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Sunday, October 07, 2012

चाणक्य नीति-ध्यान की कला बगुले से सीखना चाहिए (dhyana karna bagule se seekhna chahiye-chakya neeti or policy)


      सामान्य मनुष्य हमेशा ही बहिर्मुखी रहता है। आंखों के सामने घटित दृश्य, कानों में गूंजते स्वर तथा नासिका से सुगंध दुंर्गंध का बोध करने में उसकी इंद्रियां इतनी व्यस्त रहती है कि उसकी बुद्धि मे चिंत्तन का कीड़ा कभी घूमता नज़र नहीं आता।  विरले लोग ही होते हैं जो आत्ममंथन करते हैं।  ऐसे ज्ञानी लोग न केवल सदैव प्रसन्न रहते हैं बल्कि हर स्थिति में सफलता उनके हिस्से ही आती है।  आमतौर से बगुले को धूर्तता का पर्याय माना जाता है पर उसे अगर चालाकी समझा जाये तो कुछ सीखा जा सकता है। वह अपनी इंद्रियों को वश में कर तालाब में मछलियों का शिकार करता है।  अगर मनुष्य उससे सीखकर अपने जीवन के लक्ष्यों को पूरा करने का प्रयास करे तो वह सुखी रह सकता है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं सर्वकार्याणि साधयेत्।।
                     हिन्दी भावार्थ-ज्ञानी व्यक्ति हमेशा ही बगुले की तरह इंद्रियों पर नियंत्रण कर देश और काल की समझ धारण कर अपने बल से ही सारे कार्यो को संपन्न करता है।’’
य एतान् विंशतिगुणानाचारिव्यति मानवः।
कार्याऽवस्थासु सर्वासु अजेयः स भविष्यति।।

                                                  हिन्दी में भावार्थ-जो व्यक्ति बीस गुणों का आचरण कर जीवन व्यतीत करेगा वह कायों को संपन्न करने के साथ हर अवस्था में विजयी होता है।’’
      हमें जब भी एकांत मिले आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए। अपने गुणों तथा बल के साथ ही अपनी कमजोरियों पर भी विचार करना चाहिए। हमेशा बहिर्मुखी बने रहने से कोई लाभ नहीं जब तक हम अंतर्मुखी होकर विचार न करें। जीवन में सफलता का मूल मंत्र यही है कि अपने अंदर गुणों के संचय का प्रयास भी करें।
 
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Wednesday, August 29, 2012

शरीर की सफाई से बीमारी दूर होती है-ऋग्वेद से सन्देश (rigved se sandesh-sharir ki safai se bimari door hotee hai)

                      हमारे वेदों में अनेक ऐसी बातें कही गयी हैं जिनका महत्व इस संसार में कभी महत्व नहीं होता।  इसका कारण यह है कि इस संसार में समय के साथ भौतिक स्वरूप के साथ ही लोगों के रहन सहन, चाल चलन तथा कार्य करने के तरीकों में बदलाव तो संभव है पर उसके अंदर की मूल प्रकृतियों का निवास स्थाई रूप से रहता है।  इन मूल प्रकृतियों तथा उनकी निवृति के ज्ञान का (जिसे हम अध्यात्मिक विज्ञान भी कह सकते हैं) जो वर्णन इन वेदों में वर्णित है।  उनकी विषय सामग्री का  अध्ययन चाहे जब किया जाये उनमें नवीनता बनी रहती है।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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ब्रह्माद्विषः अवजहि।
हिन्दी में अर्थ-‘‘ज्ञान से द्वेष करने वाले को मार।’’
अहः अहःशुन्ध्युः परिपदां।।’’
हिन्दी में अर्थ-‘‘नित्य स्वच्छता रखने वाला रोगों को दूर करता है।’’
             अधिकतर लोग धार्मिक कर्मकांडों को ही अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं पर आध्यात्मिक ज्ञान उनके लिये बुढ़ापे में जानने वाला विषय होता है जबकि इसका ज्ञान अगर बचपन से हो जाये तो जिंदगी आराम से बिताई जा सकती है। इसका कारण यह है कि सांसरिक विषयों से संबंध तो बचपन से ही हो जाता है और अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव आम मनुष्य उसमें इस तरह लिप्त हो जाता है कि उसके लिये सुख कम दुःख अधिक प्रकट होते हैं।  अधिकतर मनुष्यों के  अंदर अहंकार मोह तथा लोभ की  प्रकृतियां विद्यमान रहती हैं जो उसे ज्ञान से परे रखती है।  यह प्रकृतियां ज्ञान से द्वेष करती हैं।  ज्ञानी से चिढ़ाती हैं।
           अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में आदमी की न  केवल देह  बल्कि मन तथा विचारों में भी अस्वच्छता का वास हो जाता है।  इस तरह की समस्या से बचने का उपाय यही है कि  हम अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर अपनी बुद्धि, विचार तथा मन को शुद्ध रखने का प्रयास करें।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, October 22, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-तत्वज्ञानियों का सामान्य लोगों से मेल संभव नहीं (tatava gyaniyon ka samanya logog se mel sanbhav nahin-economics of kautilya)

              आमतौर से सामान्य मनुष्य अपने संपर्क बढ़ाने और संबंधों का विस्तार करने को उत्सुक रहते हैं। दूसरे लोग चिकनी चुकनी बातों से बहकाते हैं पर यह बात सभी की समझ में नहीं आती। मुख्य बात यह है कि अपने गुणों के अनुरूप ही संपर्क और संबंध बनाने चाहिए इस सिद्धांत को बहुत कम लोग जानते हैं। श्रीमद्भागवत गीता में गुण तथा कर्म विभागों का संक्षिप्त पर गुढ़ वर्णन किया गया है। उससे हम मनुष्य का मनोविज्ञान अच्छी तरह समझ सकते हैं। आम तौर से पहनावे, रहन सहन, आचार विचार तथा कार्य करने के तरीके से सभी लोग एक जैसे दिखाई देते हैं। इस तरह हर मनुष्य का बाह्य मूल्यांकन किया जा सकता है। इस आधार पर संबंध या संपर्क बनाना ठीक नहीं है। क्योंकि संबंधों का विस्तार या संपर्क बढ़ने पर जब किसी के सामने अपने साथी का आंतरिक रूप विचार और संकल्प प्रतिकूल मिलता है तो मनुष्य को भारी निराशा होती है। किसी दूसरे व्यक्ति से संबंध बढ़ाने या संपर्क का विस्तार करने से पहले उसके विचार तथा संकल्प जानना आवश्यक है। वह चाहे कितनी भी लच्छेदार बातें करे पर उसकी क्षमता का आंकलन कर उसका प्रमाण भी लेना चाहिए। विपरीत गुणों तथा कर्म वाले लोगों से संपर्क बहुत दूरी तक नहंी चलते और कभी कभी तो दुष्परिणाम देने वाले भी साबित होते है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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उत्तमाभिजनोपेतान् न नीचैः सह वर्द्धयेत्।
कृशीऽपि हिविवेकज्ञो याति संश्रवणीयताम्।।
           ‘‘सज्जन या उत्तम गुणों वाले लोगों का नीच तथा अज्ञानी लोगों से मेल नहीं हो सकता। कृशता को प्राप्त विवेकी पुरुष अंततः राज्य का संरक्षण पा लेता है, इसमें संशय नहीं है।
निरालोके हि लोकेऽस्मिन्नासते तत्रपण्डिताः।
जात्यस्य हि मणेयंत्र काचेन समता मता।।
        ‘‘ज्ञानी लोग उन अज्ञानी लोगों के पास नहीं ठहर पाते जो अज्ञान के अंधेरे में रहते हैं। जहां मणि हो वहां भला कांच का क्या काम हो सकता है? वहां मणि के साथ कांच जैसा व्यवहार ही किया जाता है।’’
        इन संपर्कों और संबंधों में यह बात बहुत महत्वपूर्ण होती है कि लोगों का बौद्धिक स्तर क्या है? इसमें कोई शक नहीं रखना चाहिए कि मनुष्य के धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक तथा कार्यकारी स्थितियों से उसके विचार, संकल्प, तथा कर्म प्रभावित होते हैं। इन्हीं आधारों से संस्कारों का निर्माण भी होता है। कुछ लोग बड़ी चालाकी से इसे छिपाते हैं तो कुछ लोगों की सक्रियता इतनी रहती है कि उनका आंतरिक रूप समझने का अवसर दूसरों को नहीं मिलता। सांसरिक विषयों की चतुराई ज्ञान नहीं होता बल्कि अध्यात्मिक ज्ञान ही असली प्रमाण होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि अपने संपर्क के लोगों का अध्यात्मिक स्तर जानना अत्यंत आवश्यक है। ज्ञानी लोगों की अज्ञानी लोगों से दोस्ती बहुत कम निभती है। अज्ञानी लोग सांसरिक विषयों के अंधेरे कुंऐं में डूबे रहना पसंद करते हैं और ज्ञानी लोगों की बात उनके लिये बकवास भर होती है। अतः किसी भी प्रकार का संबंध स्थापित करने से पहले दूसरे की प्रवृत्तियों का प्राप्त करना आवश्यक है। स्वयं गुणी हैं तो इस बात से निराश नहीं होना चाहिए कि समाज में उनका सम्मान नहीं हो रहा है बल्कि यह विचार पक्का रखना अच्छा है कि उन गुणों से हमारी रक्षा हो रही है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Tuesday, June 28, 2011

सामवेद से संदेश-भगवान नारायण से कर्म की प्रेरणा लें (samved se sandesh-Bhaqwan narayan se karma ki prena len)

             भगवान विष्णु कर्म और फल के प्रतीक भगवान माने जाते हैं। यही कारण है कि भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी के अनेक अवतार समय समय पर हुए है। ब्रह्मा संसार के रचियता तो भगवार शिव संहारक और उद्धारकर्ता कहे गये हैं और भगवान नारायण को पालनहार माना गया है। ब्रह्मा और शिव का कोई अवतार नहीं होता जबकि भगवान नारायण अवतार लेकर अपनी सक्रियता से भक्तों की रक्षा करते है-यह आम धारण हमारे देश के धर्मभीरु लोगों की रही है।  ऐसे में वह संसार में सक्रियतापूर्ण जीवन जीने वालों के प्रेरक भी है।
यह आश्चर्य की बात है कि प्रकृति ने मनुष्य को देह, बुद्धि और मन की दृष्टि से अन्य जीवों की अपेक्षा सर्वाधिक शक्तिशाली जीव बनाया है तो सबसे अधिक आलसी भाव भी प्रदान किया। अधिकतर लोग लोग अपने तथा परिवार के स्वार्थ सिद्ध करने के बाद आराम करना चाहते है और परमार्थ उनको निरर्थक विषय लगता है जबकि पुरुषार्थ का भाव निष्काम कर्म से ही प्रमाणित होता है। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस देह से मनुष्य संसार का उपभोग करता है उसका ही महत्व नहीं समझता और भोगों में उसका नाश करता है। जिससे अंत समय में रोग उसके अंतिम सहयात्री बन जाते हैं और मृत्यु तक साथ रहते हैं।
      योग साधना, ध्यान, भजन और उद्यानों की सैर करने से जो देह के साथ मन को भी जो नवीनता मिलती है उसका ज्ञान अधिकतर मनुष्यों को नहीं रहता। सच बात तो यह है कि शरीर और मन को प्रत्यक्ष रूप से प्रसन्न करने वाले विषय मनुष्य को आकर्षित करते है और वह इसमें सक्रिय होकर जीवन भर प्रसन्न रहने का निरर्थक प्रयास करत है। वह अपनी इसी सक्रियता को पुरुषार्थ समझता है जबकि अप्रत्यक्ष लाभ देने वाले योगासन, ध्यान, भजन तथा प्रातः उद्यानों में विचरण करना उसे एक निरर्थक क्रिया लगती है। सीधी बात कहें तो इस अप्रत्यक्ष लाभ के लिये निष्काम भाव से इन कर्मो में लगना ही पुरुषार्थ कहा जा सकता है।
           हमारे पावन ग्रंथ सामवेद में कहा गया है कि
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           विष्णोः कर्माणि पश्चत यतो व्रतानि पस्पशे।
          ‘‘भगवान विष्णु के पुरुषार्थों को देखो और उनका स्मरण करते हुए अनुसरण करो।’
         ऋतस्य पथ्या अनु।
        ‘‘ज्ञानी सत्य मार्ग का अनुसरण करते हैं।’’
        ‘प्रेता जयता नर।’
        आगे बढ़ो और विजय प्राप्त करो।’’
      पुरुषार्थ करना मनुष्य का धर्म है और इसके लिये जरूरी है कि सत्य को मार्ग का अनुसरण किया जाये। आजकल जल्दी धनवान बनने के लिये असत्य मार्ग को भी अपनाने लगते हैं और उनको कामयाबी भी मिल जाती है पर जब उनको इसका दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग कभी भी ऐसे गलत कार्य में अपना मन नहीं लगाते जिसका कालांतर में दुष्परिणाम भोगना पड़े।
     कर्म और पुरुषार्थ के विषय में भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। वह संसार के पालनहार माने जाते हैं। ऐसा महान केवल पुरुषार्थ करने वालों को ही मिल सकता है। भगवान विष्णु के चौदह अवतार माने जाते हैं और हर अवतार में कहीं न कहीं उनका पुरुषार्थ प्रकट होता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Saturday, February 12, 2011

शुद्ध भोजन और स्वच्छ जल ग्रहण करें-हिन्दू धार्मिक लेख (shuddh bhojan aur swachchha jal-hindu dharmik lekh)

हम आत्मा हैं जिसने देह धारण की है। हम इस देह के माध्यम से जो कर्म और व्यवहार करते हैं उसके अनुसार ही मन, बुद्धि और विचारों पर प्रभाव पड़ता है। हम जिन विषयों से इंद्रियों के माध्यम से संपर्क करते हैं वह हमारे अंतर्मन प्रभावित करते हैं। इस आधार पर हम कह सकते है कि जैसा अन्न वैसा धन, जैसा पानी वैसी वाणी और जैसा धन वैसा मन।
हम जैसा भोजन ग्रहण करते हैं उसके लिये धनार्जन, उसके सृजन तथा निर्माण की पूरी प्रक्रिया का हम पर प्रभाव पड़ता है। अगर हम चाहते हैं कि हम सात्विक विचारों को अपने मन में धारण करें, हमारे अंदर अध्यात्मिक ज्ञान का संचार हो और हमारे व्यक्तित्व में निखार आये तो भोजन पर ध्यान देना चाहिये।
इस विषय पर संत कबीरदास जी कहते हैं कि
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जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय
जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय
"जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है वैसा ही बन जाता है।"
अधिक भोजना करना बुरा है तो कम भोजन करना भी अच्छा नहीं है। अधिक मोटा, बासी, तथा स्वादिष्ट पर अपचनीय भोजन कभी भी तन और मन को प्रसन्न नहीं कर सकता। उसी तरह जिस प्रकार के भोजन से हम अपने अंदर तनाव अनुभव करते हैं हम उसके स्वादिष्ट होने के कारण ग्रहण करने में हमें झिझकते नहीं है। लगता है कि चलो थोड़ा खा लिया तो क्या बुराई है? यह विचार अत्यंत दुःखदायी है जो कि कालांतर में हमारी देह को हानि पहुंचाता है। अतः भोजन के विषय में हमेशा सतर्क रहना चाहिए।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर 
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