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Saturday, September 07, 2013

धर्म के नाम पर चतुराई करने वाले अधम-हिन्दी चिंत्तन लेख(dharma ke naam par chaturae karne wale adham-hindi chinttan lekh)



        हमारे देश में ज्योतिष, काला जादू तथा तंत्र मंत्र की आड़ में  लोगों को सांसरिक विषयों में सफलता दिलाने के लिये कथित रूप से अनेक व्यवसायिक धार्मिक ठेकेदार सक्रिय हैं। सच बात तो यह है कि सांसरिक विषयों में लिप्त रहते हुए नैतिक आचरण करना ही धर्म है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि हम अपने महान धर्मभीरु होने का दावा करते हुए गाते फिरें।  दूसरी बात यह कि कथित रूप से जो गुरु या संत सांसरिक विषयों पर बोलते हैं उनको धर्म का प्रवर्तक मानना ही गलत है।  उससे ज्यादा बुरी बात यह है कि खांस वस्त्रों को पहनकर घूमने वाले लोगों को संबंधित धर्म का ज्ञानी मानना एकदम मूर्खता है।  अगर भेड़ की खाल पहनकर भेड़िया शाकाहारी होने का स्वांग करे और  कोई हिरण मान ले तो मूर्ख ही कहा जाता  है। यही स्थिति मनुष्य की है। वह किसी भी कथित धर्म प्रचारक के मुख से अच्छी बातें सुनकर उसे संत या सन्यासी मानने लगता है।  इसी कारण अनेक लोग ज्ञान के व्यवसायिक प्रचारकों को ही गुरु मानने लगते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है वरन् उसे धारण कर जीवन में उतारना ही पूर्ण ज्ञानी होने का प्रमाण होता है।
                        इस बात को अनेक  लोग नहीं समझते और ज्ञान की बातें सुनाने वालों को संत कहने लगते हैं। यही कारण है कि अनेक लोगों ने धर्म के नाम पर हमारे देश में अपना व्यापार चला रखा है।  इन लोगों में धन कमाने की प्रवृत्तियां किसी सामान्य मनुष्य से अधिक खतरनाक ढंग से विद्यमान देखी जाती है। 
मनस्मृति में कहा गया है कि
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अकर्मशीलं च महाशनं च लोकद्विष्टं महुमायं नृशंसम्।
अदेशकालज्ञमनिष्टवेषमेतान् गृहे न प्रतिवासयेत्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-अकर्मण्य, अधिक भोजन करने वाले, सबसे बैर बांधने वाले, मायावी, क्रूर, देशकाल का ज्ञान न रखने वाले, निन्दित वेश धारण वाले मनुष्यों को कभी अपनी घर में नहीं  ठहराये।
संक्लिष्टकर्माणमतिप्रमादं नित्यानृतं चाटृढभक्तिकं च।
विसृष्टरागं पटमानिन्र चाप्येतान् न सेवेत नराधमान् षट्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-क्लेश करने वाला, अत्यंत प्रमादी, झूठ बोलने वाला, अस्थिर भक्ति वाला, स्नेह से रहित तथा अपने को ही चतुर मानने वाला, यह छह प्रकार के लोग अधम माने जाते हैं। इनकी सेवा कतई न करें।
                        कभी कभी तो यह लगता है कि धर्म के नाम पर व्यापार चलाने वाले उतने ही खतरनाक है जितना अफीम बेचने वाले लोग होते हैं।  हमने देखा है कि मादक द्रव्य बेचने में लगे लोग अपने ही स्वाजातीय व्यवसायियों के विरुद्ध हिंसक गतिविधियां करते हैं। ऐसे ही धर्म व्यवसायियों के कारण प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कार्ल मार्क्स से धर्म को अफीम कहा था।  हम उसके कथित अर्थशास्त्र के सिद्धांतों से सहमत हों या न हों पर भारत के संदर्भ में उसका धर्म को अफीम मानने का सिद्धांत एकदम सही लगता है।  अनेक बार तो ऐसा लगता है कि धर्म का व्यापार करने वाले यह लोग अधर्म की राह पर चलते हुए शक्ति, संपत्ति तथा शिष्य संग्रह कर अपनी ताकत इसलिये बढ़ाते हैं ताकि राजकीय संस्थाओं पर प्रभाव जमाया जा सके।  ऐसे लोगों की सेवा करना या उनकी भक्ति में लगे रहने से मन के कलुषित होने का भय रहता है।
                        हमारे यहां कहा भी जाता है कि भक्ति भगवान की करो किसी बंदे को भजना ठीक नहीं है। कथित गुरुओं की व्यवसायिक चालाकियों के चलते अनेक लोग फंस कर भगवान की बजाय अपने कथित गुरुओं  को ही भगवान मानने लगते हैं। जब उनको अपने गुरु की असलियत पता चलती है तो उनके अंदर निराशा और तनाव का ज्वार उठने लगता है। अनेक कथित गुरु अपने सत्संग में चुटकुले और अपनी कल्पित कहानियां सुनाकर हास्य का भाव भी पैदा करते हैं। अपने शिष्य समुदाय को बनाये रखने के लिये अनेक प्रकार के स्वांग भी रचते हैं।  कहना चाहिये कि वह धर्म के नाम पर अभिनय करते हैं। जब पोल खुलती है तब शिष्य अपने को एक अंधेरे कुंऐं में गिरा अनुभव करते हैं।
                        जिन लोगों के अंदर अध्यात्मिक ज्ञान की ललक है उनको गुरु ढूंढने की बजाय अपने ही अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिये।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कोई भोग कभी किसी का उद्धार नहीं कर सकता। यह शक्ति केवल त्यागी भाव के गुरु में ही संभव है जिसकी पहचान यह होती है कि वह जहां खड़ा हो जाये वहीं आश्रम लगने लगे। जब बोले तो लगे कि अमृतवाणी प्रवाहित हो रही है। वह संपत्ति और शिष्य संचय की बजाय सर्वजन हिताय के भाव से समाज में सलंग्न रहता है।   

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, August 31, 2013

मनु स्मृति-कामनाओं का त्याग करने वाला ही सन्यासी (kamnaon ka tyag karne wala sanyasi-manu smriti)



                        हमारे देश में धर्म के विषय पर कहीं चर्चा हो तो अनेक लोग बातें सुनने और कहने के लिये लालायित हो उठते हैं। हैरानी की बात है कि जितना धर्म के विषय में हमारे पौराणिक ग्रंथों में लिखा गया उससे अधिक अन्यत्र कहीं सामग्री नहीं मिलती।  यही कारण है कि हमारे देश में उससे पढ़कर रटने वाले धर्म संदेशों के प्रचार को एक व्यवसाय बना लेते हैं।  दूसरी बात यह भी है कि हमारे देश में लोगों का व्यवसाय कृषि, लघु एवं कुटीर उद्योग के साथ ही वस्तुओं का विक्रय कर अपना पेट पालना रहा है।  पुराने समय में लोगों को बाज़ार के छोटे होने के कारण  अपने धंधे आदि से फुर्सत अधिक रहती थी और यही कारण है कि उनके हृदय में संसार के विषयों के पश्चात् अज्ञात शक्ति की आराधना करने का समय निकल आता है। इसी कारण उनके अंदर धर्म के प्रति आस्थाओं का जन्म हुआ। सीधी बात कहें तो उनका अध्यात्म उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करता था। संसार की अज्ञात शक्ति के प्रति जिज्ञासा का कथित धर्म प्रचारकों ने खूब लाभ उठाया  औद्योगिक रूप से हमारा देश अभी शैशवकाल में ही है। ऐसे में छोटे शहरों और गांवों में लोगों के पास धर्म के प्रति रुचि अभी भी बरकरार है।  यह अलग बात है कि उनको ज्ञान देने वाले कथित गुरु उनकी जिज्ञासा शांत करने की बजाय अपनी चालाकी से कथायें सुनाकर या भजन गाकर मनोरंजन के माध्यम से उनके मन को प्रसन्न करते हैं। जहां तक ब्रह्मज्ञान का प्रश्न है उसके बारे में भ्रांत धारणाऐं प्रचलित हैं। कौन त्यागी, कौन सन्यासी और कौन तत्वाज्ञानी इसके बारे में आम लोगों अपने अपने गुरुओं के मतानुसार विचार करते हैं। 
         अनेक कथित ब्रह्मज्ञानी तो ऐसे हैं जो केवल संपत्ति संग्रह और शिष्यों के समूह का संचय कर प्रचार में प्रसिद्धि पाते हैं। इतना ही नहीं बाज़ार तथा प्रचार समूहों के लिये जो उपयोगी हैं वह सिद्ध है और जो नहीं है उसे कोई पूछता तक नहीं है। सच बात तो यह है कि त्यागी ही सच्चा सन्यासी होता है।  सन्यास का यह अर्थ कदापि नहीं है कि आदमी अपनी सांसरिक जिम्मेदारी से भागकर गेरुऐ वस्त्र पहन ले। गेरुए वस्त्र पहनकर भी जो कामनायें करता है वह सन्यासी नहीं है। इच्छाओं का त्याग करे वही ब्रह्मज्ञानी है और जो इच्छाओं की पूर्ति में ही लगा रहे उससे तो न ज्ञान लेना चाहिये और न उसे देना चाहिये।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूव एवाभिवर्धते।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह आग में घी डालने से अग्नि प्रज्जवलित होती है उसी तरह एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी स्वतः जाग्रत हो जाती है।
अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते।
धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः।।
                        हिन्दी में भावार्थ-अर्थ और काम में आसक्त लोगों के लिये धर्म का ज्ञान देने का कोई विधान नहीं है। धर्म के विषय में जिज्ञासा रखने वालों के लिये वेद ही सर्वोच्च प्रमाण हैं।
                        भारत में हिन्दू धर्म में साकार तथा निराकार दो प्रकार की भक्ति की धारा प्रचलित है पर अब तो यहां अहंकार की भक्ति की धारा भी बह रही है। अनेक गुरु स्वयं को भगवान का अवतार बताकर लोगों में अपने शिष्य बनाते हैं।  इतना ही नहीं जो उनसे व्यवसायिक लाभ उठाना चाहते हैं या वेतन पाते हैं वह हृदय से अपने स्वामी को भगवान नहीं मानते पर शिष्यों को प्रभावित करने के लिये वह इसी तरह का प्रचार करते हैं। अनेक बार तो ऐसा भी होता है कि धर्म व्यवसाय में लगे लोग एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने का प्रयास करते हुए समाज में वैमनस्य फैलाते नज़र आते हैं।  यह सब देखते हुए धर्म के प्रति जिज्ञासा रखने वाले लोग हमेशा ही ंसशय में रहते हैं।
                        इस संशय के निवारण के लिये लोगों को अपने ही धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते रहना चाहिये।  यही  ग्रंथ धर्म का प्रमाण हैं और अगर इनका ध्यान से अध्ययन किया जाये तो धर्म के साथ ही तत्वज्ञान की अनुभूति स्वतः होने लगती है।  सबसे बड़ी बात यह कि हमारे धर्मग्रंथ मानते हैं कि कामनाओं का त्याग करना ही सन्यास है और ग्रहस्थ होते हुए भी सन्यासी हुआ जा सकता हैं।  अतः भ्रम में आकर किसी को न तो गुरु बनाना चाहिये न गुरु में ईश्वर का रूप देखने की कामना करना चाहिये।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Wednesday, July 17, 2013

मनुस्मृति के आधार पर संदेश-आत्म नियंत्रण करना भी यज्ञ है (manu smriti ke adhar par sandesh-aatma niyantran karna bhee yagya hai)



        हमारे देश में भौतिक साधनों से यज्ञ करने को अधिक महत्व दिया जाता  है।  दरअसल भौतिक यज्ञ प्रत्यक्ष दिखता है इससे दूसरों के सामने अपनी धार्मिक छवि का निर्माण करने का सहज अवसर मिलता है। यह देखा भी गया है कि धन के बल पर किये गये इस तरह के धार्मिक प्रदर्शन करने वालों का काला चरित्र आम लोगों की आंखों से ओझल ही रहता है। जिनका चरित्र काला नहंी भी हो वह भी कोई अन्य नैतिक कार्यक्रम करने की बजाय इस तरह धन खर्च कर धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से  अपनी उज्जवल छवि बनाने का प्रयास करते हैं। यहां तक तो ठीक है पर जब इस तरह धन खर्च कर धार्मिक कार्यक्रम करने वाले अन्य लोगों को भी ऐसे काम करने के लिये उकसाने का प्रयास करते हैं और न करने पर उनके निंदक बन जाते हैं।
         इतना ही नहीं हमारे देश में अनेक कथित गुरु भी हैं जो अपने शिष्यों को इस तरह के भौतिक यज्ञों के लिये प्रेरित करते हैं। उनके शिष्य उनसे भी दो कदम आगे जाकर भौतिक यज्ञ न करने वालों को नास्तिक या भक्तिहीन कहकर मजाक उड़ाते हैं।  इस तरह एक धार्मिक द्वंद्व में समाज बरसों से फंसा हुआ है।  भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परे होते समाज में यह द्वंद्व अनेक बार कई लोगों के सामने दुविधाजनक स्थिति पैदा कर देता है।
   
मनुस्मृति में कहा गया है कि
..........................................

यथायथा हि पुरुषः शास्त्रंसमधिगच्छति।
तथातथा विंजानाति विज्ञानं चास्य रोचते।।
      हिन्दी में भावार्थ-जैसे जैसे मनुष्य शास्त्र का अभ्यास करता है, उसे तत्वज्ञान प्राप्त होने लगता है। इससे उसकी रुचि अध्ययन में बढ़ती जाती है।
ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा।
नृचज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत्।।
        हिन्दी में भावार्थ-ऋषि यज्ञ (वेद अध्ययन), देव यज्ञ (मूर्ति पूजा), भूत यज्ञ (हवन आदि करना), नृयज्ञ (अतिथि सत्कार), तथा पितृयज्ञ (श्राद्ध तथा तर्पण) इन पांच यज्ञों का अनुष्ठान करते रहना चाहिये
एतानेके महायज्ञन्यज्ञशास्त्रविदो जनाः।
अनहिमानाः सततमिन्द्रियेष्ेवे जुहृति।।

         हिन्दी में भावार्थ-शास्त्रों के ज्ञाता कुछ गृहस्थ इन यज्ञों को न करन पांचों इंद्रियों पर-नेत्र, नासिका, जीभ, त्वचा ताकि कान पर संयम-नियंत्रण करते हुए पंच यज्ञ करते हैं।
       देश में कई ऐसे गृहस्थ हैं जो इस तरह के भौतिक यज्ञों की अपेक्षा ज्ञान को  श्रेष्ठ मानते हैं।  आयु, समय तथा आवश्यकता होने पर विद्याध्ययन, अतिथि सत्कार तथा अन्य परोपकार के कार्य करना चाहिये पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि अन्य प्रकार के भौतिक यज्ञों के लिये सभी गृहस्थों पर दबाव डाला जाये।  सच बात तो यह है कि अपनी देह की इंद्रियों पर नियंत्रण करना भी एक तरह से यज्ञ है।  अपनी आंखों से सदैव अच्छे दृश्य देखने का प्रयास करना, कानों से केवल मधुर स्वर सुनना, दुर्गंध से दूर होकर सुगंध की तरफ जाना, जीभ के स्वाद का ध्यान रखने की बजाय सुपाच्य वस्तुओं को ग्रहण करना तथा अनांवश्यक रूप से अपनी देह को कठिन मार्गो पर ले जाने की बजाय अनुकूल मौसम, सुविधाजनक मार्ग तथा शुद्ध वातावरण के अनुसार अपने पग बढ़ाने के साथ ही अपने हाथ उन्हीं कामों में डालना चाहिये जो तनाव पैदा करने वाले न हो।
       कहने का अभिप्राय यह है कि हर मनुष्य को अपनी देह, मन और विचारों के अनुकूल कार्यों पर ही ध्यान देना एक तरह से ज्ञान यज्ञ है।  दूसरों को लाभ पहुंचाकर वाह वाही लूटने से अच्छा है दूसरों को हानि पहुंचाने के प्रयास से बचा जाये।  हम यहां भौतिक यज्ञों की आलोचना नहीं कर रहे पर इतना जरूर कहना चाहते हैं कि ज्ञान यज्ञ करने वालों के प्रति ऐसे लोगों को दुर्भावना नहीं रखना चाहिये जो सकाम  भक्ति  करते हैं।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, June 30, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-धनियों को बुद्धिमान से होड़ नहीं करना चाहिए (economics of kautilya hin hindi-rich man should not campairs with inteligent peson)


         मनुष्य में यह प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से दूसरों के साथ होड़ करने की प्रवृत्त् िहोती है। यही उसके दुःख का मूल कारण भी है।  सच बात तो यह है कि आज कोई भी सुखी नहीं है।  इसका कारण यह कतई नहीं है कि माया की कृपा का लोगों के  पास अभाव है वरन् वह दूसरों पर भी कृपा करती है इसको लेकर सभी लोग परेशान रहते हैं।  सभी लोग:तेरी कमीज  मेरी कमीज से सफेद कैसे’ की तर्ज पर जीवन पथ पर चलते हुए चिंतायें पाल रहे हैं।  अनेक लोगों के पास बहुत सारी भौतिक सुविधायें हैं इससे उनको सुख नहीं मिलता बल्कि दूसरे के पास भी वैसे ही साधन हैं यह चीज सभी को परेशान करती है।
           उससे भी बड़ी समस्या यह है कि आधुनिक समय में ढेर सारे सुख सभी के पास हैं। कोई किसी से कम नहंी है इसलिये एक दूसरे की प्रशंसा करने का समय किसी के पास नहीं है।  न ही शब्द है न अभ्यास कि दूसरे की प्रशंसा कर उसका मनोबल बढ़ाया जाये।  इसके विपरीत सभी एक दूसरे को नीचा दिखाकर मनोबल गिराने का प्रयास करते हैं। जिनके पास धन, पद और प्रतिष्ठा है उनका अनुकरण वह लोग भी करना चाहते हैं जिनके पास अधिक धन, उच्च पद और प्रतिष्ठा का अभाव है।  परिणाम यह है कि समाज में स्वस्थ प्रतियोगिता की बजाय ईर्ष्या, वैमनस्य और घ्णा का वातावरण बन गया है।  उस पर प्रचार माध्यम भी क्रिकेट, फिल्म तथा राजनीति के शिखर पृरुषों का प्रचार इस तरह करते हैं कि वह समाज के प्रेरक बन जायें।  तय बात है कि उन जैसा स्तर आम आदमी के भाग्य मे नहीं होता पर सपने पालने के कारण वह तनाव झेलता है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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वेषभाषा अनुकरणं न कुर्य्यात्प्थ्विीपतैः।
         सम्पन्नोऽपि हि मेघावी स्पर्द्धेत न च सद्गुणे।।
      हिन्दी में भावार्थ-राज के वेष तथा वार्तालाप की नकल नहीं करना चाहिये। उसी तरह स्वयं भले हीी धनी हों पर कभी बुद्धिमान के गुणों से स्पर्घा न करें।
      नीति विशारद चाणक्य यह स्पष्ट रूप से मानते  हैं कि धनी का पूरा समाज सम्मान करता है। यह बात स्वाभाविक है क्योंकि आपत्ति विपत्ति में कोई भी रुपये पैसे के लिये धनी से ही आशा करता है। भले ही कोई धनी पूरे समाज के निर्धनों को उधार या सहायता नहीं देता पर स्वभाविक रूप से  एक आशा तो सभी को बंधी रहती है। इससे अनेक धनी लोग अपने को देवता या भगवान समझते हुए अल्पधनी बुद्धिमान को भी हेय समझने लगते हैं।  वह मानते हैं कि उनके अंदर बुद्धिमानी के गुण स्वाभाविक रूप से होते हैं।  यह उनका भ्रम है।  जिस तरह बुद्धिमान व्यक्ति अपने पास अधिक धन न होने पर धनिकों की होड़ नहीं करते उसी तरह धनवानों को भी चाहिये कि वह बुद्धिमानों की होड़ करते हुए ऐसे काम न करे जिससे उनका धन जाता रहे। हो सके तो बुद्धिमानों से अपनी स्थिति पर चर्चा करते हुए उनसे सलाह  भी लेते रहना चाहिये।                      


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Monday, June 24, 2013

चाणक्य नीति-अपने हाथ से काम करें तो शोभा बढ़ती है (chankya policy in hindi-apna hath jagannath)



              सांसरिक  विषयों में निरंतर लिप्तता मनुष्य को आत्ममंथन का समय नहीं देती। इस कारण मनुष्य विषयों में इतना आसक्त होता है कि उसका मन बेबस होकर उनमें ही बंधा रहता है। यह सांसरिक विषय मनुष्य की बुद्धि को बहिर्मुखी बना देते हैं। एक समय ऐसा आ जाता है कि मनुष्य की बुद्धि पराधीन हो जाती है और जब उसे कहीं एकांत मिलता है तब वह घबड़ा जाता है। वह तत्काल कोई ऐसा विषय ढूंढता है जिसमें वह व्यस्त होकर अपनी इस घबड़ाहट को मन से दूर कर सके।  यह अलग बात है कि वह निरंतर विषयों में लिप्त रहते हुए अपनी रचनात्मक शक्ति खो बैठता है जिससे उसमें कुछ नये करने की सोच नहीं बन पाती। हमारे देश ही नहीं वरन्  पूरे विश्व समाज में यही स्थिति है। यही कारण है कि सभी लोग पेशेवर मनोरंजन व्यवसायियों के जाल में फंसे हैं। इससे बाज़ार के सौदागर तथा उनके अनुयायी प्रचारक नित नये स्वांग रचकर मनुष्य समाज पर नियंत्रण किये हुए हैं।  क्रिकेट से आदमी बोर हो तो  टेनिस, उससे बोर हो तो फुटबाल और उससे भी उकता जाये तो फिर  बैटमिंटन का खेल सामने रख दिया जाता है। फिल्मों में यही स्थिति है। कभी स्टंट फिल्म तो कभी कॉमेडी कभी हारर कथानक पर फिल्म बनाकर लोगों की आंखों का चश्मा बदला जाता है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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स्वहस्ग्रथिता माला स्वहस्तधृष्अच्नछन्म्।
स्वहस्तलिखितं स्तोत्रं शक्रस्यापि श्रियं हरेत्।।
      हिन्दी में भावार्थ-अपने हाथ से  गूंथी हुई माला, अपने हाथों से घिसा गया चंदन और अपने हाथ से लिखा हुए स्तोत्र का इतना मन पर प्रभाव होता है कि इंद्र की शोभा भी फीकी दिखाई देती है।
       इतने सारे स्वांग देखकर भी आदमी जब उकता जाये तो  उसके सामने अध्यात्कि चर्चा के नाम पर धार्मिक कथायें इस तरह सुनाई जाती हैं जिससे उसका मनोरंजन हो।  पेशेवर धार्मिक व्यवसायिों ने धर्म के नाम पर समाज को अपने बंधन में बांध रखा है।  प्रश्न यह है कि इस बंधन से कैसे छूटा जाये?
      इसका उपाय यह है कि हमें अपने हाथ से कोई ऐसा काम करना चाहिये जिससे पैसा हमें न मिले तो कोई बात नहीं पर मन को इस बात का अनुभव होना चाहिये कि हम कुछ अनोखा कर रहे हैं। आपने देखा होगा लेखक, कलाकार तथा गायक कलाकर कभी अपना जीवन नीरस होने की शिकायत नहीं करते।  पहले लोग अपने हाथ से माला जापकर या अपने हाथ घिसे हुए चंदन से स्वयं को अलंकृत करते थे।  माला जापने से किसी को भगवान भले ही नहीं मिला हो पर इससे अनेक लोगों ने अपने मन पर पूरे जीवन भर अपना नियंत्रण रखा।
       कहा भी जाता है कि अपनी घोल तो नशा होय।  हम अक्सर अनेक लोगों से कहते हैं कि इतना पैसा कमा कर क्या करोगे? हम अनेक लोगों के बारे में यह भी सोचते हैं कि  वह इतना पैसा कमाकर क्या करेंगे? दरअसल इस संसार में मन को बहलाने का सबसे आसान साधन पैसे कमाने में लग जाना है।  यही लोग सभी करते हैं। यह अलग बात है कि कालांतर में यह शौक भी दम तोड़ देता है।  उस समय मनुष्य को खालीपन लगने लगता है।  इसलिये अपने साथ कोई ऐसा शौक रखना चाहिये जो मायाजाल से मुक्त हो। सभी लोग लेखकर, चित्रकार या कलाकर नहीं कर सकते।  ऐसे में  अपने मुंह से भजन गाते या फिर बागवानी करते रहना इसका अच्छा उपाय हो सकता है।  कहनें का अभिप्राय यह है कि अपनी अभिव्यक्ति को निष्काम कर्म के माध्यम से बाहर आने देना चाहिये।  यह बचपन से ही स्वतः पड़ जाये तो भाग्य समझना चाहिये और यदि न हो तो युवावस्था में इस बात का प्रयास करना चाहिये कि अपने हाथ हमेशा ही जगन्नाथ बने और धर्म, साहित्य, या मनोरंजन के नाम कोई हमारे मन को बांध न सके।

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Saturday, June 22, 2013

चाणक्य नीति-अपने जीवन में आत्ममंथन करते रहना चाहिए (apna atma manthan karnaa chahiye)




           वर्तमान शिक्षा पद्धति आदमी को नौकरी तथा उपभोग की के तत्वों के अलावा कुछ अन्य का ज्ञान नहीं देती। अधिकतर शिक्षित युवक नौकरी कर एक सभ्य उपभोगीय प्रवृत्ति के समाज का सदस्य बनना चाहते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में सांसरिक विषयों को ही वह जीवन का सत्य समझते हैं। यह सब ठीक है पर यह उपभोगीय प्रवृत्ति मनुष्य की संघर्ष क्षमता का कम करती है।  जब तक समय ठीक है तभी तक सभी प्रसन्न दिखते हैं पर थोड़ी विपत्ति आने पर ऐसे लोगों की हवा निकल जाती है है जो केवल बौद्धिक प्रयासों से जिन्दा   है।  शारीरिक श्रम के अभाव में शिक्षित समाज की हवा जल्दी निकल जाती है।
       विदुर नीति नीति में कहा भी गया है कि धनिक लोगों की पाचन क्षमता कम होती है। तय बात है कि जब पाचन शक्ति कमजोर होगी तो मनुष्य में संघर्ष क्षमता की कम रहेगी।  यह सब अध्यात्मिक ज्ञान होने पर ही समझा जा सकता है। मुख्य बात यह कि जो व्यक्ति समय समय पर आत्म मंथन करेगा वही अपनी स्थिति तथा शक्ति को समझ पायेगा।  आत्ममंथन की प्रकिया से गुजरने के बाद आदमी अपनी शक्ति तथा साधनों में समन्वय स्थापित कर सकता है।  अगर मनुष्य आत्ममंथन नहीं करेगा तो वह हमेशा ही अपनी स्थिति के पतन के भय से ग्रसित रहेगा।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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कः कालः काति मित्राणि को देशः की व्ययाऽगमौ
कश्चाचाऽहं का च मे शक्त्रििति विनयंमुहुर्मुहुः।।
     हिन्दी में भावार्थ-हमारे मित्र कैसे है? समय कैसा है? हम किस क्षेत्र में रहे रहे हैं। हमारे आय व्यय कीस्थिति क्या है? हम कौन है तथा हमारी शक्त् िकितनी है? ऐसे प्रश्नों पर हमेशा विचार करते रहना चाहिये।
तावट् भयेष भेतव्यं यावद्भयमनागतम्।
आगतं तु भयं दृष्टवांर प्रहर्तव्यमङ्कसर।।
          हिन्दी में भावार्थ-अपने मन में किसी भय को स्थान नहीं देना चाहिये।  जब संकट आये तभी भय का विचार करना चाहिये। जब सेकट सामने हो तो उस पर पूरी शक्ति से प्रहार करना चाहिये।
            जब आदमी चिंत्तन और आत्मंथन की प्रक्रिया नहीं करेगा तो उसके अंदर हमेशा ही अपनी स्थिति से गिरने का भय व्याप्त होगा। ऐसे ऐसे भय पैदा होंगे जिनकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। यह सभी भय कल्पित होते हैं। यह शक्तिहीन व्यक्ति की पहचान है जो कालांतर में कायर बन जाता है।  इसलिये जीवन में कोई काम सोच विचार करते हुए तो करना चाहिये पर परिणामों में

असफलता की आशंका कतई नहीं करना चाहिये।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Saturday, June 15, 2013

तुलसीदास के दोहे-पानी बढ़ जाने पर गंगा हंसों को भगाकर बगुलों को जगह देती है (tulsi ke dohe-pani badh jane par ganga hanson ko bhagakar bagulon ko jagah detee hai)



              इस संसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं-सात्विक, राजस और तामस।  योगी और ज्ञानी इस भेद को जानते हैं इसलिये कभी अपनी स्थिति से विचलित नहीं होते।  सात्विक पुरुष तो केवल अपनी भक्ति में लीन रहते हुए जीवन बिताते हैं जबकि राजस प्रवृत्ति वाले अनेक प्रकार के उपक्रम करते हैं ताकि उनको भौतिक लाभ मिलता रहे। तामसी प्रवृत्ति के लोग जहां जीवन में आलस्य के साथ प्रमाद में समय बिताते हैं वही उनके अंदर अनेक प्रकार का वैचारिक भ्रम भी रहता है। 
     हम यहां खासतौर से राजसी प्रवृत्ति के लोगों की चर्चा करना चाहेंगे। मुख्य रूप से राजस पुरुष ही संसार का संचालन करते हैं।  उनकी भूमिका समाज में  अत्यंत व्यापक होती है। इस प्रवृत्ति के लोगों में लोभ, अभिमान तथा क्रोध जैसे दुर्गुण स्वाभाविक रूप से विद्यमान होते हैं।  राजसी प्रवृत्ति के कर्मों को प्रारंभ कोई भी मनुष्य  बिना लाभ पाने की इच्छा के  नहीं करता।  यह अलग बात है कि ऐसा करने वाले अपने अंदर सात्विक प्रवृत्ति होने का दावा करते हैं।  ऐसे लोग  समाज के कल्याण और गरीब के उद्धार के कर्म में संलग्न होने का दावा इस तरह करते हैं जैसे कि परोपकार करना उनका व्यवसाय है।  उनके पास धन आता है। धन की अधिकता हमेशा ही अहंकार को जन्म देती है।  इससे कोई बच नहीं सकता।  उच्च पद, धन, और प्रतिष्ठा की उपलब्धि हमेशा ही मनुष्य को उसी तरह दिग्भ्रमित करती है जैसे कि वर्षा ऋतु में नदियों का जल धारा बाहर आकर अपने ही किनारे तोड़ते हुए वृक्षों को उजाड़ देती हैं।  परिणाम स्वरूप बाहर की गंदगी वापस लौटती धारा के साथ ही नदी के  पानी में समा जाती है।
संत प्रवर तुलसी दास जी कहते हैं कि
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‘तुलसी’ तोरत तीर तरु, बक हित हंस बिडारि।
विगत नलिन आनि मलिन जान, सुरसरिहु बढ़िआरि।।
         सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-गंगाजी में जब पानी बढ़ जाता है तब वह वृक्षों को तोड़कर हंसों को भगाने के साथ बगुलों के लिये  जगह बना देती है। उस समय गंगा कमल और भौरों से रहित और गंदे जल वाली बन जाती है।
    हमने आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा अन्य राजसी कर्मों में शिखर पर पहुंचे लोगों का पतन देखा होगा।  जब कोई मनुष्य राजसी शिखर पर पहुंचता है तब उसमें अहंकार आ ही जाता हैै।  पद, पैसे और प्रतिष्ठा की अधिकता किसी को नहीं पच पाती।  ऐसे लोगों से यह आशा करना ही बेकार है कि किसी के कड़वे सच को वह सहजता से सहन कर जायें।  परिणाम यह होता है कि सत्पुरुष उनसे दूर हो जाते हैं और चाटुकार और पाखंडी लोग उनकी सेवा में आ जाते हैं।  ज्ञानी और योगी लोग इसी कारण कभी भी राजसी पुरुषों के पास नहीं जाते क्योंकि वह जानते हैं कि कहीं वार्तालाप में उनके अहंकार पर आघात पहुंचा तो वह अपनी क्रूरता दिखाने से बाज नहीं आयेंगे।  यही कारण है कि राजसी पुरुषों के इर्दगिर्द झूठी प्रशंसा करने वाले लालची लोगों का जमघट हो जाता है। अंततः वही लोग उनके पतन का कारण भी बनते हैं जो केवल भौतिक साधना की खातिर उनके पास आते हैं।  

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, June 08, 2013

चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन-जल भी देह के लिये दवा का काम करता है (watar medician for body-accortding chanakya policy)



   हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार जल, वायु, अग्नि, आकाश और प्रथ्वी इन पांच तत्वों से हर जीव  की देह बनी है और यही स्वास्थ्य खराब होने पर उसके लिये औषधि का काम करते हैं।  इनमें जल न केवल जीवनदायक है वरन स्वास्थ्य का निर्माण  भी करता है।  आजकल जब हम देख रहे हैं कि पूरे विश्व में खान पान तथा रहन सहन के तौर आधुनिक तरीकों से बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है तब उनके निदान के लिये हमें प्राचीन उपायों पर दृष्टिपात अवश्य करना चाहिये। खासतौर से जल के उपयोग से हम किस तरह अच्छा स्वास्थ्य बनाये रख सकते हैं इस विषय पर अवश्य विचार करना चाहिये।  आजकल भारत में भी अंग्रेजी पद्धति से बीमारी का इलाज का प्रचलन गया है और बहुत कम लोग इलाज के देशी नुस्खों पर यकीन करते हैं।  महत्वपूर्ण बात यह है कि अंग्रेजी पद्धति वाले चिकित्सक दवा के साथ खान पान में परहेज की बात भी करते हैं। इसका सीधी मतलब यह है कि उनकी दवाईयां भी पूर्ण रूप से नियमानुसार खान पान न करने पर काम नहीं करती हैं। 
चाणक्य नीति में कहा गया है कि

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अजीर्णों भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्।

भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषप्रदम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-अपच होने पर जल दवा का काम करता है।  भोजन पच जाने पर जल का सेवन बल प्रदान करता है और भोजन के बीच भी जल अमृत का काम करता है।  भोजन के बाद जल का सेवन विष की तरह हानिकारक है।

        आधुनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि भोजन तथा जल सेवन के उन नियमों का पालन किया जाये तो जो भारतीय जीवन पद्धति की देन हैं उससे बेहतर स्वास्थ्य बना रह सकता है। आमतौर सेे हमने देखा है कि लोग भोजन के बाद जल का सेवन बढ़ी मात्रा में करते हैं।  इससे उनके स्वास्थ्य पर असर बुरा पड़ता है।  अगर भोजन के दो घंटे नहीं तो  कम से कम एक घंटे बाद भी जल के सेवन का उपयोग किया जाये तो स्वास्थ्य का स्तर अच्छा बना रह सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि भोजन और जल के सेवन में नियमों का पालन कर भी प्रसन्न रह सकते हैं।  

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Saturday, April 06, 2013

चाणक्य नीति-कभी संकोच न करें (apnee bat kahane mein sankoch n karen-chanakya policy in hindi


           अनेक लोग सामान्य व्यवहार में अपनी बात कहने में संकोच करते हैं। उनमें संकोच इस कदर होता है कि वह सही समय पर भी सही बात नहीं कहते। मन ही मन उनको घुटन होती है पर बाहर कहने में संकोच के कारण व्यर्थ तनाव झेलते हैं।  इसके विपरीत स्पष्टवादी लोग भले ही झूठी प्रशंसा बटोरने की बजाय अपनी बात कह देते हैं। इसके लिये उनको आलोचना भी झेलनी पड़ती है मगर वह तनावमुक्त होकर जीवन व्यतीत करते हैं।  कहा भी जाता है कि अगर अपने मन में कोई बात हो वह कह देनी चाहिये।  इतना ही नहीं अगर कोई समस्या हो तो उसके हल के लिये लोगों को आवाज देना चाहिये।  यह सही है कि आजकल लोगों का स्वभाव मदद करने का नहीं रहा पर सभी एक जैसे हैं यह बात सोचना भी गलत है। अपने लोग भले ही मुंह फेर जायें पर संभव है कि शिकायत पर शोर करने से कोई मदद करने आ जाये।  अभी भी अगर संसार चल रहा है तो वह ऐसे लोगों की वजह से बना हुआ है तो अपने पराये का विचार किये बिना दूसरे की मदद करते हैं।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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धन-धान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहणेषु च।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तालजः सुखी भवेतु।।
                   हिन्दी में भावार्थ-धन और धान्य के व्यवहार, कहीं से विद्या प्राप्त तथा खाने पीने के साथ हिसाब में संकोच न करने वाला हमेशा सुखी रहता है।
            किसी से धन या अन्न का व्यवहार हो तो उसके सामने किसी प्रकार का संकोच नहीं करना चाहिये।  अपना उधार या वेतन मांगने में कभी शर्म अनुभव करना ठीक नहीं है।  जब प्रतिफल की आशा में कोई वस्तु या सेवा दी जाती है तो उस पर अपना अधिकार समझना गलत नहीं है।  अनेक लोग भूख लगने के बावजूद संकोच के कारण किसी अन्य स्थान पर भोजन करने से कतराते हैं।  ऐसा करना भी शरीर के साथ खिलवाड़ करना है।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अगर कोई काम सीखना हो तो उसमें कभी संकोच नहीं करना चाहिये। सिखाने वाला व्यक्ति छोटा हो या बड़ा उससे काम सीखना चाहिये। कहने का अभिप्राय है कि संकोच करना अपने आप को कष्ट देना है।

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Sunday, February 24, 2013

यजुर्वेद के आधार पर चिंत्तन लेख-संघभाव से ही निर्भय होना संभव( uajurved ke adhar par dhinttan lekh-sanghbhav se hee nirbhay hona sambhav)

        इस धरती पर अधिकतर जीव समूह बनाकर चलते हैं।  समूह बनाकर चलने की प्रवृत्ति अपनाने से  मन में सुरक्षा का भाव पैदा होता है। मनुष्य का जिस तरह का दैहिक जीवन है उसमें तो उसे हमेशा ही समूह बनाकर चलना ही चाहिये।  जिन व्यक्तियों में थोड़ा भी ज्ञान है वह जानते हैं कि मनुष्य को समूह में ही सुरक्षा मिलती है।  जब इस धरती पर मनुष्य सीमित में संख्या थे तब वह अन्य जीवों से अपनी प्राण रक्षा के लिये हमेशा ही समूह बनाकर रहते भी थे। जैसे जैसे मनुष्यों की संख्या बढ़ी वैसे अहंकार के भाव ने भी अपने पांव पसार दिये।  अब हालत यह है कि राष्ट्र, भाषा, जाति, धर्म और वर्णों के नाम पर अनेक समूह बन गये हैं।  उनमें भी ढेर सारे उप समूह हैं।  इन समूहों का नेतृत्व जिन लोगों के हाथ में है वह अपने स्वार्थ के लिये सामान्य सदस्यों का उपयोग करते हैं।  आधुनिक युग में भी अनेक मानवीय समूह  नस्ल, जाति, देश, भाषा, धर्म के नाम पर बने तो हैं पर उनमें संघभाव कतई नहीं है।  संसार का हर व्यक्ति  समूहों का उपयोग तो करना चाहता है पर उसके लिये त्याग कोई नहीं करता। यही कारण है कि पूरे विश्व में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में भारी तनाव व्याप्त है।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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सम्भूर्ति च विनाशं च यस्तद्वेदोभयथ्सह।
विनोशेन मृतययुं तीत्वी सम्भूत्यामृत मश्नुते।।
     हिन्दी में भावार्थ-जो संघभाव को जानता है वह विनाश एवं मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। इसके विपरीत जो उसे नहीं जानता वह हमेशा ही संकट को आमंत्रित करता है।

वाचमस्तमें नि यच्छदेवायुवम्।
      हिन्दी में भावार्थ-हम ऐसी वाणी का उपयोग करें जिससे सभी लोगों का एकत्रित हों।
              हृदय में संयुक्त या संघभाव धारण करने का यह मतलब कतई नहीं है कि हम अपनी समूह के सदस्यों से सहयोग या त्याग की आशा करें पर समय पड़ने पर उनका साथ छोड़ दें।  हमारे देश में संयुक्त परिवारों की वजह से सामाजिक एकता का भाव पहले तो था पर अब सीमित परिवार, भौतिकता के प्रति अधिक झुकाव तथा स्वयं के पूजित होने के भाव ने एकता की भावना को कमजोर कर दिया है।  हमने उस पाश्चात्य संस्कृति और व्यवस्था को प्रमाणिक मान लिया है जो प्रकृति के विपरीत चलती है। हमारा अध्याित्मक दर्शन व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के क्रम में चलता जबकि पश्चिम में राष्ट्र, समाज, परिवार और व्यक्ति के क्रम पर आधारित है।  हालांकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन यह भी मानता है कि जब व्यक्ति स्वयं अपने को संभालकर बाद  समाज के हित के लिये भी काम करे तो वही वास्तविक धर्म है।  कहने का अभिप्राय है कि हमें अपनी खुशी के साथ ही अपने साथ जुड़े लोगों के हित के लिये भी काम करना चाहिये।
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Saturday, February 16, 2013

अथर्ववेद के आधार पर चिंत्तन-आस्थाहीन मनुष्य माया पर मोहित रहते हैं(thought on based on atharvaved-asthaheen manushya maya par mohit rahte hain)

           यह संभव नहीं है कि मानव मन का कोई स्वामी न हो। जो मनुष्य कहते हैं कि हमारी किसी भी प्रकार के परमात्मीय रूप में आस्था नहीं है वह स्पष्टतः इस मायावी संसार को अपने हृदय में धारण किये रहते हैं।  कहने को भले ही उनको नास्तिक कहा जाये यह वह स्वयं ही इसका बखान करें पर सच यह है कि मानव मन का स्वामी या तो सत्य होता है या माया।  श्रीमद्भागवतगीता को लेकर हमारे देश में अनेक भ्रम प्रचलित हैं। कहा जाता है कि यह एक पवित्र किताब है और इसका सम्मान करना चाहिए पर उसमें जो तत्वज्ञान है उसका महत्व जीवन में कितना है इसका आभास केवल ज्ञानी लोगों को श्रद्धापूर्वक अध्ययन करने पर ही हो पाता है। श्रीगीता को पवित्र मानकर उसकी पूजा करना और श्रद्धापूर्वक उसका अध्ययन करना तो दो प्रथक प्रथक क्रियायें हैं। श्रीगीता में ऐसा ज्ञान है जिससे हम न केवल उसके आधार पर अपना आत्ममंथन कर सकते हैं बल्कि दूसरे व्यक्ति के व्यवहार, खान पान तथा रहन सहन के आधार पर उसमें संभावित गुणों का अनुमान भी कर सकते हैं। गीता का ज्ञान एक तरह से दर्पण होने के साथ दूरबीन का काम भी करता है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग परमात्मा की निष्काम आराधना करते हुए अपने अंदर ऐसी पवित्र बुद्धि स्थापित होने की इच्छा पालते हैं जिससे वह ज्ञान प्राप्त कर सकें। जब एक बार ज्ञान धारण कर लिया जाता है तो फिर इस संसार के पदार्थों से केवल दैहिक संबंध ही रह जाता है। ज्ञानी लोग उनमें मन फंसाकर अपना जीवन कभी कष्टमय नहीं बनाते।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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ये श्रद्धा धनकाम्या क्रव्वादा समासते।
ते वा अन्येषा कुम्भी पर्यादधति सर्वदा।।
            ‘‘जो श्रद्धाहीन और धन के लालची हैं तथा मांस खाने के लिये तत्पर रहते हैं वह हमेशा दूसरों के धन पर नजरें गढ़ाये रहते हैं।’’
भूमे मातार्नि धेहि भा भद्रया सुप्रतिष्ठतम्।
सविदाना दिवा कवे श्रियां धेहि भूत्याम्।।
         ‘‘हे मातृभूमि! सभी का कल्याण करने वाली बुद्धि हमें प्रदान कर। प्रतिदिन हमें सभी बातों का ज्ञान कराओ ताकि हमें संपत्ति प्राप्त हो।’’
          इस तत्वज्ञान के माध्यम से हम दूसरे के आचरण का भी अनुमान प्राप्त कर सकते हैं। जिनका खानपान अनुचित है या जिनकी संगत खराब है वह कभी भी किसी के सहृदय नहीं हो सकते। भले ही वह स्वार्थवश मधुर वचन बोलें अथवा सुंदर रूप धारण करें पर उनके अंदर बैठी तामसी प्रवृत्तियां उनकी सच्ची साथी हो्रती हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि तत्वज्ञान में ज्ञान तथा विज्ञान के ऐसे सूत्र अंतर्निहित हैं जिनकी अगर जानकारी हो जाये तो फिर संसार आनंदमय हो जाता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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