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Saturday, September 07, 2013

धर्म के नाम पर चतुराई करने वाले अधम-हिन्दी चिंत्तन लेख(dharma ke naam par chaturae karne wale adham-hindi chinttan lekh)



        हमारे देश में ज्योतिष, काला जादू तथा तंत्र मंत्र की आड़ में  लोगों को सांसरिक विषयों में सफलता दिलाने के लिये कथित रूप से अनेक व्यवसायिक धार्मिक ठेकेदार सक्रिय हैं। सच बात तो यह है कि सांसरिक विषयों में लिप्त रहते हुए नैतिक आचरण करना ही धर्म है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि हम अपने महान धर्मभीरु होने का दावा करते हुए गाते फिरें।  दूसरी बात यह कि कथित रूप से जो गुरु या संत सांसरिक विषयों पर बोलते हैं उनको धर्म का प्रवर्तक मानना ही गलत है।  उससे ज्यादा बुरी बात यह है कि खांस वस्त्रों को पहनकर घूमने वाले लोगों को संबंधित धर्म का ज्ञानी मानना एकदम मूर्खता है।  अगर भेड़ की खाल पहनकर भेड़िया शाकाहारी होने का स्वांग करे और  कोई हिरण मान ले तो मूर्ख ही कहा जाता  है। यही स्थिति मनुष्य की है। वह किसी भी कथित धर्म प्रचारक के मुख से अच्छी बातें सुनकर उसे संत या सन्यासी मानने लगता है।  इसी कारण अनेक लोग ज्ञान के व्यवसायिक प्रचारकों को ही गुरु मानने लगते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है वरन् उसे धारण कर जीवन में उतारना ही पूर्ण ज्ञानी होने का प्रमाण होता है।
                        इस बात को अनेक  लोग नहीं समझते और ज्ञान की बातें सुनाने वालों को संत कहने लगते हैं। यही कारण है कि अनेक लोगों ने धर्म के नाम पर हमारे देश में अपना व्यापार चला रखा है।  इन लोगों में धन कमाने की प्रवृत्तियां किसी सामान्य मनुष्य से अधिक खतरनाक ढंग से विद्यमान देखी जाती है। 
मनस्मृति में कहा गया है कि
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अकर्मशीलं च महाशनं च लोकद्विष्टं महुमायं नृशंसम्।
अदेशकालज्ञमनिष्टवेषमेतान् गृहे न प्रतिवासयेत्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-अकर्मण्य, अधिक भोजन करने वाले, सबसे बैर बांधने वाले, मायावी, क्रूर, देशकाल का ज्ञान न रखने वाले, निन्दित वेश धारण वाले मनुष्यों को कभी अपनी घर में नहीं  ठहराये।
संक्लिष्टकर्माणमतिप्रमादं नित्यानृतं चाटृढभक्तिकं च।
विसृष्टरागं पटमानिन्र चाप्येतान् न सेवेत नराधमान् षट्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-क्लेश करने वाला, अत्यंत प्रमादी, झूठ बोलने वाला, अस्थिर भक्ति वाला, स्नेह से रहित तथा अपने को ही चतुर मानने वाला, यह छह प्रकार के लोग अधम माने जाते हैं। इनकी सेवा कतई न करें।
                        कभी कभी तो यह लगता है कि धर्म के नाम पर व्यापार चलाने वाले उतने ही खतरनाक है जितना अफीम बेचने वाले लोग होते हैं।  हमने देखा है कि मादक द्रव्य बेचने में लगे लोग अपने ही स्वाजातीय व्यवसायियों के विरुद्ध हिंसक गतिविधियां करते हैं। ऐसे ही धर्म व्यवसायियों के कारण प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कार्ल मार्क्स से धर्म को अफीम कहा था।  हम उसके कथित अर्थशास्त्र के सिद्धांतों से सहमत हों या न हों पर भारत के संदर्भ में उसका धर्म को अफीम मानने का सिद्धांत एकदम सही लगता है।  अनेक बार तो ऐसा लगता है कि धर्म का व्यापार करने वाले यह लोग अधर्म की राह पर चलते हुए शक्ति, संपत्ति तथा शिष्य संग्रह कर अपनी ताकत इसलिये बढ़ाते हैं ताकि राजकीय संस्थाओं पर प्रभाव जमाया जा सके।  ऐसे लोगों की सेवा करना या उनकी भक्ति में लगे रहने से मन के कलुषित होने का भय रहता है।
                        हमारे यहां कहा भी जाता है कि भक्ति भगवान की करो किसी बंदे को भजना ठीक नहीं है। कथित गुरुओं की व्यवसायिक चालाकियों के चलते अनेक लोग फंस कर भगवान की बजाय अपने कथित गुरुओं  को ही भगवान मानने लगते हैं। जब उनको अपने गुरु की असलियत पता चलती है तो उनके अंदर निराशा और तनाव का ज्वार उठने लगता है। अनेक कथित गुरु अपने सत्संग में चुटकुले और अपनी कल्पित कहानियां सुनाकर हास्य का भाव भी पैदा करते हैं। अपने शिष्य समुदाय को बनाये रखने के लिये अनेक प्रकार के स्वांग भी रचते हैं।  कहना चाहिये कि वह धर्म के नाम पर अभिनय करते हैं। जब पोल खुलती है तब शिष्य अपने को एक अंधेरे कुंऐं में गिरा अनुभव करते हैं।
                        जिन लोगों के अंदर अध्यात्मिक ज्ञान की ललक है उनको गुरु ढूंढने की बजाय अपने ही अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिये।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कोई भोग कभी किसी का उद्धार नहीं कर सकता। यह शक्ति केवल त्यागी भाव के गुरु में ही संभव है जिसकी पहचान यह होती है कि वह जहां खड़ा हो जाये वहीं आश्रम लगने लगे। जब बोले तो लगे कि अमृतवाणी प्रवाहित हो रही है। वह संपत्ति और शिष्य संचय की बजाय सर्वजन हिताय के भाव से समाज में सलंग्न रहता है।   

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, July 28, 2013

चाणक्य नीति दर्शन-मार्ग पर देखभाल कर चलें (chankya neeti darshan-marga par dekhbhalkar chalen)



         आजकल हम देख रहे हैं कि युवा वर्ग के लोगों की मौतों की घटनायें  अधिक हो रही है।  आत्महत्या, हत्या तथा सड़क दुर्घटनाओं में अक्सर युवक युवतियों की मौत की खबरें प्रचार माध्यमों में आती रहती हैं।  इतना ही नहीं राजमार्गों पर भी दूरी की यात्रा कर रहे अनेक परिवारों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनायें भी होती रहती हैं। देश में विकास के नाम पर भौतिकता के भाव ने लोगों की बुद्धि कुंद कर दी है।  जिनके पास मोटर साइकिल और कार है वह उस पर सोचकर  सवारी करते है कि सड़क केवल उनके लिये ही बनी।  जिस तरह चूहे, बिल्ली और कुत्ते का खेल है कि ताकतवर अपने से कमजोर पर हमला करता है वैसी ही स्थिति आजकल सड़क पर आवागमन करने  पर दिखती है। वाहन वाला पैदल या साइकिल चालक को तथा बड़े वाहन का सवार छोटे वाहन सवार को अपने आगे कुछ नहीं समझता।  पैदल और साइकिल चालक को मोटर साइकिल वाले और उनको कार तो कार वालों को ट्रक वाले अपनी वाहन से उड़ा देते हैं। कभी कभी तो लगता है कि लोग सड़क पर बदहाली में चलने के आदी हो गये हैं।  घर जो सुरक्षित पहुंचते हैं उनके परिवार वालों को भगवान का शुक्रिया अदा करना चाहिये क्योंकि जिस तरह सड़कों पर आवागमन की स्थिति है वह अत्यंत शोचनीय है।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि

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शकटं पञ्चहस्तेन दशहस्तेन वाजिनम्।

हस्ती शतहस्तेन देशत्यागेन दुर्जनम्।।

       हिन्दी में भावार्थ-बैलगाड़ी से पांच, घोड़े से दस तथा हाथी से सौ हाथ दूर रहना चाहिये। जहां दुष्ट रहता हो तो उस क्षेत्र का त्याग कर देना चाहिये।
            अगर हम चाणक्य नीति को देखें तो लगता है कि ऐसी दुर्घटनायें ंपहले भी होती रहती होंगी तभी उनसे बचने के लिये उन्होंने  मार्ग में बैलगाड़ी, घोड़े तथा हाथी से दूर चलने का सुझाव दिया।  अभी तक आधुनिक समय में तीन ‘टी’ यानि ट्रेक्टर, ट्रक तथा टू-सीटर से बचने की सलाह देते रहे हैं पर लगता है कि मोटर साइकिल को टू-सीटर शायद नहंी माना जाता है हालांकि वह आती उसी श्रेणी मैं है।  यही कारण है कि आजकल अधिकतर दुर्घटनायें मोटरसाइकिल सवारों के साथ होती है या वह उनके लिये जिम्मेदार होते हैं।  समस्या यह है कि लोग चाहे वह कार पर हों या बाइक पर, अपने  सवारी वाहन लेकर एक दूसरे के इतना नजदीक चलते हैं कि एक ब्रेक लगाये तो दूसरा टकरा ही जाता है। इस बात पर भी जमकर झगड़े होते हैं।  आखरी बात यह कि वाहन संख्या में बढ़ गये हैं और सड़कें अतिक्रमण के कारण पहले से कम चौड़ी हो गयी हैं।  ऐसे में वाहन टकरायेंगे ही पर लोगों को आपस में लड़ने से बचना चाहिये।  अनेक बार तो ऐसी हृदय विदारक घटनायें हुई हैं जिसमें गाड़ियां टकराने पर कत्ल तक हो गये हैं।  हमारे यहां अब अध्यात्मिक ज्ञान का महत्व अधिक नहीं दिया जात है पर सच यह है कि उसमें भी मार्ग पर सावधानी से चलने का सुझाव दिया गया है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, June 22, 2013

चाणक्य नीति-अपने जीवन में आत्ममंथन करते रहना चाहिए (apna atma manthan karnaa chahiye)




           वर्तमान शिक्षा पद्धति आदमी को नौकरी तथा उपभोग की के तत्वों के अलावा कुछ अन्य का ज्ञान नहीं देती। अधिकतर शिक्षित युवक नौकरी कर एक सभ्य उपभोगीय प्रवृत्ति के समाज का सदस्य बनना चाहते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में सांसरिक विषयों को ही वह जीवन का सत्य समझते हैं। यह सब ठीक है पर यह उपभोगीय प्रवृत्ति मनुष्य की संघर्ष क्षमता का कम करती है।  जब तक समय ठीक है तभी तक सभी प्रसन्न दिखते हैं पर थोड़ी विपत्ति आने पर ऐसे लोगों की हवा निकल जाती है है जो केवल बौद्धिक प्रयासों से जिन्दा   है।  शारीरिक श्रम के अभाव में शिक्षित समाज की हवा जल्दी निकल जाती है।
       विदुर नीति नीति में कहा भी गया है कि धनिक लोगों की पाचन क्षमता कम होती है। तय बात है कि जब पाचन शक्ति कमजोर होगी तो मनुष्य में संघर्ष क्षमता की कम रहेगी।  यह सब अध्यात्मिक ज्ञान होने पर ही समझा जा सकता है। मुख्य बात यह कि जो व्यक्ति समय समय पर आत्म मंथन करेगा वही अपनी स्थिति तथा शक्ति को समझ पायेगा।  आत्ममंथन की प्रकिया से गुजरने के बाद आदमी अपनी शक्ति तथा साधनों में समन्वय स्थापित कर सकता है।  अगर मनुष्य आत्ममंथन नहीं करेगा तो वह हमेशा ही अपनी स्थिति के पतन के भय से ग्रसित रहेगा।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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कः कालः काति मित्राणि को देशः की व्ययाऽगमौ
कश्चाचाऽहं का च मे शक्त्रििति विनयंमुहुर्मुहुः।।
     हिन्दी में भावार्थ-हमारे मित्र कैसे है? समय कैसा है? हम किस क्षेत्र में रहे रहे हैं। हमारे आय व्यय कीस्थिति क्या है? हम कौन है तथा हमारी शक्त् िकितनी है? ऐसे प्रश्नों पर हमेशा विचार करते रहना चाहिये।
तावट् भयेष भेतव्यं यावद्भयमनागतम्।
आगतं तु भयं दृष्टवांर प्रहर्तव्यमङ्कसर।।
          हिन्दी में भावार्थ-अपने मन में किसी भय को स्थान नहीं देना चाहिये।  जब संकट आये तभी भय का विचार करना चाहिये। जब सेकट सामने हो तो उस पर पूरी शक्ति से प्रहार करना चाहिये।
            जब आदमी चिंत्तन और आत्मंथन की प्रक्रिया नहीं करेगा तो उसके अंदर हमेशा ही अपनी स्थिति से गिरने का भय व्याप्त होगा। ऐसे ऐसे भय पैदा होंगे जिनकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। यह सभी भय कल्पित होते हैं। यह शक्तिहीन व्यक्ति की पहचान है जो कालांतर में कायर बन जाता है।  इसलिये जीवन में कोई काम सोच विचार करते हुए तो करना चाहिये पर परिणामों में

असफलता की आशंका कतई नहीं करना चाहिये।

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Saturday, March 09, 2013

क्रूर हृदय मनुष्य पशु सामान-हिंदू अध्यात्मिक चिंत्तन हिंदी


      हर मनुष्य जब कोई उपलब्धि प्राप्त करता है तो उसका श्रेय वह स्वयं को देता है पर जहां नाकामी हाथ आती है वहां दूसरों का दोष देखता है।  आत्ममंथन करने की प्रवृत्ति सामान्य मनुष्य नहीं होती  जबकि योग तथा ज्ञान साधक समय समय पर अपनी स्थिति पर विचार करते हुए कार्यक्रम बनाते हैं।   देखा तो यह जाता है कि दूसरों का काम बिगाड़ने वाले अपने पर आये संकट के लिये भाग्य को दोष देते हैं।  अपने दुष्कर्म का सही साबित करने के लिये तमाम तर्क ढूंढते हैं।  अपना पाखंड किसी को नहीं दिखता।  सबसे बड़ी बात यह कि इस संसार के अज्ञानी मनुष्य अपने दुःख  से दुःखी नहीं बल्कि  दूसरे के सुख से दुःखी और दूसरे के दुःख से सुखी होते हैं।  आत्मप्रवंचना में मनुष्य ऐसे सत्कर्मों का बखान करते हैं जो उन्होंने किये ही नहीं। ऐसे मनुष्य कभी भी मनुष्यता और पशुता का अंतर नहीं जानते।
परकार्यवहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः।
छली द्वेषी मृदृः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते।।
       हिन्दी में भावार्थ-दूसरों के कार्य बिगाड़ने पाखंडी, अपना काम निकालने, दूसरों से छल करने, दूसरों की उन्नति देखकर मन में जलने तथा बाहर से कोमल पर अंदर से क्रूर हृदय रखने वाला मनुष्य पशु समान है।
वापी-कूप-तडागानामाराम-सुर-वेश्मनाम्।
उच्छेदने निराऽशङ्कः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते।।
       हिन्दी में भावार्थ-बावड़ी, कुआं, तालाबों, वाटिकाओं और देवालयों में तोड़फोड़ करने वाला मनुष्य म्लेच्छ कहा जाता है।
         कुछ लोगों की आदत होती है कि वह दूसरों को हानि पहुंचाते हैं।  इतना ही नहीं अपने स्वार्थ की  पूर्ति के लिये बावड़ी, कुओं और तालाबों को समाप्त करते हैं। हमने देखा होगा कि अक्सर कहा जाता है कि नदियों, नहरों और सड़कों के किनारे अतिक्रमण हो जाता है। इतना ही नहीं कागजों पर कुऐं और बावड़ियां बन जाती हैं पर धरती पर उनका अस्तित्व होता ही नहीं है।  यह भ्रष्टाचार म्लेच्छ प्रवृत्ति का द्योतक है।  अनेक जगह हमने देखा है कि सर्वशक्तिमान के लिये स्थान बनाने के नाम पर जमीन पर अतिक्रमण कर उस पर दुकानें आदि बना दी जाती है।  वैसे तो अतिक्रमण कर धर्म के नाम पर स्थान बनाना भी एक तरह से अपराध है क्योंकि यह सर्वशक्तिमान के नाम का दुरुपयोग है। उस पर भी उनका व्यवसायिक उपयोग करना किसी भी प्रकार की आस्था को प्रमाणित नहीं करता।
   हमारा अध्यात्मिक दर्शन निरंकार परमात्मा के प्रति आस्था दिखाने का संदेश देता है। इसका वैज्ञानिक कारण भी है। निरंतर सांसरिक विषयों में उलझा मनुष्य स्वाभाविक रूप से ऊब जाता है। एक विषय से दूसरे विषय की तरफ जाता हुआ मनुष्य मन जब अध्यात्मिकता से परे होता है तब उसमें निराश तथा एकरसता का भाव आता है।  इस वजह से कुछ लोगों में विध्वंस की भावना आ जाती है। इससे बचने का यही उपाय है कि प्रातः जल्दी उठकर योग साधना, ध्यान और मंत्र का जाप कर अपने हृदय में प्रतिदिन नवीनता का भाव लाया जाये।
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Saturday, December 29, 2012

विदुर नीति-छह दोष आदमी को सौ वर्ष से पहले मारते हैं (vidur neeti-chhah dosh aadmi ko sau varsh se pahle maarte hain)

           भारतीय दर्शन के अनुसर प्रकृति आधार पर  मनुष्य की आयु सौ वर्ष निर्धारित है।  ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि आखिर मनुष्य अपनी आयु पूरी क्यों नहीं कर पाता? इसका उत्तर यह है कि जिस बुद्धि की वजह से मनुष्य प्रकृत्ति के अन्य जीवों से अधिक विकसित माना जाता है वही उसकी शत्रु भी बन जाती है।  मनुष्य अपनी बुद्धि और मन को स्वच्छ रखने का कोई उपाय नहीं करता बल्कि संसार के उन लुभावने विषयों में पूरी तरह से लिप्त हो जाता है जो कालांतर में उसके अंदर मानसिक तथा दैहिक दोष उत्पन्न करते हैं।
     महाराज धृतराष्ट्र ने महात्मा विदुर से प्रश्न किया कि ‘‘जब परमात्मा ने मनुष्य की आयु कम से कम सौ वर्ष निर्धारित की है तो वह कम आयु में क्यों देह त्यागने को बाध्य होता है?’’
इसके उत्तर में महात्मा विदुर ने कहा कि
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अतिमानोऽतिवादश्च तथात्यागो नराधिप।
क्रोधश्चात्मविधित्सवा च मित्रद्रोहश्च तानि षट्।।
एत एवासयस्तीक्ष्णः कृन्तन्त्यायूँषि देहिनाम्।
एतानि मानवान् धनन्ति न मृत्युर्भद्रमस्तृ।।
           हिन्दी में भावार्थ-अत्यंत अहंकार, अधिक बोलना, त्याग न करना, क्रोध करना, केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति की चिंता में रहना तथा मित्रों से द्रोह करना यह छह दुर्गुण मनुष्य की आयु का क्षरण करते हैं। दुर्गुण वाले मनुष्य का मृत्यु नहीं बल्कि अपने कर्मो के परिणाम ही मारते हैं।
      आदमी की सौ वर्ष से पहले मृत्यु हो जाने पर अनेक लोग यह सवाल करते हैं कि आखिर मनुष्य अपनी आयु क्यों होती है? दरअसल उसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य उपभोग में इतना व्यस्त रहता है कि उसे लगता ही नहीं कि यह संसार कभी वह छोड़ेगा, इसलिये वह शारीरिक और मानसिक विकार एकत्रित करता रहता है।  अगर हम देखें तो प्राचीन काल में लोग अधिक समय तक जीवित रहते थे।  आज भी ग्रामीण क्षेत्र में श्रम करने वाले अनेक लोग शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक आयु तक जीवित रहते हैं।  शहरी क्षेत्रों में जहां आधुनिक आदमी सुविधाभोगी दुषित वातावरण में सांस ले रहा समाज रोगों का प्राप्त होता है वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में मेहनतकश लोग स्वच्छ हवा में सांस लेकर उन राजरोगों से दूर रहते हैं।  शहरी क्षेतों में तो अब साठ  साल तक आदमी शारीरिक दृष्टि  से लाचारी की स्थिति में आ जाता है, जबकि अभी भी  गाँवों  में मेहनत  की वजह से लोग हष्ट पुष्ट दिखते  हैं। इसके अलावा शहरों में धन संपदा की वृद्धि ने लोगों के अंदर अहंकार, गद्दारी तथा अधिक बोलने की ऐसी बीमारियां भर दी हैं जो अंततः आयु का क्षरण करती हैं।
         महात्मा विदुर एक महान विद्वान थे।  सच्चा विद्वान वह है जो जीवन के रहस्यों को जानता हो। इसलिये हमें उनके वचनों का अध्ययन कर जीवन बिताने का प्रयास करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, April 13, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-खाने के लिये इज्जत गंवाना ठीक नहीं (bhritirhari neeti shatak-roti aur izzat)

             दुनियां में हर जीव के लिये भोजन अनिवार्य है पर इसका आशय यह कतई नहीं है किसी भूखे की दीनता देखकर उसके प्रति उदार भाव दिखाया जाये। कहा भी जाता है कि सबका दाता राम है और जिसने पेट दिया है उसने भोजन का इंतजाम भी पहले कर दिया है। यह भी कहा जाता है कि दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम! इन सब बातों के उल्लेख करने का तात्पर्य यह है कि दैहिक जीवन धारण करने के लिये भोजन अनिवार्य है पर इसका यह मतलब भी नहीं है कि सब कुछ यही भोजन है और कहीं भी किसी प्रकार भी ग्रहण किया जाये। हमेशा सुपाच्य भोजन करने के साथ ही इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए कि वह शुद्ध माध्यमो से अर्जित किया गया हो। ऐसे लोगों की संगत करना चाहिए जो पवित्र विचार और कर्म वाले हों। अगर कहीं भोजन के लिये दूसरे पर निर्भर हों तो यह भी देखना चाहिए कि वह आदमी किस प्रवृत्ति का है और उसके आय के साधन कैसे हैं?             
                              भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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             लाङ्गल चालनभधश्चरणावपातं भूमौ निपत्य वदनोदर दर्शनं च।
           श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुङ्गवस्तु धीरं विलोकयति चाटुश्तैश्च भुङ्वते।।
                  ‘‘जब कोई मनुष्य कुत्ते के सामने भोजन डालता है तो वह पूंछ हिलाकर अपनी दीनता का प्रदर्शन करता है पर जब कोई हाथ के सामने भोजन रखता है तो वह बड़ी गंभीरता से उसे देखते हुए कई बार मनाने पर ही उसे ग्रहण करता है।"
                   हमें भोजन देने वाले का आभार व्यक्त करना चाहिए पर इसक अर्थ यह कदापि नहीं है कि उसके इतने कृतज्ञ हो जायें कि उसके कहने पर अपवित्र काम करने लगें। कहीं भोजन मिले तो उस तत्काल नहीं टूटना चाहिए बल्कि सम्मान से आग्रह करने पर ही अपना हाथ बढ़ाना चाहिए। अगर हमें भूख है तो इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि कहीं भोजन बना हुआ है जिससे हम अपना मन तृप्त कर सकते हैं। उसी तरह दूसरे को भोजन कराते समय अपने अंदर अहंकार का भाव भी नहीं रखना चाहिए। यह प्रकृत्ति प्रदत्त है भले ही निमित्त कोई इंसान बनता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Thursday, February 09, 2012

पाखंडियों को कभी मेहमान नहीं बनाना चाहिए-मनुस्मृति से संदेश (pakhandiyon ko mehman n banayen-massage based on manu smriti)

       हमारे देश में अतिथि के स्वागत की परंपरा है पर उसकी अनेक सीमायें हैं।  अतिथि के घर आने का उद्देश्य, पवित्रता तथा उसकी योग्यता पर ध्यान देना आवश्यक है। हमारे देश में संस्कार तथा संस्कृति के नाम पर भी कई नारे प्रचलित हो गये हैं। इनमें एक है ‘अतिथि देवो भव‘। इसको लेकर बहुत सारी बातें कही जाती हैं जबकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि मेहमान की पात्रता तभी स्वीकार्य है जब वह पवित्र मनुष्य हो। ऐसा नहीं है कि हर किसी को घर के दरवाजे पर आने पर मेहमान का दर्जा देकर उसका स्वागत किया जाये। दरअसल इस तरह के नारे अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित तत्वज्ञान के अभाव में ही समाज में प्रचलित हो गये हैं। कुछ लोग तो यह कहते हैं कि अतिथि सत्कार धर्म का सर्वोच्च रूप है और एक तरह से यज्ञ करने से अधिक श्रेष्ठ है। यह सत्य है कि अगर सुपात्र मनुष्य का अतिथि रूप में सत्कार करना एक तरह यज्ञ ही है पर इसमें पवित्रता का विचार भी होना चाहिए। ज्ञानी लोग हर क्रिया को यज्ञ की तरह मानते हैं। जिस तरह यज्ञ पवित्र स्थान पर पवित्र वस्तुओं से किया जाता है उसी तरह अतिथि सत्कार का धर्म भी पवित्र व्यक्ति को प्रदान किया जाना चाहिए।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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ज्ञानेनैवापरे विप्राः यजन्ते तैमंखेःसदा।
ज्ञानमूलां क्रियामेषां पश्चन्तो ज्ञानचक्षुषा।
            ‘‘तत्वाज्ञानी सभी क्रियाओं को अपने ज्ञान नेत्रों से देखते हुए उसके प्रेरक तत्वों को पहचानते हैं। इस तरह वह अपने ज्ञान से ही यज्ञानुष्ठान करना सबसे महत्वपूर्ण मानते है।
पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडाव्रतिकांछठान्।
हैंतुकान्वकवृत्तश्चि वांड्मात्रेण्णापि नार्चयेत्।।
          ‘‘पांखडी, दृष्ट, ठग, दूसरों को दुःख पहुंचाने वाला तथा धर्म ग्रंथों में अरुचि रखने भले ही सज्जनता का व्यवहार करे पर उसे कभी मेहमान नहीं बनाना चाहिए। इतना ही नहीं उसका वाणी से भी कभी स्वागत नहीं करना चाहिए।’’
         हमारे देश में पहले शिक्षा के अभाव में लोगों को अध्यात्मिक ग्रंथों का ज्ञान नहीं था तो अब आधुनिक शिक्षा ने उनको एक तरह से विरक्त ही कर दिया गया है। इसलिये चालाक लोग दूसरों को अतिथि सत्कार का धर्म निभाने की राय देते हैं और स्वयं मजे करते हैं। इसलिये यह आवश्यक है कि तत्वज्ञान को समझा जाये। अपनी हर क्रिया को अपने ज्ञान चक्षुओं से देखते हुए यज्ञ होने की अनुभूति की जाये। जीवन में आनंद लेने का यह भी एक तरीका है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Sunday, January 22, 2012

रहीमदास के दोहे-दौलत होने पर कई सगे बन जाते हैं (daulat hone par bahut sage ban jate hain-rahim ke dohe)

           इस संसार में सारे रिश्ते स्वार्थों से बनते हैं। उनका निर्वाह भी स्वार्थों से ही होता है। स्वार्थ पूरा न  होने पर अपने रिश्ते भी गैर जैसे हो जाते हैं।इस संसार का सबसे बड़ा सत्य यही है कि मूलतः हर सामान्य आदमी अपने स्वार्थ की वजह से दूसरों के साथ संबंध बनाता है। वह उन्हीं से संबंध निभाता है जिससे उसे अपनी अपेक्षायें पूरी होने की संभावना रहती है। यह सभी जानते हैं पर अज्ञानी लोग समाज के स्वार्थी होने का रोना होते हुए अपनी मतलबपरस्ती को जायज ठहराते हैं जबकि ज्ञानी मनुष्य निष्काम भाव से दूसरों की सहायता के लिये तत्पर रहते हैं क्योंकि उनके मन में अपने कर्म का फल पाने की आशा नहीं रहती। धर्म, अध्यात्म और संस्कृति के नाम पर हम भले ही परिवार और समाज क एकरूप होने का भ्रम पाल लें पर सत्य यही है कि स्वार्थ ही सभी प्रकार के संबंधों का आधार होता है।
              इस संसार में जिसके पास संपत्ति, वैभव, पद, प्रतिष्ठा और शक्ति है उससे संबंध रखने के लिये सभी आतुर होते हैं। निरीह, अल्प धनवान, सादगी पसंद और सत्य मार्ग का अनुसरण करने वाले लोगों के मित्र अत्यंत कम होते हैं। यह अलग बात है कि जिन लोगों के पास धन, पद, प्रतिष्ठा और आकर्षण है उनको यह भ्रम रहता है कि उनके चाहने वाले बहुत हैं। वह यह सच नहीं जानते कि इस संसार में पाखंड का बोलबाला है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
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कहि ‘रहीम संपत्ति सगे, बनत बहुत बहुत रीत।
बिपत्ति कसौटी ज कसे, ते ही सांचे मीत।।
         ‘‘इस संसार में सभी लोग उसके सगे हैं जिसके पास संपत्ति है। धनवान आदमी के सभी मित्र बनते हैं मगर आपातकाल में जो काम आये वही सच्चा मित्र कहलाता है।
काहु ‘‘रहीम’ कैसे बनै, अनहोनी ह्वै जाय।
मिला रहै औ ना मिलै, तासो कहा बसाय।।
       ‘‘अनहोनी होने पर बात नहीं बन सकती। किसी व्यक्ति के पास होने पर भी अगर उससे आत्मीयता का भाव नहीं रहता तो उसे संबंध कैसे निभाया जा सकता है।
           इस सत्य को जानकर दूसरे मनुष्यो के साथ अपने संबंध अत्यंत सतर्कता बरतते हुए बनाना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि हमारे साथ दोस्ती और रिश्ते का दंभ भरने वालों के साथ हमारी वैचारिक, स्वाभाविक तथा आचरण के आधार पर समानता है कि नहीं। आमतौर से विपरीत व्यक्तित्व के लोगों के बीच आपसी संबंध अधिक समय तक नहीं चलता। निष्काम भाव से काम करने वाले मनुष्य बुरा अवसर आने पर पर निभाते हैं पर कामनाओं से भरपूर आदमी उस समय मुंह फेर जाता है। अतः जिनसे मानसिक रूप से समानता के आधार पर संबंध निर्मित न हो सके उनसे दूर रहना ही श्रेयस्कर है। यह अलग बात है कि उनको इस बात का आभास नहीं होने देना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Tuesday, December 27, 2011

यजुर्वेद से संदेश-नाम स्मरण से बुद्धि शुद्धि होती है

                अक्सर लोग यह सवाल करते हैं कि जब परमात्मा ने हमें काम करने के लिये हाथ, चलने के लिये पैर, बोलने की लिये जीभ, सुनने के लिये कान, देखने के लिये आंख और सूंघने के लिये नाक देकर हमें अपने जीवन के लिये उत्तरदायित्वों के निर्वहन योग्य बना दिया है तो फिर उसका नाम लेकर समय खराब क्यों करें? कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि जब हम अपना कर्म शुद्ध हृदय से नित्य करते हैं तो भगवान का नाम लेने की आवश्यकता क्या है? कुछ लोग तो यह भी कहकर अपना ज्ञान बघारते हैं कि जीवन में चुपचाप अपना काम करना तथा कर्मकांड में लिप्त रहना ही धर्म है।
          दरअसल हम भले ही अपना नित्य कर्म शुद्ध हृदय से करें पर जब तक हमें अपने अध्यात्म का ज्ञान नहीं होगा तब कभी सुख की अनुभूति नहीं हो सकती। इस तरह तो मानसिक और वैचारिक रूप से हम एक ही धारा में बहते जायेंगे तो यह पता ही नहीं चलेगा कि जीवन का रहस्य क्या है? वैसे भी मनोविज्ञानिक मानते हैं कि नियमित रूप से एक ही कर्म करते रहना या मस्तिष्क को एक ही राह पर जाकर एक ही जगह ध्यान लगाये रखना भी स्वास्थ्य के लिये ठीक नहंी है। जो बहुत बड़े ज्ञानी और ध्यानी हैं वह तो अपने अभ्यास से एक ही जगह खड़े रहकर भी नित्य पल नवीनता का अनुभव करते हुए जीवन का सुख और आनंद उठाते हैं पर सामान्य आदमी का मन उसे इधर उधर चलने के लिये प्रेरित करता है-इसी कारण हमारे समाज में फिल्म देखना, पिकनिक मनाना या किटी पार्टी करने जैसी परंपरा प्रारंभ हो गयी हैं जो कि कालांतर में अधिक दुखदायी होती हैं। इन पर व्यय होने के साथ ही शारीरिक तथा मानसिक परेशानियों का दौर भी प्रारंभ होता है। आमतौर से लोग मनोरंजन की राह पर चले जाते हैं जहां दूसरे मनुष्य मन के व्यापारी बनकर उनका दोहन करते हैं। अपने नियमित कर्म के बाद परमात्मा की भक्ति से भले ही कोई लाभ न हो पर एक नवीन सुखद अनुभूति अवश्य होती है।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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तत्सवितुर्वरेण्य भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो न प्रचोदयात!
          ‘‘जग नियंता, जगकर्ता, दिव्य गुण युक्त परमात्मा के शुद्ध स्वरूप का ध्यान हम करते हैं जो हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग पर लगाता है।’’
                 इसमें ओम भूर्भव स्वः शब्द जुड़ने से यह गायत्री मंत्र हो जाता है जो कि मंत्रों का राजा माना जाता है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि नाम स्मरण करने से मन की शुद्ध होती है और बुद्धि परिष्कृत होती है। हम अपने अध्यात्म ग्रंथों की बातों को भले ही न माने पर पश्चिमी विशेषज्ञों की इस धारणा को तो नहीं भुलाना चाहिए कि हमें अपनी नियमित दिनचर्या में एकरसता से बचना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Tuesday, November 29, 2011

पतंजलि योग साहित्य-पूर्व के कर्म का अनुमान परिणाम से भी संभव (patanjali yoga sahitya-parinam se karma ka anuaman sanbhav)

               आमतौर से आधुनिक विज्ञापन ज्योतिष तथा मनुष्यों की सिद्धि पर विश्वास नही करता पर पतंजलि योग के अनुसार अगर कोई योगासन, ध्यान, प्राणायाम करने के साथ ही संयम का पालन करे तो वह इतना सिद्ध हो जाता है कि उसे अपने भविष्य का ज्ञान होने लगता है। इतना ही नहीं अगर हम किसी व्यक्ति को काम करते नहीं देख पाए  पर उसे नतीजे भोगते देखकर भी यह अंदाज लगाया जा सकता है कि उसने क्या किया होगा।
पतंजलि योगशास्त्र  में कहा गया है कि
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क्रमान्यत्वं परिणामन्यत्वे हेतुः।

‘‘किसी कार्य करने के क्रम में भिन्नता से परिणाम भी भिन्न होता है।’’
परिणामन्नयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।।
‘‘अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का विचार करने से परिणाम का ज्ञान हो जाता है।’’

                    पतंजलि योग में न केवल भौतिक तथा दृश्यव्य संसार को जानने की विधा बताई गयी है बल्कि अभौतिक तथा अदृश्यव्य स्थितियों के आंकलन का भी ज्ञान दिया गया है। हमारे सामने जो भी दृश्य आता है वह तत्काल प्रकट नहीं होता बल्कि वह किसी के कार्य के परिणाम स्वरूप ही ऐसा होता है। कोई व्यक्ति हमारे घर आया तो इसका मतलब वह किसी राह से निकला होगा। वहां भी उसके संपर्क हुए होंगे। वह हमारे घर पर जो व्यवहार करता है वह उसके घर से निकलने से लेकर हमारे यहां पहुंचने तक आये संपर्क तत्वों से प्रभावित होता है। वह धूप में चलकर आया है तो दैहिक थकावट के साथ मानसिक तनाव से ग्रसित होकर व्यवहार करता है। कोई घर से लड़कर आया है तो उसका मन भी वहीं फंसा रह जाता है और भले ही वह उसे प्रकट न करे पर उसकी वाणी तथा व्यवहार अवश्य ही नकारात्मक रूप से परिलक्षित होती है।

            कहने का अभिप्राय यह है कि हम प्रतिदिन जो काम करते हैं या लोगों हमारे लिये काम करते हैं वह कहीं न कहीं अभौतिक तथा अदृश्यव्य क्रियाओं से प्रभावित होती हैं। इसलिये कोई दृश्य सामने आने पर त्वरित प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करना चाहिए। हमें यह विचार करना चाहिए कि उस दृश्य के पीछे कौन कौन से तत्व हैं। व्यक्ति, वस्तु या स्थितियों से प्रभावित होकर ही कोई धटना हमारे सामने घटित होती है। जब हमें यह ज्ञान हो जायेगा तब हमारे व्यवहार में दृढ़ता आयेगी और हम अनावश्यक परिश्रम से बच सकते हैं। इतना ही नहीं किसी दृश्य के सामने होने पर जब हम उसका अध्ययन करते हैं तो उसके अतीत का स्वरूप भी हमारे अंतर्मन में प्रकट होता है। जब उसका अध्ययन करते हैं तो भविष्य का भी ज्ञान हो जाता है।         
         हम अपने साथ रहने वाले अनेक लोगों का व्यवहार देखते हैं पर उसका गहराई से अध्ययन नहीं करते। किसी व्यक्ति के मन में अगर पूर्वकाल में से दोष रहे हैं और वर्तमान में दिख रहे हैं तो मानना चाहिए कि भविष्य में भी उसकी मुक्ति नहीं है। ऐसे में उससे व्यवहार करते समय यह आशा कतई नहीं करना चाहिए कि वह आगे सुधर जायेगा। योग साधना और ध्यान से ऐसी सिद्धियां प्राप्त होती हैं जिनसे व्यक्ति स्वचालित ढंग से परिणाम तथा दृश्यों का अवलोकन करता है। अतः वह ऐसे लोगों से दूर हो जाता है जिनके भविष्य में सुधरने की आशा नहीं होती। जब हमारा कोई कार्य सफल नहीं होता तब हम भाग्य को दोष देते हैं जबकि हमें उस समय अपने दोषों और त्रुटियों पर विचार करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Thursday, November 24, 2011

संत कबीर दर्शन-भक्ति के लिये इधर उधर भटकने की आवश्यकता नहीं ( sant kabir darshan-bhakti ke liye bhatakna vyarth)

                     आखिर मनुष्य को भक्ति क्यों करना चाहिए? इसके लाभ क्या हैं? इस प्रश्न के अनेक उत्तर दिये जा सकते हैं। आर्ती प्रवृत्ति वाले भक्त अपना कष्ट दूर होने की आशा से भगवान को पुकारते हैं तो अर्थार्थी हमेशा ही इस आशा से भगवान का भजन करते हैं कि उनके सांसरिक कार्य सिद्ध होते रहें।  जिज्ञासु केवल निष्काम भाव से भक्ति करते हैं यह सोचक कि अगर इससे फायदा नहीं हुआ  तो हानि भी नहीं होगी पर देखें कि इससे क्या लाभ होता है? इन सबसे अलग ज्ञानी इस तर्क के साथ ध्यान, योग, तथा मंत्र जाप आदि करते हैं कि इससे उनका का मन कुछ देर के लिये सांसरिक पदार्थों के चिंत्तन से परे होकर विश्राम करता है। चतुराई करते हुए एकरसता से ऊबी बुद्धि सरल भाव से आत्मा के साथ बात करती है।
आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान भी मानता है कि एक ही काम करते रहने से अनेक मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं जो अततः देह के पतन का कारण बनते हैं। पश्चिमी स्वास्थ्य विज्ञान ने तो यह बात अब जानी है जबकि भारतीय अध्यात्म ज्ञानियों ने यह बात पहले ही समझ ली थी इसलिये ही भक्ति, ध्यान, योग तथा मंत्रोच्चार के लिये लोगों को प्रेरित करते रहे। यह अलग बात है कि अनेक लोग भक्ति करते हैं पर उनके में दिखावा अधिक होता है। वह चाहते हैं कि वह भक्त कहलायें। अनेक भक्तगण तो दूसरे को अपने इष्ट को पूजने के लिये उकसाते हैं।
इस विषय पर संत कबीरदास कहते हैं कि
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बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जानिए राम
कहा काज संसार से, तुझे घनी से काम
          "बाहर दिखाकर भगवान् का स्मरण करने से क्या लाभ, राम का स्मरण तो अपने ह्रदय में करना चाहिए। जब भगवान् के भक्ति करनी है फिर इस संसार से क्या काम ।
प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय
चाहे घर में बात कर, चाहे बन को जाय
        " अगर भगवान की भक्ति करनी है तो घर-गृहस्थी में रहते हुए भी की जा सकती है उसके लिए वेशभूषा बदलने की कोई जरूरत नहीं है और न वन जाने की। बस मन में प्रेमभाव होना चाहिए।" 
            भक्ति के प्रकार पर बहस करने की बजाय उसके किसी भी स्वरूप में अपना मन और मस्तिष्क स्थिर रखने पर विचार करना चाहिए।  चित्त की चंचलता पर अगर नियंत्रण नहीं किया गया तो सारी भक्ति इसलिये व्यर्थ है क्योंकि उससे हमारे मन के विचारों के विकार नहीं निकल पाते।  भक्ति से कोई इस संसार में स्वर्ग नहीं मिल जाता न ही सांसरिक कार्यों में सिद्धि की आशा पूर्ण होती है। दरअसल सांसरिक कार्य तो अपने आप समय पर सिद्ध होते हैं मनुष्य आशा और निराशा का भाव तो व्यर्थ ही पालता है। 
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Friday, October 28, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-धनी और निर्धन की कामनाऐं अलग अलग होती हैं (kamana ka roop garibi aur amiri ke ansuar-bharathari neeti shatak)

             मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह अगर धनार्जन करता है तो उसे व्यय के लिये भी तत्पर रहता है। जैसे जैसे उसके पास धन संपदा बढ़ती है अपना वैभव दिखाने के लिये वह उतना ही उतावला होता हैै। अगर कोई अल्पधनी अपनी मेहनत से धनवान हो जाता है तो उसे इस बात की प्रसन्नता कम होती है बल्कि वह इस चिंता को अधिक पाल लेता है कि वह अपने वैभव का प्रदर्शन समाज के सामने कर अपनी गरीब की छवि से मुक्ति पाये।
         नवधनाढ्य आदमी समाज के सामने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने कें लिये अनेक पदार्थों का संचय करता है। अपनी चाल ढाल से वह यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि वह अब धनवान हो गया है। यही कारण है कि हमारे देश में धनवानों की बढ़ती संख्या के कारण भौतिक पदार्थों के संचय के साथ ही विलासिता का प्रदर्शन भी तेज हो गया है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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परिक्षीणः कश्चित्स्पृहयति यवानां प्रसृतये स पश्चात्सम्पूर्णः कलयति धरित्रीं तृणसमाम्।
अतश्चानैकान्त्याद् गुरु लघुतयाऽर्थेषु धनिनामवस्था वस्तुनि प्रथयति च संकोचयति च।।
         ‘‘जब मनुष्य गरीब होता है तब वह अपने रहने के लिये एक गज जमीन की चाहत करता है पर जब अमीर होने पर वही पूरे भूमंडल की कामना करने लगता है। इस संसार में अनेक पदार्थ हैं और अमीरी गरीबी के अनुसार उनको पाने की कामना बदलती रहती है। वस्तुओं का महत्व भी मनुष्य की आर्थिक स्थिति के अनुसार बदलता रहता है।"
            जहां तक धन कम या ज्यादा होने का सवाल है तो यह त्रिगुणमयी माया अपने रंग रूप इंसान को इस तरह दिखाती है कि वह उसी को ही सत्य मानकर उसके इर्दगिर्द घूमता रहता है। अपनी आत्मा और परमात्मा विषयक अध्यात्म ज्ञान उसके लिये सन्यासियों का विषय होता है। धन न होने पर आदमी अपने सांसरिक संघर्ष में निरंतर व्यस्त रहता है इसलिये सत्संग तथा ज्ञान चर्चा उसके लिये दूर की कौड़ी हो जाती है तो धन आने पर आदमी ऐसे सात्विक स्थानों पर भी अपने राजस भाव का प्रदर्शन बहुत उत्तेजना के साथ करता है जहां अध्यात्मिक विषयक विचार हो रहा है। मजे की बात यह है कि धनवान लोगों को यह भ्रम रहता है कि उनके पास अध्यात्मिक ज्ञान है वह उसका बखान भी करते हैं। यह अलग बात है कि उनकी वाणी के पीछे ज्ञान का नहीं  वरन् धन का ओज होता है। उनके सामने प्रस्तुत लोग ज्ञान बघारते समय भले कुछ न कहें पर पीठ पीछे  उन पर हंसते हैं। वजह साफ है, ज्ञान का प्रमाण भौतिक पदार्थों की उपलिब्ध नहीं वरन! उनका त्याग है।
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Wednesday, August 31, 2011

श्री गुरु ग्रंथ साहिब से-सृष्टि का ज्ञान केवल परमात्मा के पास ही है (shri suru granth sahib-srishti aur parmatma)

         विश्व इतिहास में अनेक विद्वान हो गये पर वह इस बात का पता नहीं लगा सके कि इस सृष्टि का प्रारंभ कब और कहां से हुआ। सच तो यह है कि धर्म के ठेकेदार तमाम तरह के दावे करते हैं कि इस सृष्टि में तो बस एक ही आकाश, धरती और पाताल है जबकि पश्चिमी वैज्ञानिकों का मानना है कि अन्य जगह भी इस तरह की सृष्टि होने की संभावना हो सकती है। इस विषय पर अनेक शोध चल रहे हैं पर लगता नहीं है कि अभी निकट भविष्य में कोई वास्तविक रहस्य खोज पायेगा। यह बात अलग है कि इस विषय पर धर्म की आड़ लेकर अनेक बहसें होती हैं और कुछ लोग मानसिक विलास करते हैं। कोई कहता है कि परमात्मा एक है तो अनेक लोग कहते हैं कि परमात्मा तो अनंत है फिर कैसे माना जाये कि वह एक या अनेक।
गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
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थिति वारु न जोगी जाणै, रुति माह न कोई।
जा करता सिरठी कउ साजे, आपे जाणै सोई।।
          ‘‘बड़े बड़े ज्ञानी इस सृष्टि  का आदि और अंत नहीं जान सके। जिस समय इस सृष्टि की रचना हुई उस समय यहां क्या था यह केवल परमात्मा ही जान सकता है।
इह अंत जाणै कोई।
पाताला पाताल लख आगासा, आगास।
तिथे खंड मंडल चरभेंड।
             ‘‘इस सृष्टि के आदि और अंत को कोई नहीं जान सकता क्योंकि इसें आखों आकाश और पाताल हैं। इसकी रचना किसी कालखंड में हुई इसका ज्ञान तो केवल परमात्मा कोई ही हो सकता है।’’
         इन बहसों में उलझने से अच्छा है कि आदमी नाम स्मरण कर अपना जीवन बिताये। मुख्य बात यह है कि मनुष्य का मन एकरसता से ऊब जाता है। नियमित धनसंग्रह, परिवार का पालन पोषण तथा मनोरंजन करते हुए मनुष्य का मन कुछ विराम चाहता है जो केवल ध्यान की प्रक्रिया से ही संभव है। विश्व के स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि सांसरिक विषय ये अलग हटकर एकांत में ध्यान करने से मनुष्य को नवीनता अनुभव होती है। भारतीय दर्शन भी ध्यान के इर्दगिर्द ही अपना लक्ष्य निर्धारित करने का संदेश देता है। चूंकि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के संदर्भ ग्रंथों में अनेक रुचिकर कथायें हैं तो लोग उनका श्रवण और अध्ययन मनोरंजन की दृष्टि से करते हैं इसलिये उनका ध्यान सांसरिक भोग पदार्थों से विरक्त नहीं हो पाता। कुछ लोग सृष्टि के निर्माण की चर्चा करते हैं तो कुछ उस पर अपने व्यख्यान देकर अपने आपको ज्ञानी सिद्ध करते हैं मगर सच यही है कि इस सृष्टि के सही स्वरूप का ज्ञान किसी को नहीं है।
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