समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label hindi. Show all posts
Showing posts with label hindi. Show all posts

Thursday, August 06, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-धरती के लघु टुकड़े के मालिक मद में लिप्त हो जाते हैं (hindu dharm sandesh-dharti ka tukda aur mad)

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
---------------------

विपुलहृदयैरीशैतज्जगनतं पुरा विधृततमपरैर्दत्तं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा।
इह हि भुवनान्यन्यै धीराश्चतुर्दशभुंजते कतिपयपुरस्वाम्ये पुंसां क एष मदज्वर:


हिंदी में भावार्थ-अनेक उदार हृदय के लोगों ने इस पृथ्वी का उपभोग किया तो कुछ लोगों ने इसे जीतकर दूसरों को दान में दे दिया। आज भी कई शक्तिशाली लोग बड़े भूभाग के स्वामी है पर उनमें अहंकार का भाव तनिक भी नहीं दिखाई देता परंतु कुछ लोग ऐसे हैं जो कुछ ग्रामों (जमीन के लघु टुकड़े) के स्वामी होने के कारण उसके मद में लिप्त हो जाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह प्रथ्वी करोड़ों वर्षों से अपनी जगह पर स्थित है। अनेक महापुरुष यहां आये जिन्होंने इसका उपयोग किया। कुछ ने युद्ध में विजय प्राप्त कर जीती हुई जमीन दूसरों को दान में दी। अनेक धनी मानी लोगों ने बड़े बड़े दान किये और लोगों की सुविधा के लिये इमारतें बनवायीं। उन्होंने कभी भी अपने धन का अहंकार नहीं दिखाया पर आजकल जिसे थोड़ा भी धन आ जाता है वह अहंकार में लिप्त हो जाता है। देखा जाये तो इसी अहंकार की प्रवृति ने समाज में गरीब और अमीर के बीच एक ऐसा तनाव पैदा किया है जिससे अपराध बढ़ रहे हैं। दरअसल अल्प धनिकों में अपनी गरीबी के कारण क्रोध या निराशा नहीं आती बल्कि धनिकों की उपेक्षा और क्रूरता उनको विद्रोह के लिये प्रेरित करती है।

समाज के बुद्धिमान लोगों ने मान लिया है कि समाज का कल्याण केवल सरकार का जिम्मा है और इसलिये वह धनपतियों को समाज के गरीब, पिछड़े और असहाय तबके की सहायता के लिये प्रेरित नहीं करते। इसके अलावा जिनके पास धन शक्ति प्रचुर मात्रा है वह केवल उसके अस्तित्व से संतुष्ट नहीं है बल्कि दूसरे लोग उसकी शक्ति देखकर प्रभावित हों इसके लिये वह उसका प्रदर्शन करना चाहते हैं। वह धन से विचार, संस्कार, आस्था और धर्म की शक्ति को कमतर साबित करना चाहते हैं। सादा जीवन और उच्च विचार से परे होकर धनिक लोग-जिनमें नवधनाढ्य अधिक शामिल हैं-गरीब पर प्रतिकूल प्रयोग उसे अपनी शक्ति दिखाना चाहते हैं। परिणामतः गरीब और असहाय में विद्रोह की भावना बलवती होती है।

आज के सामाजिक तनाव की मुख्य वजह इसी धन का अहंकारपूर्ण उपयोग ही है। धन के असमान वितरण की खाई चौड़ी हो गयी है इस कारण अमीर गरीब रिश्तेदार में भी बहुत अंतर है इसके कारण भावनात्मक लगाव में कमी होती जाती है। धन की शक्ति बहुत है पर सब कुछ नहीं है यह भाव धारण करने वाले ही लोग समाज में सम्मान पाते हैं और जो इससे परे होकर चलते हैं उनको कभी कभी न कभी विद्रोह का सामना करना पड़ता है।
............................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग ‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्द योग
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, July 24, 2009

संत कबीर के दोहे-राम नाम का महत्व समझना जरूरी (kabir ke dohe--ram nam ka mahatva)

राम नाम जाना नहीं, जपा न अजपा जाप
स्वामिपना माथे पड़ा, कोइ पुरबले पाप

संत कबीरदास जी कहते हैं कि राम नाम को महत्व जाने बिना उसे जपना तो न जपने जैसा ही है क्योंकि जब तक मस्तिष्क पर देहाभिमान की छाया है तब तक अपने पापों से छुटकारा नहीं मिल सकता।
कबीर व्यास कथा कहैं, भीतर भेदे नाहिं
औरों कूं परमोधतां, गये मुहर का माहिं

कबीरदास जी का यह आशय है कि सभी को वेदव्यास रचित ग्रथों का ाान देने वाले स्वयं ही आत्मा और परमात्मा का भेद नहीं जानते इसलिये उनकी बातों का प्रभाव श्रोताओं पर नहीं होता। वह दूसरों को उपदेश तो बहुत देते हैं परंतु स्वयं धन एकत्रित कर पतन की गर्त में गिर जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-राम का नाम जपने वाले ढेर सारे हैं पर वह केवल दिखावा करते हैं। राम के नाम का महत्व समझे बिना उसे जपना न जपने के ही बराबर है। भगवान श्रीराम के चरित्र को मन में धारण कर उन पर निरंतर मनन और चिंतन करने से राम के नाम का महत्व समझा जा सकता है। नित्य एकाग्रचित होकर उनका जाप किया जाये तो स्वयं ही मन के विकास दूर होने लगते हैं। यदि राम का नाम वाणी से जपते रहें और मन में माया के विचारों का चक्र घूमता रहे तो इसका आशय यह है कि राम का नाम धारण नहीं किया गया। कई लोग ऐसे हैं जो केवल राम का नाम दिखावे के लिये जगते हैं । आखें बंद कर राम का नाम जपते हुए एक आंख खोलकर देखते हैं कि उनके आसपास क्या हो रहा है? ऐसे लोग दूसरों को नहीं बल्कि अपने आपको धोखा देते हैं।

वेद व्यास रचित महाग्रंथों की कथायें कहने वाले अनेक लोग हैं जो लोगों के बीच जाकर कथित रूप से धर्म प्रचार करते हैं पर यह उनका धार्मिक अभियान नहीं बल्कि व्यवसाय होता है। आत्मा और परमात्मा के भेद को वह बयान जरूर करते हैं पर एक तोते की तरह, जबकि तत्व ज्ञान को वह धारण नहीं किये होते। कहने को किसी ने अपनी पीठ बना ली है पर वह अपने और परिवार के लिये संपत्ति बनाने के अलावा उनका कोई उद्देश्य नहीं होता। ऐसे लोगों को सुनना तो चाहिये पर उनका सुनकर स्वयं अपना ध्यान और मनन कर ज्ञान को धारण करें तो ठीक रहेगा। उनको गुरु न मानकर अपने स्वाध्याय को अपना गुरु बनायें।

कोई ढोंगी हो या पाखंडी यह तो समझ में आ जाता है पर उन पर अधिक विचार न कर हमें अपना ध्यान अपने इष्ट के स्मरण और ध्यान पर लगाना चाहिये। आत्मिक शांति के लिये भक्ति मन में होना आवश्यक है और उसका दिखावा करने का भाव जब हमारे अंदर आता है तो समझ लें कि हमारे किये कराये पर पानी फिर रहा है। यह एकांत साधना है और इस पर किसी से अधिक चर्चा करना ठीक नहीं है। अंदर अपने इष्ट का ध्यान कर जो आनंद प्राप्त होता है उसकी तो बस अनुभूति ही की जा सकती है।

आज रामनवमी के अवसर पर समस्थ पाठकों, ब्लाग लेखक मित्रों और सहृदय धार्मिक सज्जनों को बधाई। यह पर्व समस्त समाज के जीवन में खुशियां बिखेरे ऐसी कामना सभी को करना चाहिये।

--------------------------------

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथि’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग शब्दलेख सारथि
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, June 12, 2009

संत कबीर के दोहे: प्रीति के चक्कर में सुख चला जाता है

प्रीति कर सुख लेने को सुख गया हिराय
जैसे पाइ छछुंदरी, पकडि सींप पछिताय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सुख प्राप्त करने के लिये लोग गलत संपर्क बना लेते हैं और फिर कष्ट उठाते हैं। उस समय उनकी दशा ऐसी होती है जैसे सांप छछुंदर को पकड़ कर पछताता है

कबीर विषधर बहु मिले, मणिधन मिला न कोय
विषधर को मणिधर मिले, विष तजि अमृत होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में विषधर सर्प बहुत मिलते हैं, पर मणि वाला सर्प नहीं मिलता। यदि विषधर को मणिधर मिल जाये तो विष भी अमृत बन जाये।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संगति का प्रभाव आदमी पर अवश्य होता है। भले ही लोग स्वार्थ के लिये बुरे लोगों की संगति यह विचार कर करते हैं कि उसका कोई प्रभाव नहीं होगा पर यह उनका केवल विचार होता है। जब दुर्गुणी व्यक्ति की संगति की जाती है तो उसकी बातों का प्रभाव धीरे-धीरे पड़ता ही हैं और मन में कलुषिता का भाव आता ही है। इसके अलावा उसकी संगति से लोगों की दृष्टि में ही गिरते हैं और उसक द्वारा पापकर्म करने पर उसका सहभागी का संदेह भी किया जाता है। इससे अच्छा है कि दुष्ट और दुर्गुणी व्यक्ति के साथ संगति हीं नहीं की जाये। ऐसे लोगों के साथ ही अपना संपर्क बढ़ाया जाये जो भक्ति और ज्ञान रस के सेवन करने में दिलचस्पी लेते हों।
-----------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, June 10, 2009

मनु स्मृति: वस्तु विक्रेता ग्राहक के साथ धोखाधड़ी न करें

नान्यदन्येन संसृष्टरूपं विक्रयमर्हति
न चासारं न च न्यून न दूरेण तिरोहितम्

हिंदी में आशय -मनुष्य किसी विशेष वस्तु के बदले किसी दूसरी वस्तु, सड़ी गली, निर्धारित वजन से कम, केवल दूर से ठीक दिखने वाली तथा ढकी हुई वस्तु न बेचे। विक्रेता को चाहिये कि वह ग्राहक को अपनी वस्तु की स्थिति ठीक बता दे।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-ऐसा लगता है कि आजकल धर्म के प्रति लोग इसलिये भी अधिक आकर्षित हो रहे हैं क्योंकि उनके नित्य कर्म में अशुद्धता का बोध उन्हें त्रस्त कर देता है। वह न केवल अपने ही कर्मों से असंतुष्ट हैं बल्कि दूसरे के अपने प्रति किया गया व्यवहार भी उन्हें खिन्न कर देता हैं। अब यह तो संभव नहीं है कि हम स्वयं बेईमानी का व्यवहार करते हुए दूसरों से ईमानदारी की आशा करें। नौकरी और व्यापार में कहीं न कहीं झूठ और बेईमानी करनी ही पड़ती है-यह सोचना अपने आपको धोखा देना है। दूसरे की बेेईमानी तो सभी को दिखती है अपना कर्म किसी ज्ञानी को ही दिखाई देता है। धन तो सभी के पास आता जाता है पर कुछ लोगों को धन का लोभ अनियंत्रित होकर उन्हें बेईमानी के रास्ते पर ले जाता है।

त्यौहारों के अवसर पर जब बाजार में मांग बढ़ती है तब दूध में मिलावट की बात तो होती थी पर अब तो सिंथेटिक दूध बिकने लगा है कि जिसका एक अंश भी शरीर के लिये सुपाच्य नहीं है अर्थात जो पेट में जाकर बैठता है तो फिर वहां पर बीमारी पैदा किये बिना नहीं रहता। तय बात है कि आदमी को डाक्टर के पास जाना है। दूध ऐसा जिसे दूध नहीं कहा जा सकता है मगर बेचने वाले बेच रहे है। कई जगह बड़े व्यापारी जानते हुए भी उसे खरीदकर खोवा बना रहे हैं। हलवाई मिठाई बनाकर बेचे रहे है। फिर जब दीपावली का दिन आता है तो भगवान श्रीनारायण और लक्ष्मी की मूर्तियां सजाकर अपने व्यवसायिक स्थानों की पूजा कर अपने धर्म का निर्वाह भी करते हैं। एसा पाखंड केवल इसी देश में ही संभव है। नकली दूध तथा अन्य वस्तुऐं बेचने वाले व्यापारी रौरव नरक के भागी बनते हैं यह बात मनुस्मृति में स्पष्ट की गयी है। मनु द्वारा स्थापित धर्म को मानने वाले उनकी पूजा भी करते हैं पर उनके ज्ञान को धारण नहीं करते।

धर्म का आशय यही है कि हमारे आचार, विचार और व्यवहार में शुद्धता होना चाहिये। यह भ्रम नहीं रखना चाहिये कि ईमानदारी से इस संसार में काम नहीं चलता। नकली और विषैली वस्तुयें बेचना पाप है यही सोचकर अपना व्यापार करना चाहिये।
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.‘शब्दलेख सारथी’
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, April 16, 2009

रहीम के दोहे: पशु अपना हित करने वाला गुड़ कभी नहीं खाते

कविवर रहीम कहते हैं
रहिमन आलस भजन में, विषय सुखहिं लपटाय
घास चरै पसु स्वाद तै, गुरु गुलिलाएं खाय

मनुष्य भजन में तो आलस्य कर जाता है पर जिन विषयों में सुख लिप्त है उनको अपने साथ सदैव लिपटाये रहता है। जैसे पशू बेस्वाद घास को तो स्वयं ही खाते हैं पर जो गुड़ उनके स्वास्थ्य के लिये हितकर है वह कभी भी अपने आप नहीं खाते। वह तभी खाते हैं जब उनके मूंह में जबरन ठूंसा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यह मनुष्य स्वभाव है जहां से उसे थोड़ी बहुत प्रसन्नता या धन मिलने की संभावना होती है वहां वह दौड़ा चला जाता है पर जहां मन की शांति और एकांत मिलता है वहां से वह भागता है। उसे लगता है कि धन और मान पाने में ही सारे सुख अंतर्निहित हैं और वह जीवन भर उसके पीछे दौड़ता है। भगवान का भजन, ध्यान, स्मरण और सत्संग उसको सुखद नहीं लगते क्योंकि उसमें कोई देखने वाला नहीं होता और एकांत में मिलने वाले उस सुख के लिये अपने मित्रों, रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों से उसे कुछ देर अपना मन विरक्त करना पड़ता है और सभी लोग इससे घबड़ाते हैं। उनको लगता है कि इस विरक्ति के दौरान कहीं उनके मन में पूर्ण सन्यास भाव न पैदा हो जाये और फिर वह अपने पर आश्रित लोगों को दुःख में छोड़ कर संसार में स्वतंत्र रूप से विचरण करने लगें। मतलब वह अपने ही मन से स्वयं डरते हैं और विषयों की गुलामी में उनको अपना हित लगता है। अगर कोई व्यक्ति उनको ज्ञान देता है तो कहते हैं कि हमें तो भजन आदि के लिये फुरसत ही नहीं मिल पाती। सच तो यह है कि सच्ची भक्ति में कोई आकर्षण नहीं है इसलिये लोग उससे कतराते हैं।
-------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, April 04, 2009

कबीर के दोहे: इच्छाओं के अग्नि जितनी बुझाओ उतनी ही बढ़ती जाती है

त्रिज्ञणा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ
जवासा के रूष ज्यूं, घण मेहां कुमिलाइ


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन में जो त्रृष्णा की अग्नि कभी बुझती नहीं है जैसे उस पर पानी डालो वैसे ही बढ़ती जाती है। जैसे जवासे का पौधा भारी वर्षा होने पर भी कुम्हला जाता है पर फिर हरा भरा हो जाता है।

‘कबीर’ मन फूल्या फिरै, करता हूं मैं ध्रंम
कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।


वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नरक का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढि़यों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए।
----------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथि’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग शब्दलेख सारथि
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, March 21, 2009

रहीम के दोहे: उपकार करने वाले यारी को बीच में नहीं लाते (rahim ke dohe-upkar aur yari)

रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस दियो शिवि भूप ने, दीन्हो हाड़ दधीच

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस मनुष्य का परोपकार करना है वह जरा भी नहीं हिचकता। वह परोपकार करते हुए यारी दोस्ती का विचार नहीं करते। राजा शिवि ने ने प्रसन्न मुद्रा में अपने शरीर का मांस काट कर दिया तो महर्षि दधीचि ने अपने शरीर की हड्डियां दान में दीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-विश्व का हर बड़ा आदमी परोपकार करने का दावा करता है पर फिर भी किसी का कार्य सिद्ध नहीं होता। अभिनेता, कलाकार, संत, साहुकार तथा अन्य प्रसिद्ध लोग अनेक तरह के परोपकार के दावों के विज्ञापन करते हैं पर उनका अर्थ केवल आत्मप्रचार करना होता है। आजकल गरीबों, अपंगों,बच्चों,बीमारों और वृद्धों की सेवा करने का नारा सभी जगह सुनाई देता है और इसके लिये चंदा एकत्रित करने वाली ढेर सारी संस्थायें बन गयी हैं पर उनके पदाधिकारी अपने कर्मों के कारण संदेह के घेरे में रहते हैं। टीवी चैनल वाले अनेक कार्यक्रम कथित कल्याण के लिये करते हैं और अखबार भी तमाम तरह के विज्ञापन छापते हैं पर जमीन की सच्चाई यह है कि परोपकार भी एक तरह से व्यापार हो गया है और इसके माध्यम से प्रचार और आय अर्जित करने की योजनाओं को पूरा किया जाता है।
हमारे देश में निरंतर गरीबी और बेरोजगारी बढ़ रही है। कहने को दान धर्म करने वाले बहुत लोग हैं पर देखने वाली बात यह है कि उनके आय के स्त्रोत कितने पवित्र हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वच्छ और परिश्रमी व्यवसायों में लोग इतना नहीं कमा पाते जितना अपवित्र व्यापारों में कमा लेते हैं। ऐसे लोग दान और धर्म भी इसी तरह करते हैं कि जिससे प्रचार मिले और उसकी आड़ में वह अपनी छबि साफ बनाकर समाज में प्रतिष्ठित रह सकें।

जिन लोगों को परोपकार करना है वह किसी की परवाह नहीं करते। न तो वह प्रचार करते हैं और न ही इसमें अपने पराये का भेद करते हैं। उनके लिये परोपकार करना एक नशे की तरह होता है। सच तो यह है कि यह मानव जाति अगर आज भी चैन की सांस ले रही है तो वह ऐसे लोगों की वजह से ले रही हैं ऐसे लोग न केवल बेसहारा की मदद करते हैं बल्कि पर्यावरण और शिक्षा के लिये भी निरंतर प्रयत्नशील होते हैं। वरना तो जिनके पास पद, पैसे और प्रतिष्ठा की शक्ति है वह इस धरती पर मौजूद समस्त साधनों का दोहन करते हैं पर परोपकारी लोग निष्काम भाव से उन्हीं संसाधनों में श्रीवृद्धि करते है। जिनका परोपकार करने का संकल्प लेना है उन्हें यह तय कर लेना चाहिए कि वह प्रचार और पाखंड से दूर रहेंगे।
----------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Tuesday, March 17, 2009

संत कबीर वाणी: जो जेठ माह में भी सुख दे वही नदी प्रशंसा योग्य

भक्ति बीज पलटै नहीं जो जुग जाय अनन्त
ऊंच नीच घर अवतरै, हो संत का अन्त


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य द्वारा की गयी निष्काम भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। भक्त चाहे जिस जाति या वर्ण को हो और लोग उनमें भी ऊंच नीच का भेद भले ही करें पर परमात्मा का हर सच्चा भक्त तो संत ही होता है।

भक्ति भाव भादौं नदी, सबै चली घहराय
सरिता सोई सराहिये, जेठ मास ठहराय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो लोग भादों में बहने वाली नदी की तरह केवल विशेष समय पर ही भक्ति करते हैं उनको भक्त नहीं माना जा सकता। जो लोग हर समय भक्ति में लीन रहते हैं वही सच्चे भक्त है क्योंकि वह उसी नदी की तरह पूज्यनीय हैं जो जेठ माह में भी जल प्रदान करती है जब प्रथ्वी पर जल की कमी हो जाती है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कई लोग ऐसे हैं जो अपनी मनोकामनायें लेकर धार्मिक स्थलों पर जाते हैं। वह यह प्रण करते हैं कि अमुक काम होने पर वह फिर आयेंगे। या फिर घर बैठे ही तय करते हैं कि यह इच्छा पूरी हो जाये तो अमुक धार्मिक स्थान पर जाकर दर्शन करेंगे। यह भक्ति नहीं बल्कि अपने आपको ही धोखा देना है। इस मायावी संसार में अगर मनुष्य ने जन्म लिया है तो उसे अनेक काम तो स्वतः ही पूरे हो जाते हैं क्योंकि करतार तो कोई और है पर मनुष्य अपने होने का भ्रम पाल लेता है। ऐसी कामनायें और इच्छा पूरी होने पर वह दर्शन करने ऐसे जाता है जैसे कि वह परमात्मा को फल दे रहा हो। ऐसी भक्ति केवल नाटक बाजी तो आजकल अधिक देखने को मिलती है। यह भक्ति नहीं है क्योंकि कामनाओं का क्या? एक पूरी होती है तो दूसरे जन्म लेती है। भक्ति तो निष्काम होती है और आदमी का समय अच्छा या बुरा हो वह उसे नहीं छोड़ता।
उसी तरह मनुष्य भले ही जात पांत या धर्म का भेद करता है पर जो भी परमात्मा की निष्काम भक्ति करता है वह संत है।
----------------------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, March 13, 2009

कबीर के दोहे:रात्रि के स्वप्न टूटने पर सताते हैं

कबीर सपनें रैन के, ऊपरी आये नैन
जीव परा बहू लूट में, जागूं लेन न देन

संत शिरोमणि कबीरदास जी का आशय यह है कि रात में सपना देखते देखते हुए अचानक आंखें खुल जाती है तो प्रतीत होता है कि हम तो व्यर्थ के ही आनंद या दुःख में पड़े थे। जागने पर पता लगता है कि उस सपने में जो घट रहा था उससे हमारा कोई लेना देना नहीं था।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सपनों का एक अलग संसार है। अनेक बार हमें ऐसे सपने आते हैं जिनसे कोई लेना देना नहीं होता। कई बार अपने सपने में भयानक संकट देखते हैं जिसमें कोई हमारा गला दबा रहा है या हम कहीं ऐसी जगह फंस गये हैं जहां से निकलना कठिन है। तब इतना डर जाते हैं कि हमारी देह अचानक सक्रिय हो उठती है और नींद टूट जाती है। बहुत देर तक तो हम घबड़ाते हैं जब थोड़ा संभलते हैं तो पता लगता है कि हम तो व्यर्थ ही संकट झेल रहे थे।

कई बार सपनों में ऐसी खुशियां देखते हैं जिनकी कल्पना हमने दिन में जागते हुए नहीं की होती है। ऐसे लोगों से संपर्क होता है जिनके पास जाने की हम सोच भी नहीं सकते। जागते हुए पुरानी साइकिल पर चलते हों पर सपने में किसी बड़ी गाड़ी पर घूमते हुए दिखाई देते हैं। ऐसे में जब खुशी चरम पर होती है और सपना टूट जाता है। आंखें खुलने पर भी ऐसा लगता है कि जैसे हम खुशियों के समंदर में गोता लगा रहे थे पर फिर जैसे धीरे धीरे होश आता है तो पता लगता है कि वह तो एक सपना था।

आशय यह है कि यह जीवन भी एक तरह से सपने ही है। इसमें दुःख और सुख भी एक भ्रम हैं। मनुष्य को यह देह इस संसार का आनंद लेने के लिये मिली है जिसके लिये यह जरूरी है कि भगवान भक्ति और ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त किया जाये न कि विषयों में लिप्त होकर अपने को दुःख की अनुभूति कराई जाये। जीवन में कर्म सभी करते हैं पर ज्ञानी और भक्त लोग उसके फल में आसक्त नहीं होते इसलिये कभी निराशा उनके मन में घर नहीं करती। ऐसे ज्ञानी और भक्तजन दुःख और सुख के दिन और रात में दिखने वाले सपने से परे होकर शांति और परम आनंद के साथ जीवन व्यतीत करते हैं।
------------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, March 12, 2009

रहीम के दोहे:आपस में जुडी होने के कारण पेड़ की हर गाँठ में रस होता है

जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं, यह रहीम जग होय
मंड़ए तर की गाँठ में, गाँठ गाँठ रस होय


कविवर रहीम कहते हैं कि यह संसार खोजकर देख लिया है, जहाँ परस्पर ईर्ष्या आदि की गाँठ है, वहाँ आनंद नहीं है. महुए के पेड़ की प्रत्येक गाँठ में रस ही रस होता है क्योंकि वे परस्पर जुडी होतीं हैं.

जलहिं मिले रहीम ज्यों, कियो आपु सम छीर
अंगवहि आपुहि आप त्यों, सकल आंच की भीर


कविवर रहीम कहते हैं कि जिस प्रकार जल दूध में मिलकर दूध बन जाता है, उसी प्रकार जीव का शरीर अग्नि में मिलकर अग्नि हो जाता है.
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जहां दो मनुष्यों में एक दूसरे के प्रति ईष्र्या है वहां किसी के दिल में भी संतोष नहीं रहा सकता। अक्सर लोग आपस में एक दूसरे के प्रति प्रेम होने का दावा करते हैं पर उनके मन में आपस में ही द्वेष, कटुता और ईष्र्या का भाव रहता है। इस तरह वह स्वयं को धोखा देते हैं। प्रेम तो तभी संभव है जब एक दूसरे की सफलता पर हृदय मेंें प्रसन्नता का भाव हो। हालांकि मूंह पर दिखाने के लिये एक मित्र अपने दूसरे मित्र की, भाई अपने भाई की या रिश्तेदार अपने दूसरे रिश्तेदार की सफलता पर बधाई देते हैं पर हृदय में कहीं न कहीं ईष्र्या का भाव होता है। यह दिखावे का प्रेम है और इस पर स्वयं को कोई आशा नहीं करना चाहिये क्योंकि न हम स्वयं दूसरे से वास्तव में प्रेम नहीं करते और न ही कोई हमें करता है। जहां ईष्र्या की गांठ हैं वहां प्रेम हो ही नहीं सकता।
---------------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्द योग
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, February 28, 2009

रहीम संदेश: पति पत्नी का आराध्य देव एक ही होना चाहिए

पुरुष पूजै देवरा, तिय पूजे रघुनाथ
कहि रहीम दोउन बने, पड़ौ बैल के साथ

कविवर रहीम कहते हैं कि घर का पुरुष किसी दूसरे देवता की पूजा करता है या केवल कमाने में ही उसका मन लगता है और पत्नी भगवान श्रीराम को मानती है तो उनका साथ नहीं बन पाता। उनका यह साथ ऐसा ही जैसे बैल के साथ पड़ा चल रहा हो।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल की विषम परिस्थतियों में लोगोंें के घर तनाव का यह भी एक कारण है। वर्तमान भौतिक युग में कठिन होते जा रहे इस जीवन में जहां केवल कमाने का दायित्व पुरुष सदस्यों का है वहां ऐसे तनाव जरूर पैदा होता है। पुरुष तो रोज कमाने के चक्कर में घर से निकल जाते हैं और स्त्री समय निकालकर भगवान की पूजा करती हैं और सत्संग में जाती है। इसके अलावा पुरुषों के मन में यह भी होता है कि यह पूजा वगैरह तो केवल बुढ़ापे में करने का काम है और फिर अपने घर की स्त्री यह सब कर ही रही है तो उसका फल उसे मिलेगा तो हम भी लाभान्वित होंगे। इससे दोनों के बीच एक वैचारिक अंतर पैदा होता है जो दोनों के लिये तनाव का कारण बनता है। इसके अलावा कहीं पुरुष किसी तांत्रिक या सिद्ध के चक्कर में पड़े रहते हैंं पर स्त्री केवल भगवान का भजन करती है वहां यही संकट पैदा होता है। हर घर में स्त्री और पुरुष को एक ही देव की उपासना करना चाहिए। यहां यह बात याद रखना चाहिए कि जैसे देव या इष्ट की पूजा आदमी करता है वैसा ही गुण उसमें आता है। अगर किसी ऐसे देव की जीवंत भावना रखकर आराधना की जायेगी तो हमारा मन प्रफुल्लित हो उठेगा और अगर किसी देव में उसके स्वर्गीय होने का आभास होता है तो उसकी आराधना से हमारा मन भी निराशा और निष्कियता की ओर अग्रसर हो जायेगा और वैसा ही फल भी होता है। अतः स्त्री और पुरुष को एक ही देव को पूजना चाहिए।
---------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, February 26, 2009

कबीर के दोहे: खरी कसौटी पर तौला जाए तो खोट निकल आता है

हीरा पाया पारखी, धन महं दीन्हा आन
चोट सही फूटा नहीं, तब पाई पहचान

पारखी ने ने हीरा प्राप्त कर लिया और उसकी धन के रूप में कीमत भी आंक ली पर जब चोट की तो वह फूटा नहीं और तब पहचान हुई कि वह कितना मजबूत है।
संक्षिप्त व्याख्या-जब किसी को ज्ञान प्राप्त होता है तो उसको लगता है कि अच्छा हुआ कि वह उसे प्राप्त हो गया और कभी काम आयेगा-उस समय वह उसे सामान्य बात मानता है। जब वक्त पर उसकी परीक्षा वह करता है और अनुभव करता है कि उसका ज्ञान वाकई प्रभावपूर्ण है जो उसके उपयोग करने में चूक नहींे हुई तब उसकी प्रसन्नता का पारावर नहीं रहता। अगर किसी मनुष्य के पास ज्ञान रहता है तो वह विपत्ति आने पर उसकी रक्षा करता है और आदमी चोट खाकर विचलित नहीं होता।

खरी कसौटी तौलतां, निकसि गई सब खोट
सतगुरु सेना सब हनी, सब्द वान की चोट


जब खरी कसौटी पर परीक्षा की जाती है तो सब खोट निकल जाता है। झूठे शब्दों की सेना को सतगुरू का ज्ञान ध्वस्त कर देता है।

संक्षिप्त व्याख्या-झूठ कितना भी बोला जाये अगर उसकी परीक्षा सत्य की कसौटी पर की जाये तो वह पकड़ जाता है उसके लिये जरूरी है ज्ञान होना और ज्ञान के लिये आवश्यक है कोई गुरू होना। कई लोग कहते हैं कि हम बिना गुरू के ज्ञान प्राप्त कर लेंगे पर यह संभव नहीं है। गुरु से आशय यह नहीं है कि कोई संत या सन्यासी हो। जीवन में कई ऐसे लोग होते हैं जो हमें जीवन के बारे में बताते हैं उनको गुरु मानते हुए उनकी बात हृदय में धारण करना चाहिए।
-------------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, January 11, 2009

रहीम संदेश: दु:ख में भी मानसिक रूप से दृढ़ होना चाहिए

सरवर के खग एक से, बाढ़त प्रीति न धीम
पै मराल को मानसर, एकै ठौर रहीम


अधिकतर पक्षी एक समान होते हैं। उनका अपने जल स्त्रोंतो से लगाव तभी तक रहता है जब तक उसमें उनके लिये सुविधानुसार जल रहता है वरना इधर उधर से डोलते रहते हैं पर हंस केवल मानसरोवर में रहता है। यह उसकी दृढ़ता का प्रतीक है।

संपादकीय व्याख्या-इस संसार में सामान्य लोग स्वार्थ के आधार पर ही अपने संबंध बनानते और बिगाड़ते है। अब तो यह हालत यह हो गयी है कि लोग उन्हीं रिश्तेदारों के नाम सुनाते हैं जो प्रतिष्ठित और धनवान हैं। आपसी वार्तालाप में लोग अपने उन रिश्तेदारों और मित्रों का जिक्र अवश्य करते हैं जो पद, प्रतिष्ठा और पैसे की दृष्टि से शिखर पर है पर उन लोगों का नाम नहीं लेते जो सामान्य जीवन व्यतीत करते हैं। इतना ही नहीं वह आते जाते भी उन लोगों के पास हैं जहां कभी उनका स्वार्थ सिद्ध होने की संभावना होती है। यह निम्न कोटि की प्रवृत्ति है। उच्च प्रवृत्ति के लोग सभी के प्रति समान दृष्टिकोण रखते हैं। ऐसे ही लोग सभी जगह सम्मान भी प्राप्त करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण जी श्रीगीता में यह स्पष्ट कथन है कि जो प्रिय को देखकर प्रसन्न नहीं होते और जो अप्रिय को देख दुःखी नहीं होते वही स्थिरप्रज्ञ है।

यह समदर्शिता का भाव रखना अपने जीवन में ही सुख का कारण होता है। जो मनुष्य यह भाव नहीं रखते उनको ही जीवन में तनाव झेलना पड़ता है। वह प्रतिष्ठत, उच्च पदासीन और पैसे वाले रिश्तेदारों और मित्रों के यहां जाकर कोई सम्मान नहीं पाते। वह यह समझते हैं कि समय आने पर वह काम आयेंगे तो यह भी तभी संभव होता है कि जब वह स्वयं उनका स्वार्थ सिद्ध करने वाले हों। अगर वह ऐसा करने में सक्षम नहीं होते तो समय पड़ने उन्हें अपने से उच्च व्यक्ति की सहायता नहीं मिलती भले ही आश्वासन मिल जाता हो ऐसे में उनको भारी निराशा भी झेलनी पड़ती है। जीवन में दु:ख सुख का दौर तो चलता रहता है पर दु:ख के समय अपने स्थान से हटकर दूसरे स्थान पर जाने का विचार नहीं करना चाहिए। इससे न केवल स्वयं ही मानसिक रूप से कमजोर होते हैं बल्कि दूसरों के सामने बिचारगी की स्थिति में प्रस्तुत होना पड़ता है और हमारा स्वाभिमान आहत होता है।
....................................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, November 29, 2008

संत कबीरदास सन्देश:कलियुग में होता है मसखरों का सम्मान

कबीर कलियुग कठिन हैं, साधू न मानै कोय
कामी क्रोधी मसखरा तिनका आदर होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अब इस घोर कलियुग में कठिनाई यह है कि सच्चे साधू को कोई नहीं मानता बल्कि जो कामी, क्रोधी और मसखरे हैं उनका ही समाज में आदर होने लगा है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम कबीरदास जी के इस कथन के देखें तो हृदय की पीडा कम ही होती है यह सोचकर कि उनके समय में भी ऐसे लोग थे जो साधू होने के नाम पर ढोंग करते थे। हम अक्सर सोचते हैं कि हम ही घोर कलियुग झेल रहे हैं पर ऐसा तो कबीरदास जी के समय में भी होता था। धर्म प्रवचन के नाम पर तमाम तरह के चुटकुले सुनकर अनेक संत आजकल चांदी काट रहे हैं। कई ने तो फाईव स्टारआश्रम बना लिए हैं और हर वर्ष दर्शन और समागम के नाम पर पिकनिक मनाने तथाकथित भक्त वहाँ मेला लगाते हैं। सच्चे साधू की कोई नहीं सुनता। सच्चे साधू कभी अपना प्रचार नहीं करते और एकांत में ज्ञान देते हैं और इसलिए उनका प्रभाव पड़ता है। पर आजकल तो अनेक तथाकथित साधू-संत चुटकुले सुनाते हैं और अगर अकेले में किसी पर नाराज हो जाएं तो क्रोध का भी प्रदर्शन करते हैं। उनके ज्ञान का इसलिए लोगों पर प्रभाव नहीं पड़ता भले ही समाज में उनका आदर होता हो।
अनेक कथित संत और साधु अपने प्रवचनों के चुटकलों के सहारे लोगों का प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। लोग भी चटखारे लेकर अपने दिल को तसल्ली देते हैं कि सत्संग का पुण्य प्राप्त कर रहे हैं। यह भक्ति नहीं बल्कि एक तरह से मजाक है। न तो इससे मन में शुद्धता आती है और न ज्ञान प्राप्त होता है। सत्संग करने से आशय यह होता है कि उससे मन और विचार के विकार निकल जायें और यह तभी संभव है जब केवल अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा हो। इस तरह चुटकुले तो मसखरे सुनाते हैं और अगर कथित संत और साधु अपने प्रवचन कार्यक्रमों में सांसरिक या पारिवारिक विषय पर सास बहु और जमाई ससुर के चुटकुले सुनाने लगें तो समझ लीजिये कि वह केवल मनोरंजन करने और कराने के लिये जोगी बने है। ऐसे में न तो उनसे लोक और परलोक सुधरना तो दूर बिगड़ने की आशंका होती है।
आदमी के मन को मनोरंजन की आवश्यकता होती है तो उसे कभी अध्यात्मिक भूख भी लगती है उस समय वह अपने आपको जानना चाहता है। कथित संत लोग एक साथ दोनों की कमी पूरी कर समाज में पुजते हैंं। मनोरंजन करने वाले तो केवल अपना काम करते हैं जबकि संत अपने लोगों को अध्यात्मक की आड़ में चुटकुले सुनाकर भटकाते हैं। अध्यात्मिक साधना का मतलब है एकांत में अपने आपसे सहजता से संपर्क कर अपने हृदय को शांत करना।
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, October 25, 2008

हिन्दी, हिन्दू और हिंदुत्व:नए सन्दर्भों में चर्चा (१)

हिन्दी,हिन्दू और हिंदुत्व शब्दों में जो आकर्षण है उसका कारण कोई उनकी कानों को सुनाई देने वाली ध्वनि नहीं बल्कि वह भाव जो उनके साथ जुड़ा है। यह भाव हिन्दी भाषा के अध्यात्मिक, हिन्दू व्यक्ति के ज्ञानी,और हिंदुत्व के दृढ़ आचरण होने से उत्पन्न होता है। हिन्दी भाषा के विकास, हिन्दू के उद्धार और हिंदुत्व के प्रचार का कीर्तन सुनते हुए बरसों हो गये और इनका प्रभाव बढ़ता भी जा रहा है पर यह उन व्यवसायिक कीर्तनकारों की वजह से नहीं बल्कि हिन्दी भाषा,हिन्दू व्यक्तित्व और हिंदुत्व के आचरण की प्रमाणिकता की वजह से है।

स्वतंत्रता के तत्काल बाद अंग्रेजों के जाते ही उनके द्वारा ही निर्मित शिक्षा पद्धति से शिक्षित महानुभावों को इस देश के लोगों को वैसे ही भेड़ की तरह भीड़ में शामिल करने का भूत सवार हुआ जैसे अंग्रेज करते थे। बस! जिसको जैसा विचार मिला वही उसके नाम पर पत्थर लगाता गया। बाद में उनकी आगे की पीढियों ने उन्हीं पत्थरों को पुजवाते हुए इस समाज पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। पत्थरों से आगे कुछ नहीं हो सकता था। वहां से कोई नए विचार की धारा प्रवाहित होकर नहीं आ सकती थी। नारे और वाद हमेशा लोगों को आकर्षित करने के लिए बनाए जाते हैं। उनमें कोई गहरा विचार या चिंत्तन ढूँढना अपने आप को धोखा देना है। फिर अंग्रेजों द्वारा ही बनायी गयी आदमी को गुलाम बनाने वाली शिक्षा से पढ़े हुए सभी लोगों से यह आशा भी नहीं की जा सकती कि वह अपने अन्दर कोई स्वतन्त्र विचार कर सकें। फिर भी जिन लोगों ने इस शिक्षा पद्धति को अक्षरज्ञान मानते हुए अपने प्राचीन धार्मिक तथा साहित्यक पुस्तकों को भक्ति और ज्ञान की दृष्टि से पढा वह ज्ञानी बने पर उन्होंने उसका व्यापार नहीं किया इसलिए लोगों तक उनकी बात पहुंची नहीं।
कुछ लोग तेजतर्रार थे उन्होंने इस ज्ञान को तोते की तरह रट कर उसे बेचना शुरू कर दिया। वह न तो अर्थ समझे न उनमें वह भाव आया पर चूंकि उन्होंने हिन्दी,हिन्दू और हिंदुत्व को उद्धार और प्रचार को अपना व्यवसाय बनाया तो फिर ऐसी सजावट भी की जिससे भक्त उनके यहाँ ग्राहक बन कर आये। यह हुआ भी! प्रकाशन और संचार माध्यमों में इन व्यापारियों की पकड़ हैं इसलिए वह भी इनके साथ हो जाते हैं। नित नयी परिभाषाएं और शब्द गढ़ जाते हैं।

कई किश्तों में समाप्त होने वाले इस आलेख में हिन्दी भाषा,हिन्दू व्यक्ति और हिंदुत्व के रूप में आचरण पर विचार किया जायेगा। इससे पहले यह तय कर लें कि आखिर उनकी संक्षिप्त परिभाषा या स्वरूप क्या है।

हिन्दी भाषा-संस्कृत के बाद विश्व की एकमात्र ऐसी भाषा है जो आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण है। दिलचस्प बात यह है कि यह एकमात्र ऐसी भाषा है जो आध्यात्म ज्ञान धारण करने में सहज भाव का अनुभव करा सकती है। भले ही संस्कृत से ज्ञान से किसी अन्य भाषा में अनुवाद कर उसे प्रस्तुत किया जाये पर वह प्रभावी नहीं हो सकता जब तक उसे हिन्दी में न पढा जाए। इसलिए जिन लोगों को अध्यात्म ज्ञान के साथ जीवन व्यतीत करना है उनको यह भाषा पढ़नी ही होगी। इसमें जो भाव है वह सहज है और अध्यात्मिक ज्ञान के लिए वह आवश्यक है। जिस तरह विश्व में भौतिकता का प्रभाव बढा है वैसे ही लोगों में मानसिक संताप भी है। वह उससे बचने के लिए अध्यात्म में अपनी शांति ढूंढ रहे है और इसलिए धीरे धीरे हिन्दी का प्रचार स्वत: बढेगा। अंतर्जाल पर भी पूंजीपति प्रभावी हैं पर इसके बावजूद यहाँ स्वतंत्र लेखन की धारा बहती रहेगी। इसलिए स्वतन्त्र सोच वाले उस ज्ञान के साथ आगे बढ़ेंगे जो ज्ञान और कल्याण का व्यापार करने वालों की पास ही नहीं है तो दूसरे को बेचेंगे क्या? अत: कालांतर में अंतर्जाल पर हिन्दी अपने श्रेष्ठतम रूप में आगे आयेगी। हिंदी भाषा के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि यह किसी एक धर्म, प्रदेश या देश की भाषा नहीं है। इसका प्रचार पूरे विश्व में स्वत: हो रहा है। भारत में तो हर धर्म और प्रांत का आदमी इसे अपना चुका है।

हिन्दू व्यक्ति-मानसिक,आध्यात्मिक और आचरण की दृष्टि से परिपूर्ण,दूसरे पर निष्प्रयोजन दया करने वाला,भगवान की निष्काम भक्ति में तल्लीन,विज्ञान के नित नए रूपों में जीवन की सहजता को अनुभव करते हुए उसके साथ जुड़ा हुआ, अपने मन, बुद्धि और विचारों की विकारों को योगासन और ध्यान द्वारा प्रतिदिन बाहर विसर्जित करने में सक्षम,समय समय पर वातावरण और पर्यावरण की शुद्धता के लिए यज्ञ हवन में संलिप्त, त्याग में ही प्रसन्न रहने वाला, लालच और लोभ रहित,तत्व ज्ञान धारी और हर स्थिति में सभी के प्रति समदर्शिता का भाव रखने वाला व्यक्ति सच्चा हिन्दू है। अहिंसा और ज्ञान हिंदू के ऐसे अस्त्र-शस्त्र हैं जिसस वह अपने विरोधियों को परास्त करता है।

हिंदुत्व-हिन्दू व्यक्ति के रूप में किये गए कार्य ही हिंदुत्व की पहचान होते हैं। हिंदुत्व की सबसे बड़ी पहचान यह है कि विरोधी या शत्रु को हिंसा से नहीं बल्कि बुद्धि और ज्ञान की शक्ति से परास्त किया जाए। इसके लिये उसे हिंसा करने की आव्श्यकता ही नहीं होती बल्कि वह हालातों पर बौद्धिक चातुर्य से विजय पा लेता है। देखिए कितने हमले इस देश पर हुए। इसे लूटा गया। यहाँ तमाम तरह के प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराये गए, पर उस ज्ञान को कोई नहीं मिटा पाया जिसके वजह से इस देश को आध्यात्म गुरु कहा जाता है। यही पहचान है हिंदुत्व की शक्ति की। हिंदुत्व का एक अर्थ आध्यात्मिक ज्ञान भी है जो सत्य रूप है। आगे पीछे इसे बढ़ना ही है।

यह कोई अंतिम परिभाषा नहीं। आलेख बढा न हों इसलिए यह तात्कालिक रूप से लिखीं गयीं हैं। आगे हम और भी चर्चा करेंगे। यह जानने का प्रयास करेंगे कि आखिर इसके नाम पर पाखण्ड कैसे बिक रहा है। यह बताने का प्रयास भी करेंगे कि इसे बदनाम करने वाले भी कैसे कैसे स्वांग रचते हैं।ऐसी एक नहीं कई घटनाएँ जब लोगों ने अपने हिसाब से अपने विचार बदले या कहें कि उन्होंने अपने नारे और वाद बदले। कभी धर्म के भले के नाम पर आन्दोलन चलाया तो कभी भाषा की रक्षा का ठेका लिया। कहते हैं अपने को हिंदुत्व का प्रचारक पर उनके आचरण उसके अनुसार बिलकुल नहीं है।
यह आलेख उनकी आलोचना पर नहीं लिखा जा रहा है बल्कि यह बताने के लिये लिखा जा रहा है कि एक हिंदी भाषी हिंदू के रूप में हमारा आचरण ही हिंदुत्व की पहचान होती है और उसे समझ लेना चाहिये। आने वाले समय में कई ऐसी घटनाएँ होनी वाली हैं जिससे सामान्य भक्त को मानसिक कष्ट हो सकता है। इसी कारण उनको अपने अध्यात्म ज्ञान को जाग्रत कर लेना चाहिए। आखिर इसकी आवश्यकता क्यों अनुभव हुई? देखा गया है कि सनातन धर्मी-हिन्दू धर्म-अपने धर्म की प्रशंसा तो करते हैं पर उसके समर्थन में उनके तर्क केवल विश्वास का सम्मान करने के आग्रह तक ही सीमित रहते हैं। उसी तरह जब कोई सनातन धर्म की आलोचना करता है तो लड़ने को दौड़ पड़ते हैं। यह अज्ञानता का परिणाम है।
इसका एक उदाहरण एक अन्य धर्मी चैनल पर देखने को मिला। वहां एक अन्य धर्म के विद्वान वेदों की उन ऋचाओं को वहां बैठे लोगों को सुनाकर सनातन धर्म की आलोचना कर रहे थे तब वहां बैठे कुछ लोग उन पर गुस्सा हो रहे थे। ऋचाएं भी वह जिनकी आलोचना सुनते हुए बरसों हो गये हैं। लोगों का गुस्सा देखकर वह विद्वान मुस्करा रहे थे। अगर वहां कोई ज्ञानी होता तो उनको छठी का दूध याद दिला देता, मगर जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि ज्ञान और कल्याण का व्यापार करने वाले समाज के शिखर पर जाकर बैठे हैं और समाज ने भी एक तरह से मौन स्वीकृति दे दी है। इसका कारण ज्ञान का अभाव है। ऐसे ही लोग अपने अल्पज्ञान को साथ लेकर बहस करने पहुंचते हैं और जब आलोचना होती है तो तर्क देने की बजाय क्रोध का प्रदर्शन कर अपने को धर्म का ठेकेदार साबित करते हैं। ज्ञानी की सबसे बड़ी पहचान है कि वह वाद विवाद में कभी उतेजित नहीं होता। उत्तेजित होना अज्ञानता का प्रमाण है। अपने अध्यात्म ज्ञान के मूल तत्वों के बारे में अधिक जानकारी न होने से वह न तो उसकी प्रशंसा कर पाते न आलोचना का प्रतिवाद कर पाते हैं।

इस आलेख का उद्देश्य किसी धर्म का प्रचार नहीं बल्कि धर्म की नाम फैलाए जा रहे भ्रम का प्रतिकार करने के साथ सत्संग की दृष्टि से सत्य का अन्वेषण करना है, जो लिखते लिखते ही प्राप्त होगा। इन पंक्तियों का लेखक कोई सिद्ध या ज्ञानी नहीं बल्कि एक सामान्य इंसान है जिसे भारतीय अध्यात्म में आस्था है। इसलिए अगर कहीं कोई त्रुटि हो जाए तो उसे अनदेखा करें। यहाँ किसी के विश्वास का खंडन नहीं करना बल्कि अपने विश्वास की चर्चा करना है। बिना किसी योजना के लिखे जा रहे इस लेख के लंबे चलने की संभावना है और यह विवादास्पद टिप्पणियाँ न रखें तो ही अच्छा होगा। ऐसी सार्थक टिप्पणियों का स्वागत है जिससे लेखक और पाठक दोनों को ज्ञान मिले। वह ज्ञान जो हमारे अक्षुणण अध्यात्म की सबसे बड़ी तात्कत है। शेष इसी ब्लॉग/पत्रिका पर जारी रहेगा। इस आलेख को प्रस्तावना ही समझें क्योंकि आगे इस पर व्यापक रूप से लिखना पर पढ़ना है।
-----------------------------------------------------------------

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दयोग सारथी-पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
लेखक,कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप

अध्यात्मिक पत्रिकायें

वर्डप्रेस की संबद्ध पत्रिकायें

लोकप्रिय पत्रिकायें