमारे देश में सट्टा लगता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आज के अनेक युवा अधिक धन पर उसे पचा नहीं हो पाते और स्वयं जुआ खेलकर अपने खिलाड़ी होने का गर्व पालते हैं। उनको यह पता नहीं कि इन सट्टेबाजों का धन अंततः अपराध जगत के अन्य लोगों के पास पहुंचता है। सट्टेबाजी से जुड़े विदेश में बैठे अनेक भारतीयों के माध्यम से यह धन आतंकवादियों और अतिवादियों के पास पहुंचने के समाचार भी आते हैं। देश के युवाओं को यह बात समझना चाहिए कि वह सट्टा खेलकर ऐसे लोगों को साथ दे रहे हैं जो अंततः राष्ट्र के लिये डाकू की तरह होते हैं। वह ऐसे तत्वों को प्रोत्साहन देते हैं जो आमजनों को परेशान करते हैं।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Sunday, December 04, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अक्षम आदमी से संबंध बनाना व्यर्थ

          आम मनुष्य की यह सामान्य आदत होती है कि वह अपनी भौतिक उपलब्धियों तथा गुणों का बखान करता है। ऐसा करते हुए हर मनुष्य भूल जाता है कि इससे वह अपने शत्रु ही अधिक बनाता है। इस तरह की आत्मप्रवंचना से जो हीन पुरुष होते हैं वह बलशाली मनुष्य से जलते हैं। महान नीति विशारद चाणक्य का भी कहना है कि अपना स्वास्थ्य दूसरों से छिपाकर रखें। इसके अलावा श्रीमद्भागवत में श्री कृष्ण भी कहते हैं कि उनके ज्ञान का केवल भक्तों में ही प्रसारण करना चाहिए। इसके पीछे संभवत कारण यह है कि समाज में अपने व्यसनों, विचारों और द्वेष की भावना से ओतप्रोत लोगों की संख्या सदैव अधिक रहती है। इसलिये उनको विकार घेरे रहते हैं जो कि अंततः उनके लिये अस्वास्थ्यकर होते हैं। इतना ही धन, स्वास्थ्य तथा ज्ञान से हीन मनुष्यों की कुंठा इतनी तीव्रतर होती है कि वह उनका नकारात्मक सोच हो जाता है और किसी की खुशी देखकर उनके मन में द्वेष पैदा होता है। ऐसे में अस्वस्थ, चरित्रहीन तथा धन के लालची निर्धन लोगों से संपर्क बनाना अपने लिये ही अहितकारी भी हो सकता है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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न सन्धिच्छिद्धीनैश्च तत्र हेतुरसंशयः।
तस्य विश्रम्भामलभ्य प्रहरेत्तं गतस्मृहः।
             ‘‘हीन पुरुष के साथ कभी संधि न करें। इसमें संदेह नहीं है कि उसके साथ विश्वासपूर्वक बातचीत करने पर इस बात की संभावना प्रबल रहती है कि वह समय मिलने पर अवश्य हानि करेगा।’’
           इसका यह आशय कदापि नही है कि निर्धन लोगों से धनियों को दूर रहना चाहिए। इतना अवश्य है कि धनिकों को चाहिए कि वह निर्धन लोगों के सामने अपने वैभव का प्रदर्शन करने की बजाय उनकी सहायता करें तो अच्छा है क्योंकि इसे समाज में सामंजस्य बना रहता है। हमारा मानना है कि धन का निर्धन, स्वास्थ्य का बीमार आदमी तथा अपने ज्ञान को मूर्ख के सामने प्रदर्शन करने से बचना चाहिए। ऐसा करने से हीन मनुष्य मन ही मन द्वेष करने लगता है जो कि अंततः समर्थशील मनुष्य के लिये कष्टकारी होता है।
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Friday, December 02, 2011

सामवेद से संदेश-महान लोग सत्य के साथ काम करते हैं (samves se sandesh-mahan log aur satya)

            अंग्रेज विद्वान जार्ज बर्नाड शॉ के अनुसार बिना बेईमानी के कोई भी धनी नहीं हो सकता। हमारे देश में अंग्रेजी राज व्यवस्था, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा संस्कारों ने जड़ तक अपनी स्थापना कर ली है जिसमे छद्म रूप की प्रधानता है। इसलिये अब यहां भी कहा जाने लगा है कि सत्य, ईमानदारी, तथा कर्तव्यनिष्ठा से कोई काम नहीं बन सकता। दरअसल हमारे यहां समाज कल्याण अब राज्य की विषय वस्तु बन गया है इसलिये धनिक लोगों ने इससे मुंह मोड़ लिया है। लोकतंत्र में राजपुरुष के लिये यह अनिवार्य है कि वह लोगों में अपनी छवि बनाये रखें इसलिये वह समाज में अपने आपको एक सेवक के रूप में प्रस्तुत कर कल्याण के ने नारे लगाते हैं। वह राज्य से प्रजा को सुख दिलाने का सपना दिखाते हैं। योजनायें बनती हैं, पैसा व्यय होता है पर नतीजा फिर भी वही ढाक के तीन पात रहता है। इसके अलावा गरीब, बेसहारा, बुजुर्ग, तथा बीमारों के लिये भारी व्यय होता है जिसके लिये बजट में राशि जुटाने के लिये तमाम तरह के कर लगाये गये हैं। इन करों से बचने के लिये धनिक राज्य व्यवस्था में अपने ही लोग स्थापित कर अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ात जाते हैं । उनका पूरा समय धन संग्रह और उसकी रक्षा करना हो गया है इसलिये धर्म और दान उनके लिये महत्वहीन हो गया है।
सामवेद में कहा गया है कि
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ऋतावृधो ऋतस्पृशौ बहृन्तं क्रतुं ऋतेन आशाये।
                ‘‘सत्य प्रसारक तथा सत्य को स्पर्श करने वाला कोई भी महान कार्य सत्य से ही करते हैं। सत्य सुकर्म करने वाला शस्त्र है।’’
‘‘वार्च वर्थय।
             ‘‘सत्य वचनों का विस्तार करना चाहिए।’’
वाचस्पतिर्मरवस्यत विश्वस्येशान ओजसः।
           ‘‘विद्वान तेज हो तो पूज्य होता है।’’
              कहने का अभिप्राय है कि हमारे देश में सत्य की बजाय भ्रम और नारों के सहारे ही आर्थिक, राजकीय तथा सामाजिक व्यवस्था चल रही है। राज्य ही समाज का भला करेगा यह असत्य है। एक मनुष्य का भला दूसरे मनुष्य के प्रत्यक्ष प्रयास से ही होना संभव है पर लोकतांत्रिक प्रणाली में राज्य शब्द निराकार शब्द बन गया है। करते लोग हैं पर कहा जाता है कि राज्य कर रहा है। अच्छा करे तो लोग श्रेय लेेते हैं और बुरा हो तो राज्य के खाते में डाल देते हैं। इस एक तरह से छद्म रूप से ही हम अपने कल्याण की अपेक्षा करते हैं जो कि अप्रकट है। भारतीय अध्यात्म ज्ञान से समाज के परे होने के साथ ही विद्वानों का राजकीयकरण हो गया है। ऐसे में असत्य और कल्पित रचनाकारों को राजकीय सम्मान मिलता है और समाज की स्थिति यह है कि सत्य बोलने विद्वानों से पहले लोकप्रियता का प्रमाणपत्र मांगा जाता है। हम इस समय समाज की दुर्दशा देख रहे हैं वह असत्य मार्ग पर चलने के कारण ही है।
              सत्य एक ऐसा शस्त्र है जिससे सुकर्म किये जा सकते हैं। जिन लोगों को असत्य मार्ग सहज लगता है उन्हें यह समझाना मुश्किल है पर तत्व ज्ञानी जाते हैं कि क्षणिक सम्मान से कुछ नहीं होता इसलिये वह सत्य के प्रचार में लगे रहते है और कालांतर में इतिहास उनको अपने पृष्ठों में उनका नाम समेट लेता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Sunday, November 20, 2011

हिन्दू धर्म संदेश-राजकोष में हेराफेरी करने वालों को कठोर दंड देना जरूरी (hard punishment must for reveneu fraud)

           प्राचीन समय में भारतवर्ष में राजकोष से हेराफेरी करना एक तरह से राजद्रोह जैसा अपराध माना जाता था।  एक तरह से कहा जाये तो इस संसार में परमात्मा के बाद राजा को इसलिये ही दूसरा स्थान दिया गया था कि वह समाज में सभ्यता, शिक्षा तथा शांति का वातावरण बनाये रखेगा।  इसलिये ही उसे राजस्व वसूल का अधिकार दिया गया।  स्वाभाविक रूप से इसके लिये कर्मचारियों को नियुक्ति करनी होती है।  कर्मचारी भले ही राजा के लिये राजस्व संग्रह करते हैं पर अंततः उसे प्रजा की संपत्ति माना जाता है इसलिये उसमें हेराफेरी के अपराध के लिये कड़े दंड की व्यवस्था की गयी।  आधुनिक मानव सभ्यता में विभिन्न देशों में कथित मानवीय आधार पर अपराधियों को मुलायम सजायें देने की व्यवस्था का निर्माण हुआ है। अब तो यह स्थिति है कि अगर किसी को किसी की हत्या पर मृत्यु दंड दिया जाये तो मानव अधिकार संगठन विलाप करने लग जाते हैं। अनेक लोग तो पाश्चात्य कानून से सीख लेकर भारत में मौत की सजा समाप्त करने की मांग करने लगे हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार तो केवल हत्या करना ही जघन्य अपराध नहीं है वरन् स्त्री के साथ जबरदस्ती करना, राजकोष की चोरी करना तथा सार्वजनिक संपत्ति को हानि पहुंचाना भी जघन्य अपराध है जिनकी सजा मौत ही होना चाहिए। अक्सर कुछ लोग कहते हैं कि मृत्युदंड से अपराध होना बंद नहीं होता। यह सत्य है पर इससे अपराध दर अवश्य कम रहती है। जब तक देश में हत्या पर मौत की सजा का भय था तब ऐसा अपराध बहुत कम ही देखने को मिलता था। अब तो गाहे बगाहे हत्या होने की बात सामने आती है। दरअसल अब अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के मन में यह विश्वास घर कर गया है कि वह किसी को मारकर भी बच सकते हैं। सजा हो जाये तो भी जिंदगी बरकरार रह सकती है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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राज्ञः कोषोपहर्तृश्च प्रतिकूलेष च स्थितान्।
घातयेद्विविधैर्दण्डैररीणां चोयजापकान्।।
         ‘‘जो लोग राजकोष का हरण करने के साथ ही राजा की आज्ञा की अवहेलना करते हैं। शत्रु से मिल जाते हैं उनको मृत्युदंड देना ही श्रेयस्कर है।
अग्निदान्भक्तदांश्चैव तथा शस्ववकाशदान्।
सन्निधातृंश्चैव मोषस्य हन्याच्यौरमिवेश्वरः।।
     ‘‘अपराध पर नियंत्रण करने के लिये यह आवश्यक है जो लोग अपराधियों को अग्नि, भोजन, शस्त्र, वस्त्र व आश्रय देते हैं, उन्हें भी अपराधी मानकर मृत्युदंड देना चाहिए।
          आजकल पूरे विश्व में भ्रष्टाचार बढ़ने की बात कही जाती है। दरअसल राज्य के कोष का हरण करना या प्रंजा से उचित काम के पैसे वसूल करना एक सभ्य अपराध मान लेना ही इस भ्रष्टाचार का मूल कारण है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार तो राज्य के कोष से घात करने वाले को मौत की सजा देना चाहिए पर पाश्चात्य आधारों पर बने हमारे कानूनों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इतना ही अपराधों को प्रश्रय देने वाले सफेदपोश तो अपने घरों में सुरक्षित बैठे रहते हैं। इनमे तो कई इतने शक्तिशाली होते हैं कि कोई उनका किसी अपराधी से नाम जोड़ने का साहस तक नहीं कर पाता। यह सब देखते हुए तो लगता है बिना कड़े दंड प्रावधानों के अपराध पर नियंत्रण पाना संभव नहीं है भले ही कोई कितना भी दावा करे।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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