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Tuesday, June 14, 2011

भर्तृहरि नीति शतक से संदेश-मनुष्य अपना जीवन भोजन में ही गुजार देता है

        इस संसार में माया और सत्य का संयोग और संघर्ष सदैव चलता रहा है। ईमानदार, परिश्रमी और संयमी लोगों की सक्रियता कम  होती है जिस कारण उनके पास अकूत धन संपदा नहीं होती जबकि भ्रष्ट और बेईमान लोगों की सक्रियता अधिक होने से उनका वैभव चारों तरफ फैला दिखता है। कभी कभी तो ऐसा ऐसा अनुभव होता है कि जैसे पूरा समाज ही बेईमान है। यह बात नहीं है क्योंकि हम अगर आंखें खुली रखकर अपने मस्तिष्क के चिंतन को व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो आज भी मेहतनकश तथा गरीब लोगों की संख्या अधिक है। अनुचित ढंग  की कमाई से लोगों ने ऊंची इमारतें बना लीं और अपनी असलियत छिपाने के लिये समाज सेवा का चोगा ओढ़कर वह प्रचार में अपने विज्ञापनों के कारण प्रसिद्ध भी हो रहे हैं पर जहां पर आत्मिक सुख की बात आती है तो वह केवल सत्य पथ पर चलने वाले लोगों के भाग्य में ही आता है।
         भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि 
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           हिंसाशून्यमयल्लयमशनं धांत्रा मरुत्कल्पितं व्यालानां पशवस्तणांकुरभुजस्तुष्टः स्थलीशायिनः।
          संसारार्णवलंधनक्षमर्थियां वृत्तिः कृता सा नृणां तामन्वेषयतां प्रयांति संततं सर्वे समाप्ति गुणाः।।
          ‘‘विधाता ने सापों के लिये भोजन के रूप में हवा का निर्माण किया जो उनको बिना किसी हिंसा के प्राप्त हो जाती है। पशुओं के लिये घास बनाई और सोने के लिये धरती का बिछौना बनाया। परंतु मनुष्य बुद्धिबल से ही भोजन प्राप्त कर सकता है इसलिये उसका पूरा जीवन केवल उसी में ही लग जाता है।’’
         मनुष्य का पेट तो रोटी से भी भर जाता है पर उसका मन फिर भी नहीं मानता। उसकी बुद्धि लोभ, लालच और मोह में इस तरह फंस जाती है कि हमेशा ही वह पैसा, पद और प्रतिष्ठा पाने के लिये इधर उधर भटकता है। अनेक लोग तो ऐसे हैं जो अच्छा खासा कमाते हैं पर कहते हैं कि ईमानदारी से उनका घर नहीं चल सकता। जबकि इस समाज में ऐसे भी लोग भी है जो केवल वेतन या थोड़ी कमाई के भी अपना जीवन यापन कर शांति से जीवन बिताते हैं। दरअसल हर जीव का दाता तो भगवान है पर जो लोग बेईमानी से धन कमाते हैं वह परिवार की जरूरतों को पूरा करने का ढोंग भले ही कर कर्ता बनने की खुशी पाते हैं पर वह उनका वहम है। अगर यह बेईमान देह त्याग भी दें तो भी उनका परिवार जिंदा रहेगा और उसके सदस्य अपने जीवन यापन के लिये कोई दूसरा मार्ग ढूंढ लेगा। ऐसे में उनकी परिवार की मज़बूरी केवल स्वयं को धोखा देने के लिये है।
          कहने का अभिप्राय यह है कि सभी का दाता परमात्मा है और बेईमानी और भ्रष्टाचार के लोग अपनी बाध्यताओं का दिखावा करें ऐसा करके वह स्वयं को धोखा देते हैं। अगर आदमी आत्ममंथन करे तभी इस बात को समझ सकता है।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Sunday, June 20, 2010

संत कबीर के दोहे-जैसा खाना खायेंगे वैसे विचार हो जायेंगे

साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं
धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं
कबीर दास जीं कहते हैं कि संतजन तो भाव के भूखे होते हैं, और धन का लोभ उनको नहीं होता । जो धन का भूखा बनकर घूमता है वह तो साधू हो ही नहीं सकता।

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय
जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय
संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है वैसा ही बन जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्रीमद्भागवत गीता के संदेश के अनुसार गुण ही गुणों में बरतते हैं। जिस तरह का मनुष्य भोजन ग्रहण करता है और जिस वातावरण में रहता है उसका प्रभाव उस पर पड़ता ही है। अगर हम यह मान लें कि हम तो आत्मा हैं और पंच तत्वों से बनी यह देह इस संसार के पदार्थों के अनुसार ही आचरण करती है तब इस बात को समझा जा सकता है। अनेक बार हम कोई ऐसा पदार्थ खा लेते हैं जो मनुष्य के लिये अभक्ष्य है तो उसके तत्व हमारे रक्त कणों में मिल जाते हैं और उसी के अनुसार व्यवहार हो जाता है।
आज जो हम समाज में तनाव और बीमारियों की बाहुलता देख रहे हैं वह सभी इसी खान पान के कारण उपजी हैं। कहते हैं कि स्वस्था शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है, इसका आशय यही है कि सात्विक भोजन से जहां मन प्रसन्न रहता है वहीं तामस प्रकार का भोजन शरीर और मन के लिये कष्टकारक होता है। दूसरी बात यह है कि जो साधु प्रकृत्ति के लोग हैं वह खाने पीने या पैसा लेने के लालची नहीं होते बल्कि उनमें तो भाव की भूख होती है।  अधिक से सत्संगी पाकर वह अपने को धन्य समझते हैं।  जो अपने भक्त या सत्संगियों को ग्राहक समझते हैं उनको तो कभी संत कहना ही नहीं चाहिए। 
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, June 06, 2010

हिन्दू आध्यामिक दर्शन-भक्ति के विभिन्न स्वरूप मान्य (hindu adhyamik sandesh-bhakti ke alag laga roop)

विरोधः कर्मणीति चैन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात्।।
हिन्दी में भावार्थ-यदि देवताओं की पूजा, यज्ञादि कर्म में विरोध आता है तो उसे ठीक नहीं मान लेना चाहिये क्योंकि उनके द्वारा एक ही समय में अनेक रूप धारण करना संभव है-ऐसा देखा गया है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में सांस्कृतिक, सांस्कारिक, तथा सामाजिक विविधता है और यही विश्व में हमारी पहचान भी है।  भगवत्स्वरूप को हर जगह विविध रूप में स्थापित किया जाता है और देवों की पूजा में भी भिन्नता दिखाई देती है।  उत्तर से दक्षिण तक विवाह आदि घरेलू कार्यों के अवसर पर यह विविधता दिखाई देती है।  इस विविधता को विरोध का प्रमाण नहीं समझना चाहिये। हमारा देश अत्यंत बृहद है जहां पांच कोस पर बोली बदल जाती है वहां भक्ति तथा भजन का रूप भी बदलता है। फिर अपने यहाँ निष्कामं तथा सकाम दोनों प्रकार कि भक्ति को मान्यता है वहां किसी का विरोध नहीं करना चाहिए।
इसके अलावा हमारे यहां, भगवान विष्णु, ब्रह्मा, तथा शिव को अपने अपने ढंग से अनेक भक्त अपना इष्ट मानते हैं।  भगवान विष्णु के तो 14 अवतार माने जाते हैं।  इन विविध रूपों के अनुसार भी अनेक क्षेत्रों में स्थापित प्रतिमाओं में भी विविधता देखी जाती है।  इसका अन्य धर्मावलंबी मजाक बनाते हैं पर यह उनके अज्ञान का प्रमाण है।  भारतीय अध्यत्मिक रहस्यों को समझे बिना भारत के ही अनेक लोग भी विपरीत टिप्पणियां करते हैं।  दरअसल मुख्य विषय भक्ति है और विभिन्न स्वरूपों की प्रतिमायें पूजने का आशय आकार से निरंकार की तरफ जाना होता है।  अगर हम देश की सीमाओं से उठकर देखें तो यहां से बाहर स्थापित स्वरूप भी इसी तरह विरोध भाव से परे हैं और यही कारण है कि भारतीय अध्यात्मिक पुरुषों ने कभी किसी दूसरे धर्म पर आक्षेप न कर उनको व्यापक दायरे में मान्यता दी। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञानी कभी किसी दूसरे के धर्म को निशाना नहीं बनाते।
मुख्य बात यह है कि अपने धर्म पर दृढ़ता से स्थित रहते हुए अपना कर्म करना चाहिये और जिस रूप में नारायण का मानते हैं उसका ही स्मरण करना चाहिये। चाहे कैसा भी समय हो उसके स्वरूप में बदलाव न करन  में ही हितकर  नहीं है बल्कि  अविश्वास, दबाव या लालच में आकर ऐसा करना भारी मानसिक कष्ट का कारण होता है। जो लोग अपने भक्ति या विश्वास में बदलाव करते हैं उनको हासिल तो कुछ नहीं होता उलटे लोगों में हंसी का पात्र बनते हैं।
संकलक एवं संपादक-दीपक
भारतदीप,Gwalior
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Sunday, May 30, 2010

श्रीमदभगवद्गीता गीता एक स्वर्णिम ग्रंथ है-रविवारीय चिंतन (shri madbhagvat geeta a golden book)

अपना अपना विचार है और उसके अभिव्यक्त होने की भी अलग अलग शैली होती है। इसलिये किसी के कुछ लिखने और पढ़ने पर उस आदमी के आंतरिक मनस्थिति की भी जानकारी मिल जाती है। इस देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग पढ़ते कम हैं लिखने और कहने के लिये लालायित अधिक रहते हैं। समझते कम हैं दूसरे को समझाने के लिये दौड़ पड़ते हैं। सो जैसे लेखक वैसे पाठक, जैसे गुरु वैसे चेले और जैसे बुद्धिजीवी वैसे आम श्रोताओं का एक समाज यहां बन गया है जो अंततः जड़ता की स्थिति में हैं। जहां अनेक लोग मैंढक की तरह टर्र टर्र करते हुए समाज में बदलाव की बात करते हैं पर कहीं पता खड़कता तक नहीं दिखाई देता। समाज को बदलने की बात करने वाले स्वयं में बदलाव नहीं लाते केवल नारे लगाते हैं। जिनमें एक यह भी कि दुनियां के सारे धार्मिक ग्रंथ मानवता का संदेश देते हैं मगर दुनियां है कि सुधरती नहीं है।
यही कारण है कि दुनियां का स्वर्णिम ग्रंथ श्रीमदभगवद्गीता जितना प्रसिद्धि है उसकी सामग्री के बारे में बहुत कम लोग समझते हैं। स्थिति यह है कि एक धार्मिक संस्था के कैलेंडर पर बहुत अच्छी बातें लिखी गयी थीं और संदर्भ दिया गया श्रीगीता का मगर उसमें एक भी बात प्रमाणिक रूप से मौजूद नहीं है।
एक आदमी कभी पार्क के अंदर नहीं गया। वह तो उसके पास से गुजरता भर था। उसका पार्क के चारो और के मार्ग पर आना जाना था पर अंदर झांकने की उसने कोशिश नहीं की क्योंकि वह ऊंची झाड़ियों से घिरा हुआ था। इसके बावजूद दूसरों से वह बखान करता है कि उस पार्क में अनेक प्रकार के  फूलों की जोरदार खुशबू फैलती है। अनेक प्रकार के वृक्ष हैं।
एक ने पूछा-‘वहां कौनसे फूल खिलते हैं?
उस आदमी ने जवाब दिया कि-‘गुलाब, कमल, चंद्रमुखी तथा और भी बहुत से किस्म के फूल हैं जिनकी खुशबू से मन खुश हो जाता है।
इस तरह वह पार्क का एक बहुत बड़ा प्रचारक बन गया था। जहां भी जाता उस पार्क के लोगों को बताता, अलबत्ता वहां के फूल और पेड़ पौद्यों की वास्तविक जानकारी उसके पास नहीं थी। एक दिन एक वनस्पति ज्ञानी उस पार्क में गया और उसने वहां का अध्ययन कर एक बहुत बड़ा लेख अखबार में लिख डाला। उसकी चर्चा लोग उस आदमी से करने लगे तो वह कहने लगा कि ‘उंह, उससे ज्यादा तो हम जानते हैं क्योंकि उसने जितना लिखा है उससे ज्यादा तो हम लोगों को बता चुके हैं। जितने लोगों का  उसे पढ़कर इस पार्क में जाना नहीं होगा उससे ज्यादा तो हमारे मुंह से सुनकर लोग वहां आते हैं।
श्रीमद्भागवत गीता के बारे में जो उसके ज्ञान की चर्चा करते हैं उनकी स्थिति उस आदमी की तरह ही है जो कभी पार्क के अंदर नहीं गया। फिर अपने समाज में व्यवसायिक रूप से धार्मिक विचारक सक्रिय हैं। देश में जातीय,धार्मिक तथा भाषाई समुदायों में उनको अपने ग्राहक या भक्त ढूंढने होते हैं इसलिये वह एकता कराने के लिये भी प्रयास करते हैं ताकि वह सर्वप्रिय हो सकें।
कई संत या विचारक तो इतने शुद्ध व्यवसायिक हैं कि वह श्रीमदभगवद्गीता की तुलना अन्य धर्म ग्रंथों के साथ भी करते हैं तो कई ऐसे भी हैं जो अन्य धर्म ग्रंथ के ज्ञान जैसा ही श्रीमद्भागवत गीता का भी ज्ञान बताते हैं। चार पांच अन्य धर्म ग्रंथों की पुस्तकों का नाम लेकर श्रीगीता का नाम उसमें जोड़कर कह दिया जाता है कि ‘सारे ग्रंथ भाई चारे, प्रेम तथा अंिहसा का उपदेश देते हैं।
सच बात तो यह है कि यह सभी ऐसे संत और बुद्धिजीवी उस आदमी तरह हैं जो उस पार्क में गया ही नहीं जिसका प्रचार करते हैं। उनके मुख से श्रीमद्भागवत गीता का नाम सुनकरा हैरानी होती है क्योंकि इसका मतलब यह है कि वह उसे पढ़ते नहीं और पढ़ते है तो समझते नहीं। जबकि सत्य यह है कि एक बार जो पवित्र भाव से श्रीगीता का अध्ययन करेगा तो फिर उसे अन्य धर्म पुस्तकों से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता । जिस तरह पार्क का प्रचाकर तो तो केवल उसके चारों ओर बाहर से घूमकर निकल जाता था वही स्थिति उन धार्मिक प्रचारकों की है जो दूसरे धर्म ग्रंथों के साथ श्रीमद्भागवत गीता की तुलना करते हैं।
जो वास्तव में श्रीगीता का ज्ञान रखते हैं वह वनस्पति ज्ञानी की तरह हैं जो केवल इसी पर बोला और लिखा करते हैं।
वैसे श्रीमदभगवद्गीतादुनियां का ऐसा अकेला ग्रंथ है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान है। श्रीगीता में भी प्रेम, भाईचारे, दया, सहिष्णुता तथा परोपकार की बात तो कही गयी है पर यह भी बताया गया है कि जब तक सहज योग की शरण नहीं लेंगे तब यह सब आप नहीं कर पायेंगे। शरीर के विकार निकाले बिना मन के विकार निकालना कठिन काम है। भक्त चार प्रकार के बताये गये हैं-आर्ती, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी।
दो तरह की प्रकृत्तियों के मनुष्य बताये हैं-आसुरी और देवीय।
तीन प्रकार के कर्म तथा कर्ता बताये गये हैं-सात्विक, राजस और तामसी।
सामाजिक समन्वय तथा स्वयं को तनाव रहित रखने के लिये निष्काम कर्म भक्ति, निष्प्रयोजन दया तथा योग में रत रहने के साधन बताये गये हैं।
श्रीमदभगवद्गीता के संदेशों का अध्ययन करें तो यह बात सामने आती है कि मनुष्य और उसके कर्म के उतने प्रकार इस धरती पर हमेशा रहेंगे और उनकी विविधता को मिटाना संभव नहीं है। मुख्य विषय यह है कि आप अपने कर्म और निश्चय पर ध्यान दें। इसके विपरीत अन्य धार्मिक पुस्तकें इस सत्य से परे हैं और वह सभी मनुष्यों की प्रकृत्तियों और कर्म में साम्यता लाने का असंभव सा प्रयास करने का संदेश देती हैं। व्यक्ति को अपने सुधार के बाद समाज में सुधार लाने का प्रयास करने का संदेश देती हैं जो कि एक तरह का तामसिक प्रयास है। जब आप दूसरे को अपनी तरह से भक्ति करने का ज्ञान देते हैं तो इसका आशय यह है कि आपने अपनी भक्ति का अहंकार दिखाया-‘मैं ऐसा करता हूं तू भी ऐसा कर तो तर जायेगा’, या ‘ऐसा करेगा तो तुझे स्वर्ग मिलेगा’-जो कि तामसी प्रवृत्ति का परिचायक है। इतना ही नहीं श्रीगीता में एकांत साधना करने की बात कही जाती है जबकि अन्य धर्म पुस्तकें सामूहिक प्रार्थनाओं का संदेश देती हैं।
ऐसी बहुत अन्य बातें हैं जो श्रीमद्भागवत गीता को अलौकिक तथा असाधारण प्रमाणित करती हैं। इसकी तुलना अन्य किसी भी धार्मिक पुस्तक से नहीं की जा सकती क्योंकि वह सभी सकाम भक्ति की प्रवर्तक हैं जिसका कोई लाभ अधिक नहीं होता क्योंकि मनुष्य अर्थार्थी होकर मतलबी हो जाता है। कुछ अज्ञात महापुरुषों ने इस शाब्दिक रूप से लघु तथा अर्थ की दृष्टि  से अत्यंत व्यापक इस ग्रंथ को इसलिये महाभारत जैसे महाग्रंथ से प्रथक किया क्योंकि वह जानते थे कि यह स्वर्णिम ज्ञान की खदान है। ऐसे महापुरुषों का आभारी इस समाज को रहना चाहिए जिन्होंने इस स्वर्णिम ज्ञान की खदान की खोज कर उसे प्रथक स्थापित किया।
shri madbhagavat geeta,bhagvan shri krishna
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Thursday, May 20, 2010

चाणक्य नीति दर्शन-अपने गुणों की स्वयं प्रशंसा करना अज्ञान का प्रमाण (khud ki taarif agyan ka praman-chankya neeti)

पर-प्रोक्तगुणो वस्तु निर्गृणऽपि गुणी भवेत्।
इन्द्रोऽ लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गृणैः।।
हिन्दी में भावार्थ-
चाहे कोई मनुष्य कम ज्ञानी हो पर अगर दूसरे उसके गुणों की प्रशंसा अन्य लोग  करते हैं तो वह गुणवान माना जायेगा किन्तु जो पूर्ण ज्ञानी है और स्वयं अपना गुणगान करता है तो भी वह प्रशंसनीय नहीं माना जा सकता चाहे भले ही स्वयं देवराज इंद्र हो।
अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु।
शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवंतु में।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस धन की प्राप्ति दूसरों को क्लेश पहुंचाने या शत्रु के सामने सिर झुकाने से हो वह स्वीकार करने योग्य नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-थोथा चना बाजे घना इसलिये ही कहा जाता है कि जिसके पास गुण नहीं है वह अपने गुणों की व्याख्या स्वयं करता है। यह मानवीय प्रकृत्ति है कि अपने घर परिवार के लिये रोटी की जुगाड़ में हर कोई लगा है और विरले ही ऐसे लोग हैं जो दूसरों के हित की सोचते हैं पर अधिकतर तो खालीपीली प्रशंसा पाने के लिये लालायित रहते हैं। धन, वैभव और भौतिक साधनों के संग्रह से लोगों को फुरसत नहीं है पर फिर भी चाहते हैं कि उनको परमार्थी मानकर समाज प्रशंसा प्रदान करे। वैसे अब परमार्थ भी एक तरह से व्यापार बन गया है और लोग चंदा वसूल कर यह भी करने लगे हैं पर यह धर्म पालन का प्रमाण नहीं है। यह अलग बात है कि ऐसे लोगों का कथित रूप से सम्मान मिल जाता है पर समाज उनको ऐसी मान्यता नही देता जैसी की वह अपेक्षा करते हैं। ऐसे लोग स्वयं ही अपनी प्रशंसा में विज्ञापन देते हैं या फिर अपनी प्रशंसा में लिखने और बोलने के लिये दूसरे प्रचारकों का इंतजाम करते हैं। कहीं कहीं तो ऐसा भी होता है कि ‘तू मुझे चाट, मैं तुझे चाटूं’, यानि एक दूसरे की प्रशंसा कर काम चलाते हैं। इसके बावजूद यह वास्तविकता है कि हृदय से केवल सम्मान उसी को प्राप्त होता है जो ईमानदारी सें परमार्थ का काम करते हैं।
धन प्राप्त तो कहीं से भी किया जा सकता है पर उसका स्त्रोत पवित्र होना चाहिये। दूसरों को क्लेश पहुंचाकर धन का संग्र्रह करने से पाप का बोझ सिर पर चढ़ता है। उसी तरह ऐसा धन भी प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिये जो शत्रु के सामने सिर झुकाकर प्राप्त होता है। आखिर मनुष्य धन किसी लिये प्राप्त करता है? यश अर्जित करने के लिये! अगर शत्रु के आगे सिर झुका दिया तो फिर वह  सम्मान कहां रह जायेगा।
मनुष्य को कभी अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं करना चाहिये।  दरअसल आज यह स्थिति यह है कि हर आदमी अपने मुख से अपनी प्रशंसा स्वयं करता है। इसका कारण यह है कि लोगों ने परोपकार तथा परमार्थ का काम करना छोड़ दिया है और उनके बिना सम्मान मिल नहीं सकता। इसलिये ही जिसे देखो आत्मप्रवंचना करने लगे में लगा है। ‘मैंने यह किया’ और ‘मैंने वह किया’ जैसी बातें कर लोग दूसरों से प्रशंसा पाना चाहते हैं। कई तो ऐसे हैं जिन्होंने कभी किसी का भला नहीं किया पर दावे बहुत करते हैं।  यह सब अज्ञानी लोगों का काम है। ज्ञानी लोग भला काम करते है पर आत्मप्रवंचना से दूर रहते हैं क्योंकि उनके काम की प्रशंसा स्वयं ही होती है। 
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, May 14, 2010

मनुस्मृति-भोजन करते समय मन को प्रसन्न रखें (hindu dharma sandesh-tanavmukt hokar bhojan grahan karen)

पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चेतकुत्सयन्
दृष्टवा हृध्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य को जैसा भोजन मिले उसे देखकर प्रसन्नता हासिल करना चाहिए। उसे ईश्वर प्रदत्त मानकर गुण दोष न निकालते हुए उदरस्थ करें। भोजन करते हुए अपनी झूठन न छोड़ें। यह कामना करें कि ऐसा अन्न हमेशा ही मिलता रहे।
पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्ज च यच्छाति।
अपूजितं च तद्भुक्तमूभयं नाशयेदिदम्।।
हिंदी में भावार्थ-
सदाशयता से ग्रहण किया भोजन बल और वीर्य में वृद्धि करता है जब निंदा करते हुए उदरस्थ करने से उसके तत्व नष्ट होते हैं। 
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिनको भोजन आराम से मिलता है उनको उसका महत्व नहीं पता इसलिये वह उसे ऐसे करते हैं जैसे कि उसकी उनको परवाह ही नहीं है। भोजन करते समय उनको यह अहंकार आता है कि यह तो हमारा अधिकार ही है और हमारे लिये बना है। सच तो यह है कि भोजन का महत्व वही लोग जानते हैं जिनको यह नसीब में पर्याप्त मात्रा में नहीं होता। स्वादिष्ट भोजन की चाह आदमी को अंधा बना देती है। अनेक बार ऐसा समय आता है जब वह सब्जी के कारण भोजन नहीं करता या उसे त्याग देता है। भोजन करते समय उसकी निंदा करेंगे। शादी विवाह में तो अब यह भी होने लगा है कि लोग भोजन थाली में भरकर लेते हैं पर उसमें से ढेर सारा झूठन में छोड़े देते हैं। सार्वजनिक अवसरों पर ऐसे भोजन की बरबादी देखी जा सकती है।
 हमें यह समझ लेना चाहिये कि भोजन तो ईश्वरीय कृपा से मिलता है। यह सही है कि दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम, पर यह भी नहीं भूलना कि अपने कर्म और भाव से भी भाग्य का निर्माण होता है। अगर हम भोजन करते हुए अहंकार पालेंगे तो संभव है कि दानों पर लिखा हमारा नाम मिट भी जाये। अपनी गृहिणी को कभी भी सब्जी आदि को लेकर ताना नहीं देना चाहिये। यह भगवान की कृपा समझें कि एक ऐसी गृहिणी आपके साथ है जो अपने हाथ से खाना बनाकर देती है वरना तो अनेक लोग घर के खाने के लिये तरस जाते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि खाते हुए अपना भाव सौम्य और सरल रखना चाहिए तभी भोजन के तत्व संपूर्ण रूप से काम करते हैं अगर मन में क्लेश या अप्रसन्नता है तो फिर खाना न खाना बराबर है। एक बात निश्चित है कि अगर तनाव में खाना खाया तो समझ लीजिये केवल पेट भरा पर उससे मिलने वाली ऊर्जा निरर्थक हो जाती है। आपने अक्सर सुना होगा कि जिनको दिमागी तनाव रहता है उन्हीं को उच्च रक्तचाप और मधुमेह की शिकायत होती है।
आजकल समस्या यह है कि लोग कमाने को ही सवौपरि मानते हैं और भोजन करना उनको बोझ जैसा लगता है इसलिये फास्ट फूड का सेवन करते हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। यही कारण है कि छोटी आयु में अनेक लोगों को ऐसे रोग होने की बातेें सामने आती हैं जो बड़ी आयु में होते हैं। दूसरा यह भी है कि आज के युवक युवतियां अतिशीघ्र खास इंसान बनने की चाहते में इतना तनाव अपने सिर पर लेते हैं कि भोजन भी आराम से नहीं करते। इससे उनको बचना चाहिये। याद रखें पैसा भगवान नहीं है भोजन को भगवान ही समझें।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Wednesday, May 12, 2010

पतंजलि योग साहित्य-जात पांत से मुक्त होने पर ही जीवन का आनंद

जातिदेशकालसमयानमच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्।
हिन्दी में भावार्थ
-जाति, देश, काल तथा व्यक्तिगत सीमा से रहित होकर सावैभौमिक विचार का हो जाने पर मनुष्य एक महावत की तरह हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-महर्षि पतंजलि यहां पर मनुष्य को संकीर्ण विचाराधाराओं से बाहर आने का संदेश दे रहे हैं। योगासन और प्राणायाम के बाद मनुष्य की देह तथा मन में स्फूर्ति आती है तब उसके हृदय में कुछ नया कर गुजरने की चाहत पैदा होती है। ऐसे में वह अपने लक्ष्य निर्धारित करता है। उस समय उसे अपने मस्तिष्क की सारी खिड़कियां खुली रखना चाहिए।
हमारे देश में जाति, भाषा, वर्ण तथा क्षेत्र को लेकर संकीर्णता का भाव लोगों में बहुत देखा जाता है। सभी लोग अपने समाज की श्रेष्ठता का बखान करते हुए नहीं थकते। हमारे देश में समाज का विभाजन कर कल्याण की योजनायें बनायी जाती हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से काम करने में जातीय, भाषाई, तथा क्षेत्रीय भावनाओं की प्रधानता देखती है जाती है। इस संकीर्ण सोच ने हमारे देश के लोगों को कायर और अक्षम बना दिया है। भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है क्योंकि हर आदमी अपने व्यक्तिगत दायरों में होकर सोचता है और उसे समाज से कोई सरोकार नहीं  है।
जिन लोगों को कुशल महावत की तरह अपने जिंदगी रूपी हाथी पर नियंत्रण करना है उनको अपने अंदर किसी प्रकार की संकीर्ण सोच को स्थान नहीं देना चाहिये। जब आदमी जातीय, भाषाई, वर्णिक तथा क्षेत्रीय सीमाओं के सोचता है तो उसकी चिंता अपने समाज पर ही क्रेद्रित होकर रह जाती है। तब उसे लगता है कि वह कोई ऐसा काम न करे करे जिससे उसका समाज नाराज न हो जाये। यहां तक कि इस डर से वह दूसरे समाज के लिये हित का न तो सोचता है न करता है कि वह उसके समाज का विरोधी है। इससे उसके अंदर असहजता का भाव उत्पन्न होता है। जब आदमी उन्मुक्त होकर जीवन में में विचरण करता है तब वह विभिन्न जातीय, भाषाई, तथा क्षेत्रीय समूहों में भी उसको प्रेम मिलता है जिससे उसका आनंद बढ़ जाता है। सच बात तो यह मनुष्य जीवन आनंद लेने के लिए है और यह तभी संभव है जब संकीर्ण मानसिकता से मुक्त हों।
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Thursday, May 06, 2010

कौटिल्य दर्शन-डरपोक की संगत करना भी ठीक नहीं

प्रकृतिभिर्विरक्तप्रकृतिर्युधि।
सुखाभियोज्यो भवति विषयेऽप्यतिसक्तिमान्।।
हिन्दी में भावार्थ-
विरक्त प्रकृति वाले राजा को उसके लोग युद्ध में ही छोड़कर चले जाते हैं और विषयों में आसक्त पुरुष को थोड़ा सुख देकर ही जीत लिया जाता है।

भीरुर्यद्धपमित्यागात्स्वयमेवावसीदति।
धीरोऽप्यवीपुरुषै-संग्रामे तैर्विपुच्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
कायर मनुष्य युद्ध के त्याग से स्वयं ही नष्ट होता है। वीर पुरुष भी अगर युद्ध में किसी कायर को ले जाये तो स्वयं भी कायरता को प्राप्त होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में हर मनुष्य को संघर्ष करना पड़ता है। समय अत्यंत बलवान है अतः जब कष्ट और विरोधी सशक्त होकर आक्रमण कर रहे हों तब धीरज से काम लेकर मैदान में डटे रहना चाहिए। अपने अभियान या लक्ष्य का त्याग कर विरक्त होना कभी ठीक नहीं होता। जो मनुष्य अपने संकट और विरोधी देखकर अपने अभियान या लक्ष्य से विरक्त होकर बैठ जाता है उसके मित्र तथा सहयोग भी छोड़ जाते हैं। अतः चाहे जो भी हो मनुष्य को मैदान में डटे रहना चाहिये। जीवन में कभी कायरता नहीं दिखाना चाहिये और न ही ऐसे लोगों से संपर्क रखना चाहिये जो हमारे अन्दर डर पैदा करते हैं ।
एक समय जो लक्ष्य या अभियान विरोधियों की शक्ति और संकट के गहरे होने के कारण पूरा होता नहीं दिखता वही परिस्थितियां और समय बदलते हुए पूरा भी हो सकता है। ऐसा समय भी आ सकता है कि जब विरोधी निशक्त हो जायें और संकट स्वयं ही क्षीणता को प्राप्त हो तब मनुष्य को अपने लक्ष्य और अभियान में सफलता मिल सकती है।
अपने कार्य की सिद्धि के लिये साम, दाम, दण्ड और भेद की नीति का पूरी तरह प्रयोग करना चाहिये। जहां व्यक्ति अपने से अधिक ताकतवर हो वहां उसकी यह कमजोरी देखना चाहिये कि वह किस प्रकार के सुख से जीता जा सकता है अर्थात उसे दाम का सुख देकर अपने वश में करना चाहिए। जीवन के हर क्षण में अपने अन्दर दृढ भाव रखना चाहिए। जब हम अपने जीवन के मोर्चे पर डटे रहेंगे तभी दूसरे लोग भी हमारा साथ देंगे।
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Saturday, May 01, 2010

विदुर दर्शन-क्षमावन पुरुष की राह देवता भी देखते हैं (kshamavan purush aur devata)

अतिवादं न प्रवदेव वाद्येद् योऽनाहतः प्रतहन्यान्न घातयेत्।
हन्तुं च यो नेच्छति पापकं वै तस्मै देखाः समुहयन्त्यागताय।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो स्वयं किसी के प्रति बुरी बात न स्वयं कहता न दूसरे को कहने के लिये प्रेरित करता, बिना मार खाये किसी को नहीं मारता और न मरवाता है, अपराधी को भी क्षमा करता है, ऐसे मनुष्य के आगमन की तो देवता भी बाट जोहते हैं।
यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव।
वासो तथा रंगवश्र प्रयानि तथा तेषा वशमभ्युवैति।।
हिन्दी में भावार्थ-
जैसे कोई वस्त्र जिस रंग में रंगा जाये, वैसा ही हो जाता है उसी तरह जब कोई सज्जन आदमी किसी तपस्वी, दुष्ट या चोर की सेवा करता है तो उनके वश में हो जाता है-उनका रंग उस पर चढ़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-कहा जाता है कि शक्ति ही सहनशीलता की पहचान होती है। जिसमें शक्ति नहीं है वह बहुत जल्दी उत्तेजित हो जाता है। आजकल तो सहनशीलता का लोगों को सर्वथा अभाव दिखता है। अशुद्ध खानपान, भौतिक पदार्थों के प्रति अधिक आकर्षण तथा विलासिता को जीवन के लिये अनिवार्य मानने की प्रवृत्ति ने लोगों को शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक रूप से कमजोर बना दिया है। किसी को न तो अपनी स्वयं की आलोचना सहन होती है और न ही कोई अपने विचार पर बहस सुनना चाहता है। कहते हैं कि थोथा चना, बाजे घना-इसके दर्शन अब हर कदम पर किये जा सकते हैं। अल्पज्ञानियों का झुंड बहस करता है। निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता उल्टे झगड़े ही होते हैं। स्थिति यह है कि अमन का प्रयास करने के के लिये एक साथ निकलने वाले लोग आपस में लड़ पड़ते हैं।
यह सब हमारे समाज और लोगों की कमजोरी की निशानी है। अशुद्ध तथा मिलावटी पदार्थों के सेवन से हमारे देश के नागरिकों की शारीरिक शक्ति नित प्रतिदिन कम होती जा रही है। यह शक्तिहीनता अंततः चिढ़ में बदल जाती है। फिर संगत करने के लिये ऐसे ही लोग मिलते हैं तो जो सहज और सज्जन भाव वाले होते हैं उन पर भी रंग चढ़ जाता है। बहुत कम लोग हैं जो शांति के लिये सक्रिय रहते हैं वरना तो अधिकतर झगड़ा कर उसे देखने का शौक रखते हैं। अतः जहां तक हो सके अपने खान पान में शुद्धता के साथ अपने निजी संपर्क भी ऐसे तरह बनाये जहां से वैमनस्य फैलाने का संदेश न मिलता हो। एक बात याद रखें कि आदमी पर संगत की रंगत चढ़ती ही है, अत: इसकी उपेक्षा नहीं करना चाहिये।
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Wednesday, April 28, 2010

संत कबीरदास जी के दोहे-राम की भक्ति का रंग न चढ़े तो दोष किसे दें(ram ki bhakti ka rang-kabirdas ji ke dohe)

राम नाम को छाड़ि कर, करे और की आस।
कहैं कबीर ता नर को, होय नरक में वास।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो मनुष्य राम नाम का स्मरण छोड़कर विषय वासना में रत हो जाते हैं उनको नरक में जाकर निवास करना पड़ता है।
मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग।
कहु धौं कौन कुफेर तें, नाहीं लागत रंग।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग दिन रात भगवान के नाम का जाप करते हैं, साधुओं के पास जाते हैं ऐसे में किसे दोष दें कि उनके जीवन में रंग नहीं चढ़ता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम अपने देश की वर्तमान दशा को देखें तो दुःख होने के साथ कभी कभी हंसी भी आती है।  शायद ही दुनियां में कोई ऐसा देश हो जहां भगवान नाम का स्मरण इतना होता हो पर जितना सामाजिक तथा आर्थिक भ्रष्टाचार है वह भी कहीं नहीं होगा।  लोग एक दूसरे को दिखाने के लिये भगवान का नाम लेने  साथ ही सत्संगों में जाकर साधुओं के प्रवचन सुनते हैं पर घर आकर सभी का व्यवहार मायावी हो जाता है। बड़े शहरों में नित प्रतिदिन धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होने पर वहां लोगों के झुंड के झुंड शामिल होते हैं। कोई प्रवचन सुनता है तो कोई सुनते हुए दूसरे को भी सुनाता है।  कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान की भक्ति लोग केवल दिखावे के लिये करते हैं और उनका लक्ष्य केवल स्वयं को धार्मिक या अध्यात्मिक व्यक्तित्व का स्वामी होने का दिखावा करना होता है।
वैसे हम लोग विषयों के पीछे भागते हैं जबकि सच तो यह है कि वह हमें कभी छोड़ते ही नहीं अलबत्ता हम उनकी सोच को अपने दिमाग में इस तरह बसा लेते हैं कि भगवान का नाम स्मरण करने का विचार ही नहीं आता।  अगर आता भी है तो खाली जुबान से लेते हैं पर उसका स्पंदन हृदय में नहीं पहुंचता क्योंकि बीच रास्ते में विषयों की सोच रूपी पहाड़ उनका मार्ग अवरुद्ध करता है। यही कारण है कि भगवान भक्ति अधिक होने के बावजूद इस देश में नैतिक आचरण गिरता जा रहा है।  बहुत कम लोग ऐसे रह गये हैं जिनमें मानवीय संवेदनायें और सद्भावना बची है।
इस दिखावे का ही परिणाम है कि मायावी समृद्धि की तरफ बढ़ रहे देश में अहंकार, संवेदनहीनता तथा भ्रष्टाचार के कारण नारकीय स्थिति की अनुभूति होती है। जिसके परिणाम स्वरूप हम अपने देश में सामाजिक वैमनस्य की बढ़ती प्रवृत्ति भी देख सकते हैं। ऐसा अध्यात्मिक शिक्षा के प्रति अरुचि के कारण ही हो रहा है यह बात याद रखना चाहिये।
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Thursday, April 22, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-हंसों में बगुले की तरह होता है ज्ञानियों में अज्ञानी (economic of kautilya-hans aur bagula)

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।
हिन्दी में भावार्थ--
ऐसे माता पिता अपनी संतान के बैरी है जो उससे शिक्षित नहीं करते। अशिक्षित व्यक्ति कभी भी बुद्धिमानो की सभा में सम्मान नहीं पाता। वहां उसकी स्थिति हंसों के झुण्ड में बगुले की तरह होती है।
पुत्राश्च विविधेः शीलैर्नियोज्याः संततं बुधैः।
नीतिज्ञा शीलसम्पनना भवन्ति कुलपजिताः।।
हिन्दी में भावार्थ-
बुद्धिमान व्यक्ति अपने बच्चों को पवित्र कामों में लगने की प्रेरणा देते हैं क्यों श्रद्धावान, चरित्रवान तथा नीतिज्ञ पुरुष ही विश्व में पूजे जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ऐसे समाचार अक्सर आते हैं कि माता पिता को उनके बच्चों ने छोड़ दिया या उनकी देखभाल नहीं करते। अपने देश में बुजुर्गों की देखभाल बच्चों के ही द्वारा की जाये इसके लिये कानून भी बनाया गया। मगर एक सवाल जो कोई नहीं उठाता कि आखिर बुजुर्गों की ऐसी स्थिति ऐसी होती क्यों है? पहले तो ऐसा नहीं होता था। दरअसल पाश्चात्य शिक्षा में केवल रोजगार प्राप्त करने का ही पाठ्यक्रम होता है-वह भी सेठ या पूंजीपति बनने की नहीं बल्कि गुलाम बनाने की योजना का ही हिस्सा है। ऐसे में शिक्षित व्यक्ति नौकरी आदि के चक्कर में अपने परिवार से दूर हो जाता है। ऐसे कई परिवार हैं जिसमें तीन तीन लड़के हैं पर सभी नौकरी के लिये अपने माता पिता को छोड़ जाते हैं। माता पिता अपनी संपत्ति की रक्षा उनके लिये करते हुए अकेले रह जाते हैं। इसके अलावा अगर उनके पास संपत्ति नहीं भी है तो नौकरी पर लगे बेटे के पास दूसरे शहर में वैसा मकान या रहने की स्थिति नहीं है जिससे वह अपने माता पिता को दूर रखता है। जहां तक समाज का काम है वह तो कहता ही रहता है कि अमुक आदमी ऐसा है या वैसा है पर सच यही है कि पाश्चात्य रहन सहन ने समाज में एक तरह से विघटन पैदा किया है और इसके लिये जिम्मेदारी वह माता पिता भी हैं जो अपनी संतान को सही शिक्षा नहीं देते। वह आधुनिक विद्यालयों में अपने बच्चों को शिक्षा के लिये भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं।
दूसरा भी एक सवाल है जिससे कोई नहीं उठाता कि माता पिता यह कहते हैं कि हमने बच्चे को पढ़ाया लिखाया पर उससे वह आखिर बना ही क्या? एक नौकर न! ऐसे में आजकल के लोगों के सामने यह भी समस्या है कि अपनी नौकरी से जूझते हुए अपने परिवार की देखभाल उनके लिये कठिन हो जाती है। ऐसे में पारिवारिक तनाव भी उनके लिये एक संकट हो जाता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि माता पिता अपने बच्चों से उन संस्कारों का फल चाहते हैं जो उन्होंने उनमें बोये ही नहीं। वह केवल अपने बच्चों को कमाने और खाने के अलावा कोई अन्य शिक्षा देते ही नहीं-जिससे वह समाज या धर्म का मतलब समझे-फिर बाद में उसे ही कोसते हैं। इसलिये होना तो यह चाहिए कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ प्राचीन ज्ञान भी प्रदान करने का माता पिता दायित्व स्वयं उठायें। जो माता पिता गुरु का भार स्वयं उठाते हैं उनके बच्चे तेजस्वी बनते हैं।
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Tuesday, April 20, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-स्वर्ग की कल्पना अल्पज्ञान की देन (hindu dharma sandesh-swarg ki kalpana)

स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीपण्डितो युवतीः।
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः।।
हिन्दी में भावार्थ-
शास्त्रों का अध्ययन करने वाले कुछ अल्पज्ञानी विद्वान व्यर्थ ही स्त्रियों की निंदा करते हुए लोगों को धोखा देते हैं क्योंकि तपस्या तथा साधना के फलस्वरूप जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है उसमें भी तो अप्सराओं के साथ रमण करने का सुख मिलने की बात कही जाती है।
उन्मतत्तप्रेमसंरम्भादारभन्ते यदंगनाः।
तत्र प्रत्यूहमाधातुं ब्रह्मापि खलु कातरः।
हिन्दी में भावार्थ-
प्रेम में उन्मत होकर युवतियां अपने प्रियतम को पाने के लिये कुछ भी करने लगती हैं। उनके इस कार्य को रोकने का ब्रह्मा भी सामर्थ्य नहीं रखता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-विश्व के अनेक धर्मों की बड़ी बड़ी किताबें लिखी गयी हैं। उन सभी को पढ़ना कठिन है, पर कोई एक भी पढ़ी जाये तो उसमें तमाम तरह की विसंगतियां नज़र आती है। अधिकतर धार्मिक पुस्तकों के रचयिता पुरुष हैं इसलिये स्त्रियों पर नियंत्रण रखने के लिये विशेष रूप से कुछ कुछ लिखा गया है। यह शोध का विषय है कि आखिर सारे धर्म ही स्त्रियों पर नियंत्रण की बात क्यों करते हैं पुरुष को तो एक देवता मानकर प्रस्तुत किया जाता है। सच बात तो यह है कि अगर पुरुष देवता नहंी है तो नारी भी कोई देवी नहीं है। हर मनुष्य परिस्थतियों, संस्कारों और व्यक्तिगत बाध्यताओं के चलते अपना सामाजिक व्यवहार करता है। अब यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे प्रेरणा कैसी मिलती है। अगर प्रेरणास्त्रोत बुरा है तो वह भी बुरा ही करेगा अगर अच्छा है तो वह अच्छे काम में लिप्त हो जायेगा।
दूसरी जो सबसे बड़ी अहम बात है वह यह कि हर पुरुष और स्त्री का व्यवहार तय करने में उसकी आयु का बहुत योगदान होता है। बाल्यकाल तो अल्लहड़पन में बीत जाता है। उसके बाद युवावस्था में स्त्री पुरुष दोनों का मन नयी दुनियां को देखने के लिये लालायित होता है। विपरीत लिंग का आकर्षण उनको जकड़ लेता है। ऐसे में उन पर जो नियंत्रण की बात करते हैं वह या तो बूढ़े हो चुके होते हैं या फिर जिनका जीवन असाध्य कष्टों के बीच गुजर रहा होता है। कभी कभी तो यह लगता है कि दुनियां के अनेक धर्म ग्रंथ बूढ़े लोगों द्वारा ही लिखे या लिखवाये गये हैं क्योंकि उसमें औरतों पर ही नियंत्रण की बात की जाती है पुरुष को तो स्वाभाविक रूप से आत्मनिंयत्रित माना जाता हैं स्त्रियों के लिये मुंह ढंकने, पिता या भाई के साथ ही घर के बाहर निकलने तथा ऊंची आवाज में न बोलने जैसी बातें कहीं जाती हैं। कभी कभी तो लगता है कि युवतियों की युवावस्था अनेक धर्म लेखकों और विद्वानों के बहुत बुरी लगती है। इसलिये अतार्किक और अव्यवाहारिक बातें लिखते हैं। स्त्री हो या पुरुष युवावस्था में स्वाभाविक रूप से हर जीव अनिंयत्रित होता है-मनुष्य ही नहीं पशु पक्षियों में भी काम वासना की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से देखी जाती है। इस पर युवा स्त्रियों पर नियंत्रण की बात तो व्यर्थ ही लगती है क्योंकि अपने प्रियतम को पाने के लिये जो वह करती हैं उसे रोकने का सामर्थ्य तो विधाता भी नहीं रखता। अलबत्ता सभ्य, कुलीन, शिक्षित तथा बुद्धिमान लड़कियां स्वयं पर नियंत्रण रखती हैं इसलिये ही समाज में अभी तक नैतिकता का आधार बना हुआ है। ऐसी लड़कियों को धार्मिक शिक्षक न भी समझायें तो भी वह मर्यादा में रहती हैं पर जो भटकने पर आमादा है उनको रोकना किसी के लिये संभव नहीं है। कम से कम भर्तृहरि महाराज की समझाइश के अनुसार तो स्त्रियों पर सामाजिक नियंत्रण की बात तो करना ही नहीं चाहिए। दूसरी बात यह कि स्वर्ग कि कल्पना वास्तविकता पर आधारित न होकर अज्ञानियों तथा अल्पज्ञानियों की कल्पना मात्र है।
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Friday, April 16, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-यहाँ हर कोई अभिनेता है (all men is actor-hindu dharma sandesh)

क्षणं बालो भूत्वा क्षणमपि युवा कामरसिकः क्षणं वितैहीनः क्षणमपि च संपूर्णविभवः।
जराजीर्णेंगर्नट इव वलीमण्डितततनुर्नरः संसारान्ते विशति यमधानीयवनिकाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
क्षण भर के लिये बालक, क्षणभर के लिये रसिया, क्षण भर में धनहीन और क्षणभर में संपूर्ण वैभवशाली होकर मनुष्य बुढ़ापे में जीर्णशीर्ण हालत में में पहुंचने के बाद यमराज की राजधानी की तरफ प्रस्थित हो जाता है। एक तरह से इस संसार रूपी रंगमंच पर अभिनय करने के लिये मनुष्य आता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम अपने जीवन को एक दृष्टा की तरह देखें तो इस बात का अहसास होगा कि हम वास्तव में इस धरती पर आकर रंगमचीय अभिनय की प्रस्तुति के अलावा दूसरा क्या करते हैं? अपने नित कर्म में लग रहते हुए हमें यह पता ही नहीं लगता कि हमारी देह बालपन से युवावस्था, अधेड़ावस्था और और फिर बुढ़ापे को प्राप्त हो गयी। इतना ही नहीं हम अपने गुण दोषों के साथ इस बात को भी जानते हैं कि अनेक प्रकार की दैहिक और मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बिना हम चल ही नहीं सकते। इसके बावजूद अपने आपको दोषरहित और कामनाओं से रहित होने का बस ढोंग करते हैं। अनेक मनुष्य अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिये हम आत्मप्रवंचना तो करते हैं पर उनके हाथ से किसी का भला हो, यह सहन नहीं करते।
गरीबों का कल्याण या बालकों को शिक्षा देने की बात तो सभी करते हैं पर कितने लोग अपनी कसौटी पर खरे उतरते हैं यह सभी जानते हैं। स्थिति यह है कि हमारे देश में अनेक लोग बच्चों को अध्यात्मिक शिक्षा इसलिये नहीं देते कि कहीं वह ज्ञानी होकर उनकी बुढ़ापे में उनकी सेवा करना न छोड़ दे। भले ही आदमी युवा है पर उसे बुढ़ापे की चिंता इतनी सताती है कि वह भौतिक संग्रह इस सीमा तक करता है कि उस समय उसके पास कोई अभाव न रहे। कहने का अभिप्राय है कि हर आदमी अपनी रक्षा का अभिनय करता है पर दिखाता ऐसे है कि जैसे कोई बड़ा परमार्थी हो। इस अभिनय के फन में हर कोई माहिर है। 
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Tuesday, April 13, 2010

संत कबीर दर्शन-गुरु भक्ति के बिना राजा भी गधा (Guru Bhakti ke bina-kabir ke dohe)

तेहि घर किसका चांदना, जिहि घर सतगुरु नाहिं।
महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि चौसठ कलाओं और चौदह विद्याओं की जानकारी होने पर पर अगर सत्गुरु का ज्ञान नहीं है तो समझ लीजिये अंधियारे में ही रह रहे हैं।
कबीर गुरु की भक्ति बिन, राज ससभ होय।
माटी लदै कुम्हार की, घास न डारै कोय।।
महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु की भक्ति के बिना राजा भी गधा होता है जिस पर कुम्हार दिन भर मिट्टी लादेगा और कोई घास भी नहीं डालेगा।
चौसठ दीवा जाये के, चौदह चन्दा माहिं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समाज में बढ़ती भौतिकतावादी प्रवृत्ति ने अध्यात्मिक ज्ञान से लोगों को दूर कर दिया है। हालांकि टीवी चैनलों, रेडियो और समाचार पत्र पत्रिकाओं में अध्यात्मिक ज्ञान विषयक जानकारी प्रकाशित होती है पर व्यवसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये लिखी गयी उस जानकारी में तत्व ज्ञान का अभाव होता है। कई जगह तो अध्यात्मिक ज्ञान की आड़ में धार्मिक कर्मकांडों का प्रचार किया जा रहा है। इसके अलावा टीवी चैनलों में अनेक बाबाओं के अध्यात्मिक प्रवचनों के कार्यक्रम भी प्रस्तुत होते हैं पर उनका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना ही है। वैसे भी समाज में ऐसे गुरुओं का अभाव है जो तत्वज्ञान प्रदान कर सकें क्योंकि उसके जानने के बाद तो मनुष्य का हृदय निरंकार में लीन हो जाता है जबकि पेशेवर धर्म विक्रेता अपने शब्दों को सावधि जमा में निवेश करते हैं जिससे कि वह हमेशा पैसा और सम्मान वसूल करते रहें। कभी कभी तो लगता है कि लोग धर्म के नाम पर केवल शाब्दिक बोझा अपने सिर पर ढो रहे हैं।
दूसरी बात यह है कि मनुष्य के हृदय में अगर तत्वज्ञान स्थापित हो जाये तो वह अपने सांसरिक कार्य निर्लिप्त भाव से कार्य करते हुए किसी की परवाह नहीं करता जबकि सभी लोग चाहते हैं कि कोई उनकी परवाह करे। तत्वाज्ञान के अभाव में मनुष्य को एक तरह से गधे की तरह जीवन का बोझ ढोना पड़ता है। यह बात समझ लेना चाहिये कि जीवन तो सभी जीते हैं पर तत्वाज्ञानियों के चेहरे पर जो तेज दिखता है वह सभी में नहीं होता। इसलिये किसी को गुरु माानने से पहले उसके चेहरे और व्यवहार से दिखने वाले तेज का अध्ययन करना चाहिए। जिनको तत्वज्ञान नहीं है वह कुछ देर बातें तो आदर्श की करेंगे पर जब व्यवहार की बात आयेगी तो फिर सामान्य सांसरिक व्यक्ति की चाल चलने लगते हैं। ऐसे में उनको गुरु मानकर उनके पीछे फिरने से कोई लाभ नहीं होता।
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Sunday, April 11, 2010

संत कबीर के दोहे-नशे का सेवन करने वाले इस संसार का दरिया पार नहीं कर सकते

अमल आहारी आतमा, कबहुं न पावै पार।
कहैं कबीर पुकारि के, त्यागो ताहि विचार।।
कबीरदास जी कहना है कि नशे का सेवन करने वाले इस संसार रूपी दरिया को कभी पार नहीं कर सकते। अतः नशीली वस्तुओं का सेवन त्याग देना चाहिए।
छाजन भोजन हक्क है, अनाहक लेय।
आपन दोजख जात है, और दोजख देय।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं हर इंसान को भोजन पाने का हक है पर वह ऐसी वस्तुओं का सेवन करता है जिन पर उसका हक नहीं है। वह स्वयं तो नरक में जाता ही है दूसरों के लिये भी संकट पैदा करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिस सर्वशक्तिमान ने जीव को पैदा किया है उसने उनके लिये भोजन की भी व्यवस्था की है। मनुष्य ही नहीं हर जीव का यह अधिकार है कि वह भोजन प्राप्त करे। पशु और पक्षी भी अपने भाग्य के अनुसार भोजन प्राप्त करते हैं पर मनुष्य ऐसा जीव है जो नशीने पदार्थों को सेवन करता है। नशीले पदार्थ ग्रहण करना उसका अधिकार नहीं है पर वह जबरन उनको ग्रहण करता है। इससे न वह स्वयं ही नरक भोगता है बल्कि दूसरों के सामने इस धरती पर नरक जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है। पहले हुक्के का प्रचलन था जबकि आजकल सिगरेट और बीड़ी ने उसकी जगह ले ली है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इनके सेवन करने वाला अपने शरीर की हानि तो करता ही है, पर वह जो धुंआ वातावरण में छोड़ता है उससे उसके पास बैठने वाले व्यक्ति को कहीं अधिक हानि होती है। इसके अलावा उसका धुआं विषाक्त गैस बनकर आसपास के लोगों को भी तकलीफ पहुंचाता है।
जो सिगरेट और बीड़ी का सेवन करते हैं उनको यह अनुमान ही नहीं होता कि उनके धुऐं की वजह से उनके अपने ही लोग उनको घृणा की दृष्टि से देखते हैं। यही स्थिति शराब की है। अनेक बार सार्वजनिक स्थानों पर पास खड़े शराबियों में मुख से आने वाली दुर्गंध कष्टदायी लगती है और लोग उनको कभी घृणित दृष्टि से देखते हैं। इस तरह धुम्रपान तथा शराब को सेवन त्याग देना ही उचित है क्योंकि इनके सेवन का अधिकर मनुष्य का नहीं है। जो मनुष्य व्यसन करता है वह अपना ही नहीं दूसरे का जीवन भी नारकीय बनाता है। 
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Thursday, April 01, 2010

चाणक्य दर्शन-अपयश से प्राप्त धन किसी काम का नहीं (hindi adhyamik sandesh-Dhan aur yash)


अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु।
शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवंतु में।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस धन की प्राप्ति दूसरों को क्लेश पहुंचाने या शत्रु के सामने सिर झुकाने से हो वह स्वीकार करने योग्य नहीं है।
पर-प्रोक्तगुणो वस्तु निर्गृणऽपि गुणी भवेत्।
इन्द्रोऽ लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गृणैः।।
हिन्दी में भावार्थ-
चाहे कोई मनुष्य कम ज्ञानी हो पर अगर दूसरे उसके गुणों की प्रशंसा करते हैं तो वह गुणवान माना जायेगा किन्तु जो पूर्ण ज्ञानी है और स्वयं अपना गुणगान करता है तो भी वह प्रशंसनीय नहीं माना जा सकता, चाहे भले ही स्वयं देवराज इंद्र हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-थोथा चना बाजे घना इसलिये ही कहा जाता है कि जिसके पास गुण नहीं है वह अपने गुणों की व्याख्या स्वयं करता है। यह मानवीय प्रकृत्ति है कि अपने घर परिवार के लिये रोटी की जुगाड़ में हर कोई लगा है और विरले ही ऐसे लोग हैं जो दूसरों के हित की सोचते हैं पर अधिकतर तो खालीपीली प्रशंसा पाने के लिये लालायित रहते हैं। धन, वैभव और भौतिक साधनों के संग्रह से लोगों को फुरसत नहीं है पर फिर भी चाहते हैं कि उनको परमार्थी मानकर समाज प्रशंसा प्रदान करे। वैसे अब परमार्थ भी एक तरह से व्यापार बन गया है और लोग चंदा वसूल कर यह भी करने लगे हैं पर यह धर्म पालन का प्रमाण नहीं है। यह अलग बात है कि ऐसे लोगों का कथित रूप से सम्मान मिल जाता है पर समाज उनको ऐसी मान्यता नही देता जैसी की वह अपेक्षा करते हैं। ऐसे लोग स्वयं ही अपनी प्रशंसा में विज्ञापन देते हैं या फिर अपनी प्रशंसा में लिखने और बोलने के लिये दूसरे प्रचारकों का इंतजाम करते हैं। कहीं कहीं तो ऐसा भी होता है कि ‘तू मुझे चाट, मैं तुझे चाटूं’, यानि एक दूसरे की प्रशंसा कर काम चलाते हैं। इसके बावजूद यह वास्तविकता है कि हृदय से केवल सम्मान उसी को प्राप्त होता है जो ईमानदारी सें परमार्थ का काम करते हैं।
धन प्राप्त तो कहीं से भी किया जा सकता है पर उसका स्त्रोत पवित्र होना चाहिये। दूसरों को क्लेश पहुंचाकर धन का संग्र्रह करने से पाप का बोझ सिर पर चढ़ता है। उसी तरह ऐसा धन भी प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिये जो शत्रु के सामने सिर झुकाकर प्राप्त होता है। आखिर मनुष्य धन किसी लिये प्राप्त करता है? यश अर्जित करने के लिये! अगर शत्रु के आगे सिर झुका दिया तो फिर वह कहां रह जायेगा। धन आखिर आदमी प्राप्त करता ही किसलिये है? उसका लक्ष्य अपना पेट पालने के अलावा समाज में प्रतिष्ठा अर्जित करना भी होता है। ऐसे में जो धन अपयश से प्राप्त हो उसका कोई महत्व नहीं रह जाता।
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Tuesday, March 23, 2010

पतंजलि योग दर्शन-योग साधना से अशुद्ध बुद्धि का नाश होता है (yog sadhna se buddhi nirman)

योगांगनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
हिन्दी में भावार्थ-
योग साधना के द्वारा अंगों का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होने पर जो विवेक का प्रकाश फैलता है उससे निश्चित रूप से ख्याति मिलती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पतंजलि योग शास्त्र में न केवल योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान की व्याख्या है बल्कि उसका महत्व भी दिया गया है।  अक्सर लोग योगासनों को सामान्य व्यायाम कहकर प्रचारित करते हैं जबकि इसे पतंजलि वैसा ही अनुष्ठान मानते हैं जैसे कि द्रव्य द्वारा किये जाने वाले यज्ञ और हवन।
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण भी योग साधना को एक तरह से यज्ञ मानने का संदेश देते हैं। अगर उनका आशय समझा जाये तो एक तरह से वह अपने भक्तों से इसी यज्ञ की अपेक्षा करते हुए कहते हों कि ‘मुझे योग यज्ञ से उत्पन्न ऊर्जा ही समर्पित करें।’
भगवान श्रीकृष्ण का आशय समझा जाये तो वह  यज्ञ से उत्पन्न अग्नि से ही संतुष्ट होते हैं।  यह यज्ञ सामग्री एक तरह से हमारा पसीना है जिससे देह के विकार निकलकर बाहर आकर नष्ट होते हैं और फिर प्राणयाम तथा ध्यान के संयोग से  उत्पन्न अमृत से  संपन्न हृदय के भाव  हम मंत्रोच्चार के द्वारा परमात्मा को प्रसाद की तरह चढ़ाते हैं।  सर्वशक्तिमान की इच्छा यही होती है कि उसका हर बंदा प्रसन्न और शुद्ध भाव से युक्त हो। योगसाधना उसका एक मार्ग है।  जो लोग योग साधना करते हैं उनको किसी अन्य प्रकार के अनुष्ठान की तो आवश्यकता ही नहीं रह जाती क्योंकि अपने मन, विचार, और बुद्धि की शुद्धि करने से स्वयं ही भक्ति का भाव पैदा होता है।  यह प्रक्रिया इतनी स्वाभाविक होती है कि मनुष्य को फिर किसी अन्य प्रकार से भक्ति करना सुहाता ही नहीं है क्योंकि पूरा दिन उसका मन और शरीर प्रफुल्लित भाव से विचरण करता है और रात्रि को विश्रामकाल प्रतिदिन मोक्ष प्राप्त करते हुए व्यतीत हो जाता है।
सबसे बड़ा लाभ यह है कि योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान से हमारी शरीर और मन की अशुद्धि दूर होने के बाद हमारे कर्म व्यवहार में जो आकर्षण उत्पन्न होता है उससे ख्याति फैलती है। इतना ही नहीं चेहरे पर तेजस्वी भाव देखकर दूसरे लोग प्रभावित भी होते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जीवन में विकास तथा सुख के लिये योग साधना एक महत्वपूर्ण साधन बन सकती है-इसके लिये यह आवश्यक है कि उसे अच्छे संकल्प और विश्वास के साथ किया जाये। 
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Wednesday, March 10, 2010

संत कबीर वाणी-भोजन प्राप्त करना मनुष्य का अधिकार (bhojan aur manushya-sant kabir ke dohe)

अमल आहारी आतमा, कबहुं न पावै पार।
कहैं कबीर पुकारि के, त्यागो ताहि विचार।।
कबीरदास जी कहना है कि नशे का सेवन करने वाले इस संसार रूपी दरिया को कभी पार नहीं कर सकते। अतः नशीली वस्तुओं का सेवन त्याग देना चाहिए।
छाजन भोजन हक्क है, अनाहक लेय।
आपन दोजख जात है, और दोजख देय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं हर इंसान को भोजन पाने का हक है पर वह ऐसी वस्तुओं का सेवन करता है जिन पर उसका हक नहीं है। वह स्वयं तो नरक में जाता ही है दूसरों के लिये भी संकट पैदा करता है।
अमल आहारी आतमा, कबहुं न पावै पार।
कहैं कबीर पुकारि के, त्यागो ताहि विचार।।
कबीरदास जी कहना है कि नशे का सेवन करने वाले इस संसार रूपी दरिया को कभी पार नहीं कर सकते। अतः नशीली वस्तुओं का सेवन त्याग देना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिस सर्वशक्तिमान ने जीव को पैदा किया है उसने उनके लिये भोजन की भी व्यवस्था की है। मनुष्य ही नहीं हर जीव का यह अधिकार है कि वह भोजन प्राप्त करे। पशु और पक्षी भी अपने भाग्य के अनुसार भोजन प्राप्त करते हैं पर मनुष्य ऐसा जीव है जो नशीने पदार्थों को सेवन करता है। नशीले पदार्थ ग्रहण करना उसका अधिकार नहीं है पर वह जबरन उनको ग्रहण करता है। इससे न वह स्वयं ही नरक भोगता है बल्कि दूसरों के सामने इस धरती पर नरक जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है। पहले हुक्के का प्रचलन था जबकि आजकल सिगरेट और बीड़ी ने उसकी जगह ले ली है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इनके सेवन करने वाला अपने शरीर की हानि तो करता ही है, पर वह जो धुंआ वातावरण में छोड़ता है उससे उसके पास बैठने वाले व्यक्ति को कहीं अधिक हानि होती है। इसके अलावा उसका धुआं विषाक्त गैस बनकर आसपास के लोगों को भी तकलीफ पहुंचाता है।
जो सिगरेट और बीड़ी का सेवन करते हैं उनको यह अनुमान ही नहीं होता कि उनके धुऐं की वजह से उनके अपने ही लोग उनको घृणा की दृष्टि से देखते हैं। यही स्थिति शराब की है। अनेक बार सार्वजनिक स्थानों पर पास खड़े शराबियों में मुख से आने वाली दुर्गंध कष्टदायी लगती है और लोग उनको कभी घृणित दृष्टि से देखते हैं। इस तरह धुम्रपान तथा शराब को सेवन त्याग देना ही उचित है क्योंकि इनके सेवन का अधिकर मनुष्य का नहीं है। वैसे भी कहा जाता है कि जो जीव अपनी जीभ बाहर निकालकर पानी पीते हैं वही मांसाहारी होते हैं और जो ऐसा नहीं करते वह स्वाभाविक रूप से शाकाहारी होते हैं। मनुष्य कभी भी जीभ निकालकर पानी नहीं पीता इसलिये उसे शाकाहारी नहीं होना चाहिये।


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Tuesday, March 02, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अपना लक्ष्य कभी बीच में न छोड़ें

 रत्नैर्महाहैंस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरेभीमविषेण भीतिम्।
सुधा विना न प्रययुर्विरामं न निश्चिततार्थाद्विरमन्ति धीराः।।
हिन्दी में भावार्थ-
समुद्र मंथन करने से देवता लोग अनमोल रत्न पाकर भी प्रसन्न नहीं हुए। भयंकर विष भी निकला पर उनको उससे भय नहीं हुआ और न ही वह विचलित हुए। जब तक अमृत नहीं मिला तब तक वह समुद्र मंथन के कार्य पर डटे रहे। धीर, गंभीर और विद्वान पुरुष जब तक अपना लक्ष्य नहीं प्राप्त हो तब अपना कार्य बीच में नहीं छोड़ते
।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वैसे तो जीवन में अपना लक्ष्य तक करना बहुत कठिन है क्योंकि लोग अपने विवेक से कुछ नया करने की बजाय दूसरे की उपलब्धियों को देखकर ही अपना काम प्रारंभ करते हैं। अगर तय कर लिया तो फिर उस पर निरंतर चलना कठिन है।  होता यह है कि दूसरे की उपलब्धि देखकर वैसे बनने की तो कोई भी ठान लेता है पर उसने अपने लक्ष्य पाने में क्या पापड़ बेले यह किसी को नहीं दिखाई देता।  उसने लक्ष्य प्राप्ति के लिये कितना परिश्रम करते हुए अपमान और तिरस्कार सहा होगा यह वही जानते है।  जिन्होंने  बड़ी उपलब्धि प्राप्त की है उसके पीछे उनका धीरज और एकाग्रता बहुत बड़ा योगदान होता है।

इसके अलावा एक बात यह भी है कि बहुत कम लोगों में धीरज होता है। आज कल संक्षिप्त मार्ग से उपलब्धि प्राप्त करने की परंपरा चल पड़ी है। अगर किसी युवक को धीरज या शांति से काम करने का उपदेश दें तो वह यही कहते हैं कि‘आजकल तो फटाफट का जमाना है।’
वह लगे रहते हैं फटाफट उपलब्धि प्राप्त करने में  पर वह कभी लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते।  अनेक युवक इसी तरह अपराध मार्ग पर चले जाते हैं।  उसके परिणाम बुरे होते हैं।
जिनको अपना जीवन सात्विक ढंग से शांतिपूर्वक बिताना है उनको समुद्र मंथन के अध्यात्मिक धार्मिक उदाहरण से प्रेरणा लेना चाहिये। एक बात याद रखें कि हर काम पूरा होने का एक समय होता है। इसलिये विधिपूर्वक अपना काम करते रहें तो वह पूरा होगा। यदि उसके पूरा होने से पहले ही हमने अपने अंदर संशय पाल लिये तो उसका पूर्ण होना संदिग्ध होगा।

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Thursday, February 25, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-ज्ञानी रत्न का अपमान करने वाला निंदा योग्य

शास्त्रोपस्कृतशब्द सुंदरगिरः शिष्यप्रदेयाऽऽगमा विख्याताः कवयो वसन्ति विषये यस्य प्रभर्निर्धनाः।
तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य कवयस्त्वर्थ विनाऽपीश्वराः कुत्स्या स्युः कुपरीक्षका हि मणयो यैरर्घतः पातिताः।।
हिन्दी में भावार्थ-
ग्रंथों का अध्ययन से उसमें वर्णित शब्दों के ज्ञान को धारण कर सुंदर वाणी बोलने के साथ ही शिष्यों को उनका उपदेश करने वाले विद्वान तथा काव्य की मधुर धारा प्रवाहित करने वाले कवि जिस राज्य में निर्धन होते हैं, उसका राजा या राज्य प्रमुख अयोग्य कहा जाता है। विद्वान धनहीन होने पर भी रत्न के समान है और उसका सम्मान सभी जगह होता है और जो ऐसे रत्नों का अपमान करता है वह निंदा योग्य है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम इस संदेश को आज की नई सभ्यता में देखें तो यह दायित्व पूरे समाज का है कि वह लोगों को तत्व ज्ञान तथा सत्य का उपदेश देने वाले विद्वानो के साथ ही कवियों और लेखकों को भी संरक्षण दे। राज्य प्रमुख का तो यह उच्चतर दायित्व है पर आजकल जिस तरह पूंजीवाद ने व्यापक आधार बनाया है तो उसके शिखर पुरुषों को भी इस तरह ध्यान देना चाहिए। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शिखरों पर बैठे माननीय लोगों की उपेक्षा का ही यह परिणाम है कि आजकल समाज में कोई अपने बच्चे को अध्यात्मिक ज्ञान न तो देना चाहता है न ही किसी से प्राप्त करने के लिये प्रेरित करता है। यही हाल साहित्य का है। इस देश में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो अपने लड़के या लड़की का किसी भी भाषा का लेखक होना पसंद करे-सिवाय अंग्रेजी के। इसका कारण यही है कि हमारे उच्च शिखर पुरुषों ने यह मान लिया है कि समाज को वैचारिक, साहित्यक तथा अध्यात्मिक मार्ग पर आगे ले जाने वाले विद्वानों, कवियों और लेखकों को संरक्षण देने की आवश्यकता नहीं है। उनकी उपेक्षा का ही यह परिणाम है कि समाज में हर कोई अपने बच्चे को चिकित्सक, अभियंता, उच्च श्रेणी का अध्यापक तथा प्रशासनिक अधिकारी बनाना चाहता है जो अधिक से अधिक धन का स्वयं दोहन कर सके क्योंकि विद्वानों या लेखकों को आश्रय देने वाला कोई नहीं है।
इसी कारण हमारे समाज में एक ‘खिचड़ी संस्कृति’ बन गयी है। आपने देखा होगा कि आजकल अनेक लोग यह शिकायत करते हैं कि ‘बुढ़ापे में बच्चे उनकी देखभाल नहीं करते।’ उनसे पूछिये कि ‘क्या आप इसके लिये जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि आपने ही ऐसे संस्कार नहीं दिये।’
हमारे शिखर पुरुष कानून के द्वारा समाज को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। यह एक बेकार का प्रयास है। एक तरफ आप पूरी तरह पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण न केवल स्वयं कर रहे बल्कि अपने बच्चों को भी उस पर चलते देखना चाहते हैं। फिर उनसे देशी व्यवहार की आशा करना कहां तक उचित है?
देश की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक प्रक्रिया में विद्वानों की निष्क्रियता समाज के लिये घातक होती है, इसलिये जितना हो सके सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक शिखर बैठे लोग उनको संरक्षण दें या फिर समाज के बिगड़ने का रोना बंद कर दें। विद्वानों के नाम पर चाटुकारों की फौज खड़ी करने से समाज का उद्धार नहीं हो सकता। समाज में सहज विकास की धारा तभी प्रवाहित हो सकती है जब उसका बौद्धिक रूप सेे मार्गदर्शन करने वाले विद्वानों को संरक्षण मिले।
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