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Saturday, September 21, 2013

मनुस्मृति-रात्रि भोजन के बाद मनोरंजन करना चाहिये(manu smriti-ratru bhojan ke baad manoranjan karna aawashyak)



      आमतौर से लोग यह समझते हैं कि भारतीय अध्यात्म दर्शन इंद्रियों पर नियंत्रण करने के लिये हर विषय का त्याग करने की बात करता है। वह मनोरंजन तथा खेल आदि का विरोधी है।  यकीनन यह विचार किसी के भी अज्ञानी होने का ही प्रमाण है।  यह अलग बात है कि जहां भारतीय अध्यात्मिक दर्शन जहां भक्ति तथा ध्यान साधना को एकांत करने की बात कहता है वहीं वह सांसरिक विषयों के साथ निर्लिप्त भाव से  जुड़ने की राय भी देता है।  इस देह की सभी इंद्रियां हमेशा सक्रिय रहती हैं। इंद्रियों का यह स्वभाव है कि वह विभिन्न रसों में लिप्त होने के लिये हमेशा उत्सुक रहती हैं। एकरसता उनको उबा देती है। इसलिये समय और स्थिति कंे अनुसार इंद्रियों पथ बदलना चाहिये पर उनके विषयों से जुड़ने का भी एक समय होता है। हमेशा भक्ति और साधना नहीं हो सकती तो हमेशा मनोरंजन भी नहीं हो सकता।  हमारी देह है तो उसे सांसरिक विषयों से जोड़ना ही पड़ता हैं। प्रातःकाल योग साधना के दौरान आसन, ध्यान, मंत्र जाप तथा पूजा करने से जहां देह, मन और विचारों की शुद्धि होती है वहीं सांयकाल मनोरंजन के दौरान गीत संगीत सुनने से भी मनोविकार दूर होने के साथ ही थकान भी दूर होती है। आदमी की थकी देह में बैठा मन जब मयूर की तरह नाचता है उसमें वह दोपहर अर्थोपार्जन के दौरान एकत्रित विष का नाश होता है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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तत्र भुजत्वा पुनः किञ्चित्तूर्वघोषैः प्रहर्षितः।
संविशेत्तु यथाकालमत्तिष्ठेच्य यतवलमः।।
                        हिन्दी में भावार्थ-भोजन करने के बाद कुछ समय हृदय को प्रसन्न करने के लिये गीत संगीत सुनने के बाद अपनी थकान दूर करने के लिये शयन करना चाहिये।
                        हमारे यहां भक्ति और साधना के साथ ही मनोरंजन का भी समय तय कर जीवन नहीं बिताया जाता।  प्रातःकाल गीत संगीत के साथ मनोंरजन के नाम पर भक्ति होती है तो सांयकाल भी कहीं भक्ति संगीत के नाम पर मनोरंजन कार्यक्रम होते हैं।  हैरानी तब होती है जब अनेक जगह भक्ति संध्या के नाम पर लगते हैं। भक्ति संध्या अर्थात यह  दो शब्द  ज्ञानसाधकों को हतप्रभ कर देते हैं। तब उनके मन में यह विचार भी आता है कि क्या संध्या को भी भक्ति होती है क्या? हां, इतना अवश्य है कि अनेक अध्यात्मिक ज्ञानी रात्रि शयन से पूर्व ध्यान कर सोने की सलाह देते हैं पर वास्तव में इससे निद्रा अच्छी आती है। ध्यान करने से दिन भर जो मन में एकत्रित विष  नष्ट हो जाता है।  शयन करते समय उन विषयों का विचार नहीं आता पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि भक्ति के नाम पर मनोरंजन कर उस स्थिति को पाया जा सकता है।
                        कहने का अभिप्राय है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन किसी विषय से जुड़ने पर प्रतिबंध लगाने की राय नहीं देता पर समय तथा सीमा के अनुसार काम करने की राय देता है।  प्रातःकाल जहां एकांत साधना जीवन में पवित्रता लाती है वहीं सांयकाल मनोरंजन करना भी मन को प्रसन्नता देता है। यह मनोरंजन भी एकांत में या सीमित समूह में होना चाहिये न कि उसके लिये भारी भीड़ एकत्रित की जाये।  भीड़ में मनोरंजन का लाभ वैसे ही कम होता है जैसे कि सार्वजनिक रूप से भक्ति करने पर मिलता है। किसी भी भाव की सुखद अनुभूति अंदर केवल एकांत में ही जा सकती है भीड़ में मचा शोर मनोरंजन कम तनाव का कारण अधिक होता है।


संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, July 28, 2013

चाणक्य नीति दर्शन-मार्ग पर देखभाल कर चलें (chankya neeti darshan-marga par dekhbhalkar chalen)



         आजकल हम देख रहे हैं कि युवा वर्ग के लोगों की मौतों की घटनायें  अधिक हो रही है।  आत्महत्या, हत्या तथा सड़क दुर्घटनाओं में अक्सर युवक युवतियों की मौत की खबरें प्रचार माध्यमों में आती रहती हैं।  इतना ही नहीं राजमार्गों पर भी दूरी की यात्रा कर रहे अनेक परिवारों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनायें भी होती रहती हैं। देश में विकास के नाम पर भौतिकता के भाव ने लोगों की बुद्धि कुंद कर दी है।  जिनके पास मोटर साइकिल और कार है वह उस पर सोचकर  सवारी करते है कि सड़क केवल उनके लिये ही बनी।  जिस तरह चूहे, बिल्ली और कुत्ते का खेल है कि ताकतवर अपने से कमजोर पर हमला करता है वैसी ही स्थिति आजकल सड़क पर आवागमन करने  पर दिखती है। वाहन वाला पैदल या साइकिल चालक को तथा बड़े वाहन का सवार छोटे वाहन सवार को अपने आगे कुछ नहीं समझता।  पैदल और साइकिल चालक को मोटर साइकिल वाले और उनको कार तो कार वालों को ट्रक वाले अपनी वाहन से उड़ा देते हैं। कभी कभी तो लगता है कि लोग सड़क पर बदहाली में चलने के आदी हो गये हैं।  घर जो सुरक्षित पहुंचते हैं उनके परिवार वालों को भगवान का शुक्रिया अदा करना चाहिये क्योंकि जिस तरह सड़कों पर आवागमन की स्थिति है वह अत्यंत शोचनीय है।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि

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शकटं पञ्चहस्तेन दशहस्तेन वाजिनम्।

हस्ती शतहस्तेन देशत्यागेन दुर्जनम्।।

       हिन्दी में भावार्थ-बैलगाड़ी से पांच, घोड़े से दस तथा हाथी से सौ हाथ दूर रहना चाहिये। जहां दुष्ट रहता हो तो उस क्षेत्र का त्याग कर देना चाहिये।
            अगर हम चाणक्य नीति को देखें तो लगता है कि ऐसी दुर्घटनायें ंपहले भी होती रहती होंगी तभी उनसे बचने के लिये उन्होंने  मार्ग में बैलगाड़ी, घोड़े तथा हाथी से दूर चलने का सुझाव दिया।  अभी तक आधुनिक समय में तीन ‘टी’ यानि ट्रेक्टर, ट्रक तथा टू-सीटर से बचने की सलाह देते रहे हैं पर लगता है कि मोटर साइकिल को टू-सीटर शायद नहंी माना जाता है हालांकि वह आती उसी श्रेणी मैं है।  यही कारण है कि आजकल अधिकतर दुर्घटनायें मोटरसाइकिल सवारों के साथ होती है या वह उनके लिये जिम्मेदार होते हैं।  समस्या यह है कि लोग चाहे वह कार पर हों या बाइक पर, अपने  सवारी वाहन लेकर एक दूसरे के इतना नजदीक चलते हैं कि एक ब्रेक लगाये तो दूसरा टकरा ही जाता है। इस बात पर भी जमकर झगड़े होते हैं।  आखरी बात यह कि वाहन संख्या में बढ़ गये हैं और सड़कें अतिक्रमण के कारण पहले से कम चौड़ी हो गयी हैं।  ऐसे में वाहन टकरायेंगे ही पर लोगों को आपस में लड़ने से बचना चाहिये।  अनेक बार तो ऐसी हृदय विदारक घटनायें हुई हैं जिसमें गाड़ियां टकराने पर कत्ल तक हो गये हैं।  हमारे यहां अब अध्यात्मिक ज्ञान का महत्व अधिक नहीं दिया जात है पर सच यह है कि उसमें भी मार्ग पर सावधानी से चलने का सुझाव दिया गया है।

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Sunday, February 24, 2013

यजुर्वेद के आधार पर चिंत्तन लेख-संघभाव से ही निर्भय होना संभव( uajurved ke adhar par dhinttan lekh-sanghbhav se hee nirbhay hona sambhav)

        इस धरती पर अधिकतर जीव समूह बनाकर चलते हैं।  समूह बनाकर चलने की प्रवृत्ति अपनाने से  मन में सुरक्षा का भाव पैदा होता है। मनुष्य का जिस तरह का दैहिक जीवन है उसमें तो उसे हमेशा ही समूह बनाकर चलना ही चाहिये।  जिन व्यक्तियों में थोड़ा भी ज्ञान है वह जानते हैं कि मनुष्य को समूह में ही सुरक्षा मिलती है।  जब इस धरती पर मनुष्य सीमित में संख्या थे तब वह अन्य जीवों से अपनी प्राण रक्षा के लिये हमेशा ही समूह बनाकर रहते भी थे। जैसे जैसे मनुष्यों की संख्या बढ़ी वैसे अहंकार के भाव ने भी अपने पांव पसार दिये।  अब हालत यह है कि राष्ट्र, भाषा, जाति, धर्म और वर्णों के नाम पर अनेक समूह बन गये हैं।  उनमें भी ढेर सारे उप समूह हैं।  इन समूहों का नेतृत्व जिन लोगों के हाथ में है वह अपने स्वार्थ के लिये सामान्य सदस्यों का उपयोग करते हैं।  आधुनिक युग में भी अनेक मानवीय समूह  नस्ल, जाति, देश, भाषा, धर्म के नाम पर बने तो हैं पर उनमें संघभाव कतई नहीं है।  संसार का हर व्यक्ति  समूहों का उपयोग तो करना चाहता है पर उसके लिये त्याग कोई नहीं करता। यही कारण है कि पूरे विश्व में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में भारी तनाव व्याप्त है।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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सम्भूर्ति च विनाशं च यस्तद्वेदोभयथ्सह।
विनोशेन मृतययुं तीत्वी सम्भूत्यामृत मश्नुते।।
     हिन्दी में भावार्थ-जो संघभाव को जानता है वह विनाश एवं मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। इसके विपरीत जो उसे नहीं जानता वह हमेशा ही संकट को आमंत्रित करता है।

वाचमस्तमें नि यच्छदेवायुवम्।
      हिन्दी में भावार्थ-हम ऐसी वाणी का उपयोग करें जिससे सभी लोगों का एकत्रित हों।
              हृदय में संयुक्त या संघभाव धारण करने का यह मतलब कतई नहीं है कि हम अपनी समूह के सदस्यों से सहयोग या त्याग की आशा करें पर समय पड़ने पर उनका साथ छोड़ दें।  हमारे देश में संयुक्त परिवारों की वजह से सामाजिक एकता का भाव पहले तो था पर अब सीमित परिवार, भौतिकता के प्रति अधिक झुकाव तथा स्वयं के पूजित होने के भाव ने एकता की भावना को कमजोर कर दिया है।  हमने उस पाश्चात्य संस्कृति और व्यवस्था को प्रमाणिक मान लिया है जो प्रकृति के विपरीत चलती है। हमारा अध्याित्मक दर्शन व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के क्रम में चलता जबकि पश्चिम में राष्ट्र, समाज, परिवार और व्यक्ति के क्रम पर आधारित है।  हालांकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन यह भी मानता है कि जब व्यक्ति स्वयं अपने को संभालकर बाद  समाज के हित के लिये भी काम करे तो वही वास्तविक धर्म है।  कहने का अभिप्राय है कि हमें अपनी खुशी के साथ ही अपने साथ जुड़े लोगों के हित के लिये भी काम करना चाहिये।
हिन्दी साहित्य,समाज,अध्यात्म,हिन्दू धर्म दर्शन,hindi sahitya,samaj,ahdyatma,hindu dharma darshan

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Thursday, December 27, 2012

यजुर्वेद के आधार पर चिंत्तन-प्रगतिशील मनुष्य को सभी लोग मानते हैं (yajurved ke aadhar par chittan-pragatishil manushya ko sabhi log mante hain)

                 इस संसार में अनेक महान विद्वान लोग हुए हैं जिनका सम्मान आज का मानव समाज करता है।  उन विद्वानों, विचारकों और वैज्ञानिकों को मनुष्य समाज कभी नहीं भूलता जो उसके दैहिक तथा मानसिक विकास के संवाहक रहे हैं।  इस संसार में अनेक राजा महाराजा हो गये पर समाज केवल उन्हीं लोगों को याद करता है जिन्होंने इस समाज के लिये चिंत्तन करने के साथ ही ऐसे अनुसंधान किये जिनसे मनुष्य का शारीरिक तथा मानसिक विकास हुआ।
      हम अगर थोड़ा ज्ञान प्राप्त कर देखें तो पता चलेगा कि यहां बोलने वाले बहुत हैं पर उनमें ज्ञान कितना है यह वह प्रमाणित नहीं कर पाते।  दरअसल इस संसार में अधिकतर लोग कुछ भी बोलने को आतुर हैं पर कोई किसी की सुनना नहीं चाहता।  श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि इंद्रिया ही विषयों में बरतती हैं। यह ज्ञान बघारने वाले कदम कदम पर मिल जाते हैं पर इसके बावजूद छोटी छोटी बातों पर मुंहवाद होते होते हिंसक वारदातें हो जाती हैं।  अनेक बार तो ऐसा भी होता है कि भारी भरकम हिंसा के बाद पता चलता है कि विषय इतना गंभीर नहीं था जितना संघर्ष हुआ। संत कबीरदास जी कह गये हैं कि ‘सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठा’।
यजुर्वेद में  कहा गया है कि
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इष्टं वीतमभिगूर्त वर्षट्कुतं देवासः प्रतिगृभ्णन्त्यश्वम्।
हिन्दी में भावार्थ-परिश्रमी तथा प्रगतिशील होने के साथ ही सभी को प्रिय लगने वाले व्यक्ति के प्रति सभी मनुष्य हृदय  में आस्था रखते हैं।

धिया विप्रो अजायत।
हिन्दी में भावार्थ-विद्वान उत्तम बुद्धि से युक्त होता है।
      समाज में रहते हुए छोटे छोटे  विवादों में फंसने  से अच्छा है कि समय समय पर चिंत्तन और मनन अवश्य कर अपना बौद्धिक विकास करें । मानसिक  और वैचारिक शुद्धता के लिये अपने दिन का कुछ समय सत्संग और अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने में लगायें।  मंदिर जाकर ध्यान लगायें।  यह सही है कि सभी जगह पत्थर की मूर्तियां हैं पर हमारे हृदय का भक्ति भाव उनमें भगवान की अनुभूति करता है जिससे हम मानसिक रूप से दृढ़ होते है।  भगवान है या नहीं इस बात पर तो विचार ही नहीं करना चाहिये।  न ही इस पर किसी से विवाद करना चाहिये। वह है और हमारे हृदय के अंदर स्थित है यह धारणा दूसरों पर थोपने की बजाय अपनी मानसिक स्थिति पर नियंत्रण करने में उपयोग करना चाहिये।  जब आदमी अपने मन पर नियंत्रण कर लेता है तब वह विद्वान तथा पराक्रमी होकर अन्य लोगों के लिये प्रेरक बनता है।  निरर्थक वार्तालाप, घूमना फिरना तथा अधिक मनोरंजन में समय बिताना मनुष्य को अत्यंत आकर्षक लगने के साथ सहज भी लगता है पर इससे बौद्धिक क्षरण होता है। जबकि विद्वान, पराक्रमी और परोपकारी समाज का नेतृत्व करते है। अन्य लोग उनके जीवन तथा व्यवहार शैली को अनुकरणीय मानकर सम्मानित करते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, September 09, 2012

पतंजलि योग विज्ञान-सुख का योग दुःख से है (patanjali yog vigyan or scince-sukh aur dukh ka yoga)

         पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार प्रकृति स्वतः विराजती हैं। मनुष्य का मन तो अत्यंत चंचल माना जाता है। यही मन मनुष्य का स्वामी बन जाता है और जीवात्मा का ज्ञान नहीं होने देता। अध्यात्म के ज्ञान के अभाव में सांसरिक क्रियाओं के अनुकूल मनुष्य प्रसन्न होता है तो प्रतिकूल होने पर भारी तनाव में घिर जाता है। मकान नहीं है तो दुःख है और है उसके होने पर सुख होने के बावजूद उसके रखरखाव की चिंता भी होती है। धन अधिक है तो उसके लुटने का भय और कम है नहीं है या कम है, तो भी सांसरिक क्रियाओं को करने में परेशानी आती है मनुष्य सारा जीवन इन्हीं  अपनी कार्यकलापों के अंतद्वंद्वों में गुजार देता है। विरले ज्ञानी ही इस संसार में रहकर हर स्थिति में आनंद लेते हुए परमात्मा की इस संसार रचना को देखा करते हैं। अगर किसी वस्तु का सुख है तो उसके प्रति मन में राग है और यह उसके छिन जाने पर क्लेश पैदा होता है। कोई वस्तु नहीं है तो उसका दुःख इसलिये है कि वह दूसरे के पास है। यह द्वेष भाव है जिसे पहचानना सरल नहीं है। मृत्यु का भय तो समस्त प्राणियों को रहता है चाहे वह ज्ञानी ही क्यों न हो। मनुष्य का पक्षु पक्षियों में भी यह भय देखा जाता है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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सुखानुशयी रागः।
‘‘सुख के अनुभव के पीछे रहने वाला क्लेश राग है।’’
‘‘दुःखानुशयी द्वेषः।
‘‘दुःख के अनुभव पीछे रहने वाला क्लेश द्वेष है।’’
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूडोऽभिनिवेशः।।
            ‘‘मनुष्य जाति में परंपरागत रूप से स्वाभाविक रूप से जो चला आ रहा है वह मृत्यु का क्लेश ज्ञानियों में भी देखा जाता है। उसे अभिनिवेश कहा जाता है।’’
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।
           ‘‘ये सभी सूक्ष्मावस्था से प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करने योग्य हैं।’’
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।
‘‘उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नष्ट करने योग्य हैं।’’
       इस तरह अंतद्वंद्वों में फंसी अपनी मनस्थिति से बचने का उपाय बस ध्यान ही है। ध्यान में जो शक्ति है उसका बहुत कम प्रचार होता है। योगासन, प्राणायाम और मंत्रजाप से लाभ होते हैं पर उनकी अनुभूति के लिये ध्यान का अभ्यास होना आवश्यक है। दरअसल योग साधना भी एक तरह का यज्ञ है। इससे कोई भौतिक अमृत प्रकट नहीं होता। इससे अन्तर्मन   में जो शुद्ध होती है उसकी अमृत की तरह अनुभूति केवल ध्यान से ही की जा सकती है। इसी ध्यान से ही ज्ञान के प्रति धारणा पुष्ट होती है। हमें जो सुख या दुःख प्राप्त होता है वह मन के सूक्ष्म में ही अनुभव होते हैं और उनका निष्पादन ध्यान से ही करना संभव है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, August 29, 2012

शरीर की सफाई से बीमारी दूर होती है-ऋग्वेद से सन्देश (rigved se sandesh-sharir ki safai se bimari door hotee hai)

                      हमारे वेदों में अनेक ऐसी बातें कही गयी हैं जिनका महत्व इस संसार में कभी महत्व नहीं होता।  इसका कारण यह है कि इस संसार में समय के साथ भौतिक स्वरूप के साथ ही लोगों के रहन सहन, चाल चलन तथा कार्य करने के तरीकों में बदलाव तो संभव है पर उसके अंदर की मूल प्रकृतियों का निवास स्थाई रूप से रहता है।  इन मूल प्रकृतियों तथा उनकी निवृति के ज्ञान का (जिसे हम अध्यात्मिक विज्ञान भी कह सकते हैं) जो वर्णन इन वेदों में वर्णित है।  उनकी विषय सामग्री का  अध्ययन चाहे जब किया जाये उनमें नवीनता बनी रहती है।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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ब्रह्माद्विषः अवजहि।
हिन्दी में अर्थ-‘‘ज्ञान से द्वेष करने वाले को मार।’’
अहः अहःशुन्ध्युः परिपदां।।’’
हिन्दी में अर्थ-‘‘नित्य स्वच्छता रखने वाला रोगों को दूर करता है।’’
             अधिकतर लोग धार्मिक कर्मकांडों को ही अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं पर आध्यात्मिक ज्ञान उनके लिये बुढ़ापे में जानने वाला विषय होता है जबकि इसका ज्ञान अगर बचपन से हो जाये तो जिंदगी आराम से बिताई जा सकती है। इसका कारण यह है कि सांसरिक विषयों से संबंध तो बचपन से ही हो जाता है और अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव आम मनुष्य उसमें इस तरह लिप्त हो जाता है कि उसके लिये सुख कम दुःख अधिक प्रकट होते हैं।  अधिकतर मनुष्यों के  अंदर अहंकार मोह तथा लोभ की  प्रकृतियां विद्यमान रहती हैं जो उसे ज्ञान से परे रखती है।  यह प्रकृतियां ज्ञान से द्वेष करती हैं।  ज्ञानी से चिढ़ाती हैं।
           अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में आदमी की न  केवल देह  बल्कि मन तथा विचारों में भी अस्वच्छता का वास हो जाता है।  इस तरह की समस्या से बचने का उपाय यही है कि  हम अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर अपनी बुद्धि, विचार तथा मन को शुद्ध रखने का प्रयास करें।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Thursday, April 19, 2012

यजुर्वेद के आधार पर संदेश-स्वार्थी लोग ज्ञान की बकवास करते हैं (swarthiyon ka gyan kewal bakwas hot hai-yajurved ke adhara par sandesh)

         हमारे देश में धर्म प्रचार की परंपरा है जो कि आमतौर से सत्संग और प्रवचनों के रूप में दिखाई देती है।  इसका लाभ देश के व्यवसायिक बुद्धिमानों ने इस तरह उठाया कि संत और सेठ का अंतर ही नहीं दिखाई देता। प्राचीन ग्रंथों के स्वर्णिम तत्व ज्ञान को रटने वाले गेरुए या सफेद वस्त्र पहनकर उनका प्रवचन करते हैं।  उन्होंने उसे धारण कितना किया है यह केवल ज्ञानी ही समझ सकते हैं।
   हमारे देश का अध्यात्म ज्ञान अनेक ग्रंथों में वर्णित है। इन ग्रंथों में सकाम तथा निष्काम दोनों प्रकार की भक्ति के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है। कर्म और फल के नियमों का उल्लेख किया गया है। यह अंतिम सत्य है कि हर मनुष्य को अपने ही कर्म का फल स्वयं भोगना पड़ता है। कोई व्यक्ति भी किसी की नियति और फल को बदल नहीं सकता। यह अलग बात है कि समस्त ग्रंथों का अध्ययन करने के बावजूद अनेक लोग उसका ज्ञान धारण नहीं कर पाते पर सुनाने में सभी माहिर हैं।
        हमारे देश का तत्वज्ञान प्रकृत्ति और जीवन के मूल सिद्धांतों पर आधारित एक विज्ञान है। इस संबंध में हमारे अनेक प्राचीन ग्रंथ पठनीय है। यह अलग बात है कि उनका रटा लगाने वाले अनेक लोग अपने आपको महान संत कहलाते हुए मायापति बन जाते हैं। उनके आश्रम घास फूस के होने की बजाय पत्थर और सीमेंट से बने होते हैं। उसमें फाइव स्टार होटलों जैसी सुविधायें होती हैं। गुरु लोग एक तरह से अपने महल में महाराज की तरह विराजमान होते हैं और भक्तों की दरबार को सत्संग कहते हैं। तत्वज्ञान का रट्टा लगाना उसे दूसरों को सुनाना एक अलग विषय है और उसे धारण करना एक अलग पक्रिया है।
               इस विषय पर यजुर्वेद में कहा गया है कि
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            नीहारेण प्रवृत्त जल्प्या चासुतृप उम्थ्शासरचरन्ति
‘‘जिन पर अज्ञान की छाया है जो केवल बातें बनाने के साथ ही अपनी देह की रक्षा के लिये तत्पर हैं वह तत्वज्ञान का प्रवचन बकवाद की तरह करते हैं।’’
        तत्वज्ञानी वह नहीं है जो दूसरे को सुनाता है बल्कि वह है जो उसे धारण करता है। किसी ने तत्वज्ञान धारण किया है या नहीं यह उसके आचरण, विचार तथा व्यवहार से पता चल जाता है। जो कभी प्रमाद नहीं करते, जो कभी किसी की बात पर उत्तेजित नहीं होते और सबसे बड़ी बात हमेशा ही दूसरे के काम के लिये तत्पर रहते हैं वही तत्वाज्ञानी हैं। सार्वजनिक कार्य के लिये वह बिना आमंत्रण के पहुंच कहीं भी मान सम्मान की परवाह किये बिना पहंच जाते हैं और अगर कहीं स्वयं कोई अभियान प्रारंभ करना है तो बिना किसी शोरशराबे के प्रारंभ कर देते हैं। लोग उनके सत्कर्म से प्रभावित होकर स्वयं ही उनके अनुयायी हो जाते हैं।
        इसके विपरीत अज्ञानी और स्वार्थी लोग तत्वज्ञान बघारते हैं पर उसे धारण करना तो दूर ऐसा सोचते भी नहीं है। किसी तरह अपने प्रवचन करते हुए आम लोगों को भ्रम में रखते हैं। वह उन कर्मकांडों को प्रोत्साहित करते हैं जो सकाम भक्ति का प्रमाण माने जाने के साथ ही फलहीन माने जाते हैं। अतः जिन लोगों को अध्यात्म में रुचि है उनको अज्ञानी और अज्ञानी की पहचान उस समय अवश्य करना चाहिए जब वह किसी को अपना गुरु बनाते हैं।
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Friday, April 13, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-खाने के लिये इज्जत गंवाना ठीक नहीं (bhritirhari neeti shatak-roti aur izzat)

             दुनियां में हर जीव के लिये भोजन अनिवार्य है पर इसका आशय यह कतई नहीं है किसी भूखे की दीनता देखकर उसके प्रति उदार भाव दिखाया जाये। कहा भी जाता है कि सबका दाता राम है और जिसने पेट दिया है उसने भोजन का इंतजाम भी पहले कर दिया है। यह भी कहा जाता है कि दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम! इन सब बातों के उल्लेख करने का तात्पर्य यह है कि दैहिक जीवन धारण करने के लिये भोजन अनिवार्य है पर इसका यह मतलब भी नहीं है कि सब कुछ यही भोजन है और कहीं भी किसी प्रकार भी ग्रहण किया जाये। हमेशा सुपाच्य भोजन करने के साथ ही इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए कि वह शुद्ध माध्यमो से अर्जित किया गया हो। ऐसे लोगों की संगत करना चाहिए जो पवित्र विचार और कर्म वाले हों। अगर कहीं भोजन के लिये दूसरे पर निर्भर हों तो यह भी देखना चाहिए कि वह आदमी किस प्रवृत्ति का है और उसके आय के साधन कैसे हैं?             
                              भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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             लाङ्गल चालनभधश्चरणावपातं भूमौ निपत्य वदनोदर दर्शनं च।
           श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुङ्गवस्तु धीरं विलोकयति चाटुश्तैश्च भुङ्वते।।
                  ‘‘जब कोई मनुष्य कुत्ते के सामने भोजन डालता है तो वह पूंछ हिलाकर अपनी दीनता का प्रदर्शन करता है पर जब कोई हाथ के सामने भोजन रखता है तो वह बड़ी गंभीरता से उसे देखते हुए कई बार मनाने पर ही उसे ग्रहण करता है।"
                   हमें भोजन देने वाले का आभार व्यक्त करना चाहिए पर इसक अर्थ यह कदापि नहीं है कि उसके इतने कृतज्ञ हो जायें कि उसके कहने पर अपवित्र काम करने लगें। कहीं भोजन मिले तो उस तत्काल नहीं टूटना चाहिए बल्कि सम्मान से आग्रह करने पर ही अपना हाथ बढ़ाना चाहिए। अगर हमें भूख है तो इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि कहीं भोजन बना हुआ है जिससे हम अपना मन तृप्त कर सकते हैं। उसी तरह दूसरे को भोजन कराते समय अपने अंदर अहंकार का भाव भी नहीं रखना चाहिए। यह प्रकृत्ति प्रदत्त है भले ही निमित्त कोई इंसान बनता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Sunday, February 26, 2012

चाणक्य नीति-स्वर्ग और नरक तो धरती पर ही मौजूद हैं (chankya neeti-swarga aur narak isee dharti par)

                   भारत ही नही बल्कि पूरे विश्व में स्वर्ग नरक की अनेक तरह कल काल्पनिक धारणायें प्रचलित हैं।  ऐसा नहीं है कि स्वर्ग या नरक की स्थिति केवल मरने के बाद ही दिखाई देती है। अपने पास अगर ज्ञान हो तो इसी पृथ्वी पर स्वर्ग भोग जाता है। आजकल भौतिकवाद के चलते मनुष्यों की अनुभूतियों की शक्तियां कम हो गयी हैं। वह तुच्छ उपलब्धियों पर इतराते हैं तो थोड़ी परेशानियों में भारी तनाव उन पर छा जाता है। आजकल कहा भी जाता है कि इस संसार में कोई सुखी नहीं है। दरअसल लोग सुख का अर्थ नहीं जानते। सुख के साधनों के नाम अपने घर में ही कबाड़ जमा कर रहे हैं। संबंधों के नाम पर स्वार्थ की पूर्ति चाहते हैं। स्वार्थों के लिये संबंध बनाते और बिगाड़ते हैं। क्रोध को शक्ति, कटु वाणी को दृढ़ता और दुःख के नाम पर दूसरे के वैभव से ईर्ष्या पालकर मनुष्य स्वयं ही अपने दैहिक जीवन को नरक बना देता है। किसी को यह बात समझाना कठिन है कि वह अपने जीवन की स्थितियों के लिये स्वयं जिम्मेदार हैं। लोग भाग्यवादी इतने हैं कि अपने ही कर्म को भी उससे प्रेरित मानते है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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                                   अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्।
                                  नीचप्रसंङ्गा कुलहीनसेवा चिह्ननि देहे नरकास्थितानाम्।।
               ‘‘अत्यंत क्रोध करना अति कटु कठोर तथा कर्कश वाणी होना, निर्धनता, अपने ही बंधु बांधवों से बैर करना, नीचों की संगति तथा कुलहीन की सेवा करना यह सभी स्थितियां प्रथ्वी पर ही नरक भोगने का प्रमाण है।’’  
 गम्यते यदि मृगेन्द्र-मंदिर लभ्यते करिकपोलमौक्तिम्।
    जम्बुकाऽऽलयगते च प्राप्यते वत्स-पुच्छ-चर्म-खुडनम्।।
             ‘‘कोई मनुष्य यदि सिंह की गुफा में पहुंच जाये तो यह संभव है कि वहां हाथी के मस्तक का मोती मिल जाये पर अगर वह गीदड़ की गुफा में जायेगा तो वहां उसे बछड़े की पूंछ तथा गधे के चमड़ का टुकड़ा ही मिलता है।’’
                     हमें अपने जीवन को अगर आनंद से बिताना है तो अपने आचरण, विचार तथा व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। कायर, कलुषित व बीमार मानसिकता वाले, व्यसनी तथा लालची लोगों से संबंध रखने से कभी हित नहीं होता है। ऐसे स्थानों पर जाना जहां तनाव के अलावा कुछ नही मिलता हो वर्जित करना ही श्रेयस्कर हैै। जिनका छवि खराब है उनसे मिलना अपने लिये ही संकट बुलाना है। इस संसार में ऐसे पाखंडी लोगों की कमी नहीं है जो अपना काम निकालने के लिये दयनीय चेहरा बना लेते हैं पर समय आने पर सांप की तरह फुंफकारने लगते हैं। इसलिये उत्साही, संघर्षशील तथा अध्यात्मिक रुचि वालों की संगत करना ही जीवन के लिये लाभप्रद है। अच्छे लोगों से संगत करने पर अपने विचार भी शुद्ध होते हैं तो मन के संकल्प भी दृढ़ होते हैंे जो आनंदमय जीवन की पहली और आखिरी शर्त है।
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Sunday, January 08, 2012

मनुस्मृति-जाति के आधार पर किसी पर व्यंग्य करना अनुचित (manu smriti-jati ka adhar par vyangya karna anuchit)

            यह कहना कठिन है कि पूरी दुनियां में ही अहंकार के भाव का बोलबाला है या भारतीय समाज में ही यह विकट रूप में दिखाई देता है। अलबत्ता इतना अवश्य है कि भारतीय समाज में अपने अहंकार में आकर दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति कुछ अधिक ही दिखाई देती है। हम जैसे चिंत्तक तो मानते हैं कि भारत का अध्यात्मिक दर्शन इसलिये ही अधिक समृद्ध हुआ है क्योंकि ऋषियों और मुनियों को अपने आसपास अज्ञान में लिपटा एक बृहद समाज मिला जिसे सुधारने के लिये उन्होंने तत्वज्ञान स्थापित किया। इसके लिये उनको एक सहज जमीन मिल गयी जहां वह अनुसंधान, चिंत्तन, मनन और अध्ययन से अध्यात्मिक ज्ञान का सृजन करने के साथ ही उसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी कर सके। अगर सभी ज्ञानी होते तो आखिर वह किस पर अनुसंधान कर रहस्यों का पता लगाते। उनकी बात कौन सुनता? एक ज्ञानी के रूप में कौन उनको प्रतिष्ठत करता? एक टांग वाले को लंगड़ा, एक आंख वाले को काना, अक्षरज्ञान से रहित को गंवार और और काले रंग वाले को कुरूप कहकर उनका मजाक उड़ाना तो आम बात है। इसके अलावा हर आदमी अपनी जाति को श्रेष्ठ बताकर दूसरी जाति का मजाक उड़ाता है। कभी कभी तो अपने प्रथक जाति वाले को नीच बताकर उसका अपमान किया जाता है। सच बात तो यह है कि कोई जाति नीच नहीं होती अलबत्ता जिनके पास धन, पद और बाहुबल है वह दूसरे की जाति को नीच बताते हैं। यह एक दम अधर्म और अज्ञान का प्रमाण है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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हीनांगनतिरिक्तांगहीनाव्योऽधिकान्।
रूपद्रव्यविहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत्।।
           ‘‘ऐसे व्यक्तियों का मजाक  उड़ाना या अपमानित करना निंदनीय है जो किसी अंग से हीन, अधिक अंग वाले, शिक्षा से रहित, आयु में बड़े, कुरूप, निर्धन तथा छोटी जाति या वर्ण के हों।’’
         वैसे मनुमहाराज पर भारतीय समाज में जाति पांति स्थापित करने का आरोप लगता है। ऐसा लगता है कि आधुनिक शिक्षा से ओतप्रोत समाज नहीं चाहता कि भारत की प्राचीन शिक्षा का यहां प्रचार प्रसार हो। यही कारण एक तो वह लोग हैं जो मनुस्मृति के चंद उदाहरण देकर देश में उसे जातिपाति का प्रवर्तक मानते हैं बिना पढ़े ही उनका प्रतिकार यह कहते हुए करते हैं कि भारतीय समाज कभी उनके संदेशों के मार्ग पर नहीं चला। यह हैरानी की बात है कि इन्हीं मनुमहाराज ने अंगहीन, अशिक्षित, बूढ़े, असुंदर तथा जाति के आधार पर किसी के मजाक उड़ाने या अपमानित करने को वर्जित बताया है। लार्ड मैकाले की शिक्षा में रचेबसे आधुनिक बुद्धिजीवी चाहे वह जिस विचारधारा के हों मनुस्मृति का पूर्ण अध्ययन किये बिना ही अपना बौद्धिक ज्ञान बघारते हैं।
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Tuesday, January 03, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-विरक्ति का भाव मनुष्य को निडर बनाता है (bharathari niti shatak-viraki ka bhav nidar banata hai)

             श्रीमद्भागवत गीता में निष्काम भाव का जो संदेश है उसका अधिकतर लोग गलत अर्थ निकालते हैं। कुछ लोग उसे काम का त्याग करना मानकर सन्यास से जोड़ते हैं तो कुछ कहते हैं कि बिना कामना के काम किया ही नहीं जा सकता। यह अज्ञान का प्रमाण है।  कर्म करना मनुष्य का धर्म है पर उसके फल के प्रति विरक्ति भाव अपनाना ही निष्काम भाव है।हमारे अध्यात्म ज्ञान में निष्काम भाव का महत्व प्रतिपादित किया गया है। दरअसल इसमें कर्मफल के प्रति विरक्ति दिखाने के लिये प्रेरित किया गया है। जबकि हमारे प्रवचनकर्ता इसका अर्थ इस तरह प्रतिपादित करते हैं जैसे कि संसार की वस्तुओं से ही पूरी तरह विरक्त हुआ जाये। अक्सर यह कहा जाता है कि मोह, लोभ, काम क्रोध तथा कामनायें ही मनुष्य की शत्रु होती हैं। आज तक लोगों को कोई यह समझा नहीं पाया कि कर्मफल है क्या? यही कारण है कि सामान्य जन कहते हैं कि फल की इच्छा के बिना कर्म करना संभव नहीं है। इसका मतलब यह है कि लोग सांसरिक क्रियाओं के कर्म का फल भौतिक पदार्थ की उपलब्धि ही समझते हैं। नौकरी, व्यवसाय या अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों से मिलने वाले धन को आज भी फल समझना इस बात का प्रमाण है कि कथित भारतीय अध्यात्मिक गुरु समाज को निष्काम कर्म का यह अर्थ नहंीं समझा पाये जिसका आशय भक्ति, दया और दान और दान से है।
                मनुष्य अपनी दैहिक बाध्यताओं की वजह से प्रतिदिन कर्म करता है। नौकरी, व्यवसाय या मजदूरी से जिन लोगों को पैसा मिलता है वह उससे अपने घर परिवार का संचालन करते हैं। बच्चों की फीस, परिवार के लिये भोजन तथा अपनी जेब का खर्च करता हुआ कोई भी आदमी यह नहीं समझ पाता कि उसके पास आया धन फल नहीं है। इसका आशय यह है कि पैसा अपने हाथ में आना हमारे जीवन के ही कर्म का विस्तार है। वह पैसा हमारी जेब में नहीं रहता। अधिक है तो अल्मारी या बैंक में जमा रहता है। उस पैसे से खरीदा गया भोजन और वस्त्र भी फल नहीं है क्योंकि हम उसे अपनी देह का संचालन करते हैं। ऐसे सांसरिक कर्म हमेशा धन की चाह से किये जाते हैं और ऐसा जो न करे वह मूर्ख ही कहलायेगा। दरअसल उस धन का उपयोग जब किसी पर दया करने या दान देने के लिये किया जाता है तब उसे निष्काम कर्म कहा जा सकता है। जहां धन की वापसी की चाहत न हो वही निष्काम कर्म है। इस चाहत से विरक्ति ही त्याग है।
महाराज भर्तृहरि के नीति शतक में कहा गया है कि
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भोगे रोगभयं कुल च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं
मानं दैन्यभयं वाले रिपुभयं रूपे जरायाः भयमः।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं कावे कृतान्ताद् भयं
सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्।।
                            ‘‘इस दैहिक जीवन में भोगों से रोग, उच्च परिवार में जन्म लेने पर निम्न आचरण में फंसने, अधिक धन होने पर राज्य, अधिक मौन रहने पर दीनता, शक्तिवान होने पर शत्रु, सौंदर्य से बुढ़ापे, ज्ञानी होने पर वाद विवाद में पराजय, विनम्रता से दुष्टों से आक्रमण और देह रहने पर मृत्यु का भय रहता है। एक मात्र विरक्त का भव ही भय से निरापद बना सकता है।
             जहां दैहिक और भौतिक जीवन को ही स्वीकार किया जाता है वहां भय की संभावना अधिक रहती है। यहां हर वस्तु पतनशील और नष्टप्रायः है। अगर हम अपने अध्यात्म दर्शन को समझें तो यह ज्ञान प्राप्त होगा कि सांसरिक उपलब्धियों का फल समझना ही भय का कारण है। यह ज्ञान होने पर आदमी भय से रहित हो जाता है।
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Friday, December 30, 2011

सामवेद से संदेश-विद्वान में तेज हो तभी पूज्यनीय होता है (vidavan mein tej ho tabhi pujyaniya hota hai)

            मनुष्य का मन माया में आसानी से रमता है जबकि अध्यात्मिक चर्चा उसके लिये बोरियत पैदा करने वाली प्रक्रिया है। धन के पीछे भागने में हर मनुष्य अपनी पूरी ताकत लगा देता है। कई बार तो ऐसा लगता है कि अनेक लोगों के लिये मनोरंजन का साधन ही धनोपार्जन करना है।  अंग्रेज विद्वान जार्ज बर्नाड शॉ के अनुसार बिना बेईमानी के कोई भी धनी नहीं हो सकता। हमारे देश में अंग्रेजी राज व्यवस्था, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा संस्कारों ने जड़ तक अपनी स्थापना कर ली है जिसमे छद्म रूप की प्रधानता है। इसलिये अब यहां भी कहा जाने लगा है कि सत्य, ईमानदारी, तथा कर्तव्यनिष्ठा से कोई काम नहीं बन सकता। दरअसल हमारे यहां समाज कल्याण अब राज्य की विषय वस्तु बन गया है इसलिये धनिक लोगों ने इससे मुंह मोड़ लिया है। लोकतंत्र में राजपुरुष के लिये यह अनिवार्य है कि वह लोगों में अपनी छवि बनाये रखें इसलिये वह समाज में अपने आपको एक सेवक के रूप में प्रस्तुत कर कल्याण के ने नारे लगाते हैं। वह राज्य से प्रजा को सुख दिलाने का सपना दिखाते हैं। योजनायें बनती हैं, पैसा व्यय होता है पर नतीजा फिर भी वही ढाक के तीन पात रहता है। इसके अलावा गरीब, बेसहारा, बुजुर्ग, तथा बीमारों के लिये भारी व्यय होता है जिसके लिये बजट में राशि जुटाने के लिये तमाम तरह के कर लगाये गये हैं। इन करों से बचने के लिये धनिक राज्य व्यवस्था में अपने ही लोग स्थापित कर अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ात जाते हैं । उनका पूरा समय धन संग्रह और उसकी रक्षा करना हो गया है इसलिये धर्म और दान उनके लिये महत्वहीन हो गया है।
सामवेद में कहा गया है कि
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ऋतावृधो ऋतस्पृशौ बहृन्तं क्रतुं ऋतेन आशाये।
                ‘‘सत्य प्रसारक तथा सत्य को स्पर्श करने वाला कोई भी महान कार्य सत्य से ही करते हैं। सत्य सुकर्म करने वाला शस्त्र है।’’
‘‘वार्च वर्थय।
             ‘‘सत्य वचनों का विस्तार करना चाहिए।’’
वाचस्पतिर्मरवस्यत विश्वस्येशान ओजसः।
           ‘‘विद्वान में  तेज हो तो वह पूज्य होता है।’’
              कहने का अभिप्राय है कि हमारे देश में सत्य की बजाय भ्रम और नारों के सहारे ही आर्थिक, राजकीय तथा सामाजिक व्यवस्था चल रही है। राज्य ही समाज का भला करेगा यह असत्य है। एक मनुष्य का भला दूसरे मनुष्य के प्रत्यक्ष प्रयास से ही होना संभव है पर लोकतांत्रिक प्रणाली में राज्य शब्द निराकार शब्द बन गया है। करते लोग हैं पर कहा जाता है कि राज्य कर रहा है। अच्छा करे तो लोग श्रेय लेेते हैं और बुरा हो तो राज्य के खाते में डाल देते हैं। इस एक तरह से छद्म रूप से ही हम अपने कल्याण की अपेक्षा करते हैं जो कि अप्रकट है। भारतीय अध्यात्म ज्ञान से समाज के परे होने के साथ ही विद्वानों का राजकीयकरण हो गया है। ऐसे में असत्य और कल्पित रचनाकारों को राजकीय सम्मान मिलता है और समाज की स्थिति यह है कि सत्य बोलने विद्वानों से पहले लोकप्रियता का प्रमाणपत्र मांगा जाता है। हम इस समय समाज की दुर्दशा देख रहे हैं वह असत्य मार्ग पर चलने के कारण ही है।
              सत्य एक ऐसा शस्त्र है जिससे सुकर्म किये जा सकते हैं। जिन लोगों को असत्य मार्ग सहज लगता है उन्हें यह समझाना मुश्किल है पर तत्व ज्ञानी जाते हैं कि क्षणिक सम्मान से कुछ नहीं होता इसलिये वह सत्य के प्रचार में लगे रहते है और कालांतर में इतिहास उनको अपने पृष्ठों में उनका नाम समेट लेता है।
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Tuesday, December 27, 2011

यजुर्वेद से संदेश-नाम स्मरण से बुद्धि शुद्धि होती है

                अक्सर लोग यह सवाल करते हैं कि जब परमात्मा ने हमें काम करने के लिये हाथ, चलने के लिये पैर, बोलने की लिये जीभ, सुनने के लिये कान, देखने के लिये आंख और सूंघने के लिये नाक देकर हमें अपने जीवन के लिये उत्तरदायित्वों के निर्वहन योग्य बना दिया है तो फिर उसका नाम लेकर समय खराब क्यों करें? कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि जब हम अपना कर्म शुद्ध हृदय से नित्य करते हैं तो भगवान का नाम लेने की आवश्यकता क्या है? कुछ लोग तो यह भी कहकर अपना ज्ञान बघारते हैं कि जीवन में चुपचाप अपना काम करना तथा कर्मकांड में लिप्त रहना ही धर्म है।
          दरअसल हम भले ही अपना नित्य कर्म शुद्ध हृदय से करें पर जब तक हमें अपने अध्यात्म का ज्ञान नहीं होगा तब कभी सुख की अनुभूति नहीं हो सकती। इस तरह तो मानसिक और वैचारिक रूप से हम एक ही धारा में बहते जायेंगे तो यह पता ही नहीं चलेगा कि जीवन का रहस्य क्या है? वैसे भी मनोविज्ञानिक मानते हैं कि नियमित रूप से एक ही कर्म करते रहना या मस्तिष्क को एक ही राह पर जाकर एक ही जगह ध्यान लगाये रखना भी स्वास्थ्य के लिये ठीक नहंी है। जो बहुत बड़े ज्ञानी और ध्यानी हैं वह तो अपने अभ्यास से एक ही जगह खड़े रहकर भी नित्य पल नवीनता का अनुभव करते हुए जीवन का सुख और आनंद उठाते हैं पर सामान्य आदमी का मन उसे इधर उधर चलने के लिये प्रेरित करता है-इसी कारण हमारे समाज में फिल्म देखना, पिकनिक मनाना या किटी पार्टी करने जैसी परंपरा प्रारंभ हो गयी हैं जो कि कालांतर में अधिक दुखदायी होती हैं। इन पर व्यय होने के साथ ही शारीरिक तथा मानसिक परेशानियों का दौर भी प्रारंभ होता है। आमतौर से लोग मनोरंजन की राह पर चले जाते हैं जहां दूसरे मनुष्य मन के व्यापारी बनकर उनका दोहन करते हैं। अपने नियमित कर्म के बाद परमात्मा की भक्ति से भले ही कोई लाभ न हो पर एक नवीन सुखद अनुभूति अवश्य होती है।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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तत्सवितुर्वरेण्य भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो न प्रचोदयात!
          ‘‘जग नियंता, जगकर्ता, दिव्य गुण युक्त परमात्मा के शुद्ध स्वरूप का ध्यान हम करते हैं जो हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग पर लगाता है।’’
                 इसमें ओम भूर्भव स्वः शब्द जुड़ने से यह गायत्री मंत्र हो जाता है जो कि मंत्रों का राजा माना जाता है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि नाम स्मरण करने से मन की शुद्ध होती है और बुद्धि परिष्कृत होती है। हम अपने अध्यात्म ग्रंथों की बातों को भले ही न माने पर पश्चिमी विशेषज्ञों की इस धारणा को तो नहीं भुलाना चाहिए कि हमें अपनी नियमित दिनचर्या में एकरसता से बचना चाहिए।
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Sunday, December 25, 2011

तुलसी के दोहे-मीठे बोल सुनकर बहकना नहीं चाहिए (tusli ke dohe-meethe bol suykar bahakna nahin chahiye)

           आजकल बाज़ार का प्रभाव धर्म तथा समाज के विषयों में बहुत अधिक हो गया है। उपभोग संस्कृति ने लोगों के अंदर अध्यात्म ज्ञान के प्रति विरक्ति पैदा की है जिसके कारण उनके पास सामान्य व्यवहारिक ज्ञान भी नहीं रहा है। लोगों के अंदर पैसा पाने का मोह इतना अधिक हो गया है कि दूसरों की बातों में आकर अपना कमाया भी सब कुछ गंवा बैठते हैं। हमने ऐसे अनेक समाचार सुने और देखे होंगे कि लोगों को अतिशीघ्र अपने धन का दोगुना या चार गुना देकर उनसे भारी रकम की ठगी की गयी। अनेक कंपनियों ने तो शहर में एक नहंी बल्कि चार पांच सौ लोगों को चूना सामूहिक रूप से चूना लगा लिया। यह समाज में अपराध बढ़ने की प्रवृत्ति का परिचायक है पर साथ ही आम जनमानस में बौद्धिक सोच के अभाव का प्रमाण भी है। इस तरह की घटनायें चिंताजनक हैं। दो चार व्यक्ति हों तो ठीक पर यहां तो हजारों के हजारों एक साथ ठगे जाते हैं।
          ठगी करने वाले लोग अपनी मीठी बातों के साथ ही आकर्षण प्रलोभन भी देते हैं। कहीं तो आरंभ में ही उपहार भी दे दिया जाता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर इतने सारे लोग कैसे जाल में फंस जाते हैं। इसमें फंसने वाले लोग ग्रामीण या अशिक्षित पृष्ठभूमि वाले नहीं वरन् पढ़े लिखे और नौकरीशुदा लोग ही होते हैं। इस तरह आधुनिक शिक्षा को लेकर भी संशय पैदा होता है।
महाकवि तुलसी दास जी कहते हैं कि
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‘तुलसी’ खल बानी मधुर, मुनि समुझिअं हियं हेरि।
राम राज बाधक भई, मूढ़ मंथरा चेरि।।
‘‘कभी किसी की मधुर वाणी सुनकर उस पर मोहित नहीं होना चाहिए। दासी मंथरा ने कैकयी को मधुर वाणी में समझाकार भगवान श्री राम के राज्याभिषेक में बाधा डाली थी।’’
         कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हमारे देश के ग्रामीण तथा अशिक्षित लोग कथित आधुनिक समाज से अधिक चतुर हैं। वह भी ठगे अवश्य जाते हैं पर सामूहिक रूप से उनको कोई चूना नहीं लगा सकता। ऐसे में यह सवाल उठता है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे रहकर आधुनिक समाज कहीं बौद्धिक क्षमता खो तो नहीं बैठा है?
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, December 23, 2011

मनुस्मृति से संदेश-धन और जाति के आधार पर उपहास उड़ाना पापपूर्ण (manu smriti se sandesh-dhan aur jaati ka aadhar par uphas karna galat)

            हम अक्सर अपने भारतीय समाज के इतिहास को लेकर अनेक चर्चाऐं करते हैं। कहा जाता है कि भारतीय समाज मे जातिपाति का भेदभाव ही उसके पतन का कारण बन रहा है पर सच बात यह है कि ऐसा अपने अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव के कारण है। हमारे समाज में धन, जाति या भाषा के आधार पर किसी मनुष्य को  हेय मानना अत्यंत अनुचित माना जाता है।
                  यह कहना कठिन है कि पूरी दुनियां में ही अहंकार के भाव का बोलबाला है या भारतीय समाज में ही यह विकट रूप में दिखाई देता है। अलबत्ता इतना अवश्य है कि भारतीय समाज में अपने अहंकार में आकर दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति कुछ अधिक ही दिखाई देती है। हम जैसे चिंत्तक तो मानते हैं कि भारत का अध्यात्मिक दर्शन इसलिये ही अधिक समृद्ध हुआ है क्योंकि ऋषियों और मुनियों को अपने आसपास अज्ञान में लिपटा एक बृहद समाज मिला जिसे सुधारने के लिये उन्होंने तत्वज्ञान स्थापित किया। इसके लिये उनको एक सहज जमीन मिल गयी जहां वह अनुसंधान, चिंत्तन, मनन और अध्ययन से अध्यात्मिक ज्ञान का सृजन करने के साथ ही उसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी कर सके। अगर सभी ज्ञानी होते तो आखिर वह किस पर अनुसंधान कर रहस्यों का पता लगाते। उनकी बात कौन सुनता? एक ज्ञानी के रूप में कौन उनको प्रतिष्ठत करता? एक टांग वाले को लंगड़ा, एक आंख वाले को काना, अक्षरज्ञान से रहित को गंवार और और काले रंग वाले को कुरूप कहकर उनका मजाक उड़ाना तो आम बात है। इसके अलावा हर आदमी अपनी जाति को श्रेष्ठ बताकर दूसरी जाति का मजाक उड़ाता है। कभी कभी तो अपने प्रथक जाति वाले को नीच बताकर उसका अपमान किया जाता है। सच बात तो यह है कि कोई जाति नीच नहीं होती अलबत्ता जिनके पास धन, पद और बाहुबल है वह दूसरे की जाति को नीच बताते हैं। यह एक दम अधर्म और अज्ञान का प्रमाण है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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हीनांगनतिरिक्तांगहीनाव्योऽधिकान्।
रूपद्रव्यविहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत्।।
           ‘‘ऐसे व्यक्तियों का मजाक  उड़ाना या अपमानित करना निंदनीय है जो किसी अंग से हीन, अधिक अंग वाले, शिक्षा से रहित, आयु में बड़े, कुरूप, निर्धन तथा छोटी जाति या वर्ण के हों।’’
         वैसे मनुमहाराज पर भारतीय समाज में जाति पांति स्थापित करने का आरोप लगता है। ऐसा लगता है कि आधुनिक शिक्षा से ओतप्रोत समाज नहीं चाहता कि भारत की प्राचीन शिक्षा का यहां प्रचार प्रसार हो। यही कारण एक तो वह लोग हैं जो मनुस्मृति के चंद उदाहरण देकर देश में उसे जातिपाति का प्रवर्तक मानते हैं बिना पढ़े ही उनका प्रतिकार यह कहते हुए करते हैं कि भारतीय समाज कभी उनके संदेशों के मार्ग पर नहीं चला। यह हैरानी की बात है कि इन्हीं मनुमहाराज ने अंगहीन, अशिक्षित, बूढ़े, असुंदर तथा जाति के आधार पर किसी के मजाक उड़ाने या अपमानित करने को वर्जित बताया है। लार्ड मैकाले की शिक्षा में रचेबसे आधुनिक बुद्धिजीवी चाहे वह जिस विचारधारा के हों मनुस्मृति का पूर्ण अध्ययन किये बिना ही अपना बौद्धिक ज्ञान बघारते हैं।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Tuesday, December 13, 2011

मनुस्मृति-जिस खेल में धन की हार या जीत हो वह जुआ कहलाता है (fixing is gamling in paly-manu smriti in hindi)

            हमारे देश में क्रिकेट खेल को लेकर अनेक प्रकार की चर्चायें होती हैं। सच तो यह है कि इसे खेलने वाले बहुत कम हैं उससे ज्यादा अधिक तो इसे देखने वाले हैं। यह शुद्ध रूप से मनोरंजन का खेल है और इसके साथ ऐसे लोग भी जुड़ गये हैं जो इस पर सट्टा लगाते हैं।  आजकल खेलों में अनेक प्रकार की फिक्सिंग की चर्चा होती है। अभी हाल में पाकिस्तान के तीन क्रिकेट खिलाड़ियों को स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में सजा भी हुई थी। ऐसा नहीं भारत कोई इस समस्या से बचा हुआ है। भारत के भी दो खिलाड़ियों पर इस अपराध में आजीवन खेलने पर प्रतिबंध लगाया गया था। विश्व में भारत की आर्थिक शक्ति पर ही क्रिकेट खेल चल रहा है। जिन पाकिस्तानियों को ब्रिटेन में क्रिकेट खेल फिक्स करने के आरोप में सजा हुई हैए बताया जा रहा है कि भारत के सट्टेबाज भी उनसे संबंधित हैं। इधर हम देख रहे हैं कि भारत में भी अनेक सट्टेबाज पकड़े जा रहे हैं। कहने को क्रिकेट एक खेल है पर जैसे जैसे इससे जुड़े काले कारनामों का पर्दाफाश हो रहा है उससे तो जुंआ ही अधिक दिखने लगा है। अनेक परिवार इसके चक्कर में बरबाद हो गये हैं। हैरानी तो इस बात की है कि इस खेल में पैसा लगाने वाले वह लोग भी हैं जो इसको कभी खेले ही नहीं है। भले ही वह इसे मनोरंजन मानते हों पर अंततः यह जुआ है।
इस विषय पर मनु स्मृति में कहा गया है कि
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अप्राणिभिर्यत्क्रियते तल्लोके द्यूतमच्यते।
प्राणिभिः क्रियतेयस्तु सः विज्ञेयः समाह्वयः।।
             ‘‘जिस खेल में धन आदि निर्जीव वस्तुओं से हार या जीत का निर्णय हो वह खेल जुआ कहलाता है। पशु-पक्षी या अन्य सजीव प्राणियों को दांव पर रखकर खेले जाने वाले खेल का नाम समाह्व्य है।’’
एते राष्ट्रे वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्नत्सकराः।
विकर्म क्रियर्यानित्य बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः।।
          ‘‘जो लोग  जुआ या समाह्वय जैसे कर्म करवाते हैं वह राष्ट्र के लिये डाकू की तरह होते हैं और सदैव अपने कुकर्मों से प्रजा को कष्ट देते हैं।’’
         देश में एक बहुत बड़ा सट्टा समूह सक्रिय हैं। ऐसा कोई मैच नहीं होता जिसके होने पर कहीं न कहीं सट्टेबाज न पकड़े जाते हों। हैरानी इस बात की है कि यह केवल भारतीय टीम के खेलने पर ही नही होता बल्कि प्रसिद्धि विदेशी टीमों के मैच पर भी हमारे देश में सट्टा लगता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आज के अनेक युवा अधिक धन पर उसे पचा नहीं हो पाते और स्वयं जुआ खेलकर अपने खिलाड़ी होने का गर्व पालते हैं। उनको यह पता नहीं कि इन सट्टेबाजों का धन अंततः अपराध जगत के अन्य लोगों के पास पहुंचता है। सट्टेबाजी से जुड़े विदेश में बैठे अनेक भारतीयों के माध्यम से यह धन आतंकवादियों और अतिवादियों के पास पहुंचने के समाचार भी आते हैं। देश के युवाओं को यह बात समझना चाहिए कि वह सट्टा खेलकर ऐसे लोगों को साथ दे रहे हैं जो अंततः राष्ट्र के लिये डाकू की तरह होते हैं। वह ऐसे तत्वों को प्रोत्साहन देते हैं जो आमजनों को परेशान करते हैं।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, December 02, 2011

सामवेद से संदेश-महान लोग सत्य के साथ काम करते हैं (samves se sandesh-mahan log aur satya)

            अंग्रेज विद्वान जार्ज बर्नाड शॉ के अनुसार बिना बेईमानी के कोई भी धनी नहीं हो सकता। हमारे देश में अंग्रेजी राज व्यवस्था, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा संस्कारों ने जड़ तक अपनी स्थापना कर ली है जिसमे छद्म रूप की प्रधानता है। इसलिये अब यहां भी कहा जाने लगा है कि सत्य, ईमानदारी, तथा कर्तव्यनिष्ठा से कोई काम नहीं बन सकता। दरअसल हमारे यहां समाज कल्याण अब राज्य की विषय वस्तु बन गया है इसलिये धनिक लोगों ने इससे मुंह मोड़ लिया है। लोकतंत्र में राजपुरुष के लिये यह अनिवार्य है कि वह लोगों में अपनी छवि बनाये रखें इसलिये वह समाज में अपने आपको एक सेवक के रूप में प्रस्तुत कर कल्याण के ने नारे लगाते हैं। वह राज्य से प्रजा को सुख दिलाने का सपना दिखाते हैं। योजनायें बनती हैं, पैसा व्यय होता है पर नतीजा फिर भी वही ढाक के तीन पात रहता है। इसके अलावा गरीब, बेसहारा, बुजुर्ग, तथा बीमारों के लिये भारी व्यय होता है जिसके लिये बजट में राशि जुटाने के लिये तमाम तरह के कर लगाये गये हैं। इन करों से बचने के लिये धनिक राज्य व्यवस्था में अपने ही लोग स्थापित कर अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ात जाते हैं । उनका पूरा समय धन संग्रह और उसकी रक्षा करना हो गया है इसलिये धर्म और दान उनके लिये महत्वहीन हो गया है।
सामवेद में कहा गया है कि
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ऋतावृधो ऋतस्पृशौ बहृन्तं क्रतुं ऋतेन आशाये।
                ‘‘सत्य प्रसारक तथा सत्य को स्पर्श करने वाला कोई भी महान कार्य सत्य से ही करते हैं। सत्य सुकर्म करने वाला शस्त्र है।’’
‘‘वार्च वर्थय।
             ‘‘सत्य वचनों का विस्तार करना चाहिए।’’
वाचस्पतिर्मरवस्यत विश्वस्येशान ओजसः।
           ‘‘विद्वान तेज हो तो पूज्य होता है।’’
              कहने का अभिप्राय है कि हमारे देश में सत्य की बजाय भ्रम और नारों के सहारे ही आर्थिक, राजकीय तथा सामाजिक व्यवस्था चल रही है। राज्य ही समाज का भला करेगा यह असत्य है। एक मनुष्य का भला दूसरे मनुष्य के प्रत्यक्ष प्रयास से ही होना संभव है पर लोकतांत्रिक प्रणाली में राज्य शब्द निराकार शब्द बन गया है। करते लोग हैं पर कहा जाता है कि राज्य कर रहा है। अच्छा करे तो लोग श्रेय लेेते हैं और बुरा हो तो राज्य के खाते में डाल देते हैं। इस एक तरह से छद्म रूप से ही हम अपने कल्याण की अपेक्षा करते हैं जो कि अप्रकट है। भारतीय अध्यात्म ज्ञान से समाज के परे होने के साथ ही विद्वानों का राजकीयकरण हो गया है। ऐसे में असत्य और कल्पित रचनाकारों को राजकीय सम्मान मिलता है और समाज की स्थिति यह है कि सत्य बोलने विद्वानों से पहले लोकप्रियता का प्रमाणपत्र मांगा जाता है। हम इस समय समाज की दुर्दशा देख रहे हैं वह असत्य मार्ग पर चलने के कारण ही है।
              सत्य एक ऐसा शस्त्र है जिससे सुकर्म किये जा सकते हैं। जिन लोगों को असत्य मार्ग सहज लगता है उन्हें यह समझाना मुश्किल है पर तत्व ज्ञानी जाते हैं कि क्षणिक सम्मान से कुछ नहीं होता इसलिये वह सत्य के प्रचार में लगे रहते है और कालांतर में इतिहास उनको अपने पृष्ठों में उनका नाम समेट लेता है।
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Tuesday, November 29, 2011

पतंजलि योग साहित्य-पूर्व के कर्म का अनुमान परिणाम से भी संभव (patanjali yoga sahitya-parinam se karma ka anuaman sanbhav)

               आमतौर से आधुनिक विज्ञापन ज्योतिष तथा मनुष्यों की सिद्धि पर विश्वास नही करता पर पतंजलि योग के अनुसार अगर कोई योगासन, ध्यान, प्राणायाम करने के साथ ही संयम का पालन करे तो वह इतना सिद्ध हो जाता है कि उसे अपने भविष्य का ज्ञान होने लगता है। इतना ही नहीं अगर हम किसी व्यक्ति को काम करते नहीं देख पाए  पर उसे नतीजे भोगते देखकर भी यह अंदाज लगाया जा सकता है कि उसने क्या किया होगा।
पतंजलि योगशास्त्र  में कहा गया है कि
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क्रमान्यत्वं परिणामन्यत्वे हेतुः।

‘‘किसी कार्य करने के क्रम में भिन्नता से परिणाम भी भिन्न होता है।’’
परिणामन्नयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।।
‘‘अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का विचार करने से परिणाम का ज्ञान हो जाता है।’’

                    पतंजलि योग में न केवल भौतिक तथा दृश्यव्य संसार को जानने की विधा बताई गयी है बल्कि अभौतिक तथा अदृश्यव्य स्थितियों के आंकलन का भी ज्ञान दिया गया है। हमारे सामने जो भी दृश्य आता है वह तत्काल प्रकट नहीं होता बल्कि वह किसी के कार्य के परिणाम स्वरूप ही ऐसा होता है। कोई व्यक्ति हमारे घर आया तो इसका मतलब वह किसी राह से निकला होगा। वहां भी उसके संपर्क हुए होंगे। वह हमारे घर पर जो व्यवहार करता है वह उसके घर से निकलने से लेकर हमारे यहां पहुंचने तक आये संपर्क तत्वों से प्रभावित होता है। वह धूप में चलकर आया है तो दैहिक थकावट के साथ मानसिक तनाव से ग्रसित होकर व्यवहार करता है। कोई घर से लड़कर आया है तो उसका मन भी वहीं फंसा रह जाता है और भले ही वह उसे प्रकट न करे पर उसकी वाणी तथा व्यवहार अवश्य ही नकारात्मक रूप से परिलक्षित होती है।

            कहने का अभिप्राय यह है कि हम प्रतिदिन जो काम करते हैं या लोगों हमारे लिये काम करते हैं वह कहीं न कहीं अभौतिक तथा अदृश्यव्य क्रियाओं से प्रभावित होती हैं। इसलिये कोई दृश्य सामने आने पर त्वरित प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करना चाहिए। हमें यह विचार करना चाहिए कि उस दृश्य के पीछे कौन कौन से तत्व हैं। व्यक्ति, वस्तु या स्थितियों से प्रभावित होकर ही कोई धटना हमारे सामने घटित होती है। जब हमें यह ज्ञान हो जायेगा तब हमारे व्यवहार में दृढ़ता आयेगी और हम अनावश्यक परिश्रम से बच सकते हैं। इतना ही नहीं किसी दृश्य के सामने होने पर जब हम उसका अध्ययन करते हैं तो उसके अतीत का स्वरूप भी हमारे अंतर्मन में प्रकट होता है। जब उसका अध्ययन करते हैं तो भविष्य का भी ज्ञान हो जाता है।         
         हम अपने साथ रहने वाले अनेक लोगों का व्यवहार देखते हैं पर उसका गहराई से अध्ययन नहीं करते। किसी व्यक्ति के मन में अगर पूर्वकाल में से दोष रहे हैं और वर्तमान में दिख रहे हैं तो मानना चाहिए कि भविष्य में भी उसकी मुक्ति नहीं है। ऐसे में उससे व्यवहार करते समय यह आशा कतई नहीं करना चाहिए कि वह आगे सुधर जायेगा। योग साधना और ध्यान से ऐसी सिद्धियां प्राप्त होती हैं जिनसे व्यक्ति स्वचालित ढंग से परिणाम तथा दृश्यों का अवलोकन करता है। अतः वह ऐसे लोगों से दूर हो जाता है जिनके भविष्य में सुधरने की आशा नहीं होती। जब हमारा कोई कार्य सफल नहीं होता तब हम भाग्य को दोष देते हैं जबकि हमें उस समय अपने दोषों और त्रुटियों पर विचार करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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