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Saturday, February 07, 2015

धन्य है वह लोग जो निष्कामभाव से समाज सेवा करते हैं-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(dhanaya hain vah log jo nishkam bhav se samaj sewa kanrte hain-A Hindu hindi religion thought based on bhartrihari neeti shatak)




            आज के विज्ञापन युग में प्रचार माध्यम पैसा लेकर अनेक प्रतिष्ठित लोगों को देवता बना देते हैं।  इतना ही नहीं अब तो ऐसे कथित स्वयंभू समाजसेवी हो गये हैं जो धनिकों से चंदा लेकर गरीब तथा बेसहारा लोगों में दानवीर बन जाते हैं।  देश में अनेक अशासकीय स्वयंसेवी संगठन बन गये हैं जिनके शीर्ष पुरुष यह दावा करते हैं कि वह निष्काम भाव से समाज सेवा कर रहे हैं।  यह अलग बात है कि वह समाज सेवा के लिये प्राप्त धन से ही अपने गृह खर्च चलाते हैं। उससे ही समाज सेवा के लिये  यात्रायें करते हैं।  अपनी जेब से पैसा निकालकर खर्च करने की बात तो वह स्वयं  कहते भी नहीं है जो कि वास्तव में निष्काम भावी होने का प्रमाण होता है।  अगर हम ऐसे समाजसेवी संगठनों की संख्या देखें तो हमारे देश में गरीबो, मरीजों तथा बेसहारा लोगों की संख्या नगण्य रहना चाहिये पर आंकड़े इस को प्रमाणित नहीं करते। 

भर्तृहरि नीति शतक

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किं तेन हेमगिरिणा रजतांद्रिणा वा यत्राश्रिताश्च तरवस्तरवस्त एव।

मन्यामहे मलयमेव यदाश्रवेणा कङ्कोलनिन्बकुटजा अपि चन्दनाः स्यूः।।



            हिन्दी में भावार्थ-उस स्वर्ण पर्वत सुमेरु और रजत पर्वत हिमालय से भी क्या लाभ जहां के पेड़ तो पेड़  रहते है। हम तो उस मलय पेड़ को महान मानते हैं जिसके आश्रय में रहने वाले कंकोल, नीम और कुटज आदि वृक्ष चंदनमय हो जाते हैं।

            भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में अंधविश्वासों का कोई स्थान नहीं है यह अलग बात है कि पेशेवर धार्मिक ठेकेदारों ने कर्मकांडों के नाम पर अनेक प्रकार के अंधविश्वास समाज में स्थापित कर दिये हैं जिसे लोग चाहे अनचाहे उनका बोझ ढोते हैं।  इन अंधविश्वासों के विरुद्ध अनेक कथित विद्वान अभियान भी छेड़ देते हैं पर उनका प्रभाव इसलिये नहीं होता क्योंकि वह भारतीय अध्यात्म के तत्वज्ञान का अध्ययन नहीं करते।  उन्हें लगता है कि केवल नारे लगाने से लोग उनकी बात मान लेंगे।  ऐसे लोग भी अपने अभियान के लिये चंदा लेते हैं।  हमारी दृष्टि में तो अगर अंधविश्वास समाप्त करना है तो सत्य का विश्वास कायम करना चाहिये पर यह भी निश्चित है कि पेशेवर लोगों के लिये समाज में भावनात्मक परिवर्तन लाना सहज नहीं है।  भावनात्मक परिवर्तन के लिये हार्दिक प्रयास आवश्यक हैं जिसे आर्य अर्जन की भावना होने पर सहजता से नहीं किया जा सकता।
            ऐसे में धन्य है वह लोग जो प्रचार से परे होकर समाज में न केवल निष्काम भाव से सेवा करते हैं वरन् हार्दिक भाव से उनमें ज्ञान का प्रचार करते हैं।  इन्हीं लोगों की वजह से आज भी भारतीय समाज की पहचान विश्व में बनी हुई है।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Saturday, September 20, 2014

संस्कार मस्तिष्क की स्मृतियों का ही एक भाग-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(sanskar masitishk ki smritiyon ka hi ek bhag-A Hindu hindi religion thought based on patanjali yog sichnce)




            आमतौर से सामान्य भाषा में स्मृति तथा संस्कार एकरूप नहीं होते।  स्मृतियों को पुराने विषय, व्यक्ति, दृश्य अथवा अनुभूतियों के स्मरण का भंडार माना जाता है जबकि संस्कार मस्तिष्क में स्थापित मानवीय व्यवहार के स्थापित सिद्धांतों के रूप में समझा जाता है। पतंजलि योग का अध्ययन करें तो लगता है कि संस्कार स्मृति का ही एक भाग है।  जीवन व्यवहार के सिद्धांत अंततः स्मृति समूह का ही वह भाग है जो मानव मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं।

पतंजलि  योग सूत्र  में कहा गया है
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जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानष्यानन्तर्य स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्।।

     हिन्दी में भावार्थ-पतंजलि योग सूत्र के अनुसार जाति, देश काल इन तीनों से संपर्क टूटने पर भी स्वाभाविक कर्म संस्कारों में बाधा नहीं आती क्योंकि स्मृति और संस्कारों का एक ही रूप होता है।

     हम इस श्लोक में योग के संस्कारिक रूप को समझ सकते हैं। जब मनुष्य बच्चा होता है तब उसके अपने घर परिवार, रिश्तेदारी, विद्यालय तथा पड़ौस के लोगों से स्वाभाविक संपर्क बनते हैं। वह उनसे संसार की अनेक बातें ऐसी सीखता है जो उसके लिये नयी होती हैं। वह अपने मन और बुद्धि के तत्वों में उन्हें स्वाभाविक रूप से इस तरह स्थापित करता है जीवन भर वह उसकी स्मृतियों में बनी जाती हैं। कहा भी जाता है कि बचपन में जो संस्कार मनुष्य में आ गये फिर उनसे पीछा नहीं छूटता और न छोड़ना चाहिए क्योंकि वह कष्टकर होता है।
      यही कारण है कि माता पिता तथा गुरुओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दें। संभव है बाल्यकाल में अनेक बच्चे उनकी शिक्षा पर ध्यान न दें पर कालांतर में जब वह उनकी स्थाई स्मृति बनती है तब वह उनका मार्ग प्रशस्त करती है। इसलिये बच्चों के लालन पालन में मां की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण मानी गयी है क्योंकि बाल्यकाल में वही अपने बच्चे के समक्ष सबसे अधिक रहती है और इसका परिणाम यह होता है कि कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जो अपनी मां को भूल सके।
      इसलिये हमारे अध्यात्मिक संदेशों में अच्छी संगत के साथ ही अच्छे वातावरण में भी निवास बनाने की बात कहीं जाती है। अक्सर लोग कहते हैं कि पास पड़ौस का प्रभाव मनुष्य पर नहीं पड़ता पर यह गलत है। अनेक बच्चे तो इसलिये ही बिगड़ जाते हैं क्योंकि उनके बच्चे आसपास के गलत वातावरण को अपने अंदर स्थापित कर लेते हैं।
      यही नहीं आज के अनेक माता पिता बाहर जाकर कार्य करते हैं और सोचते हैं कि उनका बच्चा उनकी तरह ही अच्छा निकलेगा तो यह भ्रम भी उनको नहीं पालना चाहिये क्योंकि किसी भी मनुष्य की प्रथम गुरु माता की कम संगत बच्चों को अनेक प्रकार के संस्कारों से वंचित कर देती है। ऐसे लोग सोचते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर ठीक हो जायेगा या हम उसे संभाल लेंगे तो यह भी भ्रामक है क्योंकि जो संस्कार कच्चे दिमाग में स्मृति के रूप में स्थापित करने का है वह अगर निकल गया तो फिर अपेक्षायें करना निरर्थक है। युवा होने पर दिमाग पक्का हो जाता है और सभी जानते हैं कि पक्की मिट्टी के खिलोने नहीं बन सकते-वह तो जैसे बन गये वैसे बन गये। दरअसल हम जिससे संस्कार कहते हैं वह प्रारम्भिक काल में स्थापित स्मृतियों का विस्तार ही हैं इसलिये अगर हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे बच्चे आगे चलकर वह काम करें जो हम स्वयं चाहते हैं तो उसकी शिक्षा पहले ही देना चाहिए। यह स्मृतियां इस तरह की होती हैं कि देश, काल तथा जाति से कम संपर्क रहने न बिल्कुल न होने पर भी बनी रहती हैं और मनुष्य अपने संस्कारों से भ्रष्ट नहीं होता है अगर किसी लोभवश वह अपना पथ छोड़ता भी है तो उसे भारी कष्ट उठाना पड़ता है और फिर अपने स्थान पर वापस आता है।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Sunday, August 31, 2014

ज्ञान का अहंकार अज्ञानी बना देता है-चिंतन लेख(gyan ka ahankar aadmi ko agyani bana deta hai-A Hindu hindi religion thouhgt based on bhartrihari neeti shatak)



            विश्व में जितने भी प्रचलित कथित  धर्म हैं उनके प्रचारक सक्रिय हैं।  हर धर्म का प्रतीक और पवित्र कोई रंग माना गया है जिससे रंगे वस्त्र यह प्रचारक पहनते हैं।  इनके पहनने से ही आम लोग उनको सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।  यह अलग बात है कि ऐसे अनेक कथित धार्मिक ठेकेदार अपनी अधार्मिक गतिविधियों के कारण बदनाम भी हुए हैं। हम यहां उन धार्मिक वाचकों की बात कर रहे हैं जो भले ही अधार्मिक गतिविधियों मे लिप्त न हों पर समाज पर शासन करने की उनकी प्रवृत्ति ही उनको इस धर्म के पेशे से जोड़ लेती हैं।  मुख्य बात यह है कि वह अपने धर्म के बारे में लोगों को प्रवचन यही सोचकर देते हैं कि वह ज्ञानी है। यह सोच अहंकार का प्रमाण है।  यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में तत्व ज्ञान का उपदेश केवल अपने ही भक्तों में करने का प्रतिबंध लगा दिया जबकि पाश्चात्य विचारधाराओं में धर्म का प्रचार एक महत्वपूर्ण काम माना गया।  सवाल यह है कि कोई वाकई धर्म का मर्मज्ञ है इसका प्रमाणपत्र कौन देगा? आमजन तो दे ही नहीं सकते जो ऐसे लोगों के सामने केवल इसलिये नतमस्तक होते हैं क्योंकि धन, पद और बल के केंद्रबिंदु में ऐसे अनेक कथित धर्माचार्य आते हैं जिन्होंने चालाकी से अपनी छवि बनायी होती है। यह कथित ज्ञानी एक दूसरे को व्यवसायिकता प्रतिस्पर्धा के कारण ऐसा प्रमाणपत्र दे नहीं सकते।  सभी में अपने ज्ञान का अहंकार नाक पर मक्खी की तरह बैठा रहता है।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिपतं मम मनः
यदा किञ्चित्किञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदा मूर्खोऽस्मीति जवन इव मदो में व्यपगतः

            हिंदी में भावार्थ -जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो मैं हाथी की तरह मदांध होकर उस पर गर्व करने लगा और अपने को विद्वान समझने लगा पर जब विद्वानों की संगत में बैठा और यथार्थ का ज्ञान हुआ तो वह अहंकार ज्वर की तरह उतर गया तब अनुभव हुआ कि मेरे समान तो कोई मूर्ख ही नहीं है।

वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि

            हिंदी में भावार्थ - बियावान जंगल और पर्वतों के बीच खूंखार जानवरों के साथ रहना अच्छा है किंतु अगर मूर्ख के साथ इंद्र की सभा में भी बैठने का अवसर मिले तो भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।

            मनुष्य की पंच तत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि तथा अहंकार स्वाभाविक रूप से रहते हैं। अच्छे से अच्छे ज्ञानी को कभी न कभी यह अहंकार आ जाता है कि उसके पास सारे संसार का अनुभव है। इस पर आजकल अंग्रेजी शिक्षा पद्धति लोग तो यह मानकर चलते हैं कि उनके पास हर क्षेत्र का अनुभव है जबकि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के बिना उनकी स्थिति अच्छी नहीं है। सच तो यह है कि आजकल जिन्हें गंवार समझा जाता है वह अधिक ज्ञानी लगते हैं क्योंकि वह प्रकृति से जुड़े हैं और आधुनिक शिक्षा प्राप्त आदमी तो एकदम अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गये हैं। इसका प्रमाण यह है कि आजकल हिंसा में लगे अधिकतर युवा आधुनिक शिक्षा से संपन्न हैं। इतना ही नहीं अब तो अपराध भी आधुनिक शिक्षा से संपन्न लोग कर रहे हैं।
            जिन लोगों के शिक्षा प्राप्त नहीं की या कम शिक्षित हैं वह अब अपराध करने की बजाय अपने काम में लगे हैं और जिन्होंने अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त की और इस कारण उनको आधुनिक उपकरणों का भी ज्ञान है वही बम विस्फोट और अन्य आतंकवादी वारदातों में लिप्त हैं। इससे समझा जा सकता है कि उनके अपने आधुनिक ज्ञान का अहंकार किस बड़े पैमाने पर मौजूद है।
      आदमी को अपने ज्ञान का अहंकार बहुत होता है पर जब वह आत्म मंथन करता है तब उसे पता लगता है कि वह तो अभी संपूर्ण ज्ञान से बहुत परे है। कई विषयों पर हमारे पास काम चलाऊ ज्ञान होता है और यह सोचकर इतराते हैं कि हम तो श्रेष्ठ हैं पर यह भ्रम तब टूट जाता है जब अपने से बड़ा ज्ञानी मिल जाता है। अपनी अज्ञानता के वश ही हम ऐसे अल्पज्ञानी या अज्ञानी लोगों की संगत करते हैं जिनके बारे में यह भ्रम हो जाता है वह सिद्ध हैं। ऐसे लोगों की संगत का परिणाम कभी दुखदाई भी होता है। क्योंकि वह अपने अज्ञान या अल्पज्ञान से हमें अपने मार्ग से भटका भी सकते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, August 15, 2014

आस्तिक और नास्तिक के बीच अध्यात्मिक विषय-हिन्दी चिंत्तन लेख(astik aur nastik ke beech adhyatmik vishaya-hindi thought article)




      अमेरिका में नास्तिकतावादी चर्चों का प्रभाव बढ़ रहा है- समाचार पत्रों प्रकाशित यह खबर दिलचस्प होने के साथ  विचारणीय भी है। पाश्चात्य दृष्टि से  ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करने वालो को कहा जाता है। न करने वाले को नास्तिक का तमगा लगाकर निंदित घोषित किया जाता है। वहां के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण है जिनमें धर्मांध समाज के क्रूर शिखर पुरुषों ने नास्तिक होने को आरोप लगाकर अनेक लोगों को निर्दयी दंड दिया।  हमारे यहा आस्तिकता और नास्तिकता के विवाद अधिक  संघर्ष नहीं देखे जाते इसलियें ऐसे उदाहरण नहीं मिलते।  यह अलग बात है कि परमात्मा के अस्तित्व पर हार्दिक आस्था रखने वाले कितने हैं इसका सही आंकलन करना सहज नहीं है। कारण यह कि यहां धर्मभीरुता का भाव अधिक है इसलिये  कुछ चालाक लोग तो केवल इसलिये धर्म के धंधे में आ जाते हैं कि भीड़ का आर्थिक दोहन किया जा सके।  वह पुराने ग्रंथों को रटकर राम का नाम लेकर अपने मायावी संसार का विस्तार करते हैं।  माया के शिखर पर बैठे ऐसे लोग एकांत में वह परमात्मा पर चिंत्तन करने होंगे इस पर यकीन नहीं होता।  सच्ची भक्ति का अभाव यहां अगर न देखा गया होता तो हमारे हिन्दी  साहित्य में भक्तिकाल के कवि कभी ऐसी रचनायें नहीं देते जिनमें समाज को सहज और हार्दिक भाव से परमात्मा का स्मरण करने का संदेश दिया गया।  इतना ही नहीं संत कबीर और रहीम ने तो जमकर भक्ति के नाम पर पाखंड की धज्जियां उड़ाईं है। स्पष्टतः यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे समाज में भक्ति के नाम पर न केवल पाखंड रहा है बल्कि अपनी शक्ति अर्जित करने तथा उसके प्रदर्शन करने का भी यह माध्यम रहा है।
      अगर हम पाश्चात्य समाज में नास्तिकतावाद के प्रभाव की खबर को सही माने तो एक बात साफ लगती है कि कहीं न कहीं वहां वर्तमान प्रचलित धर्मों की शक्ति में हृास हो रहा है। हम यह सोचकर प्रसन्न न हों कि भारतीय धर्मों में कोई ज्यादा स्थिति बेहतर है क्योंकि कहीं न कहीं अंग्रेजी पद्धति की शिक्षा के साथ ही रहन सहन तथा खान पान में हमने जो आदते अपनायी हैं उससे यहां भी समाज मानसिक रूप से लड़खड़ा रहा है।  यहां नास्तिकतवाद जैसा तत्व सामाजिक वातावरण में नहीं है पर अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति  व्याप्त उदासीनता का भाव वैसा ही है जैसा कि पश्चिम में नास्तिकवाद का है।
      हम यहां भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की बात करें तो उसमें ज्ञान और कर्मकांडों के बीच एक पतली विभाजन रेखा खिंची हुई है जो दिखाई नहीं देती।  श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्टतः स्वर्ग दिलाने वाले कर्मकांडों के प्रति रुचि दिखाने वालों को अज्ञानी बताया गया है।  मूल बात यह है कि भक्ति  आतंरिक भाव से की जाने वाली वह क्रिया मानी गयी है जो मानसिक विकारों से परे ले जाती है शर्त यह कि वह हृदय से की जाये।  इसके विपरीत भारत के बाहर पनपी विचाराधाराओं में अपने समूहों के लिये बकायदा खान पान और रहन सहन वाले बंधन लगाये गये हैं। इसके विपरीत भारतीय अध्यात्मिक दर्शन उन्मुक्त भाव से जीवन जीने की प्रेरणा देता है।  वह किसी वस्तु, विषय और व्यक्ति में दोष देखने की बजाय साधक को आत्ममंथन के लिये प्रेरित करता है।  इतना ही नहीं अध्यात्मिक दर्शन तो किसी कर्म को भी बुरा नहीं मानता पर वह यह तो बताता है कि वह अपनी प्रकृत्ति के अनुसार कर्ता को परिणाम भी देते हैं।  अब यह कर्ता को सोचना है कि किस कर्म को करना और किससे दूर रहना है। भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा के प्रवाह में लोच है।  वह परिवर्तन के लिये तैयार रहने की प्रेरणा देती है। अध्यात्मिक ज्ञान के साथ भौतिक विज्ञान के साथ संयुक्त अभ्यास करने का संदेश देती है।
      हम अक्सर विश्व में अध्यात्मिक गुरु होने के दावे का बखान करते हैं पर स्वयं अपनी मौलिक विचारधारा से दूर हटकर पाश्चात्य सिद्धांतों को अपना रहे हैं।  कहा जाता है कि अध्यात्मिक ज्ञान मनुष्य को मानसिक रूप से दृढ़ता प्रदान करता है जो कि सांसरिक विषयों में युद्धरत रहने के लिये आवश्यक है। भगवान के प्रति आस्था होने या न होने से किसी दूसरे को अंतर नहीं पड़ता वरन् हमारी मनस्थिति का ही इससे सरोकार है।  आस्था हमारे अंदर एक रक्षात्मक भाव पैदा करती है और सांसरिक विषयों संलिप्त रहते हुए सतर्कता बरतने की प्रेरणा के साथ आशावाद के मार्ग पर ले जाती है जबकि अनास्था आक्रामकता और निराशा पैदा करती है। तय हमें करना है कि कौनसे मार्ग पर जाना है।  संभव है कि हम दोनों ही मार्गों पर चलने वालों की भीड़ जमा कर लें पर हमारी दूरी हमारे स्वयं के कदम ही तय करते हैं और हमारा लक्ष्य हमारी तरह ही एकाकी होता है उसे किसी के साथ बांटना संभव नहीं है।
      भारत में नास्तिक विचाराधारा अभी प्रबल रूप से प्रवाहित नहीं है पर कुछ लोग हैं जिन्होंने यह दावा करना शुरू कर दिया है। ऐसे ही हमारे एक मित्र ने हमसे सवाल किया-‘‘आप भगवान पर विश्वास करते हैं?’
      हमने उत्तर दिया कि ‘‘पता नहीं!
      उसने कहा-‘‘पर आप तो अध्यात्म पर लिखते हैं।  यह कैसे हो सकता है कि परमात्मा पर विश्वास न करें।  मैं तो नहीं करता।’’
      हमने कहा-‘‘हम तो अभी शोध के दौर से हैं।  जब काम पूरा हो जायेगा तब आपको बतायेंगे।
      उसने व्यंग्यताम्क रूप से कहा-‘‘अभी तक साधना से आपने कुछ पाया है तो बताईये  भगवान है कि नहीं!’’
      हमने कहा-‘‘वह अनंत है। हमारा दर्शन तो यही कहता है।’’
      फिर उसने व्यंग्य किया-‘‘अरे वाह, सभी कहते हैं कि वह एक है।’’
      हमने कहा-‘‘वह एक है कि अनेक, यह बात कहना कठिन है पर वह अनंत है।’’
      वह झल्ला गया और बोला-‘‘आप तो अपना मत बताईये कि वह है कि नहीं?’’
      हमने कहा-‘‘अगर हम हैं तो वह जरूर होगा।’’
      वह चहक कर बोला-मैं हूं इस पर कोई संशय नहीं पर भगवान को नहीं मानता।
      हमने पूछा-‘‘मगर तुम हो यह बात भी विश्वास से कैसे कह सकते हो।’’
      वह चौंका-इसका क्या मतलब?’’
      हमने कहा-हमने अध्यात्मिक ग्रंथों में पढ़ा है कि ब्रह्मा जी के स्वप्न की अवधि में ही यह सृष्टि चलती है।  हम सोचते हैं कि जब ब्रह्मा जी के सपने या संकल्प पर ही यह संसार स्थित है तो फिर हम हैं ही कहां? अरे, हमारी निद्रा में भी सपने आते हैं पर खुलती है तो सब गायब हो जाता है।’’
      वह थोड़ी देर खामोश रहा फिर बोला-यार, तुम्हारी बात मेंरी समझ में नहीं आयी।’’
      हमने कहा-हमने तुम्हारे भगवान के प्रति विश्वास या अविश्वास का उत्तर इसलिये ही नहीं दिया क्योंकि अध्यात्मिक साधना करने वाले ऐसे प्रश्नों से दूर ही रहते हैं।’’
      उस बहस का कोई निष्कर्ष निकलना नहीं था और न निकला। आखिरी बात यह है कि अध्यात्मिक साधना करने वालों के लिये इस तरह की बहसें निरर्थक होती है जिनमें व्यक्ति अपने प्रभाव बढ़ाने के लिये तर्क गढ़ते हैं।  अध्यात्मिक साधना नितांत एकाकी विषय है और परमात्मा के प्रति विश्वास या अविश्वास बताने की आवश्यकता अपरिपकव ज्ञानियों को ही होती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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Sunday, July 27, 2014

मनुष्य समाज तीन भागों में बंटा है-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(manushya samaj teen Bhagon mein banta hai-A Hindu hindi religion thought bhartrihari neeti shatak)



      ह संसार अत्यंत विचित्र है।  एक तरफ लोग आपसी वार्तालाप में ज्ञान की बातें करते हुए स्वयं को विद्वान साबित करने का बहुत प्रयास करते हैं दूसरे तरफ सांसरिक  व्यवहार में सारे सिद्धांत ताक में रख देते हैं।  अनेक लोग तो यह मानते हैं कि ज्ञान की बातें करना ठीक हैं पर उस पर चलना केवल सन्यासियों को ही चाहिये।  इतना ही नहीं अगर कोई ज्ञानी सांसरिक विषयों में सीमित सक्रियता दिखाये तो उसका मजाक उड़ाते हैं।  धन, पद और प्रतिष्ठा की अंधीदौड़ में शामिल अज्ञानी लोगों के  समुदाय के लिये तत्वज्ञान का मतलब केवल सन्यास ही है।
      एक तो मनुष्य में वैसे ही आलस्य करने की प्रवृत्ति रहती है उस पर आज के विलासितापूर्ण साधनों ने पूरी तरह से उसे निष्क्रिय बना दिया है। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। हम इस सिद्धांत को विस्तृत रूप से देखें तो यह भी कहा जा सकता है कि आदमी अपनी देह को जिस वातावरण में रखता है वैसी ही उसकी बुद्धि भी रहती है।  विलासिता की वजह से देह की सक्रियता कम हो जाती है और ऐसे में मन तथा मस्तिष्क में स्फूर्ति रहने की आशा करना बेकार है।  वैसे भी देखा जाये तो अमीरों की वाचन क्षमता भले ही तीव्रतर हो पर पाचन क्षमता अत्यंत मद्धिम होती है। जब समाज पर विपत्ति आती है तो संघर्ष का बीड़ा कम धनवान और परिश्रमी लोग ही उठाते हैं।  कहा जाता है कि हमारे देश में प्रभावशाली अमीरों की संख्या बढ़ रही है तो इसका मतलब यह भी होता है कि संघर्षशील और संयमशील लोगों उस अनुपात में कम हो रहे हैं।

भर्तृहरि नीति  शतक में कहा गया है कि
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बौद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः।
अबोधेपहताश्चान्ये जीर्णमंगे संभाषिताम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-विद्वान ईर्ष्या, प्रभावशाली अहंकार और अन्य लोग अज्ञान से पीड़ित होते हैं। ऐसे ज्ञानी के लिये जीवन एकाकी होने के साथ ही उसकी समझ घुटकर रह जाती है।

      पूरा विश्व समाज तीन भागों में बंटा है।  सबसे पहले धन, पद और बाहुबलियों का क्रम में स्थान आता है। उसके बाद उनके प्रायोजित बुद्धिजीवी अपने आकाओं के हितों के अनुसार सामान्य लोगों पर नियंत्रण स्थापित कर अपने मार्गदर्शन में समाज चला रहे हैं। पूरे विश्व में व्यवसायिक कंपनियों ने अपना राज्य इस तरह स्थापित कर लिया है कि आमजनों को इसका आभास तक नहीं होता।  फिल्म, खेल, टीवी चैनल और परिवहन के साधनों से लेकर तक किराने के खेरिज व्यापार तक पर उन्होंने नियंत्रण कर लिया है। इतना ही नहीं वह धार्मिक, सामाजिक, राजकीय तथा कला संस्थाओं पर इस तरह नियंत्रण कर लिया है कि किसी को इस बात का आभास भी नहीं हो सकता कि राजधानियों से लेकर गांवों तक उनका वर्चस्व चल रहा है।  सामाजिक तथा धार्मिक संस्थाओं का हाल यह है कि उनके कर्ताधर्ता समाज को सुप्तावस्था में डालने वाले इन पूंजीपतियों से ही  चंदा लेकर समाज को जगाने के लिये औपचारिक कार्यक्रम कर इन्हीं के उत्पादों का प्रचार करते हैं। ऐसा नहीं है कि समझदार लोगों को इसका आभास नहीं है पर उनकी सुनता कौन है?
      अक्सर लोग यह कहते हैं कि समाज की वर्तमान दुर्दशा के लिये सज्जनों  की निष्क्रियता जिम्मेदार है पर यही प्रचार इन पूंजीपतियों के प्रायोजित बुद्धिजीवी ही करते हैं।  अगर लोगों को समझाया जाये तो ज्ञान की बात पर सहमति में सिर सभी हिलाते हैं पर चलने की बात की जाये तो लाचारी दिखाने में भी नहीं चूकते।  इसलिये सबसे बेहतर यही है कि ज्ञानार्जन कर स्वयं ही उस राह पर चलें। कम से कम यह गलतफहमी न पालें कि आप अपने श्रीमुख से किसी को उपदेश देकर सुधार सकते हैं।  यह अलग बात है कि पाश्चात्य शास्त्रों के ज्ञान से संपन्न बुद्धिजीवी सारे समाज को देवता बना देने का सपना दिखाते रहते हैं।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, July 19, 2014

खास लोगों के विरोधी भी बहुत होते हैं-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन लेख(khas logon ke virodhi bhi bahut hote hain-A hindu hindi religion message based on economics of kautilya)



            जिस व्यक्ति के पास धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल की कमी है उसके शत्रु अधिक नहीं होते। सीधी बात कहें तो इस संासरिक जीवन में आम आदमी की बजाय खास आदमी के लिये खतरे बहुत होते हैं।  इस संसार में तीन प्रकार की प्रवृत्ति के लोग होते हैं-सात्विक, राजसी और तामसी-इनमें सबसे अधिक सक्रियता राजसी प्रकृत्ति के लोगों की होती है।  इसे यूं भी कहा जा सकता है कि जीवन में अपने कार्यक्षेत्र में अधिक से अधिक सक्रियता दिखाकर पैसा, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करना ही राजसी प्रकृत्ति का प्रमाण हो सकता है।  जिन लोगों में लोभ, मद, मोह, क्रोध तथा कामनाओं का भंडार होता है वह निरंतर सक्रिय रहते हैं और इसी कारण उन्हें कड़ी प्रतिद्वंद्वता का सामना भी करना होता है। उनकी सफलताओं के कारण लोग उनसे ईर्ष्या तो करते ही हैं पर अतिसक्रियता के दोष से उनके शत्रु भी बन जाते हैं।  यही कारण है कि संतोष सदा सुखी होता है और लालची सदैव कष्ट उठाता है।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया कि
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न जातु गच्छेद्धिश्वासे सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान।
अद्रोहसमयं कृत्यां वृत्रमिन्द्रः पुरात्त्वद्यीत्।।

     हिन्दी में भावार्थ-अगर किसी कारणवश किसी से संधि भी की जाये तो उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। मैं वैर नहीं करूंगायह कहकर भी इन्द्र ने वृत्रासुर को मार डाला था।
ज्यायांसं सिंहः साहसं यथं मध्नाति दन्तिनः।
तस्मार्तिह इवोदग्रमात्मानं वीक्ष्ण सम्पतेत्।।

     हिन्दी में भावार्थ-शक्तिशाली सेना को साथ लिए शत्रु को युद्ध में मारने पर राजा का प्रभाव बढ़ता है। इसी प्रताप के कारण सभी जगह उसके दूसरे शत्रु भी पैदा होते हैं।

      मनुष्य जीवन अद्भुत है और रहस्यमय भी। मनुष्य को अन्य जीवों से अधिक बुद्धि वरदान में मिली है और वही उसकी सबसे शत्रु और मित्र भी है। जहां पशु पक्षी तथा अन्य जीव मनुष्य के एक बार मित्र हो जाते हैं तो फिर शत्रुता नहीं करते मगर स्वयं मनुष्य ही एक विश्वसनीय जीव नहीं है। वह परिस्थितियों के अनुसार अपनी वफादारी बदलता रहता है। अतः यह कहना कठिन है कि कोई मित्र अपने संकट निवारण या स्वार्थ सिद्धि का अवसर आने पर विश्वासघात नहीं करेगा। ऐसे में किसी शत्रु से संधि हो या मित्र से नियमित व्यवहार की पक्रिया उसमें कभी स्थाई विश्वास की अपेक्षा नहीं करना चाहिए।
इसके अलावा एक बात यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे के प्रति कठोरता या हिंसा का व्यवहार न करें। अनेक बार मनुष्य अपने को प्रभावशाली सिद्ध करने के लिये अपने से हीन प्राणी पर अनाचार करता है या फिर हमला कर उसे मार डालता है। इससे अन्य मनुष्य डर अवश्य जाते हैं पर मन ही प्रभावशाली आदमी के प्रति शत्रुता का भाव भी पाल लेते हैं। समय आने पर प्रभावशाली आदमी जब संकट में फंसता है तो वह उनका मन प्रसन्न हो जाता है। इसलिये जहां तक हो सके क्रूर तथा हिंसक व्यवहार से बचना चाहिए।


संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Wednesday, March 12, 2014

रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख-पोल खुल जाने पर सब जगह थू-थू होती है(rahim darshan par aadharit chinttan lekh-pol khul jane par sab jagah thu-thu hotee hai)



      आधुनिक लोकतंत्र में जहां यह पूरे विश्व में एक अच्छी परंपरा बनी है कि लोग अपने देश, प्रदेश और शहर के लिये राज्य व्यवस्था की देखरेख करने वाले प्रमुख का चयन स्वयं ही कर सकते हैं वही इस तरह की बुरी प्रवृत्ति भी चालाक लोगों में आयी है कि वह जनमानस को अपने पक्ष में करने के लिये अनेक तरह के प्रपंच तथा स्वांग रचते हैं।  अपने प्रचार में वह स्वयं की छवि एक ईमानदार, समझदार तथा उच्च विचारों वाले व्यक्ति की बनाते हैं। इससे प्रभावित होकर लोग उन्हें अपना नायक भी मान लेते हैं पर जब बाद में पता चलता है कि वह तो पद पर बैठने के लिये एक बुत की तरह सज कर आये थे तब उनके प्रति निराशा का भाव पलता है। ऐसा भी देखा गया है कि अनेक लोगों ने अपनी छवि महान नायक की बनाई पर कालांतर में जब भेद खुला तो वह खलनायक कहलाने लगे।

कविवर रहीम कहते हैं कि
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रहिमन ठहरी धूरि की, रही पवन ते पूरि।
गांठ युक्ति की खुलि गई, अंत धूरि की धूरि।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह ठहरी हुई धूल हवा के रहने पर स्थिर नहीं रहती वैसे ही यदि किसी व्यक्ति के कुकृत्य या बुरे विचार का रहस्य खुल जाये तो उसकी सभी निंदा करते हैं।

      चुनावी वैतरणी पार करने के लिये प्रचार की नाव का सहारा सभी लेते हैं।  जो सौम्य व्यक्तित्व के स्वामी हैं उनके प्रति लोग वैसे ही सहृदयता का भाव रखते हैं पर जिनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है उसके प्रति प्रचार देखकर ही अपना दृष्टिकोण बनाते हैं। यही वजह है कि जिन्होंने अपने जीवन में कोई परमार्थ नहीं किया होता वही उच्च पद की लालसा में प्रचार के माध्यम से अपनी छवि भव्य बनाने का प्रयास करते हैं।  कई बार प्रचार के दौरान ही उनकी पोल खुल जाती है पर अनेक लोग समाज की आंखें बचाकर अपना लक्ष्य ही पा लेते हैं।  ऐसे राजसी पुरुषों का निजी कार्यों तक सीमित रहने के कारण किसी को उनकी स्वार्थ वृत्ति का अनुभव नहीं होता पर सार्वजनिक पदों पर उनका चरित्र जाहिर होने लगता है तब लोग हताश हो जाते हैं।  वैसे तो पूरे विश्व में अनेक छद्म समाज सेवकों ने उच्च पद प्राप्त कर अपनी प्रतिष्ठा गंवाई है पर जिन्होंने बहुत प्रचार से लोकप्रियता अर्जित की पर अपना दायित्व निभाने में नाकाम रहे उन्हें उतने ही बड़े अपमान का भी सामना उनको करना पड़ा।
      उच्च पद पर बैठने का प्रयास करना बुरा नहीं है पर इसके लिये लोगों के साथ कोई ऐसी बात नहीं करना चाहिये जो बाद में निरर्थक सिद्ध हो। न ही ऐसे वादे करना चाहिये जिनको पूरा करना स्वयं को ही संदिग्ध लगे। लोगों को यह बात स्पष्ट रूप से समझाना चाहिये कि उनकी समस्याओं का वह निराकरण का पूरा प्रयास करेंगे। उच्च पद पर आने के बाद ईमानदारी से प्रयास भी करना चाहिये वरना लोगों में निराशा का भाव पैदा होता है जो कालांतर में घृणा में बदल जाता है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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