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Sunday, February 24, 2013

यजुर्वेद के आधार पर चिंत्तन लेख-संघभाव से ही निर्भय होना संभव( uajurved ke adhar par dhinttan lekh-sanghbhav se hee nirbhay hona sambhav)

        इस धरती पर अधिकतर जीव समूह बनाकर चलते हैं।  समूह बनाकर चलने की प्रवृत्ति अपनाने से  मन में सुरक्षा का भाव पैदा होता है। मनुष्य का जिस तरह का दैहिक जीवन है उसमें तो उसे हमेशा ही समूह बनाकर चलना ही चाहिये।  जिन व्यक्तियों में थोड़ा भी ज्ञान है वह जानते हैं कि मनुष्य को समूह में ही सुरक्षा मिलती है।  जब इस धरती पर मनुष्य सीमित में संख्या थे तब वह अन्य जीवों से अपनी प्राण रक्षा के लिये हमेशा ही समूह बनाकर रहते भी थे। जैसे जैसे मनुष्यों की संख्या बढ़ी वैसे अहंकार के भाव ने भी अपने पांव पसार दिये।  अब हालत यह है कि राष्ट्र, भाषा, जाति, धर्म और वर्णों के नाम पर अनेक समूह बन गये हैं।  उनमें भी ढेर सारे उप समूह हैं।  इन समूहों का नेतृत्व जिन लोगों के हाथ में है वह अपने स्वार्थ के लिये सामान्य सदस्यों का उपयोग करते हैं।  आधुनिक युग में भी अनेक मानवीय समूह  नस्ल, जाति, देश, भाषा, धर्म के नाम पर बने तो हैं पर उनमें संघभाव कतई नहीं है।  संसार का हर व्यक्ति  समूहों का उपयोग तो करना चाहता है पर उसके लिये त्याग कोई नहीं करता। यही कारण है कि पूरे विश्व में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में भारी तनाव व्याप्त है।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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सम्भूर्ति च विनाशं च यस्तद्वेदोभयथ्सह।
विनोशेन मृतययुं तीत्वी सम्भूत्यामृत मश्नुते।।
     हिन्दी में भावार्थ-जो संघभाव को जानता है वह विनाश एवं मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। इसके विपरीत जो उसे नहीं जानता वह हमेशा ही संकट को आमंत्रित करता है।

वाचमस्तमें नि यच्छदेवायुवम्।
      हिन्दी में भावार्थ-हम ऐसी वाणी का उपयोग करें जिससे सभी लोगों का एकत्रित हों।
              हृदय में संयुक्त या संघभाव धारण करने का यह मतलब कतई नहीं है कि हम अपनी समूह के सदस्यों से सहयोग या त्याग की आशा करें पर समय पड़ने पर उनका साथ छोड़ दें।  हमारे देश में संयुक्त परिवारों की वजह से सामाजिक एकता का भाव पहले तो था पर अब सीमित परिवार, भौतिकता के प्रति अधिक झुकाव तथा स्वयं के पूजित होने के भाव ने एकता की भावना को कमजोर कर दिया है।  हमने उस पाश्चात्य संस्कृति और व्यवस्था को प्रमाणिक मान लिया है जो प्रकृति के विपरीत चलती है। हमारा अध्याित्मक दर्शन व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के क्रम में चलता जबकि पश्चिम में राष्ट्र, समाज, परिवार और व्यक्ति के क्रम पर आधारित है।  हालांकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन यह भी मानता है कि जब व्यक्ति स्वयं अपने को संभालकर बाद  समाज के हित के लिये भी काम करे तो वही वास्तविक धर्म है।  कहने का अभिप्राय है कि हमें अपनी खुशी के साथ ही अपने साथ जुड़े लोगों के हित के लिये भी काम करना चाहिये।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, February 16, 2013

अथर्ववेद के आधार पर चिंत्तन-आस्थाहीन मनुष्य माया पर मोहित रहते हैं(thought on based on atharvaved-asthaheen manushya maya par mohit rahte hain)

           यह संभव नहीं है कि मानव मन का कोई स्वामी न हो। जो मनुष्य कहते हैं कि हमारी किसी भी प्रकार के परमात्मीय रूप में आस्था नहीं है वह स्पष्टतः इस मायावी संसार को अपने हृदय में धारण किये रहते हैं।  कहने को भले ही उनको नास्तिक कहा जाये यह वह स्वयं ही इसका बखान करें पर सच यह है कि मानव मन का स्वामी या तो सत्य होता है या माया।  श्रीमद्भागवतगीता को लेकर हमारे देश में अनेक भ्रम प्रचलित हैं। कहा जाता है कि यह एक पवित्र किताब है और इसका सम्मान करना चाहिए पर उसमें जो तत्वज्ञान है उसका महत्व जीवन में कितना है इसका आभास केवल ज्ञानी लोगों को श्रद्धापूर्वक अध्ययन करने पर ही हो पाता है। श्रीगीता को पवित्र मानकर उसकी पूजा करना और श्रद्धापूर्वक उसका अध्ययन करना तो दो प्रथक प्रथक क्रियायें हैं। श्रीगीता में ऐसा ज्ञान है जिससे हम न केवल उसके आधार पर अपना आत्ममंथन कर सकते हैं बल्कि दूसरे व्यक्ति के व्यवहार, खान पान तथा रहन सहन के आधार पर उसमें संभावित गुणों का अनुमान भी कर सकते हैं। गीता का ज्ञान एक तरह से दर्पण होने के साथ दूरबीन का काम भी करता है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग परमात्मा की निष्काम आराधना करते हुए अपने अंदर ऐसी पवित्र बुद्धि स्थापित होने की इच्छा पालते हैं जिससे वह ज्ञान प्राप्त कर सकें। जब एक बार ज्ञान धारण कर लिया जाता है तो फिर इस संसार के पदार्थों से केवल दैहिक संबंध ही रह जाता है। ज्ञानी लोग उनमें मन फंसाकर अपना जीवन कभी कष्टमय नहीं बनाते।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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ये श्रद्धा धनकाम्या क्रव्वादा समासते।
ते वा अन्येषा कुम्भी पर्यादधति सर्वदा।।
            ‘‘जो श्रद्धाहीन और धन के लालची हैं तथा मांस खाने के लिये तत्पर रहते हैं वह हमेशा दूसरों के धन पर नजरें गढ़ाये रहते हैं।’’
भूमे मातार्नि धेहि भा भद्रया सुप्रतिष्ठतम्।
सविदाना दिवा कवे श्रियां धेहि भूत्याम्।।
         ‘‘हे मातृभूमि! सभी का कल्याण करने वाली बुद्धि हमें प्रदान कर। प्रतिदिन हमें सभी बातों का ज्ञान कराओ ताकि हमें संपत्ति प्राप्त हो।’’
          इस तत्वज्ञान के माध्यम से हम दूसरे के आचरण का भी अनुमान प्राप्त कर सकते हैं। जिनका खानपान अनुचित है या जिनकी संगत खराब है वह कभी भी किसी के सहृदय नहीं हो सकते। भले ही वह स्वार्थवश मधुर वचन बोलें अथवा सुंदर रूप धारण करें पर उनके अंदर बैठी तामसी प्रवृत्तियां उनकी सच्ची साथी हो्रती हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि तत्वज्ञान में ज्ञान तथा विज्ञान के ऐसे सूत्र अंतर्निहित हैं जिनकी अगर जानकारी हो जाये तो फिर संसार आनंदमय हो जाता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Monday, February 04, 2013

पतंजलि योग साहित्य-जीवन में प्रसन्नता देता है अहिंसा का भाव (ahinsa ka bhav jiwan mein khush rakhta hai-patanjali yog sootra)

             हिंसा का भाव हमेशा ही मनुष्य में नहीं रहता  बल्कि उसके  मन का अहिंसा एक स्थाई भाव है जिसमें स्थित मनुष्य न केवल स्वयं आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करता है वरन समाज में लोकप्रिय होता है।  जो  व्यक्ति  हिंसक व्यापार  में लिप्त रहता होता है वह भी हर समय हथियार में उठाए नहीं रहता।  श्रीमद्भागवत गीता में बताया गया है कि इस संसार के सारे पदार्थ परमात्मा के संकल्प के आधार पर स्थित पर वह उनमें नहीं है। यहां इस बात को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि इस संसार के देहधारी जीव के संकल्प से गहरा संबंध है क्योंकि वह अंततः उसी परमात्मा का अंश हैं। इसलिये जीव भले ही इस संसार और भौतिक पदार्थों को धारण करे वह उसमें अपना भाव लिप्त न करे,  इसे ही निष्काम भाव भी कहा जाता है। हम अगर योग साधना और ध्यान करने के साथ श्रीमद्भावगत गीता का अध्ययन करें तो धीरे धीरे यह बात समझ में आने लगेगी कि यह संसार की प्रकृति और इसमें स्थित समस्त पदार्थ न बुरे हैं न अच्छे, बल्कि वह हमारे संकल्प के अनुसार कभी प्रतिकूल तो कभी अनुकूल होते हैं। इसलिये हम अपने हृदय के अंदर अहिंसा, त्याग, तथा परोपकार के संकल्प धारण करें तो यह सारा संसार और पदार्थ हमारे अनुकूल हो जायेंगे।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः।
           ‘‘हृदय में अहिंसा का भाव जब स्थिर रूप से प्रतिष्ठ हो जाता है तब उस योगी के निकट सब प्राणी वैर का त्याग कर देते हैं।
अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्।
               ‘‘हृदय जब चोरी के भाव से पूरी तरह रहित हो जाता है तब उस योगी के समक्ष सब प्रकार के रत्न प्रकट हो जाता है।’’
          अधिकतर लोग यह तर्क देते हैं कि यह संसार बिना चालफरेब के चल नहीं सकता। यह लोगों की मानसिक विलासिता और बौद्धिक आलस्य को दर्शाता है। एक तरह से यह मानसिक विकारों से ग्रसित लोगों का अध्यात्मिक दर्शन से परे एक बेहूदा तर्क है। हम यह तो नहीं कहेंगे कि सारा समाज ही मानसिक विकारों से ग्रसित है पर अधिकतर लोग इस मत के अनुयायी हैं कि जैसे दूसरे लोग चल रहे हैं वैसे ही हम भी चलें। कुछ लोग ऐसे जरूर हैं जो इस सत्य को जानते हैं और अपने देह, हृदय तथा मस्तिष्क से विकारों की निकासी कर अपना संकल्प शुद्ध रखते हुए अपना जीवन शांति  से जीते हैं। ऐसे लोग संख्या में नगण्य होते हैं पर समाज के लिये वही प्रेरणास्त्रोत होते हैं। उनसे ही इसकी प्रेरणा लेना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Tuesday, January 22, 2013

विदुर नीति-अहंकारी के लिये मद विष समान (ahankari ke liye mad vish saman-vidur neeti)

          पंच तत्वों ने बनी मनुष्य की देह में मन और बुद्धि की तरह ही अहंकार की प्रकृति भी विराजती है।  विरले ही ज्ञानी, ध्यानी और तपस्वी ही होते हैं जो अपने अहंकार पर नियंत्रण रखते हैं-याद रहे देह का अभिन्न हिस्सा होने के इस प्रकृति को समूल नष्ट करना संभव नहीं है। ऐसे में जिन लोगों को अधिक विद्या, धन और पद मिलता है उनसे यह आशा करना ही व्यर्थ है कि वह अपने अहंकार में आकर अपने से कमतर आदमी को सम्मान दें।  इसके अलावा जिनको लगता है कि उनका कुल समाज में सबसे श्रेष्ठ है, उनसे अन्य समाज के लोगों को सम्मान देने की आशा करना भी व्यर्थ है।
          सच बात तो यह है कि हमारे देश में इस अहंकार से पैदा हुए सामाजिक वैमनस्य का यह  परिणाम है कि भौतिक रूप से संपन्न होते हुए भी विश्व में हमें आर्थिक रूप से पिछड़ा माना जाता है।  छोटी छोटी बातों पर समाज में सामूहिक संघर्ष होते हैं।  हम अपनी जिस आजादी पर इतराते हैं उसका यह भी एक पक्ष में है कि जिस मात्रा में इधर से उधर लोगों का उस दौरान पलायन हुआ उसकी मिसाल दुनियां  में किसी देश के इतिहास में नहीं मिलती।  भारत छोड़ रहे अंग्रेजों ने इस देश के भविष्य में अत्यंत शक्तिशाली होने की आशंका से इसके दो टुकड़े करने के लिये तत्कालीन शिखर पुरुषों को आपस में इस तरह उलझाया कि वह अपने अहंकार में लड़ते रहे और देश में इधर उसे उधर पलायन हुआ।
विदुर महाराज का कहना है कि
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विद्यामदो धनमदस्तृतीयोऽभिजनो मदः।
मदा एतेऽवलिप्तनामेत एवं संतां दमः।।
           हिन्दी में भावार्थ-विद्या का मद, धन और ऊंचे कुल का यह तीन प्रकार का मद होता है। अहंकारी के लिये यह मद विष के समान होता है जो अंततः उसे पतन की तरफ ले जाता है, परंतु सहृदय व्यक्ति के लिये यह दम का साधन होता है।

अनर्थमर्थतः पश्यत्रर्थ चैवाप्यनर्थतः।
इन्द्रियैरजितैबॉलः सुदुःखं मन्यते सुखम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-इंद्रियांवश में न होने के कारण अर्थ को अनर्थ और अनर्थ को अर्थ समझने वाला मनुष्य दुःख को भी सुख मान बैठता है।        जब हम देश की हालात पर नज़र डालते हैं तो लगता है कि चरित्र की दृष्टि से बौने लोग अपने से बड़े कद वाले पद पर पहुंच गये हैं।  जिन्होंने भूतकाल में कभी लोगों का भला नहीं किया समाज का भविष्य संवारने के लिये वही शिखर पर बैठ गये हैं।  समाज सेवा पेशा बन गयी तो धर्म बेचने की वस्तु की तरह बाज़ार में सजा हुआ दिखता है।  जिन लोगों ने भारत के प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कर ज्ञान का रट्टा लगाया है  वह महाज्ञानी बनकर समाज पर शासन करना चाहते हैं।  शिष्य और धन संग्रह कर ऐसे कथित महाज्ञानियों को स्वयं के बारे में ही यह भ्रम हो जाता है कि वह वाकई समाज के भगवान हैं।  इसके विपरीत जो ज्ञानी है वह शांति से समाज की सेवा करते हैं।  अपने प्रचार के लिये उनको किसी प्रचार की आवश्यकता नहीं होती।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, January 17, 2013

कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन-धीर और नीतिवान पुरुष संकट से बचता है

              अंग्रेजी शिक्षा पद्धति तथा आधुनिक प्रचार साधनों में-फिल्म, टीवी और इंटरनेट पर-शीघ्र अमीर और प्रसिद्ध होने के नुस्खे खूब बताये जाते हैं। सत्य तो यह है कि आधुनिक शिक्षा वैसे ही आदमी में चिंत्तन क्षमता निर्माण नहीं करती तो वही प्रचार माध्यम उसमें अधीरता के भाव का निर्माण करते हैं जिससे विश्व समाज असमंजस वातावरण में सांस ले रहा है।   फिल्मों में नायकों के पात्रों का सृजन कर लोगों का मनोरंजन किया जाता है पर उनकी पटकथायें हमेशा ही हिंसा से बेहतर परिणामों को प्रदर्शित करती है।  सभी नायक अपने सामने आने वाले खलनायकों को बल से मारते हैं। कहीं नीति से किसी खलनायक का पतन होते नहीं दिखाया जाता है।
     भारत ही नहीं विश्व के अधिकांश देशों की व्यवस्थायें आधुनिक समय में विफल साबित हो रही हैं।  जनाक्रोश बढ़ रहा है और इसका लाभ फिल्म वाले उठाते हैं।  हाल ही में भारत के एक प्रसिद्ध शायर ने कहा था कि भारत के एक अभिनेता की ‘‘नाखुश युवा’’ की छवि फिल्म के पटकथाकारों ने बनाई थी।  दरअसल उनका कहना था कि भारत में भेजा गया एक कुख्यात आतंकवादी इसी तरह का एक युवा था जिसे देश के दुश्मनों ने वास्तविक हमले की पटकथा का सृजन कर  भेजा अतः उसे भेजने वाले लोगों को भी कड़ी सजा देने या दिलाने का प्रयास करना चाहिए।  देश के कुछ बुद्धिमानों ने इस की  आपत्ति की कि एक महानायक की एक आतंकवादी से तुलना क्यों की गयी? जबकि उन महान शायर का आशय यह था कि जिस तरह पटकथाकार किसी कल्पित पात्र का सृजन करता है उसी पर कोई अभिनेता अपनी नायक की भूमिका निभाता है।  उसी तरह उस आतंकवादी को भारत के दुश्मनों ने ऐसे ही वास्तविक हमले की पटकथा रचकर यहां अपराध करने के लिये उकसाया।  दरअसल विश्व में हिंसा फैलाकर अपना मतलब साधने वाले ऐसे ही युवकों का उपयोग कर रहे हैं। आदमी आधुनिक रूप से शिक्षित हो या अशिक्षित कोई अंतर नहीं रह गया क्योंकि आध्यात्म्कि ज्ञान से सभी दूर हैं।  पूरे विश्व की सभी भाषाओं की फिल्मों में हिंसा दिखाई जाती है। कहा तो यह जाता है कि यह सब समाज में चल रहा है इसलिये दिखा रहे हैं पर यह भी सच यह है कि इससे हिंसक घटनायें बढ़ जाती हैं।  अगर आप न्यूयार्क में हुई हिंसक घटना को ऐसी फिल्म में दिखायेंगे जो सारे विश्व में दिखती है तो यह बात तय है कि उसकी पुनरावृत्ति करने के लिये अनेक अनीतिवान और अपराधी तत्व तैयार हो जायेंगे। यह अलग बात है कि ऐसे लोग एक दो बार ही ऐसे अपराध करते हैं बाद में स्वयं भी काल कलवित हो ही जाते हैं।
आशिक्षितनयः सिंहो हन्तीमं केवलं बलात्।
तच्च धीरो नरस्तेषां शातानि जातिमाञ्जायेत्।।
          हिन्दी में भावार्थ- अशिक्षित सिंह ने कोई नीति नहीं सीखी होती, वह केवल अपने बल से ही  नष्ट कर डालता है जबकि ज्ञानी और धीर पुरुष अपनी नीति से सैंकड़ों को मारता है।
         पश्चयद्भिर्दूरतोऽपायान्सूपायप्रतिपत्तिभिः।
          भवन्ति हि फलायव विद्वाद्भश्वन्तिताः क्रियाः।।
                    हिन्दी में भावार्थ-जो विद्वान पुरुष दूर से ही आती विपत्ति को देखकर उसके प्रतिकार का विचार करता है वह अपना बचाव करने में सक्षम होता है।
         जो लोग नीति और धीरज के साथ जीवन में रहते हैं उनकी शक्ति बहुत ज्यादा होती है।  महर्षि विवेकानंद ने अपने अल्प जीवन में पूरे विश्व में  भारतीय ज्ञान का प्रकाश फैलाया। उसी तरह भारतीय क्रिकेट के दो महान खिलाड़ियों  कपिल देव और धोनी ने अपनी कप्तानी में विश्व कप जितवाया। धोनी तो पहले बीस ओवर और अब पचास दो विश्व कप जितवा चुके हैं। अगर आदमी में धीरज और ज्ञान हो तो वह अपने सामर्थ्य से सारे समाज को प्रसन्न करने के साथ ही उसका मार्गदर्शन भी करता है।  इसलिये किसी भी प्रचार में आकर जल्दबाजी में सफलता हासिल करने की बजाय धीरज के साथ ही योजना बनाकर लक्ष्य प्राप्त करना चाहिये।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, January 04, 2013

विदुर नीति-धनी से अधिक दरिद्र स्वाद चखता है (vidur neeti-dhani se adhik daridra swad chakhta hai)

            परमात्मा ने यह संसार अत्यंत विचित्र ढंग से रचा है।  उससे अधिक वह माया है जो सभी को नचाती है।  जिसके पास धन है उसके पास व्यय करने का समय नहीं है। व्यय करने का समय है तो सुख प्राप्त करने की कला वह भुला रहता है।  मनुष्य माया के चक्र में फंसने के बाद अपनी सारी दिनचर्या को अनियमित बना देता है।  ढेर सारी दौलत एकत्रित करने के बाद उसका शरीर इस कदर विकारग्रस्त हो जाता है कि न तो वह ढंग से सो पाता है न खा पाता है।  आजकल हमारे देश में राजरोगों का जाल फैल गया है। मधुमेह, हृदयघात, वायुविकार और घुटनों के दर्द की शिकायत ऐसे लोग करते हैं जो अत्यंत धनी है।  दरअसल धन के फेर में उनका शरीर जर्जर हो जाता है।  बाहर से भले ही रहन सहन से वह अत्यंत स्वस्थ दिखते हैं पर अंदर ही अंदर उनका शरीर खोखला हो जाता है।  इसके विपरीत दरिद्र की स्थिति भले ही धन की कमी की वजह से ठीक न हो पर दैहिक सुख की दृष्टि से वह धनी होता है।  आमतौर से श्रमकार्य करने वाले लोग कभी राजरोगों की शिकायत नहीं करते।  दैहिक विकार उनके पसीने के साथ बह जाते हैं।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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सम्पन्नतरमेवान्न दरिद्र सदा।
क्षुत् स्वादुताँ जनपति सा चाड्येषु सुदुर्लभा।।
           हिन्दी से भावार्थ-निर्धन आदमी भोजन का जितना स्वाद लेता है उतना धनियों के लिये संभव नहीं है। धनियों के लिये यह स्वाद दुर्लभ है।
प्रावेण श्रीमतां लोक भोक्तुं शक्तिनं विद्यते।
जीर्वन्त्यपि हि काष्ठानि दरिद्राणं महपिते।।
           हिन्दी में भावार्थ- इस संसार में धनियों के भोग करने की शक्ति अत्यंत क्षीण होती है जबकि दरिद्र मनुष्य काष्ठ की लकड़ी को भी पचा जाता है।
       हमारे देश में जैसे जैसे कथित आर्थिक विकास में वृद्धि का आंकड़ा ऊंचाई की तरफ जाता दिखता है  वैसे ही स्वास्थ्य की तस्वीर अत्यंत विकृत होती जा रही है।  टीवी चैनलों पर राजरोगों के निवारण के लिये बनी दवाओं के ढेर सारे विज्ञापन आते हैं।  इन दवाई कंपनियों की आय इतनी है कि उनके कारण से फिल्म और धारावाहिकों का प्रायोजन तक होता है।  अनेक अध्यात्मिक चैनल इन राजरोगों के निवारण के लिये दवा बनाने वाली कपंनियों और इलाज करने वाले चिकित्सकों के सहारे चल रहे हैं।  राजरोगों की बढ़ोतरी ने अनेक शहरों में फाईव स्टार अस्पताल बनवा दिये हैं।  इससे सभी शहर चमकदार होते जा रहे हैं।  इन अस्पतालों मे केवल धनियों के आने की प्रतीक्षा होती है।  चिकित्सक अब इतने पेशेवर हो गये हैं कि वह अपने अस्पताल में ही किराने से लेकर दवा तक की व्यवस्था करते हैं।  धोखे से कभी कोई दरिद्र बीमार होकर वहां पहुंच जाये तब उसे पता लगता है कि ऐसे स्वर्ग में आ गया है जहां उसका प्रवेश वर्जित है।
            बहरहाल  दरिद्रता और  धन संपदा के बीच जो वैमनस्य है वह इस दुनिया में चलता रहेगा।  सच बात तो यह है कि इस तरह के विरोधाभास देखकर परमात्मा के लिये कहना पड़ता है कि ‘हे दुनिया बनाने वाले! तूने यह कैसी विचित्र रीतियां बनाई हैं।’’
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, December 29, 2012

विदुर नीति-छह दोष आदमी को सौ वर्ष से पहले मारते हैं (vidur neeti-chhah dosh aadmi ko sau varsh se pahle maarte hain)

           भारतीय दर्शन के अनुसर प्रकृति आधार पर  मनुष्य की आयु सौ वर्ष निर्धारित है।  ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि आखिर मनुष्य अपनी आयु पूरी क्यों नहीं कर पाता? इसका उत्तर यह है कि जिस बुद्धि की वजह से मनुष्य प्रकृत्ति के अन्य जीवों से अधिक विकसित माना जाता है वही उसकी शत्रु भी बन जाती है।  मनुष्य अपनी बुद्धि और मन को स्वच्छ रखने का कोई उपाय नहीं करता बल्कि संसार के उन लुभावने विषयों में पूरी तरह से लिप्त हो जाता है जो कालांतर में उसके अंदर मानसिक तथा दैहिक दोष उत्पन्न करते हैं।
     महाराज धृतराष्ट्र ने महात्मा विदुर से प्रश्न किया कि ‘‘जब परमात्मा ने मनुष्य की आयु कम से कम सौ वर्ष निर्धारित की है तो वह कम आयु में क्यों देह त्यागने को बाध्य होता है?’’
इसके उत्तर में महात्मा विदुर ने कहा कि
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अतिमानोऽतिवादश्च तथात्यागो नराधिप।
क्रोधश्चात्मविधित्सवा च मित्रद्रोहश्च तानि षट्।।
एत एवासयस्तीक्ष्णः कृन्तन्त्यायूँषि देहिनाम्।
एतानि मानवान् धनन्ति न मृत्युर्भद्रमस्तृ।।
           हिन्दी में भावार्थ-अत्यंत अहंकार, अधिक बोलना, त्याग न करना, क्रोध करना, केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति की चिंता में रहना तथा मित्रों से द्रोह करना यह छह दुर्गुण मनुष्य की आयु का क्षरण करते हैं। दुर्गुण वाले मनुष्य का मृत्यु नहीं बल्कि अपने कर्मो के परिणाम ही मारते हैं।
      आदमी की सौ वर्ष से पहले मृत्यु हो जाने पर अनेक लोग यह सवाल करते हैं कि आखिर मनुष्य अपनी आयु क्यों होती है? दरअसल उसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य उपभोग में इतना व्यस्त रहता है कि उसे लगता ही नहीं कि यह संसार कभी वह छोड़ेगा, इसलिये वह शारीरिक और मानसिक विकार एकत्रित करता रहता है।  अगर हम देखें तो प्राचीन काल में लोग अधिक समय तक जीवित रहते थे।  आज भी ग्रामीण क्षेत्र में श्रम करने वाले अनेक लोग शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक आयु तक जीवित रहते हैं।  शहरी क्षेत्रों में जहां आधुनिक आदमी सुविधाभोगी दुषित वातावरण में सांस ले रहा समाज रोगों का प्राप्त होता है वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में मेहनतकश लोग स्वच्छ हवा में सांस लेकर उन राजरोगों से दूर रहते हैं।  शहरी क्षेतों में तो अब साठ  साल तक आदमी शारीरिक दृष्टि  से लाचारी की स्थिति में आ जाता है, जबकि अभी भी  गाँवों  में मेहनत  की वजह से लोग हष्ट पुष्ट दिखते  हैं। इसके अलावा शहरों में धन संपदा की वृद्धि ने लोगों के अंदर अहंकार, गद्दारी तथा अधिक बोलने की ऐसी बीमारियां भर दी हैं जो अंततः आयु का क्षरण करती हैं।
         महात्मा विदुर एक महान विद्वान थे।  सच्चा विद्वान वह है जो जीवन के रहस्यों को जानता हो। इसलिये हमें उनके वचनों का अध्ययन कर जीवन बिताने का प्रयास करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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