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Thursday, April 14, 2011

कामना रूप नदी राग और अनुराग जैसे मगरमच्छों से भरी पड़ी है-हिन्दू धार्मिक लेख (kamna roopg nadi mein rag aur anurag magarmachchh-hindu dharmik lekh)

विद्वान्  महाराज भर्तृहरि कहते हैं 
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आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङगाकुला
रामग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी
मोहावर्तसुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुङगचिन्तातटी
तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगश्वराः
''आशा एक नदी की भांति इसमे हमारी कामनाओं के रूप में जल भरा रहता है और तृष्णा रूपी लहरें ऊपर उठतीं है। यह नदी राग और अनुराग जैसे भयावह मगरमच्छों से भरी हुई हैं। तर्क वितर्क रूपी पंछी इस पर डेरा डाले रहते हैं। इसकी एक ही लहर मनुष्य के धैर्य रूपी वृक्ष को उखाड़ फैंकती है। मोह माया व्यक्ति को अज्ञान के रसातल में खींच ले जाती हैं, जहा चिंता रूपी चट्टानों से टकराता हैं। इस जीवन रूपी नदी को कोई शुद्ध हृदय वाला  योगी तपस्या, साधना और ध्यान से शक्ति अर्जित कर परमात्मा से संपर्क जोड़कर ही सहजता से पार कर पाता है।"
वर्त्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- कहते हैं कि ‘उम्मीद पर आसमान टिका है’।  यह उम्मीद और आशा यानि क्या? सांसरिक स्वार्थों की पूर्ति होने ही हमारी आशाओं का केंद्र है। भक्ति, सत्संग तथा तत्वज्ञान से दूर भटकता मनुष्य अपना पेट भरते भरते थक जाता है पर वह है कि भरता नहीं।  कभी कभी जीभ स्वाद बदलने के लालायित हो जाती है।  सच तो यह है कि मन की तृष्णायें ही आशा का निर्माण करती हैं।  भारत जो कभी एक शांत और प्राकृतिक रूप से संपन्न क्षेत्र था आज पर्यावरण से प्रदूषित हो गया है।  हमेशा यहां आक्रांता आये और साथ में लाये नयी रौशनी की कल्पित आशायें।  सिवाय ढोंग के और क्या रहा होगा?  कुछ मूर्ख लोग तो कहते हैं कि इन आक्रांताओं ने यहां नयी सभ्यता का निर्माण किया।  इस पर हंसा ही जा सकता है।  यह नयी सभ्यता कभी अपना पेट नहीं भर पाती। जीभ के स्वाद के लिये अपना धर्म तक छोड़ देती है। रोज नये भौतिक साधनों के उपयोग की तरफ बढ़ चुकी यह सभ्यता जड़ हो चुकी है।  आशायें हैं कि पूर्ण नहीं होती। होती है तो दूसरी जन्म लेती है।  यह क्रम कभी थमता नहीं।
इस सभ्यता में हर मनुष्य का सम्मान की बात कही जाती है।  यह एक नारा है। योग्यता, चरित्र और वैचारिक स्तर के आधार पर ही मनुष्य को सम्मान की आशा करना चाहिये मगर नयी सभ्यता के प्रतिपादक यहां जातीय और भाषाई भेदों का लाभ उठाकर यहां संघर्ष पैदा कर  मायावी दुनियां स्थापित करते रहे। भारतीय अध्यात्म ज्ञान में जहां मान सम्मान से परे रहकर अपनी तृष्णाओं पर नियंत्रण करने के लिये संदेश दिया जाता है। सभी के प्रति समदर्शिता का भाव रखने का आदेश दिया जाता है। वही नयी सभ्यता के प्रतिपादक अगड़ा पिछड़ा का भेद यहां खड़ा करते हुए बतलाते हैं कि जिन तबकों को पहले  सम्मान नहीं मिला अब उनकी पीढ़ियों को विशेष सम्मान दिया जाना चाहिए।  कथित पिछड़े तबकों को विशेष सम्मान की तृष्णा जगाकर वह दावा करते हैं कि हम यहां समाज में बदलाव ला रहे हैं।  कितने आश्चर्य की बात है कि जिन जातियों में अनेक महापुरुष और वीर योद्धा पैदा हुए उनको ही पिछड़ा बताकर सामाजिक वैमनस्य पैदा केवल इसी ‘विशेष सम्मान’ की आड़ में पैदा किया गया है। आज हालत यह है कि पहले से अधिक जातिपाति का  फैल गया है।
विकास, सम्मान और आर्थिक समृद्धि की आशाऐं जगाकर भारतीय अध्यात्म ज्ञान को ढंकने का प्रयास किया गया।  ऐसी आशायें जो कभी पूरी नहीं होती और अगर हो भी जायें तो उनसे किसी मनुष्य को तत्वज्ञान नहीं मिलता जिसके परिणाम स्वरूप समाज में आज रोगों का प्रकोप और तनाव का वातावरण बन गया है।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा 'भारतदीप',ग्वालियर 
writer and editorial-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep',Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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Wednesday, March 23, 2011

वाणी और धन के बीमार अपने वश में नहीं होते-हिन्दी धार्मिक चिंत्तन

जैसे जैसे मनुष्य का अध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता जाता है वैसे वैसे उसे इस संसार के भोग विलास की वास्तविकता समझ में आती है। उपभोग की प्रवृत्ति किस तरह मनुष्य को पशु बनाकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये इस संसार में बांधे रहती है इसका आभास तत्वज्ञानी को हो जाता है। ‘दिल मांगे मोर’ का नारा बाज़ार में प्रचार के माध्यम से इसलिये उछाला जाता है कि लोग विज्ञापित वस्तु का क्रय करने के लिये लालायित हों।
समाज में बाज़ार तथा उसके परचार माध्यमों से उपभोग कि प्रवृति बढ़ाई जा रही है रोज देखा जा सकता है।
  एक विज्ञापन में तो भारतीय फिल्मों का एक अभिनेता साफ कहता है कि ‘आदमी को कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए। जो लोग संतुष्ट होते हैं वह जिंदगी में कुछ नहीं कर पाते।’
कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य की लालच का कोई अंत नहीं है। अक्सर समाचारों में यह चर्चा आती है कि भारत के उच्च वर्ग का बहुत सारा काला धन विदेशी बैंकों में जमा है। यह उच्च वर्ग ऐसा है जो यहां भारत में रहकर आदर्शवाद, नैतिकतावाद तथा कल्याण वाद की राह पर चलने का दावा करते हुए समाज पर नियंत्रण रखता है मगर उसकी पैसे की हवस मिटती नहीं। अनेक राजकीय अधिकारी पकड़े गये हैं जिन्होंने इतना धन अर्जित किया कि उनकी आगे की दस पीढ़ियां भी नहीं खा सकती। इतने सारे आवास बना लिये कि उनकी पचास पीढ़ियों के वंशज भी उसमें रह जायें तो कम लगें। यह केवल उच्च वर्ग ही नहीं सामान्य वर्ग पर भी लागू है। लोगों में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति रुझान ही नहीं रहा। समाज में भौतिकवाद का इतना बोलाबाला है कि अगर तत्वज्ञानी उनमें बैठकर ज्ञानचर्चा करे तो उसे पागल समझा जाता है। जिनके पास अध्यात्मिक ज्ञान है वह सांसरिक विषय में चर्चा करने में रुचि नहीं लेते तो उनको अज्ञानी मान लिया जाता है।
पुण्यैर्मूलफलैस्तथा प्रणयिनीं वृत्तिं कुरुष्वाधुना
भूश्ययां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
क्षधद्राणामविवेकमूढ़मनसां यन्नश्वाराणां सदा
वित्तव्याधिविकार विह्व्लगिरां नामापि न श्रूयते।।
"भर्तृहरि महाराज अपने प्रजाजनों से कहते हैं कि अब तुम लोग पवित्र फल फूलों खाकर जीवन यापन करो। सजे हुए बिस्तर छोड़कर प्रकृति की बनाई शय्या यानि धरती पर ही शयन करो। वृक्ष की छाल को ही वस्त्र बना लो लो। अब यहां से चले चलो क्योंकि वहां उन मूर्ख और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों का नाम भी सुनाई नहीं देगा जो अपनी वाणी और संपत्ति से रोगी होने के कारण अपने वश में नहीं है।"
ऐसे में ज्ञानियों के लिये मौन ही अच्छा है। अपने नियमित कर्मं करने के साथ ही ज्ञानियों के लिये यह भी जरूरी है कि वह भौतिकवादी लोगों के बाहुल्य वाले समाज में अर्थ, प्रतिष्ठा या उच्च पद के अभाव में सम्मान या इनाम की आशा न करें। वह तो दृष्टा की तरह इस संसार को देखें और अपना काम करते जायें।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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