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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Friday, March 20, 2015

परीक्षा में छात्रों को अध्ययन की किताब लेने की छूट देकर ही नकल की बुराई से मुक्ति पायें-हिन्दी चिंत्तन लेख(pariksha meih adhyayan kee chhoot dekar hi nakal se mukti paayen-hindi thought article)




          बिहार में माध्यमिक मंडल की परीक्षा के दौरान नकल करने और कराने के जो दृश्य टीवी चैनलों पर देखने को मिले वह कम से कम हमें नहीं चौंकाते हैं। इसका कारण यह है कि यह समस्या उतनी ही पुरानी लगती है जितनी हमारी शिक्षा पद्धति।  मुख्य बात यह है कि हमारे यहां अध्ययन किताब से सर्वांगीण विकास के लिये कराया जाता है पर परीक्षा के समय केवल स्मरण शक्ति या कहें रटने की कला का ही परीक्षण होता है। हम कबीर, रहीम, तुलसी या मीरा के दोहों को कभी रटकर नहीं सुना पाये पर उनका अर्थ हमेशा ही दिमाग में बसा रहा।  कैसे? हम किसी को बुरा नहीं कहते क्योंकि  पता है कि जब अपनी बुराईयां ढूंढेगे तो सबसे बुरे स्वयं ही लगेंगे। अब यहां कबीर का ‘बुरा जो देख मैं चला’ वाला दोहा कहने की आवश्यकता नहीं लगती।  हम परीक्षा के समय जिस शब्द को रट लेते थे तो केवल इतना ही ध्यान रखते थे वह वैसे ही लिखें जैसा किताब में है-इस दबाव में उस शब्द के अर्थ का भाव रखना संभव नहीं था। एक तरह से किताब से संबंध शब्द रटने से अधिक था।  हिन्दी में लिखना तो हमने शैक्षणिक काल में प्रारंभ किया पर रहीम, कबीर, तुलसी और चाणक्य के संदेशों पर मंथन बहुत समय बाद प्रारंभ किया।  अध्ययन के दौरान कभी इन महानुभावों के प्रति सद्भाव दिमाग में नहीं आया क्योंकि वहां तो केवल इनके पवित्र शब्द रट कर लिखने थे।  समझ से उस परीक्षा का कोई संबंध नहीं था
          हमने अनेक लोगों को नकल करते देखा है।  अपने ही समकालीनों को अपने से कम योग्य छात्रों को अधिक नंबर पाते देखा है। इसमें कुछ किस्से तो ऐसे भी आये कि छात्रों ने किसी प्रश्न के उत्तर मेें दूसरे की नकल की और अपना रटा भूलना बेहतर समझा। बाद में पता चला कि उससे गलती हुई।  कुछ विद्वान तो यह तक कहते हैं कि इस तरह की स्मरण शक्ति की परीक्षा लेना ही व्यर्थ है वरन् इसकी बजाय परीक्षा के दौरान किताबें ले जाने की छूट छात्रों को दी जाये।  जब हमने देखा है कि नौकरी की परीक्षा के लिये अलग से परीक्षायें होती हैं और उसमें इस शिक्षा का कोई लाभ केवल प्रमाण पत्र के रूप में ही है तब छात्रों की स्मरण शक्ति की परीक्षा बेकार है।
          हमारा तो मानना है कि विद्यालयीन और महाविद्यालयीन शिक्षा तो केवल साक्षर और विद्वान बनाने के लिये ही समझा जाना चाहिये।  जब किताबें ले जाने की छूट होगी तब छात्र दूसरे दाव पैंच नहीं लगायेंगे।  यहां यह भी बता दें कि किताब के आधार पर भी प्रश्न के उत्तर ढूंढना तब ज्यादा कलात्मक हो जाता है जब विषय सामग्री में व्यापकता होती है।  सभी छात्र उत्तर एक जैसा लिखें यह संभव नहीं है। अलबत्ता प्रतिभावान छात्रों के सामने तब रट्टा लगाने का तनाव नहीं होगा और वह सामान्य छात्रों से अधिक बेहतर उत्तर लिख पायेंगे।  हमारा मानना है कि स्मरण शक्ति का प्रतिभा से अधिक संभव नहीं है। बल्कि जो ज्यादा प्रतिभावान होते हैं वह अपने शब्दों का रट्टा लगाने की बजाय उसके अर्थ तथा भाव से ज्यादा संबंध स्थापित कर लेते हैं।
          इस सुझाव का विरोध शिक्षा व्यवसाय से जुड़े लोग अवश्य करेंगे क्योंकि तब ट्यूशन और नकल का धंधा चौपट हो जायेगा-अनुमान है कि यह व्यवसाय भी हजारों करोड़ों का है।  व्यवसाय चौपट हो जायेगे तो उससे एक वह दो नंबर में धन कमाने वाले दलाल भी निष्क्रिय होंगे जो कि हमारे समाज में प्रतिष्ठित हैं।  इससे भी आगे हमारे यहां कुछ ऐसे उदारवादी विद्वान है जो मानते हैं कि हर छात्र को नियमित शिक्षा देकर बिना परीक्षा ही उपाधि देना चाहिये क्योंकि उससे होना जाना कुछ नहीं है।  नौकरी के लिये अलग से परीक्षायें होती हैं-अनेक विद्वान तो वहां भी किताबें ले जाने की छूट देने की बात करते हैं-क्योंकि वह मानते हैं कि अनेक नकल कर पास होने वाले छात्र किताब पास होने पर सारी चौकड़ी भूल ही जायेंगे। ले देकर मुर्गे की एक ही टांग!  इससे शैक्षणिक मध्यस्थों का व्यवसाय चौपट आयेगा और अच्छे नंबर दिलाने के नाम छात्र और छात्राओं का शोषण संभव नहीं रहेगा-जिनके सहारे अनेक लोग अपनी समाज में छवि बनाये हुए हैं।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Friday, March 06, 2015

कभी कभी उपेक्षासन भी कर लिया करो-हिन्दी लघु व्यंग्य चिंत्तन(labhi kabhi upekshasan bhi kar liya karo-hindi short satire thought article)



            निर्भया बलात्कार कांड पर बनाये गये बीबीसी के लघुवृत्त चित्र पर इतना हंगामा मचना इस बात का प्रमाण है कि हमारे देश में लोगों में धैर्य के साथ किसी विषय पर चिंत्तन कर उस पर अपने विचार व्यक्त करने की प्रवृत्ति का अभाव है। इस लघुवृत्त चित्र के बारे में हम जैसे आम लोगों को जानकारी तभी मिली जब पर चारों तरफ हंगामा मचा।  इस हंगामे का यह परिणाम हुआ कि बीबीसी ने यह वृत्त चित्र निर्धारित तारीख से चार दिन पहले प्रसारित कर दिया।  प्रचार जगत में समय का महत्व होता है और चार दिन पूर्व प्रसारण की यह प्रेरणा भारत में मचे हंगामें से बीबीसी को मिली।  हमारे यहां का हंगामा एक तरह से इसी वृत्त चित्र के लिये अधिक दर्शक जुटाने में एक विज्ञापन की तरह मददगार हुआ।
            इससे पहले ही भी एक मुंबईया फिल्म में कथित रूप से हिन्दू धर्म के कथित अपमान को लेकर बवाल मचा।  उसमें भी हंगामाकार उसके लिये दर्शक जुटाने में सहायक हुए।  इन दोनों प्रकरणों में हमारे जैसे स्वतंत्र और मौलिक चिंतक मानते हैं कि हंगामा नहीं होता तो बीबीसी का वृत्त चित्र और कथित मुंबईया फिल्म एक तरह से फ्लाप शो साबित होते।  हमारी चिंत्ता इस बात की नही है कि प्रचार माध्यम इस तरह की योजना बनाते होंगे जिससे आमजन फंस जाता है बल्कि जिस तरह भारत में  संस्थागत आधार पर ऐसे विवादों में विज्ञापन का काम होता दिखता है वह परेशानी का कारण है।  टीवी चैनल अपना विज्ञापन का समय पास करने के लिये भले ही इस तरह तरह के तयशुदा आयोजन करें।  उन पर कहना बेकार है पर जिस तरह अनेक सामाजिक तथा धार्मिक संस्थायें अपने साथ की भीड़ चौराहों पर लाकर उनकी सहायक बनती हैं वह दुःख से अधिक गुस्से का कारण बनता है।
            इस पर अधिक लिखने से कोई फायदा नहीं है पर हमारी सलाह है कि कभी कभी उपेक्षासन भी कर लिया करो।  कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उपेक्षासन करने का सिद्धांत है। अपनी बहिन रुकमणी हरण के समय भगवान श्रीकृष्ण के साथ युद्ध में पराजित होने पर रुक्मा ने यही आसन किया था।  हमारे यहां का मनोरंजन क्षेत्र अजेय है। उसे अंदर बाहर से हर की शक्ति प्राप्त है।  इस पेशे में लोग विवाद के माध्यम से अपनी विक्रय सामग्री के लिये ग्राहक जुटाते हैं। उन्हें हराना कठिन है।  क्रुद्ध होकर हम उनके कटाक्षों पर टिप्पणियां या प्रदर्शन कर उनके ही जाल में फंसते हैं।  न उनके वृत्त चित्र रुकते हैं न फिल्म बंद होती है।  कभी कभी तो हंगामा बचने से  नवधानाढ्य तथा मनोरंजन के भूखे लोग बिना सोचे समझे दर्शक बनकर उन्हें हिट बनाते हैं।  विरोधी लोग  क्रुद्ध होकर अपना खून जलाते हैं पर नतीजा वही ढाक के तीन पात!  हमारे यहां  अनेक कथित ज्ञानी हैं जो दावा करते हैं कि उन्हें भारतीय ग्रंथों का पूरा ज्ञान है पर जिस तरह सतही विषयों पर भडकते हैं उससे नहीं लगता कि उनका दावा सही है।  हमारी उनको भी सलाह है कि वह कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा चाणक्य नीति का अध्ययन करना चाहिये।  हमारा मानना है कि मौन की तरह उपेक्षासन भी काम का विषय है।  जिन विवादों में हार निश्चित है वहां से मुंह फेर लेना चाहिये।
          

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Tuesday, February 17, 2015

भगवान शिव तो सत्य मार्ग पर विराजते हैं-महाशिवरात्रि पर विशेष हिन्दी लेख(bhagawan shiv to satya marga par virajte hain-A Special hindi article on mahashivratri)



         आज पूरे देश में महाशिवरात्रि का पर्व बड़े उल्लास से मनाया जा रहा है।  हमारे प्राचीन ग्रंथों में भगवान शिव की अनेक लीलायें वर्णित हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में ब्रह्म के तीन रूप मान गये हैं-ब्रह्मा जन्म, विष्णु धारण-पालन तथा शिव या रुद्र सहंार के प्रतीक माने गये हैं।  हर मनुष्य में मृत्यु या संहार का भय रहता ही है इसलिये रुद्र या शिव के प्रति भी अनेक लोग अपनी श्रद्धा इस आशा से प्रकट करते हैं कि वह हमेशा प्र्रसन्न रहे।  वैसे भी उन्हें अत्यंत भोला माना जाता है जो नाम स्मरण से कृपा करने वाले हैं।
            धारणा तथा पालन के रूप भगवान विष्णु के अनेक अवतार माने जाते हैं पर भगवान शिव का एक ही रूप रहां है। यह अलग बात है कि हमारे यहां कथित अनेक बाबा उनके अवतार होने का दावा करते हैं। सबसे बड़ी महत्वपूर्ण बात यह कि हमने कहीं भी यह नहीं पढ़ा कि भगवान शिवजी भांग या नशे का सेवन करते थे जबकि देखा यह जाता है कि अनेक व्यसनी लोग तंबाकू, शराब, भांग, अफीम या मादक द्रव्य पदार्थों का सेवन करते हुए भगवान शिव का संदर्भ मजाक में देकर अपने को सही साबित करने का प्रयास करते हैं।  इतना ही नहीं कुछ लोग मादक पदार्थों के सेवन मदहोश होकर ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि कोई विशिष्ट व्यक्तित्व के स्वामी हों।  पतंजलि योग साहित्य में औषधि से समाधि की बात कही गयी है यह सत्य है पर उसे कोई श्रेष्ठ नहीं कहा गया है।  श्रीमद्भागवत गीता और पतंजलि योग में किसी वस्तु, विषय या व्यक्ति को अच्छा या बुरा नहीं कहा गया है। इनमें तो इतना बताया गया है कि किसी भी कर्म की प्रकृत्ति के अनुसार परिणाम होता है, तय तो यह हमें करना है कि वह हमारे अनुकूल है या नहीं।  औषधियों का निंरतर सेवन दैहिक, मानसिक और वैचारिक से विकृतियां लाता है यह अंतिम सत्य है।  इसलिये व्यसनी धर्म के ठेकेदारों से परे ही रहना चाहिये।
            ब्रह्मा जन्म, विष्णु कर्म तथा शिव मोक्ष के रूप हैं।  हम प्रतिदिन इनके प्रभाव में रहते हैं।  प्रातः धर्म, दोपहर धर्म, सांय काम या मनोरंजन तथा रात्रि मोक्ष के लिये बनी है।  अगर हम यह चाहते हैं कि रात्रि को निद्रा सहजता से आये तो यह आवश्यक है कि हम पूरे दिन ऐसे काम करें जो हमारे अनुकूल परिणाम देने वाले हों। शिव सत्य का प्रतीक माना जाता है।  सात्विक लोगों को सत्य ही प्रिय होता है।  ऐसा नहीं है कि अध्यात्मिक ज्ञानी या सात्विक लोग सांसरिक विषयों को त्याग देते हैं वरन् वह उसमें पूर्ण लिप्तता का त्याग करते हैं।  अपनी भौतिक, सामाजिक तथा भौतिक उपलब्धियों को अपने मन पर सवार नहीं होते।  न ही भगवान के किसी भी रूप की आराधना से कोई भौतिक सफलता की आशा करते हैं।  उनका आशय पूजा या आराधना करन अपने मन की शुद्धि करना होता है। ही शुद्धि सत्य मार्ग पर ले जाती है जहां भगवान शिव विराजमान रहते हैं। 
       इस महाशिवरात्रि पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों, पाठकों तथा फेसबुक सहयोगियेां को हार्दिक बधाई।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, February 07, 2015

धन्य है वह लोग जो निष्कामभाव से समाज सेवा करते हैं-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(dhanaya hain vah log jo nishkam bhav se samaj sewa kanrte hain-A Hindu hindi religion thought based on bhartrihari neeti shatak)




            आज के विज्ञापन युग में प्रचार माध्यम पैसा लेकर अनेक प्रतिष्ठित लोगों को देवता बना देते हैं।  इतना ही नहीं अब तो ऐसे कथित स्वयंभू समाजसेवी हो गये हैं जो धनिकों से चंदा लेकर गरीब तथा बेसहारा लोगों में दानवीर बन जाते हैं।  देश में अनेक अशासकीय स्वयंसेवी संगठन बन गये हैं जिनके शीर्ष पुरुष यह दावा करते हैं कि वह निष्काम भाव से समाज सेवा कर रहे हैं।  यह अलग बात है कि वह समाज सेवा के लिये प्राप्त धन से ही अपने गृह खर्च चलाते हैं। उससे ही समाज सेवा के लिये  यात्रायें करते हैं।  अपनी जेब से पैसा निकालकर खर्च करने की बात तो वह स्वयं  कहते भी नहीं है जो कि वास्तव में निष्काम भावी होने का प्रमाण होता है।  अगर हम ऐसे समाजसेवी संगठनों की संख्या देखें तो हमारे देश में गरीबो, मरीजों तथा बेसहारा लोगों की संख्या नगण्य रहना चाहिये पर आंकड़े इस को प्रमाणित नहीं करते। 

भर्तृहरि नीति शतक

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किं तेन हेमगिरिणा रजतांद्रिणा वा यत्राश्रिताश्च तरवस्तरवस्त एव।

मन्यामहे मलयमेव यदाश्रवेणा कङ्कोलनिन्बकुटजा अपि चन्दनाः स्यूः।।



            हिन्दी में भावार्थ-उस स्वर्ण पर्वत सुमेरु और रजत पर्वत हिमालय से भी क्या लाभ जहां के पेड़ तो पेड़  रहते है। हम तो उस मलय पेड़ को महान मानते हैं जिसके आश्रय में रहने वाले कंकोल, नीम और कुटज आदि वृक्ष चंदनमय हो जाते हैं।

            भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में अंधविश्वासों का कोई स्थान नहीं है यह अलग बात है कि पेशेवर धार्मिक ठेकेदारों ने कर्मकांडों के नाम पर अनेक प्रकार के अंधविश्वास समाज में स्थापित कर दिये हैं जिसे लोग चाहे अनचाहे उनका बोझ ढोते हैं।  इन अंधविश्वासों के विरुद्ध अनेक कथित विद्वान अभियान भी छेड़ देते हैं पर उनका प्रभाव इसलिये नहीं होता क्योंकि वह भारतीय अध्यात्म के तत्वज्ञान का अध्ययन नहीं करते।  उन्हें लगता है कि केवल नारे लगाने से लोग उनकी बात मान लेंगे।  ऐसे लोग भी अपने अभियान के लिये चंदा लेते हैं।  हमारी दृष्टि में तो अगर अंधविश्वास समाप्त करना है तो सत्य का विश्वास कायम करना चाहिये पर यह भी निश्चित है कि पेशेवर लोगों के लिये समाज में भावनात्मक परिवर्तन लाना सहज नहीं है।  भावनात्मक परिवर्तन के लिये हार्दिक प्रयास आवश्यक हैं जिसे आर्य अर्जन की भावना होने पर सहजता से नहीं किया जा सकता।
            ऐसे में धन्य है वह लोग जो प्रचार से परे होकर समाज में न केवल निष्काम भाव से सेवा करते हैं वरन् हार्दिक भाव से उनमें ज्ञान का प्रचार करते हैं।  इन्हीं लोगों की वजह से आज भी भारतीय समाज की पहचान विश्व में बनी हुई है।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Tuesday, January 13, 2015

साधक ज्ञान के पर्वत पर चढ़कर अज्ञानियों पर हंसता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(sadhak gyan ke parvat par chadhkar agyaniyon ko hansta hai-hindi chinntan article)



            इस संसार में योग सभी कर रहे हैं-कोई स्वेच्छा से सहज योग में तल्लीन है  तो कोई परवश असहज योग में फंसा है। आम तौर से योग साधक और सामान्य जन में अंतर नहीं दिखता पर तत्वज्ञान होने पर इसका आभास स्वाभाविक रूप से होता है।  नित्य प्रतिदिन योग साधक अपने अभ्यास से जैसे जैसे प्रवीण होते हैं उन्हें लगने लगता है कि उनके सपंर्क में आने वाले लोग उनकी अपेक्षा कुछ भिन्न हैं।  कभी कभी योग साधकों को अपने अंदर सहजता का भाव यह विचार उत्पन्न होने सताने लगता है कि उनके मस्तिष्क में सांसरिक विषयों के प्रति वैसी रुचि नहीं है जैसे सामान्यजनों में प्रकट दिखती है।
            इसलिये योग साधकों को श्रीमद्भागवत गीता का भी अध्ययन कर तत्वज्ञान प्राप्त करना चाहिये।  मनुष्य देह त्रिगुणात्मक माया के बंधन में है।  इस देह में स्थित बुद्धि और मन बाह्य विषयों से प्रभावित होकर कार्य करती है।  इसलिये देह स्वामी बाह्य विषयों, वस्तुओं और व्यक्तियों से अपने स्वार्थ भाव होने से बाध्य होकर जुड़ता है।  यह असहज योग की स्थिति है जो प्रारंभ में उसे अमृत तुल्य लगती है मगर कालंातर में उसका प्रभाव विषैला ही रहता है।  इसके विपरीत योग साधक अभ्यास करते हुए बौद्धिक प्रवीणता होने पर बाह्य विषयों के उचित अनुचित का भेद करने के बाद  अपनी सामान्य आवश्यकता पूर्ति होने तक ही उनसे जुड़कर अपना काम निकलने के  बाद में विरक्त हो जाता है। योग साधक  किसी एक वस्तु, विषय और व्यक्ति से जुड़कर अपना संपूर्ण जीवन दाव पर नहीं लगाता।

पतंजलि योग सूत्र में कहा गया है

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निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसाद।



            हिन्दी में भावार्थ- विचार के अभाव रखने की प्रवीणता अध्यात्म का प्रसाद होता है।

महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि

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प्रज्ञाप्रासादमारुह्यशोच्यः शोचतो जनान्।

भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति।।

            हिन्दी में भावार्थ-ज्ञान के प्रसाद पर चढ़कर विषयों में आसक्ति से रहित विद्वान सांसरिक विषयों में कष्ट भोग रहे सामान्य जनों को ऐसे ही देखता है जैसे पहाड़ पर चढ़ने वाला नीचे चल रहे लोगों को देखता है।

            जैसे जैसे योग साधक अभ्यास करता है वैसे वैसे उसे सामान्य जनों के अनेक कार्य अज्ञान से किये गये लगते हैं। योगाभ्यास और अध्ययन से जुड़ने पर मनुष्य को ज्ञान रूपी जो प्रसाद मिलता है वह अनुपम हैं।  उसके अंतर्चक्षु इस तरह खुल जाते हैं कि उसे अच्छे और बुरे की पहचान करने में अधिक समय नष्ट नहीं करना पड़ता।  किसी कार्य के परिणाम का वह पहले ही अनुमान कर लेता है न कि फल के अच्छे होने की कामना लेकर जीवन के युद्ध में बिना किसी योजना के उतरकर कष्ट उठाता है। इतना ही नहीं वह अंधेरे में तीर चलाने वालों को देखकर हंसता भी है। हम आजकल समाज में मानसिक, शारीरिक तथा वैचारिक दृष्टि से विकारों से युक्त लोगों की बढ़ती संख्या देखकर यह अनुमान कर सकते हैं कि लोगों ने मन बुद्धि और विचार भौतिकवाद के पास गिरवी रख दिये हैं।  वह बाहर से सुख अंदर आने की कामना करते हैं जबकि ज्ञानी जानते हैं सुख एक अनुभूति है जिसे हाथ से पकड़ा नहीं जा सकता।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Thursday, January 08, 2015

आस्था के नाम पर धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध अभियान को पूर्ण स्वतंत्रता होना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन लेख(astha ke naam par dharmik kattarta ke viruddh abhiyan ko poorn swatantrata hona chahiye-hindi thought article)





            फ्रांस में शार्ली हेब्दो पत्रिका पर हमले से मध्य एशिया के उन्मादी समूहों को बरसों तक प्रचारात्मक ऊर्जा मिलेगी।  पहले यह ऊर्जा सलमान रुशदी की पुस्तक के बाद उन पर ईरान के एक धार्मिक नेता खुमैनी के फतवे से मिली थी।  इसके बाद मध्य एशिया का धार्मिक उन्माद बढ़ता ही गया।  वह धार्मिक नेता बरसों तक अमेरिका में रहा और उसी ने ही ईरान की राजशाही के बाद धार्मिक ठेकेदार होने के साथ ही वहां के शासन को भी अपने हाथ में ले लिया। प्रत्यक्ष अमेरिका का खुमैनी से कोई संबंध नहीं दिखता था मगर उसके नेतृत्व में उस समय ईरान में राजशाही के विरुद्ध चल रहे लोकतात्रिक आंदोलन से उसकी सहमति थी। राजशाही के पतन के बाद वहां खुमैनी के धार्मिक नेतृत्व में बनी सरकार कट्टरपंथी ही थी। दिखाने के लिये अमेरिका ने ईरान में लोकतंत्र स्थापित किया पर सच यह है कि वहां एक उस व्यक्ति को सत्ता मिली जो बाद में उसका   दुश्मन बना।
            धार्मिक उन्मादी प्रचार के भूखे होते हैं।  जिस तरह चार्ली हेब्दों के कार्टूनिस्टों की हत्या हुई है वह मध्य एशिया के धर्म की ताकत बनाये रखने के लिये की गयी है जो केवल प्रचार से मिलती है।     इस धार्मिक उन्माद का सामना करने के लिये पूरे विश्व में धार्मिक आस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक ही रूप रखना चाहिये।  यह नहीं हो सकता कि एक देश में आस्था के नाम पर किसी धर्म पर कटाक्ष अपराध तो किसी में एक सामान्य प्रक्रिया मानना चाहिये।  हमारे देश में स्थिति यह है कि भारतीय धर्मोंे पर आक्रमण तो एक सामान्य प्रक्रिया और दूसरे धर्म पर कटाक्ष अपराध मानने की प्रचारजीवियों की प्रवृत्ति हो गयी है।  समस्या यह है कि भारतीय धर्म के ठेकेदार भी कर्मकांडों के ही संरक्षक होते हैं और अध्यात्मिक ज्ञान को एक फालतू विषय मानते हैं।  अध्यात्मिक ज्ञानी अंतर्मुखी होते हैं इसलिये कटाक्ष की परवाह नहीं करते कर्मकांडियों बहिर्मुखी होने के कारण चिंत्तन प्रक्रिया से पर होते इसलिये कटाक्ष सहन नहीं कर पाते।  हमारा तो यह मानना है कि विदेशी विचाराधाराओं के मूल तत्वों पर कसकर टिप्पणी हो सकती है और सहज मानव जीवन के लिये  भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा पर चलने के अलावा कोई विकल्प हो ही नहीं सकता, पर यह ऐसी सोच संकीर्ण मानसिकता की मानी जाती है।  हम इस पर बहस कर सकते हैं और कोई कटाक्ष करे तो उसका शाब्दिक प्रतिरोध भी हो सकता है पर कर्मकांडी किसी कटाक्ष को सहन नहीं करना चाहते। वह बहस में किसी अध्यात्मिक ज्ञानी का नेतृत्व स्वीकार नहीं कर सकते। इसलिये चिल्लाते हैं ताकि शोर हो जिससे वह प्रचार प्रचार पायें।
            फ्रांस की चार्ली हेब्दो पत्रिका पर हमले को सामान्य समझना उसी तरह भूल होगी जैसे सलमान रुशदी की किताब पर ईरान के धार्मिक तानाशाह खुमैनी के उनके खिलाफ मौत की फतवे को मानकर की गयी थी। शिया बाहुल्य होने के कारण ईरान के वर्तमान शासक  मध्य एशिया में प्रभावी गुट के विरोधी हैं पर वह इस हत्याकांड की निंदा नहीं करेंगे क्योंकि कथित धार्मिक आस्था पर आक्रमण पर स्वयं ही हिंसक कार्यवाहियों के समर्थक हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि इस विषय पर मध्य एशिया की विचारधारा पर बने सभी समूह वैचारिक रूप से एक धरातल पर खड़ मिलेंगे।
            इनका प्रतिकार वैचारिक आक्रमण से किया जा सकता है पर अलग अलग देशों  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नियमों में विविधिता है। जहां आस्था के नाम पर छूट है वहां बहस की गुंजायश कम रह जाती है। इसलिये फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों के बुद्धिमान सीधे धार्मिक अंधवश्विास पर आक्रमण करते हैं जबकि एशियाई देशों में  दबी जुबान से यह काम होता है। भारत में तो यह संभव ही नहीं है।  आज भी हमारे देश के बुद्धिजीवी दिवंगत कार्टूनिस्टों की मौत पर सामान्य शोक जरूर जता रहे हैं पर अपने यहां आस्था के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी सीमित रखने का विरोध नहीं कर रहे। शायद उनके लियं यहां भारतीय धर्मों में ही दोष हैं जिन पर गाह बगाहे वह हंसते ही हैं।  कट्टर धार्मिक विचाराधाराओं के विरुद्ध वैचारिक अभियान में पश्चिमी देशों का अनुसरण हमारे देश के बुद्धिजीवी करना ही नहीं चाहते। संभवत भारतीय प्रचार माध्यम सनसनी के सतही आर्थिक लाभ से संतुष्ट हैं और चाहते हैं कि यहां वैचारिक जड़ता बनी रहे।
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Thursday, December 25, 2014

उत्तम राज्य प्रबंध से ही धर्म की रक्षा संभव-सुशासन पर विशेष हिन्दी लेख(uttam rajya prabandh se hi raksha sambhav-special hindi article on sushasan diwas,good governes for people




            आज 25 दिसम्बर 2014 श्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म दिन सुशासन दिवस में रूप में मनाया जा रहा है। हमारे देश में आज राज्य व्यवस्थाओं में राम राज्य की कल्पना के साकार प्रकट होने की अपेक्षा की जाती है। यह तो पता नहीं कि हमारे देश के धाार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विषयों के विशेषज्ञ सुशासन के स्वरूप और महत्व से क्या आशय लेते हैं, पर हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार शासन की व्यवस्था ही सतयुग और कलियुग की स्थिति  परिभाषित करती है।  हमारे महान विद्वान चाणक्य जी का कहना है कि राज्य के अच्छे बुरे प्रबंध से  ही प्रजा में सतयुग और कलियुग का भाव निर्मित होता है। हमारा देश बौद्धिक रूप से तत्वज्ञान के भंडार की वजह से विश्व का अध्यात्मिक गुरु माना जाता है और उसके अनुसार भी मनुष्य की दैनिक आवश्यकतायें भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती इसलिये राजधर्म में स्थित लोगोें  यह दायित्व होता है कि वह प्रजा के प्रति हमेशा सजग रहें।  हमारे यहां धर्म से आशय अच्छे व्यवहार तथा अपने कर्म का निर्वाह करने से ही है।
            हमारे यहां भगवान विष्णु के अनेक अवतार माने जाते हैं उनमें भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की चर्चा सबसे अधिक होती है।  इसका कारण यह है कि उन्होंने न केवल अध्यात्मिक रूप से समाज को संदेश दिया वरन् सांसरिक विषयों मेें भी नैतिक सिद्धांतों से कार्य करने की प्रेरणा दी।  दोनों ने ही राजधर्म का निर्वाह किया। भगवान विष्णु भी पालनहार होने की वजह से भारतीय समाज में सक्रिय इष्ट का सम्मान पाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन केवल भगवान की आराधना के लिये ही प्रेरित नहीं करता वरन् सांसरिक विषयों में भी सिद्धांतों के पालन की बात कहता है।  हमारे यहां कर्म ही धर्म माना जाता है। यही कारण है कि राज धर्म का महत्व अत्यंत बढ़ जाता है।
            हमारे यहां अभी धर्मांतरण पर बहस चल रही है।  एक प्रश्न आता है कि हमारे यहां इतने लोग धर्मांतरण क्यों कर गये? इतिहास बताता है कि मध्य युग में हमारे यहां के राजा अपने कर्तव्य से विमुख हो गये। उनके परस्पर संबंध कटु रहे।  प्रजा के प्रति उनके असंतोष का परिणाम ही रहा है कि लोग विदेशी शासकों के प्रति भी सद्भावना दिखाते रहे। हमने देखा होगा कि अनेक पुराने लोग आज भी कहते हैं कि अंग्रेजों का राज्य आज की अपेक्षा अच्छा था।  हमारे यहां विदेशी विचाराधारा और शासन के प्रति यह मोह अपने राज्य प्रबंधकों के कुशासन से उत्पन्न निराशा की वजह से विद्रोह के रूप में परिवर्तित होता रहा।  यह विद्रोह की प्रवृत्ति इतनी रही कि राज्य प्रबंधक के इष्ट और पूजा पद्धति से प्रथक जाकर समाज में अलग पहचान दिखने की प्रेरक बन गयी।
            अध्यात्मिक ज्ञान के अभ्यास से हमारी समझ तो यह बनी है कि संसार में जितने भी कथित संज्ञाधारी धर्म बने हैं वह राज्य के प्रेरणा से बने हैं।  दरअसल ऐसे संज्ञाधारी धर्म भ्रम फैलाने के लिये ही प्रकट किये गये हैं ताकि पूजा पद्धति के माध्यम से लोगों में आपसी संघर्ष कराकर राज्य प्रबंध की नाकामियों से उनका ध्यान हटाया जाये।  हमारे देश में धर्म से आशय कर्म तथा व्यवहार से है। किसी भी प्राचीन ग्रंथ में धर्म का कोई नाम नहीं है।  अच्छा राजा भगवान का दूसरा  रूप माना गया है। इसके विपरीत विदेशी विचारधाराओं के शीर्ष पुरुषं पूजा पद्धतियों से नये लोग जोड़कर अपने समाज को यह जताते रहे है कि वह अपने कथित धर्म को ही श्रेष्ठ माने। यही कारण है कि आज विदेशों में धर्म के नाम पर संघर्ष आज भी जारी है।
            हमारे यहां राजधर्म बृहद धर्म का ही एक उपभाग माना जाता है।  राजधर्म में स्थित लोग अगर अपने कर्म का निर्वाह उचित रूप से करें तो प्रजा में उनकी छवि अच्छी बन सकती है।  धर्म की रक्षा में मध्यम वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है पर हम देख रहे हैं कि वह अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है। धनिक वर्ग अपनी प्रभुता के मोह तथा अहकार में तल्लीन है।  निम्म वर्ग के लिये भी हर पल संकट मुंह बायें रहता है। हमारा मानना है कि हमारे यहां इस समय संकट इसलिये अधिक क्योंकि समाज को स्थिर रखने वाला मध्यम वर्ग स्वयं ही अस्थिर हो गया है।  हमारा यह भी मानना है कि राज्य प्रबंध सुशासन का रूप ले तो हमारे देश में विदेशी विचारधाराओं के साथ उनके प्रवाह के लिये लालायित लोगों का प्रभाव स्वतः कम हो जायेगा तब किसी अन्य प्रयास की आवश्यकता नहीं होगी। अगर इस प्रयास में कमी रहेगी तो बाकी अन्य प्रयास न केवल विवाद खड़े करेंगे बल्कि मजाक भी बनेगा।
            माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनके जन्म दिन पर बधाई।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Saturday, December 20, 2014

दूसरे को सुधारने की बजाय स्वयं सुधरें-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(doosron ko sudharne ki bajay swayan sudhren-A Hindu hindi religion article)



            जब राज्य समाज या धार्मिक विषय पर नियंत्रण करता है तब क्या स्थिति होती है यह अब विश्व में व्याप्त आतंकवाद के रूप में देख सकते हैं।  विश्व में राज्य कर्म का निर्वाह करने वालों में सामर्थ्य का अभाव होता है और वह अपना पद बचाये रखने के लिये लोगों को धर्म के आधार पर नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं।  अनेक स्थानों पर आधुनिक  राज्य व्यवस्थाओं में अपात्रों का प्रवेश हो गया है। धन, बल और चतुराई से राजपद पाने वालों को राजनीति के जनहित सिद्धांत का ज्ञान ही नहीं होता। इस विश्व के 180 देशों में साठ से अधिक देश धर्म आधारित होने का दावा करते हैं और इन्हीं देशों में हिंसक वातावरण बना हुआ है। इन देशों में धर्म के नाम पर जो ध्ंाधा चल रहा है उससे पूरा विश्व आतंकवाद की चपेट में है। इनकी विचारधारा की दृष्टि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन मूर्तिपूजा समर्थक है इसलिये अवांछनीय है जबकि इन्हीं देशों में सर्वशक्तिमान के नाम पर सबसे अधिक पाखंड है।
            हमारे देश में भारतीय समाज में अनेक विरोधाभास है पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के प्रभाव के चलते यहां हिंसक द्वंद्व अधिक नहीं होते। हमारे भारतीय धर्म की रक्षा का दावा अनेक  लोग तथा उनके समूह करते हैं पर सत्य यह है कि वह भारत में व्याप्त भ्रमों के निवारण का प्रयास नहीं करते। अक्सर कहा जाता है कि भारत में दूसरे देशों की जनता से अधिक सोना है।  यह हैरानी की बात है कि कथित बहुमूल्य धातुऐं भी पत्थर समान है यह बात कोई नहीं समझता।  प्रकृति ने हमें अन्य देशों की अपेक्षा अधिक संपन्न बनाया है पर उसके जल और अन्न को मूल्यवान मानने की बजाय सोना और हीरा पर  अपना हृदय न्यौछावर करते हैं।  विवाह और शोक के अवसर पर धन खर्च कर कथित सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का ऐसा प्रयास करते हैं जिसका कोई तार्किक आधार नहीं होता।
चाणक्य नीति में कहा गया है
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पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
मूढैं: पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।
            हिन्दी में भावार्थ-इस धरती पर जल, अन्न और मधुर वचन यह तीन प्रकार के ही रत्न हैं मूर्ख लोग पत्थरों को रत्न कहते हैं।
            हमारे यहां जाति के आधार पर बहुत वैमनस्य रहा है।  यही कारण है कि हमारे यहां विदेशी धार्मिक विचाराधाराओं ने पदार्पण किया।  यहां अल्प धनिक, श्रमिक तथा निम्न वर्ण के लोगों को अपमानित करने की भयंकर प्रवृत्ति है। दूसरे के  दोषों पर कठाक्ष कर अपनी योग्यता प्रमाणित करने का प्रयास सभी करते हैं पर किसी की प्रशंसा करने का मन किसी का नहीं करता। हमारा मानना तो यह है कि  विदेशी धार्मिक विचाराधारा के धारकों  पर टिप्पणियां करने या उनमें सद्भाव पैदा करने के प्रयासों से अच्छा है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन पर चलने वाले समाजों में मानसिक शक्ति का प्रवाह करें।  हम दूसरे को सुधारने की बजाय स्वयं दृढ़ पथ का अनुसरण करें।  यह पथ उपभोग के शिखर पर पहुंचकर पताका फहराने वाला नहीं वरन् त्याग का है।  जहां विदेशी धार्मिक विचाराधारायें मनुष्य, प्रकृत्ति तथा अध्यात्मिक ज्ञान से परे हैं वहीं हमारा दर्शन तत्वज्ञान का ऐसा भंडार है जिसे कोई प्राप्त कर ले तो उसका जीवन धन्य हो जाये।  विदेशी विचाराधाराऐं मनुष्य की पहचान एक छतरी के नीचे दिखाना चाहती हैं पर प्रकृति तथा जीव विज्ञान विविधताओं के आधार पर सृष्टि की जानकारी देता है।  हर जीवन का स्वभाव, रहन सहन तथा आचार विचार धरती पर  अलग अलग समय पर सक्रिय भिन्न भिन्न तत्वों से संपर्क होने से बदलता रहता है। सभी मनुष्य एक जैसे  नहीं हो सकते और सभी समय एक जैसे भी नहीं हो सकते।
            अतः जहां तक हो सके देश के साधु, संतो, बुद्धिमानो तथा समाज सुधारक अपने समाज में ज्ञान चक्षु खोलने का काम करें।  यही सच्चा धर्म ज्ञानियों का है।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Sunday, December 07, 2014

योग के आठ भागों में चरम शिखर है समाधि-हिन्दी चिंत्तन लेख(yog ka aath bhagon mein charam shikhar hai samadhi-hindi thought article)



            पतंजलि योग साहित्य के अनुसार सात भागों से गुजरने के बाद आठवां और अंतिम भाग समाधि है। योग के विषय के व्यापक संदर्भों में पतंजलि योग साहित्य ही एकमात्र प्रमाणिक सामग्री प्रदान करता है।  हमने कथित रूप से अनेक लोगों से सुना है कि अमुक गुरु समाधि में प्रवीण थे या अमुक संत को इस विषय में विशेषज्ञता प्राप्त है।  अनेक लोग तो कहते हैं कि हिमालय की कंदराओं में कई ऐसे योगी है जो समाधि में दक्ष हैं।  जब हम पतंजलि योग साहित्य का अध्ययन करते हैं तो लगता है कि इस तरह की बातें केवल प्रमाणिक नहीं है।  समाधि योग का चरम शिखर है।  एक तरह से योग साधना की आहुति समाधि ही है।
            ऐसे में अनेक प्रश्न दिमाग में आते हैं। हम जिन लोगों की समाधि विषयक योग्यता के बारे में सुना है उनकी बाकी सात भागों में सक्रियता की चर्चा नहीं होती।  आसन और प्राणायाम का भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है।  वैसे हम आसनों की बात करें तो अब अनेक प्रकार के व्यायाम भी इनके साथ वैज्ञानिक ढंग से इसलिये जोड़े गये हैं क्योंकि पहले समाज श्रम आधारित था पर अब सुविधा भोगी हो गया जिससे लोगों को दैहिक शुद्ध करायी जा सके।  यह व्यायाम रूपी आसान इसलिये वैज्ञानिक हैं क्योंकि इस दौरान सांसो के उतार चढ़ाव का-जिसे प्राणायाम भी कहा जाता है- अभ्यास भी कराया जाता है।  एक तरह से आसन और प्राणायाम का संयुक्त रूप बनाया गया है। पतंजलि योग में प्राणायाम में प्राण रोकने और छोड़ने का अभ्यास ही एक रूप माना गया है। आसन से आशय भी सुखासन, पद्मासन या वज्रासन पर बैठना है। बहुत सहज दिखने वाली आसन और प्राणायाम की प्रक्रिया तब बहुत कठिन हो जाती है जब मनुष्य के मन और देह पर भोग प्रभावी होते हैं। योगाभ्यास के  दौरान देह से पसीना निकलता ही जिससे देह के विकार बाहर आते हैं पर सवाल यह है कि इसे करते कितने लोग हैं? जिनके बारे में समाधि लगाने का दावा किया जाता है वह पतंजलि योग के कितने जानकार होते हैं यह पता ही नहीं लगता।
            यहां हम बता दें कि भक्ति के चरम को छूने वाले अनेक संतों ने तो योग साधना को भी बेकार की कवायद बताया है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन संतों ने भक्ति का शिखर अपने तप से पाया पर सच यह है कि वह भक्ति भी उसी तरह सभी के लिये कठिन है जैसे कि योग साधना।  दूसरी बात यह है कि इन महापुरुषों ने योग साहित्य का अध्ययन न कर केवल तत्कालीन समाज में ऐसे योगियों को देखा था जिनका स्वयं का ज्ञान अल्प था।  अगर इन महापुरुषों ने योग साधना का अध्ययन किया होता तो वह जान पाते कि जिस भक्ति के शिखर को उन्होंने पाया है वह समाधि का ही रूप है और कहीं न कहीं उन्होंने अनजाने में ही योग के आठों भागों को पार किया था।  योग साहित्य से इन महापुरुषों की अनभिज्ञता का प्रमाण यह है कि वह योग को तीव्र या धीमी गति से प्राणवायु को ग्रहण या त्यागने की प्रक्रिया  ही मानते थे जो कि योग साधना का केवल एक अंशमात्र है।  यह अलग बात है कि इन महापुरुषों के  कथनों को भक्ति की सर्वोपरिता बताने वाले आज के पेशेवर संत उन भक्तों के सामने दोहराकर वाहवाही लूटते हैं जो देह मन और बुद्धि के विकारों से ग्रसित हैं। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है।  जब वात, पित और कफ के कुपित से पीड़ित समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग हो तब हार्दिक भक्ति करने वाले मिल जायेंगे यह सोचना भी व्यर्थ है।
            हमने ऐसे लोग भी देखें हैं जो योग साधना प्रारंभ करते हैं तो कथित धार्मिक गुरू उन्हें ऐसा करने से रोक देते हैं।  अनेक गुरु तो यह कहते हैं कि योग साधना से कुछ नहीं होता। बीमारी दवा से जाती है और भगवान भक्ति से मिलते हैं।  यह प्रचार भयभीत और कमजोर लोगों के दिमाग की देन है।  मूलतः सभी जानते हैं योग साधना से व्यक्ति में एक नयी स्फूर्ति आने के साथ ही उसके मन मस्तिष्क में आत्मविश्वास पैदा होता है जिससे वह किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहता। इसलिये कायर और कमजोर लोग आलस्यवश न केवल स्वयं योग साधना से दूर रहते हैं बल्कि दूसरों में भी नकारात्मक भाव पैदा करते हैं।
            योग साधना की बातें सभी करते हैं पर महर्षि पतंजलि योग के सूत्रों का पढ़ने और समझने की समझ किसमें कितनी है यह तो विद्वान लोग ही बता सकते हैं।  हमारा एक अनुभव है कि जो नित्य योग साधना करते हैं उन्हें इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिये। जिस तरह आसना के समय सांसों के अभ्यास से दोनों काम होते हैं उसी तरह योग सूत्र पढ़ने पर हम उनसे होने वाले लाभों को पढ़कर अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि समाधि विषयक भ्रम दूर हो जाते हैं।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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