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Friday, July 01, 2011

पतंजलि योग साहित्य-समाधि में सारे क्लशों का नाश होता है (patanjali yog sahitya-samadhi mein sare kleshoh ka nash)

           योग साधना भारतीय अध्यात्म दर्शन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।हम जानते हैं कि हमारे हिमालयीन क्षेत्रों में अनेक ऐसे तपस्वी रहते हैं जो वहां से कभी नीचे या बाहर नहीं आते। अक्सर कुछ लोग उन पर आक्षेप करते हैं कि अगर वह वाकई तपस्वी हैं तो वह क्यों नहीं समाज का नेतृत्व करने के लिये बाहर आते। उन पर पर अकर्मण्यता का आरोप भी लगाया जाता है। इसके बावजूद उनके भक्त और शिष्य उनके पास जाते हैं। इनमें से कुछ ऋषि तो अपने भक्तों तथा शिष्यों की सेवा को भी स्वीकार नहीं करते और इसकी उनको आवश्यकता भी नहीं होती क्योंकि वह ज्ञानी महात्मा आहार विहार तथा प्रचार के लोभ में नहीं फंसते।
          भले ही हमारे देश के कुछ अज्ञानी लोग उन पर आक्षेप करें पर सच यह है कि ऐसे लोग महान योगी होने के साथ महान तत्वज्ञानी भी होते हैं। हम लोग अक्सर ज्ञान की चरम सीमा यह समझते हैं कि उसे दूसरों को सुनाया जाये या उसका नकदीकरण हो। यह अल्पज्ञान के साथ ही अहंकार का भी प्रमाण हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में कहा भी है उनके ज्ञान का प्रचार केवल भक्तों में ही किया जाये जबकि हम देख रहे हैं कि व्यवसायिक प्रवचनकर्ता चाहे जहां उसे सुनाते रहते हैं। यह अलग बात है कि इसका प्रभाव कहीं परिलक्षित नहीं होता। दरअसल महाज्ञानी धर्ममेय समाधि में लीन रहते हैं जहां उनको मान पाने का लोभी नहीं होता। इस वजह से उनके सारे क्लेश भी समाप्त हो जाते हैं।
       पतंजलि योग में कहा गया है कि
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         प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेक ख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः।।
       ‘‘जिस योगी का तत्वज्ञान के महत्व में भी विरक्ति हो जाती है उसका विवेक और ज्ञान सर्वथा प्रकाशमान रहता है और उसे ही धर्ममेय समाधि कहा जाता है।
तत क्लेशकर्मनिवृत्तिः
         ‘‘उस समय उसके अंदर क्लेश और कर्मों का सर्वथा नाश हो जाता है।
        तद सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेमल्पम्।।
      ‘उस समय उसके मन से सारे परदे और मल हट चुका होता है। ऐसा ज्ञान अनंत है इस कारण क्लेश पदार्थ कम हो जाते हैं।’
        देखा जाये तो हमारे अधिकतर संकट लोभ, लालच, तथा अहंकार की वजह से आते हैं। जब मनुष्य इससे विरक्त हो जाता है तब उसका जीवन शांति से बीतता है। ऐसा तभी संभव है कि जब कोई धर्ममेय समाधि में दक्षता प्राप्त कर लेता है।समाधि देह और मन के विकार रहित होने का सबसे बड़ा प्रतीक है।
लेखक एवं संपादक दीपक राज कुकरेजा भारतदीपग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep',Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com
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Tuesday, June 14, 2011

भर्तृहरि नीति शतक से संदेश-मनुष्य अपना जीवन भोजन में ही गुजार देता है

        इस संसार में माया और सत्य का संयोग और संघर्ष सदैव चलता रहा है। ईमानदार, परिश्रमी और संयमी लोगों की सक्रियता कम  होती है जिस कारण उनके पास अकूत धन संपदा नहीं होती जबकि भ्रष्ट और बेईमान लोगों की सक्रियता अधिक होने से उनका वैभव चारों तरफ फैला दिखता है। कभी कभी तो ऐसा ऐसा अनुभव होता है कि जैसे पूरा समाज ही बेईमान है। यह बात नहीं है क्योंकि हम अगर आंखें खुली रखकर अपने मस्तिष्क के चिंतन को व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो आज भी मेहतनकश तथा गरीब लोगों की संख्या अधिक है। अनुचित ढंग  की कमाई से लोगों ने ऊंची इमारतें बना लीं और अपनी असलियत छिपाने के लिये समाज सेवा का चोगा ओढ़कर वह प्रचार में अपने विज्ञापनों के कारण प्रसिद्ध भी हो रहे हैं पर जहां पर आत्मिक सुख की बात आती है तो वह केवल सत्य पथ पर चलने वाले लोगों के भाग्य में ही आता है।
         भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि 
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           हिंसाशून्यमयल्लयमशनं धांत्रा मरुत्कल्पितं व्यालानां पशवस्तणांकुरभुजस्तुष्टः स्थलीशायिनः।
          संसारार्णवलंधनक्षमर्थियां वृत्तिः कृता सा नृणां तामन्वेषयतां प्रयांति संततं सर्वे समाप्ति गुणाः।।
          ‘‘विधाता ने सापों के लिये भोजन के रूप में हवा का निर्माण किया जो उनको बिना किसी हिंसा के प्राप्त हो जाती है। पशुओं के लिये घास बनाई और सोने के लिये धरती का बिछौना बनाया। परंतु मनुष्य बुद्धिबल से ही भोजन प्राप्त कर सकता है इसलिये उसका पूरा जीवन केवल उसी में ही लग जाता है।’’
         मनुष्य का पेट तो रोटी से भी भर जाता है पर उसका मन फिर भी नहीं मानता। उसकी बुद्धि लोभ, लालच और मोह में इस तरह फंस जाती है कि हमेशा ही वह पैसा, पद और प्रतिष्ठा पाने के लिये इधर उधर भटकता है। अनेक लोग तो ऐसे हैं जो अच्छा खासा कमाते हैं पर कहते हैं कि ईमानदारी से उनका घर नहीं चल सकता। जबकि इस समाज में ऐसे भी लोग भी है जो केवल वेतन या थोड़ी कमाई के भी अपना जीवन यापन कर शांति से जीवन बिताते हैं। दरअसल हर जीव का दाता तो भगवान है पर जो लोग बेईमानी से धन कमाते हैं वह परिवार की जरूरतों को पूरा करने का ढोंग भले ही कर कर्ता बनने की खुशी पाते हैं पर वह उनका वहम है। अगर यह बेईमान देह त्याग भी दें तो भी उनका परिवार जिंदा रहेगा और उसके सदस्य अपने जीवन यापन के लिये कोई दूसरा मार्ग ढूंढ लेगा। ऐसे में उनकी परिवार की मज़बूरी केवल स्वयं को धोखा देने के लिये है।
          कहने का अभिप्राय यह है कि सभी का दाता परमात्मा है और बेईमानी और भ्रष्टाचार के लोग अपनी बाध्यताओं का दिखावा करें ऐसा करके वह स्वयं को धोखा देते हैं। अगर आदमी आत्ममंथन करे तभी इस बात को समझ सकता है।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Saturday, February 05, 2011

आलस्य मानव का बहुत बड़ा दुश्मन-हिन्दी अध्यात्मिक चिंतन

         मनुष्य स्वभाव में आलस्य का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है। संत कबीर दास जी ने कहा भी है कि ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय हो जायेगी बहुरि करेगा कब।’ हर मनुष्य सोचता है कि अपना काम तो वह कभी भी कर सकता है पर ऐसा सोचते हुए उसका समय निकलता जाता है। चतुर मनुष्य इस बात को जानते हैं इसलिये ही वह विकास के पथ पर चलते हैं। अक्सर लोग अपनी असफलता और निराशा को लेकर भाग्य को कोसते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि विकास का समय हर आदमी के पास आता है और जो अपने ज्ञान और विवेक से उसका लाभ उठाते हैं उनकी पीढ़ियों का भी भविष्य सुधर जाता है। संसार में सफल और प्रभावशाली व्यक्त्तिव का स्वामी, उद्योगपति, तथा प्रतिष्ठाप्राप्त लोगों की संख्या आम लोगों से कम होती है इसका कारण यह है कि सभी लोग समय का महत्व नहीं समझते और आलस्य के भाव से ग्रसित रहते हैं।
         जीवन में निरंतर सक्रिय रहने से मनुष्य के चेहरे और मन में स्फूर्ति बनी रहती है और बड़ी आयु होने पर भी उसका अहसास नहीं होता। आलस्य मनुष्य का एक बड़ा शत्रु माना जाता है इसलिये उससे मुक्ति पाना ही श्रेयस्कर है। कोई काम सामने आने पर उसको तुरंत प्रारंभ कर देना चाहिये यही जीवन में सफलता का मूलमंत्र है।
इस  विषय में कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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न कार्यकालं मतिमानतिक्रामेत्कदायन।
कथञ्चिदेव भवति कार्ये योगः सुदृर्ल्लभः।।

       "ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि अपने कार्य को निश्चित समय पर पूरा करे और इसमें किसी प्रकार की कोताही न बरते। कारण यह कि किसी भी कार्य में मन लगाना दुर्लभ है। फिर जीवन में संयोग बार बार नहीं आते।" 
सतां मार्गेण मतिमान् काले कर्म्म समाचरेत्।

काले समाचरन्साधु रसवत्फल्मश्नुते।।
      "ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को सत्य मार्ग पर स्थिर होकर समय आने अपना कार्य निश्चित रूप से आरंभ करना चाहिऐ। समय पर कार्य करने पर सारे फल प्रकट होते हैं।"
       समय समय पर हमें आत्ममंथन भी करना चाहिए कि हम कितना समय सार्थक कामों में कितना निरर्थक व्यतीत करते हैं।  यह मनुष्य स्वभाव भी है कि व्यसन तथा नकारात्मक कार्य उसे आकर्षित करते हैं और सकारात्मक काम करने की सोचने में भी आलस्य करता है। इस आदत से बचना चाहिए।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Saturday, September 04, 2010

मनुसंदेश-मन, वचन और वाणी के दंडों का उचित प्रयोग करें (man, vachan aur vani ke dand-manu sandesh)

त्रिदण्डमेतिन्निक्षप्य सर्वभूतेषु मानवः।
कामक्रोधी तु संयभ्य ततः सिद्धिं नियच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य सभी जीवों के साथ मन, शरीर वह वाणी तीनों प्रकार के दंडों का पालन करते हुए व्यवहार करता है वह किसी को पीड़ा नहीं देता। उसका काम व क्रोध के साथ ही अपने आचरण पर भी संयम रहता है जिसके कारण वह सिद्ध कहलाता है।
वाग्उण्डोऽडःकायादण्डस्तथैव च।
वसयैते निहिता बुद्धौ त्रिडण्डीति स उच्यते
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य सोच विचार कर वाणी का प्रयोग करते हुए देह और मन पर अपना नियंत्रण बनाये रखते हैं उसे त्रिदंडी कह जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने कर्मों से मन, शरीर और वाणी के द्वारा बंधा रहता है। जिस तरह का कोई कर्म करता है वैसा ही उसे परिणाम प्राप्त होता है। सिद्ध व्यक्ति वही है जो दृष्टा की तरह अपने मन, शरीर और वाणी को अभिव्यक्त होते देखता है। इसलिये वह उन पर नियंत्रण करता है। दृष्टा होने के कारण मनुष्य के किसी भी कर्म के प्रति अकर्ता का भाव पैदा होता है जिससे उसके अंतर्मन में विद्यमान अहंकार की भावना प्रायः समाप्त हो जाती है।
ऐसा निरंकार मनुष्य मन, वचन और शरीर से संयम पूर्वक जीवन व्यतीत करता है और इससे न केवल वह अपना बल्कि दूसरे लोगों के जीवन का भी उद्धार करता है। इससे दूसरे लोग भी प्रसन्न होते हैं और उसका सिद्ध की उपाधि प्रदान करते हैं। जिन मनुष्यों के पास तत्व ज्ञान है वह अपने मुख से आत्मप्रचार कर अपने व्यवहार और आचरण से ही अपनी सिद्धि को प्रमाण करते है। जिनको ऐसा सिद्ध बनना है उनको चाहिये कि वह मन, वचन और देह के दंडों पर अभ्यास से नियंत्रण करें। एक बात रखना चाहिए कि इस संसार में हम अपने कर्म से ही अपना यात्रा करते हैं और मन, वचन और वाणी में पवित्रता हमारा मार्ग सहज करती है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Monday, April 26, 2010

मनु दर्शन-झूठी गवाही देने वाले को होता है जलोदर रोग (jhoothi gavahi dena bura-manu darshan)

साक्ष्येऽनृतं वदन्याशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम्।
विवशः शमाजातीस्तरस्मात्साक्ष्यं वदेदृतम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
झूठी गवाही देने वाले मनुष्य, वरुण देवता के पाशों से बंधकर सैंकड़ों वर्षों तक जलोदर बीमारियों से ग्रसित जीवन गुजारता है। अतः हमेशा किसी के पक्ष में सच्ची गवाही ही देना चाहिये।
द्यौर्भूमिरापो हृदयं चंद्रर्काग्नि यमानिलाः।
रात्रिः सन्ध्ये च धर्मख्च वृत्तजाः सर्वदेहिनाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनु महाराज के अनुसार आकाश, पृथ्वी, पानी, हृदय, चंद्र, सूर्य, अग्नि, यम, वायु, रात संध्या और धर्म सभी प्राणियों के सत् असत् कर्मों को देखते हैं। इनको देवता ही समझना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्या हम सोचते हैं कि हम कोई भी काम कर रहे हैं तो दूसरा कोई उसे नहीं देख रहा? ऐसी गलती कभी न पालें। इस धरा पर ऐसे कई जीव विचरण कर रहे हैं जिनको हम नहीं देख पाते पर वह हमें देख रहे हैं। दूसरों की छोड़िये अपने अंदर के हृदय को ही कहां देख पाते हैं। यह हृदय भी देवता है पर उसे कहां समझ पाते हैं? वह लालायित रहता है धर्म और परोपकार का कार्य करने के लिये पर मनुष्य मन तो हमेशा अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर विचरण करता है। एक नहीं अनेक बार झूठ बोलते हैं। दूसरों की निंदा करने के लिये प्रवृत्त होने पर उसके लिये ऐसे किस्से गढ़ते हैं कि जो हम स्वयं जानते हैं कि वह सरासर झूठ है। मगर बोलते हैं यह मानते हुए कि कोई देख नहीं रहा है।

ऐसे भ्रम पालकर हम स्वयं को धोखा देते हैं। इस चंद्रमा, सूर्य नारायण, प्रथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के साथ हमारा हृदय देवता सब देख रहा है। समय आने पर यह देवता दंड भी देते हैं। अतः कोई भी अच्छा काम करते हुए इस बात की चिंता नहीं करना चाहिये कि कोई उसे देख नहीं रहा तो क्या सुफल मिलेगा तो बुरा कर्म करते हुए इस बात से लापरवाह भी न हों कि कौन देख रहा है जो सजा मिलेगी? झूठी गवाही देने वाले का बुरा हश्र होता है यह बात हमेशा याद रखना चाहिए।
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Saturday, April 17, 2010

पतंजलि योग दर्शन-योगाभ्यास से उत्पन्न विवेक से प्रकाश फैलता है

योगांगनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
हिन्दी में भावार्थ-
योग साधना के द्वारा अंगों का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होने पर जो विवेक का प्रकाश फैलता है उससे निश्चित रूप से ख्याति मिलती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पतंजलि योग शास्त्र में न केवल योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान की व्याख्या है बल्कि उसका महत्व भी दिया गया है।  अक्सर लोग योगासनों को सामान्य व्यायाम कहकर प्रचारित करते हैं जबकि इसे पतंजलि वैसा ही अनुष्ठान मानते हैं जैसे कि द्रव्य द्वारा किये जाने वाले यज्ञ और हवन।
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण भी योग साधना को एक तरह से यज्ञ मानने का संदेश देते हैं। अगर उनका आशय समझा जाये तो एक तरह से वह अपने भक्तों से इसी यज्ञ की अपेक्षा करते हुए कहते हों कि ‘मुझे योग यज्ञ से उत्पन्न ऊर्जा ही समर्पित करें।’
भगवान श्रीकृष्ण का आशय समझा जाये तो वह  यज्ञ से उत्पन्न अग्नि से ही संतुष्ट होते हैं।  यह यज्ञ सामग्री एक तरह से हमारा पसीना है जिससे देह के विकार निकलकर बाहर आकर नष्ट होते हैं और फिर प्राणयाम तथा ध्यान के संयोग से  उत्पन्न अमृत से  संपन्न हृदय के भाव  हम मंत्रोच्चार के द्वारा परमात्मा को प्रसाद की तरह चढ़ाते हैं।  सर्वशक्तिमान की इच्छा यही होती है कि उसका हर बंदा प्रसन्न और शुद्ध भाव से युक्त हो। योगसाधना उसका एक मार्ग है।  जो लोग योग साधना करते हैं उनको किसी अन्य प्रकार के अनुष्ठान की तो आवश्यकता ही नहीं रह जाती क्योंकि अपने मन, विचार, और बुद्धि की शुद्धि करने से स्वयं ही भक्ति का भाव पैदा होता है।  यह प्रक्रिया इतनी स्वाभाविक होती है कि मनुष्य को फिर किसी अन्य प्रकार से भक्ति करना सुहाता ही नहीं है क्योंकि पूरा दिन उसका मन और शरीर प्रफुल्लित भाव से विचरण करता है और रात्रि को विश्रामकाल प्रतिदिन मोक्ष प्राप्त करते हुए व्यतीत हो जाता है।
सबसे बड़ा लाभ यह है कि योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान से हमारी शरीर और मन की अशुद्धि दूर होने के बाद हमारे कर्म व्यवहार में जो आकर्षण उत्पन्न होता है उससे ख्याति फैलती है। इतना ही नहीं चेहरे पर तेजस्वी भाव देखकर दूसरे लोग प्रभावित भी होते हैं। एक बात याद रखें कि  इसका मतलब यह कतई नहीं है कि योग साधना से कोई चमत्कारी सिद्धि  मिल जाती है अलबत्ता मन और देह में पवित्रता आने से हमारे हाथ से अच्छे काम होते हैं जिससे उसका फल भी अच्चा मिलता है
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लेखक, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, April 09, 2010

विदुर नीति-उपकार करे वही सच्चा बंधु (upkar kare vahi bandhu-hindi sandesh)

सा बन्धुर्योऽनुबंघाति हितऽर्ये वा हितादरः।
अनुरक्तं विरक्त वा तन्मिंत्रमुपकारि यत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
वही बंधु है जो हमारे उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होने के साथ आदर करने वाला हो। अनुरक्त हो या विरक्त पर उपकार आवश्यक करे वही सच्चा बंधु है।  


 मित्रं विचार्य बहुशो ज्ञातदोषं परित्येजेत्।
त्यंजन्नभूतेदोषं हि धर्मार्थावुपहन्ति हिं।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद कौटिल्य के अनुसार अपने मित्रों के बारे में विचार करना चाहिए। अगर उनमें छल कपट या अन्य दोष दिखाई दे तो उसे त्याग दें।  ऐसा न करने पर न केवल धर्म की हानि होती है बल्कि जीवन में कष्ट भी उठाना पड़ता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समय के साथ समाज में खुलापन आ रहा है और मित्र संग्रह में लोगों की लापरवाही का नतीजा यह है कि सभी जगह खुद के साथ धोखे की शिकायत करते हुए मिलते हैं।  इतना ही नहीं युवा पीढ़ी तो हर मिलने और बातचीत करने वाले को अपना मित्र समझ लेती है। मित्र के गुणों की पहचान कोई नहीं करता।

मित्र का सबसे बड़ा गुण है कि वह हर समय सहयोग के लिये तत्पर दिखता  हो। इसके अलावा वह अन्य लोगों के सामने अपमानित न करे और साथ ही समान विचारधारा वाला हो। स्वभाव के विपरीत होने पर या विचारों की भिन्नता वाले से अधिक समय तक मित्रता नहीं चलती अगर चलती है तो धर्म की हानि उठानी पड़ सकती है।   इसके अलावा मित्र वह है जो कहीं अपने मित्र की गुप्त बातों को कहीं उजागर न करता हो।  इतना ही नहीं मित्र का अन्य मित्रों का समूह और कुल भी अनुकूल होना चाहिये।   अगर वह केवल दिखावे की मित्रता करता है तो आपके वह रहस्य जो दूसरों के जानने योग्य नहीं है सभी को पता चल जाते हैं।  दूसरी बात यह है कि मित्र जब हमारे साथ होता है तब हमारा लगता है पर जब दूसरी जगह होता है तो दूसरों का होता है-यह विचार भी करना चाहिये।

कुछ लोग केवल स्वार्थ की वजह से मित्रता करते हैं-वैसे आजकल अधिकतर संख्या ऐसे ही लोगों की है-इस विचार करना चाहिऐ। एकांत में  हमेशा अपने मित्र समूह पर चिंतन करते हुए जिनमें दोष दिखता है या जिनकी मित्रता सतही प्रतीत होती है उनका त्याग कर देना चाहिये।
इसके अलावा निकट रहने पर मित्र के प्रति अपने भाव का अवलोकन भी उससे कुछ समय दूर रहकर करना चाहिये। निकट रहने पर उसके प्रति मोह रहता है इसलिये यह पता नहीं लगता कि उसकी नीयत क्या है? दूर रहने पर उससे मोह कम हो जाता है तब यह पता लगता है कि उसके प्रति हमारे मन में क्या है? इतना ही न अपने बच्चों के मित्रों और मिलने जुलने वालों पर भी दृष्टिपात करना चाहिये। आजकल काम की व्यस्तताओं की वजह  से माता पिता को अपने बच्चों की देखभाल का पूरी तरह अवसर नहीं मिल पाता इसलिये उनको बरगलाने की घटनायें बढ़ रही है।  ऐसा उन्हीं माता पिता के साथ होता है जो अपने बच्चों के मित्रों की यह सोचकर उपेक्षा कर देते हैं कि ‘वह क्या कर लेगा?’
कहने का तात्पर्य यह है कि अपने घर के सदस्यों के मित्रों पर दृष्टिपात करना चाहिये। अगर अपने मित्र दोषपूर्ण लगें तो उनसे दूरी बनायें और घर के सदस्यों के हों तो उन्हें इसके लिये प्रेरित करें।  मित्र के गलत होने पर धर्म की हानि अवश्य होती है। इसलिए हितेषियों को ही अपना मित्र समझना चाहिए
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Wednesday, February 17, 2010

संत कबीर के दोहे-धर्म का असली स्वरूप समझना जरूरी

संत शिरोमणि कबीरदास अपने समय के धार्मिक विवादों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि
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कहै हिन्दु मोहि राम पिआरा, तुरक कहे रहिमाना।
आपस में दोऊ लरि-लरि मुए, मरम न कोऊ जाना।।
एक तरफ भारतीय हैं जो कहते हैं कि हमें राम प्यारा है दूसरी तरफ तुर्क हैं जो कहते हैं कि हम तो रहीम के बंदे हैं। दोनों आपस में लड़कर एक दूसरे को तबाह कर देते हैं पर धर्म का मर्म नहीं जानते।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जैसा कि इतिहास गवाह है कि भारत पर विदेशी हमले हुए। शुरुआती दौर में हमलावर केवल धन के लिये आये पर बाद में उनको लगा कि यह देश सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है तो यहीं अपना स्थाई निवास बना लिया। उनका उद्देश्य यहां शासन करना था पर इसमें भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान शक्ति उनके लिये बाधा थी। वह आसानी शासन करते पर भारत में ऐसे लोगों की तादाद अधिक थी जो किसी के राजा होने की परवाह नहीं करते थे। उनके लिये भगवान के बाद राजा का नंबर आता था जबकि विदेशी शासक चाहते थे कि भगवान से पहले उनकी प्रतिष्ठा बने। इसलिये उन्होंने अपने साथ कथित रूप से धार्मिक संत भी रखे। इसके अलावा शासन के कार्यक्षेत्र का विस्तार किया जिससे कि यहां के लोगों के जनजीवन में राज्य का दखल अधिक हो। कुछ लोग कहते हैं कि विदेशी लोगों ने इस देश को सभ्य बनाया है-यह दावा हास्यास्पद है। दरअसल विदेशी लोगों ने राज्य का समाज के कार्यक्षेत्र में दखल बढ़ाया ही है। यही कारण है कि अनेक ऐसे क्षेत्र जहां राज्य का काम नहीं है वहां भी उसका विस्तार इस तरह हो गया जिससे समाज कमजोर हो गये हैं। फिर फूट डालो राज्य करो की तर्ज पर विदेशी शासक यहां जमे रहे और उन्हें अपने धर्म से इस देश की अध्यात्मिक विचाराधारा का कमतर साबित करने का प्रयास किया। इसलिये झगड़े बढ़े और आज तक उनको देखा जा सकता है। तुर्क यानि मध्य एशिया के देशों के लोग अपने रहीम (कविवर रहीम नहीं) को मानते जबकि भारत में तो भगवान राम की महिमा गायी जाती रही है। इस तरह झगड़े शुरु हुए जो अभी तक जारी हैं जिससे देश का आर्थिक, सामाजिक, तथा वैचारिक विकास अवरुद्ध हो गया है।
मुख्य बात है धर्म का मर्म। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ किसी धर्म की संज्ञावाचक पहचान नहीं देते बल्कि कर्म की शुद्धता ही धर्म की पहचान मानी जाती है। इसके विपरीत बाहर से आयी विचाराधारायें न केवल नाम से पहचाने जाते हैं बल्कि उनके इष्ट की पूजा के तरीके और स्वयं के पहनावे को लेकर भी अनेक प्रतिबंध हैं। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान शुद्ध निष्काम कर्म और हृदय से की गयी भक्ति को ही धर्म का रूप मानता है जबकि बाहर से आयातित विचार तो आदमी के जन्म और मरण में भी रीतियां सिखाते हैं। भारतीय अध्यात्मिक गंथों में धर्म का अर्थ भले ही छोटा है पर उसका दायरा व्यापक है। सबसे बड़ी बात यह है कि अहिंसा धर्म की प्रधानता है जबकि विदेशी हमलावर यहां लूटने आये तो उनके लिये हिंसा करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। इस तरह के हमलों ने ही यहां के निवासियों को शायद इतना विचलित कर दिया कि उन्हें अपने नाम और पहचार के साथ हिन्दू धर्म जोड़कर संगठित होने का विचार किया। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि अंततः यह एक राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति का एक अच्छा प्रयास रहा होगा जिसकी बाध्यता रही होगी।
बहरहाल जो बीत गया उसे भुलाना चाहिये था पर आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो इस प्रकार के विवाद का जारी रखना चाहते हैं। जब हमारे लिये धर्म का सूक्ष्म अर्थ होते हुए भी उसका दायरा बड़ा है तो हमें किसी भी विचाराधारा या धर्म पर आक्षेप न करते हुए अपने भारतीय होने की अनुभूति के साथ जीना चाहिये। हम अगर इतिहास गर्व या कुंठा के साथ जीना चाहेंगे तो सिवाय संताप के कुछ नहीं मिलना है। इस देश में विभिन्न देशों से लोग आये पर अब यहीं के होेकर रह गये। अब हमें नये सिरे से सोचना चाहिए पर समस्या यह है कि समाज में संघर्ष पैदा कर कुछ लोग अपने हित साध रहे हैं। वह धर्म पर बहसें और विवाद खड़े करते हैं पर जानते ही नहीं कि उसका आशय क्या है? सच तो यह है कि भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान ही सत्य की अनुभूति कराता है जहां तक धर्म का सवाल है तो उसके नाम पर ढेर सारे भ्रम हैं और इतिहासकार क्या कहते हैं यह अलग बात है पर हमारा विचार तो यह है कि कोई धार्मिक विचाराधारा केवल राजनीतिक संबल पाने के लिये प्रतिपादित की गयी हैं और उनका उद्देश्य प्रेम या अमन लाना नहीं है जैसा कि कुछ शायर यह कवि कहते हैं। बेहतर यही है कि हम अपना मार्ग भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथों में ही ढूंढें। उससे भी बड़ी बात यह है कि हम दूसरों को हानि पहुंचाने वाले विचारों से परे होकर सभी के सुख पर विचार करें। यह प्रेम कोई सिखाने या समझाने का विषय नहीं है। मनुष्य में यह गुण स्वाभाविक रूप से रहता है। कहने का अभिप्राय यह है कि हमें अपने प्राचीन ग्रंथो का निरंतर अध्ययन करते रहना चाहिये ताकि हमें ज्ञान प्राप्त हो और किसी द्वारा बताये गये गलत मार्ग का अनुसरण न करें।
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Saturday, January 23, 2010

चाणक्य दर्शन-धर्मग्रंथों की आलोचना वाले कष्ट उठाते हैं (Dhrama granthon ki ninda galat-hindu dharma sandesh)

दारिद्रयनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी।।
हिंदी में भावार्थ-
दान से दरिद्रता, शील भाव से दुर्भाग्य तथा निष्ठा से भय का नाश होता है।
अन्यथा वेदपाण्डितयं शास्त्रमाचारमन्यतथा।
अन्यथा कुवचः शान्तं लोकाः क्लिश्चन्ति चान्यथा।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो लोग वेदों में वर्णित तत्वज्ञान, शास्त्रों में विधान और उत्तम पुरुषों के चरित्र को गलत बताते हैं वह इस लोक में स्वयं ही भारी कष्ट उठाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-कभी भी किसी भी प्रकार के धर्मग्रंथ की आलोचना या विरोध नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि धर्म ग्रंथ तो निश्चित कालावधि में तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार लिखे जाते हैं जबकि पृथ्वी और प्रकृति के स्वरूप में बदलाव के साथ ही मनुष्य की जीवन शैली में बदलाव आता है और इसी कारण धर्मग्रंथों के कुछ संदेश समय के साथ अप्रासंगिक लगते हैं। अतः धर्म ग्रंथों की आलोचना करना उचित नहीं है।
हां, भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित तत्वज्ञान में कभी बदलाव नहीं आता क्योंकि उसमें जीवन के मूल तत्वों की जानकारी देने के साथ ही उसका सदुपयोग करने की प्रक्रिया का भी वर्णन मिलता है। विश्व में भले ही कितने प्रकार के भौतिक परिवर्तन आयें पर जीवन के तत्वों का निर्धारण करने वाली प्रक्रिया में बदलाव संभव नहीं है।

भारतीय वेदों तथ अन्य धर्मग्रंथों की आलोचना करने वाले अपना उल्लू सीधा करने करने के लिये भारतीय धर्मग्रंथों के ऐसे चंद श्लोक या दोहे लेकर लोगों को बरगलाते हैं जो अब अप्रासांगिक हो गये हैं या लोग उस पर ध्यान नहीं देते। ऐसे लोग अज्ञान के अंधेरे में रहते हैं क्योंकि वह उनमें वर्णित तत्वज्ञान को नहीं जानते। ऐसे लोग भले ही चाहे कितनी भी प्रतिष्ठा या धन अर्जित कर लें पर सुखी नहीं रहते। वह नहीं जानते कि समाज के सहज संचालन के लिये भारतीय अध्यात्मिक दर्शन बहुत महत्वपूर्ण है। वह धनिक लोगों को दान देने के लिये प्रेरित करता है ताकि समाज की गरीब पर नियंत्रण हो। इतना ही नहीं उत्तम चरित्र से ही व्यक्ति के साथ ही समाज का निर्माण होता है। अक्सर लोग दूसरों के चरित्र पर तो लांछन लगाते हैं पर अपनी तरफ नहीं देखते। अगर सभी लोग तय करें तकि हम अपना चरित्र सही रखेंगे तो निश्चित रूप से देश में एक महान समाज का निर्माण होगा। यही बात भय के संबंध में भी कही जा सकती है। जब व्यक्ति की सब तरफ निष्ठा समाप्त हो जाती है तो वह अपने आप को एकाकी अनुभव करता है जिससे उसके मन भय का निर्माण होता है। इसलिये भगवान भक्ति से पुण्य मिले या नहीं पर अपने अंदर एक भय होता है जिससे हम निजात पा सकते हैं। कहने का का तात्पर्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथो की आलोचना करने वाले न अपने को सुखी रख पाते हैं न उन लोगों को लाभ होता है जो उनका अनुसरण करते हैं। सच बात तो यह है कि दूसरे की आस्था और भक्ति पर सवाल उठाने की बजाय अपने चरित्र और स्थितियों का मंथन करना चाहिये। भारतीय धर्म ग्रंथों पर आक्षेप करने वाले यह भूल जाते हैं कि उनमें वर्णित ऐसा ज्ञान है जिसकी आज विदेशों में भी साख है।
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Tuesday, January 19, 2010

विदुर नीति-अनुशासनहीनता से ऐश्वर्य नष्ट हो जाता है

अर्थानामीश्वरो यः स्यादिन्द्रियाणमीनश्वरः।
इन्द्रियाणामनैश्वर्यर्दिश्वर्याद भ्रश्यते हि सः।।
हिन्दी में भावार्थ-
अधिक धन का स्वामी होने भी इंद्रियों पर अधिकार करने की बजाय उसके वश में हो जाने वाला भी मनुष्य ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है।
धर्मार्थोश्यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानगुः।
श्रीप्राणधनदारेभ्यः क्षिप्र स परिहीयते।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर के कथनानुसार जो मनुष्य धर्म और अर्थ इंद्रियों के वश में हो जाता है वह शीघ्र ही अपने ऐश्वर्य, प्राण, धन, स्त्री को अपने हाथ से गंवा बैठता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अनेक लोगों को यह लगता है कि अगर अधिक धन आ गया तो जैसे सारा संसार जीत लिया। इस भ्रम में अनेक लोग धन के कारण अनुशासहीनता पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि शीघ्र ही न केवल अपना वैभव गंवाते हैं बल्कि कहीं कहीं उनको शारीरिक हानि भी झेलनी पड़ती हैं। जीवन में दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन का होना जरूरी है। अधिक धन है तो भी समाज में सम्मान प्राप्त होता है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि अनुशासनहीनता बरती जाये। ऐसे ढेर सारे उदाहरण है जिसमें अनेक धनपतियों की औलादें मदांध होकर ऐसे अपराधिक कार्य इस आशय से करती हैं कि उनके पालक धन से कानून खरीद लेंगे। ऐसा होता भी है पर उसकी एक सीमा होती है जहां उसका अतिक्रमण होता है वहां फिर सींखचों के अंदर भी जाना पड़ता है। इस समय ऐसा दौर भी है जिसमें धनपति स्वयं और उनकी औलादें समाज में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिये अनुशासन हीनता दिखाते हैं। धन उनकी आंखों बंद कर देता है और उनको यह ज्ञान नहीं रहता कि आजकल प्रचार माध्यम सशक्त हो गये हैं जिनकी वजह से हर समाचार बहुत जल्दी ही लोगों तक पहुंचता है। भले ही यह प्रचार माध्यम भी धनपतियों के हैं पर उनको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये सनसनीखेज खबरों की आवश्यकता होती है और ऐसे में किसी धनी, प्रतिष्ठित या बाहुबली द्वारा किसी प्रकार के अपराध की जानकारी मिलने पर उसे जोरदार ढंग से प्रसारित भी करते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि अब वह समय चला गया जब धन और वैभव का प्रदर्शन करने के लिये अनुशासनहीनता बरतना आवश्यक लगता था।
आदमी के पास चाहे कितना भी धन हो उसे जीवन में अनुशासन अवश्य रखना चाहिये। याद रहे धन की असीमित शक्ति है पर देह की सीमायें हैं और किसी प्रकार की अनुशासनहीनता का दुष्परिणाम उसे ही भोगना पड़ता है। आजकल धनी लोगों द्वारा अनुशासनहीनता के कारण ही समाज में वैमनस्य फैल रहा है और अपराध बढ़ रहे हैं। सच तो यह है कि समाज के उच्च वर्ग के प्रति सामान्य वर्ग लोगों के मन में अब सद्भावना रही नहीं है भले ही उसका दिखावा करते हों
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Friday, January 15, 2010

चाणक्य की नीति-पुरानी बातों को याद करने से लाभ नहीं

अहो बत विचित्राणि चरितानि महाऽऽत्मनाम्।
लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च।।
हिंदी में भावार्थ-
अहे! महात्माओं का चरित्र भी बहुत विचित्र होता है। एक तरफ वह धन को तिनके समान मानते हैं किन्तु उसके भार से झुक जाते हैं।
गते शोको न कत्र्तव्यो भविष्यं नैव चिनतयेत्।
वर्तमानेन कालेन प्रवर्तन्ते विचक्षणाः।।
हिंदी में भावार्थ-
पहले हुई घटना को याद करने से कोई लाभ नहीं है। इससे अच्छा है भविष्य की चिंता करें। बुद्धिमान लोग हमेशा ही वर्तमान काल में कार्य करने के लिये प्रवृत्त होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर दिन नया है यही मानने वाले इस जीवन का आनंद उठाते हैं। पहले की न केवल बुरी बल्कि अच्छी घटनाओं का भी भुला दें। कल जो बीत गया वह लौट कर नहीं आयेगा। अपनी असफलता को ही नहीं वरन् सफलता को भी भूल जायें। यही जीवन के आनंद उठाने का नियम है।
यदि कल हुए अपमान का स्मरण किया तो आज भी तकलीफ देगा। अगर कल हुए सम्मान को दिमाग में संजोया तो आज कर्म करने के लिये मन प्रवृत्त नहीं होगा। कल अपने दैहिक कर्म से जो सांसरिक उपलब्धि पायी उस पर गर्व किया तो फिर आज कोई अच्छा कर्म नहीं कर सकते। अगर कल कहीं कोई नाकामी मिली तो उसका स्मरण किसी नये कार्य में मन नहीं लगने देगा। कहने का मतलब है कि अपने स्मृतियों से जितना दूर रहें अच्छा है वह आंनद दें या कष्ट पर अगले कार्य के लिये व्यवधान पैदा करती हैं। मनुष्य जीवन में स्वच्छंद ढंग से कार्य करने का जो अवसर मिलता है वह परमात्मा की कृपा समझना चाहिये। दुःख सुख, मान अपमान और सफलता और सफलता केवल दृश्य मात्र है और उसके दृष्टा की तरह देखें तो उनका अच्छा प्रभाव अहंकार नहीं आने देता और बुरा विचलित नहीं करता।
इस संसार में अनेक ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि धन तिनके के समान है पर उसका भार हर कोई नहीं उठा पाता। अगर सज्जन आदमी है तो धन आने पर अधिक विनम्र हो जाता है और अगर दुर्जन है तो उसे अहंकार आ जाता है। यह भी अजीब बात है कि सभी धन को सामान्य मानते हैं पर दोनों ही प्रकार के लाग उसका भार नहीं उठा पाते। सच तो यह है कि जितना इस संसार में परमात्मा की भूमिका है उतनी ही माया भी निभाती है और कभी कभी तो उससे भी ज्यादा जब उसे पाकर आदमी परमात्मा को भी भूल जाता है। कुल मिलाकर यह संसार विचित्र बातों से भरा पड़ा है और उसे समझने के लिये बुद्धि और ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है जो कि स्वाध्याय से ही प्राप्त किया जा सकता है।
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Saturday, January 09, 2010

मनुस्मृति-विषयासक्त राजा दुष्टों को दंड नहीं दे पाता (raja aur dosht-hindi sandesh)

स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना।
न शक्तो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेनणु च।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस राजा के सहायक न हों या फिर मूर्ख, लालची, बुद्धिहीन हों एवं स्वयं भी जो विषय और कामनाओं में लीन रहता हो ऐसे राजा को दंड का उपयोग उचित ढंग से प्रयोग करना नहीं आता।
स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। से प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी राज्य का राजा हो या समाज तथा परिवार का मुखिया उसे अपने संरक्षितों के शत्रुओं से किसी प्रकार की उदारता न बरतते हुए उनको कड़ा दंड दे या कार्रवाई करे। जहां मुखिया या स्वामी का कोई सहायक न हो और वही शराब जैसे व्यसनों में डूबा रहे उसके समूह का सर्वनाश हो जाता है। विषय और कामनाओं का चिंतन करने वाले मनुष्य की बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसे में उसके आसपास कामी, क्रोधी, लोभी तथा अहंकारी लोगों का मित्र समूह एकत्रित होकर उसे उल्टी सीधी सलाहें देता है जिससे स्वामी के साथ उसके कुल, राज्य और समाज का भी नाश होता है।
इसलिये जिन लोगों को परमात्मा की कृपा से कहीं स्वामित्व का अधिकार प्राप्त होता है वह अपने सरंक्षित तथा शरणागत जीवों के शत्रुओं के विरुद्ध कठोर दंड का उपयोग करें तथा जो मित्र हों उनके साथ सौहार्द का व्यवहार करते हुए अपने समूह का हित सोचें। इसके साथ ही ऐसे विद्वानों का हमेशा सम्मान करें तो संकट पड़ने पर अपने बौद्धिक कौशल से उसे तथा उसके समूह को उबार सकें। समाज के शीर्षस्थ वर्ग का यह दायित्व है कि वह छोटे वर्ग की रक्षा करे। जब शासक और उच्च वर्ग के लोग विषयास्क्त हो जाते हैं तो उनका सभी से नियंत्रण समाप्त हो जाता है और इससे समाज में अव्यवस्था व्याप्त हो जाती है। आजकल हम अपने समाज की हालत देखकर इस सत्य को समझ सकते हैं।
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Saturday, December 26, 2009

चाणक्य नीति शास्त्र-दुष्ट की संगत कर ली तो सांप क्या कर लेगा?

नीति विशारद चाणक्य महाराज का कहना है कि
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क्षान्तिश्चत्कवचेन किं किमनिरभिः क्रोधीऽस्ति चेद्दिहिनां ज्ञातिश्चयेदनलेन किं यदि सहृदद्दिव्यौषधं किं फलम्।
किं सर्पैयीदे दुर्जनाः किमु धनैर्विद्याऽनवद्या चदि व्रीडा चेत्किमुभूषणै सुकविता यद्यपि राज्येन किम्।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि क्षमा हो तो किसी कवच की आवश्यकता नहीं है। यदि मन में क्रोध है तो फिर किसी शत्रु की क्या आवश्यकता? यदि मंत्र है तो औषधियो की आवश्यकता नहीं है। यदि अपने दुष्ट की संगत कर ली तो सांप की क्या कर लेगा? विद्या है तो धन की मदद की आवश्यकता नहीं। यदि लज्जा है तो अन्य आभूषण की आवश्यकता नहीं है।
वर्तमान में संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- ध्यान दें तो भर्तृहरि महाराज ने पूरा जीवन सहजता से व्यतीत करने वाला दर्शन प्रस्तुत किया है। अगर आदमी विनम्र हो और दूसरे के अपराधों को क्षमा करे तो उसे कहीं से खतरा नहीं रहता। जैसा कि हम देख रहे हैं कि आजकल अस्त्र शस्त्र रखने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसका कारण यह है कि लोगों का विश्वास अपने ऊपर से उठ गया है। अपने छोटे छोटे विवादों के बड़े हमले में परिवर्तित होने का भय उनको रहता है इसलिये ही लोग हथियार रखते हैं। उनको यह भी विश्वास है कि वह किसी को क्षमा नहीं करते इसलिये उनके क्रोध या हिंसा का शिकार कभी भी उन पर हमला कर सकता है। जिन लोगों में क्षमा का भाव है वह किसी प्रकार की आशंका से रहित होकर जीवन व्यतीत करते हैं। क्षमा का भाव होता है तो क्रोध का भाव स्वतः ही दूर रहता है। ऐसे में अन्य कोई शत्रु नहीं होता जिससे आशंकित होकर हम अपनी सुरक्षा करें।

उसी तरह अपनी संगत का भी ध्यान रखना चाहिये। जिनकी सामाजिक छबि खराब है उनसे दूर रहें इसी में अपना हित समझें। वैसे आजकल तो हो यह रहा है कि लोग दादा और गुंडा टाईप के लोगों से मित्रता करने में अपनी इज्जत समझते हैं मगर सच तो यह है कि ऐसे लोग उसी व्यक्ति को तकलीफ देते हैं जो उनको जानता है। इसके अलावा अपने दोस्तों से रुतवे के बदल अच्छी खासी कीमत भी वसूल करते हैं भले ही उनका कोई काम नहीं करते हों पर भविष्य में सहयोग का विश्वास दिलाते हैं। देखा यह गया है कि दुष्ट लोगों की संगत हमेशा ही दुःखदायी होती है।
अपनी देह को स्वस्थ रखने के लिये प्रतिदिन योग साधना के साथ अगर मंत्र जाप करें तो फिर आप औषधियों के नाम जानने का भी प्रयास न करें। राह चलते हुए फाईव स्टार टाईप के अस्पताल देखकर भी आपको यह ख्याल नहीं आयेगा कि कभी आपको वहां आना है।
जहां तक हो सके अच्छी बातों का अध्ययन और श्रवण करें ताकि समय पड़ने पर आप अपनी रक्षा कर सकें। याद रखिये जीवन में रक्षा के लिये ज्ञान सेनापति का काम करता है। अगर आपके पास धन अल्प मात्रा में है और ज्ञान अधिक मात्रा में तो निश्चिंत रहिये। ज्ञान की शक्ति के सहारे दूसरों की चालाकी, धूर्तता तथा लालच देकर फंसाने की योजनाओं से बचा जा सकता है। अगर ज्ञान न हो तो दूसरे लोग हम पर शासन करने लगते हैं।
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Thursday, December 24, 2009

मनु दर्शन-अध्यात्मिक ज्ञान से ही सुख पूर्वक विचरण संभव (adhyatmik gyan aur sukh-hidnu dharm sandesh)

अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः
आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह

हिंदी में भावार्थ-अध्यात्म विषयों में अपनी रुचि रखते हुए सभी वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति निरपेक्ष भाव रखना चाहिये। इसके साथ ही शाकाहारी तथा इद्रियों से संबंधित विषयो में निर्लिप्त भाव रखते हुए अपने अध्यात्म उत्थान के लिये अपने प्रयास करते रहना चाहिये। इससे मनुष्य सुखपूर्वक इस दुनियां में विचरण कर सकता है।
अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्
न क्रुद्धयंन्तं प्रतिक्रुध्येदाक्रृष्टः कुशलं वदेत्
सप्तद्वाराऽवकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत्

हिंदी में भावार्थ-दूसरे के कड़वे वचनों को सहना करना चाहिये। अभद्र शब्द (गाली)का उत्तर कभी वैसा ही नहीं देना चाहिये। न ही किसी का अपमान करना चाहिये। यह शरीर तो नश्वर है इसके लिये किसी से शत्रुता करना ठीक नहीं माना जा सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-खानपान और रहन सहन में आई आधुनिकता ने लोगों की सहनशीलता को कम कर दिया है। लोग जरा जरा सी बात पर उत्तेजित होकर झगड़ा करने पर आमादा है। स्वयं के पास कितना भी बड़ा पद,धन और वैभव हो पर दूसरे का सुख सहन नहीं कर पाते। गाली का जवाब गाली से देना के लिये सभी तत्पर हैं। अध्यात्म विषय के बारे में लोगों का कहना है कि उसमें तो वृद्धावस्था में ही जाकर दिलचस्पी रखना चाहिये। इस अज्ञानता का परिणामस्वरूप आदमी वृद्धावस्था में अधिक दुखी होता हैं। अगर बचपन से ही अध्यात्म में रुचि रखी जाये तो फिर बुढ़ापे में आदमी को अकेलापन नहीं सताता। जिसकी रुचि अध्यात्म में नहीं रही वह आदमी वृद्धावस्था में चिढ़चिढ़ा हो जाता है। ऐसे अनेक वृद्ध लोग हैं जो अपना जीवन शांतिपूर्वक व्यतीत करते हैं क्योंकि वह बचपन से मंदिर आदि में जाकर अपने मन की शुद्धि कर लेते हैं और अध्यात्म विषयों पर चिंतन और मनन भी करते हैं।
बदले की भावना इंसान को पशु बना देती हैं और वह तमाम तरह के ऐसे अपराध करने लगता है जिससे समाज में उसे बदनामी मिलती है। कई लोग ऐसे हैं जो गाली के जवाब में गाली देकर अपने लिये शत्रुता बढ़ा लेते है। कुछ लोग ऐसे हैं जिनको अभद्र शब्द बोलने और लिखने में मजा आता है जबकि यह अंततः अपने लिये ही दुःखदायी होता है। अपने मस्तिष्क में अच्छी बात सोचने से रक्त में भी वैसे ही कीटाणु फैलते हैं और खराब सोचने से खराब। यह संसार वैसा ही जैसा हमारा संकल्प होता है। अतः अपनी वाणी और विचारों में शुद्धता रखना चाहिये। दूसरे के व्यवहार या शब्दों से प्रभावित होकर उनमें अशुद्धता लाना अपने आपको ही कष्ट देना है। आधुनिक शिक्षा के कारण आजकल अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना भले ही एक फालतु विषय समझा जाता है पर सच यह है कि उसके बिना मनुष्य केवल गुलाम बनकर रह जाता है। नौकरी चाहे कोई भी हो उसे गुलामी ही माना जाता है। धन की उपलब्धि ही दिल को चैन नहीं दिला सकती उसके लिये जीवन रहस्य को समझना जरूरी है ताकि अल्पज्ञानियों को आपको गुलाम न बना सकें।
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Saturday, December 19, 2009

संत कबीरदास के दोहे-निच्छल हृदय बिना भक्ति नहीं होती (saf dil ke bina bhakti nahin hoti-kabir vani)

भाव बिना नहिं भक्ति जग, भक्ति बिना नहीं भाव
भक्ति भाव इक रूप है, दोअ एक सुभाव

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक हृदय में निच्छल और निर्मल भाव नहीं है तब तक इस जगत में भक्ति का भाव नहीं बन सकता है। भक्ति के भाव तो रूप एक है पर उसके दो प्रकार के स्वभाव हैं-एक सकाम भाव दूसरा निष्काम भाव।
भक्ति दुवारा सांकरा, राई दशवें भाव
मन मैंगल होम रहा, कैसे आये जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भक्ति का द्वार कि राई के दाने के दसवें भाग के बराबर संकरा होता है उसमें पागली हाथी की तरह मतवाला विशाल मन में कैसे प्रवेश कर सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भक्ति और ज्ञान का स्वरूप अत्यंत सूक्ष्म है। संत और साधु लोग प्रवचन देते हुए तमाम तरह की कहानियां और संस्मरण जोड़ देते हैं तो ऐसा लगता है कि ज्ञान का कोई बृहद स्वरूप है। अक्सर ऐसे संत लोग कहते हैं कि श्रीगीता का ज्ञान गूढ और रहस्यपूर्ण है पर यह उनका भी भ्रम है। श्रीगीता का ज्ञान सरल और सहज है पर प्रश्न यह है कि उसका अध्ययन और श्रवण करने वाला किस मार्ग पर स्थित है। जो भक्त सकाम भाव में स्थित हैं उसके लिये वह राई के बराबर है और वह उसमें प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि उसका मन तो अपने अंदर इच्छायें और आकांक्षाओं को पालकर मदमस्त हाथी हो जाता है। उसको निष्काम भक्ति का यह द्वार दिखाई ही नहीं देगा। जिसने निष्काम भाव अपनाते हुए श्रीगीता का अध्ययन और श्रवण किया वह सहजता से समझ सकता है।इसलिये श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, December 18, 2009

रहीम संदेश-जिससे निर्वाह न हो उससे दूरी भली (nirvah-rahim ke dohe)

कहु रहीम कैसे बनै, अनहोनी हो जाय
मिला रहै और ना मिलै, तासों कहा बसाय

कविवर रहीम कहते हैं कि जब कोई हम कार्य करना चाहें और उसके विपरीत अनहोनी हो जाये तो क्या किया जा सकता है? उसी तरह जो व्यक्ति ऐसा हो जो मिलकर भी दूरी बनाये रखे उसे निर्वाह नहीं हो सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिंदगी में अनेक लोग मिलते हैं। कुछ तो पास ही रहते हैं पर वह एक मानसिक दूरी बनाये रखते हैं ऐसे भला उनसे आत्मीयता का भाव कैसे स्थापित हो सकता है। अपने शैक्षणिक, व्यवसायिक और आवासीय स्थानों में ऐसे अनेक लोग प्रतिदिन मिलते हैं जिनके प्रति हमारा झुकाव इसलिये हो जाता है कि क्योंकि उनसे नियमित संपर्क रहता है। ऐसे में यह वहम भी हो जाता है कि वह हमारे अपने हैं और समय पर काम आयेंगे-पर ऐसा होता नहीं है। दरअसल अपने स्वार्थ की वजह से हम और वह पास होते हैं पर हमारे अपने स्वार्थ ही होते हैं जो जोड़े रहते हैं इससे मानसिक एकात्मकता का पता नहीं लगता। अगर हम उनके साथ अपने संबंधों का विश्लेषण करें तो एक दूरी अनुभव होगी और तब लगेगा कि उनके अपने होने का वहम है।
इसके अलावा अपने नियमित संपर्क में आने वाले व्यक्ति को केवल इसलिये ही अच्छा नहीं मान लेना चाहिये कि हम उसे जानते हैं और वह मीठा बोलता है। उसके घरेलू इतिहास, संस्कार और आस्था का भी पता करना चाहिये क्योंकि अगर मानसिक धरातल पर कोई व्यक्ति हम जैसा और हम उस जैसे नहीं है तो आत्मीयता का भाव स्थापित नहीं किया जा सकता। अगर जबरन यह प्रयास किया जाता है तो बाद में पछतावा होता है। जब तक संस्कार, विचार, लक्ष्य और कार्यशैली में साम्यता नहीं है तब तक संबंध स्थाई नहीं हो पाते। तत्कालिक आकर्षण में स्थापित संबंध बाद में दुःखदायी साबित होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जिससे निर्वाह नहीं हो सकता उससे दूर हो जाना ही अच्छा है।
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Sunday, December 13, 2009

हिन्दू अध्यात्मिक संदेश-अहित करने वाले मित्र का त्याग करें (ahit karne vala mitra-hindu dharm sandesh)

अमित्राण्यपि कुर्वीत मित्रण्युपचयावहान्।
अहिते वत्र्त मानानि मित्राण्यपि परित्यजेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि अपना हित करने वाला शत्रु भी हो तो भी उसे मित्र बनाना चाहिये। यदि मित्र अहित करने वाला हो तो उसका त्याग करना ही अच्छा है।
भोगप्राप्तं विकुर्वाणं मित्रमप्युपपीडयेत्।
अत्यंतं विकृतं हन्यात्स पापीया् रिपुर्मतः।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मित्र भोगों में लिप्त होते हुए भी उपकार करने वाला है तो भी वह पीड़ा देता है। अगर वह अपकार करने वाला है तो उसे अपना शत्रु ही समझते हुए उसे दंडित करें या उसका साथ ही छोड़ दें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्र बनाने में हमेशा सतर्कता बरतना चाहिए। आधुनिक समय में युवक युवतियों को अपना मित्र बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनका मित्र हमेशा हित की सोचने वाला हो। युवक युवतियों छोटी छोटी बातों पर नाराज और प्रसन्न होते हैं, पर उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि इससे जीवन में अधिक आनंद नहीं आता। आजकल विलासिता के सामान बहुत सस्ते आते हैं अतः वह तोहफे में देने वालों को अपना सच्चा मित्र नहीं मान लेना चाहिए। साथ ही यह भी देखना चाहिए कि मित्र का आचरण, चरित्र और विचार कैसे हैं? कुछ मित्र सामने बहुत मीठा बोलते हैं पर पीठ पीछे दूसरों के सामने निंदा करते हैं या मजाक बनाते हैं। खासतौर से युवतियों को अपने युवक मित्रों से अधिक सतर्क रहना चाहिये। कहने को तो कहा जाता है कि आजकल आधुनिक समय है पर कुछ यथार्थ विचार बदल नहीं सकते। कहा जाता है कि युवक की इज्जत को पीतल के लोटे की तरह होती है जो खराब होने पर फिर मिट्टी से भी साफ हो जाता है पर युवती की इज्जत तो मिट्टी के बर्तन की तरह है एक बार बिगड़ी तो फिर उसकी भरपाई नहीं होती। ऐसे मित्र जिनका आचरण, चरित्र और विचार संदिग्ध हों उनसे युवक युवतियों को बचना चाहिये। यह बात याद रखने योग्य है कि संगत का मनुष्य के न केवल आचरण पर प्रभाव पड़ता है बल्कि सामाजिक छवि भी उससे प्रभावित होती है। अतः अपनी संगत अच्छी बनाने का प्रयास करना चाहिए।
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Friday, December 11, 2009

संत कबीरदास के दोहे-संसार के बाजार में स्वाद ही ठग (hindu dharm sandesh-bazar aur svad)

कूकट कूटै कन बिना, बिन करनी का ज्ञान।
ज्यौं बन्दूक गोली बिना, भड़क न मरि आन।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बिना अनुभव के ज्ञान देना, चावल की भूसी कूटने के समान है।
सुर नर मुनि सबको ठगै, मनहिं लिया औतार।
सुन जो कोई बाते बचै, तीन लोग ते न्यार।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह चंचल मन सामान्य मनुष्य हों या असाधारण सभी को ठगता है।
जग हटबारा स्वाद ठग, माया वेश्या लाय।
राम नाम गाढ़ा गहो, जनि जहु जन्म गंवा।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार के बाजार में स्वाद ही ठग और माया ही वैश्या की तरह व्यवहार करती है। इसलिये राम का नाम का दिल की गहराई से स्मरण करें वरना पूरा जीवन व्यर्थ चला जायेगा।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में किसी भी कंपनी का उत्पाद देखिये उसके समर्थन में प्रस्तुत विज्ञापन की भाषा बहुत आकर्षक और मन लुभावनी होती है। खाने पीने की वस्तुओं का विज्ञापन तो इस तरह होता है कि पढ़ते ही मूंह में पानी आ जाता है। यह सब आदमी के जेब से पैसे या माया निकालने की कला है जिसका नाम बाजार है। आदमी के जेब अगर पैसा या माया अधिक है तो उसकी बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है और वह उन चीजों को खरीदने चला जाता है।
अगर हम आज की उपभोक्ता संस्कृति का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो अनुभव होगा कि कुछ लोगों के पास पैसा वाकई बहुत अधिक आ गया है वरना इतना सारा विज्ञापन जगत चल ही नहीं सकता। इसके अलावा खाने पीने की वस्तुओं में ऐसे पदार्थों का उपयोग बढ़ रहा है जो जीभ के लिये स्वादिष्ट हैं पर पेट के लिये पाचन योग्य नहीं। परिणाम स्वरूप नयी नयी बीमारियों की उत्पत्ति हो रही है और फिर उनके लिये दवा निर्माण के लिये नये कारखाने खुलते हैं फिर उनका विज्ञापन हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है। यह बाजार और माया का चक्र में जिसके अंदर विज्ञापन आदमी को अपनी सवारी कर घुमाता है।
यह सब हमारे देश में अधिक हो रहा है क्योंकि यहां अब नये नये धनवान अधिक हो गये हैं और इसलिये जिन चीजों को पुराने अमीर देशों के लोगों ने त्याग कर दिया है उनको यहां ग्रहण किया जा रहा है। हमारे देश के प्राचीन अध्यात्मिक ज्ञान को एक तरफ उठाकर रख दिया गया है और अगर उसे कुछ लोग प्रस्तुत भी कर रहे हैं तो वह स्वयं के लिये धनार्जन और विज्ञापन के लिये। राम की चर्चा करते हैं पर माया का संग पाने की इच्छा के साथ। ऐसे लोग अध्यात्मिक ज्ञान की पुस्तकों के संदेश तो रट लेते हैं पर धारण करना उनके वश में भी नहीं होता।
सच बात तो यह है कि अगर हृदय से भगवान का स्मरण किया जाये तो मन में एक नयापन आता है जबकि उपभोक्ता वस्तुओं के प्रति आकर्षण अंततः मनोविकारों का कारण बनता है। भक्ति से जहां हमारे अंदर सकारात्मक भाव का निर्माण होता है वहीं मनोविकारों से मुक्ति मिलती है, वहीं जीवन स्वयमेव तनाव से मुक्त हो जाता है ।
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Saturday, November 28, 2009

यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं न पोरुषेणापि विकत्धरोऽन्यान्।
न मूर्चि्छत्रः कटुकान्याह किंचित् प्रियं सदा तं कुरुते जनति।।
हिंन्दी में भावार्थ-
जो कभी उद्दण्ड जैसा वेष नहीं बनाता, दूसरों के सामने अपने पराक्रम की डींग नहीं हांकता, गुस्सा होने पर कट् वाक्य नहीं बोलता वह सभी का प्यारा हो जाता है।

न स्वे सुखे वै कुरुते नान्यस्य दुःखे भवित प्ररहृष्टः।
दत्तवा च पश्चात्कुरुतेऽनुतायं स कथ्यते सत्पुरुषार्यशीलः।।
हिंदी में भावार्थ-
महात्मा विदुर के कथानुसार जो अपने सुख में दूसरे के दुःख में प्रसन्न नहीं होता और दान देकर उसका स्मरण नहीं करता वही सदाचारी है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम देश के वातावरण को देखें तो अनुभव होगा कि आजकल भले काम कम किये जाते हैं पर उनका प्रचार अधिक होता है। देशभर की सामाजिक तथा आर्थिक हालत देखें तो ऐसे विरोधाभास सामने आते हैं जिनसे इस बात की अनुभूति होती है कि लोगों की चिंतन क्षमता अपह्त कर ली गयी है। टीवी, अखबार और रेडियो पर विज्ञापन देखने और सुनने के आदी हो चुके लोग अपना विज्ञापन स्वयं करने लगते हैं भले ही अपने परिवार के बाहर किसी का भला नहीं करते हों।
एक मजे की बात है कि इस देश में इतने महापुरुष और सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिनके नाम पर जन्म दिन मनते हैं या उनकी तस्वीरों को लोग अपने घर में लगाकर उनकी पूजा करते हैं फिर भी इस देश की इतनी दुर्दशा क्यों है, इस पर कोई विचार नहीं करता। फिल्मों में कल्पित पात्रों की भूमिका निभाने वाले पात्रों को लोगों ने अपना भगवान मान लिया है। लोग अपनी हालतों से इतना डरते हैं कि वह प्रचार माध्यमों से बने हुए भगवानों की चर्चा अधिक करते हैं।
उसके बाद जो समय बचता है उसमें वह आत्म विज्ञापन में व्यतीत करते हैं। हर आदमी यह बताता है कि ‘उसने अमुक भला काम किया’। अब उसका प्रमाण कौन ढूंढने जाता है।
इससे दूसरे शब्दों में कहें तो लोग दूसरे से सदाचार की अपेक्षा करते हैं पर स्वयं उस राह पर चलना नहीं चाहते। समाज में प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिये अपने व्यवहार को सयंमित रखना पड़ता है। उद्दण्डता के व्यवहार से दूसरे आदमी में भय पैदा किया जा सकता है प्रेम नहीं।
कभी कभी तो ऐसा लगता है कि लोग अपने दुःख से कम दूसरे के सुख से अधिक दुःखी हैं। यह विकृत मानसिकता है और जितना हो सके इससे बचा जाये। अपने मुख से अपनी तारीफ करना व्यर्थ है। इसकी बनिस्पत अगर दूसरे का वास्तव में भला किया जाये तभी यह अपेक्षा की जा सकती है कि सम्मान प्राप्त हो। साथ ही यह भी दूसरे का भला कर उसे गाने का लाभ नहीं है इससे एक तो आत्मप्रवंचना हो जाती है दूसरा पुण्य भी नहीं मिलता। जो चुपचाप ही समाज सेवा और भक्ति करता है वही सच्चा संत है।
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Tuesday, November 17, 2009

विदुर नीति-बुद्धिमान को सहारा देते हैं संत (buddhiman aur sant-hindu adhyatmik sandesh)

गतिरात्मवतां सन्तः सन्त एवं सतां गतिः।
असतां च गतिः सन्तो न त्वसन्तः सतां गतिः।।
हिंदी में भावार्थ-
मतिमान और गतिमान पुरुषों को सहारा देने वाले संत हैं। संतों को भी सहारा देने वाले संत हैं। असत्य पुरुषों को भी संत सहारा देते हैं पर दुष्ट लोग किसी को सहारा नहीं देते।
विद्यामदो धनमदस्तृतीयोऽभिजनो मदः।
मदा एतेऽवलिसानामेत एवं सतां दमः।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्या, धन, और अभिजातीय वर्ग होने का मद अहंकारी के लिए दोष तथा सज्जन पुरुषों के लिये शक्ति होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जैसे संसार भौतिकवादी होता जा रहा है वैसे मनुष्य की बुद्धि कुंठित होती जा रही है। शिक्षा और धन की अधिक उपलब्धता ने अभिजातीय वर्ग का दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। लोग इस बात से संतुष्ट नहीं है कि उनके संपन्नता और प्रतिष्ठा है बल्कि वह उसका प्रमाणीकरण चाहते हैं। अपनी योग्यता से अधिक धन प्राप्त करने वाले लोगों का अहंकार तो देखते ही बनता है। समय ने ऐसी करवट ली है कि परिश्रम से काम करने वालों का सम्मान कम होता गया है और झूठ, अपराधी तथा ठगी से पैसा कमाने वालों को-उनके दोष जानते हुए भी-समाज के लोग इज्जतदार मानते हैं। ऐसे लोग किसी का भला करने से तो रहे। सच तो यह है कि अगर आप शिक्षित, धनी और अभिजात वर्ग के हैं तो तभी सज्जन माने जा सकते हैं जब अपने गुण से किसी अन्य की सहायता करें। शक्ति और गुण होने पर केवल उसका दिखावा करें तो अहंकारी कहलायेंगे।

भले आदमी का काम है सभी की अपने आसपास गरीब और बेसहारा की सहायता करे न कि मूंह फेरकर अपने अभिमान में चलता जाये। किसी की भी सहायता करने वाला व्यक्ति ही सज्जन कहलाता है और जो समर्थ होते हुए भी ऐसा नहीं करता उसे अहंकारी और दुष्ट कहा जाता है। जब हम यह कहते हैं कि मनुष्य को समाज की साथ चलना चाहिए तब यह भी जरूरी है कि समर्थ और ज्ञानी लोग निरीह आदमी के सहायता करें। यही मनुष्यता का प्रमाण है।
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