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Monday, August 15, 2011

संत कबीरदास-कर्मकांडों में ही धर्म नहीं होता (karmkand aur dharma-sant kabirdas)

          मूलतः भारतीय समाज प्रगतिवादी माना जाता है। हालांकि कुछ विदेशी भारतवासियों की धर्मभीरुता का मजाक उड़ाते हैं पर जिस तरह हमारा समाज समय के अनुसार नई शिक्षा, विज्ञान तथा साधनों के उपयोग की तरफ प्रवृत्त होता है उससे यह प्रमाणित होता है कि रूढ़ता का भाव उसमें नहीं है पर इसके बावजूद फिर भी धर्म के नाम पर अनेक कर्मकांड हैं जिसे लोग केवल सामाजिक दबाव में इसलिये अपनाते हैं कि लोग क्या कहेंगे। आधुनिक शिक्षा से जीवन में आगे बढ़े लोग भी अंधविश्वास और कर्मकांडों पर इसलिये विश्वास करते दिखते हैं क्योंकि उन पर कहीं न कहीं से दूसरे लोगो का दबाव होता है। स्थिति यह है कि अनेक धार्मिक ठेकेदार तो इन्हीं कर्मकांडों को ही धर्म का आधार कहकर प्रचारित करते हैं।
            इस विषय पर संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि
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            ‘कबीर’ मन फूल्या फिरै, करता हूं मैं ध्रंम।
                कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम।।
          "आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।"
              संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नरक का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढ़ियों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Wednesday, August 03, 2011

मनुस्मृति से संदेश-पानी के स्पर्श से आंखों की शुद्धि होती है (manu smriti-pani ke achman se akhon ki shuddhi)



          वायु तथा जल को न केवल जीवन का आधार माना गया है कि बल्कि उनको ओषधि भी कहा जाता है। जिस तरह प्रातः प्राणायाम से शुद्ध वायु के प्रवेश से शरीर और मन के आंतरिक विकार बाहर निकलते हैं उसी तरह नहाने के दौरान जल के उपयोग से बाहरी अंगों पर शुद्धता आती है। आधुनिक विज्ञान जल की उपयोगिता को लेकर अनेक अनुंसधान कर चुका है। हालांकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में भी इस विषय पर अनेक बातें कही गयी है।
          मनु स्मृति में कहा गया है कि
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            कृत्वा मूत्रं पूरीपं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत्।
            वेदमध्येध्माणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा
       "मल मूत्र करने के बाद व्यक्ति को सदैव हाथ धोकर आचमन करने के साथ ही पानी का स्पर्श आंखों पर करना चाहिए। सदैव वेद पढ़ने तथा भोजन करने से पहले भी हाथ धोकर आचमन करना चाहिए।"
                आजकल कंप्यूटर का उपयोग बढ़ता जा रहा है पर उससे होने वाली हानियों से रोकने और बचने के उपाय बहुत कम  लोग जानते हैं। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि कंप्यूटर का उपयोग करने वालों को बीस मिनट से अधिक उस पर काम करने के बाद दो मिनट आंखें बंद रखना चाहिए। इसके अलावा कंप्यूटर से उठकर बाहर आसमान में ताकना चाहिए ताकि आंखों के उन सूक्ष्म तंतुओं का विस्तार होता है जो काम के दौरान सिकुड़ जाते है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गयी है कि कंप्यूटर पर काम करने वालों को अपनी आंखों में पानी की छींटें मारते रहना चाहिए। कंप्यूटर पर काम करते हुए आंखों में जल सूखने लगता है और आंखों में छींटे मारने से वहां ताजगी आती है। मनृस्मृति में भी कहा गया है कि वेद आदि का अध्ययन करने से पहले और बाद दोनों ही समय आंखों में जल का प्रवेश कराना चाहिए। यही बात हम कंप्यूटर पर काम करते समय भी लागू कर सकते हैं। ऐसे प्रयासों से बहुत सीमा तक कंप्यूटर से होने वाली हानियों से बचा जा सकता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Tuesday, June 28, 2011

सामवेद से संदेश-भगवान नारायण से कर्म की प्रेरणा लें (samved se sandesh-Bhaqwan narayan se karma ki prena len)

             भगवान विष्णु कर्म और फल के प्रतीक भगवान माने जाते हैं। यही कारण है कि भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी के अनेक अवतार समय समय पर हुए है। ब्रह्मा संसार के रचियता तो भगवार शिव संहारक और उद्धारकर्ता कहे गये हैं और भगवान नारायण को पालनहार माना गया है। ब्रह्मा और शिव का कोई अवतार नहीं होता जबकि भगवान नारायण अवतार लेकर अपनी सक्रियता से भक्तों की रक्षा करते है-यह आम धारण हमारे देश के धर्मभीरु लोगों की रही है।  ऐसे में वह संसार में सक्रियतापूर्ण जीवन जीने वालों के प्रेरक भी है।
यह आश्चर्य की बात है कि प्रकृति ने मनुष्य को देह, बुद्धि और मन की दृष्टि से अन्य जीवों की अपेक्षा सर्वाधिक शक्तिशाली जीव बनाया है तो सबसे अधिक आलसी भाव भी प्रदान किया। अधिकतर लोग लोग अपने तथा परिवार के स्वार्थ सिद्ध करने के बाद आराम करना चाहते है और परमार्थ उनको निरर्थक विषय लगता है जबकि पुरुषार्थ का भाव निष्काम कर्म से ही प्रमाणित होता है। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस देह से मनुष्य संसार का उपभोग करता है उसका ही महत्व नहीं समझता और भोगों में उसका नाश करता है। जिससे अंत समय में रोग उसके अंतिम सहयात्री बन जाते हैं और मृत्यु तक साथ रहते हैं।
      योग साधना, ध्यान, भजन और उद्यानों की सैर करने से जो देह के साथ मन को भी जो नवीनता मिलती है उसका ज्ञान अधिकतर मनुष्यों को नहीं रहता। सच बात तो यह है कि शरीर और मन को प्रत्यक्ष रूप से प्रसन्न करने वाले विषय मनुष्य को आकर्षित करते है और वह इसमें सक्रिय होकर जीवन भर प्रसन्न रहने का निरर्थक प्रयास करत है। वह अपनी इसी सक्रियता को पुरुषार्थ समझता है जबकि अप्रत्यक्ष लाभ देने वाले योगासन, ध्यान, भजन तथा प्रातः उद्यानों में विचरण करना उसे एक निरर्थक क्रिया लगती है। सीधी बात कहें तो इस अप्रत्यक्ष लाभ के लिये निष्काम भाव से इन कर्मो में लगना ही पुरुषार्थ कहा जा सकता है।
           हमारे पावन ग्रंथ सामवेद में कहा गया है कि
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           विष्णोः कर्माणि पश्चत यतो व्रतानि पस्पशे।
          ‘‘भगवान विष्णु के पुरुषार्थों को देखो और उनका स्मरण करते हुए अनुसरण करो।’
         ऋतस्य पथ्या अनु।
        ‘‘ज्ञानी सत्य मार्ग का अनुसरण करते हैं।’’
        ‘प्रेता जयता नर।’
        आगे बढ़ो और विजय प्राप्त करो।’’
      पुरुषार्थ करना मनुष्य का धर्म है और इसके लिये जरूरी है कि सत्य को मार्ग का अनुसरण किया जाये। आजकल जल्दी धनवान बनने के लिये असत्य मार्ग को भी अपनाने लगते हैं और उनको कामयाबी भी मिल जाती है पर जब उनको इसका दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग कभी भी ऐसे गलत कार्य में अपना मन नहीं लगाते जिसका कालांतर में दुष्परिणाम भोगना पड़े।
     कर्म और पुरुषार्थ के विषय में भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। वह संसार के पालनहार माने जाते हैं। ऐसा महान केवल पुरुषार्थ करने वालों को ही मिल सकता है। भगवान विष्णु के चौदह अवतार माने जाते हैं और हर अवतार में कहीं न कहीं उनका पुरुषार्थ प्रकट होता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Friday, June 17, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-प्रचार पाने के लिए गलत काम न करें (prachar paane ke liye galat kaam na karen-kautilya ka arthshastra)

           मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह समाज में श्रेष्ठ कहलना चाहता   है। इसी कारण वह निरंतर ही धन, प्रतिष्ठा और अन्य लोक महत्व की अन्य वस्तुएं संग्रह करने में लगा रहता है। इसी प्रवृति के चलते  समान रुचियों वाले लोगों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है।  आज समाज में नाम पाने के लिये कुछ भी कर गुजरने की मनोवृत्ति इतने भयानक हो चुकी है  कि लोग अनेक बार शर्मनाक हरकते करते हैं।  प्रचार माध्यमों में नाम पाने का मोह लोगों को अंधा बना देता है। अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का नायक की तरह प्रचारित होते  देखकर कुछ युवा भ्रमित हो जाते हैं।  वैसे भी जनसामान्य को लगता है कि जो लोग अपनी हिंसक अपराधिक प्रवृत्ति की वजह से समाज में डर बनाये रहते हैं वह कोई दमदार आदमी हैं।  उनका रुतवा देखकर सब उनसे संपर्क रखते हैं पर प्रकृति का नियम है कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा।  जो लोग जनविरोधी काम करते हुए आतंक का वातावरण बनाते हैं वह दरअसल स्वयं ही अंदर से डरे रहते हैं। उनकी बदनामी को लोकप्रियता समझना मूर्खता है।  समाज में सम्मान तो केवल उसी आदमी को मिलता है जो जनहित का काम करता है। 
      हर मनुष्य में पूज्यता और अहंकार का भाव होता है। जब किसी को धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो फूलकर कुप्पा नहीं समाता बल्कि उसका प्रदर्शन करने लगता है और कई लोगों का तो मन ही विचलित हो जाता है। शक्ति आने पर ही अनेक लोग संतुष्ट नहीं होते बल्कि उसका प्रभाव समाज पर दृष्टिगोचर हो और वह डरे इसी उद्देश्य से कुछ लोग अपने बड़प्पन का दुरुपयोग करने लगते हैं। आजकल हम देख सकते है कि देश में अमीरों, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोगों का आतंक पूरे समाज पर दिखाई देता है। शक्तिशाली वर्ग के लोग अपनी शक्ति से छोटों को संरक्षण देने की बजाय अपनी शक्ति का उपयोग उनको दबाकर आत्म संतुष्टि कर लेते हैं। यही कारण है कि समाज में वैमनस्य का भाव बढ़ रहा है।
            कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि 
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         आयत्याञ्प तदात्वे च यत्स्यादास्वादपेशलम्।
         तदेव तस्य कुर्वीत न लोकद्विष्टमाचरेत्।।
       "भविष्य की अच्छी संभावनाओं को देखते हुए बुद्धिसे जो कार्य करने में अच्छा लगे वही प्रारंभ करे परंतु कभी भी सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें।"
        श्लाघ्या चानन्दनीया च महतामुफ्कारिता।
       करले कल्याणगायत्ते स्वल्पापि सुमहोदयम्।
       "उच्च पुरुषों का उपकार कर्म अत्यंत प्रिय तथा आनंदमय लगता है वह अगर किसी का भी थोड़ा कल्याण करते हैं तो उसका महान उदय होता है।"
            हम अनेक लोगों का उनके धन, पद और बल की वजह से बड़ा मान लेते हैं पर सच यह है कि वह समाज का भला करना नहीं जानते। बड़े आदमी की थोड़ी कृपा से छोटे आदमी प्रसन्न हो सकत हैं पर इसको समझने की बजाय उसे कुचलकर अपने आप को खुश करना चाहते हैं।
       बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को न छाया मिले, पथिक को फल लागे अति दूर-यह कहावत अधिकतर बड़े लोगों पर लागू होती है। ऐसे लोगों को बड़ा मानना ही एक तरह से गलत है। बड़ा आदमी तो वह है जो लोकहित में अपनी शक्ति का उपयोग करता है न कि जनविरोधी काम करके अपने अहंकार की संतुष्टि! अतः धल, उच्च पद या बाहूबल होने पर छोटे और कमजोर आदमी को संरक्षण देना चाहिये ताकि समाज को एक नई दिशा मिल सके।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर 
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Saturday, May 21, 2011

बड़े लोगों को अधिक प्रसन्न नहीं रखा जा सकता-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन

                मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति और कमजोरी उसकी देह में स्थित मन है। कहना तो यह चाहिये कि मन की इच्छा से चलने वाला ही जीव मनुष्य कहलाता है। यह मन बहुत विचित्र है। पहले एक चीज को पाने का मोह करता है तो उसके आते ही उससे विरक्त होकर दूसरी का मुख देखने लगता है। जो तत्व ज्ञानी नहीं होते वह अनाड़ी घुड़सवार की तरह इस बेेलगाम घोड़े की सवारी करते हैं जो द्रुत गति से चलता जाता है और फिर अपने स्वामी को नीचे पटक देता है। रुकता फिर भी नहीं बल्कि और तेज दौड़ता है। जमीन पर गिरा मनुष्य घायलावस्था में पड़ा है और सोचता है कि अब क्या करूं?
            आज के वैश्विक समाज में जीवन के विकास का मतलब केवल भौतिक उपलब्धियों की वृद्धि से ही माना जाता है। अध्यात्मिक विकास तो बुढ़ापे में ही आवश्यक है-यह सिद्धांत बताया जाता है। अध्यात्मिक विकास से मतलब सन्यास माना गया है। इस कारण हर मनुष्य जीवन में माया के पीछे भागे चला जा रहा है। एक लाख हैं तो दस लाख चाहिए और दस लाख हैं तो करोड़, करोड़ हैं तो दस करोड़, दस करोड़ हैं तो एक अरब-इस तरह उसके भौतिक विकास का अंतहीन लक्ष्य कभी पूरा नहीं होता और इधर देह वृद्धावस्था में पहुंच जाती है जहां शरीर की लाचारी मन को भी लाचार बना देती है। मन बीमार तो मनुष्य भी बीमार हो जाता है। अध्यात्मिक अभ्यास न होने की वजह से भक्ति होती नहीं तो जिंदगी से थके पंाव सत्संग में जाने नहीं देते।
             इस विषय में भर्तृहरि महाराज अपने नीति शतक  में कहते हैं कि
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  दुराराध्याश्चामी तुरगचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं तु स्थूलेच्छाः सुमहति फले बद्धमनसः।
    जरा देहं मृत्युर्हरति दयितं जीवितमिदं सखे नान्यच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः।।
          "राजाओं का चित तो घोड़े की गति से इधर उधर भागता इसलिये उनको भला कब तक प्रसन्न रखा जा सकता है। हमारे अंदर भी ऊंचे ऊंचे पद पाने की लालसा हैं। इधर शरीर को बुढ़ापा घेर रहा है। ऐसे में लगता है कि विवेकवान पुरुषों के लिये तप बल के अलावा अन्य कोई उद्धार का मार्ग नहीं है।"
         अगर हम थोड़ा चिंत्तन करें तो इस बात का आभास स्वतः होगा कि संसार का भौतिक चक्र तो त्रिगुणमयी माया के बंधने में होने के कारण स्वतः संचालित है। हमारी देह स्वाभाविक रूप से अपनी आवश्यकताओं के लिये सक्रिय रहनी ही है चाहे हम प्रयास करें या नहीं। इस देह में विद्यमान मन, बुद्धि तथा अहंकार ऐसी प्रकृतियां हैं जो अपनी सक्रियता का अहसास मनुष्य को कर्ता के रूप में कराती हैं जबकि यह सच नहीं है। ज्ञानी लोग इस बात को जानते हैं इसलिये सांसरिक कर्म में सक्रिय रहते हुए भी उसके फल में विरक्त भाव रखते हैं। ऐसी मानसिक नियंत्रण तप, स्वाध्याय, सत्संग, त्याग तथा भक्ति के अभ्यास से ही प्राप्त होता है। अत जहां तक हो सके समय मिलने पर योगसाधना तथा भक्ति करना चाहिए।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Tuesday, May 03, 2011

धन के पीछे आदमी जीवन नष्ट कर देता है-कबीरदास

सिख गुरु गोविंद सिंह जी का कहना था कि ‘धन बहुत बड़ी चीज है, पर आदमी को खाने के लिये बस दो रोटी चाहिए।’
इसका आशय यही है कि भले ही आदमी कितना भी कमा ले पर उसका पेट अन्न के बिना नहीं भर सकता। हम इसका व्यापक तथा गुढ़ भाव देखें तो यह बात समझ में आती है कि खाने के लिये जहां हमें रोटी चाहिए तो प्यास बुझाने के लिये पानी। देह को बचाने के लिये कपड़ा चाहिये और रात गुजारने के लिये छत की आवश्यकता होती है। यह धन से प्राप्त होती हैं पर दैहिक आवश्यकता की पूर्ति वस्तुओं से होती है कि कागज के नोटों से। यह बात लोग नहीं समझते और पैसा कमाने का लक्ष्य रखकर ही चलते जाते हैं और फिर अंततः उनकी देह नष्ट हो जाती है। इस दुनियां के अधिकतर मनुष्य जितना कमाते हैं उतना खर्च नहीं कर पाते। वह ऐसा भौतिक संसार रच जाते हैं जो बाद में दूसरों के काम आता है।
इस विषय पर संत कबीरदास कहते हैं कि
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कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं
तीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिं
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा उसके घर कब आयेगी।
हालांकि लोग धन का पीछा करते हुए थकते नहीं हैं पर एकरसता से जो ऊब पैदा होती है उसको भी नहीं समझ पाते। योगसाधना, ध्यान, और मंत्रजाप उनके लिये फालतु की चीज हैं। कुछ लोग पैसे के कारण भी भक्ति का दिखावा करते हुए बड़े बड़े कार्यक्रम भी करते हैं पर उनका आचरण, व्यवहार और वाणी हमेशा ही उनके अंदर के विकारों से ग्रसित दिखाई देती है। आजकल तो ऐसे लोग भी हो गये हैं जो धर्म का व्यापार इसलिये करते हैं ताकि उनके लिये सुखसुविधा का संग्रह होता रहे। अनेक लोग समाज पर दबदबा बनाये रखने के लिये भगवान की आड़ लेते हैं। ऐसे लोग वैभव, पद और बाहुबल से संपन्न दिखते जरूर हैं पर मानसिक रूप से विकृति को प्राप्त हो जाते हैं।
इस संसार में सुख से रहने का मार्ग अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने से ही सुलभ होता है। यही सोचकर तत्व ज्ञानी जितना मिलता है उसी से संतोष कर लेते हैं। वह न केवल अपना जीवन आनंद से बिताते हैं बल्कि दूसरों को भी सुख देते हैं।

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Wednesday, April 27, 2011

क्रोध बनता है स्वनाश का कारण-हिन्दी धार्मिक संदेश

             क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। क्रोध की उत्पति अहंकार से होती है जो कि अज्ञानियों में कूटकुटकर भरा होता है। जीवन से लेकर मृत्यु तक के सफर को तत्वज्ञान की दृष्टि से देखने वाले जानते हैं कि यहां कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं है। यह संसार त्रिगुणमयी माया से संचालित है और हर जीव अपने गुणों के वशीभूत होकर व्यवहार करता है। जिन लोगों का रहन सहन गलत स्थान और वातावरण में है उनसे सद्व्यवहार करने की आशा करना ही मूर्खता है। जिनके पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है वह इस संसार को अपनी शक्ति से संचालित होने का भ्रम पालकर अपने कर्म का परिणाम सम्मान और दान के रूप में चाहते हैं। ऐसा न होने पर वह क्रोध का शिकार होकर हिंसा करते हैं और फिर अंततः उसका दुष्परिणाम भी उनके सामने आता है तब वह उन पलों को कोसते हैं जब उनको क्रोध आया था। आजकल की युवा पीढ़ी व्यसनों के साथ ही जुआ और सट्टे जैसे अपराधों के साथ जुड़ रही है। फिल्म और टीवी धारावाहिकों में मेकअप से सजे कृत्रिम सौंदर्य से उनकी बृद्धि दिग्भ्रमित हो जाती है और उनके अंदर यौन अपराध की वृत्तियां पनपती हैं। सब तरफ से निराश होने पर उनके अंदर क्रोध पैदा होता है और अंततः वह हिंसक मार्ग पर चल पड़ते हैं।
इस विषय पर मनुमहाराज कहते हैं कि
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                        परस्यं दण्डं नोद्यच्छेत्क्रुद्धोनैनं।
                     अन्यत्र पुत्राच्छिष्याद्वा शिष्टयर्थ ताडयेत्तु तौ।।
              "कभी क्रोध भी आये तब भी किसी अन्य मनुष्य को मारने के लिये डंडा नहीं उठाना चाहिये। मनुष्य केवल अपने पुत्र या शिष्य को ही पीटने का हक रखता है।"
                     ताडयित्त्वा तृपोनापि संरम्भान्मतिपूर्वकम्।
                   एकविंशतिमाजातोः पापयेनिषु जायसे।।
                "अपनी जाग्रतावस्था में जो व्यक्ति अपने गुरु या आचार्य को तिनका भी मारता है तो वह इक्कीस बार पाप योनियों में जन्म लेता है।"
              जिन लोगों ने क्रोधवश हिंसा की है और उसका परिणाम भोगा है, उनसे अगर अपने अपराध की चर्चा की जाये तो वह इस बात को मानते हैं कि उन्होंने आवेश में आकर ऐसा अपराध किया जिससे वह बच सकते थे। इसका सीधा मतलब यह है कि उनसे हुआ अपराध हालातों से नहीं बल्कि उनके स्वयं के अपने आवेश की वजह से हुआ था। अनेक जगह तो ऐसे झगड़े होते हैं जिनमें विषय इतना गौण होता है कि देखने और सुनने वाले हंसते हैं। क्रोध का शिकार होने वाले पीड़ित हों या अपराधी अपनी जान ऐसे विषय पर गंवाते हैं जिससे टाला जा सकता था। अंतः जब अपने अंदर क्रोध आये तो उस पर नियंत्रण करना चाहिए। इसका सीधा उपाय यह है कि जब हमें लगे कि निराशा और क्रोध हमारे अंदर आ रहा है तब ओम शब्द का जाप करें। अगर कोई दूसरा मंत्र जपते हैं तो उसका अधिक और नियमित     जाप आरंभ करें।
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Thursday, April 14, 2011

कामना रूप नदी राग और अनुराग जैसे मगरमच्छों से भरी पड़ी है-हिन्दू धार्मिक लेख (kamna roopg nadi mein rag aur anurag magarmachchh-hindu dharmik lekh)

विद्वान्  महाराज भर्तृहरि कहते हैं 
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आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङगाकुला
रामग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी
मोहावर्तसुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुङगचिन्तातटी
तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगश्वराः
''आशा एक नदी की भांति इसमे हमारी कामनाओं के रूप में जल भरा रहता है और तृष्णा रूपी लहरें ऊपर उठतीं है। यह नदी राग और अनुराग जैसे भयावह मगरमच्छों से भरी हुई हैं। तर्क वितर्क रूपी पंछी इस पर डेरा डाले रहते हैं। इसकी एक ही लहर मनुष्य के धैर्य रूपी वृक्ष को उखाड़ फैंकती है। मोह माया व्यक्ति को अज्ञान के रसातल में खींच ले जाती हैं, जहा चिंता रूपी चट्टानों से टकराता हैं। इस जीवन रूपी नदी को कोई शुद्ध हृदय वाला  योगी तपस्या, साधना और ध्यान से शक्ति अर्जित कर परमात्मा से संपर्क जोड़कर ही सहजता से पार कर पाता है।"
वर्त्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- कहते हैं कि ‘उम्मीद पर आसमान टिका है’।  यह उम्मीद और आशा यानि क्या? सांसरिक स्वार्थों की पूर्ति होने ही हमारी आशाओं का केंद्र है। भक्ति, सत्संग तथा तत्वज्ञान से दूर भटकता मनुष्य अपना पेट भरते भरते थक जाता है पर वह है कि भरता नहीं।  कभी कभी जीभ स्वाद बदलने के लालायित हो जाती है।  सच तो यह है कि मन की तृष्णायें ही आशा का निर्माण करती हैं।  भारत जो कभी एक शांत और प्राकृतिक रूप से संपन्न क्षेत्र था आज पर्यावरण से प्रदूषित हो गया है।  हमेशा यहां आक्रांता आये और साथ में लाये नयी रौशनी की कल्पित आशायें।  सिवाय ढोंग के और क्या रहा होगा?  कुछ मूर्ख लोग तो कहते हैं कि इन आक्रांताओं ने यहां नयी सभ्यता का निर्माण किया।  इस पर हंसा ही जा सकता है।  यह नयी सभ्यता कभी अपना पेट नहीं भर पाती। जीभ के स्वाद के लिये अपना धर्म तक छोड़ देती है। रोज नये भौतिक साधनों के उपयोग की तरफ बढ़ चुकी यह सभ्यता जड़ हो चुकी है।  आशायें हैं कि पूर्ण नहीं होती। होती है तो दूसरी जन्म लेती है।  यह क्रम कभी थमता नहीं।
इस सभ्यता में हर मनुष्य का सम्मान की बात कही जाती है।  यह एक नारा है। योग्यता, चरित्र और वैचारिक स्तर के आधार पर ही मनुष्य को सम्मान की आशा करना चाहिये मगर नयी सभ्यता के प्रतिपादक यहां जातीय और भाषाई भेदों का लाभ उठाकर यहां संघर्ष पैदा कर  मायावी दुनियां स्थापित करते रहे। भारतीय अध्यात्म ज्ञान में जहां मान सम्मान से परे रहकर अपनी तृष्णाओं पर नियंत्रण करने के लिये संदेश दिया जाता है। सभी के प्रति समदर्शिता का भाव रखने का आदेश दिया जाता है। वही नयी सभ्यता के प्रतिपादक अगड़ा पिछड़ा का भेद यहां खड़ा करते हुए बतलाते हैं कि जिन तबकों को पहले  सम्मान नहीं मिला अब उनकी पीढ़ियों को विशेष सम्मान दिया जाना चाहिए।  कथित पिछड़े तबकों को विशेष सम्मान की तृष्णा जगाकर वह दावा करते हैं कि हम यहां समाज में बदलाव ला रहे हैं।  कितने आश्चर्य की बात है कि जिन जातियों में अनेक महापुरुष और वीर योद्धा पैदा हुए उनको ही पिछड़ा बताकर सामाजिक वैमनस्य पैदा केवल इसी ‘विशेष सम्मान’ की आड़ में पैदा किया गया है। आज हालत यह है कि पहले से अधिक जातिपाति का  फैल गया है।
विकास, सम्मान और आर्थिक समृद्धि की आशाऐं जगाकर भारतीय अध्यात्म ज्ञान को ढंकने का प्रयास किया गया।  ऐसी आशायें जो कभी पूरी नहीं होती और अगर हो भी जायें तो उनसे किसी मनुष्य को तत्वज्ञान नहीं मिलता जिसके परिणाम स्वरूप समाज में आज रोगों का प्रकोप और तनाव का वातावरण बन गया है।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप',ग्वालियर 
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Sunday, April 03, 2011

सज्जन की मित्रता धीरे धीरे बढ़ती है-हिन्दू धार्मिक चिंतन (sajjan ki mitrata-hindu dharmik chittan)

दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्।
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
"कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो  तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।"
आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
"जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध  में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।"
             सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्द्ध  में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है। पड़ौस तथा कार्यस्थलों में हमारा संपर्क अनेक ऐसे लोगों से होता है जिनके प्रति हमारे हृदय में क्षणिक आत्मीय भाव पैदा हो जाता है। वह भी हमसे बहुत स्नेह करते हैं पर यह यह संपर्क नियमित संपर्क के कारण मौजूद हैं।  उन कारणों के परे होते ही-जैसे पड़ौस छोड़ गये या कार्य का स्थान बदल दिया तो-उनसे मानसिक रूप से दूरी पैदा हो जाती है।  इस तरह यह बदलने वाली मित्रता वास्तव में सत्य नहीं होती। मित्र तो वह है जो दैहिक रूप से दूर होते भी हमें स्मरण करता है और हम भी उसे नहीं भूलते। इतना ही नहीं समय पड़ने पर उनसे सहारे का आसरा मिलने की संभावना रहती है।  अतः स्थितियों का आंकलन कर ही किसी को मित्र मानकर उससे आशा करना चाहिये। जहां तक हो सके दुष्ट और स्वार्थी लोगों से मित्रता नहीं करना चाहिये जो कि कालांतर में घातक होती है। उसी तरह अपने व्यक्तित्व का भी निर्माण इसी तरह करना चाहिए कि वह दूसरों को प्रिय लगे।
        दूसरों से स्नेह तथा प्रेम पाने के लिये यह आवश्यक है कि निस्वार्थ भाव से सभी का काम करें और वार्तालाप में मधुर वचन का प्रयोग करें। एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि व्यक्तित्तव में सौम्यता तथा व्यवहार में नैतिकता बरतने से ही समाज में सम्मान बढ़ता है।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक  राज कुकरेजा "भारतदीप",ग्वालियर 
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Sunday, March 27, 2011

संयम से ही इंद्रियों के साथ ही संसार जीता जा सकता है-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (sanyam se vijay sanbhav-hindu dharmik chittan)

पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है 
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ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्तवसंमादिन्द्रियजयः।।
हिन्दी में भावार्थ-ग्रहण, स्वरूप, अस्मित, अन्वय और अर्थतत्व इन पांचों अवस्थाओं में संयम करने से मन सहित इंद्रियों पर विजय प्राप्त हो जाती है।
रूपलावण्यबलवज्रसंहनत्वानि कायसम्पत्।।
हिन्दी में भावार्थ-रूप, लावण्य, बल और मानसिक दृढ़ता यानि वज्र एक संगठन होने के साथ ही शरीर की संपत्ति है।
ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च।।हिन्दी में भावार्थ-इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने मन के सदृश गति, शरीर के बिना विषयों को अनुभव करने की शक्ति और प्रकृत्ति पर अधिकार स्वतः प्राप्त हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय योग साधना के प्रचारक केवल आसन तथा प्राणायाम करने के संदेश के साथ ही इसे केवल स्वस्थ रहने का उपाय बताते हैं। यह गलत नहीं है पर इससे सीमित उद्देश्य की प्राप्त होती हैं । योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान अनेक प्रकार की सिद्धियां भी प्राप्त हो जाती हैं। अब यहां सिद्धियों का अर्थ यह कदापि नहीं लेना चाहिए कि मरे हुए आदमी को जीवित किया जा सकता है या किसी को को धन प्राप्त हो ऐसा उपाय किया जा सकता है। कुछ लोग योग साधना कर यह भ्रम पाल लेते हैं कि उनको तो भारी सिद्धियां मिल गयी। दरअसल योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान करने से मनुष्य की देह तथा इंद्रियों में तीक्ष्णता आती है पर अन्य ज्ञान न होने की वजह से उसका उपयोग अनेक लोग अज्ञानजनित कार्यों में करते के साथ ही अंधविश्वास फैलाने में करते हैं।
पतंजलि महाराज ने योग दर्शन में केवल मनुष्य को स्वयं शक्तिशली और दृढ़ मानसिकता का स्वामी होने का पाठा सिखाया है। योगासन, प्राणायाम तथा मंत्र जाप के बाद जब ध्यान किया जाता है तब वह मनुष्य देह और मन को पूर्णता प्राप्त करता है। उस समय अंतर्मन का निरीक्षण करने से बाहर के विषयों की अनुभूति की जा सकती है। ऐसी जगहों को भी अनुमान किया जा सकता है जहां स्वयं उपस्थित न हों। इतना ही दूसरे व्यक्ति का चेहरा देखकर या उसके शब्द सुनकर उसके मन में चल रही अन्य बातों का भी अनुमान किया जा सकता है। इसके अलावा गर्मी, सर्दी और वर्षा के दौरान अपनी देह को बीमारियों से भी बचाया जा सकता है। जब हम स्वस्थ होते हैं तो हमारी योग्यता और प्रतिभा का प्रवाह स्वत: प्रवाहित होता है जिसकी वजह से समाज में सम्मान मिलता है। भारतीय योग साधना के समूचे  अंगों का अध्ययन करने पर ही इसका ज्ञान हो सकता है।

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Wednesday, March 16, 2011

अभिलाषा और आकांक्षा की कोई सीमा नहीं-हिन्दू धार्मिक विचार (abhilasha aur akanksha ki seema nahin-patanjlali yog sahitya)

आम आदमी की जिंदगी हमेशा ही कठिन होती है पर आजकल के समय में तो लगभग दुरूह हो गयी है। बढ़ती महंगाई, हिंसा, तथा भ्रष्टाचार ने आम आदमी को त्रस्त कर दिया है। ऐसे में हर आम इंसान सोचता है कि वह बड़े आदमी की चमचागिरी कर जीवन में शायर कोई उपलब्धि प्राप्त कर ले। इस भ्रम में अनेक लोग बड़े लोगों की चाटुकारिता लगते हैं, मगर फायदा उसी को होता है जो दौलतमंदों के तलवे चाटने की हद तक जा सकता है। सच तो यह है कि कोई आदमी कितना भी दौल्त, शौहरत या पद की ऊंचाई पर पहुंच जाये पर उसकी मानसिकता छोटी रहती है। ऐसे में उनकी चमचागिरी से सभी को कुछ हासिल नहीं होता इसलिये जहां तक हो सके अपने अंदर आत्मविश्वास लाकर जीवन में संघर्ष करना चाहिए।
पतंजलि  योग साहित्य के अनुसार 
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दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं
तु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः।
जरा देहं मृत्युरति दयितं जीवितमिदं
सखे नानयच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः।।
"जिन राजाओं का मन घोड़े की तरह दौड़ता है उनको कोई कब तक प्रसन्न रख सकता है। हमारी अभिलाषायें और आकांक्षायें की तो कोई सीमा ही नहीं है। सभी के मन में बड़ा पद पाने की लालसा है। इधर शरीर बुढ़ापे की तरह बढ़ रहा होता है। मृत्यु पीछे पड़ी हुई है। इन सभी को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि भक्ति और तप के अलावा को अन्य मार्ग ऐसा नहीं है जो हमारा कल्याण कर सके।"
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों के मन में धन पाने की लालसा बहुत होती है और इसलिये वह धनिकों, उच्च पदस्थ एवं बाहुबली लोगों की और ताकते रहते हैं और उनकी चमचागिरी करने के लिये तैयार रहते हैं। उनकी चाटुकारिता में कोई कमी नहीं करते। चाटुकार लोगों को यह आशा रहती है कि कथित ऊंचा आदमी उन पर रहम कर उनका कल्याण करेगा। यह केवल भ्रम है। जिनके पास वैभव है उनका मन भी हमारी तरह चंचल है और वह अपना काम निकालकर भूल जाते हैं या अगर कुछ देते हैं तो केवल चाटुकारिता  के कारण नहीं बल्कि कोई सेवा करा कर। वह भी जो प्रतिफल देते हैं तो वह भी न के बराबर। इस संसार में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर उसके मद में डूबने से बच पाते हैं।  अधिकतर लोग तो अपनी शक्ति के अहंकार में अपने से छोटे आदमी को कीड़े मकौड़े जैसा समझने लगते हैं और उनकी चमचागिरी करने पर भी कोई लाभ नहीं होता।  अगर ऐसे लोगों की निंरतर सेवा की जाये तो भी सामान्य से कम प्रतिफल मिलता है।
सच तो यह है कि आदमी का जीवन इसी तरह गुलामी करते हुए व्यर्थ चला जाता हैं। जो धनी है वह अहंकार में है और जो गरीब है वह केवल बड़े लोगों की ओर ताकता हुआ जीवन गुंजारता है। जिन लोगों का इस बात का ज्ञान है वह भक्ति और तप के पथ पर चलते हैं क्योंकि वही कल्याण का मार्ग है।इस संसार में प्रसन्नता से जीने का एक ही उपाय है कि अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए ही जीवन भर चलते रहें।  अपने से बड़े आदमी की चाटुकारिता से लाभ की आशा करना अपने लिये निराशा पैदा करना है।
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर 
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Saturday, February 26, 2011

जनता के शोषक की प्राण शक्ति अल्प हो जाती है-हिन्दू धार्मिक संदेश

शरीरकर्षणात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा।
तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस प्रकार शरीर को भोजन पानी न देकर उसका शोषण करने से उसकी प्राणशक्ति कमजोर हो जाती है उसी तरह राष्ट्र या प्रजा का शोषण करने से राज्य प्रमुख  की प्राणशक्ति कमजोर हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-जिन लोगों ने मनुस्मृति को नारी तथा निम्न जातियों के लोगों के लिये अपमानजनक बताकर इसको जलाया और अपमान किया वह लोग कौन थे?
यकीनन इनमें से कई लोग अपने अभियान को पूरा कर राजकीय पदों पर सुशोभित हुए। वह मनुस्मृति का दुष्प्रचार कर जनता में भेद डालकर आधुनिक लोकतंत्र के सहारे उसका मत लेकर राजसत्ता चाहते रहे होंगे। वह मिली और आधुनिक पदों के नाम से राजा भी वही लोग बने। वह डरते थे कि मनुस्मृति के अनेक संदेश उनकी आत्मा को रुलायेंगे, उनका सच कोई बतायेगा तो स्वयं का काला चेहरा ही अपने अंतर्मन के कांच में दिखाई देगा। सच से भागने वाले इसे सत्ता भोगियों ने मनृस्मृति से ही न केवल दूर रहने का फैसला किया बल्कि प्रजा को भी दूर रहने का प्रयास आरंभ किया।
हम आज देखें तो देश की क्या हालत है? घोटालों, भ्रष्टाचार तथा आतंक के साये में आम लोग जी रहे हैं। मनृस्मृति में नारी के लिये अपमाजनक टिप्पणियां दिखाने वाले विद्वान आज के युग में ही नारी की पहले से अधिक दुर्गति पर रोते हैं पर उसका हल नहीं बता पाते। वह विद्वान राज्य को दोष देते हैं पर उसी के सहारे उनकी दुकान चल रही है। ऐसा नहीं है कि इस देश में ईमानदार राज्य कर्मी या अधिकारी नहीं हैं पर कुछ लोगों ने अपना वर्चस्व इस तरह स्थापित कर लिया है कि राज्य का केंद्र बिंदु उनके इर्दगिर्द ही घूमता है और वह उसका गलत इस्तेमाल कर अपने लिये घर भरते हैं। इन भ्रष्ट लोगों के मन में बस जनता की शोषण करने की भयानक प्रवृत्ति है। इससे उनकी प्राणशक्ति कमजोर हो गयी है और भले ही वह जनता की रक्षा का कथित दावा करें पर कर नहीं  पाते।
कभी कभी तो प्रतीत होता  है कि आम और गरीब जनता के माध्यम से जो राजस्व आता है उसकी लूट के लिये एक तरह से बहुत सारे गिरोह बन गये हैं। कहीं न कहीं न वह सफेद चेहरा लेकर राज्य के निकट पहुंचकर वह अपना कालाचरित्र धन और पद के सफेद रंग से पोतकर उसे आकर्षक ढंग से सजा लेते हैं। ऐसे लोगों की प्राणशक्ति कमजोर होती है। बाहर से भले ही वह ढीठता दिखायें पर पर अंदर से वह अपने काले कारनामों की वजह से खौफ में जीते हैं। ऐसे में अगर कोई मनृस्मृति के राज्य से जुड़े अंश पढ़कर सुनायें तो उनको लगेगा कि कोई उनका सच ही उनके सामने बयान कर रहा है। प्राणशक्ति से क्षीण ऐसे लोग अज्ञानी पुरुष की तरह सत्य से छिपते और भागते हैं। एक बात याद रखना चाहिए कि समाज और राष्ट्र की सेवा वही कर सकते हैं जिनकी प्राणशक्ति प्रबल है और यह उनके लिये ही संभव है जो गलत काम नहीं  करते। जिनकी प्राणशक्ति कम है वह न जनता के हितों को देख पाते हैं और न ही संकट पड़ने पर राष्ट्र को बचा पाते हैं।  राजधर्म का वही दृढ़ता से कर पाते हैं जो जनता को अपनी संतान की तरह देखते हुए उसका पालन करते हैं।

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Saturday, February 05, 2011

आलस्य मानव का बहुत बड़ा दुश्मन-हिन्दी अध्यात्मिक चिंतन

         मनुष्य स्वभाव में आलस्य का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है। संत कबीर दास जी ने कहा भी है कि ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय हो जायेगी बहुरि करेगा कब।’ हर मनुष्य सोचता है कि अपना काम तो वह कभी भी कर सकता है पर ऐसा सोचते हुए उसका समय निकलता जाता है। चतुर मनुष्य इस बात को जानते हैं इसलिये ही वह विकास के पथ पर चलते हैं। अक्सर लोग अपनी असफलता और निराशा को लेकर भाग्य को कोसते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि विकास का समय हर आदमी के पास आता है और जो अपने ज्ञान और विवेक से उसका लाभ उठाते हैं उनकी पीढ़ियों का भी भविष्य सुधर जाता है। संसार में सफल और प्रभावशाली व्यक्त्तिव का स्वामी, उद्योगपति, तथा प्रतिष्ठाप्राप्त लोगों की संख्या आम लोगों से कम होती है इसका कारण यह है कि सभी लोग समय का महत्व नहीं समझते और आलस्य के भाव से ग्रसित रहते हैं।
         जीवन में निरंतर सक्रिय रहने से मनुष्य के चेहरे और मन में स्फूर्ति बनी रहती है और बड़ी आयु होने पर भी उसका अहसास नहीं होता। आलस्य मनुष्य का एक बड़ा शत्रु माना जाता है इसलिये उससे मुक्ति पाना ही श्रेयस्कर है। कोई काम सामने आने पर उसको तुरंत प्रारंभ कर देना चाहिये यही जीवन में सफलता का मूलमंत्र है।
इस  विषय में कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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न कार्यकालं मतिमानतिक्रामेत्कदायन।
कथञ्चिदेव भवति कार्ये योगः सुदृर्ल्लभः।।

       "ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि अपने कार्य को निश्चित समय पर पूरा करे और इसमें किसी प्रकार की कोताही न बरते। कारण यह कि किसी भी कार्य में मन लगाना दुर्लभ है। फिर जीवन में संयोग बार बार नहीं आते।" 
सतां मार्गेण मतिमान् काले कर्म्म समाचरेत्।

काले समाचरन्साधु रसवत्फल्मश्नुते।।
      "ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को सत्य मार्ग पर स्थिर होकर समय आने अपना कार्य निश्चित रूप से आरंभ करना चाहिऐ। समय पर कार्य करने पर सारे फल प्रकट होते हैं।"
       समय समय पर हमें आत्ममंथन भी करना चाहिए कि हम कितना समय सार्थक कामों में कितना निरर्थक व्यतीत करते हैं।  यह मनुष्य स्वभाव भी है कि व्यसन तथा नकारात्मक कार्य उसे आकर्षित करते हैं और सकारात्मक काम करने की सोचने में भी आलस्य करता है। इस आदत से बचना चाहिए।
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Saturday, January 29, 2011

जातीय झगड़ों से बचना चाहिए-हिन्दी चिंत्तन लेख (jatpaat se bachen-hindi chinttan lekh)

हमारे देश में जाति पाति को लेकर झगड़ा बहुत पुरानी समस्या है।  दरअसल हम यह मानते हैं कि हर जाति दूसरी जाति पर शासन करना चाहती है और दूसरे को हेय मानती है।  वैसे देखा जाये तो जाति पाति न भी हो तो भी लोग अन्य प्रकार से समूहों में बंटकर एक दूसरे को दबाना चाहते हैं।  झूठे अहंकार की वजह से झगड़ा होता है पर यह समस्या अंततः आर्थिक असुरक्षा तथा भूमि संबंधी विवादों से उपजे तनाव का परिणाम है।  लोगों को जाति के नाम पर समूह बनाने में सुविधा होती है इसलिये वह अपने स्वाथों की पूर्ति के लिये एक समूह बनाकर दूसरे से अहंकारवश झगड़ा करते हैं। 
प्राचीनकाल में भारत में जाति पाति व्यवस्था थी पर उसकी वजह से समाज में कभी विघटन का वातावरण नहीं बनता था। कालांतर में विदेशी शासकों का आगमन हुआ तो उनके बौद्धिक रणनीतिकारों ने यहां फूट डालने के लिये इस जाति पाति की व्यवस्था को उभारा। इसके बाद मुगलकाल में जब विदेशी विचारधाराओं का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था तब सभी समाज अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिये संगठित होते गये जिसकी वजह से उनमें रूढ़ता का भाव आया और जातीय समुदायों में आपसी वैमनस्य बढ़ा जिसकी वजह से मुगलकाल लंबे समय तक भारत में जमा रहा। अंग्रेजों के समय तो फूट डालो राज करो की स्पष्ट नीति बनी और बाद मेें उनके अनुज देसी वंशज इसी राह पर चले। यही कारण है कि देश में शिक्षा बढ़ने के साथ ही जाति पाति का भाव भी तेजी से बढ़ा है। जातीय समुदायों की आपसी लड़ाई का लाभ उठाकर अनेक लोग आर्थिक, सामजिक तथा धार्मिक शिखरों पर पहुंच जाते है। यह लोग बात तो जाति पाति मिटाने की करते हैं पर इसके साथ ही कथित रूप से जातियों के विकास की बात कर आपसी वैमनस्य भी बढ़ाते है।
भारत भूमि सदैव अध्यात्म ज्ञान की पोषक रही है। हर जाति में यहां महापुरुष हुए हैं और समाज उनको पूजता है, पर कथित शिखर पुरुष अपनी आने वाली पीढ़ियों को अपनी सत्ता विरासत में सौंपने के लिये समाज में फूट डालते हैं। जो जातीय विकास की बात करते हैं वह महान अज्ञानी है। उनको इस बात का आभास नहीं है कि यहां तो लोग केवल ईश्वर में विश्वास करते हैं और जातीय समूहों से बंधे रहना उनकी केवल सीमीत आवश्यकताओं की वजह से है।
जात पात पर गुरुग्रंथ साहिब में प्रभावपूर्ण उल्लेख मिलता है
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जाति का गरबु न करि मूरख गवारा।
इस गरब ते चलहि बहुतु विकारा।।
"
गुरुवाणी में मनुष्यों को संबोधित करते हुए कहा गया है कि ‘हे मूर्ख जाति पर गर्व न कर, इसके चलते बहुत सारे विकार पैदा होते हैं।"
‘हमरी जाति पाति गुरु सतिगुरु’
  "
गुरुग्रंथ साहिब में भारतीय समाज में व्याप्त जाति पाति का विरोध करते हुए कहा गया है कि हमारी जाति पाति तो केवल गुरु सत गुरु है।"
‘भै काहू को देत नहि नहि भै मानत आनि।
कहु नानक सुनि रे मना गिआनी ताहि बखानि।।’
"गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार जो व्यक्ति न किसी को डराता है न स्वयं किसी से डरता है वही ज्ञानी कहलाने योग्य है।"

जातीय समूहों से आम लोगों के बंधे रहने की एक वजह यह है कि यहां सामूहिक हिंसा का प्रायोजन अनेक बार किया जाता है ताकि लोग अकेले होने से डरें। इस समय देश में बहुत कम ऐसे लोग होंगे जो अपने जातीय समुदायों के शिखर पुरुषों से खुश होंगे पर सामूहिक हिंसक घटनाओं की वजह से उनमें भय बना रहता है। आम आदमी में यह भय बनाये रखने के लिये निंरतर प्रयास होते हैं ताकि वह अपने जातीय शिखर पुरुषों की पकड़ में बने रहें ताकि उसका लाभ उससे ऊपर जमे लोगों को मिलता रहे। मुश्किल यह है कि आम आदमी में भी चेतना नहीं है और वह इन प्रयासों का शिकार हो जाता है। इसलिये सभी लोगों को यह समझना चाहिए कि यह जाति पाति बनाये रखकर हम केवल जातीय समुदायों के शिखर पुरुषों की सत्ता बचाते हैं जो दिखाने के लिये हमदर्द बनते हैं वरना वह तो सभी अज्ञानी है। अपने से बड़े से भय खाने और और अपने से छोटे को डराने वाले यह लोग महान अज्ञानी हैं और हमारे अज्ञान की वजह से हमारे सरताज बन जाते है।
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Saturday, October 30, 2010

धार्मिक विचार-मन शरीर और वाणी के दंड धारण करने वाला ही सुखी (dharmik vichar-man,sharir aur vani ke dand)

मनु महाराज के अनुसार 
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त्रिदण्डमेतिन्निक्षप्य सर्वभूतेषु मानवः।
कामक्रोधी तु संयभ्य ततः सिद्धिं नियच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य सभी जीवों के साथ मन, शरीर वह वाणी तीनों प्रकार के दंडों का पालन करते हुए व्यवहार करता है वह किसी को पीड़ा नहीं देता। उसका काम व क्रोध के साथ ही अपने आचरण पर भी संयम रहता है जिसके कारण वह सिद्ध कहलाता है।

वाग्उण्डोऽडःकायादण्डस्तथैव च।
वसयैते निहिता बुद्धौ त्रिडण्डीति स उच्यते
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य सोच विचार कर वाणी का प्रयोग करते हुए देह और मन पर अपना नियंत्रण बनाये रखते हैं उसे त्रिदंडी कह जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने कर्मों से मन, शरीर और वाणी के द्वारा बंधा रहता है। जिस तरह का कोई कर्म करता है वैसा ही उसे परिणाम प्राप्त होता है। सिद्ध व्यक्ति वही है जो दृष्टा की तरह अपने मन, शरीर और वाणी को अभिव्यक्त होते देखता है। इसलिये वह उन पर नियंत्रण करता है। दृष्टा होने के कारण मनुष्य के किसी भी कर्म के प्रति अकर्ता का भाव पैदा होता है जिससे उसके अंतर्मन में विद्यमान अहंकार की भावना प्रायः समाप्त हो जाती है।
ऐसा निरंकार मनुष्य मन, वचन और शरीर से संयम पूर्वक जीवन व्यतीत करता है और इससे न केवल वह अपना बल्कि दूसरे लोगों के जीवन का भी उद्धार करता है। इससे दूसरे लोग भी प्रसन्न होते हैं और उसका सिद्ध की उपाधि प्रदान करते हैं। जिन मनुष्यों के पास तत्व ज्ञान है वह अपने मुख से आत्मप्रचार कर अपने व्यवहार और आचरण से ही अपनी सिद्धि को प्रमाण करते है। जिनको ऐसा सिद्ध बनना है उनको चाहिये कि वह मन, वचन और देह के दंडों पर अभ्यास से नियंत्रण करें। ऐसी सिद्धि योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान से प्राप्त कि जा सकती है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज  कुकरेजा 'भारतदीप',ग्वालियर मध्य प्रदेश
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep' Gwalior Madhya Pradesh
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Saturday, September 25, 2010

श्री गुरुग्रंथ साहिब-जो न डरे न डराये वही ज्ञानी (shri gurugranth sahib-na daren n darayen)

‘भै काहू को देत नहि नहि भै मानत आनि।
कहु नानक सुनि रे मना गिआनी ताहि बखानि।।’
हिन्दी में भावार्थ-
गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार जो व्यक्ति न किसी को डराता है न स्वयं किसी से डरता है वही ज्ञानी कहलाने योग्य है।

जाति का गरबु न करि मूरख गवारा।
इस गरब ते चलहि बहुतु विकारा।।
हिन्दी में भावार्थ-
गुरुवाणी में मनुष्यों को संबोधित करते हुए कहा गया है कि ‘हे मूर्ख जाति पर गर्व न कर, इसके चलते बहुत सारे विकार पैदा होते हैं।
‘हमरी जाति पाति गुरु सतिगुरु’
हिन्दी में भावार्थ-
गुरुग्रंथ साहिब में भारतीय समाज में व्याप्त जाति पाति का विरोध करते हुए कहा गया है कि हमारी जाति पाति तो केवल गुरु सत गुरु है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-प्राचीनकाल में भारत में जाति पाति व्यवस्था थी पर उसकी वजह से समाज में कभी विघटन का वातावरण नहीं बनता था। कालांतर में विदेशी शासकों का आगमन हुआ तो उनके बौद्धिक रणनीतिकारों ने यहां फूट डालने के लिये इस जाति पाति की व्यवस्था को उभारा। इसके बाद मुगलकाल में जब विदेशी विचारधाराओं का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था तब सभी समाज अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिये संगठित होते गये जिसकी वजह से उनमें रूढ़ता का भाव आया और जातीय समुदायों में आपसी वैमनस्य बढ़ा जिसकी वजह से मुगलकाल लंबे समय तक भारत में जमा रहा। अंग्रेजों के समय तो फूट डालो राज करो की स्पष्ट नीति बनी और बाद में उनके अनुज देसी वंशज इसी राह पर चले। यही कारण है कि देश में शिक्षा बढ़ने के साथ ही जाति पाति का भाव भी तेजी से बढ़ा है। जातीय समुदायों की आपसी लड़ाई का लाभ उठाकर अनेक लोग आर्थिक, सामजिक तथा धार्मिक शिखरों पर पहुंच जाते है। यह लोग बात तो जाति पाति मिटाने की करते हैं पर इसके साथ ही कथित रूप से जातियों के विकास की बात कर आपसी वैमनस्य भी बढ़ाते है।
भारत भूमि सदैव अध्यात्म ज्ञान की पोषक रही है। हर जाति में यहां महापुरुष हुए हैं और समाज उनको पूजता है, पर कथित शिखर पुरुष अपनी आने वाली पीढ़ियों को अपनी सत्ता विरासत में सौंपने के लिये समाज में फूट डालते हैं। जो जातीय विकास की बात करते हैं वह महान अज्ञानी है। उनको इस बात का आभास नहीं है कि यहां तो लोग केवल ईश्वर में विश्वास करते हैं और जातीय समूहों से बंधे रहना उनकी केवल सीमीत आवश्यकताओं की वजह से है।
जातीय समूहों से आम लोगों के बंधे रहने की एक वजह यह है कि यहां सामूहिक हिंसा का प्रायोजन अनेक बार किया जाता है ताकि लोग अकेले होने से डरें। इस समय देश में बहुत कम ऐसे लोग होंगे जो अपने जातीय समुदायों के शिखर पुरुषों से खुश होंगे पर सामूहिक हिंसक घटनाओं की वजह से उनमें भय बना रहता है। आम आदमी में यह भय बनाये रखने के लिये निंरतर प्रयास होते हैं ताकि वह अपने जातीय शिखर पुरुषों की पकड़ में बने रहें ताकि उसका लाभ उससे ऊपर जमे लोगों को मिलता रहे। मुश्किल यह है कि आम आदमी में भी चेतना नहीं है और वह इन प्रयासों का शिकार हो जाता है। इसलिये सभी लोगों को यह समझना चाहिए कि यह जाति पाति बनाये रखकर हम केवल जातीय समुदायों के शिखर पुरुषों की सत्ता बचाते हैं जो दिखाने के लिये हमदर्द बनते हैं वरना वह तो सभी अज्ञानी है। अपने से बड़े से भय खाने और और अपने से छोटे को डराने वाले यह लोग महान अज्ञानी हैं और हमारे अज्ञान की वजह से हमारे सरताज बन जाते है। अत: न किसी से डरना चाहिए न ही किसी को डरना चाहिए।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप', Gwalior
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Tuesday, September 21, 2010

पतंजलि योग विज्ञान-मनुष्य चित्त सहकारिता के भाव वाला (patanjali yoga vigyan-manushya chita aur sahakarita ka bhav)

तदंसख्येयवासनाभिश्चिन्नमपि परार्थ संहृत्यकारित्वात।
हिन्दी में भावार्थ-
वह चित्त असंख्येय वासनाओं से चित्रित होने पर भी दूसरे के लिए है क्योंकि वह सहकारिता के भाव से काम करने वाला है।

द्रष्टृदृश्यघोपरक्तं चितं सर्वार्थम्
हिन्दी में भावार्थ-
द्रष्टा और दृश्य-इन दो रंगों से रंगा चित्त सभी अर्थवाला हो जाता है।
विशेषंषर्शिन आत्मभावभावनविनिवृत्तिः।।
हिन्दी में भावार्थ-चित्त और आत्मा के भेद को प्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष करने वाले योगी की आत्माभावविषयक भावना सर्वथा निवृत्त हो जाती है।
तदा विवेनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्।
हिन्दी में भावार्थ-
उस समय चित्त विवेक की तरफ झुककर कैवल्य के अभिमुख हो जाता है।
तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्राणि संसकारेभ्यंः।
हिन्दी में भावार्थ-
उसके अंतराल में दूसरे पदार्थों का ज्ञान पूर्वसंस्कारों से होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-महर्षि पतंजलि का योग सूत्र संस्कृत में है और उसके हिन्दी अनुवाद का अर्थ इतना किल्ष्ट होता है कि सीधी भाषा में बहुत कम विद्वान उसकी व्याख्या कर पाते हैं। हम यहां सीधी सादी भाषा में कहें तो हमारा चित्त या बुद्धि इस देह के कारण है और उसे आत्मा समझना अज्ञान का प्रमाण है। हमारे मन और बुद्धि में विचारों का क्रम आता जाता है जो केवल सांसरिक विषयों से संबंधित होता है। अध्यात्मिक विषयों के लिये हमें अपने अंदर संकल्प धारण करना पड़ता है और जब हम आत्मा और मन का अंतर समझ लेंगे तो दृष्टा की तरह जीने का आनंद ले पायेंगे।
एक तो संसार का दृश्य है और दूसरा वह दृष्टा आत्मा है जिसके बीच में यह देह स्थित है। पंच तत्वों से बनी इस देह की मन, बुद्धि तथा अहंकार की प्रकृतियों को अहंता, ममता और वासना की भावनायें बांधे रहती हैं। हम दृष्टा हैं पर कर्तापन का अहंकार कभी यह बात समझने नहीं देता। तत्वज्ञान के अभाव मनुष्य को दूसरा चतुर मायावी मनुष्य चाहे जब जहां हांक कर ले जाता है। इस संसार दो प्रकार के मनुष्य है एक वह जो शासक हैं दूसरे जो शासित हैं। निश्चित रूप से शासक चतुर मायावी मनुष्यों की संख्या कम और शासित होने वाले लोगों की संख्या अधिक है पर अगर तत्वज्ञान को जो समझ लें तो वह न तो शासक बनता है न शासित। योगी बनकर अपना जीवन आंनद से व्यतीत करता है।
एक बात दूसरी यह भी है इस विश्व में मनुष्य मन के चलने के दो ही मार्ग हैं-सहज योग और असहज योग। योग तो हर मनुष्य कर रहा है पर जो बिना ज्ञान के चलते हैं वह सांसरिक विषयों में चक्कर में अपना जीवन तबाह कर लेते हैं और जो ज्ञानी हैं वह उसे संवारते रहते हुए सुख अनुभव करते हैं। अतः आत्मा और चित्त का भेद समझना जरूरी है।
दूसरी बात हम समाधि या ध्यान के विषय में यह भी समझ लें कि जब हम उसमें लीन होने का प्रयास करते हैं तब हमारे अंदर विषयों का घेर आने लगता है। उनसे विचलित नहीं होना चाहिए क्योंकि यह उन विषयों से उत्पन्न विकार हैं जो उस समय भस्म होने आते हैं। जब वह पूरी तरह से भस्म होते हैं तब ध्यान आसानी से लग जाता है। ध्यान से जो मन को शांति मिलती है उससे बुद्धि में तीक्ष्णता आती है और प्रसन्न हो जाता है। इसलिए ही हमारे अध्यात्मा में ध्यान का महत्व प्रतिपादित किया गया है।
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Saturday, September 11, 2010

हिन्दू धर्म संदेश-मानसिक विकार दूर करने के लिये प्राणायाम आवश्यक (hindu dharma sandesh-pranaya aur mansik vikar)

मनु स्मृति के अनुसार 
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दह्यान्ते ध्यायमानानां धालूनां हि यथा भलाः।
तथेन्द्रियाणां दह्यान्ते दोषाः प्राणस्य निग्राहत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
अग्नि में सोना चादी, तथा अन्य धातुऐं डालने से जिस प्रकार उनकी अशुद्धता दूर होती है उसी प्राणायाम करने से इंद्रियों के सारे पाप तथा विकार नष्ट होते हैं।
प्राणायमाः ब्राहम्ण त्रयोऽपि विधिवत्कृताः।
व्याहृति प्रणवैर्युक्ताः विज्ञेयं परमं तपः।।
हिन्दी में भावार्थ-
किसी साधक द्वारा ओऽम तथा व्याहृति के साथ विधि के अनुसार किए गए तीन प्राणायामों को भी उसका तप ही मानना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय योग दर्शन की आजकल चारों तरफ चर्चा है। दरअसल योग विज्ञान अपने आप ही मनुष्य को स्वयं से जोड़ता है। आजकल सिकुड़ रहे समाज में हर मनुष्य अकेला है और उसमें आत्म विश्वास का अभाव है। अगर मनुष्य योग विज्ञान का अभ्यास करे तो वह इस बात को अनुभव कर सकता है कि वह स्वयं ही अपना पूरक है और उसे बाहर से किसी अन्य की सहायत की आवश्यकता नहीं है। विश्व में आर्थिक उदारीकरण तथा औद्योगिकीरण के कारण प्राकृतिक पर्यावरण बिगड़ने के कारण मनुष्य की मनस्थिति भी बिगड़ी है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में मनोरोगियों की संख्या 40 प्रतिशत से अधिक है। कई लोगों को तो यह आभास ही नहीं है कि वह मनोरोगी है। हममें से भी अनेक लोगों को दूसरे के मनोरोगी होने का अहसास नहीं होता क्योंकि स्वयं हमें अपने बारे में ही इसका ज्ञान नहीं है। इसके अलावा कंप्यूटर, मोबाईल तथा पेट्रोल चालित वाहनों के उपयोग से हमारे शरीर के स्वास्थ्य पर जो बुरा असर पड़ने से दिमागी संतुलन बिगड़ता है यह तो सभी जानते हैं। इधर हम यह भी देख सकते हैं कि चिकित्सालयों में मरीजों की भीड़ लगी रहती है। कहने का अभिप्राय यह है कि आधुनिक साधनों की उपलब्धता ने रोग बढ़ाये हैं पर उसका इलाज हमारे पास नहीं है।
इधर हम यह भी देख सकते हैं कि विश्व में भारतीय योग साधना का प्रचार बढ़ रहा है। इसका कारण यह है कि योगासन तथा प्राणायाम से शरीर के विकार निकल जाते हैं। सच बात तो यह है कि प्राणायाम के मुकाबले इस धरती पर किसी भी रोग का कोई इलाज नहीं है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि प्राणायाम करने पर यह आभास हो जाता है कि इस धरती पर तो किसी रोग की कोई दवा ही नहीं है क्योंकि प्राणायाम करने से जो तन और मन में स्फूर्ति आती है उसका अभ्यास करने पर ही पता चलता है। अतः तीक्ष्ण बुद्धि तथा शारीरिक बल बनाये रखने के लिये प्राणायाम करना एक अनिवार्य आवश्यकता है। कम से कम आज विषैले वातावरण का सामना करने के लिये इससे बेहतर और कोई साधन नज़र नहीं आता।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप', ग्वालियर 
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Friday, August 27, 2010

श्री गुरुग्रंथ साहिब से-दहेज प्रथा केवल एक आडम्बर है (dowry sistem in india is not good)

‘हरि प्रभ मेरे बाबुला, हरि देवहु दान में दाजो।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब में दहेज प्रथा का आलोचना करते हुए कहा गया है कि वह पुत्रियां प्रशंसनीय हैं जो दहेज में अपने पिता से हरि के नाम का दान मांगती हैं।
होर मनमुख दाज जि रखि दिखलाहि,सु कूड़ि अहंकार कच पाजो
श्री गुरू ग्रन्थ साहिब के अनुसार लड़की के विवाह में  ऐसा दहेज दिया जाना चाहिए जिससे मन का सुख मिले और जो सभी को दिखलाया जा सके। ऐसा दहेज देने से क्या लाभ जिससे अहंकार और आडम्बर ही दिखाई दे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दहेज हमारे समाज की सबसे बड़ी बुराई है। चाहे कोई भी समाज हो वह इस प्रथा से मुक्त नहीं है। अक्सर हम दावा करते हैं कि हमारे यहां सभी धर्मों का सम्मान होता है और हमारे देश के लोगों का यह गुण है कि वह विचारधारा को अपने यहां समाहित कर लेते हैं। इस बात पर केवल इसलिये ही यकीन किया जाता है क्योंकि यह लड़की वालों से दहेज वसूलने की प्रथा उन धर्म के लोगों में भी बनी रहती है जो विदेश में निर्मित हुए और दहेज लेने देने की बात उनकी रीति का हिस्सा नहीं है। कहने का आशय यह है कि दहेज लेने और देने को हम यह मानते हैं कि यह ऐसे संस्कार हैं जो हमारी पहचान हैं  मिटने नहीं चाहिए।  कोई भी धर्म या  समाज हो  कथित रूप से इसी पर इतराता है।
इस प्रथा के दुष्परिणामों पर बहुत कम लोग विचार करते हैं। इतना ही नहीं आधुनिक अर्थशास्त्र की भी इस पर नज़र नहीं है क्योंकि यह दहेज प्रथा हमारे यहां भ्रष्टाचार और बेईमानी का कारण है और इस तथ्य पर कोई भी नहीं देख पाता। अधिकतर लोग अपनी बेटियों की शादी अच्छे घर में करने के लिये ढेर सारा दहेज देते हैं इसलिये उसके संग्रह की चिंता उनको नैतिकता और ईमानदारी के पथ से विचलित कर देती है। केवल दहेज देने की चिंता ही नहीं लेने की चिंता में भी आदमी अपने घर पर धन संग्रह करता है ताकि उसकी धन संपदा देखकर बेटे की शादी में अच्छा दहेज मिले। यह दहेज प्रथा हमारी अध्यात्मिक विरासत की सबसे बड़ी शत्रु हैं और इससे बचना चाहिये। यह अलग बात है कि अध्यात्मिक, धर्म और समाज सेवा के शिखर पुरुष ही अपने बेटे बेटियों की शादी कर समाज को चिढ़ाते हैं। सच बात तो यह है कि यह पर्थ हमारे समाज के अस्तित्व पर संकर खड़ा किये हुए है और अगर यह ख़त्म नहीं हुए तो एक दिन यह समाज भी कह्तं हो जाएगा।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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Saturday, August 14, 2010

हिन्दू धर्म संदेश-मूढ़ लोग बिना बुलाये मेहमान बनते हैं(bin bulaye mehman hote moorkh-hindu dharma sandesh)

अनाहूत प्रविशति अपुष्ठो बहु भाषते।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः।।
हिन्दी में भावार्थ-
मूढ़ चित्तवाला अधर्मी मनुष्य बिना आमंत्रण के ही कहीं भी पहुंच जाता है। बिना कहे ही बोलने लगता है तथा ऐसे लोग पर विश्वास करता है जो अविश्वसनीय होते हैं।
अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं देष्टि हिनस्ति च।
कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य शत्रु को मित्र बनाता है और मित्र से ही द्वेष कर उसे कष्ट देता है वह सदैव ही बुरे कर्म में लिप्त रहता है। ऐसे मनुष्य को मूढ़ कहा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने आसपास चल रहे वातावरण का थोड़ा ध्यान से अवलोकन करें तो लोग मानसिक तनावों से इस कदर ग्रसित लगते हैं कि वह अपने हितैषी और शत्रु की पहचान नहीं कर पाते। स्थिति यह होती है कि अनेक लोग अपने मित्रों और हितैषियों को ही अपना शत्रु बनाकर संकट बुलाते हैं। ऐसे लोगों की गल्तियों से ही सीखना चाहिये।
कहा जाता है चतुर लोग अपने पत्ते आसानी से नहीं खोलते और न ही अपनी चाल चलने से पहले किसी को उसका पूर्वाभास होने देते हैं। सच तो यह है कि अधिकतर लोग जीवन में इसलिये नाकाम होते हैं क्योंकि वह अपने रहस्य दूसरों के सामने खोल देने के अलावा गैरों की बात पर आकर अपने ही लोगों पर अविश्वास करने लगते हैं। विदुर महाराज ऐसे लोगों को मूढ़ मानते हैं।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि यह संसार एक रंगमंच है और हर प्राणी यहां अभिनय करता है। ऐसे गूढ़ संदेशों का मनन करते रहना चाहिये ताकि वह दिमाग में स्थापित हो सकें। फूट डालो राज करो केवल अंग्रेजों की नीति नहीं है बल्कि हर सामान्य सांसरिक व्यक्ति यही करता है। किसी को अपना बनाकर उसका शोषण करने के लिये पहले उसे आत्मीयजनों और मित्र से अलग करने के लिये उसे भड़काया जाता है। यह समझाया जाता है कि उसके आत्मीय जन और मित्र तो गद्दार हैं। अगर कोई नया मित्र या कम परिचित ऐसा करता है तो यह समझ लेना चाहिये कि वह कोई चाल खेल रहा है। अगर ऐसा नहीं करते तो आप मूढ़ ही कहलायेंगे।
दूसरों के कहने में आकर निर्णय लेना या उसकी बताई राह पर चलना मूर्खत है। इसलिये किसी की बात सुनकर तत्काल न तो निर्णय लें और न ही अपनों के प्रति द्वेष पालकर उन्हें दूर होनेे दें। इसके अलावा कहीं भी बिना बुलाय न जायें और न ही बिना किसी की इच्छा के उसके सामने अपना ज्ञान बघारें। इसी में ही चतुराई है।
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