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Wednesday, April 28, 2010

संत कबीरदास जी के दोहे-राम की भक्ति का रंग न चढ़े तो दोष किसे दें(ram ki bhakti ka rang-kabirdas ji ke dohe)

राम नाम को छाड़ि कर, करे और की आस।
कहैं कबीर ता नर को, होय नरक में वास।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो मनुष्य राम नाम का स्मरण छोड़कर विषय वासना में रत हो जाते हैं उनको नरक में जाकर निवास करना पड़ता है।
मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग।
कहु धौं कौन कुफेर तें, नाहीं लागत रंग।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग दिन रात भगवान के नाम का जाप करते हैं, साधुओं के पास जाते हैं ऐसे में किसे दोष दें कि उनके जीवन में रंग नहीं चढ़ता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम अपने देश की वर्तमान दशा को देखें तो दुःख होने के साथ कभी कभी हंसी भी आती है।  शायद ही दुनियां में कोई ऐसा देश हो जहां भगवान नाम का स्मरण इतना होता हो पर जितना सामाजिक तथा आर्थिक भ्रष्टाचार है वह भी कहीं नहीं होगा।  लोग एक दूसरे को दिखाने के लिये भगवान का नाम लेने  साथ ही सत्संगों में जाकर साधुओं के प्रवचन सुनते हैं पर घर आकर सभी का व्यवहार मायावी हो जाता है। बड़े शहरों में नित प्रतिदिन धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होने पर वहां लोगों के झुंड के झुंड शामिल होते हैं। कोई प्रवचन सुनता है तो कोई सुनते हुए दूसरे को भी सुनाता है।  कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान की भक्ति लोग केवल दिखावे के लिये करते हैं और उनका लक्ष्य केवल स्वयं को धार्मिक या अध्यात्मिक व्यक्तित्व का स्वामी होने का दिखावा करना होता है।
वैसे हम लोग विषयों के पीछे भागते हैं जबकि सच तो यह है कि वह हमें कभी छोड़ते ही नहीं अलबत्ता हम उनकी सोच को अपने दिमाग में इस तरह बसा लेते हैं कि भगवान का नाम स्मरण करने का विचार ही नहीं आता।  अगर आता भी है तो खाली जुबान से लेते हैं पर उसका स्पंदन हृदय में नहीं पहुंचता क्योंकि बीच रास्ते में विषयों की सोच रूपी पहाड़ उनका मार्ग अवरुद्ध करता है। यही कारण है कि भगवान भक्ति अधिक होने के बावजूद इस देश में नैतिक आचरण गिरता जा रहा है।  बहुत कम लोग ऐसे रह गये हैं जिनमें मानवीय संवेदनायें और सद्भावना बची है।
इस दिखावे का ही परिणाम है कि मायावी समृद्धि की तरफ बढ़ रहे देश में अहंकार, संवेदनहीनता तथा भ्रष्टाचार के कारण नारकीय स्थिति की अनुभूति होती है। जिसके परिणाम स्वरूप हम अपने देश में सामाजिक वैमनस्य की बढ़ती प्रवृत्ति भी देख सकते हैं। ऐसा अध्यात्मिक शिक्षा के प्रति अरुचि के कारण ही हो रहा है यह बात याद रखना चाहिये।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Monday, April 26, 2010

मनु दर्शन-झूठी गवाही देने वाले को होता है जलोदर रोग (jhoothi gavahi dena bura-manu darshan)

साक्ष्येऽनृतं वदन्याशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम्।
विवशः शमाजातीस्तरस्मात्साक्ष्यं वदेदृतम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
झूठी गवाही देने वाले मनुष्य, वरुण देवता के पाशों से बंधकर सैंकड़ों वर्षों तक जलोदर बीमारियों से ग्रसित जीवन गुजारता है। अतः हमेशा किसी के पक्ष में सच्ची गवाही ही देना चाहिये।
द्यौर्भूमिरापो हृदयं चंद्रर्काग्नि यमानिलाः।
रात्रिः सन्ध्ये च धर्मख्च वृत्तजाः सर्वदेहिनाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनु महाराज के अनुसार आकाश, पृथ्वी, पानी, हृदय, चंद्र, सूर्य, अग्नि, यम, वायु, रात संध्या और धर्म सभी प्राणियों के सत् असत् कर्मों को देखते हैं। इनको देवता ही समझना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्या हम सोचते हैं कि हम कोई भी काम कर रहे हैं तो दूसरा कोई उसे नहीं देख रहा? ऐसी गलती कभी न पालें। इस धरा पर ऐसे कई जीव विचरण कर रहे हैं जिनको हम नहीं देख पाते पर वह हमें देख रहे हैं। दूसरों की छोड़िये अपने अंदर के हृदय को ही कहां देख पाते हैं। यह हृदय भी देवता है पर उसे कहां समझ पाते हैं? वह लालायित रहता है धर्म और परोपकार का कार्य करने के लिये पर मनुष्य मन तो हमेशा अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर विचरण करता है। एक नहीं अनेक बार झूठ बोलते हैं। दूसरों की निंदा करने के लिये प्रवृत्त होने पर उसके लिये ऐसे किस्से गढ़ते हैं कि जो हम स्वयं जानते हैं कि वह सरासर झूठ है। मगर बोलते हैं यह मानते हुए कि कोई देख नहीं रहा है।

ऐसे भ्रम पालकर हम स्वयं को धोखा देते हैं। इस चंद्रमा, सूर्य नारायण, प्रथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के साथ हमारा हृदय देवता सब देख रहा है। समय आने पर यह देवता दंड भी देते हैं। अतः कोई भी अच्छा काम करते हुए इस बात की चिंता नहीं करना चाहिये कि कोई उसे देख नहीं रहा तो क्या सुफल मिलेगा तो बुरा कर्म करते हुए इस बात से लापरवाह भी न हों कि कौन देख रहा है जो सजा मिलेगी? झूठी गवाही देने वाले का बुरा हश्र होता है यह बात हमेशा याद रखना चाहिए।
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Friday, April 23, 2010

श्रीगुरुवाणी-घमंड अनेक संकटों का कारण (shri guruvani-ghamand sankat ka karan

‘हउमै नावै नालि विरोध है, दोए न वसहि इक थाई।।’
हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण अहंकार है और इससे अन्य बुराईयां भी पैदा होती है।
जह गिआन प्रगासु अगिआन मिटंतु।
हिन्दी में भावार्थ-
गुरु ग्रंथ साहिब के मतानुसार जिस प्रकार अंधेरे को दूर करने के लिये चिराग की आवश्यकता होती है उसी तरह अज्ञान रूपी अंधेरे को दूर करने के लिये प्रकाश आवश्यक है।
‘हउमै दीरघ रोग है दारु भी इस माहि।
किरपा करे जो आपणी ता गुर का सब्दु कमाहि।।’
हिन्दी में भावार्थ-
अहंकार एक भयानक रोग है जिसकी जड़ें बहुत गहरे तक फैल जाती हैें। इसका इलाज गुरु की कृपा से प्राप्त शब्द ज्ञान से ही संभव हो सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सभी जानते हैं कि अहंकार करना एक बुराई है पर इस रोग को पहचानना भी कठिन है। इसकी वजह यह है कि पंच तत्वों से बनी इस देह में मन और बुद्धि के साथ अहंकार की प्रकृत्ति भी स्वयंमेव बनती है। अनेक बार एक मनुष्य को दूसरे का अहंकार दिखाई देता है पर स्वयं का नहीं। इतना ही नहीं जब कोई व्यक्ति आक्रामक होकर दूसरों के विरुद्ध विषवमन करता है तब सभी लोग उसे अहंकारी कहते हैं जबकि सच यह है कि अहंकार कभी न कभी किसी में आता है या यूं कहें कि यह सभी में रहता है।
किसी भी कर्म में अपने कर्तापन की अनुभूति करना ही अहंकार है। जब मन में यह विचार आये कि ‘मैंने यह किया’ या ‘वह किया’ तब समझ लीजिये कि वह हमारे अंदर बैठा अहंकार बोल रहा है। फिर इससे आगे यह भी होता है कि जब हम किसी का कार्य करते हैं और उसका प्रतिफल भौतिक रूप से नहीं मिलता तब भारी निराशा घेर लेती है। आजकल आप किसी से भी चर्चा करिये वह अपने रिश्तेदारेां, मित्रों और सहकर्मियों के विश्वासघात की शिकायत करता मिलेगा। अहंकार का एक रूप यह भी है कि किसी से एक मनुष्य का काम कर दिया तो वह इस कारण भी उसका काम नहीं करता क्योंकि उसको लगता है कि वह छोटा हो जायेगा-अधिकतर लोग ऐसे भी हैं जो दूसरे के द्वारा कार्य करने पर अहसान मानने की बजाय हक अनुभव करते हैं तो कुछ लोगों को लगता है कि उनके गुणों के कारण कोई स्वार्थवश सेवा कर रहा है तो यह हमारी श्रेष्ठता का प्रमाण है। यही अहंकार मनुष्यों के बीच संघर्ष का कारण बनता है। अतः समय समय पर आत्ममंथन करते हुए इस अहंकार रूप बीमारी से दूर रहना चाहिये।
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Thursday, April 22, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-हंसों में बगुले की तरह होता है ज्ञानियों में अज्ञानी (economic of kautilya-hans aur bagula)

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।
हिन्दी में भावार्थ--
ऐसे माता पिता अपनी संतान के बैरी है जो उससे शिक्षित नहीं करते। अशिक्षित व्यक्ति कभी भी बुद्धिमानो की सभा में सम्मान नहीं पाता। वहां उसकी स्थिति हंसों के झुण्ड में बगुले की तरह होती है।
पुत्राश्च विविधेः शीलैर्नियोज्याः संततं बुधैः।
नीतिज्ञा शीलसम्पनना भवन्ति कुलपजिताः।।
हिन्दी में भावार्थ-
बुद्धिमान व्यक्ति अपने बच्चों को पवित्र कामों में लगने की प्रेरणा देते हैं क्यों श्रद्धावान, चरित्रवान तथा नीतिज्ञ पुरुष ही विश्व में पूजे जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ऐसे समाचार अक्सर आते हैं कि माता पिता को उनके बच्चों ने छोड़ दिया या उनकी देखभाल नहीं करते। अपने देश में बुजुर्गों की देखभाल बच्चों के ही द्वारा की जाये इसके लिये कानून भी बनाया गया। मगर एक सवाल जो कोई नहीं उठाता कि आखिर बुजुर्गों की ऐसी स्थिति ऐसी होती क्यों है? पहले तो ऐसा नहीं होता था। दरअसल पाश्चात्य शिक्षा में केवल रोजगार प्राप्त करने का ही पाठ्यक्रम होता है-वह भी सेठ या पूंजीपति बनने की नहीं बल्कि गुलाम बनाने की योजना का ही हिस्सा है। ऐसे में शिक्षित व्यक्ति नौकरी आदि के चक्कर में अपने परिवार से दूर हो जाता है। ऐसे कई परिवार हैं जिसमें तीन तीन लड़के हैं पर सभी नौकरी के लिये अपने माता पिता को छोड़ जाते हैं। माता पिता अपनी संपत्ति की रक्षा उनके लिये करते हुए अकेले रह जाते हैं। इसके अलावा अगर उनके पास संपत्ति नहीं भी है तो नौकरी पर लगे बेटे के पास दूसरे शहर में वैसा मकान या रहने की स्थिति नहीं है जिससे वह अपने माता पिता को दूर रखता है। जहां तक समाज का काम है वह तो कहता ही रहता है कि अमुक आदमी ऐसा है या वैसा है पर सच यही है कि पाश्चात्य रहन सहन ने समाज में एक तरह से विघटन पैदा किया है और इसके लिये जिम्मेदारी वह माता पिता भी हैं जो अपनी संतान को सही शिक्षा नहीं देते। वह आधुनिक विद्यालयों में अपने बच्चों को शिक्षा के लिये भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं।
दूसरा भी एक सवाल है जिससे कोई नहीं उठाता कि माता पिता यह कहते हैं कि हमने बच्चे को पढ़ाया लिखाया पर उससे वह आखिर बना ही क्या? एक नौकर न! ऐसे में आजकल के लोगों के सामने यह भी समस्या है कि अपनी नौकरी से जूझते हुए अपने परिवार की देखभाल उनके लिये कठिन हो जाती है। ऐसे में पारिवारिक तनाव भी उनके लिये एक संकट हो जाता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि माता पिता अपने बच्चों से उन संस्कारों का फल चाहते हैं जो उन्होंने उनमें बोये ही नहीं। वह केवल अपने बच्चों को कमाने और खाने के अलावा कोई अन्य शिक्षा देते ही नहीं-जिससे वह समाज या धर्म का मतलब समझे-फिर बाद में उसे ही कोसते हैं। इसलिये होना तो यह चाहिए कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ प्राचीन ज्ञान भी प्रदान करने का माता पिता दायित्व स्वयं उठायें। जो माता पिता गुरु का भार स्वयं उठाते हैं उनके बच्चे तेजस्वी बनते हैं।
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Tuesday, April 20, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-स्वर्ग की कल्पना अल्पज्ञान की देन (hindu dharma sandesh-swarg ki kalpana)

स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीपण्डितो युवतीः।
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः।।
हिन्दी में भावार्थ-
शास्त्रों का अध्ययन करने वाले कुछ अल्पज्ञानी विद्वान व्यर्थ ही स्त्रियों की निंदा करते हुए लोगों को धोखा देते हैं क्योंकि तपस्या तथा साधना के फलस्वरूप जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है उसमें भी तो अप्सराओं के साथ रमण करने का सुख मिलने की बात कही जाती है।
उन्मतत्तप्रेमसंरम्भादारभन्ते यदंगनाः।
तत्र प्रत्यूहमाधातुं ब्रह्मापि खलु कातरः।
हिन्दी में भावार्थ-
प्रेम में उन्मत होकर युवतियां अपने प्रियतम को पाने के लिये कुछ भी करने लगती हैं। उनके इस कार्य को रोकने का ब्रह्मा भी सामर्थ्य नहीं रखता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-विश्व के अनेक धर्मों की बड़ी बड़ी किताबें लिखी गयी हैं। उन सभी को पढ़ना कठिन है, पर कोई एक भी पढ़ी जाये तो उसमें तमाम तरह की विसंगतियां नज़र आती है। अधिकतर धार्मिक पुस्तकों के रचयिता पुरुष हैं इसलिये स्त्रियों पर नियंत्रण रखने के लिये विशेष रूप से कुछ कुछ लिखा गया है। यह शोध का विषय है कि आखिर सारे धर्म ही स्त्रियों पर नियंत्रण की बात क्यों करते हैं पुरुष को तो एक देवता मानकर प्रस्तुत किया जाता है। सच बात तो यह है कि अगर पुरुष देवता नहंी है तो नारी भी कोई देवी नहीं है। हर मनुष्य परिस्थतियों, संस्कारों और व्यक्तिगत बाध्यताओं के चलते अपना सामाजिक व्यवहार करता है। अब यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे प्रेरणा कैसी मिलती है। अगर प्रेरणास्त्रोत बुरा है तो वह भी बुरा ही करेगा अगर अच्छा है तो वह अच्छे काम में लिप्त हो जायेगा।
दूसरी जो सबसे बड़ी अहम बात है वह यह कि हर पुरुष और स्त्री का व्यवहार तय करने में उसकी आयु का बहुत योगदान होता है। बाल्यकाल तो अल्लहड़पन में बीत जाता है। उसके बाद युवावस्था में स्त्री पुरुष दोनों का मन नयी दुनियां को देखने के लिये लालायित होता है। विपरीत लिंग का आकर्षण उनको जकड़ लेता है। ऐसे में उन पर जो नियंत्रण की बात करते हैं वह या तो बूढ़े हो चुके होते हैं या फिर जिनका जीवन असाध्य कष्टों के बीच गुजर रहा होता है। कभी कभी तो यह लगता है कि दुनियां के अनेक धर्म ग्रंथ बूढ़े लोगों द्वारा ही लिखे या लिखवाये गये हैं क्योंकि उसमें औरतों पर ही नियंत्रण की बात की जाती है पुरुष को तो स्वाभाविक रूप से आत्मनिंयत्रित माना जाता हैं स्त्रियों के लिये मुंह ढंकने, पिता या भाई के साथ ही घर के बाहर निकलने तथा ऊंची आवाज में न बोलने जैसी बातें कहीं जाती हैं। कभी कभी तो लगता है कि युवतियों की युवावस्था अनेक धर्म लेखकों और विद्वानों के बहुत बुरी लगती है। इसलिये अतार्किक और अव्यवाहारिक बातें लिखते हैं। स्त्री हो या पुरुष युवावस्था में स्वाभाविक रूप से हर जीव अनिंयत्रित होता है-मनुष्य ही नहीं पशु पक्षियों में भी काम वासना की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से देखी जाती है। इस पर युवा स्त्रियों पर नियंत्रण की बात तो व्यर्थ ही लगती है क्योंकि अपने प्रियतम को पाने के लिये जो वह करती हैं उसे रोकने का सामर्थ्य तो विधाता भी नहीं रखता। अलबत्ता सभ्य, कुलीन, शिक्षित तथा बुद्धिमान लड़कियां स्वयं पर नियंत्रण रखती हैं इसलिये ही समाज में अभी तक नैतिकता का आधार बना हुआ है। ऐसी लड़कियों को धार्मिक शिक्षक न भी समझायें तो भी वह मर्यादा में रहती हैं पर जो भटकने पर आमादा है उनको रोकना किसी के लिये संभव नहीं है। कम से कम भर्तृहरि महाराज की समझाइश के अनुसार तो स्त्रियों पर सामाजिक नियंत्रण की बात तो करना ही नहीं चाहिए। दूसरी बात यह कि स्वर्ग कि कल्पना वास्तविकता पर आधारित न होकर अज्ञानियों तथा अल्पज्ञानियों की कल्पना मात्र है।
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Saturday, April 17, 2010

पतंजलि योग दर्शन-योगाभ्यास से उत्पन्न विवेक से प्रकाश फैलता है

योगांगनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
हिन्दी में भावार्थ-
योग साधना के द्वारा अंगों का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होने पर जो विवेक का प्रकाश फैलता है उससे निश्चित रूप से ख्याति मिलती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पतंजलि योग शास्त्र में न केवल योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान की व्याख्या है बल्कि उसका महत्व भी दिया गया है।  अक्सर लोग योगासनों को सामान्य व्यायाम कहकर प्रचारित करते हैं जबकि इसे पतंजलि वैसा ही अनुष्ठान मानते हैं जैसे कि द्रव्य द्वारा किये जाने वाले यज्ञ और हवन।
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण भी योग साधना को एक तरह से यज्ञ मानने का संदेश देते हैं। अगर उनका आशय समझा जाये तो एक तरह से वह अपने भक्तों से इसी यज्ञ की अपेक्षा करते हुए कहते हों कि ‘मुझे योग यज्ञ से उत्पन्न ऊर्जा ही समर्पित करें।’
भगवान श्रीकृष्ण का आशय समझा जाये तो वह  यज्ञ से उत्पन्न अग्नि से ही संतुष्ट होते हैं।  यह यज्ञ सामग्री एक तरह से हमारा पसीना है जिससे देह के विकार निकलकर बाहर आकर नष्ट होते हैं और फिर प्राणयाम तथा ध्यान के संयोग से  उत्पन्न अमृत से  संपन्न हृदय के भाव  हम मंत्रोच्चार के द्वारा परमात्मा को प्रसाद की तरह चढ़ाते हैं।  सर्वशक्तिमान की इच्छा यही होती है कि उसका हर बंदा प्रसन्न और शुद्ध भाव से युक्त हो। योगसाधना उसका एक मार्ग है।  जो लोग योग साधना करते हैं उनको किसी अन्य प्रकार के अनुष्ठान की तो आवश्यकता ही नहीं रह जाती क्योंकि अपने मन, विचार, और बुद्धि की शुद्धि करने से स्वयं ही भक्ति का भाव पैदा होता है।  यह प्रक्रिया इतनी स्वाभाविक होती है कि मनुष्य को फिर किसी अन्य प्रकार से भक्ति करना सुहाता ही नहीं है क्योंकि पूरा दिन उसका मन और शरीर प्रफुल्लित भाव से विचरण करता है और रात्रि को विश्रामकाल प्रतिदिन मोक्ष प्राप्त करते हुए व्यतीत हो जाता है।
सबसे बड़ा लाभ यह है कि योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान से हमारी शरीर और मन की अशुद्धि दूर होने के बाद हमारे कर्म व्यवहार में जो आकर्षण उत्पन्न होता है उससे ख्याति फैलती है। इतना ही नहीं चेहरे पर तेजस्वी भाव देखकर दूसरे लोग प्रभावित भी होते हैं। एक बात याद रखें कि  इसका मतलब यह कतई नहीं है कि योग साधना से कोई चमत्कारी सिद्धि  मिल जाती है अलबत्ता मन और देह में पवित्रता आने से हमारे हाथ से अच्छे काम होते हैं जिससे उसका फल भी अच्चा मिलता है

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Friday, April 16, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-यहाँ हर कोई अभिनेता है (all men is actor-hindu dharma sandesh)

क्षणं बालो भूत्वा क्षणमपि युवा कामरसिकः क्षणं वितैहीनः क्षणमपि च संपूर्णविभवः।
जराजीर्णेंगर्नट इव वलीमण्डितततनुर्नरः संसारान्ते विशति यमधानीयवनिकाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
क्षण भर के लिये बालक, क्षणभर के लिये रसिया, क्षण भर में धनहीन और क्षणभर में संपूर्ण वैभवशाली होकर मनुष्य बुढ़ापे में जीर्णशीर्ण हालत में में पहुंचने के बाद यमराज की राजधानी की तरफ प्रस्थित हो जाता है। एक तरह से इस संसार रूपी रंगमंच पर अभिनय करने के लिये मनुष्य आता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम अपने जीवन को एक दृष्टा की तरह देखें तो इस बात का अहसास होगा कि हम वास्तव में इस धरती पर आकर रंगमचीय अभिनय की प्रस्तुति के अलावा दूसरा क्या करते हैं? अपने नित कर्म में लग रहते हुए हमें यह पता ही नहीं लगता कि हमारी देह बालपन से युवावस्था, अधेड़ावस्था और और फिर बुढ़ापे को प्राप्त हो गयी। इतना ही नहीं हम अपने गुण दोषों के साथ इस बात को भी जानते हैं कि अनेक प्रकार की दैहिक और मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बिना हम चल ही नहीं सकते। इसके बावजूद अपने आपको दोषरहित और कामनाओं से रहित होने का बस ढोंग करते हैं। अनेक मनुष्य अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिये हम आत्मप्रवंचना तो करते हैं पर उनके हाथ से किसी का भला हो, यह सहन नहीं करते।
गरीबों का कल्याण या बालकों को शिक्षा देने की बात तो सभी करते हैं पर कितने लोग अपनी कसौटी पर खरे उतरते हैं यह सभी जानते हैं। स्थिति यह है कि हमारे देश में अनेक लोग बच्चों को अध्यात्मिक शिक्षा इसलिये नहीं देते कि कहीं वह ज्ञानी होकर उनकी बुढ़ापे में उनकी सेवा करना न छोड़ दे। भले ही आदमी युवा है पर उसे बुढ़ापे की चिंता इतनी सताती है कि वह भौतिक संग्रह इस सीमा तक करता है कि उस समय उसके पास कोई अभाव न रहे। कहने का अभिप्राय है कि हर आदमी अपनी रक्षा का अभिनय करता है पर दिखाता ऐसे है कि जैसे कोई बड़ा परमार्थी हो। इस अभिनय के फन में हर कोई माहिर है। 
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