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Friday, June 17, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-प्रचार पाने के लिए गलत काम न करें (prachar paane ke liye galat kaam na karen-kautilya ka arthshastra)

           मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह समाज में श्रेष्ठ कहलना चाहता   है। इसी कारण वह निरंतर ही धन, प्रतिष्ठा और अन्य लोक महत्व की अन्य वस्तुएं संग्रह करने में लगा रहता है। इसी प्रवृति के चलते  समान रुचियों वाले लोगों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है।  आज समाज में नाम पाने के लिये कुछ भी कर गुजरने की मनोवृत्ति इतने भयानक हो चुकी है  कि लोग अनेक बार शर्मनाक हरकते करते हैं।  प्रचार माध्यमों में नाम पाने का मोह लोगों को अंधा बना देता है। अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का नायक की तरह प्रचारित होते  देखकर कुछ युवा भ्रमित हो जाते हैं।  वैसे भी जनसामान्य को लगता है कि जो लोग अपनी हिंसक अपराधिक प्रवृत्ति की वजह से समाज में डर बनाये रहते हैं वह कोई दमदार आदमी हैं।  उनका रुतवा देखकर सब उनसे संपर्क रखते हैं पर प्रकृति का नियम है कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा।  जो लोग जनविरोधी काम करते हुए आतंक का वातावरण बनाते हैं वह दरअसल स्वयं ही अंदर से डरे रहते हैं। उनकी बदनामी को लोकप्रियता समझना मूर्खता है।  समाज में सम्मान तो केवल उसी आदमी को मिलता है जो जनहित का काम करता है। 
      हर मनुष्य में पूज्यता और अहंकार का भाव होता है। जब किसी को धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो फूलकर कुप्पा नहीं समाता बल्कि उसका प्रदर्शन करने लगता है और कई लोगों का तो मन ही विचलित हो जाता है। शक्ति आने पर ही अनेक लोग संतुष्ट नहीं होते बल्कि उसका प्रभाव समाज पर दृष्टिगोचर हो और वह डरे इसी उद्देश्य से कुछ लोग अपने बड़प्पन का दुरुपयोग करने लगते हैं। आजकल हम देख सकते है कि देश में अमीरों, उच्च पदस्थ तथा बाहूबली लोगों का आतंक पूरे समाज पर दिखाई देता है। शक्तिशाली वर्ग के लोग अपनी शक्ति से छोटों को संरक्षण देने की बजाय अपनी शक्ति का उपयोग उनको दबाकर आत्म संतुष्टि कर लेते हैं। यही कारण है कि समाज में वैमनस्य का भाव बढ़ रहा है।
            कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि 
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         आयत्याञ्प तदात्वे च यत्स्यादास्वादपेशलम्।
         तदेव तस्य कुर्वीत न लोकद्विष्टमाचरेत्।।
       "भविष्य की अच्छी संभावनाओं को देखते हुए बुद्धिसे जो कार्य करने में अच्छा लगे वही प्रारंभ करे परंतु कभी भी सफलता के लिये जनविरोधी काम न करें।"
        श्लाघ्या चानन्दनीया च महतामुफ्कारिता।
       करले कल्याणगायत्ते स्वल्पापि सुमहोदयम्।
       "उच्च पुरुषों का उपकार कर्म अत्यंत प्रिय तथा आनंदमय लगता है वह अगर किसी का भी थोड़ा कल्याण करते हैं तो उसका महान उदय होता है।"
            हम अनेक लोगों का उनके धन, पद और बल की वजह से बड़ा मान लेते हैं पर सच यह है कि वह समाज का भला करना नहीं जानते। बड़े आदमी की थोड़ी कृपा से छोटे आदमी प्रसन्न हो सकत हैं पर इसको समझने की बजाय उसे कुचलकर अपने आप को खुश करना चाहते हैं।
       बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को न छाया मिले, पथिक को फल लागे अति दूर-यह कहावत अधिकतर बड़े लोगों पर लागू होती है। ऐसे लोगों को बड़ा मानना ही एक तरह से गलत है। बड़ा आदमी तो वह है जो लोकहित में अपनी शक्ति का उपयोग करता है न कि जनविरोधी काम करके अपने अहंकार की संतुष्टि! अतः धल, उच्च पद या बाहूबल होने पर छोटे और कमजोर आदमी को संरक्षण देना चाहिये ताकि समाज को एक नई दिशा मिल सके।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर 
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Friday, April 08, 2011

प्रसन्नता देने वाला काम ही करें-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (khushi dene wala kam karen-hindu dharmik chinttan)

यत्कर्मकुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्म्न्ः।
तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।।
"
जिस कार्य से मन को शांति तथा अंतरात्मा को खुशी हो वही करना चाहिये। जिस काम से मन को अशांति हो उसे न ही करें तो अच्छा।"

यद्यत्परवशं कर्म तत्तद्यलेन वर्जयेत्।
यद्यदात्मवशं तु स्यात्तत्तत्सेवेत यत्नतः।
"
जिस काम के लिये दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है उनका त्याग कर देना चाहिये तथा अपने हाथ से ही संपन्न होने वाले अनुष्ठान करना चाहिए"
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में चाहे कोई भी कार्य हो उसे पूरा करने से पहले अपने सामर्थ्य, साधन तथा सहयोगियों की उपलब्धता पर विचार करना चाहिये। अनेक लोग किसी भी कार्य में परिणाम की अनिश्चितता के बावजूद उसे इस आशा से प्रारंभ करते हैं कि उनका ‘भाग्य’ साथ देगा या फिर ऊपर वाले की कृपा होगी-यह अंधेरे में तीर चलाने जैसा है। संभव है कुछ लोगों का निशाना लग जाये पर सभी को ऐसा सौभाग्य नहीं मिलता।
दूसरों से अपने काम में सहयोग मिलने की अपेक्षा करना व्यर्थ है। अगर करें तो भी तो यह भी देखें कि आपने किसी को कितना सहयोग दिया है। फिर यह भी देखें कि जिसका सहयोग किया है कि उसमें प्रत्युपकार की भावना है कि नहीं। कहने का अभिप्राय यह है कि दूसरों पर निर्भर रहने वाले काम को प्रारंभ ही न करें तो अच्छा है।
इसके अलावा ऐसे भी काम न करें जिससे मानसिक क्लेश बढ़ता हो। आजकल खानपान तथा रहन सहन की वजह से लोगों में असहिष्णुता के साथ ही अहंकार की भावना बढ़ गयी है। अतः जरा जरा सी बात पर लोग उत्तेजित होकर लड़ने लगते हैं। अगर हमारे अंदर तनाव झेलने की क्षमता नहीं है तो फिर चुपचाप रहकर अपना काम करना चाहिये। अगर कोई व्यक्ति गलत काम कर रहा है तो उसे अनदेखा करें। कोई गलत व्यवहार करता है तो उसकी उपेक्षा कर दें। ऐस कुछ पल जिंदगी में आते हैं-यह सोचकर आगे बढ़ जायें। अगर आपने प्रतिवाद किया तो सामने वाले की उग्रता अधिक बढ़ेगी तब वह अधिक तनाव दे सकता है। ऐसे में हमें दूसरे का व्यवहार नहीं   बल्कि अपनी मनस्थिति को देखना चाहिये जो तनाव नहीं झेल पाती।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप",ग्वालियर 
writter and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep',Gwalior
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