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Saturday, March 05, 2016

आत्मकुंठा से हो रहा है मनुस्मृति का विरोध-हिन्दी चिंत्तन लेख(ManuSmriti is A Great Knowledgeble Book-Hindu Thought Article)

यह अजीब लगता है कि मनुस्मृति का विरोध का नेतृत्व भी  भारतीय समाज के उस उच्चवर्ण  के लोग ही कर रहे हैं जिन्हें सम्मानीय माना गया है। यह तर्क भी अजीब है कि उसमें दलित समाज के लिये कमतर संज्ञा दी गयी है। इस लेखक की चर्चा कथित जनवादियों से कभी होती रही थी।  वह सभी उच्चवर्ण के थे। वह सभी मनुस्मृति के इतने विरोध में विचार व्यक्त करते थे कि उसे जलाने की भी इच्छा उनकी थी।  इस लेखक ने तब तक मनुस्मृति का अध्ययन इस दृष्टि से नहीं किया था कि उसके आलोचकों को जवाब दिया जा सके।  इधर जैसे जैसे मनुवाद का विरोध बढ़ता जा रहा है तब उसका विश्लेषण करने पर यह समझ आ रहा है कि कुछ कथित पेशेवर विद्वान नहीं चाहते कि जीवन के सत्य से आमजन अवगत हों ताकि उनका जनकल्याण, गरीब उद्धार तथा बेबस की मदद का पाखंड चलता रहे।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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न वार्यपि प्रयच्छेत्तु बैडालव्रतिकेय द्विजे।
न बकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मचित्।।
हिन्दी में भावार्थ-धर्म के आधार पर ऐसे विद्वान को पानी तक नहीं पिलाना चाहिये जो दूसरों को मूर्ख बनाता है। ऊपर से साधु दिखने वालों का चित्त ज्ञान से रहित होता है।
हैरानी तो इस बात की है कि भारतीय धर्म के अनेक प्रचारक भी मनुस्मृति की चर्चा से बचते हैं। मनृस्मृति में यह स्पष्ट लिखा गया है कि धर्म के नाम पर लोभ की प्रवृत्ति से काम करने वालों को कतई संत न माना जाये। इतना ही नहीं जिन लोगों को वेद के ज्ञान के साथ ही उस पर चलने की शक्ति नहीं है उन्हें न तो विद्वान माने  न उन्हें दान दिया जाये। हमने देखा है कि विद्वता के नाम पर पाखंड करने वाले लोग अधिकतर उच्च वर्ग हैं और मनुस्मृति में जिस तरह भ्रष्ट, भयावह तथा व्याभिचार के लिये जो कड़ी सजा है उससे वह बचना चाहता है।  खासतौर से राजसी कर्म में लिप्त लोग भ्रष्टाचार, भूख, भय के साथ अन्य समस्याओं से जनमानस का ध्यान हटाने के लिये पुराने ग्रंथों को निशाना बना रहे हैं जिसमें भ्रष्ट, व्याभिचार तथा अन्य अपराधों के लिये कड़ी सजा का प्रावधान हैं।  मनुस्मृमि की वेदाभ्यास में रत ब्राह्ण, समाज की रक्षा में रत क्षत्रिय, व्यवसाय में रत व्यापारी तथा इन तीनो की सेवा करने वाला सेवक जाति का है। इन्हीं कर्मों का निर्वाह धर्म माना गया है।  स्पष्टतः जन्म से जाति स्वीकार नहीं की गयी है। लगता है कि मनुस्मृति के विरुद्ध प्रचार किन्हीं सिद्धांतों की बजाय आत्मकुंठा की वजह से की जा रही है। 
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Sunday, November 04, 2012

चाणक्य नीति-दंड की कठोर व्यवस्था न होने से अपराधी बेखौफ हो जाते हैं

                कहा जाता है कि फिट है वही हिट है। दरअसल भौतिक उपलब्धियों के लिये जुटा इंसान न तो अपनी देह को स्वस्थ रखने के लिये प्रयास करता है और न ही अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर आत्मबली हो पाता है। जीवन में एक बार ऐसा समय अवश्य ही आता है जब वह थक जाता है। यह थकावट उसे वृद्धावस्था में ही पहुंचा देती है। ऐसे में शारीरिक तथा आत्मिक रूप से क्षीण होकर मनुष्य के पास आर्तनाद करने के अलावा कोई मार्ग शेष नहीं रह जाता। हमारे देश में व्यायाम आदि को कभी आदत की तरह नहीं अपनाया गया। अपनी ही योग कला को केवल सिद्धों तथा नकारा लोगों के लिये आवश्यक माना गया है। यही कारण है कि आजकल हम अपने आसपास शारीरिक तथा दिमागी रूप से विकारग्रस्त लोगों का से भरा समाज देख रहे हैं।
                       महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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                        यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैंव धनऽऽगमः।
                       निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति।।
            ‘‘जिसके नाराज होने पर किसी प्रकार का भय नहीं हो और नही प्रसन्न होने पर किसी फल की आशा है और जो दण्ड देने का सामर्थ्य भी नहीं रखता वह गुस्सा होकर कर भी क्या लेगा?’’
                  पश्चिमी आधार पर किये गया व्यायाम भी बुरा नहीं है अगर नियमित रूप से किया जाये मगर हमारे देश में लोगों ने जीवन शैली तो ब्रिटेन और अमेरिका जैसी अपना ली है पर वहां जो कसरत करने का नियम है उसका पालन नहीं करते। सुविधाओं ने इतना विलासी बना दिया है कि हमारे यहां अस्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही है। हमारे यहां की योग कला तो न केवल शारीरिक रूप से शक्तिशाली बनाती है वरन मानसिक रूप से दृढ़ भी बनाती है। आज के समय में जब भौतिकवाद के चलते आदमी अकेला होता जा रहा है तब यह आवश्यक है कि अपने बल को बनाये रखे। यह सभी जानते हैं कि जब तक हमारी देह में सामर्थ्य है तभी तक सारा संसार हमारे साथ है और असमर्थ होने पर अपने भी त्याग देते हैं। इसके बावजूद अगर कोई अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देता तो उसे अज्ञानी ही माना जा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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