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Sunday, December 29, 2013

अपने पाप की स्वीकृति कर मुक्ति पायें-मनुस्मृति के आधार चिंत्तन लेख(apne paap ki swikriti ka mukti paayen-manu smriti ke aadhan par chinntan



            जिनकी प्रवृत्ति अपराधिक है उनसे तो यह भी अपेक्षा की ही नहीं जा सकती कि पर कभी कभी सामान्य मनुष्य भी अपराध कर बैठत है और फिर परेशान होता है। इससे बचने का एक ही उपाय है अपने अपराध की सार्वजनिक रूप से हृदय से स्वीकृत्ति की जाये। यह बात सामान्य मनुष्य के लिये कही जा रही है जो जघन्य अपराध नहीं करते वरन् ऐसे कर्म कर बैठते हैं जो नैतिक रूप से अनुचित होते हैं। झूठ बोलना, परनिंदा तथा धोखा देने जैसे पाप शायद ही कोई ऐसा सामान्य मनुष्य हो जो कभी नहीं करता है। फिर उसे पीड़ा भी बहुत होती है। अनेक लोग तो ऐसे है जिन्हें कर्म करते समय उसके पापपूर्ण होने का अहसास नहीं होता पर बाद में वह पछताते हैं पर वह उसके प्रायश्चित का उपाय नहीं करते। 
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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ख्यायनेनानुतायेन तपसाऽध्ययनेन च।

पापकृन्मुच्यते पापतथा दानेन चापदि।।

            हिन्दी में भावार्थ-पापी व्यक्ति अपने दुष्कर्म का सत्य लोगों को बताकर, पश्चाताप कर, तप तथा स्वाध्याय कर मुक्ति पा सकता है। संकट की घड़ी में तप तथा स्वध्याय न करे तो दान करने से भी वह शुद्ध हो जाता है।

यथा यथा नरोऽधर्म स्वयं कृत्याऽनुभाषते।

तथा तथा त्वचेवाहिस्तेनाधर्मेण मुच्यते।।

            हिन्दी में भावार्थ-अपने अपराध की स्वीकृति दूसरों के सामने करने पर आदमी पाप से मुक्त हो जाता है।
            अनेक भावुक लोग तो छोटी गलती कर ही मन ही मन पछताते हैं। इतना कि अपना पूरा जीवन ही तनावपूर्ण बना डालते हैं। इससे बचने का एक उपाय है तो यह है कि किसी दूसरे के सामने अतिशीघ्र अपनी गलती का बखान कर मन हलका करें अथवा हृदय में पछतावा करने के साथ ही यह बात भी तय करना चाहिये कि ऐसी गलती दोबारा नहीं करनी है।  दूसरा यह कि कहीं ध्यान लगाकर परमात्मा का स्मरण कर उसे अपनी गलती समर्पित करें अथवा धार्मिक ग्रंथ का अध्ययन कर अपना मन मजबूत करें। इसका अवसर न मिले तो फिर किसी सुपात्र को कोई वस्तु या धन देकर मन की शुद्धि करें।


संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Tuesday, December 24, 2013

तुलसी दास दर्शन-रसों में अमृत और विष की पहचान करने वाला ही सच्चा रसिक(tulsidas darshan-rason mein amrit aur vish ki pahachan karne wala hi sachcha rasik-tulsidas darsha)



            पूरे विश्व में उपभोग संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है। धार्मिक गुरु तथा समाज चिंत्तक भले ही अपने समाजों के सांस्कृतिक, धार्मिक तथा श्रेष्ठ होने का दावा भले करें पर सच यह है कि अध्यात्मिक दृष्टि से लोगों की चेतना का एक तरह से हरण हो गया है।  स्थिति यह हो गयाी है कि विषयों में  अधिक लोग इस तरह लिप्त हो गये हैं कि उनकी वजह से जो दैहिक, मानसिक तथा शारीरिक विकार पैदा हो रहे हैं उनका आंकलन कोई नहीं कर रहा।  अनेक लोगों के पास ढेर सारा धन है पर उनका पाचन क्रिया तंत्र ध्वस्त हो गया है।  महंगी दवाईयां उनकी सहायक बन रही हैं। दूसरी बात यह है कि जिसके पास धन है वह स्वतः कभी किसी अभियान पर दैहिक तथा मानसिक बीमारी के कारण समाज का सहयोग नहीं कर सकता। उसके पास देने के लिये बस धन होता है। जहां समाज को शारीरिक तथा मानसिक सहायता की आवश्यकता होती है वह मध्यम तथा निम्न वर्ग का आदमी ही काम आ सकता है।
            अनेक लोग धन के मद में ऐसे वस्त्र पहनते हैं जो उनकी छवि के अनुरूप नहीं होते। उसी तरह औषधियों का निरंतर सेवन करने से  उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता का हृास हो जाता है। यहां तक कि अनेक लोगों को सामान्य जल भी बैरी हो जाता है। अनेक बीमारियों में चिकित्सक कम पानी पीने की सलाह देते हैं।  अधिक दवाईयों का सेवन भी उनके लिये एक तरह से दुर्योग बन जाता है।    
संत तुलसीदास कहते हैं कि
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ग्रह भेषज जल पवन पट, पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग, लखहिं सुलच्छन लोग।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-ग्रह, वेशभूषा, पानी, वायु तथा औषधि समय अनुसार दुर्योग तथा संयोग बनाते हैं।
जो जो जेहि जेहि रस मगन, तहं सो मुदित मन मानि
रसगुन दोष बिचारियो, रसिक रीति पहिचानि।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार संसार के विषयों के रस में मग्न रहता है। उसे उसके रस के दोषों के प्रभाव को नहीं जानते। इसके विपरीत ज्ञानी लोग रसों के गुण दोष को पहचानते हुए ही आनंद उठाते है। एक तरह से ज्ञानी ही सच्चे रसिक होते हैं।
            जिन लोगों की भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में रुचि है वह जानते हैं कि हर विषय के उपभोग की सीमा होती है।  अति हमेंशा वर्जित मानी जाती है। योग और ज्ञान साधना का नियमित अभ्यास करने वाले जानते हैं कि सांसरिक विषयों में जब अमृत का आभास होता है तो बाद में परिवर्तित होकर विष बन जाते हैं जिसे योग तथा ज्ञान साधना से ही नष्ट किया जा सकता है। यही कारण है कि जब विश्व में उपभोग संस्कृति से जो दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक विकारों का प्रभाव बढ़ा है तब भारतीय योग साधना तथा श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की चर्चा हो रही है क्योंकि अमृत से विष बने सांसरिक विषयों के रस को जला देने की कला इन्हीं में वर्णित है।


संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, October 12, 2013

इस संसार में कमाना सबसे सरल काम लगता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(is sansar mein kamana sabse saral kam lagta hai-hindi chinntan lekh,hindi thouhgt article)



                        इस संसार में मनुष्य के लिये हाथों से प्रत्यक्ष रूप में धनार्जन, आंख से सुंदर दृश्य का दर्शन, मुख से भोजन, जिव्हा से वाचन और कान से मधुर स्वर का श्रवण करना सरल काम है।  इन्हें कोई भी कर सकता है। हमारी इंद्रियों को हमेशा ही बाह्य विषय आकर्षित करते हैं पर अंततः थका भी देते हैं। सांसरिक विषयों से परे होने के बाद  ज्ञान साधना करने पर इन इंद्रियों और विषयों का संयोग  वास्तविक रूप से समझ मेें आता है।  अगर हम बाह्य विषयों की बात करें तो उनके साथ संबंध हमेशा ही विष का निर्माण करता है और जब तक हम उसका विसर्जन न करें तब तक मन परेशान रहता है। जिस तरह हम पेट में भोजन तथा पानी उदरस्थ करते हैं पर वह अंततः निष्कासन द्वारों से गंदा होकर ही निकलता है। उसी तरह अन्य विषयों का भी यही हाल है। हम सुंदर दृश्य देखते हैं पर थक जाते हैं। फिर विराम के बाद वही दृश्य जब दोबारा नहीं दिखता तब निराशा होती है। उसी तरह कोयल का मधुर स्वर सुनने की आदत होने पर जब वह नहीं सुनाई देता तब कान खालीपन का अनुभव करते हैं।  उसी तरह जब हमें हाथों से प्रत्यक्ष धन कमाने का अभ्यास हो जाता है तब सेवानिवृत्ति या व्यवसाय से प्रथक होने पर फिर कहीं दूसरी जगह धन कमाने की इच्छा होती है।
                        यह इच्छायें मनुष्य की देह को जिंदा रखती हैं पर उसकी आत्मा को मरने के लिये विवश भी करती है।  सबसे सरल लगने वाले यह काम हमेशा ही कठिनाई में डाले रहते हैं।  योग साधना, ध्यान, मंत्रजाप तथा एकांत में मौन बैठकर चिंत्तन करने वाले काम अत्यंत कठिन लगते हैं पर उनसे जो अमृत पैदा होता है उसकी अनुभूति करने वाले बहुत कम लोग दिखते हैं। सच तो यह है कि हाथ से कमाने की अपेक्षा त्याग करना, आंख को खोलकर हमेशा ही बाह्य दृश्य देखने की अपेक्षा ध्यान लगाना, मुख से भोजन में स्वाद का त्याग, कान से अपने अंदर की सुनना, और जीभ से बोलने की अपेक्षा मौन रहना अत्यंत दुष्कर लगता है पर सच यही है कि मनुष्य में उस अध्यात्मिक शक्ति का निर्माण इन्हीं कठिन कामों से होता है जो जीवन को कलात्मक रूप से रहने का अनुभव देती है।
                        अक्सर हमारे अनेक कथित गुरु विषयों का त्याग करने की बात करते हैं पर इसका आशय वह स्वयं ही नहीं जानते। सच तो यह है कि उन्होंने स्वयं ही विषयों का त्याग नहीं किया होता क्योंकि मनुष्य देह के रहते यह संभव नहीं है।  देह के साथ इंद्रियां हैं तो बाह्य विषयों से संपर्क किये बिना उनका प्रसन्न रहना संभव नही है।  इंद्रियों अपना काम करती हैं तो करने दीजिये पर विषयों में मन को लिप्त नहीं करना चाहिये। हाथ से काम करने पर मिलने वाले धन के रूप में लाभ को फल नहीं कहा जा सकता बल्कि वह तो कर्म का ही विस्तार है।  आप कहीं से धन लेकर अपने पास नहीं रखते बल्कि उसे अपने अन्य सांसरिक कर्मों पर व्यय करते हैं।
                        एक सज्जन ने एक ज्ञानी व्यक्ति से कहा-‘‘जब तुम ज्ञान की बात करते हो तो यह बताओ यह नौकरी क्यों करते हो? तुम्हें निष्काम  कैसे कहा जा सकता है क्योंकि तुम इसका वेतन पाते हों?’’
                        उस ज्ञानी ने जवाब दिया कि-‘‘यह वेतन लेना एक तरह से कर्म ही है। हाथ से धन लेकर मुझे यह कहीं दूसरी जगह खर्च करना है।  अपनी देह के साथ ही अपने परिवार का भी पालन पोषण करना है।  यह वेतन मेरे मन को प्रसन्नता नहीं देता बल्कि यह कर्म की बाध्यता है कि इसे लेकर में दूसरा कर्म करूं। पेट पालन फल नहीं होता वरन् यह दायित्व है ताकि में अपनी देह से भक्ति के साथ ही ज्ञानार्जन कर सकूं।’’
                        संसार में रहते हुए अनेक पारिवारिक समस्याओं से हमें जूझना होता है। उनकी निपटने पर हम यह सोचकर प्रसन्न होते हैं कि हमने फल पा लिया तो यह अज्ञान का प्रमाण है। पैसा पाया तो वह खर्च करेंगे या बैंक खाते जमा कर देंगे। हमारे खाते में रकम चमकती दिखेगी पर बैंक दूसरों को ऋण देकर उन्हें कृतार्थ करेगा।  बेटे की शादी पर नाचते हैं पर बाद में पता चलता है कि वह तो बहु का होकर रह गया।  तब चिढ़ते हैं पर यह भूल जाते हैं कि विवाह स्त्री पुरुष का नया जन्म होता है और प्राकृत्तिक रूप से दोनों एक दूसरे के निकट आते हैं तब पुराने जन्म के रिश्ते उन्हें निभाने का अवसर उनके पास नहीं रह जाता।  बेटी की शादी होने पर उसे सुयोग्य वर मिला यह देखकर हम समझते हैं कि हमारा जीवन धंन्य हो गया। यह भूल गये कि अब वह परायी हो गयी और उसे अब अपनी गृहस्थी देखनी होगी। आजकल तो सीमित संतान का समय है इसलिये लोगों को अपने बच्चों के विवाह आदि की प्रसन्नता क्षणिक ही रह पाती है।  कुछ समय बाद पता लगता है कि परिवार की जिम्मेदारी पूरी करने वाले दंपत्ति को बाकी जीवन अकेले ही बिताना होगा। हम शहरी समाज में ऐसे अनेक दंपत्ति देख सकते हैं जो अकेले हो गये हैं।
                        ऐसे में अध्यात्मिक ज्ञान होने वाले लोग ही अपने जीवन में सहजता अनुभव कर सकते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान होने पर एक ही व्यक्ति दो और दो चार हो जाते हैं।  आत्मा और मन दो तत्व इस देह  का भाग हैं।  अगर मन अकेला उपयोग करता है तो वह थक जाता है और अगर आत्मा इसमें साथ देती है तो दोनों साथी हो जाते हैं।  योग साधना, ध्यान, मंत्र जाप तथा प्रातःकाल सैर करने वाले लोगों के चेहरे पर कभी ऐसे तनाव नहीं दिखते जो आलस्य के साथ जीवन बिताने वालों पर दिखते हैं।  इस जीवन की सार्थकता समझने वाले कभी अपना समय फालतु बातों में नष्ट नहीं करते वरन् प्रतिदिन उनका जन्म तथा मोक्ष होता है। योग साधना से जब आत्मा का इंद्रियों से संपर्क होता है तो वह शक्तिशाली हो जाती हैं और उन्हें विषयों के सहज तथा असहज रूप का आभास हो जाता है।                       

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, September 07, 2013

धर्म के नाम पर चतुराई करने वाले अधम-हिन्दी चिंत्तन लेख(dharma ke naam par chaturae karne wale adham-hindi chinttan lekh)



        हमारे देश में ज्योतिष, काला जादू तथा तंत्र मंत्र की आड़ में  लोगों को सांसरिक विषयों में सफलता दिलाने के लिये कथित रूप से अनेक व्यवसायिक धार्मिक ठेकेदार सक्रिय हैं। सच बात तो यह है कि सांसरिक विषयों में लिप्त रहते हुए नैतिक आचरण करना ही धर्म है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि हम अपने महान धर्मभीरु होने का दावा करते हुए गाते फिरें।  दूसरी बात यह कि कथित रूप से जो गुरु या संत सांसरिक विषयों पर बोलते हैं उनको धर्म का प्रवर्तक मानना ही गलत है।  उससे ज्यादा बुरी बात यह है कि खांस वस्त्रों को पहनकर घूमने वाले लोगों को संबंधित धर्म का ज्ञानी मानना एकदम मूर्खता है।  अगर भेड़ की खाल पहनकर भेड़िया शाकाहारी होने का स्वांग करे और  कोई हिरण मान ले तो मूर्ख ही कहा जाता  है। यही स्थिति मनुष्य की है। वह किसी भी कथित धर्म प्रचारक के मुख से अच्छी बातें सुनकर उसे संत या सन्यासी मानने लगता है।  इसी कारण अनेक लोग ज्ञान के व्यवसायिक प्रचारकों को ही गुरु मानने लगते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है वरन् उसे धारण कर जीवन में उतारना ही पूर्ण ज्ञानी होने का प्रमाण होता है।
                        इस बात को अनेक  लोग नहीं समझते और ज्ञान की बातें सुनाने वालों को संत कहने लगते हैं। यही कारण है कि अनेक लोगों ने धर्म के नाम पर हमारे देश में अपना व्यापार चला रखा है।  इन लोगों में धन कमाने की प्रवृत्तियां किसी सामान्य मनुष्य से अधिक खतरनाक ढंग से विद्यमान देखी जाती है। 
मनस्मृति में कहा गया है कि
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अकर्मशीलं च महाशनं च लोकद्विष्टं महुमायं नृशंसम्।
अदेशकालज्ञमनिष्टवेषमेतान् गृहे न प्रतिवासयेत्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-अकर्मण्य, अधिक भोजन करने वाले, सबसे बैर बांधने वाले, मायावी, क्रूर, देशकाल का ज्ञान न रखने वाले, निन्दित वेश धारण वाले मनुष्यों को कभी अपनी घर में नहीं  ठहराये।
संक्लिष्टकर्माणमतिप्रमादं नित्यानृतं चाटृढभक्तिकं च।
विसृष्टरागं पटमानिन्र चाप्येतान् न सेवेत नराधमान् षट्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-क्लेश करने वाला, अत्यंत प्रमादी, झूठ बोलने वाला, अस्थिर भक्ति वाला, स्नेह से रहित तथा अपने को ही चतुर मानने वाला, यह छह प्रकार के लोग अधम माने जाते हैं। इनकी सेवा कतई न करें।
                        कभी कभी तो यह लगता है कि धर्म के नाम पर व्यापार चलाने वाले उतने ही खतरनाक है जितना अफीम बेचने वाले लोग होते हैं।  हमने देखा है कि मादक द्रव्य बेचने में लगे लोग अपने ही स्वाजातीय व्यवसायियों के विरुद्ध हिंसक गतिविधियां करते हैं। ऐसे ही धर्म व्यवसायियों के कारण प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कार्ल मार्क्स से धर्म को अफीम कहा था।  हम उसके कथित अर्थशास्त्र के सिद्धांतों से सहमत हों या न हों पर भारत के संदर्भ में उसका धर्म को अफीम मानने का सिद्धांत एकदम सही लगता है।  अनेक बार तो ऐसा लगता है कि धर्म का व्यापार करने वाले यह लोग अधर्म की राह पर चलते हुए शक्ति, संपत्ति तथा शिष्य संग्रह कर अपनी ताकत इसलिये बढ़ाते हैं ताकि राजकीय संस्थाओं पर प्रभाव जमाया जा सके।  ऐसे लोगों की सेवा करना या उनकी भक्ति में लगे रहने से मन के कलुषित होने का भय रहता है।
                        हमारे यहां कहा भी जाता है कि भक्ति भगवान की करो किसी बंदे को भजना ठीक नहीं है। कथित गुरुओं की व्यवसायिक चालाकियों के चलते अनेक लोग फंस कर भगवान की बजाय अपने कथित गुरुओं  को ही भगवान मानने लगते हैं। जब उनको अपने गुरु की असलियत पता चलती है तो उनके अंदर निराशा और तनाव का ज्वार उठने लगता है। अनेक कथित गुरु अपने सत्संग में चुटकुले और अपनी कल्पित कहानियां सुनाकर हास्य का भाव भी पैदा करते हैं। अपने शिष्य समुदाय को बनाये रखने के लिये अनेक प्रकार के स्वांग भी रचते हैं।  कहना चाहिये कि वह धर्म के नाम पर अभिनय करते हैं। जब पोल खुलती है तब शिष्य अपने को एक अंधेरे कुंऐं में गिरा अनुभव करते हैं।
                        जिन लोगों के अंदर अध्यात्मिक ज्ञान की ललक है उनको गुरु ढूंढने की बजाय अपने ही अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिये।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कोई भोग कभी किसी का उद्धार नहीं कर सकता। यह शक्ति केवल त्यागी भाव के गुरु में ही संभव है जिसकी पहचान यह होती है कि वह जहां खड़ा हो जाये वहीं आश्रम लगने लगे। जब बोले तो लगे कि अमृतवाणी प्रवाहित हो रही है। वह संपत्ति और शिष्य संचय की बजाय सर्वजन हिताय के भाव से समाज में सलंग्न रहता है।   

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Saturday, August 31, 2013

मनु स्मृति-कामनाओं का त्याग करने वाला ही सन्यासी (kamnaon ka tyag karne wala sanyasi-manu smriti)



                        हमारे देश में धर्म के विषय पर कहीं चर्चा हो तो अनेक लोग बातें सुनने और कहने के लिये लालायित हो उठते हैं। हैरानी की बात है कि जितना धर्म के विषय में हमारे पौराणिक ग्रंथों में लिखा गया उससे अधिक अन्यत्र कहीं सामग्री नहीं मिलती।  यही कारण है कि हमारे देश में उससे पढ़कर रटने वाले धर्म संदेशों के प्रचार को एक व्यवसाय बना लेते हैं।  दूसरी बात यह भी है कि हमारे देश में लोगों का व्यवसाय कृषि, लघु एवं कुटीर उद्योग के साथ ही वस्तुओं का विक्रय कर अपना पेट पालना रहा है।  पुराने समय में लोगों को बाज़ार के छोटे होने के कारण  अपने धंधे आदि से फुर्सत अधिक रहती थी और यही कारण है कि उनके हृदय में संसार के विषयों के पश्चात् अज्ञात शक्ति की आराधना करने का समय निकल आता है। इसी कारण उनके अंदर धर्म के प्रति आस्थाओं का जन्म हुआ। सीधी बात कहें तो उनका अध्यात्म उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करता था। संसार की अज्ञात शक्ति के प्रति जिज्ञासा का कथित धर्म प्रचारकों ने खूब लाभ उठाया  औद्योगिक रूप से हमारा देश अभी शैशवकाल में ही है। ऐसे में छोटे शहरों और गांवों में लोगों के पास धर्म के प्रति रुचि अभी भी बरकरार है।  यह अलग बात है कि उनको ज्ञान देने वाले कथित गुरु उनकी जिज्ञासा शांत करने की बजाय अपनी चालाकी से कथायें सुनाकर या भजन गाकर मनोरंजन के माध्यम से उनके मन को प्रसन्न करते हैं। जहां तक ब्रह्मज्ञान का प्रश्न है उसके बारे में भ्रांत धारणाऐं प्रचलित हैं। कौन त्यागी, कौन सन्यासी और कौन तत्वाज्ञानी इसके बारे में आम लोगों अपने अपने गुरुओं के मतानुसार विचार करते हैं। 
         अनेक कथित ब्रह्मज्ञानी तो ऐसे हैं जो केवल संपत्ति संग्रह और शिष्यों के समूह का संचय कर प्रचार में प्रसिद्धि पाते हैं। इतना ही नहीं बाज़ार तथा प्रचार समूहों के लिये जो उपयोगी हैं वह सिद्ध है और जो नहीं है उसे कोई पूछता तक नहीं है। सच बात तो यह है कि त्यागी ही सच्चा सन्यासी होता है।  सन्यास का यह अर्थ कदापि नहीं है कि आदमी अपनी सांसरिक जिम्मेदारी से भागकर गेरुऐ वस्त्र पहन ले। गेरुए वस्त्र पहनकर भी जो कामनायें करता है वह सन्यासी नहीं है। इच्छाओं का त्याग करे वही ब्रह्मज्ञानी है और जो इच्छाओं की पूर्ति में ही लगा रहे उससे तो न ज्ञान लेना चाहिये और न उसे देना चाहिये।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूव एवाभिवर्धते।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह आग में घी डालने से अग्नि प्रज्जवलित होती है उसी तरह एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी स्वतः जाग्रत हो जाती है।
अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते।
धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः।।
                        हिन्दी में भावार्थ-अर्थ और काम में आसक्त लोगों के लिये धर्म का ज्ञान देने का कोई विधान नहीं है। धर्म के विषय में जिज्ञासा रखने वालों के लिये वेद ही सर्वोच्च प्रमाण हैं।
                        भारत में हिन्दू धर्म में साकार तथा निराकार दो प्रकार की भक्ति की धारा प्रचलित है पर अब तो यहां अहंकार की भक्ति की धारा भी बह रही है। अनेक गुरु स्वयं को भगवान का अवतार बताकर लोगों में अपने शिष्य बनाते हैं।  इतना ही नहीं जो उनसे व्यवसायिक लाभ उठाना चाहते हैं या वेतन पाते हैं वह हृदय से अपने स्वामी को भगवान नहीं मानते पर शिष्यों को प्रभावित करने के लिये वह इसी तरह का प्रचार करते हैं। अनेक बार तो ऐसा भी होता है कि धर्म व्यवसाय में लगे लोग एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने का प्रयास करते हुए समाज में वैमनस्य फैलाते नज़र आते हैं।  यह सब देखते हुए धर्म के प्रति जिज्ञासा रखने वाले लोग हमेशा ही ंसशय में रहते हैं।
                        इस संशय के निवारण के लिये लोगों को अपने ही धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते रहना चाहिये।  यही  ग्रंथ धर्म का प्रमाण हैं और अगर इनका ध्यान से अध्ययन किया जाये तो धर्म के साथ ही तत्वज्ञान की अनुभूति स्वतः होने लगती है।  सबसे बड़ी बात यह कि हमारे धर्मग्रंथ मानते हैं कि कामनाओं का त्याग करना ही सन्यास है और ग्रहस्थ होते हुए भी सन्यासी हुआ जा सकता हैं।  अतः भ्रम में आकर किसी को न तो गुरु बनाना चाहिये न गुरु में ईश्वर का रूप देखने की कामना करना चाहिये।

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Saturday, August 24, 2013

यजुर्वेद के आधार पर संदेश-अपने लिये परमात्मा से मित्र दृष्टि मांगें (yajurved ke adhayar par sandessh-parmatma se apne liye mitra drishti mangen)



    हमारे देश में कुछ लोगों को प्रसिद्धि केवल इसलिये मिली है क्योंकि वह भारतीय धर्म ग्रंथों को बेकार का विषय मानते हुए उसके विरुद्ध प्रचार में लगे रहते हैं। इसके साथ ही कुछ लोग भारत में कर्मकांड के नाम पर होने वाली क्रियाओं को अंधविश्वास बताकर उनसे दूर रहने का अभियान चलाकर भी प्रसिद्ध हुए हैं। सच बात तो यह है कि अंग्रेजी पद्धति में सराबोर विद्वानों से यह आशा तो करना भी नहीं चाहिये कि वह भारतीय अध्यात्म ग्रंथों के मिलने वाली सामग्री का अध्ययन करें।  मुख्य बात यह है कि भारतीय धर्म को हिन्दू धर्म कहकर उन्होंने इसे सीमित बना दिया है।  सच बात तो यह है कि धर्म का कोई नाम नहीं होता। अगर हम श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करें तो उसमें कहीं भी हिन्दू धर्म का नाम नहीं दिया गया।  उसका सार यही है कि यदि आचरण में अगर नियम का पालन किया जाये तो वह धर्म है और स्वच्छंद व्यवहार अंततः अधर्म का रूप ले ही लेता है।  दूसरी बात यह भी कि श्रीगीता में कहीं भी अंधविश्वास वाली बात नहीं कही गयी है यह अलग बात है कि उसके विषय में सिद्ध होने का दावा करने वाले पेशेवर प्रवचनकर्ता उसके संदेशों का उपयोग चालाकी से अपने शिष्यों से अपनी सेवा  कराने के लिये उपयोग करते हैं। इसमें खासतौर से गुरुजनों की सेवा वाली बात आती है।  सारे गुरु केवल इसी इर्दगिर्द अपनी शिष्यों को घुमाते रहते हैं।
    उसी तरह वेदों का भी कुछ विद्वान जमकर विरोध करते हैं।  स्थिति यह है कि अनेक लोगों के सामने तो वेदों का नाम लेना भी गलती लगती है।  बहरहाल इस तरह समाज को भारतीय अध्यात्म से परे कर दिया है और इससे लोगों का मन इधर से उधर भटकता है और वह कृत्रिम तत्वों पर विश्वास रखने लगते हैं जिसे हमारे नवीन समाज सुधारक अंधविश्वास कहते हैं। अनेक लोगों ने तो अंधविश्वासों के विरुद्ध अभियान चलाकर नाम कमाया है पर ऐसे लोगों को यह समझ में नहीं आती कि विश्वास में धोखा हो सकता है और होता भी है पर परेशान हाल आदमी का मन जब भटकता है तो वह उसे कहीं भी ले जा सकता है।  हम लोगों से कहें कि इस पर विश्वास मत करो पर इससे पहले उनको यह बताना जरूरी है कि वह किस पर विश्वास करें? कथित अंधविश्वास विरोधी आदमी के मन का विज्ञान नहीं जानते। वह अगर यह मानते हैं कि समाज में कुछ लोग अंधविश्वासी हैं और उन्हेें रोकना जरूरी है र्तो स्वयं ही गलती पर हैं।  उन्हें कथित अंधविश्वास की जगह विश्वास की स्थापना करनी होगी। उसके बिना उनका अंधविश्वास विरोधी अभियान कभी सफल नहीं हो सकता।
यजुर्वेद में  कहा गया है कि
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दृते छंह मा।
ज्योवते संदृशि जीव्यासं ज्योवते सदृशि जीष्यासम्।।
       हिन्दी में भावार्थ-हे समर्थ! मुझे बलवान बनाओ। लोग मुझे तथा में उनको मित्र दृष्टि से देखें।
मनसः कामंमाकृतिं वाचः सत्यमशीप।
      हिन्दी में भावार्थ-मननशील अंतकरण की इच्छा और अभिप्राय जानने के साथ ही सत्य भाषण करूं।
         अगर समाज में जीवन के प्रति विश्वास कायम करना है तो उसे भारतीय अध्यात्म ज्ञान की धारा से जोड़ना ही होगा। यहां तक कि वेदों में जो संदेश आज भी प्रासांगिक हैं उनकी चर्चा सार्वजनिक रूप से करना ही होगी। वेदों में अनेक ऐसे मंत्र हैं जिनका जाप करने से भले ही प्रत्यक्ष लाभ न होता पर उनसे जो मानसिक दृढ़ता आती है उससे सांसरिक विषयों में उपलब्धि अवश्य होती है। अगर मनुष्य आचरण, विचार कार्यशैली में दृढ़ता नहीं होगी तो उसे सफलता नहीं मिल सकती।  वेदों में जो मंत्र हैं उनके जाप से यह संभव है कि मानसिक दृढ़ता आये जिसकी आजकल समाज को बहुत आवश्यकता है।   

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, August 10, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-सार्वजानिक राजनीति में सभी को साथ लेने की नहीं वरन सभी को साधने की जरुरत (economics of kautilya-rajneeti mein sabhi ko saath lekar chalane kee nahin varan sabhi ko sadhne kee jarurat-hindi article on indian politics)



      भारतीय अध्यात्म दर्शन  में न केवल प्रथ्वी के जीवन रहस्य को वर्णन किया गया है कि वरन् उसमें सांसरिक विषयों से पूर्ण सामर्थ्य के साथ ही लिप्त रहने के लिये पठनीय सामग्री भी शामिल है। भारतीय दर्शन मनुष्यों में जाति या भाषा के आधार पर भेद करने की बजाय स्वभाव, कर्म तथा प्रकृति की दृष्टि से उनमें प्रथकता का ज्ञान कराता है। भारतीय अध्यात्म दर्शन यह दावा कभी नहीं  करता कि उसके अध्ययन से सभी मनुष्य देवता हो जायेंगे बल्कि वह इस सत्य की पुष्टि करता है कि मनुष्यों में आसुरी और दैवीय प्रकृतियां वैचारिक  रूप में हमेशा मौजूद रहेगी।  इसके विपरीत भारत के बाहर से आयातित विचारधारायें सभी मनुष्य को फरिश्ता बनाने के दावे का स्वप्न मनुष्य मन में प्रवाहित कर उसे भ्रमित करती हैं।  हमारे देश में राजा की परंपरा समाप्त हो गयी तो उसकी जगह विदेशों से आयातित लोकतांत्रिक व्यवस्था की विचाराधाराओं ने यहां जड़े जमायीं।  हैरानी की बात है कि देश की प्रबंधकीय व्यवस्था का स्तर इतना गिर गया है कि लोग आज राजाओं के साथ ही अंग्रेजों की राज्य व्यवस्था को  याद करते हैं।   तय बात है कि आज के राजनीतिक प्रबंधकों से उनके मन में भारी निराशा व्याप्त है।  इसी निराशा का लाभ शत्रु राष्ट्र उठाकर सीमा पर नित्त नये खतरे पैदा कर रहे हैं।
       दरअसल आधुनिक लोकतंत्र में चुनाव जीत कर ही कोई शासन प्राप्त कर सकता है।  यह भी पांच वर्ष की सीमित अवधि के लिये मिलता है।  फिर चुनाव जीतने के लिये भारी प्रचार का व्यय करने के साथ ही कार्यकर्ताओं को भी पैसा देना पड़ता है। परिणाम यह हुआ है कि भले ही लोग समाज सेवा के लिये चुनावी राजनीति करने का दावा करते हों पर उनके कार्य करने की शैली उनके व्यवसायिक रूप का अनुभव कराती है। स्थिति यह है कि कानून में निर्धारित  राशि से कई गुना खर्च चुनाव जीतने के लिये उम्मीदवार करते हैं।  चुनाव जीतन के बाद राजकीय पद पर बैठने पर भी उनकी व्यक्तिगत चिंतायें कम नहीं होतीं। कहा भी जाता है कि जिसे राजनीति का चस्का लग जाये तो फिर आदमी उसे छोड़ नहीं सकता। तात्कालिक रूप से अपना पद बचाये रखने के साथ ही  अगली बार चुनाव  जीतने का सोच चुनावी राजनीति में सक्रिय लोगों को परेशान किये रहता है। जहां तक प्रजा के लिये व्यवस्था के प्रबंध का प्रश्न है तो वह अंग्रेजों की बनायी लकीर पर फकीर की तरह चल ही रही है।  भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अपने कौशल के अनुसार राज्य चलाते हैं।  वह अपने सिर पर बैठे चुनावी राजनीति से आये शिखर पुरुषों को भी संचालित करते हैं।  राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों को राजाओं जैसी सुविधा मिलती है तो वह प्रशासन तथा प्रबंधकीय स्थानों पर बैठे लोगों की कार्यप्रणाली पर अधिक दृष्टिपात नहीं करते। दिखाने के लिये भले ही वैचारिक द्वंद्व प्रचार माध्यमों में होता है पर मूल व्यवस्था में कभी कोई बदलाव नहीं होता।
    जहां तक राजनीति का प्रश्न है तो उच्च पदों पर पहुंचे लोगों की चाल भी आम आदमी की तरह ही होती है।  जिस तरह आम आदमी अपने राजसी कर्मों के निष्पादन के लिये चिंतित रहता है उसी तरह चुनाव राजनीति में भी केवल चुनाव जीतना ही मुख्य लक्ष्य रह जाता है। चुनाव जीतने के बाद पद मिलते ही अनेक लोग यह भूल जाते हैं कि निज जीवन और सार्वजनिक जीवन की राजनीति में अंतर होता है। राजनीति तो हर आदमी करता है पर सार्वजनिक जीवन की राजनीति करने वालों का समाज में मुख्य दर्जा प्राप्त होता है। प्रजा के धन से ही उनको अनेक सुविधायें मिलती हैं। वह समाज के प्रेरक और आदर्श होते हैं। यह अलग बात है कि चुनावी राजनीति में सक्रिय बहुत कम लोग अपनी सकारात्मक छवि समाज में बना पाते हैं।  राज्य के अंदर की व्यवस्था तो प्रशासकीय अधिकारी करते हैं पर सीमा के प्रश्न पर उनका नजरिया हमेशा ही अस्पष्ट रहता है। इसका मुख्य कारण यह है कि बाह्य विषयों पर  चुनावी राजनीति से पद प्राप्त व्यक्ति ही निर्णायक होता हैै।  ऐसे में जिस देश में राजनेता और प्रशासन में वैचारिक  अंतद्वंद्व हो वह बाहरी संकटों से कठिनाई अनुभव करते हैं।  दूसरी बात यह कि लोकतांत्रिक नेता सैन्य नीतियों पर कोई अधिक राय नहीं रख पाते।  खासतौर से जहां शत्रु राष्ट्र को दंडित करने का प्रश्न है तो लोकतांत्रिक देश के नेता अपनी झिझक दिखाते हैं। युद्ध उनके लिये अप्रिय विषय हो जाता है।  हम पूरे विश्व में जो आतंकवाद का रूप देख रहे हैं वह कहीं न कहीं लोकतांत्रिक नेताओं में युद्ध के प्रति अरुचि का परिणाम है।     
कौटिल्य महाराज अपने अर्थशास्त्र में कहते हैं कि
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अरयोऽपि हि मित्रत्वं यान्ति दण्डोवतो ध्रुवम्।
दण्डप्रायो हि नृपतिर्भुनक्तयाक्रम्य मेदिनीम्।।
          हिन्दी में भावार्थ-दण्डग्रहण करने वाले के शत्रु भी मित्र हो जाते हैं। दण्ड धारण करने वाला राज या राज्य प्रमुख आक्रमण कर इस धरती पर सुख भोग सकता है।
सस्तम्भयति मित्राणि ह्यभित्र नाशयत्यपि।
भूकोषदण्डैर्वृजति प्राणश्वाप्युपकारिताम्।।
       हिन्दी में भावार्थ-अपने मित्रों को स्थिर रखने के साथ ही शत्रुओं को मारने वाले, प्रथ्वी, कोष और दण्डधारक राजा या राज्य प्रमुख की दूसरे लोग अपने प्राण दाव पर लगाकर रक्षा करते हैं।
     परिवार की हो या देश की राजनीति, वही मनुष्य अपने आपको सफल प्रमाणित कर सकता है जो अपने मित्र की रक्षा तथा शत्रु का नाश करने का सामर्थ्य रखता है। मुख्य बात यह है कि जिस तरह पुरुष अपने परिवार की रक्षा के लिये अपने अंदर आक्रामक प्रवृत्ति बनाये रखता है उसी तरह उसे राज्य की रक्षा के लिये भी तत्पर रहना चाहिये।  राज्य प्रमुख चाहे सैन्य क्षमता से सत्ता प्राप्त करे या चुनाव से, राज्य करने के नियम बदल नहीं सकते। भारत में इस समय चारों  तरफ से सीमा पर खतरा व्याप्त है और हम शांतिपूर्ण राष्ट्र होने की दुहाई देते हुए उनसे बचने का मार्ग ढूंढते हैं तो कहंी न कहीं हमारे राजनीति कौशल के अभाव का ज्ञान उससे होता है। जब हमारे पास अपनी एक शक्तिशाली सेना है तब हमें अहिंसा या शांति की बात कम से कम अपनी सुरक्षा को लेकर करना ही नहीं चाहिये। शांति या अहिंसा की बात करना सार्वजनिक जीवन के राजनयिकों का नहीं है वरन यह सामाजिक तथा धार्मिक शीर्ष पुरुषों पर छोड़ देना चाहिये कि वह समाज को ऐसे संदेश दें।  राजकीय विषयों का निष्पादन हमेशा ही मानसिक दृढ़ता से होता है। वहां सभी को साथ लेकर चलने की नीति की बजाय सभी को साधने की नीति अपनानी चाहिये। कम से कम कौटिल्य का अर्थशास्त्र तो यही कहता है।

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Sunday, August 04, 2013

महाराज विदुर ने भी दिया है समाजवाद का संदेश-हिन्दी चिंत्तन (maharaj vidur ne bhee diya hai samajwad ka sandesh-thought of socialism accourding hindu adhyatma)



     कहा जाता है कि हमारा देश दो हजार  वर्ष तक गुलाम रहा।  दरअसल हम इस गुलामी को राजनीतिक गुलामी तक ही सीमित मान सकते हैं। इस गुलामी का मुख्य कारण भारतीय क्षेत्र में राजसी पुरुषों की अज्ञानता को ही जिम्मेदारी माना जा सकता है। हम जब इस संसार की संरचना की बात करें तो इसके दो वह दो विषयों पर आधारित है-एक अध्यात्म तथा दूसरा सांसरिक कार्य।  सांसरिक कार्यों में भौतिकता का बोलबाला रहता है जो कि राजसी वृत्ति से ही किये जाते हैं। इसमें सात्विक प्रवृत्ति के लोग तो सांसरिक विषयों से केवल अपनी देह के पालन तक ही संबंध रखते हैं जबकि तामसी प्रवृत्ति के लोग ज्ञान के अभाव में नकारात्मक विचारों के साथ काम करते हैं। सांसरिक विषयों में प्रवीणता राजसी प्रवृत्ति के लोगों में होती है पर वह भी तब जब वह अपने कर्म की प्रकृत्ति तथा क्रिया की साधना का रूप समझें।  अगर हम दो हजार वर्ष की राजनीतिक गुलामी की बात करें तो इसके लिये देश के राजसी पुरुषों को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
         मुश्किल यह है कि हमारे देश के लोग दिखना तो सात्विक चाहते हैं पर उनका मन लिप्त राजसी विषयों में ही रहता है। फल भी वह राजसी चाहते हैं पर अपनी प्रकृत्ति सात्विक होने का दावा करते हैं। एक बात तय रही कि एक साथ दोनों प्रकृत्तियां मनुष्य में रह नहीं सकती और न ही एक कर्म दोनों प्रकृत्तियों का हो सकता है। राजसी कर्म राजसी विधि से ही होता है और उस समय अपनी मनस्थिति भी वैसी ही रखनी पढ़ती है।  हुआ यह है कि हमारे देश में सात्विक और तामसी प्रवृत्ति के लोगों की ही जमावड़ा रहा है।  सात्विक लोग अपनी देह के पालन तक ही सांसरिक विषयों से संबंध रखते हैं और तामसी प्रवृत्ति के लोग केवल भोग की प्रकृत्ति से कार्य करते हैं। तामसी प्रकृत्ति वाले येन केन प्रकरेण धन समेटकर अपनी तिजोरी तो भरना चाहते हैं पर समाज को देना कुछ नहीं चाहते।  ऐसे राजसी प्रकृत्ति के लोग कम ही होते हैं जो इस हाथ लेना और उस हाथ देना के सिद्धांत पर चलते हैं।

विदुरनीति में कहा गया है कि
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सहायक बन्धना ह्यर्थाः सहायकश्चार्थबन्धनाः।
अन्योन्बन्धनावेती विनान्योन्यं न सिध्यतः।
          हिन्दी में भावार्थ-धन की प्राप्ति के लिये सहायक चाहिये हैं और सहायकों को धन चाहिये।  यह दोनों परस्पर एक दूसरे के आश्रित हैं और आपसी सहायोग से किसी कार्य की सिद्ध हो सकती है।
संक्लिष्टकर्माणमतिप्रमादं नित्यानृतं चाट्ढभक्तिं च।
विसृष्टरागं पटुमानिनं चाप्येतान् न सेवेत नराधमान् षट्।।
       हिन्दी में भावार्थ-क्लेश कर्म, अत्यंत प्रमाद, असत्य भाषण, अस्थिर भक्ति, स्नेह भाव से रहित कार्य तथा अत्यंत चतुराई में लिप्त रहने वाले व्यक्ति की सेवा न करें क्योंकि यह अधम माने जाते हैं।

       राजसी कर्म में लगे इन्ही तामसी प्रवृत्ति के लोगों की वजह से ही देश को राजनीतिक गुलामी झेलना पड़ी हैं।  हमारे देश में अनेक राजा महाराजा हुए  पर बहुत कम ऐसे रहे जिनकी लोकप्रियता जनहित के कामों की वजह से हुई हो।  अधिकतर राजाओं ने अपनी आंतरिक व्यवस्थाओं पर पेशेवर ढंग अपनाने की बजाय परंपरागत प्रणाली अपनाई।  चाटुकारिता, प्रमाद तथा अहंकार के वशीभूत राजाओं ने अपनी व्यवस्था सामंतों और ज़मीदारों के भरोसे छोड़ दी। इन जमीदारों तथा सामंतों ने भी अपने राजाओं का अनुसरण कर जनता की उपेक्षा की। राज्य प्रबंधन करने वाले लोगों का लक्ष्य केवल राजा की रक्षा करना ही रह गया ताकि उनकी श्रेष्ठ स्थिति बनी रहे। यही कारण है कि बाहरी हमलों में प्रजा का एक बहुत बड़ा वर्ग इन राजाओं के साथ नहीं रहा।
       हम आज की स्थिति देखें तो कुछ अलग नहीं लगती। राजसी कर्म में लगे शिखर पुरुष आम जनता को भले ही देशभक्ति का पाठ पढ़ाते हैं पर विदेशी देशों के प्रति आकर्षण भी जनता को दिखाते हैं।  विदेशी विनिवेश तथा तकनीकी को लाकर देश को समृद्ध करने की बात करते हैं। विश्व के राजनीतिक पटल  परं भारतीय राजसी पुरुषों की छवि दृढ मानसिकता वाली नहीं मानी जाती।  तय बात है कि कहीं न कहंी उनके व्यक्तित्व में प्रकृत्ति तथा क्रिया साधना के बीच विरोधाभास दिखाई देता है।  हमारे देश में लोकतंत्र है और वैसे ही लोग जन प्रतिनिधि बनते हैं जैसी जनता होती है।  यकीनन हमारे देश में लोगों भी वैसे ही हैं जैसे कि यहां के राजसी पुरुष।
       मुख्य बात यह है कि जो लोग यह समझते हैं कि उनका काम समाज सेवा या उस पर नियंत्रण करना है उन्हें यह भी देखना चाहिये कि उसके लिये कौनसी क्रिया साधना होना चाहिये? समाज से कुछ लेना है तो उसे कुछ देना भी होगा। इतना ही देते हुए दिखना भी होगा।  अगर उस पर नियंत्रण करना है तो अपनी निश्चय तथा विचार दृढ़ भी रहना होगा। हम यहां यह भी कह सकते हैं कि विदुर महाराज राजनीतिक व्यवस्था के साथ ही समाजवाद के उस सिद्धांत के प्रतिपादक हैं जिसके लिये हमारे देश बुद्धिमान लोग विदेशी महापुरुषों के विचारों की सहायता लेते हैं।

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Thursday, August 01, 2013

संत कबीर दर्शन-ज्ञान पढ़कर सुनाने वाले तीतर की तरह (sant kabir darshan-gyan padhkar sunane wale teetar ki tarah)



      हमारे देश में जैसे जैसे भौतिक समृद्धि के कारण जैसे जैसे विलासिता बढ़ रही है लोगों के शरीर टूट रहे हैं। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है।  आलस्य, विलास तथा प्रमाद के भाव की समाज में प्रधानता हो तो लोगों के मानसिक रूप से समृद्ध होने की कल्पना करना ही निरर्थक है। स्थिति यह है कि लोगों के पास धन और विलासिता के ढेर सारे साधन है पर हार्दिक प्रसन्नता उनसे कोसों दूर रहती है। ऐसे में उनका मन उनको मनोरंजन के लिये इधर उधर दौड़ता है जिसका लाभ भारतीय धार्मिक ग्रंथों के वाचकों ने खूब उठाया है।
           वैसे तो हमारे यहां कथा और सत्संग की परंपरा अत्यंत पुरानी है पर भौतिक युग में पेशेवर धार्मिक वाचकों ने उसे मनोरंजन स्वरूप दे दिया है।  वह स्वयं ज्ञान पढ़कर दूसरों को सुनाते हैं।  मनोरंजन से ऊबे लोग उसे ही अध्यात्म का मार्ग समझते हुए  भीड़ की भेड़  बनकर ऐसे उपदेशकों को अपना गुरु बना लेते हैं।  स्थिति यह है कि लोगों को त्याग, दया और दान की प्रेरणा देने वाले यह उपदेशक अपनी कथाओं के प्रायोजन के लिये सौदेबाजी करते हैं।  यह स्वाभाविक भी है क्योंकि इन उपदेशकों को अपनी कथााओं के लिये अपने साथ ऐसे दल की व्यवस्था करनी होती है जैसे कि नाटक निर्देशक  करते हैं।  अपने साथ संगीत और नृत्य  कलाकार लेकर अपनी कथाओं के पात्रों का मंच पर नाटक की तरह प्रस्तुत कर  यह कथा वाचक खर्च भी करते हैं।  ऐसे में उनको अपने कार्यक्रमों के लिये व्यवसायिक प्रबंध कौशल का परिचय देना होता है।  देखा जाये तो अध्यात्म साधना एकांत का विषय है पर गीत संगीत तथा नृत्य के माध्यम से शोर मचाकर यह लोगों का मन वैसे ही हरते हैं जैसे कि मनोरंजन करना ही अध्यात्म हो।

संत प्रवर कबीर दास जी कहते हैं कि
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पण्डित और मसालची, दोनों सूझत नाहिं।
औरन को करै चांदना, आप अंधेरे माहिं।।
         सामान्य हिन्दी में भावार्थ-पण्डित और मशाल दिखाने वाले दूसरों को प्रकाश दिखाते हैं, पर स्वयं अंधेरे में रहते हैं।
पण्डित केरी पोथियां, ज्यों तीतर का ज्ञान।
और सगुन बतावहीं, आपन फंद न जान।।
        सामान्य हिन्दी में भावार्थ-पण्डित पोथियों पढ़कर ज्ञानोपदेश करत हैं। उनका ज्ञान तीतर की तरह ही है जो दूसरे पक्षियों को ज्ञान देता पर स्वयं पिंजरे में रहता है।

          हमारा अध्यात्म अत्यंत समृद्ध है। देखा जाये तो हमारे अध्यात्म का सार श्रीमद्भागवत गीता में पूर्ण रूप से समाहित हैै। इस छोटे पर महान ग्रंथ का अध्ययन करने पर यह साफ लगता है कि उसमें वर्णित सदेशों से  प्रथक अन्य कोई सत्य हो ही नहीं सकता। कहा भी जाता है कि जिसने श्रीगीता का अध्ययन कर लिया उसे फिर अन्य किसी ग्रंथ से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है। हैरानी की बात है कि अपने आपको श्रीगीता सिद्ध बताने वाले उसके संदेश भी इतने विस्तार से बताते हैं कि सामान्य भक्तों के सिर के ऊपर से निकल जाते हैं।  उससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि लोग श्रीगीता के प्रवचन के समय ही प्रमाद कर अपनी बात से भक्तों को हंसाते हुए समझाते हैं।  प्रमाद राजसी कर्म का परिचायक है और स्वयं को सात्विक कहने वाले इन उपदेशकों को इससे बचना चाहिये।
      जिन लोगों को अधिक पुस्तकों से माथा पच्ची न करनी हो वह प्रातःकाल एक दो श्लोक ही गीता का पढ़ लिया करें।  उसका शाब्दिक अर्थ लेकर मन ही मन उसका चिंत्तन कर भावार्थ समझने का प्रयास करें।  आजकल सिद्ध गुरु मिलना कठिन है। कथित गुरु अपने आश्रमों के विस्तार और भक्तों के संग्रह को ही अपना लक्ष्य बनाते हें।  अतः भगवान श्रीकृष्ण को अपना गुरु मानते हुए श्रीगीता का अध्ययन करें तो यकीन मानिए स्वतः ही अध्यात्म का ऐसा ज्ञान प्राप्त होगा जो कथित बड़े संतों के लिये भी दुर्लभ है।

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Sunday, July 28, 2013

चाणक्य नीति दर्शन-मार्ग पर देखभाल कर चलें (chankya neeti darshan-marga par dekhbhalkar chalen)



         आजकल हम देख रहे हैं कि युवा वर्ग के लोगों की मौतों की घटनायें  अधिक हो रही है।  आत्महत्या, हत्या तथा सड़क दुर्घटनाओं में अक्सर युवक युवतियों की मौत की खबरें प्रचार माध्यमों में आती रहती हैं।  इतना ही नहीं राजमार्गों पर भी दूरी की यात्रा कर रहे अनेक परिवारों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनायें भी होती रहती हैं। देश में विकास के नाम पर भौतिकता के भाव ने लोगों की बुद्धि कुंद कर दी है।  जिनके पास मोटर साइकिल और कार है वह उस पर सोचकर  सवारी करते है कि सड़क केवल उनके लिये ही बनी।  जिस तरह चूहे, बिल्ली और कुत्ते का खेल है कि ताकतवर अपने से कमजोर पर हमला करता है वैसी ही स्थिति आजकल सड़क पर आवागमन करने  पर दिखती है। वाहन वाला पैदल या साइकिल चालक को तथा बड़े वाहन का सवार छोटे वाहन सवार को अपने आगे कुछ नहीं समझता।  पैदल और साइकिल चालक को मोटर साइकिल वाले और उनको कार तो कार वालों को ट्रक वाले अपनी वाहन से उड़ा देते हैं। कभी कभी तो लगता है कि लोग सड़क पर बदहाली में चलने के आदी हो गये हैं।  घर जो सुरक्षित पहुंचते हैं उनके परिवार वालों को भगवान का शुक्रिया अदा करना चाहिये क्योंकि जिस तरह सड़कों पर आवागमन की स्थिति है वह अत्यंत शोचनीय है।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि

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शकटं पञ्चहस्तेन दशहस्तेन वाजिनम्।

हस्ती शतहस्तेन देशत्यागेन दुर्जनम्।।

       हिन्दी में भावार्थ-बैलगाड़ी से पांच, घोड़े से दस तथा हाथी से सौ हाथ दूर रहना चाहिये। जहां दुष्ट रहता हो तो उस क्षेत्र का त्याग कर देना चाहिये।
            अगर हम चाणक्य नीति को देखें तो लगता है कि ऐसी दुर्घटनायें ंपहले भी होती रहती होंगी तभी उनसे बचने के लिये उन्होंने  मार्ग में बैलगाड़ी, घोड़े तथा हाथी से दूर चलने का सुझाव दिया।  अभी तक आधुनिक समय में तीन ‘टी’ यानि ट्रेक्टर, ट्रक तथा टू-सीटर से बचने की सलाह देते रहे हैं पर लगता है कि मोटर साइकिल को टू-सीटर शायद नहंी माना जाता है हालांकि वह आती उसी श्रेणी मैं है।  यही कारण है कि आजकल अधिकतर दुर्घटनायें मोटरसाइकिल सवारों के साथ होती है या वह उनके लिये जिम्मेदार होते हैं।  समस्या यह है कि लोग चाहे वह कार पर हों या बाइक पर, अपने  सवारी वाहन लेकर एक दूसरे के इतना नजदीक चलते हैं कि एक ब्रेक लगाये तो दूसरा टकरा ही जाता है। इस बात पर भी जमकर झगड़े होते हैं।  आखरी बात यह कि वाहन संख्या में बढ़ गये हैं और सड़कें अतिक्रमण के कारण पहले से कम चौड़ी हो गयी हैं।  ऐसे में वाहन टकरायेंगे ही पर लोगों को आपस में लड़ने से बचना चाहिये।  अनेक बार तो ऐसी हृदय विदारक घटनायें हुई हैं जिसमें गाड़ियां टकराने पर कत्ल तक हो गये हैं।  हमारे यहां अब अध्यात्मिक ज्ञान का महत्व अधिक नहीं दिया जात है पर सच यह है कि उसमें भी मार्ग पर सावधानी से चलने का सुझाव दिया गया है।

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Wednesday, July 17, 2013

मनुस्मृति के आधार पर संदेश-आत्म नियंत्रण करना भी यज्ञ है (manu smriti ke adhar par sandesh-aatma niyantran karna bhee yagya hai)



        हमारे देश में भौतिक साधनों से यज्ञ करने को अधिक महत्व दिया जाता  है।  दरअसल भौतिक यज्ञ प्रत्यक्ष दिखता है इससे दूसरों के सामने अपनी धार्मिक छवि का निर्माण करने का सहज अवसर मिलता है। यह देखा भी गया है कि धन के बल पर किये गये इस तरह के धार्मिक प्रदर्शन करने वालों का काला चरित्र आम लोगों की आंखों से ओझल ही रहता है। जिनका चरित्र काला नहंी भी हो वह भी कोई अन्य नैतिक कार्यक्रम करने की बजाय इस तरह धन खर्च कर धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से  अपनी उज्जवल छवि बनाने का प्रयास करते हैं। यहां तक तो ठीक है पर जब इस तरह धन खर्च कर धार्मिक कार्यक्रम करने वाले अन्य लोगों को भी ऐसे काम करने के लिये उकसाने का प्रयास करते हैं और न करने पर उनके निंदक बन जाते हैं।
         इतना ही नहीं हमारे देश में अनेक कथित गुरु भी हैं जो अपने शिष्यों को इस तरह के भौतिक यज्ञों के लिये प्रेरित करते हैं। उनके शिष्य उनसे भी दो कदम आगे जाकर भौतिक यज्ञ न करने वालों को नास्तिक या भक्तिहीन कहकर मजाक उड़ाते हैं।  इस तरह एक धार्मिक द्वंद्व में समाज बरसों से फंसा हुआ है।  भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परे होते समाज में यह द्वंद्व अनेक बार कई लोगों के सामने दुविधाजनक स्थिति पैदा कर देता है।
   
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यथायथा हि पुरुषः शास्त्रंसमधिगच्छति।
तथातथा विंजानाति विज्ञानं चास्य रोचते।।
      हिन्दी में भावार्थ-जैसे जैसे मनुष्य शास्त्र का अभ्यास करता है, उसे तत्वज्ञान प्राप्त होने लगता है। इससे उसकी रुचि अध्ययन में बढ़ती जाती है।
ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा।
नृचज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत्।।
        हिन्दी में भावार्थ-ऋषि यज्ञ (वेद अध्ययन), देव यज्ञ (मूर्ति पूजा), भूत यज्ञ (हवन आदि करना), नृयज्ञ (अतिथि सत्कार), तथा पितृयज्ञ (श्राद्ध तथा तर्पण) इन पांच यज्ञों का अनुष्ठान करते रहना चाहिये
एतानेके महायज्ञन्यज्ञशास्त्रविदो जनाः।
अनहिमानाः सततमिन्द्रियेष्ेवे जुहृति।।

         हिन्दी में भावार्थ-शास्त्रों के ज्ञाता कुछ गृहस्थ इन यज्ञों को न करन पांचों इंद्रियों पर-नेत्र, नासिका, जीभ, त्वचा ताकि कान पर संयम-नियंत्रण करते हुए पंच यज्ञ करते हैं।
       देश में कई ऐसे गृहस्थ हैं जो इस तरह के भौतिक यज्ञों की अपेक्षा ज्ञान को  श्रेष्ठ मानते हैं।  आयु, समय तथा आवश्यकता होने पर विद्याध्ययन, अतिथि सत्कार तथा अन्य परोपकार के कार्य करना चाहिये पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि अन्य प्रकार के भौतिक यज्ञों के लिये सभी गृहस्थों पर दबाव डाला जाये।  सच बात तो यह है कि अपनी देह की इंद्रियों पर नियंत्रण करना भी एक तरह से यज्ञ है।  अपनी आंखों से सदैव अच्छे दृश्य देखने का प्रयास करना, कानों से केवल मधुर स्वर सुनना, दुर्गंध से दूर होकर सुगंध की तरफ जाना, जीभ के स्वाद का ध्यान रखने की बजाय सुपाच्य वस्तुओं को ग्रहण करना तथा अनांवश्यक रूप से अपनी देह को कठिन मार्गो पर ले जाने की बजाय अनुकूल मौसम, सुविधाजनक मार्ग तथा शुद्ध वातावरण के अनुसार अपने पग बढ़ाने के साथ ही अपने हाथ उन्हीं कामों में डालना चाहिये जो तनाव पैदा करने वाले न हो।
       कहने का अभिप्राय यह है कि हर मनुष्य को अपनी देह, मन और विचारों के अनुकूल कार्यों पर ही ध्यान देना एक तरह से ज्ञान यज्ञ है।  दूसरों को लाभ पहुंचाकर वाह वाही लूटने से अच्छा है दूसरों को हानि पहुंचाने के प्रयास से बचा जाये।  हम यहां भौतिक यज्ञों की आलोचना नहीं कर रहे पर इतना जरूर कहना चाहते हैं कि ज्ञान यज्ञ करने वालों के प्रति ऐसे लोगों को दुर्भावना नहीं रखना चाहिये जो सकाम  भक्ति  करते हैं।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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