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Sunday, April 03, 2011

सज्जन की मित्रता धीरे धीरे बढ़ती है-हिन्दू धार्मिक चिंतन (sajjan ki mitrata-hindu dharmik chittan)

दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्।
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
"कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो  तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।"
आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
"जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध  में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।"
             सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्द्ध  में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है। पड़ौस तथा कार्यस्थलों में हमारा संपर्क अनेक ऐसे लोगों से होता है जिनके प्रति हमारे हृदय में क्षणिक आत्मीय भाव पैदा हो जाता है। वह भी हमसे बहुत स्नेह करते हैं पर यह यह संपर्क नियमित संपर्क के कारण मौजूद हैं।  उन कारणों के परे होते ही-जैसे पड़ौस छोड़ गये या कार्य का स्थान बदल दिया तो-उनसे मानसिक रूप से दूरी पैदा हो जाती है।  इस तरह यह बदलने वाली मित्रता वास्तव में सत्य नहीं होती। मित्र तो वह है जो दैहिक रूप से दूर होते भी हमें स्मरण करता है और हम भी उसे नहीं भूलते। इतना ही नहीं समय पड़ने पर उनसे सहारे का आसरा मिलने की संभावना रहती है।  अतः स्थितियों का आंकलन कर ही किसी को मित्र मानकर उससे आशा करना चाहिये। जहां तक हो सके दुष्ट और स्वार्थी लोगों से मित्रता नहीं करना चाहिये जो कि कालांतर में घातक होती है। उसी तरह अपने व्यक्तित्व का भी निर्माण इसी तरह करना चाहिए कि वह दूसरों को प्रिय लगे।
        दूसरों से स्नेह तथा प्रेम पाने के लिये यह आवश्यक है कि निस्वार्थ भाव से सभी का काम करें और वार्तालाप में मधुर वचन का प्रयोग करें। एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि व्यक्तित्तव में सौम्यता तथा व्यवहार में नैतिकता बरतने से ही समाज में सम्मान बढ़ता है।
____________________________-
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक  राज कुकरेजा "भारतदीप",ग्वालियर 
writer and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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Tuesday, November 10, 2009

चाणक्य दर्शन-इंसान जैसा अन्न खाता है वैसे ही उसके विचार होते हैं jaisa anna vaisa man-chankya darshan)

दीपो भक्षयते थ्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते।
यदन्नं भक्षयतेन्नित्यं जायते तादृशी प्रजा।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह दीपक अंधेरे को खाकर काजल को उत्पन्न करता है वैसे ही इंसान जिस तरह का अन्न खाता है वैसे उसके विचार उत्पन्न होते हैं और उसके इर्दगिर्द लोग भी वैसे ही आते हैं। उनकी संतान भी वैसी ही होती है।
अधमा धनमिच्छन्ति धनं माने च मध्यमा।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
अधम केवल धन की कामना करता है जबकि मध्यम पुरुष धन और मान दोनों की इच्छा करता है किन्तु उत्तम पुरुष केवल मान की कामना करते हुए अपन कर्म करता है। उसके लिये मान ही धन्न है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या -यह एक तरह का दर्पण है जिसमें हर इंसान अपने चरित्र का चेहरा देख सकता है। केवल धन की कामना पूरी करने के लिये कोई भी कार्य करने के लिये तैयार होना निम्नकोटि होने का प्रमाण है। कहने को तो सभी कहते हैं कि यह पेट के लिये कर रहे हैं पर जिनके पास वास्तव में धन और अन्न का अभाव है वह आजकल किसी अपराध में नहीं लिप्त दिखते जितने धन धान्य से संपन्न वर्ग के लोग बुरे कामों में व्यस्त हैं। धन का आकर्षण लोगों को लिये इतना है कि वह उसके लिये अपना धर्म बदलने और बेचने के लिये तैयार हो जाते हैं। उनके लिये मान और अपमान का अंतर नहीं रह जाता। आजकल शिक्षित और सभ्रांत वर्ग के लोगों ने यह मान्यता पाल ली है कि धन से सम्मान होता है और वह स्वयं भी निर्धनों से घृणा करते हैं। सच बात तो यह है कि अधम प्रकृति के लोग धन प्राप्त कर उच्चकोटि का दिखने का प्रयास करते हैं।
समाज में अनैतिक धनार्जन की बढ़ती प्रवृति ने नैतिक ढांचे को ध्वस्त कर दिया है और जिस वर्ग के लोगों पर समाज का मार्गदर्शन करने का दायित्व है वही कदाचार और ठगी में लगे हुए हैं। परिणामतः उनके इर्दगिर्द ऐसे ही लोगों का समूह एकत्रित हो जाता है और उनकी संतानें भी अब ऐसे काम करने लगी हैं जो पहले नहीं सुने जाते थे। नयी पीढ़ी की बौद्धिक और चिंतन क्षमता का हृास हो गया है और कहीं पुत्र तो कहीं पुत्री ही माता पिता पर दैहिक आक्रमण के लिये आरोपित हो जाती है। नित प्रतिदिन समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर ऐसे समाचार आते हैं जिसमें संतान ही उस माता पिता को तबाह कर देती है जिसकों उन्होंने जन्म दिया है।
ऐसे में ज्ञानी लोगों को यह ध्यान रखना चाहिये कि जो धन वह कमा रहे हैं उनका स्त्रोत पवित्र हो। अल्प धन होने से कोई समस्या नहीं है क्योंकि चरित्र से सम्मान सभी जगह होता है पर बेईमानी और ठगी से कमाया गया धन अंततः स्वयं के लिये कष्टदायी होता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com

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Sunday, September 27, 2009

चाणक्य नीति-अपनी आस्था और धर्म परिवर्तन दु:खदायी होता है (chankya niti-dharam parivartan)


नीति विशारद चाणक्य कहते हैं
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आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।

                   हिन्दी में भावार्थ कि अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।

                    वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अक्सर लोग धर्म की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। अनेक लोग निराशा, लालच या आकर्षण के वशीभूत होकर धर्म में परिवर्तन कर दूसरा अपना लेते हैं-यह अज्ञान का प्रतीक है। दरअसल मनुष्य के मन में जो विश्वास बचपन में उसके माता पिता द्वारा स्थापित किया जाता है उसी को मानकर वह आगे बढ़ता जाता है। कहा भी जाता है कि माता पिता प्रथम गुरू होते हैं। उनके द्वारा मन में स्थापित संस्कार,आस्था तथा इष्ट के स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि बचपन से ही मन में स्थापित संस्कार और आस्थाओं से आदमी आसानी से नहीं छूट पाता-एक तरह से कहा जाये कि पूरी जिंदगी वह उनसे परे नहीं हो पाता।
                  कहा भी जाता है कि आदमी में संस्कार,नैतिकता और आस्था स्थापित करने का समय बाल्यकाल ही होता है। ऐसे में कुछ लोग निराशा, लालच,भय या आकर्षण की वजह से से अपने धर्म या आस्था में बदलाव लाते हैं पर बहुत जल्दी ही उनमें अपने पुराने संस्कार, आस्थाऐं और इष्ट के स्वरूप का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगता है पर तब उनको यह डर लगता है कि हमने जो नया विश्वास, धर्म या इष्ट के स्वरूप को अपनाया है उसको मानने वाले दूसरे लोग क्या कहेंगे? एक तरफ अपने पुराने संस्कार और आस्थाओं की खींचने वाला मानसिक विचार और दूसरे का दबाव आदमी को तनाव में डाल देता है। धीरे धीरे यह तनाव आदमी की देह और मन में विकार पैदा कर देता है। इसलिये अपने अंदर बचपन से स्थापित संस्कार,आस्था और इष्ट के स्वरूप में में कभी बदलाव नहीं करना चाहिये बल्कि अपने धर्म के साथ ही चलते हुए सांसरिक कर्मों में निष्काम भाव से लिप्त होना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीगीता में कहा भी है कि अपना धर्म गुणहीन क्यों न हो पर उसका त्याग नहीं करें क्योंकि दूसरे का धर्म कितना भी गुणवान हो अपने लिये डरावना ही होता है। धर्म परिवर्तन करने वाले कभी सुखी नहीं रहते है और आस्था बदलने वालों का भटकाव कभी ख़त्म नहीं होता यह  अंतिम सत्य है।
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Saturday, September 12, 2009

चाणक्य नीति-भोजन के बाद अतिथि को गृहस्थ का घर छोड़ देना चाहिए (atithi aur grahsth-chankya niti)

निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्।
नदी तीरे च ये वृक्षाः परगृहेषु कामिनी।
हिंदी में भावार्थ-
निर्धन पुरुष को वैश्या, पराजित और शक्तिहीन राजा को प्रजा, फलहीन वृक्ष को पक्षी जिस तरह त्याग देते हैं उसी तरह भोजन करने के बाद अतिथि को गृहस्थ का त्याग कर देना चाहिये।
मन्त्रिहीनश्चय राजानः शीघ्रं नश्चाननसंशयम्
खग चीतफल वृक्षं भुक्त्वा चाऽभ्यागता गृहम्।।
हिंदी में भावार्थ-
नदी के किनारे वृक्ष, दूसरे के घर रहने वाली स्त्री, मंत्री के बिना राजा शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने जीवन के लक्ष्य और कार्य पर स्वयं ही निर्भर रहना चाहिये। यह सही है कि अपने अनेक कार्यों के लिये दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है पर उस समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि अपनी निर्भरता किसी एक व्यक्ति की बजाय अनेक पर हो ताकि एक अगर सहायता न तो दूसरा कर दे। अपने कार्य तथा उद्देश्य की पूर्ति के सदैव स्वयं ही विचार करते हुए सक्रिय रहना चाहिये। दूसरों निर्भर रहने से जीवन में असफलता की आशंका बलवती होती है।

परिवार समाज और राष्ट्र के मुखिया को सदैव अपनी शक्ति और अर्थ का संचय करते रहना चाहिये। जहां उसकी शक्ति में शिथिलता आने के साथ ही धनाभाव घेर लेता है वहां उसके अंतर्गत सक्रिय अन्य लोग ही नहीं वरन् स्वजन ही उसका त्याग कर देते हैं। अपनी शक्ति और संपन्नता बनाये रखने के लिये अपने गुणों और दुर्गुणों पर निरंतर दृष्टिपात करते हुए आत्म मंथन करते हुए नये प्रयोग करते रहने से शक्ति अर्जित होती है और साथ में अपने प्रति लोगों में नवीनता का भाव बनाये रखा जा सकता है। वैसे आयु अनुसार शक्ति और समयानुसार धन का हृास होता है पर गुणवान और ज्ञानी लोग अपने अभ्यास से इसका आभास किसी को नहीं होने देते जिससे उनकी शक्ति यथावत रहती है। जीवन में जहाँ तक हो सके सतर्क रहना चाहिए। छोट और बड़े अवसरों पर शिष्टाचार का ध्यान रखना चाहिए.
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Saturday, August 22, 2009

चाणक्य नीति-धर्म बदलने वाले का शीघ्र नाश होता है (chankya niti-change of religion)

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।

हिन्दी में भावार्थ- अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अक्सर लोग धर्म की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। अनेक लोग निराशा, लालच या आकर्षण के वशीभूत होकर धर्म में परिवर्तन कर दूसरा अपना लेते हैं-यह अज्ञान का प्रतीक है। दरअसल मनुष्य के मन में जो विश्वास बचपन में उसके माता पिता द्वारा स्थापित किया जाता है उसी को मानकर वह आगे बढ़ता जाता है। कहा भी जाता है कि माता पिता प्रथम गुरू होते हैं। उनके द्वारा मन में स्थापित संस्कार,आस्था तथा इष्ट के स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि बचपन से ही मन में स्थापित संस्कार और आस्थाओं से आदमी आसानी से नहीं छूट पाता-एक तरह से कहा जाये कि पूरी जिंदगी वह उनसे परे नहीं हो पाता।

कहा भी जाता है कि आदमी में संस्कार,नैतिकता और आस्था स्थापित करने का समय बाल्यकाल ही होता है। ऐसे में कुछ लोग निराशा, लालच,भय या आकर्षण की वजह से से अपने धर्म या आस्था में बदलाव लाते हैं पर बहुत जल्दी ही उनमें अपने पुराने संस्कार, आस्थाऐं और इष्ट के स्वरूप का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगता है पर तब उनको यह डर लगता है कि हमने जो नया विश्वास, धर्म या इष्ट के स्वरूप को अपनाया है उसको मानने वाले दूसरे लोग क्या कहेंगे? एक तरफ अपने पुराने संस्कार और आस्थाओं की खींचने वाला मानसिक विचार और दूसरे का दबाव आदमी को तनाव में डाल देता है। धीरे धीरे यह तनाव आदमी की देह और मन में विकार पैदा कर देता है। इसलिये अपने अंदर बचपन से स्थापित संस्कार,आस्था और इष्ट के स्वरूप में में कभी बदलाव नहीं करना चाहिये बल्कि अपने धर्म के साथ ही चलते हुए सांसरिक कर्मों में निष्काम भाव से लिप्त होना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीगीता में कहा भी है कि अपना धर्म गुणहीन क्यों न हो पर उसका त्याग नहीं करें क्योंकि दूसरे का धर्म कितना भी गुणवान हो अपने लिये डरावना ही होता है।
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Saturday, August 08, 2009

चाणक्य नीति-धर्म बदलने वाला जल्दी नष्ट हो जाता है (chankya niti-change of religion is not good)

आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अक्सर लोग धर्म की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। अनेक लोग निराशा, लालच या आकर्षण के वशीभूत होकर धर्म में परिवर्तन कर दूसरा अपना लेते हैं-यह अज्ञान का प्रतीक है। दरअसल मनुष्य के मन में जो विश्वास बचपन में उसके माता पिता द्वारा स्थापित किया जाता है उसी को मानकर वह आगे बढ़ता जाता है। कहा भी जाता है कि माता पिता प्रथम गुरू होते हैं। उनके द्वारा मन में स्थापित संस्कार,आस्था तथा इष्ट के स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि बचपन से ही मन में स्थापित संस्कार और आस्थाओं से आदमी आसानी से नहीं छूट पाता-एक तरह से कहा जाये कि पूरी जिंदगी वह उनसे परे नहीं हो पाता।

कहा भी जाता है कि आदमी में संस्कार,नैतिकता और आस्था स्थापित करने का समय बाल्यकाल ही होता है। ऐसे में कुछ लोग निराशा, लालच,भय या आकर्षण की वजह से से अपने धर्म या आस्था में बदलाव लाते हैं पर बहुत जल्दी ही उनमें अपने पुराने संस्कार, आस्थाऐं और इष्ट के स्वरूप का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगता है पर तब उनको यह डर लगता है कि हमने जो नया विश्वास, धर्म या इष्ट के स्वरूप को अपनाया है उसको मानने वाले दूसरे लोग क्या कहेंगे? एक तरफ अपने पुराने संस्कार और आस्थाओं की खींचने वाला मानसिक विचार और दूसरे का दबाव आदमी को तनाव में डाल देता है। धीरे धीरे यह तनाव आदमी की देह और मन में विकार पैदा कर देता है। इसलिये अपने अंदर बचपन से स्थापित संस्कार,आस्था और इष्ट के स्वरूप में में कभी बदलाव नहीं करना चाहिये बल्कि अपने धर्म के साथ ही चलते हुए सांसरिक कर्मों में निष्काम भाव से लिप्त होना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीगीता में कहा भी है कि अपना धर्म गुणहीन क्यों न हो पर उसका त्याग नहीं करें क्योंकि दूसरे का धर्म कितना भी गुणवान हो अपने लिये डरावना ही होता है।
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Wednesday, July 29, 2009

चाणक्य नीति-धर्म स्थानों पर तोड़फोड़ करने वाले म्लेच्छ (chankya niti on dharm sthan)

परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः।
छली द्वेषी मृदः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य दूसरे के कार्यों को बिगाड़ने वाला, पाखंडी, अपना मतलबी साधने वाला, छलिया, दूसरों की उन्नति देखकर जलने वाला तथा बाहर से कोमल और अंदर कपट भाव रखने वाला है वह भले ही विद्वान क्यों न हो पशु के समान है।
चापी-कूप-तडागानामाराम-सुर-वेश्मनाम्।
उच्छेद निरऽऽशंकः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य बावड़ी, कुआं तालाब, बगीचे और धर्म स्थानों में तोड़फोड़ और उनको नष्ट करने से जो डरते नहीं है वह भले ही विद्वान हों म्लेच्छ कहलाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सभी को अपने जीवन में अपना स्वयं के धर्म और कर्म केंद्रित करना चाहिये। कुछ ऐसे मनुष्य भी हैं जो केवल धर्म का दिखावा करते हैं पर उनका लक्ष्य उसकी आड़ में व्यवसाय या उसके सहारे अपना समाज पर वर्चस्व स्थापित करना है। ऐसे लोग धर्म के आधार पर निकृष्ट कर्म करते हैं जो केवल पाप की श्रेणी में आते हैं। हालांकि कहा जाता है अशिक्षित और गंवार लोग ही ऐसे हैं जो धर्म की आड़ में पाप काम करते हैं पर चाणक्य महाराज की बात को देखें तो यह काम पहले भी विद्वान और शिक्षित लोगों के द्वारा होता रहा है। बस अंतर इतना है कि अब यह काम केवल विद्वान आर शिक्षित लोग ही कर नजर आते हैं। कथित अशिक्षित और गंवार लोगों को तो अपनी रोजी रोटी कमाने से ही आजकल फुरसत कहां मिल पाती है?
देश, प्रदेश, और शहर की संपत्ति और धार्मिक स्थानों पर तोड़फोड़ करने वाले भारी पाप करते हैं और उनको एक तरह से म्लेच्छ कहा जाता है। चाहे अपने धर्म का हो या दूसरे धर्म का उसमें तोड़फोड़ करने वाले महापापी हैं और उनका कभी समर्थन न करे। ऐसे लोग धर्म के नाम पर विवाद कर समाज का ध्यान अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर उसका लाभ उठाते हैं। अगर हम उनकी तरफ देखें तो भी समझ लेना चाहिये कि पाप हो गया।
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Monday, July 27, 2009

चाणक्य नीति-मनुष्य को पाप पुण्य का फल अकेले भोगना है (chankya niti in hindi)

जन्ममृत्यु हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाऽशुभम्।
नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम्।।

हिंदी में भावार्थ-मनुष्य अकेला ही जन्म लेकर मुत्यु को प्राप्त होता है। अपने हाथ से ही अकेले शुभ अशुभ कर्म करता है और अपने पाप पुण्य का फल अकेले ही भोगता और मोक्ष प्राप्त करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-जन्म के साथ ही मनुष्य के अनेक प्रकार के संबंध स्थापित होते हैं और मृत्यु के साथ ही बिखर जाते हैं। मनुष्य जन्म से स्थापित इन्हीं संबंधों को सत्य मानकर उनके इर्दगिर्द घूमते हुए परमात्मा की भक्ति से जीवन भर विरक्त रहता है। वह अपने लिये जीवन का सुख केवल इन्हीं संबंधों में ढूंढता है जो कभी नहीं मिलता। कहीं दायित्व तो कहीं अधिकार के नाम पर मनुष्य जीवन भर इन संबंधों में लिप्त रहता है पर उसे मिलता कुछ नहीं है कभी तो उसके लिये यह संबंध तनाव का कारण भी बनते हैं।
अपने परिवार के आहार विहार के लिये मनुष्य हर तरह के कर्म करता है। कहीं शिष्टाचार तो कहीं भ्रष्टाचार करने के लिये तत्पर मनुष्य यह नहीं जानता कि उसके फल और कुफल के लिये वह स्वयं जिम्मेदार होगा। महर्षि बाल्मीकि का चरित्र सभी जानते हैं। वह एक दस्यु के रूप में अपने परिवार वालों के लिये कमाई करते थे। एक बार जब उन्होंने कुछ साधुओं को पकड़ लिया और उन्होंने उनसे कहा कि ‘अपने परिवार के सदस्यों से पहले पूछकर आओ कि क्या तुम्हारे कुफल में वह भागीदार बनेंगे।
महर्षि बाल्मीकि ने जब अपने परिवार के सदस्यों से उक्त प्रश्न किया तो सभी ने उनको ‘ना’ में उत्तर दिया। वहां से उनको ऐसा ज्ञान प्राप्त हुआ कि उन्होंने रामायण जैसा महाग्रंथ रच डाला और उनका नाम आज भी जाना जाता है। यह कथा इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य अपने कर्म के लिये स्वयं ही जिम्मेदार होता है।
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Sunday, July 19, 2009

चाणक्य नीति-ज्ञान प्राप्ति में आसक्ति बाधक chankya niti-gyan prapti men askti badhak)

न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः।
आमूलसिक्तः पया घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति।।
हिंदी में भावार्थ-
दुर्जन व्यक्ति को कितना भी प्रेम से समझाया जाये पर वह किसी भी हालत में सज्जन भाव को प्राप्त नहीं होता, जैसे नीम का वृक्ष दूध और घी से सींचा जाये पर उसमें मधुरता नहीं आती।

गृहाऽसक्तस्य नो विद्या नो दया मांसभोजिनंः।
द्रव्ययालुब्धस्य नो सत्यं स्त्रेणस्य न पवित्रता।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद चाणक्य महाराज के मतानुसार जिसकी घर में आसक्ति अधिक है उसे कभी विद्या प्राप्त नहीं होती। मांस का सेवन करने वाले में कभी दया नहीं होती। जिसके मन में धन का लोभ है वह कभी सत्य की सहायता नहीं लेता। दुराचारी, व्याभिचारी तथा भोग विलास वाले व्यक्ति से पवित्रता की आशा करना व्यर्थ है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य महाराज कहते हैं कि जिस व्यक्ति को अपने घर के मामलों में अधिक रुचि है वह कोई अन्य विद्या या ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता।
मांसाहार के विषय में अनेक प्रकार की बहस होती है। अब तो यह पश्चिमी स्वास्थ्य और मनोचिकित्सक भी मानने लगे है कि मांसाहार से व्यक्ति में हिंसा की प्रवृ त्ति आती है। भारतीय अध्यात्मिक संदेश भी यही कहता है कि मनुष्य देह पंचतत्वों से बनी है और उनके गुणों के प्रभाव से ही उसका संचालन होता है। इसका सीधा आशय यह कि जिस तरह का खानपान मनुष्य ग्रहण करेगा उसके गुण दोषों के अनुसार ही उसकी सोच का निर्माण होगा। अगर मनुष्य सात्विक भोजन ग्रहण करेगा तो उसमें स्वाभाविक रूप से दया, प्रेम और अहिंसा के भाव आयेंगे। यदि वह तामसिक पदार्थों का भक्षण और सेवन करेगा तो उसकी मूल प्रवृत्ति में क्रोध, हिंसा और घृणा के भाव स्वयं ही आयेंगे। इस विषय में किसी तर्क वितर्क की गुंजायश नहीं है भले ही कहने वाले कुछ भी कहते रहें। जैसे गुण हम बाहर से अपने अंदर ग्रहण करेंगे वैसे ही बाहर विसर्जन भी होगा।
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Sunday, July 12, 2009

चाणक्य नीति-दरिद्र का सभा में जाना विषप्रद (daridra ka sabha men jana vishprad-chankya niti)

यह ब्लाग/पत्रिका विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त ब्लाग पत्रिका ‘अनंत शब्दयोग’ का सहयोगी ब्लाग/पत्रिका है। ‘अनंत शब्दयोग’ को यह वरीयता 12 जुलाई 2009 को प्राप्त हुई थी। किसी हिंदी ब्लाग को इतनी गौरवपूर्ण उपलब्धि पहली बार मिली थी।
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नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्।।

हिंदी में भावार्थ-अगर शास्त्र का निंरतर अभ्यास न करना, पेट खराब होने पर भोजन करना, दरिद्र व्यक्ति के लिये सभा में जाना और वृद्ध पुरुष के लिये युवा स्त्री विष की तरह होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में हर व्यक्ति किसी किसी प्रकार की पुस्तकों से शिक्षा प्राप्त करता है। शिक्षा प्राप्त करने का उसका उद्देश्य ज्ञान और रोजगार प्राप्त करना-दोनों ही या दोनों में से कोई एक-हो सकता है। ऐसे में उसे अपनी पुस्तकों या शास्त्रों का नियमित अभ्यास करते रहना चाहिये। अगर वह ऐसा नहीं करता तो उसके लिये अलाभकर स्थिति हो जाती है। एक तो वह पूर्ण रूप से अपने विषय या ज्ञान में पारंगत नहीं हो पाता जिसकी वजह से उसे सफलता नहीं मिलती और मन अशांत रहता है दूसरा यह कि उसे पहले पढ़े हुए विषय दिमाग में घूमते रहते हैं और कुछ नया सोच ही नहीं सकता। इस तरह उसके जीवन के विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। वैसे आजकल इंसान के लिये स्वतंत्र रूप से अपने व्यवसाय करना कठिन हो गया है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद अगर आदमी को उससे संबंधित रोजगार न मिले तो उसका अभ्यास नहीं रह जाता। आजकल रोजगार की जो स्थिति है उससे तकनीकी, विज्ञान, वाणिज्य तथा साहित्य विषयों में उपाधियां प्राप्त करने वाले सभी लोगों को उससे संबंधित काम नहीं मिल पाता और अनेक लोगों को जीवन यापन के लिये जब उसे कोई अन्य नौकरी या व्यवसाय करना पड़ता है पर अपनी पूर्व शिक्षा के कारण उनको बहुत मानसिक कष्ट होता है। तब उन्हें अपना जीवन ही विषैला लगता है।
उसी तरह अगर कोई ज्ञान जीवन के लिये प्राप्त किया है तो उसका निंरतर अभ्यास करना चाहिये ताकि वह याद रहे और समय आने पर उस ज्ञान से हम अपनी रक्षा कर सकें।
यही स्थिति भोजन की है। जब हमारा पेट खराब हो तब भोजन नहीं करना चाहिये। ऐसे में अगर जबरन भोजन किया तो अपना स्वास्थ्य अधिक बिगड़ जाता है। वैसे भी कहते हैं कि भूख से कम, खाने से लोग अधिक बीमार पड़ते हैं। शरीर की बीमारियों का मुख्य कारण पेट का खराब होना ही है।
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Friday, July 10, 2009

चाणक्य नीति-अपने अच्छे बुरे काम के लिए आदमी ख़ुद ही जिम्मेदार (apne kam ke liye aadmi khud jimmedar-chankya niti

जन्ममृत्यु हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाऽशुभम्।
नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम्।।

हिंदी में भावार्थ-मनुष्य अकेला ही जन्म लेकर मुत्यु को प्राप्त होता है। अपने हाथ से ही अकेले शुभ अशुभ कर्म करता है और अपने पाप पुण्य का फल अकेले ही भोगता और मोक्ष प्राप्त करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-जन्म के साथ ही मनुष्य के अनेक प्रकार के संबंध स्थापित होते हैं और मृत्यु के साथ ही बिखर जाते हैं। मनुष्य जन्म से स्थापित इन्हीं संबंधों को सत्य मानकर उनके इर्दगिर्द घूमते हुए परमात्मा की भक्ति से जीवन भर विरक्त रहता है। वह अपने लिये जीवन का सुख केवल इन्हीं संबंधों में ढूंढता है जो कभी नहीं मिलता। कहीं दायित्व तो कहीं अधिकार के नाम पर मनुष्य जीवन भर इन संबंधों में लिप्त रहता है पर उसे मिलता कुछ नहीं है कभी तो उसके लिये यह संबंध तनाव का कारण भी बनते हैं।
अपने परिवार के आहार विहार के लिये मनुष्य हर तरह के कर्म करता है। कहीं शिष्टाचार तो कहीं भ्रष्टाचार करने के लिये तत्पर मनुष्य यह नहीं जानता कि उसके फल और कुफल के लिये वह स्वयं जिम्मेदार होगा। महर्षि बाल्मीकि का चरित्र सभी जानते हैं। वह एक दस्यु के रूप में अपने परिवार वालों के लिये कमाई करते थे। एक बार जब उन्होंने कुछ साधुओं को पकड़ लिया और उन्होंने उनसे कहा कि ‘अपने परिवार के सदस्यों से पहले पूछकर आओ कि क्या तुम्हारे कुफल में वह भागीदार बनेंगे।
महर्षि बाल्मीकि ने जब अपने परिवार के सदस्यों से उक्त प्रश्न किया तो सभी ने उनको ‘ना’ में उत्तर दिया। वहां से उनको ऐसा ज्ञान प्राप्त हुआ कि उन्होंने रामायण जैसा महाग्रंथ रच डाला और उनका नाम आज भी जाना जाता है। यह कथा इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य अपने कर्म के लिये स्वयं ही जिम्मेदार होता है।
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Tuesday, July 07, 2009

चाणक्य नीति-पराया धन मिट्टी समझें (chankya niti)

यो मोहन्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी।
स तस्य वशगो मूढो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा-शकुन्तवत्।।

हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य के अनुसार कुछ पुरुषों में विवेक नहीं होता और वह सुंदर स्त्री से व्यवहार करते हुए यह भ्रम पाल लेते हैं कि वह वह उस पर मोहित है। वह भ्रमित पुरुष फिर उस स्त्री के लिये ऐसे ही हो जाता है जैसे कि मनोरंजन के लिये पाला गया पक्षी।
मातृवत् परदारांश्चय परद्रव्याणि लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स नरः।।

हिंदी में भावार्थ-दूसरों की पत्नी को माता तथा धन को मिट्टी के ढेले की भांति समझना चाहिये। इस संसार में वह यथार्थ रूप से मनुष्य है जो सारे प्राणियों को अपनी आत्मा की भांति देखने वाला मानता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर व्यक्ति को अपने अंदर विवेक धारण करना चाहिये। कुछ लोग स्त्रियों के विषय में अत्यंत भ्रमित होते हैं। उनको लगता है कि कोई स्त्री उनसे अच्छी तरह बात कर रही है तो इसका आशय यह है कि वह उन पर मोहित है-यह उनका केवल एक भ्रम है। स्त्रियों का स्वभाव तथा वाणी कोमल होती है और इसी कारण वह हमेशा मृदभाषा से पुरुषों का मन मोह लेती हैं पर कुछ अज्ञानी और अविवेकी पुरुष यह भ्रम पाल कर अपने आपको ही कष्ट देते हैं कि वह उनके प्रति आकर्षित है।
नीति विशारद चाणक्य ऐसे व्यक्तियों की तरफ संकेत करते हुए कहते हैं कि दूसरे की स्त्री को माता के समान समझना चाहिये। उसी तरह दूसरे के धन को मिट्टी का ढेला समझना चाहिये। वह यह भी कहते हैं कि इस संसार में वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो सभी लोगों को देह नहीं बल्कि इस संसार में दृष्टा की तरह उपस्थित आत्मा ही मानता है।
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Saturday, July 04, 2009

चाणक्य नीति-अच्छा काम कर आदमी मुहूर्त भर भी जिए तो ठीक (chankya niti)

गते शोको न कत्र्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्।
वर्तमानेन कालेन प्रवर्तन्ते विचक्षणाः।।
हिंदी में भावार्थ-
भूतकाल में किये गये कार्य का शोक नहीं करते हुए भविष्य की चिंता करना चाहिये। विद्वान लोग वर्तमान के अनुसार अपने कार्य को योजनाबद्ध ढंग से करते हुए भविष्य संवारते हैं।

मुहूर्तमपि जीवेच्च नरः शुक्लेन कर्मणा।
न कल्पमपि कष्टेन लोक़द्वयविरोधिना।।
हिदी में भावार्थ-
अगर अच्छे काम करते हुए मनुष्य एक मुहूर्त भी जीवित रहे तो वह उत्तम है पर दूसरे के संकट खड़ा करने के साथ अनावश्यक विरोध करने वाला लंबे समय तक जीवित रहे तो भी अच्छा नहीं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्यों में कुछ देवत्व और राक्षसत्व दोनों भाव रहते हैं। मुख्य बात यह है कि मनुष्य चलना किस राह चाहते हैं और इसी आधार पर उनके द्वारा व्यवहार किया जाता है। जिन लोगों के मस्तिष्क में लोभ, लालच और अहंकार की प्रवृत्ति की प्रधानता है वह सिवाय अपने स्वार्थ की पूर्ति के अलावा कुछ अन्य नहीं देखते। धीरे धीरे वह इतने आत्मकेंद्रित हो जाते हैं कि वह किसी दूसरे का काम बनता देख उनके हृदय ईष्र्या और द्वेष के भाव पैदा होने लगते हैं। इतना ही नहीं किसी दूसरे का काम बिगाड़ने में भी उनको मजा आता है। ऐसे लोगों की जिंदगी पशु के समान हो जाती है और वह समाज के लिये कष्टदायी होते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो पाखंड से परे होकर शांति से परोपकार का कार्य करते हुए प्रचार से दूर रहते हैं। ऐसे लोगों को पूरा समाज आदर भी करता है।
जो बीत गया सो बीत गया। अपने हाथ से कोई अच्छा काम हुआ हो या कोई गलती हो गयी हो तो उसकी चिंता को छोड़ते हुए भविष्य की योजना बनाना चाहिए। अपने वर्तमान में ही ऐसे कार्य करने की सोचना चाहिये जिससे भूतकाल की गल्तियां स्वतः सुधरने के साथ ही भविष्य में भी लाभ होता है।
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Sunday, June 14, 2009

चाणक्य नीति-मन की शान्ति पत्नी और क्षमा पुत्र समान

सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया स्वसा।
शांतिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः।।
हिंदी में भावार्थ-
इस जीवन में सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म भाई और दया बहिन समान है। मन की शांति पत्नी और क्षमा पुत्र समान है।
यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्।
स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्तवा वसेत्सुखम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जहां स्नेह हैं वही दुःख है। स्नेह ही दुःख की उत्पत्ति का कारण है। स्नेह ही दुःख का मूल है। जिसने स्नेह को त्याग दिया वही सुखी रहता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान जीवन के सत्य को प्रवाहित करने वाला स्त्रोत है जिसमें आत्मा को सर्वोपरि बताया गया है। समूचे जीवों से प्रेम करना धर्म है और कमजोर और निरीह पर दया करना सबसे बड़ा पुण्य है। मगर अनेक कथित साधु संतों समाज में अपना प्रभाव बनाये रखने के लिये मनुष्य को रिश्तों में बंधे रहकर केवल उनके निर्वाह के लिये प्रेरित करते है ताकि उनकी छबि समाज सुधारक के रूप में बनी रहे।
नीति विशारद चाणक्य स्पष्ट कहते हैं कि सत्य ही माता के समान है और ज्ञान ही पिता तुल्य है। भाई के समान धर्म और बहिन के समान दया है। मन की शांति पत्नी और क्षमा पुत्र समान है। अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान के लिये हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए। अपने रिश्तों के साथ निर्वाह करना ठीक है पर उनके प्रति अधिक मोह पालना ठीक नहीं है। यह मोह न केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति में बाधा पहुंचाता है बल्कि सांसरिक गतिविधियेां में इस तरह लिप्त करता है कि उससे मन और देह में केवल विकार और अशांति ही पैदा होती है। तथाकथित विद्वानों और संतों ने ऐसे अनेक कर्मकांडों को धर्म का हिस्सा बना दिया है जो केवल आदमी के मोह को बढ़ाते हैं और उन पर धन खर्च होता है। इसी कारण आम भारतीय धन संचय में अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर देता है और सिवाय दुःख के उसके हाथ कुछ नहीं आता।

हालत यह है कि आध्यात्मिक ज्ञान की बात तो सभी करते हैं पर धारण उसे नहीं करता। पंचतत्वों से बनी इस देह को नष्ट होना है और आत्मा अमर है इसलिये मृत देह के अंतिम संस्कार और श्राद्ध जैसी परंपराओं को निभाने की प्रेरणा देना उचित नहीं है। इस देह को लेकर को नाटकबाजी करना ही अज्ञान का प्रमाण है। यहां तक कहा जा सकता है कि जन्मतिथि और पुण्य तिथि मनाना ही एक तरह से देहाभिमान का परिणाम है। जब आत्मा अमर है तो पैदा कौन हुआ मरा कौन-इस पर विचार कर देखें तो पायेंगे कि हम अनेक प्रकार के भ्रमों में जी रहे हैं। इनसे मुक्त होकर जीवन व्यतीत करें तो शायद मानसिक संताप और वेदना स्वतः कम हो जाये।
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Friday, June 05, 2009

चाणक्य नीति-मन अगर साफ है तो पवित्र स्थान पर नहाने की आवश्यकता नहीं है

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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लोभश्चेदगुणेन किं पिंशुनता यद्यस्ति किं पासकैः सत्यं चेतपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम्।
सौजन्यं यदि किं गुणैः सुमहिमा यस्ति किं मण्डनैः सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यस्ति किं मृत्युना।।


हिंदी में भावार्थ-मनुष्य में यदि लोभ का भाव है तो फिर किसी दूसरे दोष की उसे आवश्यकता नहीं है। यदि उसके स्वभाव ही निंदा और चुगली करने का है तो उसे कोई अन्य पाप कर्म करने की आवश्यकता नहीं है। अगर व्यक्ति सत्य के पथ पर है तो उसे किसी तप की आवश्यकता नहीं है। इसी तरह यदि मन ही पवित्र है तो उसे किसी पवित्र स्थान पर जाकर स्नान करने की आवश्यकता नहीं है। हृदय में सद्भावना है तो फिर कोई दूसरा गुण क्या कर लेगा? संसार में अपने कर्मो से यश फैल रहा है तो फिर आभूषणों या सुंदर वस्त्रों को धारण करने से क्या लाभ? विद्या है तो धनहीन होना महत्वपूर्ण नहीं है। अगर अपयश फैल गया है तो फिर मृत्यु से भी मुक्ति नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में आकर अपने दैहिक निर्वहन के लिये भौतिक पदार्थों की आवश्यकता होती है पर उसके लिये अपनी आत्मा को भुलाकर उनमें लिप्त होने से कोई लाभ नहीं है। इस संसार के सभी भौतिक पदार्थ नष्ट प्रायः है पर मनुष्य द्वारा अपने सतकर्मों से अर्जित यश ही उसके बाद चलता रहता है। दुर्गुण तो स्वाभाविक रूप से आते हैं पर गुणों को बनाये रखने के लिये प्रयास करना पड़ता है। उसी तरह अपकीर्ति तो स्वतः ही फैलती है पर कीर्ति फैलाने के लिये प्रयास करना पड़ता है। आशय यह है कि अगर हम अपने ऊपर मानसिक रूप से नियंत्रण नहीं करेंगे तो हमारे कदम स्वतः ही भटकाव की राह पर चल पड़ेंगे।
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Saturday, May 23, 2009

चाणक्य नीति-विद्यार्थी के लिए कामनाओं का त्याग ज़रूरी

नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि
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सुखार्थी वा त्यजेविद्वधां विद्याथी वा त्यजेत् सुखम्
सुखार्थिनः कुतो विद्वा विद्यार्थिनः कुतो सुखम्।।

                    हिंदी में भावार्थ- सुख की कामना हो तो विद्या की इच्छा त्याग दें और यदि विद्या प्राप्त करने का उद्देश्य हो तो सुख की कामना त्याग दें। सुख की चाहत करने वालों को विद्या और विद्या प्राप्त की चाहता करने वाले का सुख का विचार नहीं करना चाहिये।
                       वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पहले गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी जहां शिष्य को हर तरह के विषय का ज्ञान प्रदान किया जाता था । जब गुरुकुल से शिष्य निकलता था तो वह हर विधा में पारंगत होता था। राजा महाराजा तक के बच्चे वहां गुरु और आश्रम की सेवा में ऐसे काम करते थे जिनको मजदूर करते हैं। इस तरह अधिक शिक्षि होने पर भी उनमें छोटे काम के प्रति उपेक्षा का भाव नहीं होता था।
आधुनिक शिक्षा में छात्रों को अपने ही छात्रावास में अनेक प्रकार की सुविधा दिलाने के विज्ञापन देखने पर यह आभास होता है कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में विद्या कम सुविधायें अधिक देने पर विचार होता है। फिर अपने घर पर ही शिक्षा प्राप्त करने की प्रवृत्ति ने छात्रों के ज्ञान को सीमित कर दिया है। वह विद्यालयों और महाविद्यालयों में अपने विषय से संबद्ध शिक्षा प्राप्त तो कर लेते हैं पर जीवन के रहस्य, चरित्र और नैतिकता के सिद्धांतों को उनको ज्ञान नहीं रहता।

                        शिक्षित तो हमारे समाज में बहुत हैं पर विद्याधर और ज्ञानी कितने हैं यह हम देख ही रहे हैं। सारे सुख और सुविधायें होते हुए अक्षर ज्ञान तो प्राप्त किया जा सकता है पर अक्षर विद्या बहुत बृहद है उसे समझने के लिये यह जरूरी है कि सुखों का त्याग किया जाये। विद्या से आशय अपने विषय के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान होने से भी है जो आजकल बहुत कम लोगों के पास है। इसका कारण यह है कि छात्रों को शिक्षा के दौरान ही विलासित की वस्तुओं के उपभोग की आदत पड़ जाती है। वैसे भी आजकल सुख सुविधाओं के साधनों प्रचुरता है। घर में टीवी, कूलर, फ्रिज तथा तीव्रगामी वाहनों की उपलब्धता ने आज की पीढ़ी की संघर्ष क्षमता को कम किया है। यही कारण है कि अनेक शिक्षा मंडलों के परीक्षा परिणाम कभी निराशाजनक रहे हैं। मनोरंजन के साधन इतने हैं कि उनसे विद्यार्थियों का ध्यान हटाना आसान काम नहीं रहा। इस पर इतने सारे चैनल और एफ. एम. रेडियो स्टेशन है कि विद्यार्थी उनसे मनोरंजन प्राप्त करें कि पढ़ें यह समझ में नहीं आता।
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