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Thursday, December 27, 2012

यजुर्वेद के आधार पर चिंत्तन-प्रगतिशील मनुष्य को सभी लोग मानते हैं (yajurved ke aadhar par chittan-pragatishil manushya ko sabhi log mante hain)

                 इस संसार में अनेक महान विद्वान लोग हुए हैं जिनका सम्मान आज का मानव समाज करता है।  उन विद्वानों, विचारकों और वैज्ञानिकों को मनुष्य समाज कभी नहीं भूलता जो उसके दैहिक तथा मानसिक विकास के संवाहक रहे हैं।  इस संसार में अनेक राजा महाराजा हो गये पर समाज केवल उन्हीं लोगों को याद करता है जिन्होंने इस समाज के लिये चिंत्तन करने के साथ ही ऐसे अनुसंधान किये जिनसे मनुष्य का शारीरिक तथा मानसिक विकास हुआ।
      हम अगर थोड़ा ज्ञान प्राप्त कर देखें तो पता चलेगा कि यहां बोलने वाले बहुत हैं पर उनमें ज्ञान कितना है यह वह प्रमाणित नहीं कर पाते।  दरअसल इस संसार में अधिकतर लोग कुछ भी बोलने को आतुर हैं पर कोई किसी की सुनना नहीं चाहता।  श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि इंद्रिया ही विषयों में बरतती हैं। यह ज्ञान बघारने वाले कदम कदम पर मिल जाते हैं पर इसके बावजूद छोटी छोटी बातों पर मुंहवाद होते होते हिंसक वारदातें हो जाती हैं।  अनेक बार तो ऐसा भी होता है कि भारी भरकम हिंसा के बाद पता चलता है कि विषय इतना गंभीर नहीं था जितना संघर्ष हुआ। संत कबीरदास जी कह गये हैं कि ‘सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठा’।
यजुर्वेद में  कहा गया है कि
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इष्टं वीतमभिगूर्त वर्षट्कुतं देवासः प्रतिगृभ्णन्त्यश्वम्।
हिन्दी में भावार्थ-परिश्रमी तथा प्रगतिशील होने के साथ ही सभी को प्रिय लगने वाले व्यक्ति के प्रति सभी मनुष्य हृदय  में आस्था रखते हैं।

धिया विप्रो अजायत।
हिन्दी में भावार्थ-विद्वान उत्तम बुद्धि से युक्त होता है।
      समाज में रहते हुए छोटे छोटे  विवादों में फंसने  से अच्छा है कि समय समय पर चिंत्तन और मनन अवश्य कर अपना बौद्धिक विकास करें । मानसिक  और वैचारिक शुद्धता के लिये अपने दिन का कुछ समय सत्संग और अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने में लगायें।  मंदिर जाकर ध्यान लगायें।  यह सही है कि सभी जगह पत्थर की मूर्तियां हैं पर हमारे हृदय का भक्ति भाव उनमें भगवान की अनुभूति करता है जिससे हम मानसिक रूप से दृढ़ होते है।  भगवान है या नहीं इस बात पर तो विचार ही नहीं करना चाहिये।  न ही इस पर किसी से विवाद करना चाहिये। वह है और हमारे हृदय के अंदर स्थित है यह धारणा दूसरों पर थोपने की बजाय अपनी मानसिक स्थिति पर नियंत्रण करने में उपयोग करना चाहिये।  जब आदमी अपने मन पर नियंत्रण कर लेता है तब वह विद्वान तथा पराक्रमी होकर अन्य लोगों के लिये प्रेरक बनता है।  निरर्थक वार्तालाप, घूमना फिरना तथा अधिक मनोरंजन में समय बिताना मनुष्य को अत्यंत आकर्षक लगने के साथ सहज भी लगता है पर इससे बौद्धिक क्षरण होता है। जबकि विद्वान, पराक्रमी और परोपकारी समाज का नेतृत्व करते है। अन्य लोग उनके जीवन तथा व्यवहार शैली को अनुकरणीय मानकर सम्मानित करते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Monday, December 24, 2012

मनुस्मृति-अहिंसा के भाव से मन एकाग्र होता है (manu smriti-ahinsa ke bhav se man ekagra hota hai)

            जीवन में सुख पाने का सीधा मार्ग यही है कि दूसरे को प्रसन्नता प्रदान करो। यह सिद्धांत न केवल मनुष्य बल्कि पशु पक्षियों के प्रति भी अपनाया जाना चाहिये।  एक बात याद रखें कि मनुष्यों के अलावा भी अन्य जीवों में  वैसी ही आत्मा होती है।  मनुष्य बोल सकता है पर अन्य जीव मूक भाव से हमारी तरफ देखते हैं।  कहा जाता है कि भोजन, काम, तथा अन्य संवेदनशील प्रवृत्तियाँ  पशु पक्षियों में भी होती है।  जिस तरह सताये जाने पर मनुष्य का मन रंज होता है वैसे ही पशु पक्षियों में निराशा, कातरता तथा क्रोध के भाव आते हैं।  सताये जाने पर वह आर्त भाव से मनुष्य की तरफ देखते हैं। इसलिये मनुष्य को न केवल मनुष्य  बल्कि पशु पक्षियों के प्रति भी अहिंसक भाव रखना चाहिए।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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ये बन्धन्वधक्लेशान्प्राणिनां न विकीर्शति।
स सर्वस्य हितप्रेप्सुः सुखामत्यन्तमश्नुते।।
               हिन्दी में भावार्थ- जो व्यक्ति दूसरे जीव को बांध कर नहीं रखता और न उसका वध करता है और नही किसी प्रकार की पीड़ा देता है वह सदा सुखी रहता है।
यद्ध्यायति यत्कुकते धृर्ति वध्नाति यत्र च।
तद्वाप्नोत्यत्नेन या हिनस्ति न किञ्चन।।
हिन्दी में भावार्थ-जो व्यक्ति अहिंसा धर्म में स्थित है वह जिस विषय पर चिंत्तन करता है उसमें सफलता प्राप्त कर लेता है। अहिसा भाव के कारण वह अपना ध्यान अपने कर्म में एकाग्रता से लगाता है इसलिये बिना विशेष प्रयास के लक्ष्य प्राप्त कर लेता है।
        जब कोई मनुष्य अपने हृदय में शुद्ध भाव धारण कर लेता है तब उसकी अध्यात्मिक शक्ति स्वतः बढ़ जाती है।  उसका  ध्यान अपने कर्म पर इतनी एकाग्रता से लगता है कि उसका लक्ष्य उसे बिना किसी विशेष प्रयास और किसी अन्य की सहायता लिये बिना प्राप्त हो जाता है।  इस संसार में ध्यान की शक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि चिड़िया अपने बच्चों को अपनी ध्यान शक्ति से ही पालती है।  अहिंसा के भाव में स्थित मनुष्य के मस्तिष्क में अच्छे सत्विचारों का केंद्र बिन्दु बन जाता है जिससे उसके अंदर नये नये कार्य करने के साथ ही समाज के लिये भी कुछ कर गुजरने का माद्दा पैदा होता है।  कहने का अभिप्राय यह है कि यह संसार हमारे संकल्प से बनता है और इसलिये ऐसे विषयों से संपर्क रखना ही श्रेयस्कर होगा जिनसे हमारी ध्यान शक्ति प्रबल हो।  यदि ध्यान भटकाने वाले विषयों से संपर्क कोई व्यक्ति बढ़ायेगा तो वह न केवल अपने कार्य में नाकाम होगा बल्कि समाज में निंदा का पात्र भी बनेगा।    
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, December 21, 2012

अथर्ववेद से संदेश-शूरवीर की तरह सूर्योदय से पहले जागें (atharvved se sandesh-shurvir ki tarah prat:kal jagen)

           इस संसार में प्रत्येक मनुष्य को संघर्ष करना ही पड़ता है।  इस  संघर्ष में जय पराजय का आधार मनुष्य के अंदर विद्यमान शारीरिक और मानसिक क्षमतायें होती हैं।  जिनका संकल्प दृढ़ होने के साथ हृदय  में कर्म करने से प्रतिबद्धता है वह व्यक्ति हमेशा ही सफल होता है।  यह बात कहने में अत्यंत सहज लगती है पर इसका व्यवहारिक पहलू यह है कि हमें अपने जीवन में ऐसी दिनचर्या अपनाना चाहिये जो शारीरिक तथा मानसिक शक्ति में वृद्धि करने में सहायक  हो।  जीवन में न केवल शारीरिक शक्ति का होना आवश्यक है बल्कि उसके साथ मनुष्य को मानसिक रूप से भी शक्तिशाली होना चाहिए।
            हमारे अध्यात्मिक दर्शन में ब्रह्म मुहूर्त में उठना जीवन के लिये सबसे ज्यादा उत्तम माना जाता है।  हमारे महान पूर्वजों ने जिस अध्यात्मिक ज्ञान का संचय किया है वह सभी प्रातःकाल उठने को ईश्वर की सबसे बड़ी आराधना माना जाता है। इससे तन और मन में शुद्धता रहती है।  प्रातःकाल का समय धर्म का माना जाता है और इस दौरान योगासन, ध्यान और मंत्रजाप कर स्वयं को अध्यात्मिक रूप से दृढ़ बनाया जाना आवश्यक है। 
अथर्ववेद  में कहा गया है कि 
व्यार्त्या पवमानो वि शक्रः पाप हत्यथा।।
           हिन्दी में भावार्थ- तन और मन में शुद्धता रखने वाला मनुष्य पीड़ाओं से दूर रहता तो पुरुषार्थी दुष्कर्म करने से बचता है।
ओर्पसूर्यमन्यातस्वापाव्युषं जागृततादहमिन्द्र इवारिष्टो अक्षितः।
             हिन्दी में भावार्थ- दूसरे लोग भले ही सूर्योदय तक सोते रहें पर शूरवीर सदृश नाश और क्षय रहित होकर समय पर जागे।
      जब देह और मन में शुद्धता होती तब आदमी स्वयं ही सत्यकर्म के लिये प्रेरित होता है।  पुरुषार्थी मनुष्यों को सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वह पाप कर्मों पर कभी नहीं विचार करते। आजकल हम समाज में जो अपराध की बढ़ती प्रवृत्ति देख रहे हैं उसके पीछे दो ही प्रकार के लोग जिम्मेदार दिखाई देते हैं। एक तो वह लोग जिनके पास कोई काम नहीं है यानि वह बेकार है दूसरे वह जिनको काम करने की आवश्यकता ही नहीं है यानि वह निकम्मे हैं।  यह बेकार और निकम्मे ही मिलकर अपराध करते हैं।  हम जब जब सभ्य समाज की बात करते हैं तो वह पुरुषार्थी लोगों के कंधों पर ही निर्भर करता है। हृदय में शुद्ध और देह में दृढ़ता होने पर कोई भी लक्ष्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, December 15, 2012

सामवेद से सन्देश-देवता केवल कर्मशील मनुष्य को ही प्रेम करते हैं (dewta kewal karmshil manushya ko prem karte hain)

         ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की तो देवता तथा मनुष्यों की उत्पति हुई।  उन्होंने कहा कि मनुष्य देवताओं की आराधना करें तो देवता मनुष्य को उसका  फल देंगे। अध्यात्म और सांसरिक विषयों के बीच जीव की देह पुल का काम करती है। सांसरिक विषयों में सहजता से संबंध रखना आवश्यक है। इसलिये आवश्यक है कि उन विषयों से संबंधित कार्य करते हुए हृदय में शुद्धि हो। सांसरिक विषयों में फल की कामना का त्याग नहीं किया जा सकता  पर उसके लिये ऐसे गलत मार्ग का अनुसरण भी नहीं किया जाना चाहिए जिससे बाद में संकट का सामना करना पड़े।  दूसरी बात यह भी है कि अपने कर्म के परिणाम की आशा दूसरे का दायित्व नहीं मानते हुए आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए।। 
सामवेद में कहा गया है कि
..................................
देवाः स्वप्नाय न स्पृहन्ति।
 

हिन्दी में भावार्थ-देवता आलसी मनुष्य को प्रेम नहीं करते।
देवाः सुन्वन्तम् इच्छान्ति। 
हिन्दी में भावार्थ-देवता कर्मशील मनुष्य को ही  प्रेम  करते हैं।
           जीवन को सुचारु रूप से चलाने क्रे लिये कर्मशील होना आवश्यक है। आलस्य मनुष्य का शत्रु माना जाता है। देह से परिश्रम न करना ही आलस्य है यह सोचना गलत है वरन् मस्तिष्क को सोचने के ले कष्ट देने से बचना भी इसी श्रेणी में आता है। आधुनिक सुविधाभोगी जीवन ने आदमी की देह के साथ ही उसके मस्तिष्क की सक्रियता पर भी बुरा प्रभाव डाला है। लोग प्रमाद तथा व्यसन में अधिक रुचि इसलिये लेते हैं कि उनके मस्तिष्क को राहत मिले। यही राहत आलस्य का रूप है।  इससे बचना चाहिए। अध्यात्म ज्ञान प्राप्त करने यह आलस्य स्वमेव दूर होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, November 14, 2012

पतंजलि योग विज्ञान-अभाव के ज्ञान का अवलम्बन करने वाली वृत्ति निद्रा है(patanjali yog vigyan-abhav ke gyan ko dharan karane wali vritti nidra hai)

       पतंजलि योग वास्तव में ऐसा विज्ञान है जिस पर नवीन युग में अनुसंधान करना आवश्यक है।  हम यह नहीं कह सकते कि  इसका वर्तमान समय में  कोई महत्वनहीं है क्योंकि हम देख रहे हैं कि आधुनिक विज्ञान अभी भी पूर्णता का दावा नहीं कर सकता।   विषय चाहे अध्यात्मिक हो या सांसरिक उसे अपनी इस देह के साथ ही जोड़ा जा सकता है इसलिये किसी भी विषय को जीव से प्रथम नहीं किया जा सकता।   यह देह पूरे संसार से जुड़ी है और अगर हम पाश्चात्य विज्ञान की बात माने तो इस प्रथ्वी पर मौजूद हर वस्तु का अंश इस देह में होता है।  इसलिये संसार को समझने के लिये अपनी देह को समझना जरूरी है। उसमें मौजूद प्रकृतियों का अध्ययन करने पर इस संसार का रहस्य सहजता से समझा जा सकता है। निष्कर्ष निकालने के लिये कहीं अन्यत्र प्रयोग करने की आवश्कता नहीं है उन्हें हम स्वतः अनुभव कर सकते हैं।  इतना ही नहीं इसके सूत्रों को समझने पर जब व्यवहार में उसे देखते हैं तो लगता है कि वास्तव में यह ऐसा विज्ञान है जिसके बिना मनुष्य का ज्ञान अधूरा है।
       पतंजलि में चित्त के यह सूत्र मनोविज्ञान की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वृत्तयः पञ्चतथ्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः।।
             हिन्दी भावार्थ-क्लिष्ट और अक्लिष्ट वृत्तियां पांच प्रकार की होती हैं।
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः
         हिन्दी में भावार्थ-यह है प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति।
प्रत्यक्षानुमानागामः प्रमाणानि।।
        हिन्दी में भावार्थ-प्रमाण के तीन प्रकार हैं प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम
       विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतदृुप्रतिष्ठम्।।
         हिन्दी में भावार्थ-वह वस्तु वैसी नहीं है जैसी समझ रहे हैं यह भ्रम विपर्यय है।
शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः।।
           हिन्दी में भावार्थ-जो ज्ञान शब्द के साथ होने वाला है जिसका विषय वास्तव में नहीं वह विकल्प है।
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिनिंद्रा।।
           हिन्दी में भावार्थ-अभाव के ज्ञान का अवलम्बन करने वाली वृत्ति निद्रा है।
अनुभूतविषयास्पभ्प्रभोषः स्मृतिः।।
         हिन्दी में भावार्थ-अनुभव किये हुए विषय का प्रकट हो जाना स्मृति है।
         इस संसार में अनेक प्रकार के भ्रम प्रचलित है।  अनेक प्रकार के मंत्र तंत्र करने वाले समाज में भ्रम पैदा करते हैं।  देखा जाये तो यह संसार चलायमान है। अनेक विषय ऐसे हैं जिनका संबंध समय से है  जिसकी वजह से लोगों को सांसरिक कार्य स्वतः होते हैं।  कहा जाता है कि परमात्मा पहले दाना बनाता है फिर जीव में पेट लगाता है। अगर किसी आदमी के मन में यह इच्छा कि उसका धंधा लग जाये तो समय आने पर वह सफल भी होता है पर अगर उसने इस दौरान कहीं मन्नत मांगी होती है या किसी ने सिद्धि का मंत्र बताया होता है तो वह मानने लगता है कि यह सब चमत्कार है। योग साधक और अध्यात्मिक ज्ञान के छात्र इस बात को जानते हैं यही कारण है कि वह चमत्कार आदि में यकीन नहीं करते।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ ग्वालियर मध्यप्रदेश

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Sunday, November 04, 2012

चाणक्य नीति-दंड की कठोर व्यवस्था न होने से अपराधी बेखौफ हो जाते हैं

                कहा जाता है कि फिट है वही हिट है। दरअसल भौतिक उपलब्धियों के लिये जुटा इंसान न तो अपनी देह को स्वस्थ रखने के लिये प्रयास करता है और न ही अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर आत्मबली हो पाता है। जीवन में एक बार ऐसा समय अवश्य ही आता है जब वह थक जाता है। यह थकावट उसे वृद्धावस्था में ही पहुंचा देती है। ऐसे में शारीरिक तथा आत्मिक रूप से क्षीण होकर मनुष्य के पास आर्तनाद करने के अलावा कोई मार्ग शेष नहीं रह जाता। हमारे देश में व्यायाम आदि को कभी आदत की तरह नहीं अपनाया गया। अपनी ही योग कला को केवल सिद्धों तथा नकारा लोगों के लिये आवश्यक माना गया है। यही कारण है कि आजकल हम अपने आसपास शारीरिक तथा दिमागी रूप से विकारग्रस्त लोगों का से भरा समाज देख रहे हैं।
                       महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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                        यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैंव धनऽऽगमः।
                       निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति।।
            ‘‘जिसके नाराज होने पर किसी प्रकार का भय नहीं हो और नही प्रसन्न होने पर किसी फल की आशा है और जो दण्ड देने का सामर्थ्य भी नहीं रखता वह गुस्सा होकर कर भी क्या लेगा?’’
                  पश्चिमी आधार पर किये गया व्यायाम भी बुरा नहीं है अगर नियमित रूप से किया जाये मगर हमारे देश में लोगों ने जीवन शैली तो ब्रिटेन और अमेरिका जैसी अपना ली है पर वहां जो कसरत करने का नियम है उसका पालन नहीं करते। सुविधाओं ने इतना विलासी बना दिया है कि हमारे यहां अस्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही है। हमारे यहां की योग कला तो न केवल शारीरिक रूप से शक्तिशाली बनाती है वरन मानसिक रूप से दृढ़ भी बनाती है। आज के समय में जब भौतिकवाद के चलते आदमी अकेला होता जा रहा है तब यह आवश्यक है कि अपने बल को बनाये रखे। यह सभी जानते हैं कि जब तक हमारी देह में सामर्थ्य है तभी तक सारा संसार हमारे साथ है और असमर्थ होने पर अपने भी त्याग देते हैं। इसके बावजूद अगर कोई अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देता तो उसे अज्ञानी ही माना जा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, October 07, 2012

चाणक्य नीति-ध्यान की कला बगुले से सीखना चाहिए (dhyana karna bagule se seekhna chahiye-chakya neeti or policy)


      सामान्य मनुष्य हमेशा ही बहिर्मुखी रहता है। आंखों के सामने घटित दृश्य, कानों में गूंजते स्वर तथा नासिका से सुगंध दुंर्गंध का बोध करने में उसकी इंद्रियां इतनी व्यस्त रहती है कि उसकी बुद्धि मे चिंत्तन का कीड़ा कभी घूमता नज़र नहीं आता।  विरले लोग ही होते हैं जो आत्ममंथन करते हैं।  ऐसे ज्ञानी लोग न केवल सदैव प्रसन्न रहते हैं बल्कि हर स्थिति में सफलता उनके हिस्से ही आती है।  आमतौर से बगुले को धूर्तता का पर्याय माना जाता है पर उसे अगर चालाकी समझा जाये तो कुछ सीखा जा सकता है। वह अपनी इंद्रियों को वश में कर तालाब में मछलियों का शिकार करता है।  अगर मनुष्य उससे सीखकर अपने जीवन के लक्ष्यों को पूरा करने का प्रयास करे तो वह सुखी रह सकता है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं सर्वकार्याणि साधयेत्।।
                     हिन्दी भावार्थ-ज्ञानी व्यक्ति हमेशा ही बगुले की तरह इंद्रियों पर नियंत्रण कर देश और काल की समझ धारण कर अपने बल से ही सारे कार्यो को संपन्न करता है।’’
य एतान् विंशतिगुणानाचारिव्यति मानवः।
कार्याऽवस्थासु सर्वासु अजेयः स भविष्यति।।

                                                  हिन्दी में भावार्थ-जो व्यक्ति बीस गुणों का आचरण कर जीवन व्यतीत करेगा वह कायों को संपन्न करने के साथ हर अवस्था में विजयी होता है।’’
      हमें जब भी एकांत मिले आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए। अपने गुणों तथा बल के साथ ही अपनी कमजोरियों पर भी विचार करना चाहिए। हमेशा बहिर्मुखी बने रहने से कोई लाभ नहीं जब तक हम अंतर्मुखी होकर विचार न करें। जीवन में सफलता का मूल मंत्र यही है कि अपने अंदर गुणों के संचय का प्रयास भी करें।
 
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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