समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label घर परिवार. Show all posts
Showing posts with label घर परिवार. Show all posts

Saturday, February 07, 2015

धन्य है वह लोग जो निष्कामभाव से समाज सेवा करते हैं-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(dhanaya hain vah log jo nishkam bhav se samaj sewa kanrte hain-A Hindu hindi religion thought based on bhartrihari neeti shatak)




            आज के विज्ञापन युग में प्रचार माध्यम पैसा लेकर अनेक प्रतिष्ठित लोगों को देवता बना देते हैं।  इतना ही नहीं अब तो ऐसे कथित स्वयंभू समाजसेवी हो गये हैं जो धनिकों से चंदा लेकर गरीब तथा बेसहारा लोगों में दानवीर बन जाते हैं।  देश में अनेक अशासकीय स्वयंसेवी संगठन बन गये हैं जिनके शीर्ष पुरुष यह दावा करते हैं कि वह निष्काम भाव से समाज सेवा कर रहे हैं।  यह अलग बात है कि वह समाज सेवा के लिये प्राप्त धन से ही अपने गृह खर्च चलाते हैं। उससे ही समाज सेवा के लिये  यात्रायें करते हैं।  अपनी जेब से पैसा निकालकर खर्च करने की बात तो वह स्वयं  कहते भी नहीं है जो कि वास्तव में निष्काम भावी होने का प्रमाण होता है।  अगर हम ऐसे समाजसेवी संगठनों की संख्या देखें तो हमारे देश में गरीबो, मरीजों तथा बेसहारा लोगों की संख्या नगण्य रहना चाहिये पर आंकड़े इस को प्रमाणित नहीं करते। 

भर्तृहरि नीति शतक

-----------------

किं तेन हेमगिरिणा रजतांद्रिणा वा यत्राश्रिताश्च तरवस्तरवस्त एव।

मन्यामहे मलयमेव यदाश्रवेणा कङ्कोलनिन्बकुटजा अपि चन्दनाः स्यूः।।



            हिन्दी में भावार्थ-उस स्वर्ण पर्वत सुमेरु और रजत पर्वत हिमालय से भी क्या लाभ जहां के पेड़ तो पेड़  रहते है। हम तो उस मलय पेड़ को महान मानते हैं जिसके आश्रय में रहने वाले कंकोल, नीम और कुटज आदि वृक्ष चंदनमय हो जाते हैं।

            भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में अंधविश्वासों का कोई स्थान नहीं है यह अलग बात है कि पेशेवर धार्मिक ठेकेदारों ने कर्मकांडों के नाम पर अनेक प्रकार के अंधविश्वास समाज में स्थापित कर दिये हैं जिसे लोग चाहे अनचाहे उनका बोझ ढोते हैं।  इन अंधविश्वासों के विरुद्ध अनेक कथित विद्वान अभियान भी छेड़ देते हैं पर उनका प्रभाव इसलिये नहीं होता क्योंकि वह भारतीय अध्यात्म के तत्वज्ञान का अध्ययन नहीं करते।  उन्हें लगता है कि केवल नारे लगाने से लोग उनकी बात मान लेंगे।  ऐसे लोग भी अपने अभियान के लिये चंदा लेते हैं।  हमारी दृष्टि में तो अगर अंधविश्वास समाप्त करना है तो सत्य का विश्वास कायम करना चाहिये पर यह भी निश्चित है कि पेशेवर लोगों के लिये समाज में भावनात्मक परिवर्तन लाना सहज नहीं है।  भावनात्मक परिवर्तन के लिये हार्दिक प्रयास आवश्यक हैं जिसे आर्य अर्जन की भावना होने पर सहजता से नहीं किया जा सकता।
            ऐसे में धन्य है वह लोग जो प्रचार से परे होकर समाज में न केवल निष्काम भाव से सेवा करते हैं वरन् हार्दिक भाव से उनमें ज्ञान का प्रचार करते हैं।  इन्हीं लोगों की वजह से आज भी भारतीय समाज की पहचान विश्व में बनी हुई है।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका 


Saturday, January 24, 2015

जहां मान है वही रहती अपमान की आशंका-पतंजलि योग सूत्र के आधार पर चिंत्तन लेख(jahan maan hai vahin rahti hai apaman ki aashanka-A Hindu Hindi religion thoughta based on thought article)



            मनुष्य में यह सामान्य प्रवृत्ति रहती है कि वह अपने परिवार, समाज तथा अन्य वर्ग से सम्मान पाना चाहता है। पूज्यता मिलने पर वह न केवल प्रसन्न होता है वरन् उसके मद में डूबकर विचित्र व्यवहार भी करने लगता है।  उसे देश, काल तथा भाग्य के परिवर्तित होने का आभास और अनुमान तक नहीं हो पाता।  कालांतर में जब उसे सम्मान नहीं मिलता तो वह मानसिक संताप का शिकार हो जाता है।  अगर हम योग सिद्धांतों को समझें तो जहां मान है वहीं अपमान, जहां विश्वास है वहीं घात  और जहां वचन है वहीं निराशा की आशंका रहती है।  श्रीमद्भागवत गीता में इसलिये ही सांसरिक विषयों के प्रति निष्काम भाव अपनाने का संदेश दिया है। निष्काम भाव से काम करने पर अनुकूल परिणाम न मिलने पर निराशा नहीं होती वरन् यह संतोष रहता है कि हमने अपना काम पूरे परिश्रम से किया।
पतंजलि योग में कहा गया है कि
---------------
स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्स्मयाकरणे पुनरिष्टप्रसङ्गात्।
            हिन्दी में भावार्थ-संपन्न व्यक्ति से सम्मान मिलने पर प्रसन्न नहीं होना चाहिये क्योंकि उससे अपमानित होने का भय भी उपस्थित रहता है।

            योग साधना के समय आसन तथा प्राणायाम के दौरान साधक ऊपर-नीचे, दायें-बायें तथा सामने-पीछे की तरफ अंगों को घुमाने के साथ ही प्राण भी उसी क्रम में स्थापित करता है। इस तरह के अभ्यास करते करते उसके अंदर यह ज्ञान सहजता से आ जाता है कि किसी कर्म का प्रतिकर्म भी हो सकता है।  उसी तरह वह किसी के व्यवहार से निराश भी नहीं होता क्योंकि वह जानता है कि दुष्कर्म करने वाला  मनुष्य कभी  सद्कर्म की तरफ भी प्रेरित हो ही जाता है।  इस तरह का ज्ञान होने पर मनुष्य का जीवन सहज हो जाता है।  उसे सांसरिक विषयों की चिंता परेशान नहीं करती क्योंकि वह जानता है कि उसकी समस्यायें समय आने पर स्वतः ही दूर हो जायेंगी।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका 


Sunday, January 18, 2015

विभिन्न मतों के द्वंद्वों से दूर रहकर ही शांति प्राप्त करना संभव-अष्टावक्र गीता के आधार पर चिंत्तन लेख(vibhinna maton ke dwandwa se door rahakar hee shandi prapat karna sambhav-a Hindu hindi religion thought based on ashtawakra geeta)



            ऐसा लगता है कि भारत में कुछ कथित प्रतिष्ठित और प्रतिष्ठित धार्मिक ठेकेदारों ने  तय कर लिया है कि वह अपनी अज्ञान पूर्ण वाणी से हिन्दू धर्म के विषय को हास्य सामग्री बनाये बिना मानेंगे नहीं।  कोई भारतीय नारियों को चार तो कोई दस बच्चे पैदा करने का उपदेश दे रहा है।  उनकी दृष्टि एक तरह से हर भारतीय हिन्दू नारी बच्चे उत्पादिन करने वाली एक जीवित मशीन है-हम जैसे अध्यात्मिक योग तथा ज्ञान साधक को यह देखकर हैरानी होती है कि तत्व ज्ञान रखने का दावा करने वाले यह लोग भारतीय समाज को मूर्ख बताकर अपनी अंधबुद्धि का ही प्रदर्शन कर रहे हैं।
            हमारे भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में दृश्यव्य मनुष्य, प्रकृति तथा उनके मूल व्यवहार के सिद्धांतों के साथ ही अदृश्यव्य परमात्मा की चर्चा भी व्यापक रूप से की गयी है। मूल रूप से यह माना गया है कि तत्व ज्ञानी ही सुख की अधिकारी है क्योंकि वह विषयों में निर्लिप्त भाव से सीमित  अपनी इंद्रियों का सीमित संपर्क स्थापित करता है।  अपना कार्य पूर्ण होने पर वह अपना संपर्क समाप्त कर देता है।  ऐसे में यह कथित गेरुए वस्त्रधारी जब तामसी प्रवृत्ति धारण कर समाज की ठेकेदारी करते हैं तो यह चिंता होती है कि तत्व ज्ञान की वजह से हमारा देश पूरे विश्व में  जाना जाता है, कहीं इन लोगों की वजह से यहां की संस्कृति हास्य व्यंग्य का विषय न बन जाये।
अष्टावक्र गीता में कहा गया है कि
----------------
नाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा।
दृष्टवा निर्वेदमापन्न को न शाम्यति।।
            हिन्दी में भावार्थ-महर्षियों, साधुओ और योगियों के अनेक मत होते हैं। इन मतों के  द्वंद्वों से दूर रहने वाला कौन व्यक्ति है जो शांति को प्राप्त नहीं होता।
            यह सही है कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में योगी, सात्विक, राजसी तथा तामसी प्रवृत्तियों के मनुष्यों की उपस्थिति स्वीकार की  गयी है पर सबसे अधिक शक्तिशाली ज्ञान योगियों को माना गया है। वह समाज के बृहद आकार करने की चिंता की बजाय उसे ज्ञान से शक्तिशाली बनाने का प्रयास करते हैं।  ज्ञान का फल सुख और शंाति है।  कथित गेरुए वस्त्रधारी स्वयंभू को सन्यासी लोगों में राजसी और तामसी भाव बढ़ाने वाली प्रेरणा देते हैं।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका 


Thursday, January 01, 2015

ईसवी संवत् 2015 प्रारंभ होने पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख(special hindi hindu thought article on new year 2015)



            1 जनवरी 2015 से नया ईसवी संवत या अंग्रेजी वर्ष प्रारंभ हो रहा है। हालांकि हमारे यहां कैलेंडर इसी अंग्रेजी वर्ष के आधार पर ही छपते हैं पर इन्हीं कैलेंडरों में ही भारतीय संवत् की तारीखें भी सहायक बनकर उपस्थित रहती हैं।  दूसरी बात यह है कि हमारे यहां भारतीय संवत् अनेक भाषाई, जातीय तथा क्षेत्रीय समाज अलग अलग तरीके से मनाते हैं इससे ऐसा लगता है कि इसे मानने वालों की संख्या कम है पर इतना तय है कि भारतीय संवत् ने अभी अपना महत्व खोया नहीं है। फिर हमारे यहां नवधनाढ्य, नवप्रतिष्ठित तथा नवशिक्षित लोगों को समाज से अलग दिखने की प्रवृत्ति होती है-इसे हम नवअभिजात्य वर्ग भी कह सकते हैं। हमारे यहां अंग्रेज चले गये पर अपने प्रशंसक छोड़ गये जिनकी पीढ़ियां नव संस्कार का बोझा ढो रही है।  नये पुराने का अंतद्वंद्व हमारे जैसे अध्यात्मिक चिंत्तकों के लिये व्यंग्य का सृजक बन गया है।  हिन्दी भाषा के वाहक समाचार पत्र तथा टीवी चैनल को अब केवल अपनी भाषा की क्रियायें ही उपयोग करते है जिस कारण उसे  संज्ञा और सर्वनाम के लिये वह बिना झिझक अंग्रेजी करने में जरा भी शर्म नहीं होती। नवअभिजात्य वर्ग को प्रसन्न रखने से ही उनका व्यवसायिक उद्देश्य पूरा होता है।
            हमारे देश में भौतिकता के बढ़ते प्रभाव के कारण एक ऐसे नवअभिजात्य समाज का निर्माण हुआ है जिसके लिये संस्कार, आस्था और धर्म शब्द नारे भर हैं।  अंतर्मुखी चिंत्तन की प्रक्रिया से दूर बाह्य आकर्षण के जाल में फंसे इस नये समाज को वस्तु, व्यक्ति तथा विषय में परिवर्तित रूप से संपर्क की चाहत प्रबल रहती है।  वह इस संपर्क के संभावित प्रभाव का अनुमान किये बिना ही अनुसंधान करने की क्रिया को को जीवन का आधार मानता है।
            31 दिसम्बर की रात्रि को नववर्ष के आगमन में मौज मस्ती की थकावट के बाद 1 जनवरी को प्रातः का उगता सूरज देखना सभी के लिये सहज नहीं है।  31 दिसम्बर की रात्रि के दौरान ही 12 बजे नया वर्ष आता है।  यह उस घड़ी से प्रकट होता है जो अंग्रेजों की ही देन है।  यह अच्छी देन है पर उसमें रात्रि 12 बजे तारीख बदलने की बात स्वीकार करना अंग्रेजी सभ्यता की पहचान है।  भारतीय कैलेंडर की तारीख प्रातः तीन बजे बदलती है-ऐसा एक विद्वान ने बताया था। हमारे देश में ग्रामीण पृष्ठभूमि में पले लोग आज भी तीन बजे ही नींद से उठते हैं।  उनका नींद से उठना ही तारीख बदलना है।  जब जागे तभी सवेरा!  जागे तो फिर सोते नहीं काम पर चलना होता है।  अंग्रेजी वर्ष मनाने वाले जागते हुए दिन बदलते हैं और फिर सो जाते हैं।  सुबह लाने वाला सूरज उन्हें नहीं निहारता।
            हमारे देश में संस्कार किसी एक नियम पुस्तक से नहीं चलते। नियमों का कोई दबाव नहीं है।  व्यक्ति के पास अनेक विकल्प हैं।  वह कोई भी विकल्प चुन सकता है। अपने कर्म से वह कितनी भौतिक सफलता प्राप्त करता है यह चर्चा का विषय हो सकता है पर किसी के लिये आदर्श नहीं बन सकता।  आदर्श वह बनता है जो दूसरों को भी सफलता के लिये प्रेरित करे। दूसरों की सफलता पर भी हार्दिक रूप से प्रसन्न प्रकट करे। नवअभिजात्य वर्ग के लिये केवल अपनी सफलता और उसका प्रचार ही एक ध्येय बन गया है।  अब समाज कथित रूप से  अभिजात्य और पिछड़ा दो वर्गों में दिखता है।  सुविधा के लिये हम कह सकते हैं कि एक गाड़ी के दो पहिये हैं पर सच यह है कि दोनों के बीच विरोधाभास है।  कथित अभिजात्य वर्ग धन, पद और प्रतिष्ठा के मद में मदांध होकर शेष समाज को पिछड़ा मानता है। पिछड़ा उसकी इस दृष्टि से अपने अंदर घृणा का भाव पाले रहता है। यह द्वंद्व हमेशा रहा है पर नव संस्कृति के प्रभाव ने उसे अधिक बढ़ा दिया है। यही कारण है कि जहां  सभी जगह अभिजात्य स्थानों पर नव वर्ष की बधाई का दौर चलता है वहीं उनसे परे होकर रहने वालों के लिये एक दिन के आने और जाने से अधिक इसका महत्व नहीं होता।  हमारे देश में ऐसे ही लोगो की संख्या ज्यादा है। तब एक देश में दो देश या एक समाज में दो समाज के बीच का विभाजन साफ दिखाई देता है।
प्रस्तुत है इस अवसर पर एक कविता
-------------------

शराब पीते नहीं
मांस खाना आया नहीं
वह अंग्रेजी नये वर्ष का
स्वागत कहां कर पाते हैं।

भारतीय नव संवत् के
आगमन पर पकवान खाकर
प्रसन्न मन होता है
मजेदार मौसम का
आनंद भी उठाते हैं।

कहें दीपक बापू विकास के मद में,
पैसे के बड़े कद में,
ताकत के ऊंचे पद मे
जिनकी आंखें मायावी प्रवाह से
 बहक जाती हैं,
सुबह उगता सूरज
देखते से होते वंचित
रात के अंधेरे को खाती
कृत्रिम रौशनी उनको बहुत भाती है,
प्राचीन पर्वों से
जिनका मन अभी भरा नहीं है,
मस्तिष्क में स्वदेशी का
सपना अभी मरा नहीं है,
अंग्रेजी के नशे से
वही बचकर खड़े रह पाते हैं।
-----------

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका 


Saturday, November 22, 2014

कबीर पंथ पर फकीर ही चल सकते हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख(kabir pant par faqir hi chal sakte hain-hindi thought article)




            हमारे देश में महापुरुषों के नाम पर बहुत सारे पंथ बन गये हैं। इसमें आजकल कबीर पंथ की बहुत चर्चा है।  संत कबीर दास जी ने हमेशा ही भक्ति तथा ज्ञान साधना को एकांत का विषय बताया है। इतना ही नहीं उन्होंने धर्म के नाम पर ठेकेदारी करने वाले कथित संतों पर भी तीखे कटाक्ष किये हैं।  हैरानी की बात यह है कि भगवान नाम स्मरण से ही संसार सागर को पार करने का संदेश देने वाले संत कबीर के नाम पर भी पंथ चलाकर भीड़ का एकत्रीकरण होता रहा है।  संत कबीर ने कभी कोई अपना संगठन या आश्रम बनाया  अथवा शिष्यों को दीक्षा देने का कोई नाटक किया हो इसका उदाहरण नहीं मिलता।  उनकी रचनायें भी शिष्यों की बजाय संपूर्ण समाज को संबोधित करती हैं।
            हरियाणा के एक कथित संत ने पूज्यनीय कबीर का जितना मखौल बनाया है उसका उदाहरण आज तक नहीं देखा गया। कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिये उन्होंने अपने आश्रम के बाहर भक्तों और शिष्यों को एकत्रित कर लिया है ताकि वहां पुलिस प्रविष्ट न हो सके। हथियार बंद लोग न केवल अपने कथित गुरू को बचाने का प्रयास करते वरन् पुलिस पर हमले भी कर रहे थे।  संत के पकड़े जाने के बाद उनके महलनुमा आश्रम से अनेक प्रकार के हथियार तथा अन्य आपत्तिजनक वस्तुऐं बरामद होने के समाचार आ रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम का न तो अध्यात्मिक दर्शन और नही  उन महान संत कवि कबीर दास जी के संदेशों से संबंध है जिन्हें हमारा ज्ञानी समाज अपनी अनमोल धरोहर मानता है।

संत कबीर कहते हैं कि
------------
गुरुवा तो घर घर फिरै, दीक्षा हमरी लेहु।
कै बूड़ौं कै ऊबरौ, टका पर्दनी देहु।।
            हिन्दी में भावार्थ-गुरू तो घर घर फिर अपनी दीक्षा देने के लिये फिरते हैं। उनका केवल धन से मतलब होता है शिष्य उबरे या डूबे इससे उनका कोई मतलब नहीं होता।
सतगुरु ऐसा कीजिये, जाके पूरन मन्न।
अनतोले ही देत है नाम सरीखा धन्न।
            हिन्दी में भावार्थ-गुरु तो वही हो सकता है जिसका मन भरा हुआ है तथा वह बिना तोले ही नाम स्मरण जैसा धन देते हैं।

            कबीर ने संपूर्ण भारतीय समाज को एक इकाई माना है।  वह एक छोटे समूह का प्रतिनिघित्व नहीं करते थे वरन् उन्हें भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में एक ऐसा महापुरुष माना जाता है जिसकी चर्चा के बिना कोई ज्ञानी संत वाणी से से निकले शब्द समूह को अधूरा ही मानता है। आज हम जब कबीर पंथ के नाम पर चले ऐसे धार्मिक संगठनों या कथित संतों की क्रियायें देखते हैं तो लगता है कि वह दोहरे अपराध में लिप्त हैं-एक तो उनका नाम लेकर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के सिद्धांतों की आड़ में भ्रम फैलाना दूसरा कानून से  अपने आप को बड़ा समझकर न्याय सिद्धांतों का अपमान करना।  इस दोहरे अपराध की सजा भी दोहरी होना चाहिये। जिस अपराध पर कानूनी कार्यवाही होनी है वह तो करना ही चाहिये साथ ही उन पर धर्म को अपमानित करने का मामला भी दर्ज किया जा सकता है। हालांकि इसी बची यह भी खबर आयी है कि जिस तरह आश्रम से पुलिस पर आक्रमण किया गया उससे उस कथित संत पर राष्ट्रद्रोह का मामला दर्ज किया गया है।  एक कथित कबीर पंथी अगर वास्तव में अपनी राह चला होता तो कभी भी ऐसी नौबत नहीं आती।  अब तो उनके भक्त भी उन्हें छोड़कर जाते हुए यह कह रहे हैं कि वह कभी इस आश्रम में नहीं आयेंगे।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका 


Thursday, November 06, 2014

भारतीय अध्यात्मिक पंरपरा में श्रीगुरुनानक देव का महान योगदान अविस्मरणीय-प्रकाश पर्व पर विशेष हिन्दी लेख(bhartiya adhyatmik parampara mein shri guru nanak dev ka mahan yogadan avismarniy-prakash parva par visheh hindu lekh, A Specila hindi article on birth day of shri guru nanak dev prakash parva)



           
            आज श्री गुरुनानक देव जी का 546 वां प्रकाश पर्व मनाया जा रहा है। गुरूनानक देव जी ने भारतीय अध्यात्मिक परंपरा की रक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वैसे तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन प्रारंभ से ही तत्वज्ञान धारण कर उसक अनुसार जीवन जीने के संदेश देता है पर कथित विद्वान इसकी आड़ में कर्मकांडों के नाम पर समाज को अंधविश्वास की तरफ ढकेल देते हैं। श्रीगुरुनानक देव ने इन्हीं अंधविश्वासों पर प्रहार करते हुए हृदय से परमात्मा की भक्ति करने की जो प्रेरणा के साथ ही समाज के कमजोर तथा गरीब वर्ग की सहायता की जो प्रेरणा दी वह अनुकरणीय है।
            श्रीगुरुनानक देव जी ने स्वयं किसी धर्म की स्थापना नहीं की। उनके बाद आये गुरुओं ने अपने समय की संक्रमित स्थितियों  को देखकर सिख पंथ की स्थापना का भी  भारतीय धर्म और संस्कृति कि रक्षा के लिये ही  की थी। श्रीगुरुनानक देव जी का जीवन सदैव समाज चिंतन और सुधार में बीता। बहुत कम लोग हैं जो आज के सभ्य भारतीय समाज में उनकी भूमिका का सही आंकलन कर पाते हैं। उनके काल में भारतीय समाज अंधविश्वासों और कर्मकांडों के मकड़जाल में फंसा हुआ था। कहने को लोग भले ही समाज की रीतियां निभा रहे थे पर अपने धर्म और संस्कृति कि  रक्षा के लिये उनके पास कोई ठोस योजना नहीं थी। राजनीतिक रूप से विदेशी आक्रांता अपना दबाव इस देश पर बढ़ा रहे थे। इन्हीं आक्रान्ताओं  के  साथ आये कथित विद्वान सामान्य जनों  को अपनी विचारधारा के अनुरूप माया मोह की तरफ दौड़ाते दिखे। देश के अधिकतर राजाओं का जीवन प्रजा की भलाई की बजाय अपने निजी राग द्वेष में बीत रहा था। वह राज्य के व्यवस्थापक का कर्तव्य निभाने की बजाय उसके उपभोग के अधिकार में अधिक संलग्न थे। यही कारण था कि जन असंतोष के चलते विदेशी राजाओं ने उनको हराने का सिलसिला जारी रखा। इधर सामान्य लोग भी अपने कर्मकांडो में ऐसे लिप्त रहे उनके लिये ‘कोई नृप हो हमें का हानि’ की नीति ही सदाबहार थी।
      मुख्य विषय यह था कि समाज धीरे धीरे विदेशी मायावी लोगों के जाल में फंसता जा रहा था और अपने अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति उसका कोई रुझान नहीं था। ऐसे में महान संत श्री गुरुनानक देव जी ने प्रकट होकर समाज में अध्यात्मिक चेतना जगाने का जो काम किया वह अनुकरणीय है। वैसे महान संत कबीर भी इसी श्रेणी में आते हैं। हम इन दोनों महापुरुषों का जीवन देखें तो न वह केवल रोचक, प्रेरणादायक और समाज के लिये कल्याणकारी है बल्कि सन्यास के नाम पर समाज से बाहर रहने का ढोंग करते हुए उसकी भावनाओं का दोहन करने वाले ढोंगियों के लिये एक आईना भी है| गुरुनानक देव और कबीरदास जी  के भक्त ही उनका ज्ञान धारण  कर इस असलियत को समझ  सकते हैं। इन दोनों महापुरुषों ने पूरा जीवन समाज में रहकर समाज के साथ व्यतीत किया। भारतीय अध्यात्मिक संदेश अपने पांवों पर अनेक स्थानों घूमते हुए सभी जगह फैलाया। श्री गुरुनानक देव जी तो मध्य एशिया तक की यात्रा कर आये।
श्री गुरुनानक देव जी के सबसे निकटस्थ शिष्य मरदाना को माना जाता है जो कि जाति से मुसलमान थे। आप देखिये गुरुनानक देव जी के तप का प्रभाव कि  उन्होंने अपना पूरा जीवन गुरुनानक जी के सेवा में गुजारा। इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि मरदाना ने कभी  अपना धर्म छोड़ने या पकड़ने का नाटक किया। दरअसल उस समय तक धर्म शब्द के साथ कोई संज्ञा या नाम नहीं था। मनुष्य यौनि मिलने पर संयम, परोपकार, दया तथा समभाव से जीवन व्यतीत किया जाये-यही धर्म का आशय था।
      आज धर्मों के जो नाम मिलते हैं वह पेशेवर धार्मिक ठेकेदारों एक सोचीसमझी साजिश के तहत समाज को बांटकर उस पर शासन करने की नीति का परिणाम है।
श्रीगुरुनानक देव जी के समय इस देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक दृष्टि से संक्रमण काल था। वह जानते थे कि भौतिकवाद की बढ़ती प्रवृत्ति ही इस समाज के लिये सबसे बड़ा खतरा है, जिसमें धार्मिक कर्मकांड और अंधविश्वास अपनी बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इससे व्यक्ति की चिंतन क्षमता का ह्रास  होता है और वह बहिर्मुखी होकर दूसरे का गुलाम बन जाता है। भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता मनुष्य को दास बना देती है। अधिक संचय की प्रवृत्ति से बचते हुए दान, सेवा और परोपकार करने से ही समाज समरसता आयेगी जिससे शांति और एकता का निर्माण होगा-यही उनके संदेशों का सार था। सबसे बड़ी बात उनका जोर व्यक्ति निर्माण पर था। हम अगर इस पर विचार करें तो पायेंगे कि व्यक्ति मानसिक रूप से परिपक्व, ज्ञानी और सजग होगा तो भले ही वह निर्धन हो उसे कोई भी दैहिक तथा मानसिक रूप से बांध नहीं सकता। यदि व्यक्ति में अज्ञान, अहंकार तथा विलासिता का भाव होगा तो कोई भी उसे पशु की तरह बांध कर ले जा सकता है। आज हम देख सकते हैं कि टीवी चैनलों पर कल्पित पात्रों पर लोग किस तरह थिरक रहे हैं। उसी में अपने नये भगवान बना लेते हैं। कई युवक युवतियों यह कहते हुए टीवी पर देखे जा सकते हैं कि हम तो अमुक बड़ी हस्ती को प्यार करते हैं। यह अध्यात्मिक ज्ञान से दूरी का परिणाम है। इसलिये आवश्यकता इस बात है कि बजाय हम इस बात पर विचार करें कि दूसरे धर्म के लोग हमारे विरोधी हैं इस बात पर अधिक जोर देना चाहिये कि हमारे समाज का हर सदस्य दिमागी रूप से परिपक्व हो। अध्यात्मिक रूप से अपरिपक्व युवक हो युवती समाज रक्षा में सहयोगी नहीं बन सकते।
      इस देश की मुख्य समस्या यह है कि मनुष्य ही मनुष्य का पशु रूप में दोहन करता है।

श्री गुरुनानक देव जी ने इसी तरफ इशारा करते हुए कहा है कि
--------------------------

‘जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु।’

     हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य का ही रक्त पीता है उसका चित कैसे निर्मल हो सकता है।

      ‘खावहि खरचहि रलि मिलि भाई।
तोटि न आवै वधदो जाई।।;;

     हिंदी में भावार्थ- भाई, सभी मिलकर खर्च करो और खाओ। इससे टोटा नहीं पड़ता बल्कि वृद्धि होती है।’
      ऐसे एक नहीं हजारों संदेश है जो आज के संदर्भ में ही उतने प्रासंगिक हैं जितने उनके इस धरती पर प्रकट रहते हुए थे। ऐस महान संत श्री गुरुनानक देव जी का स्मरण करने मात्र से हृदय प्र्फुल्लित हो उठता है। उनका जीवन इसलिये भी प्रेरक है क्योंकि उन्होंने उसे सामान्य मनुष्य की तरह बिताया। ऐसे महान संत को कोटि कोटि प्रणाम। वाहे गुरु की जय, वाहे गुरु की फतह।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका 


Wednesday, October 29, 2014

सात्विक जीवन जीना भी तप है-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(satwik jeevan jeena bhee tap hai-A hindu hindi religion thought based on manusmriti)




            हमारे देश में श्रीमद्भागवत गीता जैसे पवित्र ग्रंथ भी है जो जीवन जीने की कला सिखाता है पर आश्चर्य इस बात का है कि धर्म के कथित ज्ञाता उसी के ज्ञान के नाम पर भारी भ्रम फैलाते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में गुरु की सेवा करने की बात कही गयी है यह उचित भी है। यह अलग बात है कि श्रीमद्भागवत गीता में तत्वज्ञान देने वालों को ही गुरु मानने का संकेत दिया गया है।  दैहिक गुरु न होने पर श्रीगीता का अध्ययन करने पर भी जीवन सुख मिलने की प्रेरणा भी दी गयी है। यह अलग बात है कि श्रीमद्भागवत गीता में गुरु सेवा के संदेश की आड़ में अनेक पाखंडी अपने पांव छुआकर लोगों को स्वर्ग दिलाने का आश्वासन देते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में पवित्र ग्रंथों के अध्ययन को भी तप माना गया है।  उनके शब्दों को ही गुरु रूप भी कहा गया है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि
-----------
वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्स्यन् द्विजोनामः।
वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते।।
            हिन्दी में भावार्थ-संसार में वेदों की शिक्षानुसार अपने जीवन को व्यतीत करने से बड़ा कोई तप नहीं है, यदि कोई मनुष्य वास्तव में तप करना चाहता है तो उसे वेदों का अध्ययन करना चाहिये।

            तप के नाम पर द्रव्यमय हवन और यज्ञों को ही प्रचारित किया जाता है ताकि उससे धर्म से चलने वाले व्यापार में आथ्रिक लाभ हो।  श्रीमद्भागवत गीता में प्राणायाम को भी यज्ञ कहा गया है। योग साधना में अपनी ही देह में उत्पन्न ऊर्जा से हवन करने पर अमृत की अनुभूति का अनुभव वाले साधक को भी एक तपस्वी माना गया है। जबकि देखा यह गया है कि द्रव्यमय यज्ञ में खीर या अन्य खाद्य पदार्थ को प्रसाद को अमृत कहकर खाने के लिये लोग तत्पर रहते हैं। अमृत का केवल भौतिक स्वरूप मानने वाले ज्ञानी नहीं हो सकते यह बात तय है। अमृत का आशय है कि सुखानुभूति से भी है यह बात ज्ञान साधक जानते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ माना जाता है। ज्ञानमय यज्ञ से पैदा अमृत मुख से नहीं वरन् आज्ञा चक्र से ग्रहण किया जाता है।
            हमारे यहां अनेक ऐसे महापुरुष ऐसे हुए हैं जिन्हें दैहिक गुरु की बजाय परमात्मा या फिर पवित्र ग्रंथों को अपना गुरु बनाकर तप किया और समाज को एक नयी दिशा दी। उनसे प्रेरणा लेकर  कभी भी दैहिक गुरु न मिलने से निराश होकर बैठने की बजाय पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिये।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

८.हिन्दी सरिता पत्रिका 


अध्यात्मिक पत्रिकायें

वर्डप्रेस की संबद्ध पत्रिकायें

लोकप्रिय पत्रिकायें