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Wednesday, April 14, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-धन की उष्मा से मनुष्य की प्रतिष्ठा बढ़ती है (Dhan aur pratishtha-hindi sandesh)

तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिप्रतिहता वचनं तदेव।
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुष क्षणेन सोऽप्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
एक जैसी इंद्रियां, एक जैसा नाम और काम, एक ही जैसी बुद्धि और वाणी पर फिर भी जब आदमी धन की गरमी से क्षण भर में रहित हो जाता है। इस धन की बहुत विचित्र महिमा है।
 यसयास्ति वित्तं स नरः कुलीन स पण्डित स श्रुतवान्गुणज्ञः।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः।
सर्वे गुणा कांचनमाश्रयन्ति।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस मनुष्य के पास माया का भंडार उसे ही कुलीन, ज्ञानी, गुणवान माना जाता है। वही आकर्षक है। स्पष्टतः सभी के गुणों का आंकलन उसके धन के आधार पर किया जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह समाज भर्तृहरि महाराज के समय में भी था और आज भी है। हम बेकार में परेशान होकर कहते हैं कि ‘आजकल का जमाना खराब हो गया है।’ सच बात तो यह है कि सामान्य मनुष्य की प्रवृत्तियां ही ऐसी है कि वह केवल भौतिक उपलब्धियां देखकर ही दूसरे के गुणों का आंकलन  करता है। इधर गुणवान मनुष्य अपने अंदर गुणों का संचय करते हुए इतना ज्ञानी हो जाता है कि वह इस बात को समझ लेता है कि उनसे ही उसके जीवन की रक्षा होगी। इसलिये वह समाज में प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिये कोई अधिक प्रयास नहीं करता। उधर अल्पज्ञानी और ढोंगी लोग थोड़ा पढ़लिखकर सामान्य व्यक्तियों के सामने अपनी चालाकियों के सहारे उन्हीं से धन वसूल कर प्रतिष्ठित भी हो जाते हैं। यह अलग बात है कि इतिहास हमेशा ही उन्हीं महान लोगों को अपने पन्नों में दर्ज करता है जिन्होंने अपने गुणों से वास्तव में समाज को प्रभावित किया जाता है।
इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर हमारे पास अधिक धन नहीं है तो इस बात की परवाह नहीं करना चाहिए। समाज के सामान्य लोगों की संकीर्ण मानसिकता का विचार करके अपने सम्मान और असम्मान की उपेक्षा कर देना चाहिए।  जिसके पास धन है उसे सभी मानेंगे। आप अच्छे लेखक, कवि, चित्रकार या कलाकार हैं पर उसकी अगर भौतिक उपलब्धि नहीं होती तो फिर सम्मान की आशा न करें। इतना ही नहीं अगर आप परोपकार के काम में लगे हैं तब भी यह आशा न करें  कि बिना दिखावे के आपका   कोई सम्मान करेगा। सम्मान या असम्मान ली  उपेक्षा करने के बाद आपके अंदर एक आत्मविश्वास पैदा होगा जिससे जीवन में अधिक आनंद प्राप्त कर सकेंगे। इस संसार में आम इंसानों से तो यह आशा भी नहीं करना चाहिए कि वह सम्मान देंगे। अगर आप धनवान, उच्च पदस्थ और बाहुबली नहीं हैं और सम्मान असम्मान के परे हैं तो अपने जीवन का आन्नद उठा सकते हैं वर्ना तो अपने अभावों पर रोते रहिये जिससे अपनी देह और मन को कष्ट देने के अलावा और कुछ नहीं मिलता।
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Friday, April 09, 2010

विदुर नीति-उपकार करे वही सच्चा बंधु (upkar kare vahi bandhu-hindi sandesh)

सा बन्धुर्योऽनुबंघाति हितऽर्ये वा हितादरः।
अनुरक्तं विरक्त वा तन्मिंत्रमुपकारि यत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
वही बंधु है जो हमारे उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होने के साथ आदर करने वाला हो। अनुरक्त हो या विरक्त पर उपकार आवश्यक करे वही सच्चा बंधु है।  


 मित्रं विचार्य बहुशो ज्ञातदोषं परित्येजेत्।
त्यंजन्नभूतेदोषं हि धर्मार्थावुपहन्ति हिं।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद कौटिल्य के अनुसार अपने मित्रों के बारे में विचार करना चाहिए। अगर उनमें छल कपट या अन्य दोष दिखाई दे तो उसे त्याग दें।  ऐसा न करने पर न केवल धर्म की हानि होती है बल्कि जीवन में कष्ट भी उठाना पड़ता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समय के साथ समाज में खुलापन आ रहा है और मित्र संग्रह में लोगों की लापरवाही का नतीजा यह है कि सभी जगह खुद के साथ धोखे की शिकायत करते हुए मिलते हैं।  इतना ही नहीं युवा पीढ़ी तो हर मिलने और बातचीत करने वाले को अपना मित्र समझ लेती है। मित्र के गुणों की पहचान कोई नहीं करता।

मित्र का सबसे बड़ा गुण है कि वह हर समय सहयोग के लिये तत्पर दिखता  हो। इसके अलावा वह अन्य लोगों के सामने अपमानित न करे और साथ ही समान विचारधारा वाला हो। स्वभाव के विपरीत होने पर या विचारों की भिन्नता वाले से अधिक समय तक मित्रता नहीं चलती अगर चलती है तो धर्म की हानि उठानी पड़ सकती है।   इसके अलावा मित्र वह है जो कहीं अपने मित्र की गुप्त बातों को कहीं उजागर न करता हो।  इतना ही नहीं मित्र का अन्य मित्रों का समूह और कुल भी अनुकूल होना चाहिये।   अगर वह केवल दिखावे की मित्रता करता है तो आपके वह रहस्य जो दूसरों के जानने योग्य नहीं है सभी को पता चल जाते हैं।  दूसरी बात यह है कि मित्र जब हमारे साथ होता है तब हमारा लगता है पर जब दूसरी जगह होता है तो दूसरों का होता है-यह विचार भी करना चाहिये।

कुछ लोग केवल स्वार्थ की वजह से मित्रता करते हैं-वैसे आजकल अधिकतर संख्या ऐसे ही लोगों की है-इस विचार करना चाहिऐ। एकांत में  हमेशा अपने मित्र समूह पर चिंतन करते हुए जिनमें दोष दिखता है या जिनकी मित्रता सतही प्रतीत होती है उनका त्याग कर देना चाहिये।
इसके अलावा निकट रहने पर मित्र के प्रति अपने भाव का अवलोकन भी उससे कुछ समय दूर रहकर करना चाहिये। निकट रहने पर उसके प्रति मोह रहता है इसलिये यह पता नहीं लगता कि उसकी नीयत क्या है? दूर रहने पर उससे मोह कम हो जाता है तब यह पता लगता है कि उसके प्रति हमारे मन में क्या है? इतना ही न अपने बच्चों के मित्रों और मिलने जुलने वालों पर भी दृष्टिपात करना चाहिये। आजकल काम की व्यस्तताओं की वजह  से माता पिता को अपने बच्चों की देखभाल का पूरी तरह अवसर नहीं मिल पाता इसलिये उनको बरगलाने की घटनायें बढ़ रही है।  ऐसा उन्हीं माता पिता के साथ होता है जो अपने बच्चों के मित्रों की यह सोचकर उपेक्षा कर देते हैं कि ‘वह क्या कर लेगा?’
कहने का तात्पर्य यह है कि अपने घर के सदस्यों के मित्रों पर दृष्टिपात करना चाहिये। अगर अपने मित्र दोषपूर्ण लगें तो उनसे दूरी बनायें और घर के सदस्यों के हों तो उन्हें इसके लिये प्रेरित करें।  मित्र के गलत होने पर धर्म की हानि अवश्य होती है। इसलिए हितेषियों को ही अपना मित्र समझना चाहिए
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Wednesday, February 17, 2010

संत कबीर के दोहे-धर्म का असली स्वरूप समझना जरूरी

संत शिरोमणि कबीरदास अपने समय के धार्मिक विवादों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि
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कहै हिन्दु मोहि राम पिआरा, तुरक कहे रहिमाना।
आपस में दोऊ लरि-लरि मुए, मरम न कोऊ जाना।।
एक तरफ भारतीय हैं जो कहते हैं कि हमें राम प्यारा है दूसरी तरफ तुर्क हैं जो कहते हैं कि हम तो रहीम के बंदे हैं। दोनों आपस में लड़कर एक दूसरे को तबाह कर देते हैं पर धर्म का मर्म नहीं जानते।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जैसा कि इतिहास गवाह है कि भारत पर विदेशी हमले हुए। शुरुआती दौर में हमलावर केवल धन के लिये आये पर बाद में उनको लगा कि यह देश सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है तो यहीं अपना स्थाई निवास बना लिया। उनका उद्देश्य यहां शासन करना था पर इसमें भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान शक्ति उनके लिये बाधा थी। वह आसानी शासन करते पर भारत में ऐसे लोगों की तादाद अधिक थी जो किसी के राजा होने की परवाह नहीं करते थे। उनके लिये भगवान के बाद राजा का नंबर आता था जबकि विदेशी शासक चाहते थे कि भगवान से पहले उनकी प्रतिष्ठा बने। इसलिये उन्होंने अपने साथ कथित रूप से धार्मिक संत भी रखे। इसके अलावा शासन के कार्यक्षेत्र का विस्तार किया जिससे कि यहां के लोगों के जनजीवन में राज्य का दखल अधिक हो। कुछ लोग कहते हैं कि विदेशी लोगों ने इस देश को सभ्य बनाया है-यह दावा हास्यास्पद है। दरअसल विदेशी लोगों ने राज्य का समाज के कार्यक्षेत्र में दखल बढ़ाया ही है। यही कारण है कि अनेक ऐसे क्षेत्र जहां राज्य का काम नहीं है वहां भी उसका विस्तार इस तरह हो गया जिससे समाज कमजोर हो गये हैं। फिर फूट डालो राज्य करो की तर्ज पर विदेशी शासक यहां जमे रहे और उन्हें अपने धर्म से इस देश की अध्यात्मिक विचाराधारा का कमतर साबित करने का प्रयास किया। इसलिये झगड़े बढ़े और आज तक उनको देखा जा सकता है। तुर्क यानि मध्य एशिया के देशों के लोग अपने रहीम (कविवर रहीम नहीं) को मानते जबकि भारत में तो भगवान राम की महिमा गायी जाती रही है। इस तरह झगड़े शुरु हुए जो अभी तक जारी हैं जिससे देश का आर्थिक, सामाजिक, तथा वैचारिक विकास अवरुद्ध हो गया है।
मुख्य बात है धर्म का मर्म। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ किसी धर्म की संज्ञावाचक पहचान नहीं देते बल्कि कर्म की शुद्धता ही धर्म की पहचान मानी जाती है। इसके विपरीत बाहर से आयी विचाराधारायें न केवल नाम से पहचाने जाते हैं बल्कि उनके इष्ट की पूजा के तरीके और स्वयं के पहनावे को लेकर भी अनेक प्रतिबंध हैं। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान शुद्ध निष्काम कर्म और हृदय से की गयी भक्ति को ही धर्म का रूप मानता है जबकि बाहर से आयातित विचार तो आदमी के जन्म और मरण में भी रीतियां सिखाते हैं। भारतीय अध्यात्मिक गंथों में धर्म का अर्थ भले ही छोटा है पर उसका दायरा व्यापक है। सबसे बड़ी बात यह है कि अहिंसा धर्म की प्रधानता है जबकि विदेशी हमलावर यहां लूटने आये तो उनके लिये हिंसा करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। इस तरह के हमलों ने ही यहां के निवासियों को शायद इतना विचलित कर दिया कि उन्हें अपने नाम और पहचार के साथ हिन्दू धर्म जोड़कर संगठित होने का विचार किया। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि अंततः यह एक राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति का एक अच्छा प्रयास रहा होगा जिसकी बाध्यता रही होगी।
बहरहाल जो बीत गया उसे भुलाना चाहिये था पर आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो इस प्रकार के विवाद का जारी रखना चाहते हैं। जब हमारे लिये धर्म का सूक्ष्म अर्थ होते हुए भी उसका दायरा बड़ा है तो हमें किसी भी विचाराधारा या धर्म पर आक्षेप न करते हुए अपने भारतीय होने की अनुभूति के साथ जीना चाहिये। हम अगर इतिहास गर्व या कुंठा के साथ जीना चाहेंगे तो सिवाय संताप के कुछ नहीं मिलना है। इस देश में विभिन्न देशों से लोग आये पर अब यहीं के होेकर रह गये। अब हमें नये सिरे से सोचना चाहिए पर समस्या यह है कि समाज में संघर्ष पैदा कर कुछ लोग अपने हित साध रहे हैं। वह धर्म पर बहसें और विवाद खड़े करते हैं पर जानते ही नहीं कि उसका आशय क्या है? सच तो यह है कि भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान ही सत्य की अनुभूति कराता है जहां तक धर्म का सवाल है तो उसके नाम पर ढेर सारे भ्रम हैं और इतिहासकार क्या कहते हैं यह अलग बात है पर हमारा विचार तो यह है कि कोई धार्मिक विचाराधारा केवल राजनीतिक संबल पाने के लिये प्रतिपादित की गयी हैं और उनका उद्देश्य प्रेम या अमन लाना नहीं है जैसा कि कुछ शायर यह कवि कहते हैं। बेहतर यही है कि हम अपना मार्ग भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथों में ही ढूंढें। उससे भी बड़ी बात यह है कि हम दूसरों को हानि पहुंचाने वाले विचारों से परे होकर सभी के सुख पर विचार करें। यह प्रेम कोई सिखाने या समझाने का विषय नहीं है। मनुष्य में यह गुण स्वाभाविक रूप से रहता है। कहने का अभिप्राय यह है कि हमें अपने प्राचीन ग्रंथो का निरंतर अध्ययन करते रहना चाहिये ताकि हमें ज्ञान प्राप्त हो और किसी द्वारा बताये गये गलत मार्ग का अनुसरण न करें।
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संकलक एवं व्याख्याकार -दीपक भारतदीप
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Friday, February 05, 2010

श्रीगुरुवाणी-घमंड से अनेक विकार पैदा होते हैं उत्पन्न (shri guruvani-ghamand aur vikar)

‘हउमै नावै नालि विरोध है, दोए न वसहि इक थाई।।’
हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण अहंकार है और इससे अन्य बुराईयां भी पैदा होती है।
जह गिआन प्रगासु अगिआन मिटंतु।
हिन्दी में भावार्थ-
गुरु ग्रंथ साहिब के मतानुसार जिस प्रकार अंधेरे को दूर करने के लिये चिराग की आवश्यकता होती है उसी तरह अज्ञान रूपी अंधेरे को दूर करने के लिये प्रकाश आवश्यक है।
‘हउमै दीरघ रोग है दारु भी इस माहि।
किरपा करे जो आपणी ता गुर का सब्दु कमाहि।।’
हिन्दी में भावार्थ-
अहंकार एक भयानक रोग है जिसकी जड़ें बहुत गहरे तक फैल जाती हैें। इसका इलाज गुरु की कृपा से प्राप्त शब्द ज्ञान से ही संभव हो सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सभी जानते हैं कि अहंकार करना एक बुराई है पर इस रोग को पहचानना भी कठिन है। इसकी वजह यह है कि पंच तत्वों से बनी इस देह में मन और बुद्धि के साथ अहंकार की प्रकृत्ति भी स्वयंमेव बनती है। अनेक बार एक मनुष्य को दूसरे का अहंकार दिखाई देता है पर स्वयं का नहीं। इतना ही नहीं जब कोई व्यक्ति आक्रामक होकर दूसरों के विरुद्ध विषवमन करता है तब सभी लोग उसे अहंकारी कहते हैं जबकि सच यह है कि अहंकार कभी न कभी किसी में आता है या यूं कहें कि यह सभी में रहता है।
किसी भी कर्म में अपने कर्तापन की अनुभूति करना ही अहंकार है। जब मन में यह विचार आये कि ‘मैंने यह किया’ या ‘वह किया’ तब समझ लीजिये कि वह हमारे अंदर बैठा अहंकार बोल रहा है। फिर इससे आगे यह भी होता है कि जब हम किसी का कार्य करते हैं और उसका प्रतिफल भौतिक रूप से नहीं मिलता तब भारी निराशा घेर लेती है। आजकल आप किसी से भी चर्चा करिये वह अपने रिश्तेदारेां, मित्रों और सहकर्मियों के विश्वासघात की शिकायत करता मिलेगा। अहंकार का एक रूप यह भी है कि किसी से एक मनुष्य का काम कर दिया तो वह इस कारण भी उसका काम नहीं करता क्योंकि उसको लगता है कि वह छोटा हो जायेगा-अधिकतर लोग ऐसे भी हैं जो दूसरे के द्वारा कार्य करने पर अहसान मानने की बजाय हक अनुभव करते हैं तो कुछ लोगों को लगता है कि उनके गुणों के कारण कोई स्वार्थवश सेवा कर रहा है तो यह हमारी श्रेष्ठता का प्रमाण है। यही अहंकार मनुष्यों के बीच संघर्ष का कारण बनता है। समस्या इसे पहचानने की है। सच बात तो यह है कि अगर सभी लोग घमंड करना छोड़ दें तो किसी तरह का विवार कहीं न हो।
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Wednesday, February 03, 2010

कौटिल्य दर्शन बुद्धि और उद्यम के संयुक्त प्रयास से फल की प्राप्ति

धातोश्चामीकरमिव सर्पिनिर्मथनादिव।
बुद्धिप्रयत्नोपगताध्यवसायाद्ध्रवं फलम्।।
हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह अनेक धातुओं में मिला होने पर भी गलाने से प्रकट होता है तथा दही मथने से घृत प्रगट होता है वैसे बुद्धि और उद्योग से के संयुक्त उद्यम से फल की प्राप्ति भी होती है।
सूक्ष्मा सत्तवप्रयत्नाभ्यां दृढ़ा बुद्धिरधिष्ठिता।

प्रसूते हि फलं श्रीमदरणीय हुताशनम्।।

हिन्दी में भावार्थ-
जो बुद्धि सूक्ष्म तत्त्वगुण का ज्ञान होने से दृढ़ स्थिति में है वह धन रूपी फल को उत्पन्न करती है जिस प्रकार अरणी काष्ट अग्नि को प्रकट करता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-
श्रीगीता में वर्णित ज्ञान की लोग यह सोचकर उपेक्षा करते हैं कि वह तो सांसरिक कार्य से विरक्ति की ओर प्रेरित कर सन्यास मार्ग की ओर ले जाता है। यह अल्पज्ञान का प्रंमाण है। सच तो यह है कि उसमें वर्णित तत्व ज्ञान को जिसने भी धारण कर लिया उसकी बुद्धि दृढ़ मार्ग पर चल देती है। वह छोटी मोटी बातों पर न ध्यान देता है न उसे मान अपमान की चिंता रहती है। जिनसे मनुष्य को विचलित किया जा सकता है वह मायावी प्रयास उसे अपने मार्ग से डिगा नहीं सकते।  यही कारण है कि अपने बौद्धिक संतुलन और एकाग्रता से अन्य के मुकाबले तत्वज्ञानी  अधिक सफल रहता है।  निष्काम भाव से उद्योग करने का आशय यह कतई नहीं है कि सारे संसार के काम को तिलांजलि देकर बैठा जाये बल्कि उपलब्धि प्राप्त होने पर हर्षित होकर चुप न बैठें और न नाकामी होने पर हताश हों, यही उसका आशय है। 

तत्वज्ञान का आशय यह भी है कि जीवन पथ पर उत्साह के साथ बढ़ें। समय के साथ मनुष्य को भी बदलना पड़ता है। अच्छे, बुरे, मूर्ख और चतुर व्यक्तियों से उसका संपर्क होता है, उनसे व्यवहार करने का तरीका केवल तत्वज्ञानी ही जानते हैं। तत्व ज्ञान से जो बुद्धि में स्थिरता आती है उससे दूसरे लोग अपने छल, चालाकियों तथा मिथ्या ज्ञान से विचलित नहीं कर सकते।  वर्तमान में हम देखें तो विश्व आर्थिक शिखर पर बैठे लोगों का  सारा ढांचा ही मिथ्या ज्ञान तथा काल्पनिक स्वर्ग बेचने पर आधारित है। अगर लोगों में तत्व ज्ञान हो तो शायद ऐसे दृश्य देखने को नहीं मिलें जिसमें लोगों को जीते जी जमीन पर मरने पर आसमान में स्वर्ग खरीदते हुए अपना धन तथा समय बरबाद करते हैं। इस दुनियां में अनेक लोगों का व्यापार तो केवल इसलिये ही चल रहा है कि लोगों को अध्यात्म का ज्ञान नहीं है।
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Friday, January 29, 2010

संत कबीर के दोहे-ज्ञान के बिना जीवन में अंधेरा रहता है (gyan aur jivan-hindi sandesh)

चौसठ दीवा जाये के, चौदह चन्दा माहिं।
तेहि घर किसका चांदना, जिहि घर सतगुरु नाहिं।
महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि चौसठ कलाओं और चौदह विद्याओं की जानकारी होने पर पर अगर सत्गुरु का ज्ञान नहीं है तो समझ लीजिये अंधियारे में ही रह रहे हैं।

कबीर गुरु की भक्ति बिन, राज ससभ होय।
माटी लदै कुम्हार की, घास न डारै कोय।।
महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु की भक्ति के बिना राजा भी गधा होता है जिस पर कुम्हार दिन भर मिट्टी लादेगा और कोई घास भी नहीं डालेगा।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समाज में बढ़ती भौतिकतावादी प्रवृत्ति ने अध्यात्मिक ज्ञान से लोगों को दूर कर दिया है। हालांकि टीवी चैनलों, रेडियो और समाचार पत्र पत्रिकाओं में अध्यात्मिक ज्ञान विषयक जानकारी प्रकाशित होती है पर व्यवसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये लिखी गयी उस जानकारी में तत्व ज्ञान का अभाव होता है। कई जगह तो अध्यात्मिक ज्ञान की आड़ में धार्मिक कर्मकांडों का प्रचार किया जा रहा है। इसके अलावा टीवी चैनलों में अनेक बाबाओं के अध्यात्मिक प्रवचनों के कार्यक्रम भी प्रस्तुत होते हैं पर उनका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना ही है। वैसे भी समाज में ऐसे गुरुओं का अभाव है जो तत्वज्ञान प्रदान कर सकें क्योंकि उसके जानने के बाद तो मनुष्य का हृदय निरंकार में लीन हो जाता है जबकि पेशेवर धर्म विक्रेता अपने शब्दों को सावधि जमा में निवेश करते हैं जिससे कि वह हमेशा पैसा और सम्मान वसूल करते रहें। कभी कभी तो लगता है कि लोग धर्म के नाम पर केवल शाब्दिक बोझा अपने सिर पर ढो रहे हैं।
दूसरी बात यह है कि मनुष्य के हृदय में अगर तत्वज्ञान स्थापित हो जाये तो वह अपने सांसरिक कार्य निर्लिप्त भाव से कार्य करते हुए किसी की परवाह नहीं करता जबकि सभी लोग चाहते हैं कि कोई उनकी परवाह करे। तत्वाज्ञान के अभाव में मनुष्य को एक तरह से गधे की तरह जीवन का बोझ ढोना पड़ता है। यह बात समझ लेना चाहिये कि जीवन तो सभी जीते हैं पर तत्वाज्ञानियों के चेहरे पर जो तेज दिखता है वह सभी में नहीं होता। ज्ञान होने से न केवल आदमी शांत रहता है बल्कि उसका आभास सामने वाले को भी हो जाता है।
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Saturday, January 23, 2010

चाणक्य दर्शन-धर्मग्रंथों की आलोचना वाले कष्ट उठाते हैं (Dhrama granthon ki ninda galat-hindu dharma sandesh)

दारिद्रयनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी।।
हिंदी में भावार्थ-
दान से दरिद्रता, शील भाव से दुर्भाग्य तथा निष्ठा से भय का नाश होता है।
अन्यथा वेदपाण्डितयं शास्त्रमाचारमन्यतथा।
अन्यथा कुवचः शान्तं लोकाः क्लिश्चन्ति चान्यथा।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो लोग वेदों में वर्णित तत्वज्ञान, शास्त्रों में विधान और उत्तम पुरुषों के चरित्र को गलत बताते हैं वह इस लोक में स्वयं ही भारी कष्ट उठाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-कभी भी किसी भी प्रकार के धर्मग्रंथ की आलोचना या विरोध नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि धर्म ग्रंथ तो निश्चित कालावधि में तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार लिखे जाते हैं जबकि पृथ्वी और प्रकृति के स्वरूप में बदलाव के साथ ही मनुष्य की जीवन शैली में बदलाव आता है और इसी कारण धर्मग्रंथों के कुछ संदेश समय के साथ अप्रासंगिक लगते हैं। अतः धर्म ग्रंथों की आलोचना करना उचित नहीं है।
हां, भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित तत्वज्ञान में कभी बदलाव नहीं आता क्योंकि उसमें जीवन के मूल तत्वों की जानकारी देने के साथ ही उसका सदुपयोग करने की प्रक्रिया का भी वर्णन मिलता है। विश्व में भले ही कितने प्रकार के भौतिक परिवर्तन आयें पर जीवन के तत्वों का निर्धारण करने वाली प्रक्रिया में बदलाव संभव नहीं है।

भारतीय वेदों तथ अन्य धर्मग्रंथों की आलोचना करने वाले अपना उल्लू सीधा करने करने के लिये भारतीय धर्मग्रंथों के ऐसे चंद श्लोक या दोहे लेकर लोगों को बरगलाते हैं जो अब अप्रासांगिक हो गये हैं या लोग उस पर ध्यान नहीं देते। ऐसे लोग अज्ञान के अंधेरे में रहते हैं क्योंकि वह उनमें वर्णित तत्वज्ञान को नहीं जानते। ऐसे लोग भले ही चाहे कितनी भी प्रतिष्ठा या धन अर्जित कर लें पर सुखी नहीं रहते। वह नहीं जानते कि समाज के सहज संचालन के लिये भारतीय अध्यात्मिक दर्शन बहुत महत्वपूर्ण है। वह धनिक लोगों को दान देने के लिये प्रेरित करता है ताकि समाज की गरीब पर नियंत्रण हो। इतना ही नहीं उत्तम चरित्र से ही व्यक्ति के साथ ही समाज का निर्माण होता है। अक्सर लोग दूसरों के चरित्र पर तो लांछन लगाते हैं पर अपनी तरफ नहीं देखते। अगर सभी लोग तय करें तकि हम अपना चरित्र सही रखेंगे तो निश्चित रूप से देश में एक महान समाज का निर्माण होगा। यही बात भय के संबंध में भी कही जा सकती है। जब व्यक्ति की सब तरफ निष्ठा समाप्त हो जाती है तो वह अपने आप को एकाकी अनुभव करता है जिससे उसके मन भय का निर्माण होता है। इसलिये भगवान भक्ति से पुण्य मिले या नहीं पर अपने अंदर एक भय होता है जिससे हम निजात पा सकते हैं। कहने का का तात्पर्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथो की आलोचना करने वाले न अपने को सुखी रख पाते हैं न उन लोगों को लाभ होता है जो उनका अनुसरण करते हैं। सच बात तो यह है कि दूसरे की आस्था और भक्ति पर सवाल उठाने की बजाय अपने चरित्र और स्थितियों का मंथन करना चाहिये। भारतीय धर्म ग्रंथों पर आक्षेप करने वाले यह भूल जाते हैं कि उनमें वर्णित ऐसा ज्ञान है जिसकी आज विदेशों में भी साख है।
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Tuesday, January 19, 2010

विदुर नीति-अनुशासनहीनता से ऐश्वर्य नष्ट हो जाता है

अर्थानामीश्वरो यः स्यादिन्द्रियाणमीनश्वरः।
इन्द्रियाणामनैश्वर्यर्दिश्वर्याद भ्रश्यते हि सः।।
हिन्दी में भावार्थ-
अधिक धन का स्वामी होने भी इंद्रियों पर अधिकार करने की बजाय उसके वश में हो जाने वाला भी मनुष्य ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है।
धर्मार्थोश्यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानगुः।
श्रीप्राणधनदारेभ्यः क्षिप्र स परिहीयते।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर के कथनानुसार जो मनुष्य धर्म और अर्थ इंद्रियों के वश में हो जाता है वह शीघ्र ही अपने ऐश्वर्य, प्राण, धन, स्त्री को अपने हाथ से गंवा बैठता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अनेक लोगों को यह लगता है कि अगर अधिक धन आ गया तो जैसे सारा संसार जीत लिया। इस भ्रम में अनेक लोग धन के कारण अनुशासहीनता पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि शीघ्र ही न केवल अपना वैभव गंवाते हैं बल्कि कहीं कहीं उनको शारीरिक हानि भी झेलनी पड़ती हैं। जीवन में दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन का होना जरूरी है। अधिक धन है तो भी समाज में सम्मान प्राप्त होता है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि अनुशासनहीनता बरती जाये। ऐसे ढेर सारे उदाहरण है जिसमें अनेक धनपतियों की औलादें मदांध होकर ऐसे अपराधिक कार्य इस आशय से करती हैं कि उनके पालक धन से कानून खरीद लेंगे। ऐसा होता भी है पर उसकी एक सीमा होती है जहां उसका अतिक्रमण होता है वहां फिर सींखचों के अंदर भी जाना पड़ता है। इस समय ऐसा दौर भी है जिसमें धनपति स्वयं और उनकी औलादें समाज में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिये अनुशासन हीनता दिखाते हैं। धन उनकी आंखों बंद कर देता है और उनको यह ज्ञान नहीं रहता कि आजकल प्रचार माध्यम सशक्त हो गये हैं जिनकी वजह से हर समाचार बहुत जल्दी ही लोगों तक पहुंचता है। भले ही यह प्रचार माध्यम भी धनपतियों के हैं पर उनको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये सनसनीखेज खबरों की आवश्यकता होती है और ऐसे में किसी धनी, प्रतिष्ठित या बाहुबली द्वारा किसी प्रकार के अपराध की जानकारी मिलने पर उसे जोरदार ढंग से प्रसारित भी करते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि अब वह समय चला गया जब धन और वैभव का प्रदर्शन करने के लिये अनुशासनहीनता बरतना आवश्यक लगता था।
आदमी के पास चाहे कितना भी धन हो उसे जीवन में अनुशासन अवश्य रखना चाहिये। याद रहे धन की असीमित शक्ति है पर देह की सीमायें हैं और किसी प्रकार की अनुशासनहीनता का दुष्परिणाम उसे ही भोगना पड़ता है। आजकल धनी लोगों द्वारा अनुशासनहीनता के कारण ही समाज में वैमनस्य फैल रहा है और अपराध बढ़ रहे हैं। सच तो यह है कि समाज के उच्च वर्ग के प्रति सामान्य वर्ग लोगों के मन में अब सद्भावना रही नहीं है भले ही उसका दिखावा करते हों
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Friday, January 15, 2010

चाणक्य की नीति-पुरानी बातों को याद करने से लाभ नहीं

अहो बत विचित्राणि चरितानि महाऽऽत्मनाम्।
लक्ष्मीं तृणाय मन्यन्ते तद्भारेण नमन्ति च।।
हिंदी में भावार्थ-
अहे! महात्माओं का चरित्र भी बहुत विचित्र होता है। एक तरफ वह धन को तिनके समान मानते हैं किन्तु उसके भार से झुक जाते हैं।
गते शोको न कत्र्तव्यो भविष्यं नैव चिनतयेत्।
वर्तमानेन कालेन प्रवर्तन्ते विचक्षणाः।।
हिंदी में भावार्थ-
पहले हुई घटना को याद करने से कोई लाभ नहीं है। इससे अच्छा है भविष्य की चिंता करें। बुद्धिमान लोग हमेशा ही वर्तमान काल में कार्य करने के लिये प्रवृत्त होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर दिन नया है यही मानने वाले इस जीवन का आनंद उठाते हैं। पहले की न केवल बुरी बल्कि अच्छी घटनाओं का भी भुला दें। कल जो बीत गया वह लौट कर नहीं आयेगा। अपनी असफलता को ही नहीं वरन् सफलता को भी भूल जायें। यही जीवन के आनंद उठाने का नियम है।
यदि कल हुए अपमान का स्मरण किया तो आज भी तकलीफ देगा। अगर कल हुए सम्मान को दिमाग में संजोया तो आज कर्म करने के लिये मन प्रवृत्त नहीं होगा। कल अपने दैहिक कर्म से जो सांसरिक उपलब्धि पायी उस पर गर्व किया तो फिर आज कोई अच्छा कर्म नहीं कर सकते। अगर कल कहीं कोई नाकामी मिली तो उसका स्मरण किसी नये कार्य में मन नहीं लगने देगा। कहने का मतलब है कि अपने स्मृतियों से जितना दूर रहें अच्छा है वह आंनद दें या कष्ट पर अगले कार्य के लिये व्यवधान पैदा करती हैं। मनुष्य जीवन में स्वच्छंद ढंग से कार्य करने का जो अवसर मिलता है वह परमात्मा की कृपा समझना चाहिये। दुःख सुख, मान अपमान और सफलता और सफलता केवल दृश्य मात्र है और उसके दृष्टा की तरह देखें तो उनका अच्छा प्रभाव अहंकार नहीं आने देता और बुरा विचलित नहीं करता।
इस संसार में अनेक ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि धन तिनके के समान है पर उसका भार हर कोई नहीं उठा पाता। अगर सज्जन आदमी है तो धन आने पर अधिक विनम्र हो जाता है और अगर दुर्जन है तो उसे अहंकार आ जाता है। यह भी अजीब बात है कि सभी धन को सामान्य मानते हैं पर दोनों ही प्रकार के लाग उसका भार नहीं उठा पाते। सच तो यह है कि जितना इस संसार में परमात्मा की भूमिका है उतनी ही माया भी निभाती है और कभी कभी तो उससे भी ज्यादा जब उसे पाकर आदमी परमात्मा को भी भूल जाता है। कुल मिलाकर यह संसार विचित्र बातों से भरा पड़ा है और उसे समझने के लिये बुद्धि और ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है जो कि स्वाध्याय से ही प्राप्त किया जा सकता है।
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Sunday, January 10, 2010

श्रीमद्भागवत गीता-ज्ञानी के लिये मिट्टी, पत्थर और सोना एक समान (shri madbhagvat geeta in hindi)

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रिय।
युक्त इत्युच्यते योगी समोलोष्टाश्मकांचनः।।
हिंदी में भावार्थ-
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि जो ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकार रहित है, जिसकी इंद्रियां भलीभांति जीती हुई है और जिसके लिये मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान है वह योगी, युक्त अर्थात भगवत्प्राप्त ऐसा कहा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अनेक कथित विद्वान भगवान श्रीकृष्ण के निष्काम भाव से कर्म के संदेश का गलत भाव ही लेते हैं। दरअसल इसका स्पष्ट आशय यह है कि मनुष्य कभी स्थिर नहीं रह सकता और इसलिये समाज भी परिवर्तन शील है और सभी मनुष्यों को भक्ति और ज्ञान के साथ अपना दायित्व निर्वाह भी करना चाहिए। वह ज्ञान के साथ विज्ञान की प्राप्ति पर भी अपना मत व्यक्त करते हैं। इसका अर्थ स्पष्ट है कि मनुष्य को निंरतर सक्रिय रहना चाहिये तभी वह अपनी रक्षा कर सकता है। उसमें नित नयी चीजों के निर्माण और उनके प्रयोग की प्रवृत्ति हो न कि रूढ़ियों और अंधविश्वासों में बंधकर यथास्थितिवादी होकर वह रहे।
वह एक सक्रिय समाज चाहते हैं। आपने सुना होगा कि अनेक मूर्ख लोग कहते हैं कि ‘अमुक ज्ञानी है तो फिर काम क्यों करता है?’
जो वास्तव में ज्ञानी होगा वह हमेशा सक्रिय रहेगा। हां, वह अपने दैहिक कर्म से मिलने वाले फलरूपी धन या साधन को अंतिम नहीं मानता क्योंकि उससे प्राप्त फल तो अन्य दैहिक दायित्वों की पूर्ति में लगाता है। जो लोग श्रीगीता को सन्यास के लिये प्रवृत्त करने वाली बताते हैं वह घोर अज्ञानी है यह इसी श्लोक से समझा जा सकता है। सन्यास निष्क्रियता में नहीं वरन् फल के स्वरूप को समझने में है। सच बात तो यह है कि कुछ विद्वान श्रीगीता की सही व्याख्या न कर उसे केवल भक्ति करने वाला ही ग्रंथ इसलिये प्रचारित करते हैं क्योंकि उनको नहीं लगता कि समाज में चेतना आये।
हमारा अध्यात्मिक दर्शन ज्ञान के साथ विज्ञान में भी पारंगत होने की प्रेरणा देता है ताकि इस पृथ्वी पर जीवन का सहजता से विचरण हो। श्रीमद्भागवतगीत हमारा ऐसा आधार ग्रंथ है जिस पर पूरा विश्व यकीन करता है।
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Saturday, January 09, 2010

मनुस्मृति-विषयासक्त राजा दुष्टों को दंड नहीं दे पाता (raja aur dosht-hindi sandesh)

स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना।
न शक्तो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेनणु च।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस राजा के सहायक न हों या फिर मूर्ख, लालची, बुद्धिहीन हों एवं स्वयं भी जो विषय और कामनाओं में लीन रहता हो ऐसे राजा को दंड का उपयोग उचित ढंग से प्रयोग करना नहीं आता।
स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। से प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी राज्य का राजा हो या समाज तथा परिवार का मुखिया उसे अपने संरक्षितों के शत्रुओं से किसी प्रकार की उदारता न बरतते हुए उनको कड़ा दंड दे या कार्रवाई करे। जहां मुखिया या स्वामी का कोई सहायक न हो और वही शराब जैसे व्यसनों में डूबा रहे उसके समूह का सर्वनाश हो जाता है। विषय और कामनाओं का चिंतन करने वाले मनुष्य की बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसे में उसके आसपास कामी, क्रोधी, लोभी तथा अहंकारी लोगों का मित्र समूह एकत्रित होकर उसे उल्टी सीधी सलाहें देता है जिससे स्वामी के साथ उसके कुल, राज्य और समाज का भी नाश होता है।
इसलिये जिन लोगों को परमात्मा की कृपा से कहीं स्वामित्व का अधिकार प्राप्त होता है वह अपने सरंक्षित तथा शरणागत जीवों के शत्रुओं के विरुद्ध कठोर दंड का उपयोग करें तथा जो मित्र हों उनके साथ सौहार्द का व्यवहार करते हुए अपने समूह का हित सोचें। इसके साथ ही ऐसे विद्वानों का हमेशा सम्मान करें तो संकट पड़ने पर अपने बौद्धिक कौशल से उसे तथा उसके समूह को उबार सकें। समाज के शीर्षस्थ वर्ग का यह दायित्व है कि वह छोटे वर्ग की रक्षा करे। जब शासक और उच्च वर्ग के लोग विषयास्क्त हो जाते हैं तो उनका सभी से नियंत्रण समाप्त हो जाता है और इससे समाज में अव्यवस्था व्याप्त हो जाती है। आजकल हम अपने समाज की हालत देखकर इस सत्य को समझ सकते हैं।
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Friday, January 08, 2010

संत कबीर के दोहे-स्वाद के कुंऐं में विष पड़ा मिलता है (swad aur vish-hindu dharma sandesh)

माखी गुड़ में गड़ि रही, पंख रही लपटाय।
तारी पीटै सिर धुनै, लालच बुरी बलाय।
भावार्थ-
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मक्खी जब गुड़ की लालच में अपने पंख फंसा देती है तब अपने हाथ पांव पटकने और सिर धुनने के बावजूद भी उसकी मुक्ति नहीं होती। लालच वाकई बुरी बला है।
जीभ स्वाद के कूप में, जहां हलाहल काम।
अंग अविद्या ऊपजै, जाय हिये ते नाम।
भावार्थ-
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक जीभ स्वाद में गहरे कुएं में पड़ी हुई है तब विष का सेवन करेगी जिससे अविद्या और अज्ञान ही पैदा होकर मनुष्य को परमात्मा के नाम से दूर हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल अनेक ऐसी चीजें लोग खा रहे हैं जो न तो स्वास्थ्य के लिये ठीक हैं न उनसे पेट भरता है। फास्ट फूड को पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञ ही ठीक नहीं मानते पर हमारे देश में खाने पीने के विषय में अपनी सोच कम जमाने के फैशन पर लोग अधिक चलते हैं। इससे देश में बीमारियां बढ़ी रही हैं। पहले तो वर्षा के दिनों में ही चिकित्सकों के अस्पताल भरे रहते थे पर अब तो उनका व्यवसाय सदाबहार पूरे वर्ष चलने वाला हो गया है। इसके पीछे वातावरण का प्रदूषित होना अकेला कारण नहीं है बल्कि लोगों का खान पान तथा मिलावटी खाद्य पदार्थ उपयोग करना भी है। यह समझने वाली बात है कि दूध इतना महंगा हो गया है तो घी, दही, पनीर और खोवा सस्ता कैसे मिल सकता है? कई जगह दुग्ध पदार्थ नकली या मिलावट कर बेचे जाते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि लोग जानते हुए भी उनको खरीद कर उनका उपभोग करते हैं। दूध का महंगा होने के पीछे उसका कम उत्पादन होने के साथ ही पशुओं पर लागत मूल्य अधिक होना है इसलिये उस पर शिकायत नहीं की जा सकती पर इतना तो समझा जा सकता है कि उससे बनने वाले पदार्थ सस्ते नहीं हो सकते पर लोग हैं कि इसके बावजूद ऐसे मिलावटी और नकली पदार्थों का सेवन कर अपने लिये बीमारी मोल लेते हैं। यह जीभ का स्वाद ही है जो हमें बाद में कष्ट देता है। दूध स्वास्थ्य के लिये अच्छा है पर अगर न मिले तो केवल स्वाद के लिये नकली पीकर अपने शरीर को हानि पहुंचाने का कारण कौन समझा सकता है? शरीर दूध न पीने से अधिक स्वस्थ नहीं रहेगा पर मिलावटी या नकली पीने से तो उसकी हानि होगी। रोग प्रतिरोधक क्षमता के अभाव में हमारी देह बीमारी का प्रतिकार नहीं कर पाती-यह सामान्य तथ्य जान लेना चाहिये।हमारे समाज में जिस तरह खाने पीने को लेकर लापरवाही बरती जा रही है उससे ही बीमारियां बढ़ रही हैं। इसे रोकने के लिये यह जरूरी है कि खानपान में सात्विकता बरती जाये।
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Wednesday, January 06, 2010

रहीम के दोहे-मतलब का प्यार जल्दी कम हो जाता है (matala ka pyar-hindu dharama sandesh)

वहै प्रीति नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत
घटत घटत रहिमन घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत

स्वाभाविक रूप से जो प्रेम होता है उसकी कोई रीति नहीं होती। स्वार्थ की वजह से हुआ प्रेम तो धीरे धीरे घटते हुए समाप्त हो जाता है। जब आदमी के स्वार्थ पूरे हो जाते हैं जब उसका प्रेम ऐसे ही घटता है जैसे रेत हाथ से फिसलती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में कई ऐसे लोग आते हैं जिनका साथ हमें बहुत अच्छा लगता है और हम से प्रेम समझ बैठते हैं। फिर वह बिछड़ जाते हैं तो उनकी याद आती है और फिर एकदम बिसर जाते हैं। उनकी जगह दूसरे लोग ले लेत हैं। यह प्रेमी की ऐसी रीति है जो देह के साथ आती है। यह अलग बात है कि इसमें बहकर कई लोग अपना जीवन दूसरे को सौंप कर उसे तबाह कर लेते हैं।

सच्चा प्रेम तो परमात्मा के नाम से ही हो सकता है। आजकल के फिल्मी कहानियों में जो प्रेम दिखाया जाता है वह केवल देह के आकर्षण तक ही सीमित है। फिर कई सूफी गाने भी इस तरह प्रस्तुत किये जाते हैं कि परमात्मा और प्रेमी एक जैसा प्रस्तुत हो जाये। सूफी संस्कृति की आड़ में हाड़मांस के नष्ट होने वाली देह में दिल लगाने के लिये यह संस्कृति बाजार ने बनाई है। अनेक युवक युवतियां इसमें बह जाते हैं और उनको लगता हैकि बस यही प्रेम परमात्मा का रूप है।

सच तो यह है परमात्मा को प्रेम करने वाली तो कोई रीति नहीं है। उसका ध्यान और स्मरण कर मन के विकार दूर किये जायें तभी पता लगता है कि प्रेम क्या है? यह दैहिक प्रेम तो केवल एक आकर्षण है जबकि परमात्मा के प्रति ही प्रेम सच्चा है क्योंकि हम उससे अलग हुई आत्मा है। इस संसार में दिखावे का प्रेम करने वाले बहुत मिल जाते हैं। कार्यस्थलों और मित्र मंडली में कार्य, व्यवसाय और रहन सहन की एकरूपता के कारण अनेक लोग मित्र बन जाते हैं पर वह तभी तक प्रेम करते हैं जब तक वह आधार विद्यमान है। उसके हटते ही वह मित्रता और प्रेम खत्म हो जाता है। अतः किसी भी मनुष्य के प्रेम का स्थाई नहीं मानना चाहिये।
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Sunday, January 03, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-नालायक से दया और दोस्त से पैसा मांगना ठीक नहीं (hindu dharma sandesh-dost ka paisa n mangen)

असन्तो नाम्यथ्र्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः प्रियान्याच्या वृत्तिर्मलिनमुसुभंगेऽप्यसुकरं।
चिपद्युच्चैः स्थेयं पदमनृविधेयं च महतां सत्तां केनाद्दिष्टं विषमममसिधाराव्रतमिदम्?
हिंदी में भावार्थ-
दृष्ट लोगों से दया के लिये प्रार्थना और अमीर मित्रों से याचना न कर केवल सत्य आचरण से ही जीवन पथ पर आगे बढ़ना चाहिये-ऐसे विचार का प्रतिपादन सज्जन लोगों के लिये किसने किया? मृत्यु के समक्ष भी उच्च विचारों की रक्षा की जाती है और महापुरुषों के मार्ग का ही अनुसरण करना पड़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन के अनेक नियम हैं जिनमें यह भी है कि जो व्यक्ति दुष्ट प्रवृत्ति का है उससे दया की याचना करने का कोई अर्थ नहीं है। उससे अपनी दुष्टता का प्रदर्शन करना ही है। दया दिखाने पर हो सकता है वह कुछ देर अपने दुष्कर्म से रुक जाये पर फिर उसे उसी मार्ग पर जाना है। अतः दुष्ट प्रकृति के लोगों का प्रतिकार करने का सामर्थ्य हमेशा अपने पास रखना चाहिये या फिर उस स्थान से ही चले जाना चाहिये जहां वह निवास करते है।
उसी तरह अपने धनी मित्र से किसी प्रकार की याचना कर अपने संबंध बिगाड़ने की आशंकायें पैदा करना व्यर्थ है। धन एक माया का रूप है और वह सभी को भ्रम, लालच और लोभ की प्रवृत्तियों के कारण अपने बंधन में जकड़े रहती है। अतः अपने धन बंधु-बांधवों और मित्रों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह याचना करने पर आर्थिक सहायता देंगे। जहां तक आर्थिक सहायता का प्रश्न है तो जिसके मन में यह उदार भाव होता है वह बिना मंागे ही करता है और जिसका हृदय संकीर्ण मानसिकता वाला है उससे कितना भी आग्रह करें वह आर्थिक सहायता नहीं करेगा।
जीवन में अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिये जरूरी है कि उसके कुछ नियमों को समझा जाये। महापुरुष द्वारा ने अपने अनुभवों से जो सत्य का मार्ग दिखाया है उस पर चलकर ही सामान्य मनुष्य जीवन में स्वस्थ और प्रसन्न रह सकता है। उससे पृथक चलना अपने आपको ही शारीरिक और मानसिक कष्ट देना है।
किसी दुष्ट आदमी से दया की याचना कर अपने आपको ही अपमानित करना है। उससे तो अच्छा है कि उसके साथ रण किया जाये या उपेक्षा कर उससे दूर हो जायें। उसी तरह मित्र से धन मांगना एक तरह से दीवार खड़ी करना है। हर किसी को धन का मोह होता है और संभव है कि मित्र से धन मांगें तो उसे अच्छा न लगे। वैसे सच्चा मित्र तो वही है जो समय पड़ने पर स्वयं ही धन देने का प्रस्ताव करे
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Friday, January 01, 2010

संत कबीर के दोहे-मन तो पर्वत की तरह विशाल है (sant kabir das ke dohe-man to parvat saman)

संत शिरोमणि कबीरदास जी के मतानुसार
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कबीर यह मन लालची, समझै नहीं गंवार।
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार।।

मन खाने में एक तरह से लालची और भजन में आलसी होता है। वह एक गंवार की तरह है जो कोई बात समझना ही नहीं चाहता है।
कबीर मन परबत भया, अब मैं पाया जान
टांकी लागी प्रेम की, निकसी कंचन खान

संत कबीरदास जी के अनुसार अब मैं समझ पाया हूं कि मन तो पर्वत की तरह विशाल है। अगर इसमें प्रेम का टांका लगा दिया जाये तो सोने का भंडार मिलता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे प्राचीन आध्यात्मिक मनीषियों ने यह रहस्या बहुत पहले ही खोज निकाला कि मनुष्य ही नहीं बल्कि हर जीव अपने मन से संचालित होता हैं। पांच तत्वों से बनी इस देह में तीन प्रकृतियां मन, बुद्धि और अहंकार रहती हैं और समय के अनुसार उनका कार्य भी होता हैं। मन को चंचल माना जाता है यही कारण है कि कोई भी जीव एक जगह स्थिर नहीं रह पाता। यह मन शक्तिशाली है इसलिये इस पर नियंत्रण रखा जाये तो जीवन सफल हो जाता है पर अगर इसके नियंत्रण में रहकर काम किया तो पूरा जीवन गुलाम की तरह बिताना पड़ता है। श्रीगीता के अनुसार गुण ही गुणों के बरतते हैं। अगर हम अपने मन में विलासिता, घृणा और लोभ के बीज बोंऐंगे तो उनके पीछे हम अपनी देह साथ ही ले जायेंगे जो कि अंततः हमारें दुःख का कारण बनेगा। उसी तरह अगर उसमें प्रेम, त्याग और विश्वास के बीज बोऐंगे तो उसका फल सुखद होगा। अतः मन को दृष्टा की तरह देखना चाहिये तभी उसे नियंत्रण में ला पायेंगे। कहने का तात्पर्य है कि अगर हम अपने मन पर नियंत्रण कर उसे अपने बुद्धि ज्ञान के द्वारा संचालित करें तो निश्चित रूप से हमें कभी विपत्ति का सामना नहीं करना पड़ेगा। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हम मन में आया हर काम करें। पहले उस कार्य के परिणाम पर विचार करें कितना फलदायक है न कि बिना किसी योजना के उसे शुरु कर देना।
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Friday, December 11, 2009

संत कबीरदास के दोहे-संसार के बाजार में स्वाद ही ठग (hindu dharm sandesh-bazar aur svad)

कूकट कूटै कन बिना, बिन करनी का ज्ञान।
ज्यौं बन्दूक गोली बिना, भड़क न मरि आन।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बिना अनुभव के ज्ञान देना, चावल की भूसी कूटने के समान है।
सुर नर मुनि सबको ठगै, मनहिं लिया औतार।
सुन जो कोई बाते बचै, तीन लोग ते न्यार।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह चंचल मन सामान्य मनुष्य हों या असाधारण सभी को ठगता है।
जग हटबारा स्वाद ठग, माया वेश्या लाय।
राम नाम गाढ़ा गहो, जनि जहु जन्म गंवा।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार के बाजार में स्वाद ही ठग और माया ही वैश्या की तरह व्यवहार करती है। इसलिये राम का नाम का दिल की गहराई से स्मरण करें वरना पूरा जीवन व्यर्थ चला जायेगा।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में किसी भी कंपनी का उत्पाद देखिये उसके समर्थन में प्रस्तुत विज्ञापन की भाषा बहुत आकर्षक और मन लुभावनी होती है। खाने पीने की वस्तुओं का विज्ञापन तो इस तरह होता है कि पढ़ते ही मूंह में पानी आ जाता है। यह सब आदमी के जेब से पैसे या माया निकालने की कला है जिसका नाम बाजार है। आदमी के जेब अगर पैसा या माया अधिक है तो उसकी बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है और वह उन चीजों को खरीदने चला जाता है।
अगर हम आज की उपभोक्ता संस्कृति का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो अनुभव होगा कि कुछ लोगों के पास पैसा वाकई बहुत अधिक आ गया है वरना इतना सारा विज्ञापन जगत चल ही नहीं सकता। इसके अलावा खाने पीने की वस्तुओं में ऐसे पदार्थों का उपयोग बढ़ रहा है जो जीभ के लिये स्वादिष्ट हैं पर पेट के लिये पाचन योग्य नहीं। परिणाम स्वरूप नयी नयी बीमारियों की उत्पत्ति हो रही है और फिर उनके लिये दवा निर्माण के लिये नये कारखाने खुलते हैं फिर उनका विज्ञापन हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है। यह बाजार और माया का चक्र में जिसके अंदर विज्ञापन आदमी को अपनी सवारी कर घुमाता है।
यह सब हमारे देश में अधिक हो रहा है क्योंकि यहां अब नये नये धनवान अधिक हो गये हैं और इसलिये जिन चीजों को पुराने अमीर देशों के लोगों ने त्याग कर दिया है उनको यहां ग्रहण किया जा रहा है। हमारे देश के प्राचीन अध्यात्मिक ज्ञान को एक तरफ उठाकर रख दिया गया है और अगर उसे कुछ लोग प्रस्तुत भी कर रहे हैं तो वह स्वयं के लिये धनार्जन और विज्ञापन के लिये। राम की चर्चा करते हैं पर माया का संग पाने की इच्छा के साथ। ऐसे लोग अध्यात्मिक ज्ञान की पुस्तकों के संदेश तो रट लेते हैं पर धारण करना उनके वश में भी नहीं होता।
सच बात तो यह है कि अगर हृदय से भगवान का स्मरण किया जाये तो मन में एक नयापन आता है जबकि उपभोक्ता वस्तुओं के प्रति आकर्षण अंततः मनोविकारों का कारण बनता है। भक्ति से जहां हमारे अंदर सकारात्मक भाव का निर्माण होता है वहीं मनोविकारों से मुक्ति मिलती है, वहीं जीवन स्वयमेव तनाव से मुक्त हो जाता है ।
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Friday, December 04, 2009

संत कबीरदास के दोहे-हिन्दू कहें राम प्यारा, तुर्क कहें रहीम (ram rahim-kabir ke dohe in hindi)

कहै हिन्दु मोहि राम पिआरा, तुरक कहे रहिमाना।
आपस में दोऊ लरि-लरि मुए, मरम न कोऊ जाना।।
संत शिरोमणि कबीरदास अपने समय के धार्मिक विवादों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि एक तरफ भारतीय हैं जो कहते हैं कि हमें राम प्यारा है दूसरी तरफ तुर्क हैं जो कहते हैं कि हम तो रहीम के बंदे हैं। दोनों आपस में लड़कर एक दूसरे को तबाह कर देते हैं पर धर्म का मर्म नहीं जानते।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जैसा कि इतिहास गवाह है कि भारत पर विदेशी हमले हुए। शुरुआती दौर में हमलावर केवल धन के लिये आये पर बाद में उनको लगा कि यह देश सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है तो यहीं अपना स्थाई निवास बना लिया। उनका उद्देश्य यहां शासन करना था पर इसमें भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान शक्ति उनके लिये बाधा थी। वह आसानी शासन करते पर भारत में ऐसे लोगों की तादाद अधिक थी जो किसी के राजा होने की परवाह नहीं करते थे। उनके लिये भगवान के बाद राजा का नंबर आता था जबकि विदेशी शासक चाहते थे कि भगवान से पहले उनकी प्रतिष्ठा बने। इसलिये उन्होंने अपने साथ कथित रूप से धार्मिक संत भी रखे। इसके अलावा शासन के कार्यक्षेत्र का विस्तार किया जिससे कि यहां के लोगों के जनजीवन में राज्य का दखल अधिक हो। कुछ लोग कहते हैं कि विदेशी लोगों ने इस देश को सभ्य बनाया है-यह दावा हास्यास्पद है। दरअसल विदेशी लोगों ने राज्य का समाज के कार्यक्षेत्र में दखल बढ़ाया ही है। यही कारण है कि अनेक ऐसे क्षेत्र जहां राज्य का काम नहीं है वहां भी उसका विस्तार इस तरह हो गया जिससे समाज कमजोर हो गये हैं। फिर फूट डालो राज्य करो की तर्ज पर विदेशी शासक यहां जमे रहे और उन्हें अपने धर्म से इस देश की अध्यात्मिक विचाराधारा का कमतर साबित करने का प्रयास किया। इसलिये झगड़े बढ़े और आज तक उनको देखा जा सकता है। तुर्क यानि मध्य एशिया के देशों के लोग अपने रहीम (कविवर रहीम नहीं) को मानते जबकि भारत में तो भगवान राम की महिमा गायी जाती रही है। इस तरह झगड़े शुरु हुए जो अभी तक जारी हैं जिससे देश का आर्थिक, सामाजिक, तथा वैचारिक विकास अवरुद्ध हो गया है।
मुख्य बात है धर्म का मर्म। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ किसी धर्म की संज्ञावाचक पहचान नहीं देते बल्कि कर्म की शुद्धता ही धर्म की पहचान मानी जाती है। इसके विपरीत बाहर से आयी विचाराधारायें न केवल नाम से पहचाने जाते हैं बल्कि उनके इष्ट की पूजा के तरीके और स्वयं के पहनावे को लेकर भी अनेक प्रतिबंध हैं। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान शुद्ध निष्काम कर्म और हृदय से की गयी भक्ति को ही धर्म का रूप मानता है जबकि बाहर से आयातित विचार तो आदमी के जन्म और मरण में भी रीतियां सिखाते हैं। भारतीय अध्यात्मिक गं्रथों में धर्म का अर्थ भले ही छोटा है पर उसका दायरा व्यापक है। सबसे बड़ी बात यह है कि अहिंसा धर्म की प्रधानता है जबकि विदेशी हमलावर यहां लूटने आये तो उनके लिये हिंसा करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। इस तरह के हमलों ने ही यहां के निवासियों को शायद इतना विचलित कर दिया कि उन्हें अपने नाम और पहचार के साथ हिन्दू धर्म जोड़कर संगठित होने का विचार किया। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि अंततः यह एक राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति का एक अच्छा प्रयास रहा होगा जिसकी बाध्यता रही होगी।

बहरहाल जो बीत गया उसे भुलाना चाहिये था पर आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो इस प्रकार के विवाद का जारी रखना चाहते हैं। जब हमारे लिये धर्म का सूक्ष्म अर्थ होते हुए भी उसका दायरा बड़ा है तो हमें किसी भी विचाराधारा या धर्म पर आक्षेप न करते हुए अपने भारतीय होने की अनुभूति के साथ जीना चाहिये। हम अगर इतिहास गर्व या कुंठा के साथ जीना चाहेंगे तो सिवाय संताप के कुछ नहीं मिलना है। इस देश में विभिन्न देशों से लोग आये पर अब यहीं के होेकर रह गये। अब हमें नये सिरे से सोचना चाहिए पर समस्या यह है कि समाज में संघर्ष पैदा कर कुछ लोग अपने हित साध रहे हैं। वह धर्म पर बहसें और विवाद खड़े करते हैं पर जानते ही नहीं कि उसका आशय क्या है? सच तो यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान ही सत्य की अनुभूति कराता है जहां तक धर्म का सवाल है तो उसके नाम पर ढेर सारे भ्रम हैं और इतिहासकार क्या कहते हैं यह अलग बात है पर हमारा विचार तो यह है कि कोई धार्मिक विचाराधारा केवल राजनीतिक संबल पाने के लिये प्रतिपादित की गयी हैं और उनका उद्देश्य प्रेम या अमन लाना नहीं है जैसा कि कुछ शायर यह कवि कहते हैं। बेहतर यही है कि हम अपना मार्ग भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में ही ढूंढें। उससे भी बड़ी बात यह है कि हम दूसरों को हानि पहुंचाने वाले विचारों से परे होकर सभी के सुख पर विचार करें। यह प्रेम कोई सिखाने या समझाने का विषय नहीं है। मनुष्य में यह गुण स्वाभाविक रूप से रहता है। कुछ लोग दुनियां को प्रेंम सिखाने की बात करते हैं पर यह नहीं जानते कि उसका मर्म क्या है और उसका निबाह कैसे होता है।
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संकलक एवं व्याख्याकार -दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, October 31, 2009

कौटिल्य का दर्शन- सभी को रोटी देना राजा का कर्तव्य (kotilya ka arthshastra in hindi)

आचार्य कौटिल्य महाराज कहते हैं कि
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आजीव्यः सर्वभूतानां राजा पज्र्जन्यवद्भुवि।
निराजीव्यं त्यजन्त्येनं शुष्कवृक्षभिवाउढजाः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा मेघों के समान सब प्राणियों को आजीविका देता है। जो राजा प्रजा को आजीविका नहीं दे पाता उसका साथ सभी छोड़ जाते हैं, जिस प्रकार पेड़ को पक्षी छोड़ जाते हैं।
उत्थिता एवं पूज्यन्ते जनाः काय्र्यर्थिभिर्नरःै।
शत्रुवत् पतितं कोऽनुवन्दते मनावं पुनः।।
हिंदी में भावार्थ-
जो व्यक्ति कार्य सिद्धि की अभिलाषा रखते हैं वह उत्थान की तरफ बढ़ रहे पुरुष का सम्मान करते हैं और जो पतन की तरफ जाता दिखता है उसे त्याग देते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने जीवन में अपनी भौतिक उपलब्धियों को लेकर कोई भ्रम नहीं रखना चाहिये। यदि आप धनी है पर समाज के किसी काम के नहीं है तो कोई आपका हृदय से सम्मान नहीं करता। जिस तरह जो राजा अपनी प्रजा को रोजगार नहीं उपलब्ध कराता उसे प्रजा त्याग देती है वैसे ही अगर धनी मनुष्य समाज के हित पर धन व्यय नहीं करता तो उसे कोई सम्मान नहीं देता। तात्पर्य यह है कि अगर आप समाज के शिखर पुरुष हैं तो जितना हो सके अपने आसपास और अपने पर आश्रित निर्धनों, श्रमिकों और बेबसों पर रहम करिये तभी तो आपका प्रभाव समाज पर रह सकता है वरना आपके विरुद्ध बढ़ता विद्रोह आपका समग्र भौतिक सम्राज्य भी नष्ट कर सकता है।
हमारे प्राचीन महापुरुष अनेक प्रकार की कथा कहानियों में समाज में समरसता के नियम बना गये हैं। उनका आशय यही है कि समाज में सभी व्यक्ति आत्मनियंत्रित हों। जिसे आज समाजवाद कहा जाता है वह एक नारा भर है और उसे ऊपर से नीचे की तरफ नारे की तरह धकेला जाता है जबकि हमारे प्राचीन संदेश मनुष्य को पहले ही चेता चुके हैं कि राजा, धनी और प्रभावी मनुष्य को अपने अंतर्गत आने वाले सभी लोगों को प्रसन्न रखने का जिम्मा लेना चाहिए। उनका आशय यह है कि समाजवाद लोगों में स्वस्फूर्त होना चाहिये जबकि आजकल इसे नारे की तरह केवल राज्य पर आश्रित बना दिया गया है। इस सामाजिक समरसता के प्रयास की शुरुआत भले ही राज्य से हो पर समाज में आर्थिक, सामाजिक, और प्रतिष्ठत पदों पर विराजमान लोगों को स्वयं ही यह काम करना चाहिये। इसके लिये हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों से जीवन के नियम सीखें न कि पश्चिम या पूर्व से आयातित नारे गाते हुए भ्रम में रहना चाहिए। सच तो समाज में सामंजस्य बनाये रखने का दायित्व बड़े और धनी लोगों का है क्योंकि उससे उनको ही सुरक्षा मिलती है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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Sunday, October 25, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-दुश्मन दो प्रकार के होते हैं (dushman ke prakar-hindu adhyatm sandesh)

उच्छेदापचयो काले पीडनं कर्षणन्तथा।
इति विधाविदः प्राहु, शत्रौ वृतं चतुविंघम्।।
हिंदी में भावार्थ-
उच्छेद, अपचय, समय पर पीड़ा देना और कर्षण यह चार प्रकार की स्थिति विद्वान बताते हैं।
सहज कार्यजश्वव द्विविधः शत्रु सच्यते।
सहज स्वकुलोत्पन्न कार्यजः स्मृतः।
हिंदी में भावार्थ-
शत्रु दो प्रकार के होते हैं-एक तो जो स्वाभाविक रूप से बनते हैं दूसरे वह जो कार्य से बनते हैं। स्वाभाविक शत्रु कुल में उत्पन्न होता है तो दूसरा अपने कार्य के कारण बन जाता है।
वर्तमान संबंध में संपादकीय-ऐसा कोई जीव इस प्रथ्वी पर नहीं है जिसका कोई शत्रु न हो। बड़े बड़े महापुरुष इस प्रकृत्ति के नियम का उल्लंघन नहीं कर पाये। शत्रु दो प्रकार के बनते हैं। एक तो जो स्वाभाविक रूप होते ही हैं दूसरे हमारे कार्य से बनते हैं। स्वाभाविक रूप शत्रु या विरोधी परिवार, समाज तथा कुल की वजह से बनते हैं। जैसे बिल्ली चूहे की तो कुत्ता बिल्ली का दुश्मन होता है। उसी तरह इंसानों में भी कुछ रिश्ते आपस में प्रतिस्पर्धा पैदा करते हैं। जहां कुल बड़ा होता है वहां आपस में लोग एक दूसरे के विरोधी या दुश्मन पैदा होते हैं। आपने देखा होगा कि किसी आदमी को तब हानि नहीं पहुंचाई जा सकती जब उसका अपना कोई शत्रु न हो। बड़े शत्रु को हराने के लिये छोटे शत्रु से समझौता करना चाहिये यह इसलिये कहा गया है कि क्योंकि दो शत्रुओं से एक साथ लड़ना संभव नहीं होता।

हम यहां शत्रु के साथ विरोधी की भी चर्चा करें तो बात आसानी से समझी जा सकती है। हम जब कोई अपना कार्य करते हैं तो वही कार्य करने वाला अन्य व्यक्ति स्वाभाविक रूप से हमें शत्रु भाव से देखता है। वह इस बात से आशंकित रहता है कि कहीं उसका प्रतिस्पर्धी उससे आगे न निकल जाये। तब वह इस बात का प्रयास भी करता है कि आपको नाकाम किया जाये, आपकी मजाक उड़ायी जाये और तमाम तरह का दुष्प्रचार कर आपका मनोबल गिराया जाये। वह आपके ही छोटे शत्रु या विरोधी को अपना मित्र बना लेता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि इस दैहिक जीवन में शत्रु या विरोधी से मुक्त रहना संभव नहीं है। अतः शत्रु और विरोधी की गतिविधियों को नजर रखें। वह आपकी उपेक्षा करने के साथ ही आपके कार्यसिद्धि के साधनों को हानि पहुंचा सकते हैं। शत्रु या विरोधी की प्रकृत्ति को समझें तो हमेशा सतर्क रहकर उसका मुकाबला कर सकते हैं। याद रहे आपके शत्रु या विरोधी कभी भी आपकी सफलता को न तो स्वीकार कर सकते हैं न ही पचा सकते हैं। इसलिए उनसे हमेशा सतर्क रहना चाहिए।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Wednesday, October 21, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-कभी कटु वाणी न बोलें (katu vani n bolen-hindu adhyatm sandesh)

हृदि विद्ध इवात्यर्थ यदा सन्तप्यते जनः।
पीडितोऽपि हि न मेघावीन्तां वाचमुदीरयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
क्रूर वाणी से हर आदमी का मन त्रस्त हो जाता है इसलिये विद्वान लोगों को चाहिए कि वह कठोर वाणी न बोलें। भले ही अन्य लोग अपनी कठोर वाणी से संताप देते रहें।
अनिन्दापरकृत्येषु स्वधम्र्मपरिपालनम्।
कृपणेषु दयालुत्वं सव्र्वत्र मधुरा गिरः।।
हिंदी में भावार्थ-
दूसरे के कार्य की निंदा न करते हुए अपना धर्म पालन करना , दीनों पर दया करना तथा मीठे वचनों से दूसरों को तृप्त करना ही धर्म है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस दुनियां में प्रचलित अनेक धर्मों की व्याख्या करती हुई अनेक किताबें मौजूद हैंे पर फिर भी अशांति व्याप्त है। कहीं आतंकवाद है तो कहीं युद्ध की आशंकायें। इसके अलावा लोगों के अंदर मानसिक तनाव की ऐसी धारा प्रवाहित हो रही है जिससे किसी की मुक्ति नहीं है। दरअसल धर्म के नाम सभी जगह भ्रम फैलाया जा रहा है। कहने को तो कहा जाता है कि हिन्दू धर्म है पर वास्तव में यह एक जीवन शैली है। वैसे हिन्दू धर्म के नाम पर कर्मकांडों का प्रचार भी भ्रम से कम नहीं है। धर्म का मूल स्वरूप इतना बड़ा और कठिन नहीं है जितना बताया जाता है। धर्म से आशय यह है कि हम मनुष्य हैं और न केवल अपनी देह का पालन करें बल्कि दूसरों की भी सहायता करें, किसी को कष्ट न पहुंचायें। सभी को अपनी मधुर वाणी से प्रसन्न करते हुए अपनी मनुष्य यौनि का का आनंद उठायें।
मगर इसके विपरीत धर्म के नाम पर भ्रम का प्रचार करने वाले लोगों की कमी नहीं है, जो यह बताते हैं कि कर्मकांड करने पर स्वर्ग मिलता है। कई तो ऐसे भी हैं जो बताते हैं कि यह खाओ, यह पहनो, इस तरह चलो तो स्वर्ग मिलेगा। स्वर्ग की यह कपोल कल्पना आदमी की बुद्धि को बंधक बनाये रखती है और धर्म के ठेकेदार अपने इन्हीं बंधकों के सहारे राज्य कर रहे हैं। कई तो ऐसे भी हैं जो अपने धर्म का राज्य लाने के लिये प्रयत्नशील हैं तो कुछ ऐसे है जो तमाम तरह की किताबों से ज्ञान उठाकर बताते हैं कि उनका धर्म श्रेष्ठ है। सच तो यह है कि धर्म से आशय केवल इतना ही है कि अपने कर्तव्यों का पालने करते हुए दूसरे पीड़ितों की भी मदद करें। हमेशा ही मधुर वाणी में बोलें और यह सिद्ध करें कि आपको परमात्मा ने जो जिव्हा दी है उसका आप सदुपयोग कर रहे हैं।
दूसरे की निंदा कर अपने को श्रेष्ठ साबित करना या कड़े शब्दों का उपयोग कर किसी को दुःख देना तो बहुत आसान है मुश्किल तो दूसरे को खुश करने में आती है जो कि धर्म का सबसे बड़ा परिचायक है। स्वयं बेहतर काम कर अपने धर्म पर दृढ़ होने का प्रमाण दिया जाता है, जबकि कहने और करने में अंतर रखकर अपने को पाखंडी ही साबित किया जा सकता है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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