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Wednesday, February 12, 2014

चाणक्य नीति-जीवन का दर्शन कुत्ते से भी सीखा जा सकता है(chanakya neeti-jiwan ka darshan kutte se bhi seekhna chahiey)



      यह विचित्र बात है कि श्वान या कुत्ते को एकदम घटिया पशु कहा जाता है। जब कोई एक व्यक्ति दूसरे  के विरुद्ध क्रुद्ध होकर विषवमन करना हो तो उसे कुत्ता कह कर अपनी भडास निकालता है। इतना ही नहीं अगर किसी व्यक्ति को उत्तेजित करना हो तो उसे भी यही उपाधि दी जाती है।  हालांकि समाज में कुत्ते को पालने वाले हमेशा ही रहे हैं। गांव हो या शहर कुत्ते को लोग पालते हैं। कुत्ते की वफादारी का गुण विश्व विख्यात है पर उसका यह भी गुण है कि थोड़ा मिलने पर भी वह प्रसन्न हो जाता है।  अक्सर कुत्ते सोते मिलते हैं पर जरा आहट होने पर ही वह जाग जाते हैं। इतना ही नहीं जब स्वामी पर संकट हो तो कुत्ता अपनी जान की भी परवाह नहीं करता। 
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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बह्वाशी स्वल्पसन्तुष्टः सुनिद्रो लघुचेतनः।
स्वामिभक्तश्च शुरश्च बडेते श्वानतो गुणाः।।
     हिन्दी में भावार्थ-समय के अनुसार बहुत खाना या कम ही खाने से संतुष्ट हो जाना, अवसर मिले तो खूब सोना पर आहट होते ही जाग जाना तथा वफदारी के साथ ही वीरता का गुण कुत्ते से सीखना चाहिये।
      देखा जाये तो सभी पशु पक्षियों में कोई न कोई गुण होता है पर इंसान उसे अनदेखा कर देता है। इंसानों में सभी बुरे हो नहीं सकते पर यह भी सच है कि स्वाजातीय जीवों के लिये इंसान ही खतरा होता है।  अपराध विशेषज्ञों के अनुसार इंसान के लिये खतरा दूसरे इंसान कम अपने निकटस्थ ज्यादा होते हैं। स्त्रियों के विरुद्ध अपराध उनके करीबी ही ज्यादा करते हैं।  हम जब धोखे की बात करते हैं तो वही देता है जिस पर हम अपना समझकर यकीन करते हैं।  गद्दारी का शिकार आदमी तभी होता है जब वह किसी को मित्र मानकर उसे अपनी गुप्त बातें बताता है।
      अधिकतर लोग अपनी मतलब की वजह से कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। उन्हें मित्र या रिश्ते का ख्याल नहीं आता।  हम स्वयं ऐसा न करें यह अच्छी बात है पर दूसरे पर यकीन करते हुए उसकी पिछली पृष्ठभूमि देखना चाहिये।  हमें अपने जीवन के प्रति सतर्कता बरतना चाहिये और किसी पर दूसरे पर विश्वास करते तो दिखें पर करें नहीं। दूसरी बात यह कि हमें कभी स्वयं किसी से गद्दारी नहीं करना चाहिये। अगर किसी का काम न करना हो तो उससे वादा कभी नहीं करें। जीवन का सिद्धांत यही है कि जैसा व्यवहार आप दूसरे से चाहते हैं वैसा स्वयं ही करें।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Wednesday, February 05, 2014

बंद हृदय गति, निष्क्रिय मस्तिष्क और चमक खोती देह समाधि का प्रमाण नहीं-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(band hirdya gati,hishkriya mastishk aur chamak khoti deh samad.hi ka praman nahin-patanjali yog ke aadhar par lekh)




      हमारे देश में पतंजलि योग साहित्य का अध्ययन अगर शैक्षणिक पुस्तकों में कराया जाता तो शायद धर्म के नाम पर कभी इतना पाखंड नहीं फैलता।  दरअसल लोगों को योग विद्या का ज्ञान नहीं है इसलिये कोई भी पेशेवर धर्म प्रवचनकर्ता उन्हें अपने  लाभ के लिये भ्रमित करते हैं। स्थिति यह है कि जितने पेशेवर गुरु हैं उतने ही प्रकार के योग के रूप बन गये हैं। हास्य की स्थिति तब होती है प्रचार माध्यमों में समाचार, बहस तथा लेखों में अनेक लोग योग में महारथी के रूप में प्रस्तुत होते हैं।  उस समय पतंजलि योग का अध्ययन करने वाले साधक दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। योग साधना के रूप तथा तत्वज्ञान को एक मानकर बहस होती है जो एकदम अर्थहीन है।
      अभी हाल ही में एक संगठन के गुरु की समाधि चर्चा का विषय बनी हुई है। चिकित्सक मानते हैं कि वह देह का त्याग कर चुके हैं-उनका हृदय, मस्तिष्क तथा अन्य दैहिक क्रियायें एकदम काम करना बंद कर चुकी हैं। अब बहस इस बात की हो रही है कि पश्चिमी चिकित्सा पद्धति के आधार पर समाधि मानी जानी चाहिये कि नहीं। फिर कहा जाता है कि विज्ञान अलग विषय है भारतीय धार्मिक आस्थायें उनकी तराजु पर नहीं तोली जा सकती। समाधि पर तमाम तरह के विचार आ रहे हैं। हैरानी इस बात की है कि अनेक कथित संत इस विषय पर तर्क दे रहे हैं पर पतंजलि योग के आधार पर यह कहा जा सकता है कि ऐसे लोगों को इस विधा का अध्ययन अब शुरु करें न कि उस पर अपनी बात रखकर समाज को भ्रमित करना चाहिये। जिन गुरु की समाधि की चर्चा हो रही है उनके चालक की बात मानी जाये तो उनकी संस्था के पास हजारों करोड़ की संपत्ति है। माया का यह विशाल रूप अध्यात्मिक सिद्धों के पास नहीं आता भले ही कहा जाता हो कि वह त्यागियों की दासी होती है। माया संतों के इर्दगिर्द चक्कर लगाती है पर वह उसके संग्रह का  मोह ं अपने जीवन में कभी नहीं पालते।
      पतंजलि योग साहित्य में योग के आठ भाग बतायें गये हैं-यम, नियम, प्रत्याहार, आसन, प्राणायाम, ध्यान, धारण और समाधि।  समाधि योग का चरम रूप है।  इसमें लीन होने पर योग सिद्ध होना माना जाता है। इस समािध में भी अनेक भेद हैं पर उसका कोई स्पष्ट प्रकट स्वरूप नहीं है। अक्सर लोग सांस रोककर पड़ रहने को समाधि मानने लगते हैं। कुछ लोग बैठकर ध्यान लगाते हैं तो उसे भी समाधि कहा जाने लगता है। सांस रोकना प्राणायाम है तो ध्यान लगाना एक तात्कालिक सहज स्थिति है। जबकि योग का चरमरूप समाधि  एक मनस्थिति है जिसे बाहर से देखा नहीं जा सकता।
पतंजलि योग साहित्य के समाधि पद में कहा गया है कि
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योगनिश्चितवृत्तिनिरोधः
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है।
तदा दृष्टुः स्वरूपेऽअवस्थानम्।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-उस सयम दृष्टा  अपने रूप में स्थित हो जाता है।
      पतंजलि योग में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि सांस रोकना, मस्तिष्क का कार्य न करना अथवा देह की चमक फीकी पड़ जाना समाधि का प्रमाण है।  समाधि एक आंतरिक स्थिति है जिसमें मन की प्रकृत्तियों को स्थिर रखा जाता है। इसका अभ्यास न किया जाये   एकदम कठिन लगती है। हमारी दृष्टि से समाधिस्थ होना एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति परमात्मा ही नहीं वरन् किसी विषय से जुड़कर उससे मानसिक रूप से एकाकार हो सकता है। जिन लोगों ने निरंकार परमात्मा में मन लगाया उसे पाया और जिन्होंने साकार रूप देखा भी पूज्यनीय रहे।
      समाधि का मतलब है किसी विषय या वस्तु से  से इस तरह जुड़ जाना कि दृष्टा और दृश्य एकाकार हो जाये।  यहां हम तुलसी, कबीर, रहीम तथा मीरा की बात करें तो कहा जा सकता है कि वह  जीवन भर समाधि में ही रहे। उन्होंने जीवन भर परमात्मा से अपना मन इस तरह जोड़ा कि उससे अध्यात्मिक प्रसाद प्राप्त कर समाज को महान रचनायें दी।  समाधि के बाद अध्यात्म का जो प्रसाद मिलता है उसे अनुभव ही  किया जा सकता है। तुलसी ने रामचरित मानस के रूप में पाया प्रसाद समाज को बांटा। कबीर के दोहे भी एक तरह का अध्यात्म प्रसाद है जो हमने पाया।  जितना अध्ययन एक साधक के रूप में हमने किया उससे तो यही लगता है कि समाधि और ध्यान के नाम पर पाखंड अधिक दिखायी देता हैं।  योग साधना एकांत का विषय है।  लोग इस पर सार्वजनिक चर्चा इस तरह करते हैं जैसे कि महान योग विशारद हैं।
      जिस संगठन के गुरु कथित रूप से समाधि में हैं उनके शिष्य आस्था का विषय बताकर जिस तरह के तर्क दे रहे हैं हमें उन पर कोई आपत्ति नहीं है। धर्म के प्रतीक पहनकर कोई उसका महारथी नहीं हो जाता। हम तो बस इतना कहना चाहते हैं कि समाधि एक मनस्थिति है जिसमें हृदय की गति रुकना, मस्तिष्क का निष्क्रिय होना अथवा देह की चमक कम होना समाधि का प्रमाण नहीं है। पतंजलि योग के साधक के रूप में हमारा इतना ही मानना है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Thursday, January 30, 2014

स्वार्थी का लक्ष्य प्रेम करना नहीं होता-तुलसी दर्शन पर आधारित चिंत्तन(swarthi ka lakshya prem karna nahin hota-tulsi darshan par aadharit chinntan lekh )



      हम अक्सर दूसरे लोगों के व्यवहार पर टीका टिप्पणियां करते हैं।  किसी में गुण दिखता है तो प्रसन्नता होती है और किसी में दोष देखते हैं तो उस पर क्रोध भी आ जात है। आमतौर से सामान्य लोग दूसरों में दोष ही देखते हैं।  समाज में परनिंदा का फैशन पुराना है। विरले ही ऐसे सज्जन मिलते हैं जो किसी की प्रशंसा करते मिलेंगे। स्थिति यह है कि लोग एक दूसरे के मित्र होते हुए भी प्रशंसा नहीं करते। इसके विपरीत पीठ पीछे अपने ही मित्रों की ऐसे लोगों के सामने निंदा करते हैं जो उनके स्वयं के मित्र नहीं होते।
      एक बार इस लेखक की भेंट एक कंपनी में कार्यरत उच्च अधिकारी मित्र से हुई थी।  उस मित्र ने अपने ही कार्यालय की एक कथा सुनाई।  वहां दो कार्यरत कर्मचारी आपस में  अच्छे मित्र थे। दोनों के पारिवारिक संबंध थे।  एक मित्र मध्यम पद तो दूसरा छोटे पद पर था।  मध्यम पद पर कार्य करने वाला मित्र निरीक्षक होने के कारण अपने कर्मचारी मित्र को अपने काम के सिलसिले में कभी टोकता भी तो इस बात का आभास नहीं देता था कि वह उसका अधिकारी है।  दोनों अच्छा काम करते थे इसलिये हमारे प्रबंधक मित्र को उनसे कोई परेशानी भी नहीं थी। दोनों भोजनावकाश में साथ खाना खाते और चाय भी पीने जाते थे। जब उनसे जुड़ा काम होता तो वह दोनों ही अपने प्रबंधक मित्र से मिलने आते थे।
      एक बार उनके काम में कोई कमी आयी। तब हमारे प्रबंधक  ने निरीक्षक मित्र को बुलाया। उससे काम के सिलसिले में कमी की बात की तो उसने पूरा दोष अपने कर्मचारी मित्र पर डाला।
      प्रबंधक ने सरल भाव से कहा-‘‘ठीक है, वह तो आपका मित्र है। संभाल लीजिये।’’
      होना तो यह चाहिये था कि वह निरीक्षक स्वीकृति में सिर हिलाकर चला जाता पर उसने कहा-‘‘साहब, कैसा मित्र? वह तो मजबूरी है, साथ काम करते हैं इसलिये निभाना पड़ता है, वरना मैं उसे पसंद नहीं करता।’’
      उसने कर्मचारी मित्र की इतनी बुराईयां की कि प्रबंधक दंग रह गया।  उत्सुकतावश उसने कर्मचारी मित्र को बुलाया।  उसने अपने काम का पूरा दोष प्रबंधक पर डाल दिया।  कमोवेश उसने भी निरीक्षक मित्र के प्रतिकूल उतनी ही  बातें कहीं जितना वह प्रबंध से कर गया था।
      उनके व्यवहार पर हमारे प्रबंधक मित्र ने हमसे टिप्पणी करते हुए कहा-‘‘यार, अगर वह चाहते थे तो प्रसंग इतना अप्रिय नहीं था जिस पर वह अपनी पुरानी मित्रता की पोल मेरे जैसे उस व्यक्ति के सामने नहीं खोलते जो जिसे उनके कार्यालय में न अधिक समय आये हुए था न अधिक वहां रहने वाला था।  आज नहीं तो कल मेरा स्थानांतरण वहां से होना ही था। मैंने मित्रता का जो वहां पाखंड वहां देखा वह मेरे मन को आज तक तकलीफ देता है।’’
संत  तुलसीदास कहते है कि
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लखि गयंद ले चलत भजि, स्वान सुखानो हाड़।
गज गुन मोल अहार, महिमा जान कि राड़।।
              सामान्य हिन्दी में भावार्थ-हाथी को देखकर कुत्ता सूखी हड्डी ऐसे लेकर दौड़ पड़ता है कि वह उसे छीन लेगा। वह हाथी के गुण , मूल स्वभाव और आहार की प्रकृत्ति को नहीं जानता।
कै निदरहु कै आदरहु, सिंघहि स्वान सिआर।
हरण विषाद न केसरिहि, कुंजर, कुंजरगंज निहार।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-कुत्ते, सियार और सिंह का आदर करें या सम्मान उनको परवाह नहीं होती।  हाथी का शिकार करने पर सिंह को दुःख या हर्ष नहीं होता।
      कहने का अभिप्राय यही है कि आम मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह स्वार्थ की वजह से अनेक प्रकार के संबंध निभाता है। हम अनेक बार ऐसे लोगों की उपेक्षा से दुःखी हो जाते हैं जिनका काम हमने कभी किया था।  हम यह भूल जाते हैं कि अनेक लोगों ने अनेक अवसरों पर हमारा काम किया होता है पर उनकी याद हमें नहीं आती। यह संसार का नियम है कि काम निकलने के बाद हम अनेक प्रकार के सामान फैंक देते हैं और उन व्यक्तियों से स्वाभाविक रूप से परे हो जाते हैं जिन्होंने हमारा कभी साथ दिया।  सच बात तो यह है कि सच्चा संबंध वही है जो स्वार्थ की वजह से हुआ जरूर हो पर उसकी नियमित स्थिति निराधार हो। शिक्षा, कार्यस्थल या किसी अन्य कारण से बने संबंध तभी शुद्ध रह पाते हैं जब उनमें स्वार्थ की पूर्ति से हार्दिक प्रेम हो। 

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Friday, January 24, 2014

संत कबीर दर्शन-बिना विचार के बोलने वाला साधु नहीं(sant kabir darshan-bina vichar ke bolne wala sadhu nahin)



      हमारे देश में अनेक ऐसे मठाधीश धर्म के नाम पर अपने आश्रमों में महल की तरह व्यवस्था कर उसमें राजा की तरह विराजमान रहते हैं। यही नहीं उनके मुंहलगे कथित शिष्य उनकी सेवा इस तरह करते हैं जैसे कि वह महल के कारिंदे हों। धर्म के प्रतीक रंगों के वस्त्र पहनकर अनेक ऐसे लोग साधु बनकर समाज के पथप्रदर्शक बनने का ठेका लेते हैं जिन्होंने भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित ज्ञान को रट तो लगाया पर धारण न कर उसे विक्रय योग्य विषय बना लिया है।  इतना ही नहीं ऐसे कथित साधु अनेक निंदनीय प्रसंगों में शामिल होकर अपनी प्रतिष्ठा तक गंवा देते हैं मगर फिर भी बेशरमी से अपने विरुद्ध कार्यवाही को हिन्दू धर्म का विरोध में की गयी प्रचारित करते हैं।  इतना ही नहीं प्रचार माध्यमों में बने रहने का उनका मोह उन्हें इतना रहता है कि हर विशेष घटना पर अपनी प्रतिकिया देने के लिये पर्दे पर हमेशा ही अवतरित होने का प्रयास करते हैं। अध्यात्मिक विषयों पर चर्चा कर लोगों को आत्मिक रूप से परिपक्व बनाने की बजाय यह लोभी साधु सांसरिक विषयों में दक्षता प्राप्त करने के हजार नुस्खे बताते हैं।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि
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साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को  गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।।
      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-साधु वही व्यक्ति है जिसका स्वभाव सूप(छाज) की तरह हो। वह केवल ज्ञान की चर्चा करे और व्यर्थ की बातों की उपेक्षा कर दे।
साधु भया तो क्या भया, बोलै नाहिं बिचार।
हतै पराई आतमा, जीभ गाधि तरवार।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-वह साधु नहीं हो सकता जो बिना विचार किये ही सारे काम करता है। वह अपनी जीभ का तलवार की तरह उपयोग कर दूसरे के  आत्मा  को रंज करता है।
      सच्चा साधु वही है जो सहज भाव से आचरण, विचार तथा व्यवहार करता हो। मान और अपमान में समान हो।  इतना ही नहीं किसी भी स्थिति में वह अपनी वाणी को कृपाण की तरह उपयोग न करे।  साधु की सबसे बड़ी पहचान उसकी मधुर वाणी तथा प्रभावशाली चरित्र होता है। हम आजकल ऐसे अनेक कथित साधुओं को देखते हैं जो प्रचार माध्यमों में चेहरा चमकाने के लिये उत्सुक रहते हैं पर यह अलग बात है कि अनेक बार उनका यही मोह तब शत्रु बन जाता है जब उनकी हिंसक, मूर्खतापूर्ण तथा अव्यवहारिक गतिविधियां कैमरे के सामने आ जाती हैं। आज के प्रचार माध्यम इतने शक्तिशाली है कि उनके उपयोग से अनेक व्यवसायिक धर्म के ठेकेदार प्रतिष्ठित हो गये पर अंततः उन्हें बदनामी का बोझ भी इसी वजह से झेलना पड़ा क्योंकि उन्होंने इस शक्ति को समझा नहीं।
      ऐसा नहीं है कि सच्चे साधु इस देश में मिलते नहीं है जिनके गुरु बनाया जा सके। हमारा मानना है कि सच्चे साधु कभी प्रचार के मोह नहंी पड़ता न धर्म की दुकान लगाते हैं। आत्मप्रचार में लगे साधुओं की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह अपने शिष्य बनाने के लिये आओ आओ के नारे उसी तरह लगाते हैं जैसे दुकानदार ग्राहक के लिये लगाते हैं।  उसी तरह जिस तरह फेरीवाले सामान लेकर घर घर जाते हैं वैसे ही कथित साधु अपने शिष्यों के घर जाकर आतिथ्य ग्रहण उनको कृतार्थ करने का ढोंग रचते हैं।

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Sunday, January 19, 2014

ध्यान से विषयों से उत्पन्न विष को नष्ट करना सहज-पतंजलि योग सूत्र के आधार पर चिंत्तन लेख(dhyan se vishayon utpanna vish ko nasht karna sahaj-patanjali yog sootra ke aadhar par chinttan lekh)



      इस संसार में मनुष्य के जीवन में क्लेश और प्रसन्नता दोनों ही प्रकार के संयोग बनते बिगड़ते हैं। यह अलग बात है कि सामान्य मनुष्य सुख का समय आने पर सब कुछ भूल जाता है पर जब दुःख का समय आता है तब वह सहायता के लिये इधर उधर ताकता रहता है। क्लेश के समय वह विचलित होता है पर जिन लोगों को योग तथा ज्ञान का अभ्यास निरंतर हो उन्हे कभी भी इस बात की परवाह नहीं होती कि उसका समय अच्छा चल रहा है या बुरा, बल्कि वह हर हालत में सहज बने रहते हैं।
      हमारे देश में पेशेवर योग शिक्षकों ने प्राणायाम तथा योगासनों का प्रचार खूब किया है जिसके लिये वह प्रशंसा के पात्र भी हैं पर ध्यान के प्रति आज भी लोगों में इतना ज्ञान नहीं है जितनी अपेक्षा की जाती है। यह ध्यान ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति होती है जो कि मनुष्य के उस मन पर नियंत्रण करने में सहायक होती है जो प्रत्यक्ष उसकी देह का स्वामी होता है।  हमारे दर्शन के अनुसार अध्यात्म या आत्मा मनुष्य की देह का वास्तविक स्वामी होता है और योग विद्या से अपनी इंद्रियों का उससे संयोग कर जीवन को समझा जा सकता है। योगाभ्यास में ध्यान विद्या में पारंगत होने पर ही समाधि के चरम स्तर तक पहुंचा जा सकता है।

पतंजलि योग साहित्य मे कहा गया है कि
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ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।
     हिन्दी में भावार्थ-सूक्ष्मवस्था को प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करना चाहिये।
ध्यानहेयास्तदूवृत्तयः।
     हिन्दी में भावार्थ-उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नाश करने योग्य हैं।

      जहां आसन और प्राणायाम प्रातः किये जाते हैं वहीं ध्यान कहीं भी  कभी भी लगाया जा सकता है। जहां अवसर मिले वहीं अपनी बाह्य चक्षुओं को विराम देकर अपनी दृष्टि भृकुटि पर केंद्रित करना चाहिये।  प्रारंभ में सांसरिक विषय मस्तिष्क में विचरण करते हैं तब ऐसा लगता है कि हमारा ध्यान नहीं लग रहा पर धीरे धीरे इस बात का अनुभव होता है कि उन विषयों का विष वहां जलकर नष्ट हो रहा है।  जिस तरह हम करेला खायें या मिठाई, हमारे उदर में वह कचड़े के रूप में परिवर्तित होता है।  उसी तरह कोई विषय प्रसन्नता देने वाला हो या क्लेश उत्पन्न करने वाला, वह अंतर्मन में विष ही पैदा करता है। यह विष कोई भौतिक रूप से नहीं होता इसलिये उसे ध्यान  से ही जलाकर नष्ट किया जा सकता है।  हम विचार करें तो ध्यान के दौरान भी मनुष्य दैहिक अंगों की सक्रियता नहीं होती। ध्यान अभौतिक या मानसिक स्थिति है। विषयों से संसर्ग उत्पन्न विष ध्यान के माध्यम से जब नष्ट हो जाता है उसके बाद मनुष्य को यह सुखद अनुभूति होने लगती है  उसकी देह एकदम हल्की हो गयी है और वह जैसे उड़ रहा है। मस्तिष्क की नसों में एक ऐसे सुख का आभास होता है जिसे शब्दों में वर्णन करने की बजाय मनुष्य उसे अनुभव करते रहने में ही आनंद अनुभव करता है।

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Tuesday, January 14, 2014

तुलसीदास का दर्शन-सरल लोगों से अपना व्यवहार करें(Tuslidas ka darshan-saral logon se apna vyavhar karen)



  पूरे विश्व मे भौतिकतावाद का बोलबाला हो गया है। नयी नयी वस्तुओं के नये नये रूप प्रतिदिन आते हैं। उनके विक्रय करने के लिये प्रचार माध्यमों में विज्ञापन दिये जाते हैं। स्थिति यह है कि उत्पादक कंपनियों ने पूरे समाज में अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। फिल्म, कला, पत्रकारिता, समाज सेवा था खेल जैसे क्षेत्रों में अपने अपने बुत बैठा दिये हैं।  वस्तुओं के उत्पादन से लेकर उनके विक्रय तक यही बुत उनके लिये सुविधाजनक मार्ग बनाते हैं।  यही कारण है कि लोगों के सामने कपटी तथा मक्कार लोग वेश बदल बदल कर उनकी बुद्धि का हरण करने लगते हैं।
      कहा जाता है कि पूरे विश्व में भ्रष्टाचार है।  इसका कारण यह है कि आधुनिक लोकतंत्र में पूंजी की प्रधानता हो गयी है। कोई भी पूंजीपति कहीं पैसा  लगाता है तो उसकी वापसी उससे कई गुना चाहता है।  इस लोकतांत्रिक प्रणाली में जनप्रतिनिधि शासन की देखभाल करते हैं पर प्रत्यक्ष रूप उनको काम करने का अधिकार नहीं होता जबकि जिम्मेदारी प्रजा के प्रति उनका दायित्व होता है। जो शासन का कार्य करते हैं उनका प्रजा के प्रति कोई प्रत्यक्ष दायित्व नहीं होता। यही कारण है कि विश्व के अनेक देशों में जन असंतोष व्याप्त है। यहां तक कि अपने ही चुने हुए प्रतिनिधियों के प्रति उनमें विश्वास कम होता जा रहा है। विश्व के अनेक देशों में जनप्रतिनिधि केवल नाम भर के रहते हैं। अमेरिका हो या ब्रिटेन सभी जगह सरकार अधिकारियों का दबदबा रहता है और वही जनप्रतिनिधियों के मार्गदर्शक होेते हैं।  स्थिति यह है कि जनप्रतिनिधि अपने मतदाता से लुभावने वादे तो कर देते हैं पर जब राजकीय पद पर विराजमान होते हैं तब अधिकारीगण उनके मार्गदर्शक बनकर मतदाताओं से किये गये वादों से उनके दूर कर देते हैं।
संत तुलसीदास जी कहते हैं कि
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हृदय कपट का वेष धरि, बचन कहि गढ़ि छोलि।
अब के लोग मयूर ज्यों, क्यों मिलिए खालि।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-लोग हृदय में कपट रखकर मीठी बातें करते हैं। ऐसे लोगों से खुलकर मिलना संभव नहीं है जो पाखंडपूर्ण व्यवहार करते हैं।
मिलै जो सरलहि ह्वै, कुटिल न सहज बिहाड़।
सो सहेतु ज्यों वक्र गति, ब्याल न बिलहि समाइ।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-अपना व्यवहार हमेशा सरल प्रकृत्ति के लोगों से ही करना चाहिये। टेढ़ी प्रकृति के लोग कभी भी असंयत व्यवहार कर धोखा दे सकते हैं। सांप भले ही अपनी बिल में सीधा जाता है पर बाहर हमेशा ही टेढ़ी चाल चलता है।
      पहले कहा जाता था कि यथा राजा तथा प्रजा। आधुनिक लोकतंत्र में यह कहावत उलट कर भी देखी जा सकती है।  यथा प्रजा तथा राजा।  लोगों अपने जनप्रतिनिधियों का आक्षेप तो करते हैं पर अपने मानस का अध्ययन नहीं करते।  तुलसीदास ने तो चार सौ बरस पहले इसी समाज को देखकर अपनी महान रचनायें प्रस्तुत की थीं। अगर उस समय का समाज वास्तव में इतना महान होता तो तुलसीदास जी तथा उनके समकालीन कविगण ऐसी रचनायें नहीं देते जो लोगों की प्रकृत्तियो पर व्यंग्य करती नजर आती हैं। पूरा समाज के सभी लोग कभी भ्रष्ट नहीं रहे पर इतना तय है कि सरल हृदय लोग भी नगण्य ही रहे हैं। यही कारण है कि अक्सर लोग कहते हैं कि जमाना खराब हो गया है यह अलग बात है कि लोग छोटे छोटे मामलों में एक दूसरे झूठ बोलने के साथ धोखा भी देते हैं। वैसे दूसरे क्या करते हैं, यह देखने की बजाय हर आदमी को आत्मविश्लेषण करे हुए अपने विचार, व्यवहार तथा व्यक्तित्व की तरफ घ्यान देना चाहिये।

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Thursday, January 09, 2014

कामदेव के प्रभाव से कोई भी धर्मभीरु नहीं बच सकता-भर्तृहरि नीति शतक (kamdev ke prabhav se koyee dharmabhiru nahin bach sakta-bhartiriharineeti shatak)



      आजकल हमारे देश में अनेक कथित बाबाओं के यौन अपराधों पर प्रचार माध्यम सनसनी खबरें पर प्रस्तुत कर अपना जनहित धर्म निभाते हुए फूले नहीं समाते। जब यह खबरें प्रसारित होती हैं तो संवाददाता और उद्घोषक बाबाओं के बारे में यह कहते हुए नहीं थकते थे कि समाज में अनेक पाखंडी धर्म के ठेकेदार हैं। यह नहीं  जानते हैं कि धर्म एक अलग विषय है और उसके नाम पर प्रचार का व्यवसाय करना कभी किसी के धार्मिक होने का प्रमाण पत्र नहीं हो जाता।  दूसरी बात यह है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के रूप में चार अलग अलग प्रकियायें हैं जिनका आपस में प्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं होता।  हां, इतना अवश्य है कि प्रातः धर्म निर्वाह के बाद अन्य प्रक्रियाओं में सात्विकता का भाव स्वतः आ जाता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान न होने के कारण पश्चिमी शिक्षा से ओतप्रोत इन प्रचार माध्यमों में कार्यरत बुद्धिमान लोगों से तो यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह धर्म को काम से न जोड़ें बल्कि उनके दर्शकों में बहुत कम लोग इस बात को समझ पाते हैं कि काम की अग्नि धर्म के कच्चे खिलाड़ी को ही नहीं वरन् परिपक्व मनुष्य को भी पथ से भ्रष्ट कर देती है।

महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि
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विश्वामित्रपराशरप्रभृत्यो वाताम्बुपर्णाशनास्तेऽपि स्त्रीमुखपङ्कजं सुललित। दृष्ट्वैव मोहं गताः।।
शाल्पन्नं सघृतं पयोदधियुतं भुञ्जन्ति ये मानवा।स्तेपामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेत् विन्ध्यस्तरेत् सागरे।।
      हिन्दी में भावार्थ-विश्वमित्र और पाराशर ऋषि पत्ते और जल का सेवन कर तप करते थे वह भी काम की अग्नि का वेग सहन नहीं कर सके तो फिर अन्न, घी, दूध तथा दही का सेवन करने वाले मनुष्य काम पर नियंत्रण कर लें तो समझ लो समुद्र में विंध्याचल तैर रहा है।

      जब सतयुग में कुछ ऋषि अपनी तपस्या में कामदेव को विध्न डालने से नहीं रोक सके तो आज के व्यवसायिक धर्मगुरुओं से यह आशा करना कि वह कामाग्नि से बच पायेंगे मूर्खता है।  हमारे देश में अनेक गुरु हैं जो अपने आसपास शिष्याओं का जमावड़ा इसलिये दिखाते हैं ताकि भक्त अधिक से अधिक उनके पास आयें।  अगर हम भारतीय अध्यात्मिक पात्रो का अध्ययन करें तो कहीं भी किसी नारी का गुरु पुरुष नहीं होता।  जब भगवान श्रीराम वनवास को गये थे तब श्रीसीता के साथ अनेक ऋषियों के आश्रम में गये। वहां भगवान श्रीराम उन ऋषियों से चर्चा करते थे गुंरु पत्नियां ही श्रीसीता को ज्ञान देती थीं।  आजकल जब नारी और पुरुष समान का नारा लगा है तब धर्मगुरुओं ने उसका लाभ जमकर उठाया है।  अनेक धर्मगुरु तो प्रवचन के समय अपनी निकटस्थ शिष्याओं को मंच पर ही बिठा देते हैं ताकि आकर्षण बना रहे।
      इधर जब से यौन अपराधों पर नया कानून आया है तब अनेक गुरुओं पर मामले दर्ज हो चुके हैं।  कभी कभी तो कुछ लोगों को  यह लगता है कि अपने भारतीय धर्म की बदनामी प्रायोजित ढंग से की जा रही है। इस तरह का संदेह करने वाले लोग कहते हैं कि दूसरे धर्म की कोई चर्चा नहीं करता।  हमारा मानना है कि हमारे देश में भारतीय धर्मावलंबियों को बहुमत है इसलिये उनकी घटनायें अधिक सामने आती हैं।  दूसरी बात यह कि अन्य धर्मों में कहीं पैसे तो पहलवानी के दम पर ऐसी घटनाओं को आने से रोका जाता है जबकि भारतीय धर्म में ऐसा नहीं हो पाता। जहां तक विश्व के सभी धर्मों के ठेकेदारों का सवाल है वह चाहे लाख पाखंड करें पर जिनके पास महिला शिष्यों का अधिक जमावड़ा है वहां पूरी तरह से मर्यादित व्यवहार की आशा कम ही हो जाती है। यह अलग बात है कि कुछ स्वयं नियंत्रित कर लेते हैं पर कुछ कामाग्नि में जल ही जाते हैं। कुछ का अपराध सामने आ जाता है जिनका दुष्कर्म अप्रकट है वह साधु ही बने रहते हैं।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Sunday, December 29, 2013

अपने पाप की स्वीकृति कर मुक्ति पायें-मनुस्मृति के आधार चिंत्तन लेख(apne paap ki swikriti ka mukti paayen-manu smriti ke aadhan par chinntan



            जिनकी प्रवृत्ति अपराधिक है उनसे तो यह भी अपेक्षा की ही नहीं जा सकती कि पर कभी कभी सामान्य मनुष्य भी अपराध कर बैठत है और फिर परेशान होता है। इससे बचने का एक ही उपाय है अपने अपराध की सार्वजनिक रूप से हृदय से स्वीकृत्ति की जाये। यह बात सामान्य मनुष्य के लिये कही जा रही है जो जघन्य अपराध नहीं करते वरन् ऐसे कर्म कर बैठते हैं जो नैतिक रूप से अनुचित होते हैं। झूठ बोलना, परनिंदा तथा धोखा देने जैसे पाप शायद ही कोई ऐसा सामान्य मनुष्य हो जो कभी नहीं करता है। फिर उसे पीड़ा भी बहुत होती है। अनेक लोग तो ऐसे है जिन्हें कर्म करते समय उसके पापपूर्ण होने का अहसास नहीं होता पर बाद में वह पछताते हैं पर वह उसके प्रायश्चित का उपाय नहीं करते। 
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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ख्यायनेनानुतायेन तपसाऽध्ययनेन च।

पापकृन्मुच्यते पापतथा दानेन चापदि।।

            हिन्दी में भावार्थ-पापी व्यक्ति अपने दुष्कर्म का सत्य लोगों को बताकर, पश्चाताप कर, तप तथा स्वाध्याय कर मुक्ति पा सकता है। संकट की घड़ी में तप तथा स्वध्याय न करे तो दान करने से भी वह शुद्ध हो जाता है।

यथा यथा नरोऽधर्म स्वयं कृत्याऽनुभाषते।

तथा तथा त्वचेवाहिस्तेनाधर्मेण मुच्यते।।

            हिन्दी में भावार्थ-अपने अपराध की स्वीकृति दूसरों के सामने करने पर आदमी पाप से मुक्त हो जाता है।
            अनेक भावुक लोग तो छोटी गलती कर ही मन ही मन पछताते हैं। इतना कि अपना पूरा जीवन ही तनावपूर्ण बना डालते हैं। इससे बचने का एक उपाय है तो यह है कि किसी दूसरे के सामने अतिशीघ्र अपनी गलती का बखान कर मन हलका करें अथवा हृदय में पछतावा करने के साथ ही यह बात भी तय करना चाहिये कि ऐसी गलती दोबारा नहीं करनी है।  दूसरा यह कि कहीं ध्यान लगाकर परमात्मा का स्मरण कर उसे अपनी गलती समर्पित करें अथवा धार्मिक ग्रंथ का अध्ययन कर अपना मन मजबूत करें। इसका अवसर न मिले तो फिर किसी सुपात्र को कोई वस्तु या धन देकर मन की शुद्धि करें।


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Tuesday, December 24, 2013

तुलसी दास दर्शन-रसों में अमृत और विष की पहचान करने वाला ही सच्चा रसिक(tulsidas darshan-rason mein amrit aur vish ki pahachan karne wala hi sachcha rasik-tulsidas darsha)



            पूरे विश्व में उपभोग संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है। धार्मिक गुरु तथा समाज चिंत्तक भले ही अपने समाजों के सांस्कृतिक, धार्मिक तथा श्रेष्ठ होने का दावा भले करें पर सच यह है कि अध्यात्मिक दृष्टि से लोगों की चेतना का एक तरह से हरण हो गया है।  स्थिति यह हो गयाी है कि विषयों में  अधिक लोग इस तरह लिप्त हो गये हैं कि उनकी वजह से जो दैहिक, मानसिक तथा शारीरिक विकार पैदा हो रहे हैं उनका आंकलन कोई नहीं कर रहा।  अनेक लोगों के पास ढेर सारा धन है पर उनका पाचन क्रिया तंत्र ध्वस्त हो गया है।  महंगी दवाईयां उनकी सहायक बन रही हैं। दूसरी बात यह है कि जिसके पास धन है वह स्वतः कभी किसी अभियान पर दैहिक तथा मानसिक बीमारी के कारण समाज का सहयोग नहीं कर सकता। उसके पास देने के लिये बस धन होता है। जहां समाज को शारीरिक तथा मानसिक सहायता की आवश्यकता होती है वह मध्यम तथा निम्न वर्ग का आदमी ही काम आ सकता है।
            अनेक लोग धन के मद में ऐसे वस्त्र पहनते हैं जो उनकी छवि के अनुरूप नहीं होते। उसी तरह औषधियों का निरंतर सेवन करने से  उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता का हृास हो जाता है। यहां तक कि अनेक लोगों को सामान्य जल भी बैरी हो जाता है। अनेक बीमारियों में चिकित्सक कम पानी पीने की सलाह देते हैं।  अधिक दवाईयों का सेवन भी उनके लिये एक तरह से दुर्योग बन जाता है।    
संत तुलसीदास कहते हैं कि
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ग्रह भेषज जल पवन पट, पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग, लखहिं सुलच्छन लोग।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-ग्रह, वेशभूषा, पानी, वायु तथा औषधि समय अनुसार दुर्योग तथा संयोग बनाते हैं।
जो जो जेहि जेहि रस मगन, तहं सो मुदित मन मानि
रसगुन दोष बिचारियो, रसिक रीति पहिचानि।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार संसार के विषयों के रस में मग्न रहता है। उसे उसके रस के दोषों के प्रभाव को नहीं जानते। इसके विपरीत ज्ञानी लोग रसों के गुण दोष को पहचानते हुए ही आनंद उठाते है। एक तरह से ज्ञानी ही सच्चे रसिक होते हैं।
            जिन लोगों की भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में रुचि है वह जानते हैं कि हर विषय के उपभोग की सीमा होती है।  अति हमेंशा वर्जित मानी जाती है। योग और ज्ञान साधना का नियमित अभ्यास करने वाले जानते हैं कि सांसरिक विषयों में जब अमृत का आभास होता है तो बाद में परिवर्तित होकर विष बन जाते हैं जिसे योग तथा ज्ञान साधना से ही नष्ट किया जा सकता है। यही कारण है कि जब विश्व में उपभोग संस्कृति से जो दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक विकारों का प्रभाव बढ़ा है तब भारतीय योग साधना तथा श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की चर्चा हो रही है क्योंकि अमृत से विष बने सांसरिक विषयों के रस को जला देने की कला इन्हीं में वर्णित है।


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Monday, December 09, 2013

अपने मनोबल को कभी गिरने न दें-हिन्दी चिंत्तन लेख(apne manobal ko kabhi girne na den-hindi chinttan lekh, a hindu thought aritcle)



            संकट कितना गहरा क्यों न हों, शत्रु चाहें कितने भी प्रबल क्यों न हों तथा हमारे बनते काम बिगड़ बार बार क्यों न बिगड़ जाते होें पर कभी विचलित नहीं होना चाहिए।  हमेशा अपनी स्थिति, बाह्य छवि तथा अपनी व्यक्तिगत शक्ति सीमा पर आत्म मंथन करते रहना चाहिये।  सर्वशक्तिमान परमात्मा ने हमारे अंदर प्राणवायु का संचार तो किया है पर शेष जीवन हम अपने ही कर्म तथा व्यवहार का परिणाम भोगते हैं।  इतना ही नहीं हमें अपने अंदर के गुणों तथा दोषों का अवलोकन करते हुए अपनी रणनीति बनानी चाहिये।  एक बात तय है कि कर्म के अनुसार परिणाम होता है और वह हमारी इच्छानुसार न भी मिले तो भी हमारे अंदर की शक्ति तथा गुणों को हमसे कोई नहीं छीन सकता।  इसलिये हमें अपने अंदर के गुणों तथा शक्ति का विस्तार करना चाहिये। अपने अंदर मौजूद कमियों को समाप्त करना संभव नहीं है पर ऐसी रणनीति बनाना चाहिये कि वह हमारी लक्ष्य प्राप्ति में बाधा न बने।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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अम्भोजिनी वनविहार विलासमेव हंसस्य हन्ति नितरां कुपितो विधाता।
न तवस्य दुग्धजलभेविधौ प्रसिद्धां वैदग्ध्यकीर्तिमपहर्तुमसौ समर्थः।।
            हिन्दी में भावार्थ-परमात्मा हंस पर क्रोधित होने पर उस वनविहार अवरुद्ध कर सकता है पर जल और दूध में भेद करने के उसके गुण को छीन नहीं सकता।
            यह समझ लेना चाहिये कि हमारी देह में रहने वाली तीन प्रकृत्तियों-मन, बुद्धि और अहंकार-अपनी अनुसार काम करती है। उन पर नियंत्रण करने वाला ही जितेंद्रिय कहलाता है।  इस संसार में अच्छा बुरा समय सभी का आता है पर जितेंद्रिय पुरुष अपने पराक्रम से अपनी लक्ष्य की तरफ बढ़ता जाता है।  उसे पता होता है कि अगर अच्छा समय नहीं रहा तो बुरा समय भी नहीं रहेगा। उसे यह भी विश्वास होता है कि अपने गुणों के सहारे वह प्रतिकूल स्थिति को अनुकूल बनाकर अपना लक्ष्य प्राप्त करेगा।  उसका मनोबल सदैव बढ़ा हुआ रहता है।  यह मनोबल तभी बढ़ा हुआ रहा सकता है जब हम आत्ममंथन की प्रक्रिया में सदैव लगे रहें।

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Saturday, November 30, 2013

दूसरों का विकास देखकर उनको आदर्श पुरुष न माने-हिन्दी चिंत्तन लेख(dusron ka vikas dekhkar unko aadarsh purush n mane-hindi chinntan lekh)



                        विश्व के अधिकतर देशों में जो राजनीतक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थायें हैं उनमें सादगी, सदाचार तथा सिद्धांतों के साथ विकास करते हुए उच्चत्तम शिखर पर कोई सामान्य मनुष्य नहीं पहुंच सकता।  अंग्रेज विद्वान जार्ज बर्नाड शॉ का मानना था कि कोई भी व्यक्ति ईमानदारी से अमीर नहीं बन सकता। अंग्रेजों  ने अनेक देशों में राज्य किया।  वहां से हटने से पूर्व  अपने तरह की व्यवस्थायें निर्माण करने के बाद ही किसी देश को आजाद किया।  यही कारण है सभी देशों में आधुनिक राज्यीय, सामाजिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं के शिखर पर अब सहजता से कोई नहीं पहुंच पाता।  यही कारण है कि उच्च शिखर पर वही पहुंचते हैं जो साम, दाम, दण्ड और भेद सभी प्रकार की नीतियां अपनाने की कला जानते हैं। याद रहे यह नीतियां केवल राजसी पुरुष की पहचान है। सात्विक लोगों के लिये यह संभव नहीं है कि वह उस राह पर चलें। वैसे भी शिखर वाली जगहों पर राजसी वृत्ति से काम चलता है। ऐसे में उच्च स्थान पर पहुंचने वालों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह निष्काम भाव से कर्म तथा निष्प्रयोजन दया करें। 
मनु स्मृति में  कहा गया है कि
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अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति।
ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति।।

            हिन्दी में भावार्थ-अधर्म व्यक्ति अपने अधार्मिक कर्मों के कारण भले ही उन्नति करने के साथ ही अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता दिखे पर अंततः वह जड़ मूल समेत नष्ट हो जाता है।
            राजसी पुरुषों का आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा अन्य क्षेत्रों में जो तेजी से विकास होता है उसे देखकर सात्विक प्रवृत्ति के लोग भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। खासतौर से युवा वर्ग को शिखर पुरुषों का जीवन इस तरह का तेजी से विकास की तरफ बढ़ता देखकर उनके आकर्षण का शिकार हो जाते हैं।  जिनकी प्रकृति सात्विक है वह तो अधिक देर तक इस पर विचार नहीं करते पर जिनकी राजसी प्रवृत्ति है वह अपना लक्ष्य ही यह बना लेते हैं कि वह अपने क्षेत्र में उच्च शिखर पर पहुंचे। न पहुंचे तो  कम से कम किसी बड़े आदमी की चाटुकारिता उसके नाम का लाभ उठायें।  यह प्रयास सभी को फलदायी नहीं होता। सच बात तो यह है कि कर्म और और उसके फल का नियम यही है कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। देखा यह भी जाता है कि उच्च शिखर पर येन केन प्रकरेण पर पहुंचते हैं उनका पतन भी बुरा होता है।  इतना ही नहीं भले ही बाह्य रूप से प्रसन्न दिखें आंतरिक रूप से भय का तनाव पाले रहते हैं।  अतः दूसरों का कथित विकास देखकर कभी उन्हें अपना आदर्श पुरुष नहीं मानना चाहिये।
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Saturday, November 09, 2013

सहज भाव से जीवन बिताना ही वास्तविक धर्म-हिन्दी चिंत्तन लेख



            हमारे देश में धर्म के विषय पर दो धारायें हमेशा प्रचलित रही हैं-एक निराकार भक्ति तथा दूसरी साकार भक्ति।  जहां तक हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों में वर्णित सामग्री की बात है तो उसमें दोनों ही प्रकार की भक्ति को ही मान्य किया गया है।  वैसे हमारे प्राचीन ऋषियों, मुनियां तथा तपस्वियों ने सदैव ही परमात्मा के निराकार रूप को ही श्रेष्ठ माना है पर देखा यह गया है कि समाज के सामान्य जनों ने हमेशा ही साकार भक्ति करने में ही अपनी सिद्धि समझी है।  समाज ने ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों को अपने हृदय में तो स्थान दिया पर उनकी निराकार भक्ति से कभी प्रेरणा नहीं ली।  यही कारण है कि साकार भक्ति के कारण पूरा समाज धीरे धीरे तार्किक गतिविधियों की तरफ बढ़ता चला गया।  दरअसल साकार भक्ति में हर मनुष्य अपनी दैहिक सक्रियता न केवल स्वयं देखता है बल्कि दूसरों को भी दिखाकर सुख उठाना चाहता है।
                        मंदिर में जाकर फल, फूल, दूध तथा तेल चढ़ाने की परंपरा साकार तथा सकाम भक्ति का ही प्रतीक हैं। इसके अलावा भी प्रसाद तथा वस्त्र भी मूर्तियों पर चढ़ाये जाते हैं।  इन सब वस्तुओं की आपूर्ति बाज़ार करता है। अनेक मंदिरों में विशेष अवसरों पर पूजा सामग्री, प्रसाद तथा मूर्तियों की दुकानें लगी देखी जा सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि सकाम तथा साकार भक्ति के कारण बाज़ार को लाभ होता है जैसा कि हम जानते हैं कि आर्थिक प्रबंधक सदैव ही अपनी वस्तुओं के प्रचार तथा उनके विक्रय के लिये सक्रिय रहते है।  कभी वह अपनी वस्तुओं का विक्रय करने के लिये किसी स्थान को सिद्ध प्रचारित करते हैं तो कभी अपनी वस्तु को सिद्ध बताकर भगवान के लिये अर्पण करने के लिये लोगों को प्रेरित करते है। इतना ही नहीं मनुष्य में जीवन के रहस्यों को जानने की जो जिज्ञासा होती है उसके लिये मोक्ष तथा स्वर्ग के भी रूप भिन्न भिन्न रूप तैयार किये गये हैं।  जिस धर्म के सिद्धांत अत्यंत सीमित और संक्षिप्त हैं उस पर ही लंबी लंबी बहसें होती हैं। यह बहसें तत्वज्ञान के नारों से शुरु तो होती हैं और समाज अज्ञान के अंधेरे में होती हैं।  दान और दया के रूप को कोई समझ हीं नहीं आया।  गुरु हमेशा ही अपने आश्रमों के लिये दान मांगते हैं तो दया के के नाम पर अपने व्यवसाय के लिये चंदा प्राप्त करने के लिये रसीदें काटते हैं।
महर्षि चाणक्य कहते हैं कि
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यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु।
तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलैपनैः।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जिसके चित्त में सभी प्राणियों के लिऐ दयाभाव है उसे शरीर पर भस्म लगाने, जटायें बढ़ाने, तत्वज्ञान प्राप्त करने तथा मोक्ष के लिये कोई प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है।
                        जिस मनुष्य में जीवन के प्रति सहज भाव है उसे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। संत रविदास ने कहा है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा। इसके विपरीत बाज़ार के आर्थिक स्वामी तथा प्रचार प्रबंधक अपने शोर से लोगों के मन को ही भटकाते हैं। जिस धर्म का सही ढंग से एकांत में हो सकता है उसे उन्होंने चौराहे पर चर्चा का विषय बना दिया है। भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व में यही स्थिति है।  हर धर्म के ठेकेदार अपने निर्धारित विशिष्ट रंगों के वस्त्र पहनकर यह प्रमाणित करते हैं कि वह अपने समाज के माननीय है। यह अलग बात है कि किसी भी धर्म के मूल प्रवर्तक ने अपने समाज के लिये किसी खास रंग की पहचान नहीं बनायी।  इस तरह धर्म को लेकर एक तरह से भ्रम की स्थिति बन गयी है।
                        अगर हम प्राचीन ग्रंथों के आधार पर धर्म के सिद्धांत की पहचान करें तो वह आचरण के आधार पर बना हुआ होता है। उसको कोई निश्चित कर्मकांड नहीं है। यही कारण है कि धार्मिक रूप से हमारे यहां एकता है पर कर्मकांडों में स्थान और क्षेत्र के आधार पर भिन्नता पायी जाती है। जहां तक स्वयं घर्म के आधार पर चलने का प्रश्न है तो उस पर अवश्य विचार करना चाहिये। प्रातःकाल उठकर योगसाधना तथा पूजा आदि कर मन को स्वस्थ तथा प्रसन्न चित्त बनाना चाहिये। उससे पूरा दिन अच्छा निकलता है। धर्म को लेकर लोगों से अधिक चर्चा नहीं करना चाहिये क्योंकि अधिकतर लोग इस बारे में अपना ज्ञान बघारते हैं। हमारे आसपास धर्म के मार्ग  पर चलने वाले लोग उंगलियों पर गिनती करने लायक ही होते हैं।                       


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