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Tuesday, June 14, 2011

भर्तृहरि नीति शतक से संदेश-मनुष्य अपना जीवन भोजन में ही गुजार देता है

        इस संसार में माया और सत्य का संयोग और संघर्ष सदैव चलता रहा है। ईमानदार, परिश्रमी और संयमी लोगों की सक्रियता कम  होती है जिस कारण उनके पास अकूत धन संपदा नहीं होती जबकि भ्रष्ट और बेईमान लोगों की सक्रियता अधिक होने से उनका वैभव चारों तरफ फैला दिखता है। कभी कभी तो ऐसा ऐसा अनुभव होता है कि जैसे पूरा समाज ही बेईमान है। यह बात नहीं है क्योंकि हम अगर आंखें खुली रखकर अपने मस्तिष्क के चिंतन को व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो आज भी मेहतनकश तथा गरीब लोगों की संख्या अधिक है। अनुचित ढंग  की कमाई से लोगों ने ऊंची इमारतें बना लीं और अपनी असलियत छिपाने के लिये समाज सेवा का चोगा ओढ़कर वह प्रचार में अपने विज्ञापनों के कारण प्रसिद्ध भी हो रहे हैं पर जहां पर आत्मिक सुख की बात आती है तो वह केवल सत्य पथ पर चलने वाले लोगों के भाग्य में ही आता है।
         भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि 
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           हिंसाशून्यमयल्लयमशनं धांत्रा मरुत्कल्पितं व्यालानां पशवस्तणांकुरभुजस्तुष्टः स्थलीशायिनः।
          संसारार्णवलंधनक्षमर्थियां वृत्तिः कृता सा नृणां तामन्वेषयतां प्रयांति संततं सर्वे समाप्ति गुणाः।।
          ‘‘विधाता ने सापों के लिये भोजन के रूप में हवा का निर्माण किया जो उनको बिना किसी हिंसा के प्राप्त हो जाती है। पशुओं के लिये घास बनाई और सोने के लिये धरती का बिछौना बनाया। परंतु मनुष्य बुद्धिबल से ही भोजन प्राप्त कर सकता है इसलिये उसका पूरा जीवन केवल उसी में ही लग जाता है।’’
         मनुष्य का पेट तो रोटी से भी भर जाता है पर उसका मन फिर भी नहीं मानता। उसकी बुद्धि लोभ, लालच और मोह में इस तरह फंस जाती है कि हमेशा ही वह पैसा, पद और प्रतिष्ठा पाने के लिये इधर उधर भटकता है। अनेक लोग तो ऐसे हैं जो अच्छा खासा कमाते हैं पर कहते हैं कि ईमानदारी से उनका घर नहीं चल सकता। जबकि इस समाज में ऐसे भी लोग भी है जो केवल वेतन या थोड़ी कमाई के भी अपना जीवन यापन कर शांति से जीवन बिताते हैं। दरअसल हर जीव का दाता तो भगवान है पर जो लोग बेईमानी से धन कमाते हैं वह परिवार की जरूरतों को पूरा करने का ढोंग भले ही कर कर्ता बनने की खुशी पाते हैं पर वह उनका वहम है। अगर यह बेईमान देह त्याग भी दें तो भी उनका परिवार जिंदा रहेगा और उसके सदस्य अपने जीवन यापन के लिये कोई दूसरा मार्ग ढूंढ लेगा। ऐसे में उनकी परिवार की मज़बूरी केवल स्वयं को धोखा देने के लिये है।
          कहने का अभिप्राय यह है कि सभी का दाता परमात्मा है और बेईमानी और भ्रष्टाचार के लोग अपनी बाध्यताओं का दिखावा करें ऐसा करके वह स्वयं को धोखा देते हैं। अगर आदमी आत्ममंथन करे तभी इस बात को समझ सकता है।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Tuesday, April 20, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-स्वर्ग की कल्पना अल्पज्ञान की देन (hindu dharma sandesh-swarg ki kalpana)

स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीपण्डितो युवतीः।
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः।।
हिन्दी में भावार्थ-
शास्त्रों का अध्ययन करने वाले कुछ अल्पज्ञानी विद्वान व्यर्थ ही स्त्रियों की निंदा करते हुए लोगों को धोखा देते हैं क्योंकि तपस्या तथा साधना के फलस्वरूप जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है उसमें भी तो अप्सराओं के साथ रमण करने का सुख मिलने की बात कही जाती है।
उन्मतत्तप्रेमसंरम्भादारभन्ते यदंगनाः।
तत्र प्रत्यूहमाधातुं ब्रह्मापि खलु कातरः।
हिन्दी में भावार्थ-
प्रेम में उन्मत होकर युवतियां अपने प्रियतम को पाने के लिये कुछ भी करने लगती हैं। उनके इस कार्य को रोकने का ब्रह्मा भी सामर्थ्य नहीं रखता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-विश्व के अनेक धर्मों की बड़ी बड़ी किताबें लिखी गयी हैं। उन सभी को पढ़ना कठिन है, पर कोई एक भी पढ़ी जाये तो उसमें तमाम तरह की विसंगतियां नज़र आती है। अधिकतर धार्मिक पुस्तकों के रचयिता पुरुष हैं इसलिये स्त्रियों पर नियंत्रण रखने के लिये विशेष रूप से कुछ कुछ लिखा गया है। यह शोध का विषय है कि आखिर सारे धर्म ही स्त्रियों पर नियंत्रण की बात क्यों करते हैं पुरुष को तो एक देवता मानकर प्रस्तुत किया जाता है। सच बात तो यह है कि अगर पुरुष देवता नहंी है तो नारी भी कोई देवी नहीं है। हर मनुष्य परिस्थतियों, संस्कारों और व्यक्तिगत बाध्यताओं के चलते अपना सामाजिक व्यवहार करता है। अब यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे प्रेरणा कैसी मिलती है। अगर प्रेरणास्त्रोत बुरा है तो वह भी बुरा ही करेगा अगर अच्छा है तो वह अच्छे काम में लिप्त हो जायेगा।
दूसरी जो सबसे बड़ी अहम बात है वह यह कि हर पुरुष और स्त्री का व्यवहार तय करने में उसकी आयु का बहुत योगदान होता है। बाल्यकाल तो अल्लहड़पन में बीत जाता है। उसके बाद युवावस्था में स्त्री पुरुष दोनों का मन नयी दुनियां को देखने के लिये लालायित होता है। विपरीत लिंग का आकर्षण उनको जकड़ लेता है। ऐसे में उन पर जो नियंत्रण की बात करते हैं वह या तो बूढ़े हो चुके होते हैं या फिर जिनका जीवन असाध्य कष्टों के बीच गुजर रहा होता है। कभी कभी तो यह लगता है कि दुनियां के अनेक धर्म ग्रंथ बूढ़े लोगों द्वारा ही लिखे या लिखवाये गये हैं क्योंकि उसमें औरतों पर ही नियंत्रण की बात की जाती है पुरुष को तो स्वाभाविक रूप से आत्मनिंयत्रित माना जाता हैं स्त्रियों के लिये मुंह ढंकने, पिता या भाई के साथ ही घर के बाहर निकलने तथा ऊंची आवाज में न बोलने जैसी बातें कहीं जाती हैं। कभी कभी तो लगता है कि युवतियों की युवावस्था अनेक धर्म लेखकों और विद्वानों के बहुत बुरी लगती है। इसलिये अतार्किक और अव्यवाहारिक बातें लिखते हैं। स्त्री हो या पुरुष युवावस्था में स्वाभाविक रूप से हर जीव अनिंयत्रित होता है-मनुष्य ही नहीं पशु पक्षियों में भी काम वासना की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से देखी जाती है। इस पर युवा स्त्रियों पर नियंत्रण की बात तो व्यर्थ ही लगती है क्योंकि अपने प्रियतम को पाने के लिये जो वह करती हैं उसे रोकने का सामर्थ्य तो विधाता भी नहीं रखता। अलबत्ता सभ्य, कुलीन, शिक्षित तथा बुद्धिमान लड़कियां स्वयं पर नियंत्रण रखती हैं इसलिये ही समाज में अभी तक नैतिकता का आधार बना हुआ है। ऐसी लड़कियों को धार्मिक शिक्षक न भी समझायें तो भी वह मर्यादा में रहती हैं पर जो भटकने पर आमादा है उनको रोकना किसी के लिये संभव नहीं है। कम से कम भर्तृहरि महाराज की समझाइश के अनुसार तो स्त्रियों पर सामाजिक नियंत्रण की बात तो करना ही नहीं चाहिए। दूसरी बात यह कि स्वर्ग कि कल्पना वास्तविकता पर आधारित न होकर अज्ञानियों तथा अल्पज्ञानियों की कल्पना मात्र है।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, March 12, 2010

कौटिल्य दर्शन-कभी कभी उपेक्षासन भी करना चाहिए

निवातकवचान् हित्वा हिरण्यपुरवासिनः।
उपेक्षयानमास्याय निजधान धनजयः।।
हिन्दी में भावार्थ-
महाभारत काल में अर्जुन ने हिरण्यपुर वासी जनों को छोड़कर उनकी उपेक्षा करते हुए निवातकवचों का  संहार  किया था।
रिपूं वातस्य बलिनः संप्राप्याविश्कृतं फलम्।
उपेक्ष्यतनिमत्रयानमुयेक्षायानमुच्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
जब शक्तिशाली राजा किसी अन्य राज्य पर आक्रमण करे और सफलता न मिले तो उसकी उपेक्षा कर देना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में कभी भी असफलता से घबड़ाने की बजाय उसकी उपेक्षा करते हुए अपने नये लक्ष्य की तरफ बढ़ना चाहिये। यह उपेक्षासन हमें तनाव से मुक्ति दिलाता है। सभी मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक से जीवन में विकास पथ पर अग्रसर होते हैं पर कहीं सफलता तो कहीं असफलता मिलती है। समझदार मनुष्य अपनी असफलताओं से विचलित हुए बिना उपेक्षासन करते हुए अपनी राह पर दूसरे लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ जाते हैं। इसके विपरीत जो असफलताओं की सोचकर बैठे रहते हैं वह जीवन में कभी खुश नहीं रह पाते। वैसे हमें अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिये योजनापूर्वक काम करना चाहिये पर यह दुनियां हमेशा हमारे अनुसार नहीं चलती। इसलिये हमारी योजना का जो भाग दूसरे पर निर्भर है उसके बारे में कोई बात निश्चितता से नहीं कही जा सकती है। अनुमान सही न होने या गलत निकलने पर जब दूसरे के योगदान का विषय गड़बड़ाता है तब हमारा अभियान अनेक बार शिथिल पड़ जाता है। इससे घबड़ाना नहीं चाहिये। मनुष्य का धर्म है कि वह हमेशा कर्म करता रहे। सफलता का आनंद तो वह उठाता ही है पर अगर असफलता मिले तो उपेक्षासन कर उसके तनाव से मुक्ति भी पा सकता है। समय का फेर होता है कभी कभी असफलता भी प्रेरणा कर कारण बनती है-इतिहास में ऐसे अनेक प्रमाण मौजूद हैं। इसलिये किसी काम में असफलता मिलने पर फिर किसी प्रियजन द्वारा अप्रिय कार्य करने पर तत्काल उत्तेजित होकर प्रतिक्रिया देने की बजाय कुछ देर अकेले में उसकी उपेक्षा करते हुए चिंतन करना चाहिये ताकि मन में धीरज आये और फिर कोई नया विचार कर सकें।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, February 13, 2010

पतंजलि योग दर्शन-सवितर्क और निर्वितर्क समाधि (patanjali yog darshan-samadhi)

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्ति।।
हिन्दी में भावार्थ-
यह समाधि की प्रारंभिक अवस्था है जिसमें मनुष्य का ध्यान सासंरिक विषयों से पृथक तो हो जाता है पर शब्द, अर्थ और ज्ञान का आभास कहीं ने कहीं उसके मस्तिष्क में बना रहता है।  इसे सवितर्क समाधि भी कहा जाता है।
स्मृतिपरिशुद्धो स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का।
हिन्दी में भावार्थ-
जब मस्तिष्क में स्मृति पूर्णतया विलुप्त हो जाये और केवल शून्य रूप का आभास हो और  निरंकार स्वरूप पर ध्यान केंद्रित हो तो इसे निर्वितर्क समाधि कहा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-
शब्दिक गूढ़ता में पड़ने की बजाय हम सवितर्क समाधि को आंशिक तथा निर्वितर्क समाधि को पूर्ण समाधि भी कह सकते हैं।  दरअसल ध्यान लगाना बहुत कठिन काम है पर अगर अभ्यास हो जाये तो इतना सहज हो जाता है कि लगता ही नहीं है कि हम कोई विशेष काम कर रहे हैं। 
शुरुआत में ध्यान लगाते समय दिमाग में अनेक प्रकार के वही विचार आते हैं जो सामान्य अवस्था में आते हैं।  अक्सर लोग इससे विचलित हो जाते हैं और ध्यान की प्रक्रिया को कठिन मानकर उसे छोड़ देते हैं।
ध्यान की अवस्था की चरमा सीमा पर पहुंचना कोई सरल काम नहीं है पर अगर संकल्प लेकर अभ्यास किया जाये तो यह कठिन भी नहीं है। भ्रुकुटि पर (दोनों आंखों के बीच और नाक के ठीक ऊपर) ध्यान लगाने की प्रक्रिया प्रारंभ करें।  सांसरिक विषय आते हैं तो चिंता की बात नहीं। दरअसल यह विचार ऐसे विकार हैं जो प्रज्जवलित होकर नष्ट होने लगते हैं और उनका धुंआ उठकर हमारे ध्यान के केंद्र बिंदु पर आता है। जिस तरह हम कचड़ा जलाते हैं और वह नष्ट होते ही धुंआ विसर्जित करता है और हम अगर पास खड़े होते हैं तो धुंआं आंखों में घुसने लगता है।  हम उस धुंऐं से बचने के लिये उस आग पर पानी डालते क्योंकि हमें पता होता है कि यह थोड़ी देर की बात है और इससे कचड़ा नष्ट हो जायेगा। यही स्थिति ध्यान में आने वाले विचारों की है। धीरे धीरे ध्यान का समय बढ़ाते जायें और यह निश्चय कर लें कि किसी भी तरह ऐसी स्थिति प्राप्त करेंगे जिससे उस दौरान कोई विचार वहां न आये।  मगर यह भी आंशिक स्थित ही है क्योंकि तब भी हमारे दिमाग में इंद्रियों की उपस्थिति का आभास बना रहता है और आगे चलकर पूर्ण समाधि की स्थिति प्राप्त करना आवश्यक है।
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Friday, February 12, 2010

वेदांत दर्शन-ब्रह्म ज्ञान से पुरुषार्थ की सिद्धि (vedant darshan-brahmagyan aur purusharth)



पुरुषार्थोऽतश्शब्दादिति बादरायणः।।
हिन्दी में भावार्थ-पुरुषार्थ की सिद्धि ब्रह्मज्ञान से होती है क्योंकि शब्द से ही यह सिद्ध होता है कि इसे बादरायण कहते हैं।
आचारदर्शनात्।
हिन्दी में भावार्थ-श्रेष्ठ पुरुषों का आचरण देखने से सिद्ध होता है कि ब्रह्म विद्या उनके कर्मों का अंग है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ब्रह्मज्ञान या आध्यात्मिक ज्ञान के बिना मनुष्य ऐसे ही हो जाता है जैसे कि पशु। बस अंतर यह है कि पशु की गर्दन में रस्सी बांधकर हांका जाता है जबकि मनुष्य के मन में लालच, लोभ और मोह की रस्सी बांध कर उसे दूसरा मनुष्य हांक सकता है।  कहीं अहंकार, क्रोध और निराशा वश आदमी स्वयं भी दूसरे के चंगुल में फंस जाता है।  इससे बचने का यही उपाय है कि तत्व ज्ञान को कहीं से ग्रहण किया जाये। वर्तमान युग में अर्थ की अधिक प्रधानता है इसलिये धर्म का लोप करने का प्रयास वणिक वर्ग करता है क्योंकि अधिक धन होने के कारण उसे बढ़ाने का उपाय वही जानता है।  इस मार्ग पर उसकी बुद्धि चलती है इसलिये जो सामान्य वर्ग है उसके लिये एक तरह ये दोहन की वस्तु है। वणिक वर्ग  उसे अपने जाल में फंसाने के लिये मोह, लालच और लोभ के फंदों का निर्माण करता है।
अपने देश का अध्यात्मिक ज्ञान सत्य रूप है पर उसे पश्चिमी देश तथा उन जैसी वणिक वृत्ति के यहीं के लोग उसे दबाना चाहते हैं।  देश  के शैक्षणिक संस्थानों में भारतीय अध्यात्म का ज्ञान नहीं दिया जाता।  यही नहीं अपने देश में धर्म परिवर्तन की घटनायें भी करायी जाती हैं ताकि भारतीय अध्यात्म को हेय समझा जाये।  देखा जाये तो धर्म को किसी नाम से पुकाराना ही एक तरह का भ्रम है क्योंकि वह तो श्रेष्ठ आचरण का प्रतीक भर है। भारतीय धर्मग्रंथें में धर्म शब्द है पर उससे कोई दूसरा शब्द नहीं जुड़ा क्योंकि उसे आचरण का प्रतीक माना गया है। इसके विपरीत विदेशी विचारक अपने धर्मों को नाम लेकर श्रेष्ठ बताते हैं। दरअसल यह उनका भ्रम हैं। मजे की बात यह है कि अनेक धर्मों के लोग अपने धर्म का विस्तार करने तथा पहचान बचाने के लिये जूझ रहे हैं।  ऐसे भ्रमित लोग भी हैं जो सारे धर्मों को एक बताकर अपनी लोकप्रियता  बढ़ाते  हैं जबकि धर्म तो बस धर्म है फिर उनमें एक होने की बात कहां से आती है। अगर यह तत्व ज्ञान भारतीय लोग धारण कर लें तो वह ऐसे फंदों में नहीं फंसेंगे। 
इसके विपरीत जो ज्ञानी हैं वह केवल आचरण की बात करते हैं।  उनको एकता आदि विषय ढोंग का विषय लगते हैं क्योंकि मनुष्य का सहज स्वभाव है कि जिसमें उसके स्वार्थ है उससे वह स्वयमेव जुड़ता है।  ऐसे में लोगों की आपस में एकता स्थापित करने की बात बेमानी लगती है पर इसे समझने के लिये तत्वज्ञान का होना जरूरी है। 
इस नश्वर संसार को सही ढंग से समझने वाले लोग ही विद्वान हैं और वह कर्म करते हुए फल के भाव लिप्त नहीं होते।  समय के अनुसार वह इतिहास में एक श्रेष्ठ पुरुष के रूप में उनका नाम दर्ज होता है।

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Friday, January 08, 2010

संत कबीर के दोहे-स्वाद के कुंऐं में विष पड़ा मिलता है (swad aur vish-hindu dharma sandesh)

माखी गुड़ में गड़ि रही, पंख रही लपटाय।
तारी पीटै सिर धुनै, लालच बुरी बलाय।
भावार्थ-
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मक्खी जब गुड़ की लालच में अपने पंख फंसा देती है तब अपने हाथ पांव पटकने और सिर धुनने के बावजूद भी उसकी मुक्ति नहीं होती। लालच वाकई बुरी बला है।
जीभ स्वाद के कूप में, जहां हलाहल काम।
अंग अविद्या ऊपजै, जाय हिये ते नाम।
भावार्थ-
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक जीभ स्वाद में गहरे कुएं में पड़ी हुई है तब विष का सेवन करेगी जिससे अविद्या और अज्ञान ही पैदा होकर मनुष्य को परमात्मा के नाम से दूर हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल अनेक ऐसी चीजें लोग खा रहे हैं जो न तो स्वास्थ्य के लिये ठीक हैं न उनसे पेट भरता है। फास्ट फूड को पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञ ही ठीक नहीं मानते पर हमारे देश में खाने पीने के विषय में अपनी सोच कम जमाने के फैशन पर लोग अधिक चलते हैं। इससे देश में बीमारियां बढ़ी रही हैं। पहले तो वर्षा के दिनों में ही चिकित्सकों के अस्पताल भरे रहते थे पर अब तो उनका व्यवसाय सदाबहार पूरे वर्ष चलने वाला हो गया है। इसके पीछे वातावरण का प्रदूषित होना अकेला कारण नहीं है बल्कि लोगों का खान पान तथा मिलावटी खाद्य पदार्थ उपयोग करना भी है। यह समझने वाली बात है कि दूध इतना महंगा हो गया है तो घी, दही, पनीर और खोवा सस्ता कैसे मिल सकता है? कई जगह दुग्ध पदार्थ नकली या मिलावट कर बेचे जाते हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि लोग जानते हुए भी उनको खरीद कर उनका उपभोग करते हैं। दूध का महंगा होने के पीछे उसका कम उत्पादन होने के साथ ही पशुओं पर लागत मूल्य अधिक होना है इसलिये उस पर शिकायत नहीं की जा सकती पर इतना तो समझा जा सकता है कि उससे बनने वाले पदार्थ सस्ते नहीं हो सकते पर लोग हैं कि इसके बावजूद ऐसे मिलावटी और नकली पदार्थों का सेवन कर अपने लिये बीमारी मोल लेते हैं। यह जीभ का स्वाद ही है जो हमें बाद में कष्ट देता है। दूध स्वास्थ्य के लिये अच्छा है पर अगर न मिले तो केवल स्वाद के लिये नकली पीकर अपने शरीर को हानि पहुंचाने का कारण कौन समझा सकता है? शरीर दूध न पीने से अधिक स्वस्थ नहीं रहेगा पर मिलावटी या नकली पीने से तो उसकी हानि होगी। रोग प्रतिरोधक क्षमता के अभाव में हमारी देह बीमारी का प्रतिकार नहीं कर पाती-यह सामान्य तथ्य जान लेना चाहिये।हमारे समाज में जिस तरह खाने पीने को लेकर लापरवाही बरती जा रही है उससे ही बीमारियां बढ़ रही हैं। इसे रोकने के लिये यह जरूरी है कि खानपान में सात्विकता बरती जाये।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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Friday, December 18, 2009

रहीम संदेश-जिससे निर्वाह न हो उससे दूरी भली (nirvah-rahim ke dohe)

कहु रहीम कैसे बनै, अनहोनी हो जाय
मिला रहै और ना मिलै, तासों कहा बसाय

कविवर रहीम कहते हैं कि जब कोई हम कार्य करना चाहें और उसके विपरीत अनहोनी हो जाये तो क्या किया जा सकता है? उसी तरह जो व्यक्ति ऐसा हो जो मिलकर भी दूरी बनाये रखे उसे निर्वाह नहीं हो सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिंदगी में अनेक लोग मिलते हैं। कुछ तो पास ही रहते हैं पर वह एक मानसिक दूरी बनाये रखते हैं ऐसे भला उनसे आत्मीयता का भाव कैसे स्थापित हो सकता है। अपने शैक्षणिक, व्यवसायिक और आवासीय स्थानों में ऐसे अनेक लोग प्रतिदिन मिलते हैं जिनके प्रति हमारा झुकाव इसलिये हो जाता है कि क्योंकि उनसे नियमित संपर्क रहता है। ऐसे में यह वहम भी हो जाता है कि वह हमारे अपने हैं और समय पर काम आयेंगे-पर ऐसा होता नहीं है। दरअसल अपने स्वार्थ की वजह से हम और वह पास होते हैं पर हमारे अपने स्वार्थ ही होते हैं जो जोड़े रहते हैं इससे मानसिक एकात्मकता का पता नहीं लगता। अगर हम उनके साथ अपने संबंधों का विश्लेषण करें तो एक दूरी अनुभव होगी और तब लगेगा कि उनके अपने होने का वहम है।
इसके अलावा अपने नियमित संपर्क में आने वाले व्यक्ति को केवल इसलिये ही अच्छा नहीं मान लेना चाहिये कि हम उसे जानते हैं और वह मीठा बोलता है। उसके घरेलू इतिहास, संस्कार और आस्था का भी पता करना चाहिये क्योंकि अगर मानसिक धरातल पर कोई व्यक्ति हम जैसा और हम उस जैसे नहीं है तो आत्मीयता का भाव स्थापित नहीं किया जा सकता। अगर जबरन यह प्रयास किया जाता है तो बाद में पछतावा होता है। जब तक संस्कार, विचार, लक्ष्य और कार्यशैली में साम्यता नहीं है तब तक संबंध स्थाई नहीं हो पाते। तत्कालिक आकर्षण में स्थापित संबंध बाद में दुःखदायी साबित होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जिससे निर्वाह नहीं हो सकता उससे दूर हो जाना ही अच्छा है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, August 22, 2009

चाणक्य नीति-धर्म बदलने वाले का शीघ्र नाश होता है (chankya niti-change of religion)

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।

हिन्दी में भावार्थ- अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अक्सर लोग धर्म की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। अनेक लोग निराशा, लालच या आकर्षण के वशीभूत होकर धर्म में परिवर्तन कर दूसरा अपना लेते हैं-यह अज्ञान का प्रतीक है। दरअसल मनुष्य के मन में जो विश्वास बचपन में उसके माता पिता द्वारा स्थापित किया जाता है उसी को मानकर वह आगे बढ़ता जाता है। कहा भी जाता है कि माता पिता प्रथम गुरू होते हैं। उनके द्वारा मन में स्थापित संस्कार,आस्था तथा इष्ट के स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि बचपन से ही मन में स्थापित संस्कार और आस्थाओं से आदमी आसानी से नहीं छूट पाता-एक तरह से कहा जाये कि पूरी जिंदगी वह उनसे परे नहीं हो पाता।

कहा भी जाता है कि आदमी में संस्कार,नैतिकता और आस्था स्थापित करने का समय बाल्यकाल ही होता है। ऐसे में कुछ लोग निराशा, लालच,भय या आकर्षण की वजह से से अपने धर्म या आस्था में बदलाव लाते हैं पर बहुत जल्दी ही उनमें अपने पुराने संस्कार, आस्थाऐं और इष्ट के स्वरूप का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगता है पर तब उनको यह डर लगता है कि हमने जो नया विश्वास, धर्म या इष्ट के स्वरूप को अपनाया है उसको मानने वाले दूसरे लोग क्या कहेंगे? एक तरफ अपने पुराने संस्कार और आस्थाओं की खींचने वाला मानसिक विचार और दूसरे का दबाव आदमी को तनाव में डाल देता है। धीरे धीरे यह तनाव आदमी की देह और मन में विकार पैदा कर देता है। इसलिये अपने अंदर बचपन से स्थापित संस्कार,आस्था और इष्ट के स्वरूप में में कभी बदलाव नहीं करना चाहिये बल्कि अपने धर्म के साथ ही चलते हुए सांसरिक कर्मों में निष्काम भाव से लिप्त होना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीगीता में कहा भी है कि अपना धर्म गुणहीन क्यों न हो पर उसका त्याग नहीं करें क्योंकि दूसरे का धर्म कितना भी गुणवान हो अपने लिये डरावना ही होता है।
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Saturday, August 08, 2009

चाणक्य नीति-धर्म बदलने वाला जल्दी नष्ट हो जाता है (chankya niti-change of religion is not good)

आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अक्सर लोग धर्म की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। अनेक लोग निराशा, लालच या आकर्षण के वशीभूत होकर धर्म में परिवर्तन कर दूसरा अपना लेते हैं-यह अज्ञान का प्रतीक है। दरअसल मनुष्य के मन में जो विश्वास बचपन में उसके माता पिता द्वारा स्थापित किया जाता है उसी को मानकर वह आगे बढ़ता जाता है। कहा भी जाता है कि माता पिता प्रथम गुरू होते हैं। उनके द्वारा मन में स्थापित संस्कार,आस्था तथा इष्ट के स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि बचपन से ही मन में स्थापित संस्कार और आस्थाओं से आदमी आसानी से नहीं छूट पाता-एक तरह से कहा जाये कि पूरी जिंदगी वह उनसे परे नहीं हो पाता।

कहा भी जाता है कि आदमी में संस्कार,नैतिकता और आस्था स्थापित करने का समय बाल्यकाल ही होता है। ऐसे में कुछ लोग निराशा, लालच,भय या आकर्षण की वजह से से अपने धर्म या आस्था में बदलाव लाते हैं पर बहुत जल्दी ही उनमें अपने पुराने संस्कार, आस्थाऐं और इष्ट के स्वरूप का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगता है पर तब उनको यह डर लगता है कि हमने जो नया विश्वास, धर्म या इष्ट के स्वरूप को अपनाया है उसको मानने वाले दूसरे लोग क्या कहेंगे? एक तरफ अपने पुराने संस्कार और आस्थाओं की खींचने वाला मानसिक विचार और दूसरे का दबाव आदमी को तनाव में डाल देता है। धीरे धीरे यह तनाव आदमी की देह और मन में विकार पैदा कर देता है। इसलिये अपने अंदर बचपन से स्थापित संस्कार,आस्था और इष्ट के स्वरूप में में कभी बदलाव नहीं करना चाहिये बल्कि अपने धर्म के साथ ही चलते हुए सांसरिक कर्मों में निष्काम भाव से लिप्त होना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीगीता में कहा भी है कि अपना धर्म गुणहीन क्यों न हो पर उसका त्याग नहीं करें क्योंकि दूसरे का धर्म कितना भी गुणवान हो अपने लिये डरावना ही होता है।
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Thursday, June 25, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-धरती पर बसे प्राणियों के स्वभाव भिन्न भिन्न

वैराग्ये संचरत्तयेको नीतौ भ्रमति चापरः
श्रृंगारे रमते कश्चिद् भुवि भेदाः परस्परम्

इस दुनियां में कोई वैरागी होकर मोक्ष प्राप्त करना चाहता तो कोई नीति शास्त्र का अध्ययन कर रहा है कोई कोई तो श्रृंगार रस का आनंद उठा रहा है। इस भूमि पर रहने वाले प्राणियों के स्वभाव अलग अलग हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पांचों उंगलियां बराबर नहीं हैं। प्रकृत्ति में जो विविधता है उसी में संसार को चलने वाली प्रक्रिया में सामंजस्य छिपा हुआ है। अगर पांचों उंगलियां बराबर होती तो शायद इंसान काम नहीं कर पाता। आज कंप्यूटर युग में जरा अपनी उंगलियों का अवलोकन करें। अगर उंगलियां बराबर होती तो क्या इसके कीबोर्ड पर काम किया जा सकता था? कतई नहीं! उंगलियां छोटी बड़ीं हैं इसलिये कीबोर्ड पर नाचते समय आपस में नहीं टकराती। हम उन्हें पंक्ति में एक साथ इसलिये खड़ा कर पाते हैं क्योंकि वह छोटी बड़ीं हैं। अगर कल्पना करें यह समान लंबाई की होती तो इन्हें एक पंक्ति में खड़ा कर काम नहीं कर सकते थे। हमारे पांवों की उंगलियां भी बराबर नहीं हैं। अगर वह बराबर होती तो हम अपनी देह के बोझ को उन पर खड़ा नहीं कर पाते। यह विविधता ही शरीर को लचीला बनाये रखते है।

इसी तरह जीवों के स्वभाव की विविधता की वजह से ही यह संसार चल रहा है। यह अंतर मनुष्यों में भी है। कुछ लोगों का स्वभाव हमें रास नहीं आता पर उस पर चिढ़+ना नहीं चाहिए। सभी लोगों के स्वभाव के साथ सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास ही जीवन में प्रसन्नता का बोध करा सकता है। यहां हर व्यक्ति अपने स्वभाव के वश होकर अपना कर्म करता है। इसे हम ऐसा भी कहते हैं कि हर व्यक्ति को उसका स्वभाव अपने वश में कर किसी कार्य करने के लिये प्रेरित करता है।
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Thursday, April 09, 2009

सेवा करते हुए स्वामी जैसा प्राप्त किया सम्मान, जय श्री हनुमान-आलेख

आज हनुमान जयंती है। हनुमान जी में हृदय से भक्तिभाव रखने वाले लोग उनके प्रभाव को जानते है। हनुमान जी के चरित्र को आज के संदर्भों में देखें तो ऐसा लगता है कि उनमें भक्तिभाव रखने के साथ उनके चरित्र की भी चर्चा करना चाहिए। श्री हनुमान जी के चरित्र के मूल में हमें उनका भगवान श्रीराम के प्रति ‘सेवाभाव‘ और ‘भक्ति भाव’’ और श्री सुग्रीव के प्रति मैत्रीभाव सदैव आकर्षित करता रहा है। हम जब उनका स्मरण करता हैं तो ‘सेवक से स्वामी’और ‘भक्त से भगवान’ बनने वाले एक इष्ट की तस्वीर हमारे मस्तिष्क में उभरती है। यह तस्वीर भक्तों के मन और मस्तिष्क में इस तरह स्थापित है कि जब वह प्रति मंगलवार और शनिवार जब मंदिर जाते हैं तो उनकी वहां स्थापित तस्वीर से अधिक भक्तों के हृदय में स्थापित तस्वीर उनको आकर्षित करती है और उनको लगता है की साक्षात हनुमान जी उनके सामने है।वर्तमान में जब हम जब समाज की हालत देखते हैं तो लगता है कि हनुमान जी चरित्र के मूल गुणों की भी अधिक मुखर होकर करना व्याख्या करना चाहिए ताकि लोग सेवा करने का महत्व समझें और केवल स्वामीपन के अंहकार में न फंसे रहें ।

आजकल लोग सेवक की बजाय स्वामी बनने के लिये आतुर रहते है और जिनके हाथ में वैभव का भंडार है वह भगवान बनकर अपने लिये भक्तों को खरीदना चाहते है। हनुमान जी का राम और सुग्रीव के प्रति जो समर्पण था वह सत्य और धर्म की वजह से था-न कि उसके पीछे उनका कोई स्वार्थ था। श्री राम मर्यादा पुरुषोतम थे ओर किसी भी स्थिति में उन्होंने धर्म से मूंह नहीं मोड़ा था। सुग्रीव ने हर स्थिति में श्रीराम को सहायता का आश्वासन दिया था। जब राजपाट मिल गया और वह वैभव और व्यसनों के मायाजाल में फंसकर अपना मूल कर्तव्य भुला बैठे तब एक हनुमान ही थे जो उन्हें लगातार समझाते रहे कि उन्हें अपने कर्तव्य का स्मरण करना चाहिए। यह उनके सेवा और भक्ति की सही शक्ति थी जो अपने स्वामी से सत्य कहने का सहस प्रदान करती है। श्रीसुग्रीव ने उनकी बात मान ली और अपनी सेना को तैयार होने का आदेश दिया। इसी बीच कुपित लक्ष्मण जब उनके महल में दाखिल हो गये तो सबसे पहले हनुमानजी ने ही उन्हें प्रसन्न करने के लिए समझाया था। श्रीलक्ष्मण जी उनकी बात सुनकर ही शांत हुए थे। इस प्रसंग में यह स्मष्ट होता है कि श्रीहनुमान जी न वरन् समय, देशकाल तथा राज्य की परिस्थितियों का ज्ञान रखते थे बल्कि उन्हें राजनीति का भी अच्छा ज्ञान था।

किष्किंधा में सुग्रीव के बाद श्री हनुमान जी को ही सम्मान प्राप्त था। यह उनके बाहूबल के साथ उनके बुद्धिमान होने का भी प्रमाण था। जब सीता जी की खोज में सब वानर थक गये तब उनके नेता अंगद का धीरज टूट गया और वह आमरण अनशन पर बैठ गये। श्री हनुमान ने तब विचार किया कि इस तरह तो अंगद संभवतः सुग्रीव का राज्य छीन लेंगे-कारण वानरों में कष्ट सहने की क्षमता वैसे ही कम होती है, और जब भूख से यह लोग बिलबिलाऐंगे ओर उनको परिवार की याद आयेगी तो वह उग्र हो जायेंगे और सुग्रीव का भय इनमें समाप्त हो जायेगा। तब वह अंगद को आगे कर उनसे लड़ने को भी तैयार हो जायेंगे।विचार करते हुए श्रीहनुमान जी ने वहां सब वानरों को पृथक-पृथक समझाकर कर अंगद से अलग कर दिया और फिर उन्हें समझाने लगे कि यह वानर आपका लंबे समय तक साथ देने वाले नहीं है पर इससे आप सुग्रीव को जरूर नाराज कर लेंगे। उनकी बात का अंगद पर प्रभाव हुआ और वह अपना अभियान आगे जारी रखने को तैयार हुए। इस प्रसंग से श्री हनुमान जी के रणनीतिक चातुर्य और बौद्धिक कौशल की जो अनूठी मिसाल मिलती है वह विरले ही चरित्रों में होती है। उनका एक गुण जिसने उनके चरित्र को भगवान पद पर प्रतिष्ठित किया वह है अहंकार रहित होना। इतने शक्तिशाली और बुद्धिमान होते हुए भी किसी को हानि पहुंचाना या अपमानित करने जैसा कार्य उन्होंने कभी नहीं किया। वह अपनी शक्ति का स्मरण तक नहीं करते थे। जब लंका जाने का प्रश्न आया तो सब घबड़ा गये तब जाम्बवान ने जब श्रीहनुमान को अपनी शक्ति का स्मरण कराकर इस कार्य के लिये प्रेरित किया तब वह तैयार हो गये। जरा हम आजकल लोगों के चरित्र पर दृष्टिपात करें जो थोड़ा धन, छोटा पद, और छोटी सफलता में ही मतमस्त हो जाते है। उन्हें श्रीहनुमान जी के चरित्र का अध्ययन कर यह सीखना चाहिए कि शक्ति का प्रदर्शन दूसरों का दिखाने के लिये नहीं वरन् समाज और राष्ट्र हित के लिये करना चाहिए। हमने श्रीहनुमान जी के चरित्र की जो चर्चा की उसे हर कोई जानता है।

अपने देश के अध्यात्मिक लोग मानते हैं ऐसी सत्संग चर्चा होती रहना चाहिए। जब हम किसी के अच्छे गुणों की चर्चा करते है तो वह धीरे धीरे हम में भी स्थापित हो जाते है और हम कभी किसी के बुराईयों की चर्चा करते हैं तो वह भी हमारे अंदर आ जाती है। अत: अपने इष्टों की भक्ति के साथ उनके गुणों का भी बखान करते रहना चाहिए उनसे प्रेरणा मिले। इस पावन अवसर पर हम भगवान श्री हनुमान का स्मरण करते हुए उनको प्रणाम करते हैं। इस अवसर पर समस्त पाठकों और ब्लॉग लेखक मित्रो को बधाई।
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Saturday, April 04, 2009

कबीर के दोहे: इच्छाओं के अग्नि जितनी बुझाओ उतनी ही बढ़ती जाती है

त्रिज्ञणा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ
जवासा के रूष ज्यूं, घण मेहां कुमिलाइ


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन में जो त्रृष्णा की अग्नि कभी बुझती नहीं है जैसे उस पर पानी डालो वैसे ही बढ़ती जाती है। जैसे जवासे का पौधा भारी वर्षा होने पर भी कुम्हला जाता है पर फिर हरा भरा हो जाता है।

‘कबीर’ मन फूल्या फिरै, करता हूं मैं ध्रंम
कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।


वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नरक का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढि़यों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए।
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Sunday, March 08, 2009

संत कबीर के दोहे: मन की तृष्णा की आग जितनी बुझाओ उतनी बढ़ती है

‘कबीर’ मन फूल्या फिरै, करता हूं मैं ध्रंम
कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।
त्रिज्ञणा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ
जवासा के रूष ज्यूं, घण मेहां कुमिलाइ


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन में जो त्रृष्णा की अग्नि कभी बुझती नहीं है जैसे उस पर पानी डालो वैसे ही बढ़ती जाती है। जैसे जवासे का पौधा भारी वर्षा होने पर भी कुम्हला जाता है पर फिर हरा भरा हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नरक का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढि़यों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए।
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Friday, January 02, 2009

कबीर के दोहे:हाथी के मुहँ से दाना गिरे तो उसे अन्तर नहीं पड़ता

कुंजी मुख से कन गिरा, खुटै न वाको आहार
कौड़ी कन लेकर चली, पोषन दे परिवार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि खाते हुए हाथी के मुख से यदि अन्न का दाना गिर जाये तो उसके आहार पर कोई अंतर नहीं पड़ता पर उसे चींटी ले जाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करती है। इस तरह यह संसार दया भाव पर चलता है।
भावे जाओ बादरी, भावै जावहु गया
कहै कबीर सुनो भाई साधो, सब ते बड़ी दया

संंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि चाहे बद्रीनाथ जाओ या गया धाम, जहां अच्छा लगे वहां जाओं पर इस संसार में मन को प्रसन्न करने का केवल एक ही तरीका है कि दूसरे पर दया करो।
जहां दया वहां धर्म है, जहां लोभ तहं पाप
जहां क्रोध वहां काल है, वहां क्षमा वहां आप

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जहां दया है वहीं धर्म स्थित होता है और जहां लोभ है वहां पाप है। जहां क्रोध है वहां काल और जहां क्षमा है वहां परमात्मा का वास है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अधिकतर लोग अपने स्वार्थ की सिद्धि कर ही यह मानते हैं कि उन्होंने अपनी कर्तव्य को पूरा कर लिया। अपने परिवार का भरण भोषण करते हुए उसके सदस्यों की मांगों की पूर्ति करने का अर्थ यह नहीं कि हम संसार चला रहे हैं। सुख और दुःख से कोई मुक्त नहीं है। आपत्ति और प्रसन्नता समय के अनुसार सभी को प्राप्त होती है पर फिर भी हमारे लिये परीक्षा के क्षण तब आते हैं जब कि अन्य व्यक्ति को हमारी जरूरत होती है।

समय आने पर दूसरे की मदद करने वाले लोग भी हो्रते हैं। हम समय पड़ने पर किसी की सहायता न करें पर कोई तो किसी की मदद करता ही है। काम किसी का रुकता नहीं है पर हम अगर यह सोचकर किसी की सहायता नहीं करते कि कोई अन्य आकर कर लेगा तो हम अपने धर्म से विमुख होते हैं।
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Tuesday, December 30, 2008

संत कबीर वाणी:हीरे का होता है मोल, पर सुंदर शब्द कहलाते हैं अनमोल

शब्द बराबर धन नहीं, जो कोय जानै बोल
हीरा तो दामों मिलै, सब्दहिं मोल न तोल

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर कोई अपनी वाणी से शब्द बोलना जानता हो तो वास्तव में उचित शब्द के बराबर कोई धन नहीं है। हीरा तो फिर भी पैसा खर्च करने पर मिल जाता है पर दूसरे को प्रभावित करने वाले शब्द हर कोई नहीं बोल पाता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आज के भौतिक युग में लोगों के संवेदनशीलता कम होती जा रही है। किसी से प्रेमपूर्वक बोलना चमचागिरी कहा जाता है। सच तो यह है कि लोग उसी से प्रेम से बोलते हैं जिससे कोई काम निकलता है या किसी से डरते हैं। अपने से छोटे या निम्न व्यक्ति के साथ तो हर कोई शुष्क और कठोर व्यवहार करता है। इसका एक पक्ष यह भी है कि अगर किसी से प्रेमपूर्वक बात की जाये तो वह सामने वाले को कमजोर और डरपोक समझने लगता है। कुछ लोग तो ऐसे भी है जो प्रेम ओर मित्रता से बात करने पर मखौल उड़ाने लगते हैं। इसके बावजूद विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। हमें अपना व्यवहार साफ रखना चाहिए। जितना हो सके सुंदर और मधुर वाणी में बोलना चाहिए।

एक सच यह भी है कि मधुर और प्रेमपूर्ण वाणी भी तभी बोली जा सकती है जब अपना मन साफ हो। अगर मन में कुविचार रखकर किसी से मधुर वाणी में बोलेंगे तो उसका कोई प्रभाव नहीं होता। किसी से डरकर भी जब उससे मधुर शब्द बोलते हैं तो वह समझ जाता है। कई लोग तो मधुर शब्द बोलकर ठगते हैं और यह सब लोग समझ जाते हैं। अतः मन में स्वच्छता रखकर हम किसी से बात करेंगे तो हमारी वाणी से सुंदर और मधुर शब्द जरूर निकलेगें और उसका प्रभाव भी होगा।
इसके अलावा आजकल लोगों में सहज वार्तालाप के दौरान ही अनावश्यक रूप से गालियाँ देने की प्रवृति बढ़ती जा रही है जो कि ख़राब है. खासतौर से पढ़े लिखे लोग इसका शिकार हो रहे हैं. इससे व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों पर पानी फ़िर जाता है और छोटों की दृष्टि में बड़ों का सम्मान कम होता है. सबसे बड़ी बात यह है की हम इसके प्रभावों का अध्ययन नहीं करते. जब कोई दूसरा गाली देता हैं हमें स्वयं को अटपटा लगता है पर जब हम बोलते हैं तो यह नहीं सोचते कि दूसरे को भी बुरा या अटपटा लग सकता है.
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Monday, December 22, 2008

रहीम संदेश: अब इस बाग में घास के ढेर रह गए हैं

रहिमन अब वे बिरछ कहं जिनकी छांह गंभीर

बागन बिच बिच देखिअत, सेंहुड, कुंज करीर

कवीवर रहीम कहते हैं की अब इस संसार रुपी बाग़ में अब वह वृक्ष कहाँ है जो घनी छाया देते हैं। अब तो इस बगीचे में सेमल और घास फूस के ढेर या करील के वृक्ष ही दिखाई देते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हम कहते हैं कि ज़माना बहुत खराब हैं पर देखें तो यह केवल हमारा एक नजरिया है। इस कलियुग में तो झूठे और लघु चरित्र के लोगों का बोलबाला है। रहीम जी के समय तो फिर भी सात्विक भाव कुछ अधिक रहा होगा पर अब तो स्थिति बदतर है।

पहले तो लोग दान -पुण्यके द्वारा समाज के गरीब तबके पर दया करते थे और अन्य भी तमाम तरह की समाज सेवा करते थे। आपने देखा होगा कि अनेक धर्म स्थलों पर तीर्थ यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनीं हैं जो अनेक तरह के दानी सेठों और साहूकारों ने बनवाईं पर आज उन जगहों पर फाईव स्टारहोटल बन गए हैं। कहने का तात्पर्य अब वह लोग नहीं है जो समाज को अपने पैसे, पद और प्रतिष्ठा से छाया देते थे। अगर कुछ लोग दानवीर या दयालू बनने का दिखावा करते हैं तो उनके निज स्वार्थ होते हैं। ऐसे लोगों से सतर्क रहने की जरूरत है।


मूल बात यह है कि इस समय भारत में ही नहीं वरन् विश्व में अमीर और गरीब के बीच धन की उपलब्धता को लेकर खाई बढ़ रही है। सभी जगह गरीबों की स्थिति दिन ब दिन खराब होती जा रही है पर हमारा भारत देश जो कि दान और सत्संग की द्वारा समाज में सामाजिक समन्वय स्थापित करने के लिये जाना जाता था वहां भी लोग पाश्चात्य संस्कृति की राह पर चल पड़े हैं और यह मान लिया गया है कि गरीब और कमजोर का कल्याण करना सरकार का ही काम है। इस भावना से मुक्त होना होगा।

Thursday, December 11, 2008

रहीम के दोहे:प्रेम में जो त्याग न करे वह पशु समान

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत

ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछु न देत

कविवर रहीम कहते हैं कि बंसी की धुन पर रीझकर हिरन शिकार हो जाता है उसी तरह मनुष्य भी प्रेम के वशीभूत होकर अपना तन, मन और धन न्योछावर कर देता है लेकिन वह लोग पशु से भी बदतर हैं जो किसी से खुशी तो पाते हैं पर उसे देते कुछ नहीं है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-वैसे देखा जाये तो आज के युग भी यह सत्य है कि अधिकतर लोग मुफ्त में मजे करना चाहते हैं। किसी से बिना लिए-दिए काम करने में चतुराई समझी जाती है। कई सरल ह्रदय लोग प्रेमवश दूसरों का काम कर देते हैं तो उनको मूर्ख समझा जाता है। हालांकि चतुर लोग भी प्रेम में ही मूर्ख बनते हैं। आजकल आपने देखा होगा कि तमाम तरह के विज्ञापन आते हैं जिनमें बडे प्रेम से विनिवेश और अन्य लाभों के बारे में बताया जाता है और लोग उसके शिकार हो जाते हैं। अनेक पढी-लिखी लडकियां प्रेम में अपना सर्वस्व लुटा बैठतीं है और बाद में उनके पास पछताने का भी अवसर नहीं होता। हालात यह है कि अपने से बहुत अधिक आयु और अकमाऊ व्यक्ति के साथ घर से भाग कर विवाह कर अपना जीवन तबाह कर बैठतीं हैं।

कुछ लड़के भी ऐसे हैं जो सुन्दर और शिक्षित लडकी से प्रेम का ढोंग करते हैं पर विवाह के समय अपने परिवार वालों का वास्ता देकर नाता तोड़ लेते हैं। इतना ही नहीं कई माता-पिता भी लड़की के सुयोग्य होते हुए भी बिना दहेज़ के विवाह करने से इनकार कर देते हैं। कहते हैं कि हर माता-पिता अपने बच्चे से प्रेम करते हैं पर कई ऐसे लड़के हैं जो विवाह की आयु पार कर चुके हैं पर उनका दिल नहीं पसीजता कि उसका विवाह कम दहेज़ में कर दें। कुल मिलाकर प्रेम एक दिखावा हो गया है और कहा जाये तो अब मानव भेष में पशु होने लगे हैं। अत: समझदार लोगों को चाहिए कि अगर कोई उनको प्रसन्न करता है तो उसे भी कुछ दें तभी वह अपने इंसान होने की अनुभूति कर सकते हैं और यही ईश्वर भक्ति भी है।

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