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Tuesday, May 03, 2011

धन के पीछे आदमी जीवन नष्ट कर देता है-कबीरदास

सिख गुरु गोविंद सिंह जी का कहना था कि ‘धन बहुत बड़ी चीज है, पर आदमी को खाने के लिये बस दो रोटी चाहिए।’
इसका आशय यही है कि भले ही आदमी कितना भी कमा ले पर उसका पेट अन्न के बिना नहीं भर सकता। हम इसका व्यापक तथा गुढ़ भाव देखें तो यह बात समझ में आती है कि खाने के लिये जहां हमें रोटी चाहिए तो प्यास बुझाने के लिये पानी। देह को बचाने के लिये कपड़ा चाहिये और रात गुजारने के लिये छत की आवश्यकता होती है। यह धन से प्राप्त होती हैं पर दैहिक आवश्यकता की पूर्ति वस्तुओं से होती है कि कागज के नोटों से। यह बात लोग नहीं समझते और पैसा कमाने का लक्ष्य रखकर ही चलते जाते हैं और फिर अंततः उनकी देह नष्ट हो जाती है। इस दुनियां के अधिकतर मनुष्य जितना कमाते हैं उतना खर्च नहीं कर पाते। वह ऐसा भौतिक संसार रच जाते हैं जो बाद में दूसरों के काम आता है।
इस विषय पर संत कबीरदास कहते हैं कि
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कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं
तीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिं
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा उसके घर कब आयेगी।
हालांकि लोग धन का पीछा करते हुए थकते नहीं हैं पर एकरसता से जो ऊब पैदा होती है उसको भी नहीं समझ पाते। योगसाधना, ध्यान, और मंत्रजाप उनके लिये फालतु की चीज हैं। कुछ लोग पैसे के कारण भी भक्ति का दिखावा करते हुए बड़े बड़े कार्यक्रम भी करते हैं पर उनका आचरण, व्यवहार और वाणी हमेशा ही उनके अंदर के विकारों से ग्रसित दिखाई देती है। आजकल तो ऐसे लोग भी हो गये हैं जो धर्म का व्यापार इसलिये करते हैं ताकि उनके लिये सुखसुविधा का संग्रह होता रहे। अनेक लोग समाज पर दबदबा बनाये रखने के लिये भगवान की आड़ लेते हैं। ऐसे लोग वैभव, पद और बाहुबल से संपन्न दिखते जरूर हैं पर मानसिक रूप से विकृति को प्राप्त हो जाते हैं।
इस संसार में सुख से रहने का मार्ग अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने से ही सुलभ होता है। यही सोचकर तत्व ज्ञानी जितना मिलता है उसी से संतोष कर लेते हैं। वह न केवल अपना जीवन आनंद से बिताते हैं बल्कि दूसरों को भी सुख देते हैं।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Friday, March 04, 2011

अपनी अक्ल नहीं तो बड़ा आदमी किस काम का-हिन्दी लेख (apni akal na ho to aadmi kis kam ka-hindi lekh)

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते  हैं कि  
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हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुराय
लोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जाय
"कुछ लोग   हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते  और दूरे यह समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है वह तो अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।"
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जोरे बड़ मति नांहि
जैसे फूल उजाड़ को, मिथ्या हो झड़ जांहि
"आदमी धन, पद और सम्मान पाकर बड़ा हुआ तो भी क्या अगर उसके पास अपनी मति नहीं है। वह ऐसे ही है जैसे बियावन उजड़े जंगल में फूल खिल कर बिना किसी के काम आये मुरझा जाता है।"
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-समय ने ऐसी करवट ली है कि इस समय धर्म और जनकल्याण के नाम पर भी व्यवसाय हो गया है। इस मायावी दुनियां में यह पता ही नहीं लगता कि सत्य और माया है क्या? जिसे देखो भौतिकता की तरफ भाग रहा है। क्या साधु और क्या भक्त सब दिखावे की भक्ति में लगे हैं। राजा तो क्या संत भी अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं। उनको देखकर लोग वाह-वाह करते हैं। सोचते हैं हां, राजा और संत को इस तरह रहना चाहिये। सत्य तो यह है कि इस तरह तो वह भी लोग भी भ्रम में हो जाते हैं और उनमें अहंकार आ जाता है और दिखावे के लिये सभी धर्म करते हैं और फिर अपनी मायावी दुनियां में अपना रंग भी दिखाते हैं। ऐसे लोग पुण्य नहीं पाप में लिप्त है और उन्हें भगवान भक्ति से मिलने वाला सुख नहीं मिलता और वह अपने किये का दंड भोगते हैं।
यह शाश्वत सत्य है कि भक्ति का आनंद त्याग में है और मोह अनेक पापों को जन्म देता है। सच्ची भक्ति तो एकांत में होती है न कि ढोल नगाड़े बजाकर उसका प्रचार किया जाता है। हम जिन्हें बड़ा व्यक्ति या भक्त कहते हैं उनके पास अपना ज्ञान और बुद्धि कैसी है यह नहीं देखते। बड़ा आदमी वही है जो अपनी संपत्ति से वास्तव में छोटे लोगों का भला करता है न कि उसका दिखावा। आपने देखा होगा कि कई बड़े लोग अनेक कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिये करते हैं और फिर उसकी आय किन्हीं कल्याण संस्थाओं को देते हैं। यह सिर्फ नाटकबाजी है। वह लोग अपने को बड़ा आदमी सबित करने के लिये ही ऐसा करते हैं उनका और कोई इसके पीछे जनकल्याण करने का भाव नहीं होता।
कभी कभी तो लगता है कि जनकल्याण का नारा देने वाले लोग बड़े पद पर प्रतिष्ठत हो गये हैं पर लगता नहीं कि उनके पास अपनी मति है क्योंकि वह दूसरों की राय लेकर काम करने आदी हो गये हैं। ऐसे लोगों के लिये कल्याण तो बस दिखावा है वह तो उसके नाम पर सुख तथा एश्वर्य प्राप्त करने में ही अपने को धन्य समझते हैं।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  "भारतदीप",ग्वालियर 
editor and writer-Deepak raj kukreja,Gwalior
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