समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label चाणक्य नीति. Show all posts
Showing posts with label चाणक्य नीति. Show all posts

Sunday, April 03, 2011

सज्जन की मित्रता धीरे धीरे बढ़ती है-हिन्दू धार्मिक चिंतन (sajjan ki mitrata-hindu dharmik chittan)

दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्।
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
"कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो  तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।"
आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
"जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध  में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।"
             सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्द्ध  में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है। पड़ौस तथा कार्यस्थलों में हमारा संपर्क अनेक ऐसे लोगों से होता है जिनके प्रति हमारे हृदय में क्षणिक आत्मीय भाव पैदा हो जाता है। वह भी हमसे बहुत स्नेह करते हैं पर यह यह संपर्क नियमित संपर्क के कारण मौजूद हैं।  उन कारणों के परे होते ही-जैसे पड़ौस छोड़ गये या कार्य का स्थान बदल दिया तो-उनसे मानसिक रूप से दूरी पैदा हो जाती है।  इस तरह यह बदलने वाली मित्रता वास्तव में सत्य नहीं होती। मित्र तो वह है जो दैहिक रूप से दूर होते भी हमें स्मरण करता है और हम भी उसे नहीं भूलते। इतना ही नहीं समय पड़ने पर उनसे सहारे का आसरा मिलने की संभावना रहती है।  अतः स्थितियों का आंकलन कर ही किसी को मित्र मानकर उससे आशा करना चाहिये। जहां तक हो सके दुष्ट और स्वार्थी लोगों से मित्रता नहीं करना चाहिये जो कि कालांतर में घातक होती है। उसी तरह अपने व्यक्तित्व का भी निर्माण इसी तरह करना चाहिए कि वह दूसरों को प्रिय लगे।
        दूसरों से स्नेह तथा प्रेम पाने के लिये यह आवश्यक है कि निस्वार्थ भाव से सभी का काम करें और वार्तालाप में मधुर वचन का प्रयोग करें। एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि व्यक्तित्तव में सौम्यता तथा व्यवहार में नैतिकता बरतने से ही समाज में सम्मान बढ़ता है।
____________________________-
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक  राज कुकरेजा "भारतदीप",ग्वालियर 
writer and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Monday, December 29, 2008

चाणक्य संदेश: साँप में विष न हो तो भी फन फैला ही देता है

१. राजा, बालक, दूसरे का कुत्ता, मूर्ख व्यक्ति, सांप, सिंह और सूअर इन सात जीवों को सोते हुए से कभी नहीं जगाना चाहिए, इन्हें जगाने से मनुष्य को हानि ही हो सकती है लाभ नहीं। इनके आक्रमण करने से अपनी रक्षा करना कठिन होगा। अत: अच्छा यही है यदि वह सो रहे हैं तो उन्हें सोता छोड़ आगे बढ जाना चाहिए।
२. जो व्यक्ति निस्तेज यानी प्रभावहीन है न तो उसके प्रसन्न होने पर किसी व्यक्ति को अर्थ की प्राप्ति होती है न ही नाराजगी पर किसी सजा का भय ही प्रतीत होता है। जिसकी कृपा होने पर पुरस्कार न मिलता हो और न ही जो किसी को दण्ड देने का अधिकारी हो ऐसा व्यक्ति रुष्ट भी हो जाये तो कोई उसकी चिंता नहीं करता।
३. आज के युग में आडम्बर का अपना अलग ही महत्व है। वह झूठ भी हो तो भी आदमी को कुछ न कुछ लाभ मिल ही जाता है। सर्प के मुख में विष न हो तो भी वह मुख तो फैला ही देता है जिससे लोग भयभीत होकर पीछे जाते हैं। उसकी फुफकार ही दूसरों को डराने और अपनी रक्षा करने में पर्याप्त होती है। यदि सर्प अपने फन भी न फैलाये तो कोई बच्चा भी मार डालेगा। इसलिये कुछ न कुछ आडम्बर करना हर प्राणी के लिए आवश्यक है

४. संसार के दुखों से दुखित पुरुष को तीन ही स्थान पर थोडा विश्राम मिलता है- वह हैं संतान, स्त्री और साधू
५. राजा की आज्ञा, पंडितों का बोलना और कन्यादान एक ही बार होता है।
६. एक व्यक्ति का तपस्या करना, दो का एक साथ मिलकर पढ़ना, तीन का गाना, चार का मिलकर राह काटना, पांच का खेती करना और बहुतों का मिलकर युद्ध करना
७. पक्षियों में कोआ, पशुओं में कुत्ता और मुनियों में पापी चांडाल होता है पर निंदा करने वाला सबसे बड़ा चांडाल होता है।
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

अध्यात्मिक पत्रिकायें

वर्डप्रेस की संबद्ध पत्रिकायें

लोकप्रिय पत्रिकायें