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Sunday, July 21, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-दूषित धन बनता है क्लेश का कारण(kautilya ka arthshastra-dooshit dhya banta hai klesh ka kaaran)

            माया का खेल निराला है।  सत्य और माया दोनों के संयोग से यह संसार चलता है। भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में कहा है कि यह संसार परमात्मा के संकल्प के आधार पर स्थित है।  समस्त भूत उसके संकल्प के आधार पर निर्मित है पर वह स्वयं किसी में नहीं है।  माया का सिद्धांत इससे अलग है।  वह स्वयं कोई पदार्थ नहीं बनाती है।  वह सभी में स्थित भी दिखती है पर किसी भी भूत को प्राणवान नहीं बनाती।   धन, सोना, हीरा, जवाहरात तथा वस्तु विनिमय के लिये निर्मित सभी  पदार्थ माया की पहचान कराते हैं पर उनमें प्राणवायु  प्रवाहित नहीं होती है।  इसके बावजूद मनुष्य उसी के पीछे भागता है। इस संसार में  पेड़, पौद्ये, नदियां, झीलें तथा फूलों में सौंदर्य और सुगंध है पर उसकी बनिस्बत मनुष्य माया के प्राणहीन स्वरूप पर ही फिदा रहता है।
        अब तो विश्व में स्थिति यह हो गयी है कि नैतिकता, धर्म तथा सद्भाव की बात सभी करते हैं पर उसे कोई समझता ही नहीं। सभी का उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना है।  मन में क्लेश होता है तो हो जाये। शहर में बदनामी होती है तो होने दो पर किसी तरह पैसा आना चाहिये, इस प्रवृत्ति ने मनुष्य को पाखंडी बना दिया हैं।  पूरे विश्व में धर्म के नाम पर बड़े बड़े संगठन बन गये हैं।  धर्म का प्रचार करने के लिये अनेक संगठन ढेर सारा पैसा खर्च करते हैं। अनेक जगह तो पैसा तथा अन्य लोभ देकर धर्मातंरण तक कराया जाता है।  सीधी बात कहें तो धर्म आचरण से अधिक राजनीति तर्थ आर्थिक प्रभाव बढ़ाने वाला साधन बन गया है।  सद्भाव से कर्म करने वाले को धन सामान्य मात्रा में मिलता है जबकि क्लेश करने और कराने वालों को भारी आय होती है।  आजकल स्थिति तो यह हो गयी है कि शराब, तंबाकू तथा अन्य व्यसनों में संलग्न रहने वालों को ढेर सारी कमाई होती है।  इसके अलावा मनोरंजन के नाम पर शोर, भय तथा तनाव बेचने वाले भी महानायकत्व प्राप्त करते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि आजकल धन की प्राप्ति क्लेश से ही होने लगी है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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तदकस्मत्समाविष्ट कोपेनातिबलीयसा।
नित्यमात्महिताङक्षी न कुर्ष्यादर्थदूषणमुच्यते।।
          हिन्दी में भावार्थ-अचानक क्रोध आ जाने पर अपने हित की पूर्ति के लिये अर्थ का दूषण न करें। इससे सावधान रहें।
दूष्यस्याद्भष्णार्थञ्च परित्यागो महीयसः।
अर्थस्य नीतितत्वज्ञेरर्थदूषणमुच्यते।।

        हिन्दी में भावार्थ-दूषित कर्म तथा अर्थ का अवश्य त्याग करना चाहिये। नीति के ज्ञाताओं ने अर्थ की हानि को ही अर्थ दूषण बताया है।
         दूषित धन का प्रभाव बढ़ने से समाज का वातावरण दूषित हो गया है।  इससे बचने का कोई उपाय फिलहाल तो नहीं है।  कहा जाता है कि संतोष सदा सुखी पर जब पर्दे पर महानायकत्व प्राप्त कर चुके  लोग संतुष्ट न बनो और अपनी प्यास बढ़ाओ जैसे जुमले सुनाकर समाज की नयी पीढ़ी का मार्गदर्शन कर रहे हों तब यह संभव नहीं है कि समाज को उचित मार्ग पर ले जाया जाये। फिर भी जिनकी अध्यात्मिक ज्ञान में रुचि है उन्हें यह समझना चाहिये कि संसार में क्लेश से प्राप्त धन कभी सुख नहीं दे सकता। 

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, July 07, 2013

चाणक्य नीति-निश्चित पदार्थ छोड़कर अनिश्चित के पीछे न भागें (chankya neeti-nishchit padarth chhodkar anishchit peeche n bhaagen)



          पूरे विश्व के साथ आर्थिक संबंध बनाये रखने की योजना के तहत हमारे देश में जो अर्थनीति बनायी गयी उसे उदारीकरण कहा जाता है। इस नीति के कारण हमारे देश में मध्यम वर्ग का रूप ही बदल गया है। आमतौर से मध्यम वर्ग में निजी तथा शासकीय क्षेत्रों में कार्यरत कर्मचारी, असंगठित छोटे व्यवसायी, निजी चिकित्सक तथा अन्य सेवायें करने वाले ऐसे लोग शामिल माने जाते हैं जिनकी आय केवल अपने परिवार के उचित पालन तक ही हो पाती है।  भारत की आजादी के  बाद सरकारी क्षेत्र का विस्तार हुआ जिसमें कार्यरत कर्मचारियों की संख्या इतनी अधिक थी कि समाज में उनकी उपस्थिति एक प्रथक जाति के रूप में दिखने लगी थी।  दरअसल सरकारी क्षेत्र में एक तयशुदा तनख्वाह मिलने से अनेक परिवारों  का जीवन स्तर स्वाभाविक रूप से बढ़ा।  मध्यम वर्ग में सर्वाधिक संख्या निजी छोटे व्यवसायियों के बाद सरकारी कर्मचारियेां की रही थी। दरअसल प्रारंभ के आर्थिक रणनतिकारों ने  सरकारी सेवा में कर्मचारियों की नियुक्ति को जन कल्याण का भी एक रूप माना थां उदारीकरण के साथ ही जैसे जैसे सरकारी क्षेत्र सीमित होने लगा है जिससे अब सरकारी सेवा में अधिक लोग रखना संभव नहीं है।  निजीकरण में कंपनी के नाम से संगठित उद्यमियों के हाथ में आर्थिक सत्ता जा चुकी है जिनकी रुचि नौकरियां देकर समाज कल्याण में नहंी होती। दूसरी बात यह कि निजी उद्यमी अपने उत्पाद का स्वयं विक्रय करने के लिये केंद्र बनाते हैं।  इससे छोटे निजी व्यवसायी भी प्रभावित हो रहे हैं।  सच बात तो यह है कि वर्तमान स्थिति में मध्यम वर्ग के सामने अस्तित्व का संकट है इसी कारण उसमें शािमल लोग इधर उधर अपनी आय बढ़ाने के लिये हाथ मारते हैं।  अनेंक लोग  नौकरियंा बदलते हैं या निजी व्यवसाय के लिये छोड़े देते हैं। अनेक व्यवसायी अपना व्यवसाय बदलने का प्रयास करने लगे हैं।  ऐसे में अगर बदलाव फलीभूत हो तो ठीक वरना उनका संकट बढ़ जाता है। 
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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यो ध्रुवाणि परित्यज्य अधुवं परिषेवते।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति आध्रुवं नष्टमेव च।।
              हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य हाथ में  आये निश्चित पदार्थ को त्याग कर अनिश्चित की तरफ भागता है उसे वह मिलना तो दूर जो निश्चित है वह भी हाथ से निकल जाता है।
           मध्यम वर्ग बुद्धि का स्वामी भी माना जाता है।  तनाव दौर  में  बुद्धि अधिक ही विचार करती है।  चंचल मन अनेक स्वप्न पालता है। जीवन में आर्थिक विकास की चाहत लिये आदमी अनेक योजनायें बनाता है। सभी के कार्यक्रम सुखद रूप से संपन्न हों यह जरूरी नहीं है।  ऐसे में असफल मनुष्य का मन टूटता है। टूटा मन लिये मनुष्य जीवन में अधिक दूर नहीं जा सकता। इसलिये जिन लोगों का रोजगार बना हुआ है उसमें ही अधिक आय अर्जित करने का प्रयास करें।  जब कभी दूसरा काम शुरु करें तो दस बार सोचें। आजकल जिंदगी में धोखे भी कम नहीं रहे।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Tuesday, August 14, 2012

पलटू महाराज का सन्देश-बराबरी करने से अच्छा है हार मन लेना

              वर्तमान युग के बाज़ार और प्रचारतंत्र के शक्तिशाली हथियारों के आगे आम आदमी लाचार और बेबस होता जा रहा है। टीवी, अखबार, मोबाइल, कंप्यूटर और फिल्मों का प्रभाव समाज में इस तरह हो गया है कि आम इंसान के अंदर स्वचिंत्तन का अभाव हो गया है। वह प्रचार के माध्यम से थोपे जा रहे विषयों को ही सबकुछ मानकर उसमें लिप्त होकर अपने मस्तिष्क में तनाव ला रहा है जिस कारण अनेक रोग पैदा हो रहे हैं। इधर भोग विलासिता की वस्तुओं में नित नित नये मॉडल आ जाते हैं तो एक माह पहले ही खरीदे गये सामान प्राचीन युग के प्रतीत होते है। इस कारण लोग विषयों के पीछे भागते जा रहे हैं। ऐसे में अपने चरित्र पर विचार करने का किसी के पास समय नहीं है पर समाज में सम्मान पाने का मोह सभी को है। इसका उपाय लोगों ने यह ढूंढ लिया है कि दूसरे की निंदा कर अपने को बड़ा साबित करो। यह निहायत घटिया प्रयास है जिसे करते हुए हम लोगों को देख सकते हैं। आत्म मंथन करें तो अपने अंदर भी यह दोष दिखाई देगा।
             पलटू महाराज कहते हैं कि
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           ‘पलटू’ यह सांची कहैं, अपने मन को फेर।
            तुझे पराई क्या परी, अपनी ओर निबेर।।
           ‘‘सच बात तो यह है कि मनुष्य अपने मन का विचार करे। पराई बातों में रुचि लेने से कोई लाभ नहीं बल्कि अपने गुण दोष पर दृष्टिपात करना ही ठीक है।                                                 सरबरि कबहूं न कीजिये, सबसे रहिये हार।
                                                      ‘पलटू’ ऐसे दास सों, डरिये बारबार।।
         ‘‘सबसे बराबरी करने का विचार छोड़कर हार मान लेना ही बेहतर हैं। जो ऐसा करता है व्यक्ति से डरना चाहिए क्योंकि दूसरों के घर की रौशनी देखकर अपना घर न चलाने वाला ही मानसिक रूप से शक्तिशाली होता है।’’
           चाणक्य महाराज का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति को लोकप्रिय होना है तो वह निंदा करना छोड़ दे। हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि दूसरों के सुख को ईर्ष्या न करें। जो लोग ज्ञानी हैं वह सादगी से जीवन जीते हैं उनको कमजोर या गरीब मानने वालों की आज के समाज में कमीनहीं है पर सच यह है कि ऐसे त्यागी और ज्ञानी आम इंसान से अधिक शक्तिशाली होते है। विषयों में आसाक्ति मनुष्य को मानसिक रूप से कमजोर बनाती है पर निष्काम भाव से हृदय में साहस का भाव आता है। अतः उनका सम्मान करना चाहिए। एक बात याद रखें उपभोग प्रवृत्ति कभी शक्ति और स्वास्थ्य का प्रमाण नहीं होती।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Saturday, October 22, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-तत्वज्ञानियों का सामान्य लोगों से मेल संभव नहीं (tatava gyaniyon ka samanya logog se mel sanbhav nahin-economics of kautilya)

              आमतौर से सामान्य मनुष्य अपने संपर्क बढ़ाने और संबंधों का विस्तार करने को उत्सुक रहते हैं। दूसरे लोग चिकनी चुकनी बातों से बहकाते हैं पर यह बात सभी की समझ में नहीं आती। मुख्य बात यह है कि अपने गुणों के अनुरूप ही संपर्क और संबंध बनाने चाहिए इस सिद्धांत को बहुत कम लोग जानते हैं। श्रीमद्भागवत गीता में गुण तथा कर्म विभागों का संक्षिप्त पर गुढ़ वर्णन किया गया है। उससे हम मनुष्य का मनोविज्ञान अच्छी तरह समझ सकते हैं। आम तौर से पहनावे, रहन सहन, आचार विचार तथा कार्य करने के तरीके से सभी लोग एक जैसे दिखाई देते हैं। इस तरह हर मनुष्य का बाह्य मूल्यांकन किया जा सकता है। इस आधार पर संबंध या संपर्क बनाना ठीक नहीं है। क्योंकि संबंधों का विस्तार या संपर्क बढ़ने पर जब किसी के सामने अपने साथी का आंतरिक रूप विचार और संकल्प प्रतिकूल मिलता है तो मनुष्य को भारी निराशा होती है। किसी दूसरे व्यक्ति से संबंध बढ़ाने या संपर्क का विस्तार करने से पहले उसके विचार तथा संकल्प जानना आवश्यक है। वह चाहे कितनी भी लच्छेदार बातें करे पर उसकी क्षमता का आंकलन कर उसका प्रमाण भी लेना चाहिए। विपरीत गुणों तथा कर्म वाले लोगों से संपर्क बहुत दूरी तक नहंी चलते और कभी कभी तो दुष्परिणाम देने वाले भी साबित होते है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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उत्तमाभिजनोपेतान् न नीचैः सह वर्द्धयेत्।
कृशीऽपि हिविवेकज्ञो याति संश्रवणीयताम्।।
           ‘‘सज्जन या उत्तम गुणों वाले लोगों का नीच तथा अज्ञानी लोगों से मेल नहीं हो सकता। कृशता को प्राप्त विवेकी पुरुष अंततः राज्य का संरक्षण पा लेता है, इसमें संशय नहीं है।
निरालोके हि लोकेऽस्मिन्नासते तत्रपण्डिताः।
जात्यस्य हि मणेयंत्र काचेन समता मता।।
        ‘‘ज्ञानी लोग उन अज्ञानी लोगों के पास नहीं ठहर पाते जो अज्ञान के अंधेरे में रहते हैं। जहां मणि हो वहां भला कांच का क्या काम हो सकता है? वहां मणि के साथ कांच जैसा व्यवहार ही किया जाता है।’’
        इन संपर्कों और संबंधों में यह बात बहुत महत्वपूर्ण होती है कि लोगों का बौद्धिक स्तर क्या है? इसमें कोई शक नहीं रखना चाहिए कि मनुष्य के धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक तथा कार्यकारी स्थितियों से उसके विचार, संकल्प, तथा कर्म प्रभावित होते हैं। इन्हीं आधारों से संस्कारों का निर्माण भी होता है। कुछ लोग बड़ी चालाकी से इसे छिपाते हैं तो कुछ लोगों की सक्रियता इतनी रहती है कि उनका आंतरिक रूप समझने का अवसर दूसरों को नहीं मिलता। सांसरिक विषयों की चतुराई ज्ञान नहीं होता बल्कि अध्यात्मिक ज्ञान ही असली प्रमाण होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि अपने संपर्क के लोगों का अध्यात्मिक स्तर जानना अत्यंत आवश्यक है। ज्ञानी लोगों की अज्ञानी लोगों से दोस्ती बहुत कम निभती है। अज्ञानी लोग सांसरिक विषयों के अंधेरे कुंऐं में डूबे रहना पसंद करते हैं और ज्ञानी लोगों की बात उनके लिये बकवास भर होती है। अतः किसी भी प्रकार का संबंध स्थापित करने से पहले दूसरे की प्रवृत्तियों का प्राप्त करना आवश्यक है। स्वयं गुणी हैं तो इस बात से निराश नहीं होना चाहिए कि समाज में उनका सम्मान नहीं हो रहा है बल्कि यह विचार पक्का रखना अच्छा है कि उन गुणों से हमारी रक्षा हो रही है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Thursday, October 06, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-विशेष संहार या व्यय वाला कार्य प्रारंभ न करें (kautilya ka arthshastra-vishesh sanhar ya vyay wala karya prarabh n karen)

               सांसरिक पदार्थों का मोह ऐसा है कि हर आदमी उसे प्राप्त करना चाहता है। यह अलग बात है कि सभी का कर्म एक जैसा नहीं होता अतः उसका परिणाम भी भिन्न होता है। अनेक लोग अपने सामर्थ्य से अधिक लक्ष्य निर्धारित करते हैं तो अनेक ऐसे हैं जो सहज प्राप्य वस्तु को प्राप्त करना ही नहीं चाहते। कुछ लोग समय बीत जाने पर अपना अभियान प्रारंभ करते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि लोग अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार चलते हैं वैसे ही उनका जीवन भी चलता है। ज्ञानी लोग देशकाल और अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी वस्तु या लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अपना काम आरंभ करते हैं। भले ही वह अधिक धनवान न बने पर उनका जीवन शांति से गुजरता है। इसके विपरीत अनेक लोग लालच, लोभ और काम के वशीभूत होकर अपना काम प्रारंभ करते हैं। भाग्यवश किसी को सफलता मिल जाये तो अलग बात है वरना अधिकरत तो अपना पूरा जीवन ही अशांति में नष्ट कर देते हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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मनुष्य युग्यापचयक्षयो हि हिरण्यधान्यावचयव्यस्तु।
तस्मादिमान्नैव विदग्धबुद्धिः क्षयव्ययायासकरीमुपेयात्।।
            ‘‘मनुष्य और पशु आदि जीवधारियों की देह का ह्रास  ही क्षय है। सोने आदि भौतिक पदार्थों का नाश व्यय है। जिसमें दोनों प्रकार का क्षय दिखे वह कार्य या अभियान प्रारंभ न करें। राजा का कर्तव्य है कि वह विशेष संहार और व्यय कर भी फल न मिलने वाले कार्य को रोके।
वस्तुष्वशक्येषु समुद्यमश्वेच्छक्येषु मोहादसमुद्यमश्च।
शक्येषु कालेन समुद्यश्वश्व त्रिघैव कार्यव्यसनं वदन्ति।।
          "किसी भी कार्य के तीन व्यसन होते हैं। एक तो अपने सामर्थ्य से अधिक वस्तु की प्राप्ति करने का प्रयास करना दूसरा सहजता से प्राप्त वस्तु के लिये उद्यम करना। तीसरा समय बीत जाने पर किसी वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करना।
         हमारी देह का ह्रास होता है तो स्वर्ण आदि भौतिक पदार्थों का व्यय भी करना पड़ता है। ऐसे में यह निश्चित कर कोई काम हाथ में लेना चाहिए जिसमें दोनों ही प्रकार की हानियों से बचा जा सके या फिर वह कम से कम हो। धन का सीधा नियम है कि जहां सें लाभ हो वहीं विनिवेश करें। राजनीति करने वालों के लिये यह नियम बहुत विचारपूर्ण है। अक्सर हम लोग देख रहे हैं कि सरकार के माध्यम से वितरित सहायता गरीब और निम्न वर्ग तक नहीं पहुंचती है। उस पर ढेर सारा व्यय हो रहा और देश के सभी शिखर पुरुष भी यह मानते हैं कि जनता तक वह सहायता नहीं पहुंच रही है। ऐसे में उस सहायता पर धन देने से क्या लाभ जिससे राज्य का लक्ष्य पूरा न होता हो। उल्टे इससे भ्रष्टाचार बढ़ रहा है।
       इसी तरह हमें अपने जीवन में भी व्यय करते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उससे हमें प्राप्त क्या हो रहा है। हम लोग अधिक धन होने पर अनेक संस्थाओं को दान आदि देते हैं इस विचार से कि उसका पुण्य मिलेगा पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सुपात्र को दिया गया दान ही फलीभूत होता है। उसी तरह जिन मदों पर व्यय करना विलासिता लगता है उनको कभी नहीं करना चाहिए। वैसे भी कहा जाता है कि लक्ष्मी चंचल है और कभी स्थिर नहीं रहती अतः सोच समझकर ही कहीं विनिवेश करना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, September 10, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-सामर्थ्य से अधिक वस्तु पाने का प्रयास भी व्यसन (kautilya ka arthshastra or economics-man and its world)

               सांसरिक पदार्थों का मोह ऐसा है कि हर आदमी उसे प्राप्त करना चाहता है। यह अलग बात है कि सभी का कर्म एक जैसा नहीं होता अतः उसका परिणाम भी भिन्न होता है। अनेक लोग अपने सामर्थ्य से अधिक लक्ष्य निर्धारित करते हैं तो अनेक ऐसे हैं जो सहज प्राप्य वस्तु को प्राप्त करना ही नहीं चाहते। कुछ लोग समय बीत जाने पर अपना अभियान प्रारंभ करते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि लोग अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार चलते हैं वैसे ही उनका जीवन भी चलता है। ज्ञानी लोग देशकाल और अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी वस्तु या लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अपना काम आरंभ करते हैं। भले ही वह अधिक धनवान न बने पर उनका जीवन शांति से गुजरता है। इसके विपरीत अनेक लोग लालच, लोभ और काम के वशीभूत होकर अपना काम प्रारंभ करते हैं। भाग्यवश किसी को सफलता मिल जाये तो अलग बात है वरना अधिकरत तो अपना पूरा जीवन ही अशांति में नष्ट कर देते हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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मनुष्य युग्यापचयक्षयो हि हिरण्यधान्यावचयव्यस्तु।
तस्मादिमान्नैव विदग्धबुद्धिः क्षयव्ययायासकरीमुपेयात्।।
            ‘‘मनुष्य और पशु आदि जीवधारियों की देह का ह्रास  ही क्षय है। सोने आदि भौतिक पदार्थों का नाश व्यय है। जिसमें दोनों प्रकार का क्षय दिखे वह कार्य या अभियान प्रारंभ न करें। राजा का कर्तव्य है कि वह विशेष संहार और व्यय कर भी फल न मिलने वाले कार्य को रोके।
वस्तुष्वशक्येषु समुद्यमश्वेच्छक्येषु मोहादसमुद्यमश्च।
शक्येषु कालेन समुद्यश्वश्व त्रिघैव कार्यव्यसनं वदन्ति।।
          "किसी भी कार्य के तीन व्यसन होते हैं। एक तो अपने सामर्थ्य से अधिक वस्तु की प्राप्ति करने का प्रयास करना दूसरा सहजता से प्राप्त वस्तु के लिये उद्यम करना। तीसरा समय बीत जाने पर किसी वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करना।
         हमारी देह का ह्रास होता है तो स्वर्ण आदि भौतिक पदार्थों का व्यय भी करना पड़ता है। ऐसे में यह निश्चित कर कोई काम हाथ में लेना चाहिए जिसमें दोनों ही प्रकार की हानियों से बचा जा सके या फिर वह कम से कम हो। धन का सीधा नियम है कि जहां सें लाभ हो वहीं विनिवेश करें। राजनीति करने वालों के लिये यह नियम बहुत विचारपूर्ण है। अक्सर हम लोग देख रहे हैं कि सरकार के माध्यम से वितरित सहायता गरीब और निम्न वर्ग तक नहीं पहुंचती है। उस पर ढेर सारा व्यय हो रहा और देश के सभी शिखर पुरुष भी यह मानते हैं कि जनता तक वह सहायता नहीं पहुंच रही है। ऐसे में उस सहायता पर धन देने से क्या लाभ जिससे राज्य का लक्ष्य पूरा न होता हो। उल्टे इससे भ्रष्टाचार बढ़ रहा है।
       इसी तरह हमें अपने जीवन में भी व्यय करते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उससे हमें प्राप्त क्या हो रहा है। हम लोग अधिक धन होने पर अनेक संस्थाओं को दान आदि देते हैं इस विचार से कि उसका पुण्य मिलेगा पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सुपात्र को दिया गया दान ही फलीभूत होता है। उसी तरह जिन मदों पर व्यय करना विलासिता लगता है उनको कभी नहीं करना चाहिए। वैसे भी कहा जाता है कि लक्ष्मी चंचल है और कभी स्थिर नहीं रहती अतः सोच समझकर ही कहीं विनिवेश करना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
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Saturday, August 06, 2011

मनुस्मृति-नारियों से बलात व्यवहार करने वालों के लिए मौत की सजा श्रेयस्कर (acording to manu smriti-death penaltiy for crime agaisnt women)

         हमारे देश के स्त्रियों के प्रति क्रूरतम अपराध की घटनायें तेजी से बढ़ रही हैं। इसका कारण यह है कि अपराधियों के मन में कठोर दंड का भय नहीं है। हमने पश्चिम के आधार पर अपनी दंड व्यवस्था को कथित रूप से मानवीय बना दिया है जिसमें प्राणदंड देना अपराध पर नियंत्रण करने का मार्ग नहीं माना जाता। यह मूर्खतापूर्ण राय है कि फांसी की सजा से अपराध नियंत्रित नहीं होता। देने वाले तो यह तर्क देते हैं कि हत्या की सजा फांसी है पर उससे क्या वह रुक रही हैं? इसका उत्तर यह है कि हमारे यहां कानूनी प्रक्रिया में लंबा समय लगता है। शनैः शनै अपराधी के अपराध की के प्रति लोगों का नजरिया ठंडा हो जाता है। फिर देखा यह भी जा रहा है कि अपराधियों को सजा दिलाना व्यवस्था से जुड़ी संस्थाओं के लिये कठिन होता जा रहा है इसी कारण अपराधियों के हौंसले बढ़ रहे हैं। इसके जवाब में यह सवाल भी है कि कितनी हत्याओं के लिये कितनों को प्राणदंड मिला। उससे भी ज्यादा यह बुरी बात है कि पद, प्रतिष्ठा और पैसे के दम पर अनेक लोग अपराध कर भी बच जाते हैं। वह समाज के अन्य तबकों के लिये अपराध कर सजा से बचने के मामले में प्रेरक बन जाते हैं। इसी कारण अपराध बढ़ रहे हैं।
मनुस्मृति में कन्याओं के प्रति अपराध के दंड पर कहा गया है कि
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योऽकामां दूषयेत्कन्यां स सद्यो वधमर्हति।
सकामा दूषयंस्तुल्यो न वधं प्राप्नुयान्नरः।।
        ‘‘जो कन्या संभोग की इच्छुक नहीं है उसे बलात संभोग करने वाले पुरुष को तुरंत मृत्युदंड देना चाहिए। स्वयं संभोग की इच्छुक कन्या से सहवास करने वाले व्यक्ति को मृत्युदंड के बजाय उसे कोई दूसरा दंड देना चाहिए।
अभिमह्य तु यः कन्या कुर्याद्दर्पेण मानवः।
तस्याशुकर्त्ये अंगल्यौ दण्डं चार्हतिष्ट्म्।।
         ‘‘जो पुरुष अपनी पौरुष के मन में आकर कन्या से बलात्कार कर उसे अपवित्र करता है उसकी तत्काल दो उंगलियां काट डालनी चाहिए तथा उस पर आर्थिक दंड लगाना चाहिए।
            अक्सर लोग सवाल यह करते हैं कि किसी भी कन्या से बलात संभोग करने वालों को ही क्या जिम्मेदार माना जा सकता है? इसके लिये कन्या को किसी पुरुष को उकसाने के लिये जिम्मेदार क्यों नहीं माना जाता। मनुस्मृति की दृष्टि से हर हालत में पुरुष ही जिम्मेदार है। अगर वह कन्या की इच्छा के खिलाफ जबरदस्ती करता है तो मृत्युदंड का अधिकारी है और अगर इच्छा के विरुद्ध वह नहीं करता तो भी उसे सजा मिलना चाहिए। कुछ घटनाओं में देखा गया है कि लड़कियों को शादी का झांसा देकर कुछ लोग उनके साथ शारीरिक संबंध कायम कर लेते हैं। मामला चलने पर वह दावा करते हैं कि यह सब लड़की की इच्छा से हुआ। वह प्रमाण भी पेश करते हैं तब लोगों की सहानुभूति पीड़ित कन्या की बजाय उसके साथ हो जाती है पर सच बात तो यह है कि वह फिर भी दंड का अधिकारी है।
           ऐसा लगता है कि कड़े दंडों की वजह से ही मनुस्मुति को जाति पाति समर्थक तथा स्त्री विरोधी कहकर प्रचलन से बाहर किया गया है जबकि उसमें वर्णित अनेक संदेश आज भी प्रासांगिक हैं। देश के सामाजिक विशेषज्ञ हमारे प्राचीन ग्रंथों से इसलिये मुंह चुराते हैं क्योंकि वह अंग्र्रेजी शिक्षा के कारण डरपोक हो गये हैं जिसमें अपराधों के लिये कड़े दंड की बजाय मानवीय प्रकार के दंड देने क बात कही गयी है। कहा जाता है कि भारतीय दर्शन में महिलाओं का सम्मानीय माना जाता है जबकि मनुस्मृति में  देखा जाये तो वह महिलाओं के प्रति अपराध को अक्षम्य माना गया है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Wednesday, July 27, 2011

पतंजलि योग विज्ञान-ध्यान ने पूरे शरीर की संरचना का ज्ञान हो जाता है(patanjali yoga scince-dhyan and man's body)

         भारतीय योग विज्ञान का अध्ययन किया जाये तो उसके व्यापक प्रभाव परिलक्षित होते हैं। इसमें वर्णित क्रियाओं का अभ्यास करने सें देह के स्वस्थ होने के साथ ही जहां मन में स्फृटित विचारों की धारा का प्रवाह तो होता ही है वहीं तमाम ऐसे विषयों और व्यक्तिों के बारे में ज्ञान होता है जो हमारे निकट नहीं होते। उनके दर्शन करते हुए उनके आचार विचार का अध्ययन ध्यान के माध्यम से भी किया जा सकता है। यह अलग बात है कि कुछ लोग अपने अंदर आयी स्फृटित धाराणाओं को सही अध्ययन नहीं कर पाते क्योंकि उनको योग विज्ञान के संपूर्ण सूत्रों का ज्ञान नहीं हो पाता।
              पतंजलि योग सूत्र में कहा गया है कि
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          नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्।
         ‘‘नाभिचक्र में संयम या ध्यान करने शरीर के व्यूह यानि पूर्ण संरचना का ज्ञान हो जाता है।’’
          कण्ठकूपे क्षत्पिपासानिवृत्तिः।।
        ‘‘कण्ठकूप में संयम या ध्यान करने से भूख और प्यास की निवृत्ति हो जाती है।’’
         कूर्मनाडयां स्थैर्यम्।।
        ‘‘कूर्माकार जिसे नाड़ी भी कहा जाता है में संयम या ध्यान करने से स्थिरता होती है।’’
        मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्।।
        ‘‘मूर्धा की ज्योति में संयम या ध्यान करने से सिद्ध पुरुषों के दर्शन होते है।’’
          योग विज्ञान के ज्ञाता लोगों को तत्वज्ञान के लिये श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना चाहिए। उसमें भगवान श्रीकृष्ण ने योग के प्रभावों का विशद वर्णन किया है। ‘गुण ही गुणों में बरतते हैं’ और इंद्रियां ही इंद्रियों में बरतती है’ यह तो ऐसे सूत्र हैं जिनका योग विज्ञानियों को का अवश्य अध्ययन करना चाहिए। जहां योग विज्ञान में यह बात बताई गयी है कि किस तरह अपनी इंद्रियों पर ध्यान रखकर उनको संयमित किया जा सकता है वहीं श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि स्थिरप्रज्ञ मनुष्य ही जीवन का सबसे अधिक आनंद उठाता है। सामान्य लोग अपने चंचल मन के साथ इधर उधर भटकते हैं वहीं योग विज्ञानी एक ही जगह स्थिर रहकर संसार को अपनी अंतदृष्टि से देख लेते हैं।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Saturday, July 23, 2011

संत कबीरदास का संदेश-धर्म का विचार अपने विवेक से करना चाहिए (sant kabir das ka sandesh-dharma ka vichar aur vivek)

          मूलतः भारतीय समाज प्रगतिवादी माना जाता है। हालांकि कुछ विदेशी भारतवासियों की धर्मभीरुता का मजाक उड़ाते हैं पर जिस तरह हमारा समाज समय के अनुसार नई शिक्षा, विज्ञान तथा साधनों के उपयोग की तरफ प्रवृत्त होता है उससे यह प्रमाणित होता है कि रूढ़ता का भाव उसमें नहीं है पर इसके बावजूद फिर भी धर्म के नाम पर अनेक कर्मकांड हैं जिसे लोग केवल सामाजिक दबाव में इसलिये अपनाते हैं कि लोग क्या कहेंगे। आधुनिक शिक्षा से जीवन में आगे बढ़े लोग भी अंधविश्वास और कर्मकांडों पर इसलिये विश्वास करते दिखते हैं क्योंकि उन पर कहीं न कहीं से दूसरे लोगो का दबाव होता है। स्थिति यह है कि अनेक धार्मिक ठेकेदार तो इन्हीं कर्मकांडों को ही धर्म का आधार कहकर प्रचारित करते हैं।
            इस विषय पर संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि 
            ‘कबीर’ मन फूल्या फिरै, करता हूं मैं ध्रंम।
                कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम।।
          "आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।"
              संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नरक का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढ़ियों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए। कर्मकांडों को निभाना धर्म नहीं होता बल्कि इंसान के व्यवहार से दूसरे को लाभ तथा प्रसन्नता मिले वही सच्चा धर्म है, यह बात समझ लेना चाहिए।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Monday, July 18, 2011

मनुस्मृति-अपनी आंखों का पानी से आचमन करते रहना चाहिए (pani se ankhon ka achman-manu smriti)

          वायु तथा जल को न केवल जीवन का आधार माना गया है कि बल्कि उनको ओषधि भी कहा जाता है। जिस तरह प्रातः प्राणायाम से शुद्ध वायु के प्रवेश से शरीर और मन के आंतरिक विकार बाहर निकलते हैं उसी तरह नहाने के दौरान जल के उपयोग से बाहरी अंगों पर शुद्धता आती है। आधुनिक विज्ञान जल की उपयोगिता को लेकर अनेक अनुंसधान कर चुका है। हालांकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में भी इस विषय पर अनेक बातें कही गयी है।
          मनु स्मृति में कहा गया है कि
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            कृत्वा मूत्रं पूरीपं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत्।
            वेदमध्येध्माणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा
       "मल मूत्र करने के बाद व्यक्ति को सदैव हाथ धोकर आचमन करने के साथ ही पानी का स्पर्श आंखों पर करना चाहिए। सदैव वेद पढ़ने तथा भोजन करने से पहले भी हाथ धोकर आचमन करना चाहिए।"
                आजकल कंप्यूटर का उपयोग बढ़ता जा रहा है पर उससे होने वाली हानियों से रोकने और बचने के उपाय बहुत कम  लोग जानते हैं। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि कंप्यूटर का उपयोग करने वालों को बीस मिनट से अधिक उस पर काम करने के बाद दो मिनट आंखें बंद रखना चाहिए। इसके अलावा कंप्यूटर से उठकर बाहर आसमान में ताकना चाहिए ताकि आंखों के उन सूक्ष्म तंतुओं का विस्तार होता है जो काम के दौरान सिकुड़ जाते है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गयी है कि कंप्यूटर पर काम करने वालों को अपनी आंखों में पानी की छींटें मारते रहना चाहिए। कंप्यूटर पर काम करते हुए आंखों में जल सूखने लगता है और आंखों में छींटे मारने से वहां ताजगी आती है। मनृस्मृति में भी कहा गया है कि वेद आदि का अध्ययन करने से पहले और बाद दोनों ही समय आंखों में जल का प्रवेश कराना चाहिए। यही बात हम कंप्यूटर पर काम करते समय भी लागू कर सकते हैं। ऐसे प्रयासों से बहुत सीमा तक कंप्यूटर से होने वाली हानियों से बचा जा सकता है।
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Saturday, July 09, 2011

तीनों लोकों की संपदा घर आने की प्रतीक्षा व्यर्थ-संत कबीर वाणी

           प्रकृति में उत्पन्न समस्त जीवों में मनुष्य सबसे अधिक बुद्धिमान माना गया है और विचित्र बात यह है कि जहां अन्य जीव सीमित आवश्यकताओं के कारण अपना जीवन सामान्य रूप से गुजार लेते हैं जबकि मनुष्य असीम लालच और लोभ को अपने मन में स्थान देता है और सदैव संकट बुलाता है। संत कबीर दास जी ने अपने संदेशों में इसी तरफ इंगित किया है।
       कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं
       तीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिं
          संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा उसके घर कब आयेगी।
            इस दुनिया में मनुष्य ही एक ऐसा जीवन जिसके पास बुद्धि में विवेक है इसलिये वह कुछ नया निर्माण कर सकता है। अपनी बुद्धि की वह से ही वह अच्छे और बुरे का निर्णय कर सकता है। सच तो यह कि परमात्मा ने उसे इस संसार पर राज्य करने के लिए ही बुद्धि दी है पर लालच और लोभ के वश में आदमी अपनी बुद्धि गुलाम रख देता है। वह कभी भी धन प्राप्ति के कार्य से थकता नहीं है। अगर हजार रुपये होता है तो दस हजार, दस हजार से लाख और लाख से दस लाख की चाहत करते हुए उसकी लालच का क्रम बढ़ जाता है। कई बार तो ऐसे लोग भी देखने में आ जाते है जिनके पेट में दर्द अपने खाने से नहीं दूसरे को खाते देखने से उठ खड़ा होता है।
         अनेक धनी लोग जिनको चिकित्सकों ने मधुमेह की वजह से खाने पर नियंत्रण रखने को कहा होता है वह गरीबों को खाता देख दुःखी होकर कहते भी हैं‘देखो गरीब होकर खा कैसे रहा है’। इतना ही नहीं कई जगह ऐसे अमीर हैं पर निर्धन लोगों की झग्गियों को उजाड़ कर वहां अपने महल खड़े करना चाहते हैं। आदमी एक तरह से विकास का गुलाम बन गया है। भक्ति भाव से पर आदमी बस माया के चक्कर लगाता है और वह परे होती चली जाती है। सौ रुपया पाया तो हजार का मोह आया, हजार से दस हजार, दस हजार से लाख और लाख से दस लाख के बढ़ते क्रम में आदमी चलता जाता है और कहता जाता है कि अभी मेरे पास कुछ नहीं है दूसरे के पास अधिक है। मतलब वह माया की सीढियां चढ़ता जाता है और वह दूर होती जाती है। इस तरह आदमी अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है।
       आजकल तो जिसे देखो उस पर विकास का भूत चढ़ा हुआ है। कहते हैं कि इस देश में शिक्षा की कमी है पर जिन्होने शिक्षा प्राप्त की है तो इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि उन्होंने ज्ञान भी प्राप्त कर लिया है। इसलिये शिक्षित आदमी तो और भी माया के चक्कर में पड़ जाता है और उसे तो बस विकास की पड़ी होती है पर उसका स्वरूप उसे भी पता नहीं होता। लोगों ने केवल भौतिक उपलब्धियों को ही सबकुछ मान लिया है और अध्यात्म से दूर हो गये हैं उसी का परिणाम है कि सामाजिक वैमनस्य तथा मानसिक तनाव बढ़ रहा है। अत: जितना हो सके उतना ही अपनी पर नियंत्रण रख्नना चाहिये।  मनुष्य को अपनी बुद्धि तथा मन को लेकर हमेशा आत्ममंथन करना चाहिए ताकि वह स्वयं भी अपने कर्म पर नियंत्रण रख सके 
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Wednesday, July 06, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-दिल को हमेशा खुश रखना संभव नहीं (bhritri neiti shataka-dil ka hamesha khush rakhna sambhav nahin)

            मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति और कमजोरी उसकी देह में स्थित मन है। कहना तो यह चाहिये कि मन की इच्छा से चलने वाला ही जीव मनुष्य कहलाता है। यह मन बहुत विचित्र है। पहले एक चीज को पाने का मोह करता है तो उसके आते ही उससे विरक्त होकर दूसरी का मुख देखने लगता है। जो तत्व ज्ञानी नहीं होते वह अनाड़ी घुड़सवार की तरह इस बेेलगाम घोड़े की सवारी करते हैं जो द्रुत गति से चलता जाता है और फिर अपने स्वामी को नीचे पटक देता है। रुकता फिर भी नहीं बल्कि और तेज दौड़ता है। जमीन पर गिरा मनुष्य घायलावस्था में पड़ा है और सोचता है कि अब क्या करूं?
          आज के वैश्विक समाज में जीवन के विकास का मतलब केवल भौतिक उपलब्धियों की वृद्धि से ही माना जाता है। अध्यात्मिक विकास तो बुढ़ापे में ही आवश्यक है-यह सिद्धांत बताया जाता है। अध्यात्मिक विकास से मतलब सन्यास माना गया है। इस कारण हर मनुष्य जीवन में माया के पीछे भागे चला जा रहा है। एक लाख हैं तो दस लाख चाहिए और दस लाख हैं तो करोड़, करोड़ हैं तो दस करोड़, दस करोड़ हैं तो एक अरब-इस तरह उसके भौतिक विकास का अंतहीन लक्ष्य कभी पूरा नहीं होता और इधर देह वृद्धावस्था में पहुंच जाती है जहां शरीर की लाचारी मन को भी लाचार बना देती है। मन बीमार तो मनुष्य भी बीमार हो जाता है। अध्यात्मिक अभ्यास न होने की वजह से भक्ति होती नहीं तो जिंदगी से थके पांव सत्संग में जाने नहीं देते।
              इस विषय में भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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         दुराराध्याश्चामी तुरगचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं तु स्थूलेच्छाः सुमहति फले बद्धमनसः।
        जरा देहं मृत्युर्हरति दयितं जीवितमिदं सखे नान्यच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः।।
         "राजाओं का चित तो घोड़े की गति से इधर उधर भागता इसलिये उनको भला कब तक प्रसन्न रखा जा सकता है। हमारे अंदर भी ऊंचे ऊंचे पद पाने की लालसा हैं। इधर शरीर को बुढ़ापा घेर रहा है। ऐसे में लगता है कि विवेकवान पुरुषों के लिये तप बल के अलावा अन्य कोई उद्धार का मार्ग नहीं है।"
         अगर हम थोड़ा चिंत्तन करें तो इस बात का आभास स्वतः होगा कि संसार का भौतिक चक्र तो त्रिगुणमयी माया के बंधने में होने के कारण स्वतः संचालित है। हमारी देह स्वाभाविक रूप से अपनी आवश्यकताओं के लिये सक्रिय रहनी ही है चाहे हम प्रयास करें या नहीं। इस देह में विद्यमान मन, बुद्धि तथा अहंकार ऐसी प्रकृतियां हैं जो अपनी सक्रियता का अहसास मनुष्य को कर्ता के रूप में कराती हैं जबकि यह सच नहीं है। ज्ञानी लोग इस बात को जानते हैं इसलिये सांसरिक कर्म में सक्रिय रहते हुए भी उसके फल में विरक्त भाव रखते हैं। ऐसी मानसिक नियंत्रण तप, स्वाध्याय, सत्संग, त्याग तथा भक्ति के अभ्यास से ही प्राप्त होता है। अत जहां तक हो सके समय मिलने पर योगसाधना तथा भक्ति करना चाहिए।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Tuesday, June 28, 2011

सामवेद से संदेश-भगवान नारायण से कर्म की प्रेरणा लें (samved se sandesh-Bhaqwan narayan se karma ki prena len)

             भगवान विष्णु कर्म और फल के प्रतीक भगवान माने जाते हैं। यही कारण है कि भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी के अनेक अवतार समय समय पर हुए है। ब्रह्मा संसार के रचियता तो भगवार शिव संहारक और उद्धारकर्ता कहे गये हैं और भगवान नारायण को पालनहार माना गया है। ब्रह्मा और शिव का कोई अवतार नहीं होता जबकि भगवान नारायण अवतार लेकर अपनी सक्रियता से भक्तों की रक्षा करते है-यह आम धारण हमारे देश के धर्मभीरु लोगों की रही है।  ऐसे में वह संसार में सक्रियतापूर्ण जीवन जीने वालों के प्रेरक भी है।
यह आश्चर्य की बात है कि प्रकृति ने मनुष्य को देह, बुद्धि और मन की दृष्टि से अन्य जीवों की अपेक्षा सर्वाधिक शक्तिशाली जीव बनाया है तो सबसे अधिक आलसी भाव भी प्रदान किया। अधिकतर लोग लोग अपने तथा परिवार के स्वार्थ सिद्ध करने के बाद आराम करना चाहते है और परमार्थ उनको निरर्थक विषय लगता है जबकि पुरुषार्थ का भाव निष्काम कर्म से ही प्रमाणित होता है। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस देह से मनुष्य संसार का उपभोग करता है उसका ही महत्व नहीं समझता और भोगों में उसका नाश करता है। जिससे अंत समय में रोग उसके अंतिम सहयात्री बन जाते हैं और मृत्यु तक साथ रहते हैं।
      योग साधना, ध्यान, भजन और उद्यानों की सैर करने से जो देह के साथ मन को भी जो नवीनता मिलती है उसका ज्ञान अधिकतर मनुष्यों को नहीं रहता। सच बात तो यह है कि शरीर और मन को प्रत्यक्ष रूप से प्रसन्न करने वाले विषय मनुष्य को आकर्षित करते है और वह इसमें सक्रिय होकर जीवन भर प्रसन्न रहने का निरर्थक प्रयास करत है। वह अपनी इसी सक्रियता को पुरुषार्थ समझता है जबकि अप्रत्यक्ष लाभ देने वाले योगासन, ध्यान, भजन तथा प्रातः उद्यानों में विचरण करना उसे एक निरर्थक क्रिया लगती है। सीधी बात कहें तो इस अप्रत्यक्ष लाभ के लिये निष्काम भाव से इन कर्मो में लगना ही पुरुषार्थ कहा जा सकता है।
           हमारे पावन ग्रंथ सामवेद में कहा गया है कि
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           विष्णोः कर्माणि पश्चत यतो व्रतानि पस्पशे।
          ‘‘भगवान विष्णु के पुरुषार्थों को देखो और उनका स्मरण करते हुए अनुसरण करो।’
         ऋतस्य पथ्या अनु।
        ‘‘ज्ञानी सत्य मार्ग का अनुसरण करते हैं।’’
        ‘प्रेता जयता नर।’
        आगे बढ़ो और विजय प्राप्त करो।’’
      पुरुषार्थ करना मनुष्य का धर्म है और इसके लिये जरूरी है कि सत्य को मार्ग का अनुसरण किया जाये। आजकल जल्दी धनवान बनने के लिये असत्य मार्ग को भी अपनाने लगते हैं और उनको कामयाबी भी मिल जाती है पर जब उनको इसका दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग कभी भी ऐसे गलत कार्य में अपना मन नहीं लगाते जिसका कालांतर में दुष्परिणाम भोगना पड़े।
     कर्म और पुरुषार्थ के विषय में भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। वह संसार के पालनहार माने जाते हैं। ऐसा महान केवल पुरुषार्थ करने वालों को ही मिल सकता है। भगवान विष्णु के चौदह अवतार माने जाते हैं और हर अवतार में कहीं न कहीं उनका पुरुषार्थ प्रकट होता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Friday, June 24, 2011

दिखावटी मित्र का त्याग करना ही श्रेयसस्कर-संत कबीर वाणी (dikhavati mitra ka tyag karna hee theek-sant kabir vani)

          आमतौर अपनी संगत और मित्रता को लेकर अधिक चिंतित नहीं होते और सतर्कता के अभाव में अंततः उनको उसका बुरा परिणाम भोगना पड़ता है। जब कोई आदमी अपने दिल की बातें, नियमित गतिविधियां तथा परिवार की स्थिति के बारे में किसी ऐसे मित्र से चर्चा करता है जो उसका हितैषी नहीं है तो वह सभी को वह बातें बता देता है। लोग यह जानते हुए भी कि उनका मित्र कोई अधिक विश्वसनीय नहीं है उसे अपनी बातें यह सोचकर बता देते हैं कि उससे कोई हानि होने की संभावना नहीं है। यह भ्रम टूटता है जब दूसरे लोगों का वह बातें पता चलती हैं और उसका सभी फायदा उठाते हुए ताने देते हैं या बदनाम करते है। कभी कभी निजी बात दूसरे को जानकारी मिलने से हानि भी होती है और तब पता चलता है कि हमने अपनी बात अपने मित्र को व्यर्थ बताई।
चित कपटी सबसों मिलै, मांहि कुटिल कठोंर।
इक दुरजन इक आरसी, आगे पीछे ओर।।
         ‘‘हृदय में कपट रखने वाला सबसे मधुर व्यवहार करता है। उसका प्रेम केवल दिखावा होता है एक दुष्ट और दर्पण के गुण एक समान होते है। आगे से सफेद पीछे से काले होते हैं।’’
हिये कतरी जीभ रस, मुख बोलन का रंग।
आगे भल पीछे बुरा, ताको तजिये संग।
       "जिसके हृदय में कपट और कलुषिता है पर बातें रस भरी हैं तथा जो केवल सामने अच्छी बात करता है जबकि पीठ पीछे बुराई में लिप्त होता है ऐसे मित्र का त्याग कर देना श्रेयस्कर है।"
       सच बात तो यह है कि लोग आजकल दिखावा बहुत करते हैं। फिर संयुक्त परिवारों की परंपरा का पतन तथा रोजगार की स्थितियो में परिवर्तन ने लोगों को अकेला कर दिया है। इसलिये किसी का साथ पाने की आशा इस उद्देश्य से करते हैं कि शायद वह मित्रता का व्यवहार निभाये। मजे की बात यह है कि लोग स्वयं इस बात का विचार नहीं करते कि वह स्वयं कितना व्यवहार निभा सकते हैं। अकेलेपन से ऊबे लोग दूसरे व्यक्तियों की बातों में आकर उसे अपना मानते हैं। हमेशा यह गलती बुरी साबित न हो पर इसकी संभावना हमेशा रहती है कि मित्र कब धोखा दे। इसलिये मित्रता के रूप में अपने संपर्क बढ़ाने से पहले मित्र के स्वभाव तथा रहन सहन के साथ ही उसकी वैचारिक शुद्धता को अवश्य प्रमाणित कर लेना चाहिए।
संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Friday, June 17, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-प्रचार पाने के लिए गलत काम न करें (prachar paane ke liye galat kaam na karen-kautilya ka arthshastra)

           मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह समाज में श्रेष्ठ कहलना चाहता   है। इसी कारण वह निरंतर ही धन, प्रतिष्ठा और अन्य लोक महत्व की अन्य वस्तुएं संग्रह करने में लगा रहता है। इसी प्रवृति के चलते  समान रुचियों वाले लोगों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है।  आज समाज में नाम पाने के लिये कुछ भी कर गुजरने की मनोवृत्ति इतने भयानक हो चुकी है  कि लोग अनेक बार शर्मनाक हरकते करते हैं।  प्रचार माध्यमों में नाम पाने का मोह लोगों को अंधा बना देता है। अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का नायक की तरह प्रचारित होते  देखकर कुछ युवा भ्रमित हो जाते हैं।  वैसे भी जनसामान्य को लगता है कि जो लोग अपनी हिंसक अपराधिक प्रवृत्ति की वजह से समाज में डर बनाये रहते हैं वह कोई दमदार आदमी हैं।  उनका रुतवा देखकर सब उनसे संपर्क रखते हैं पर प्रकृति का नियम है कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा।  जो लोग जनविरोधी काम करते हुए आतंक का वातावरण बनाते हैं वह दरअसल स्वयं ही अंदर से डरे रहते हैं। उनकी बदनामी को लोकप्रियता समझना मूर्खता है।  समाज में सम्मान तो केवल उसी आदमी को मिलता है जो जनहित का काम करता है। 
      हर मनुष्य में पूज्यता और अहंकार का भाव होता है। जब किसी को धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो फूलकर कुप्पा नहीं समाता बल्कि उसका प्रदर्शन करने लगता है और कई लोगों का तो मन ही विचलित हो जाता है। शक्ति आने पर ही अनेक लोग संतुष्ट नहीं होते बल्कि उसका प्रभाव समाज पर दृष्टिगोचर हो और वह डरे इसी उद्देश्य से कुछ लोग अपने बड़प्पन का दुरुपयोग करने लगते हैं। आजकल हम देख सकते है कि देश में अमीरों, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोगों का आतंक पूरे समाज पर दिखाई देता है। शक्तिशाली वर्ग के लोग अपनी शक्ति से छोटों को संरक्षण देने की बजाय अपनी शक्ति का उपयोग उनको दबाकर आत्म संतुष्टि कर लेते हैं। यही कारण है कि समाज में वैमनस्य का भाव बढ़ रहा है।
            कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि 
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         आयत्याञ्प तदात्वे च यत्स्यादास्वादपेशलम्।
         तदेव तस्य कुर्वीत न लोकद्विष्टमाचरेत्।।
       "भविष्य की अच्छी संभावनाओं को देखते हुए बुद्धिसे जो कार्य करने में अच्छा लगे वही प्रारंभ करे परंतु कभी भी सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें।"
        श्लाघ्या चानन्दनीया च महतामुफ्कारिता।
       करले कल्याणगायत्ते स्वल्पापि सुमहोदयम्।
       "उच्च पुरुषों का उपकार कर्म अत्यंत प्रिय तथा आनंदमय लगता है वह अगर किसी का भी थोड़ा कल्याण करते हैं तो उसका महान उदय होता है।"
            हम अनेक लोगों का उनके धन, पद और बल की वजह से बड़ा मान लेते हैं पर सच यह है कि वह समाज का भला करना नहीं जानते। बड़े आदमी की थोड़ी कृपा से छोटे आदमी प्रसन्न हो सकत हैं पर इसको समझने की बजाय उसे कुचलकर अपने आप को खुश करना चाहते हैं।
       बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को न छाया मिले, पथिक को फल लागे अति दूर-यह कहावत अधिकतर बड़े लोगों पर लागू होती है। ऐसे लोगों को बड़ा मानना ही एक तरह से गलत है। बड़ा आदमी तो वह है जो लोकहित में अपनी शक्ति का उपयोग करता है न कि जनविरोधी काम करके अपने अहंकार की संतुष्टि! अतः धल, उच्च पद या बाहूबल होने पर छोटे और कमजोर आदमी को संरक्षण देना चाहिये ताकि समाज को एक नई दिशा मिल सके।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर 
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Friday, May 27, 2011

हिन्दू धर्म शास्त्रों से संदेश-काले धन से धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करना वर्जित (from hindu dharmik shastra-black money anb religon program)

         धन के दो नहीं तीन रूप होते हैं। इनमें सबसे पवित्र शुक्ल धन माना गया है। हमारे पवित्र ग्रंथ हमेशा ही यज्ञ के उपयोग  में किये जाने वाले धन की पवित्रता पर जोर देते हैं। अनाधिकृत रूप से प्राप्त धन को शबलम तथा ठगी, चोरी, ब्याज तथा मिलावट से प्राप्त धन कृष्ण याकाला कहा जाता है। शबलम या कृष्ण धन से धार्मिक यज्ञ या कार्यक्रम करना वर्जित है।
             हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि
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            शुक्लशबलोऽसितश्चार्थ।
          "धन के तीन प्रकार होते हैं-शुक्ल, शबल तथा असित।"
             स्ववृत्युपार्जितं सर्व सर्वेषां शुक्लम्।‘
            "अपनी वृति से न्यायपूर्वक धन को शुक्ल या स्वच्छ धन कहा जाता है।"
             अनंतरवृत्युपातं शबलम्।
            उत्कोचशुल्कप्राप्तमविक्रयस्य विक्रये।
           कृतोपोरादास च शबलम् समुदाह्य्तम्।।
           "दूसरों की वृत्ति से उपार्जित तथा उत्कोच यानि अनाधिकृत रूप में घूस से प्राप्त तथा जो बेचने योग्य वस्तु नहीं  है उससे बेचकर प्राप्त धन या दूसरे के उपकार से प्राप्त धन शबलम धन कहलाता है।
अंमकरवृत्यापातं च कृष्णम्।"
             पाश्चिकद्यूतचौयासं प्रतिरूपकसाहरसोः।
            व्याजेनोपार्जित यच्य तत्कृष्णं समेदाहतम्।।
           "बुरी प्रवृत्ति प्राप्त अशुद्ध तथा कपट से प्राप्त कृष्ण या काला धन कहलाता है। छल, ठगी, बेईमानी, जुआ, चोरी, मिलावट डकैती तथा ब्याज से प्राप्त धन काला धन कहलाता है।
             आजकल हम जब समाज की स्थिति देखते हैं तो घोर कलियुग की बात एकदम समझ में आती है। पूरे देश में काले धन के विरुद्ध बहुत सारी मुहिमें चल रही है पर सवाल यह है कि उसका नेतृत्व भी कौन कर रहा है? क्या उनके पास आया पूरा धन शुक्लपक्षीय है। यकीनन नहीं है। अगर हम अपने धर्मग्रंथों की बात माने तो धर्म के लिये एकत्रित पैसा हमेशा ही साफ मार्ग से आया होना चाहिए जबकि हम आजकल के अपने धार्मिक संतों और संगठनों के पास एकत्रित धन संपदा को देखें तो यकीनन वह शबलम या काले धन से एकत्रित प्रतीत होती है। जब भारत में आम आदमी के पास इतना शुक्लपक्षीय धन उपलब्ध नहीं है कि वह धर्म पर खर्च कर सकें तब यह संभव नहीं है कि इतने बड़े पैमाने पर चल रही धार्मिक गतिविधियों शबलम् या कृष्णपक्षीय धन शामिल न हो। कुछ कट्टर धार्मिक लोग धर्म के नाम पर प्राप्त धन के पवित्र होने का दावा अवश्य करें पर हमारे धर्मग्रंथ इस बात का समर्थन नहीं करते। ऐसे में आम भक्तों को ऐसे कार्यक्रमों से भी बचना चाहिए जहां पवित्र धन के पूर्ण उपयोग की संभावना न हो। इससे बेहतर तो यही है कि स्वयं ही योगसाधना, ध्यान, गायत्री मंत्र और ओम शब्द का जाप कर भक्ति करना चाहिए। दूसरी बात यह भी दूसरे के धन पर टिप्पणियां करने से अच्छा है कि भक्त स्वयं अपने ही कर्म पर ध्यान दें।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Saturday, May 21, 2011

बड़े लोगों को अधिक प्रसन्न नहीं रखा जा सकता-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन

                मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति और कमजोरी उसकी देह में स्थित मन है। कहना तो यह चाहिये कि मन की इच्छा से चलने वाला ही जीव मनुष्य कहलाता है। यह मन बहुत विचित्र है। पहले एक चीज को पाने का मोह करता है तो उसके आते ही उससे विरक्त होकर दूसरी का मुख देखने लगता है। जो तत्व ज्ञानी नहीं होते वह अनाड़ी घुड़सवार की तरह इस बेेलगाम घोड़े की सवारी करते हैं जो द्रुत गति से चलता जाता है और फिर अपने स्वामी को नीचे पटक देता है। रुकता फिर भी नहीं बल्कि और तेज दौड़ता है। जमीन पर गिरा मनुष्य घायलावस्था में पड़ा है और सोचता है कि अब क्या करूं?
            आज के वैश्विक समाज में जीवन के विकास का मतलब केवल भौतिक उपलब्धियों की वृद्धि से ही माना जाता है। अध्यात्मिक विकास तो बुढ़ापे में ही आवश्यक है-यह सिद्धांत बताया जाता है। अध्यात्मिक विकास से मतलब सन्यास माना गया है। इस कारण हर मनुष्य जीवन में माया के पीछे भागे चला जा रहा है। एक लाख हैं तो दस लाख चाहिए और दस लाख हैं तो करोड़, करोड़ हैं तो दस करोड़, दस करोड़ हैं तो एक अरब-इस तरह उसके भौतिक विकास का अंतहीन लक्ष्य कभी पूरा नहीं होता और इधर देह वृद्धावस्था में पहुंच जाती है जहां शरीर की लाचारी मन को भी लाचार बना देती है। मन बीमार तो मनुष्य भी बीमार हो जाता है। अध्यात्मिक अभ्यास न होने की वजह से भक्ति होती नहीं तो जिंदगी से थके पंाव सत्संग में जाने नहीं देते।
             इस विषय में भर्तृहरि महाराज अपने नीति शतक  में कहते हैं कि
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  दुराराध्याश्चामी तुरगचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं तु स्थूलेच्छाः सुमहति फले बद्धमनसः।
    जरा देहं मृत्युर्हरति दयितं जीवितमिदं सखे नान्यच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः।।
          "राजाओं का चित तो घोड़े की गति से इधर उधर भागता इसलिये उनको भला कब तक प्रसन्न रखा जा सकता है। हमारे अंदर भी ऊंचे ऊंचे पद पाने की लालसा हैं। इधर शरीर को बुढ़ापा घेर रहा है। ऐसे में लगता है कि विवेकवान पुरुषों के लिये तप बल के अलावा अन्य कोई उद्धार का मार्ग नहीं है।"
         अगर हम थोड़ा चिंत्तन करें तो इस बात का आभास स्वतः होगा कि संसार का भौतिक चक्र तो त्रिगुणमयी माया के बंधने में होने के कारण स्वतः संचालित है। हमारी देह स्वाभाविक रूप से अपनी आवश्यकताओं के लिये सक्रिय रहनी ही है चाहे हम प्रयास करें या नहीं। इस देह में विद्यमान मन, बुद्धि तथा अहंकार ऐसी प्रकृतियां हैं जो अपनी सक्रियता का अहसास मनुष्य को कर्ता के रूप में कराती हैं जबकि यह सच नहीं है। ज्ञानी लोग इस बात को जानते हैं इसलिये सांसरिक कर्म में सक्रिय रहते हुए भी उसके फल में विरक्त भाव रखते हैं। ऐसी मानसिक नियंत्रण तप, स्वाध्याय, सत्संग, त्याग तथा भक्ति के अभ्यास से ही प्राप्त होता है। अत जहां तक हो सके समय मिलने पर योगसाधना तथा भक्ति करना चाहिए।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Saturday, April 23, 2011

योगासन और प्राणायाम से व्यक्तित्व में निखार आता है-पतंजलि योग सूत्र (yogasan aur pranayam aur vyaktitva-patanjali yoga sootra)

          भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के पितृपुरुष योग साधना के जनक पतंजलि के साहित्य में योगासनों की चर्चा अधिक नहीं है पर प्राणायाम का महत्व उसमें बहुत प्रभावी ढंग से व्यक्त किया गया है। श्रीमद्भागवत् गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने आसनों से अधिक प्राणायाम की चर्चा की है। वास्तव में यह प्राणायाम एक तरह से तप है जिसके माध्यम से हमारे देश में अनेक ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों ने साधना कर ज्ञानार्जन किया। उन्होंने अपने अनुभव को समाज के सामने रखा और उनके सृजन की वजह से ही हमारा देश पूरे विश्व में अध्यात्मिक गुरु की छवि बना सका है।
               इस विषय में पतंजलि योग में कहा गया है कि
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                प्राणायमाः ब्राहम्ण त्रयोऽपि विधिवत्कृताः।
                व्याहृति प्रणवैर्युक्ताः विज्ञेयं परमं तपः।।
              "किसी साधक द्वारा ओऽम तथा व्याहृति के साथ विधि के अनुसार किए गए तीन प्राणायामों को भी उसका तप ही मानना चाहिए।"
              दह्यान्ते ध्यायमानानां धालूनां हि यथा भलाः।
             तथेन्द्रियाणां दह्यान्ते दोषाः प्राणस्य निग्राहत्।।
            "अग्नि में सोना चादीए तथा अन्य धातुऐं डालने से जिस प्रकार उनकी अशुद्धता दूर होती है उसी प्राणायाम करने से इंद्रियों के सारे पाप तथा विकार नष्ट होते हैं।"
            प्राणायाम दो प्रकार से होता है। एक तो सांस अंदर कुछ देर रोकर फिर उसका विसर्जन किया जाता है दूसरा सांस बाहर निकालकर फिर उसे रोक दिया जाता है। कुछ देर बाद फिर तेजी से सांस ली जाती है। सामान्य दिखने वाला यह अभ्यास अत्यंत  तीक्ष्ण प्रभाव पैदा करने वाला होता है। इससे न केवल शरीर में बल बढ़ता है बल्कि व्यक्तित्व आकर्षक बनने के साथ ही मानसिक दृढ़ता भी आती है। मन, शरीर और विचार के विकार निकलने के साथ बुद्धि में तीक्ष्णता और चिंतन की शक्ति में वृद्धि होती है।
     प्राणायाम से जो शक्ति मिलती है उसका प्रमाण वही लोग जानते हैं जिन्होंने इसका अभ्यास किया है। जब आदमी निरंतर प्राणायाम करता है तक उसकी यह ऐसी आदत बन जाती है कि वह इसके बिना रह नहीं सकता। इसका एक ऐसा नशा हो जाता है जो सारे नशे भुला देता है। यही कारण है कि आज भी हमारे देश में अनेक लोग हैं जिन्होंने एक बार अगर योगासन और प्राणायाम करना प्रारंभ किया तो जीवन पर्यंत करते रहते हैं। 
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Thursday, April 21, 2011

शोषकों की प्राणशक्ति क्षीण होती है-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (shoshk ki pranshakti kamjor hotee hai-hindu dharmik chittan)

      शरीरकर्षणात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा।
तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात्।।
          "जिस प्रकार शरीर को भोजन पानी न देकर उसका शोषण करने से उसकी प्राणशक्ति कमजोर हो जाती है उसी तरह राष्ट्र या प्रजा का शोषण करने से राजा की प्राणशक्ति कमजोर हो जाती है।"
                      जिन लोगों ने मनुस्मृति को नारी तथा निम्न जातियों के लोगों के लिये अपमानजनक बताकर इसको जलाया और अपमान किया वह लोग कौन थे? यह विचार करना जरूरी है।
यकीनन इनमें से कई लोग अपने अभियान को पूरा कर राजकीय पदों पर सुशोभित हुए। वह मनुस्मृति का दुष्प्रचार कर जनता में भेद डालकर आधुनिक लोकतंत्र के सहारे उसका मत लेकर राजसत्ता चाहते रहे होंगे। वह मिली और आधुनिक पदों के नाम से राजा भी वही लोग बने। वह डरते थे कि मनुस्मृति के अनेक संदेश उनकी आत्मा को रुलायेंगे, उनका सच कोई बतायेगा तो स्वयं का काला चेहरा ही अपने अंतर्मन के कांच में दिखाई देगा। सच से भागने वाले इसे सत्ता भोगियों ने मनृस्मृति से ही न केवल दूर रहने का फैसला किया बल्कि प्रजा को भी दूर रहने का प्रयास आरंभ किया।
                 हम आज देखें तो देश की क्या हालत है? घोटालों, भ्रष्टाचार तथा आतंक के साये में आम लोग जी रहे हैं। मनृस्मृति में नारी के लिये अपमाजनक टिप्पणियां दिखाने वाले विद्वान आज के युग में ही नारी की पहले से अधिक दुर्गति पर रोते हैं पर उसका हल नहीं बता पाते। वह विद्वान राज्य को दोष देते हैं पर उसी के सहारे उनकी दुकान चल रही है। ऐसा नहीं है कि इस देश में ईमानदार राज्य कर्मी या अधिकारी नहीं हैं पर कुछ लोगों ने अपना वर्चस्व इस तरह स्थापित कर लिया है कि राज्य का केंद्र बिंदु उनके इर्दगिर्द ही घूमता है और वह उसका गलत इस्तेमाल कर अपने लिये घर भरते हैं। इन भ्रष्ट लोगों के मन में बस जनता की शोषण करने की भयानक प्रवृत्ति है। इससे उनकी प्राणशक्ति कमजोर हो गयी है और भले ही वह जनता की रक्षा का कथित दावा करें पर कर नहीं  पाते।
                        कभी कभी तो प्रतीत होता  है कि आम और गरीब जनता के माध्यम से जो राजस्व आता है उसकी लूट के लिये एक तरह से बहुत सारे गिरोह बन गये हैं। कहीं न कहीं न वह सफेद चेहरा लेकर राज्य के निकट पहुंचकर वह अपना कालाचरित्र धन और पद के सफेद रंग से पोतकर उसे आकर्षक ढंग से सजा लेते हैं। ऐसे लोगों की प्राणशक्ति कमजोर होती है। बाहर से भले ही वह ढीठता दिखायें पर पर अंदर से वह अपने काले कारनामों की वजह से खौफ में जीते हैं। ऐसे में अगर कोई मनृस्मृति के राज्य से जुड़े अंश पढ़कर सुनायें तो उनको लगेगा कि कोई उनका सच ही उनके सामने बयान कर रहा है। प्राणशक्ति से क्षीण ऐसे लोग अज्ञानी पुरुष की तरह सत्य से छिपते और भागते हैं। एक बात याद रखना चाहिए कि समाज और राष्ट्र की सेवा वही कर सकते हैं जिनकी प्राणशक्ति प्रबल है और यह उनके लिये ही संभव है जो गलत काम नहीं  करते। ईमानदार और निष्ठावान लोगों की प्राणशक्ति मज़बूत होती है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Tuesday, April 19, 2011

प्रसिद्धि पाने के लिये अनुचित काम न करें-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (prasiddhi ke liye anuchit kam n karen-hindu dharmik chittan)

           आज समाज में नाम पाने के लिये कुछ भी कर गुजरने की मनोवृत्ति बढ़ती जा रही है।  प्रचार माध्यमों में नाम पाने का मोह लोगों को अंधा बना देता है। अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का नायक की तरह प्रचार देखकर कुछ युवा भ्रमित हो जाते हैं।  वैसे भी जनसामान्य को लगता है कि जो लोग अपनी हिंसक अपराधिक प्रवृत्ति की वजह से समाज में डर बनाये रहते हैं वह कोई दमदार आदमी हैं।  उनका रुतवा देखकर सब उनसे संपर्क रखते हैं पर प्रकृति का नियम है कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा।  जो लोग जनविरोधी काम करते हुए आतंक का वातावरण बनाते हैं वह दरअसल स्वयं ही अंदर से डरे रहते हैं। उनकी बदनामी को लोकप्रियता समझना मूर्खता है।  समाज में सम्मान तो केवल उसी आदमी को मिलता है जो जनहित का काम करता है। 
           हर मनुष्य में पूज्यता और अहंकार का भाव होता है। जब किसी को धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो फूलकर कुप्पा नहीं समाता और कई लोगों का तो मन ही विचलित हो जाता है। शक्ति आने पर ही अनेक लोग संतुष्ट नहीं होते बल्कि उसका प्रभाव समाज पर दृष्टिगोचर हो और वह डरे इसी उद्देश्य से कुछ लोग अपने बड़प्पन का दुरुपयोग करने लगते हैं। आजकल हम देख सकते है कि देश में अमीरों, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोगों का आतंक पूरे समाज पर दिखाई देता है। शक्तिशाली वर्ग के लोग अपनी शक्ति से छोटों को संरक्षण देने की बजाय अपनी शक्ति का उपयोग उनको दबाकर आत्म संतुष्टि कर लेते हैं। यही कारण है कि समाज में वैमनस्य का भाव बढ़ रहा है।
           कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि 
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    तदेव तस्य कुर्वीत न लोकद्विष्टमाचरेत्।।
     "भविष्य की अच्छी संभावनाओं को देखते हुए बुद्धिसे जो कार्य करने में अच्छा लगे वही प्रारंभ करे परंतु कभी भी सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें।"
    श्लाघ्या चानन्दनीया च महतामुफ्कारिता।
    करले कल्याणगायत्ते स्वल्पापि सुमहोदयम्।
"उच्च पुरुषों का उपकार कर्म अत्यंत प्रिय तथा आनंदमय लगता है वह अगर किसी का भी थोड़ा कल्याण करते हैं तो उसका महान उदय होता है।"
            हम अनेक लोगों का उनके धन, पद और बल की वजह से बड़ा मान लेते हैं पर सच यह है कि वह समाज का भला करना नहीं जानते। बड़े आदमी की थोड़ी कृपा से छोटे आदमी प्रसन्न हो सकत हैं पर इसको समझने की बजाय उसे कुचलकर अपने आप को खुश करना चाहते हैं।
           बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को न छाया मिले, पथिक को फल लागे अति दूर-यह कहावत अधिकतर बड़े लोगों पर लागू होती है। ऐसे लोगों को बड़ा मानना ही एक तरह से गलत है। बड़ा आदमी तो वह है जो लोकहित में अपनी शक्ति का उपयोग करता है न कि जनविरोधी काम करके अपने अहंकार की संतुष्टि! अतः धल, उच्च पद या बाहूबल होने पर छोटे और कमजोर आदमी को संरक्षण देना चाहिये ताकि समाज को एक नई दिशा मिल सके।
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