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Saturday, January 08, 2011

योग्य लोग किसी की परवाह नहीं करते-हिन्दी चिंतन आलेख (yogya log parvah nahin karte-hindu chitan lekh)

इस संसार में कलुषित वाणी बोलने वालों की कमी नहीं है। उससे भी अधिक संख्या तो उन लोगों की है जो दूसरे के दुःख पर हंसते हैं। किसी की परेशानी आने पर उसका मजाक उड़ाते हैं। अगर हम देखें तो आम इंसान सबसे ज्यादा इसी बात पर चिंतित रहते हैं कि कहीं उनके पास दुःख न आये। इसलिये नहीं कि वह उससे लड़ नहीं सकते बल्कि कहीं अपने ही लोग उनका मजाक न उड़ायें यही चिंता उनको खाये जाती है।  इस विषय पर नीति विशारद विदुर कहते हैं कि
परश्चेदेनभिविध्येत वाणीमुंशं सुतीक्ष्यौरनलार्कदीप्तैः।
स विध्यमानोऽप्यतिदहृामानो विद्यात् कविः सुकृतं में दधाति।।
"विद्वान मनुष्य अन्य व्यक्ति के मुख से अपने प्रति वाग्बाण तथा कटुशब्दों से चोट पहुंचाने पर वेदना होने के बावजूद यह सोचकर मौन हो जाते हैं कि वह मेरे ही पुण्यों को पुष्ट कर रहा है।
यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव।"
वासो तथा रंगवशं प्रवानि तथा स तेषां वशमभ्युवैति।।
जिस तरह किसी कपड़े को रंगा जाये तो वह भी उसी रंग का हो जाता है। उसी तरह सज्जन पुरुष दुष्ट से संगत करने पर उस जैसा प्रभाव हो जाता है।
तत्वज्ञानी तथा जीवन रहस्य को समझने वाले विद्वान इस प्रकार के भय से मुक्त होते हैं। वह जानते हैं कि मनुष्य मन की यह स्थिति यह है कि वह अपने दुःख से कम दुखी बल्कि दूसरे के सुख से अधिक सुखी होता है। लोभ, लालच तथा अहंकार से भरा मनुष्य कभी संतुष्ट या सुखी नहीं रह सकता इसलिये वह दूसरे के दुःख तथा क्षोभ में अपने लिये संतोष ढूंढता है। इतना ही नहीं अनेक लोग तो दूसरों की रचनात्मक प्रवृत्तियों का भी उपहास उड़ाते हैं।
यही कारण है कि विद्वान तथा समझदार लोग दूसरों की आलोचना की परवाह तथा प्रशंसा का लोभ त्यागकर अपने सत्य पथ पर बढ़ते जाते हैं। उनको किसीके मन अपमान कि चिंता नहीं होती और वह अपने कर्म में लीन रहते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

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Thursday, December 09, 2010

मनोरंजन के नाम पर मानसिक विलासिता से बचें-हिन्दी लेख (manoranjan ke nam par vilasita-hindi lekh)

न्यूजीलैंड को भारत ने लगातार तीसरा एकदिवसीय क्रिकेट मैच में क्या हरा दिया कि जैसे भारतीय प्रचार माध्यमों की लॉटरी लग गयी। बस गाये जा रहा है कि
‘‘उस खिलाड़ी के कंधों में आई ताकत से सब भौचक्के।’
‘उसकी स्पिन में जादू कहां से आया।’
‘अब वह धनी बन गया।’ आदि आदि।
एक मज़े की बात यह रहती है कि अगर आप कभी धंटे के मध्य-यानि साढ़े छह, सात या आठ बजे-घर पहुंच कर टीवी खोलें तो आपको एक जैसे ही प्रसारण मिलेंगे। क्रिकेट मैच पर चर्चा, किसी टीवी कार्यक्रम के (कु)पात्र का बखान या किसी बड़ी हस्ती का जन्म दिन! ऐसे में यह शक होता है कि सभी चैनल अलग अलग हैं। बल्कि ऐसा लगता है कि सभी टीवी चैनल किसी एक इशारे पर काम करते हैं। तय बात है कि विज्ञापन तो सभी कंपनियां देती हैं पर उनका निर्माण तथा प्रसारण कुछ बड़ी संस्थाओं को पास होता है जो शायद इन चैनलों को बता देती हैं कि उनके मॉडल एक ही समय सभी चैनल पर दिखाये जाने चाहिए ताकि आम दर्शक इस चैनल से उस चैनल पर जाये पर रहे हमारी पकड़ में। अनेक लोग हिन्दी अंतर्जाल पर ऐसे हैं जो आये दिन इन प्रचार माध्यमों की कुछ कथित शख्सियतों पर आक्षेप करते हुए यह दुआ करते हैं कि उनको अक्ल आये। वह गलत फहमी में हैं। दरअसल कथित रूप से जो चैनल पत्रकार हैं वह ऐसे प्रारूप में काम रहे हैं जो राज्य, अर्थ तथा कला के क्षेत्र में बरसों से निर्धारित कर दिया गया है। अब उसमें बदलाव इसलिये नहीं आ पा रहा क्योंकि उसके लिये जिस अध्यात्म ज्ञान या चिंतन की जरूरत है जिससे कोई जुड़ना नहंी चाहता। कुछ नया करने का उनमें आत्मविश्वास नहीं है। आधुनिक शिक्षा से सुसज्तित जो शिखर पुरुष अपनी जगह जमे हैं उनमें अध्यात्मिक शक्ति का अभाव है। उल्टे वह भारतीय अध्यात्म ज्ञान को हेय बताकर वाहवाही लूटते हैं।
भारत का समूचा प्रचार तंत्र एक तरह से हमेशा ही पूंजीपतियों और दलालों के हाथ में रहा है। जब रेडियो और टीवी पर केवल सरकारी एकाधिकार था तब समाचार पत्र पत्रिकाओं भी वही चलती थीं जो पूंजपतियों के हाथों में थी। अनेक संघर्षशील लोगों ने छोटे अखबार चलाने का प्रयास किया पर आर्थिक समर्थन के अभाव में नाकाम रहे। बड़े समाचार पत्र पत्रिकाओं शिखर पदों भी काम भी वही लोग करते जो लिखने पढ़ने के साथ ही मालिकों के अन्य व्यवसायिक कामों में भी सहयोग कर सकते थे। अधिकतर प्रसिद्ध समाचार पत्र पत्रिकाओं के मालिक अपने प्रकाशनों सहारे ही अन्य व्यवसायिक भी करते हैं। तय बात है उनको प्रकाशन उद्योग के कारण रुतवे का लाभ मिलता है। अब टीवी और रेडियो क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी है पर उनके कर्ताधर्ता भी पूंजीपति हैं। ऐसे में कम से कम हिन्दी का प्रचारतंत्र पूरी तरह से राज्य तथा पूंजी के तयशुदा प्रारूप में काम करता रहेगा। इसमें बदलाव संभव नहीं है।
अभी 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाले में यह बात खुलकर सामने आ गयी है कि राजकीय पदों पर बैठे तथा पूंजीक्षेत्र के शिखर पुरुषों के बीच दलाली का काम कथित रूप से पत्रकारों ने किया है। यह बात चौंकाती नहीं है क्योंकि इसके अनुमान तो पहले से ही थे। ऐसे में जो लोग इन प्रचार माध्यमों में सुधार की आशा करते हैं उनको निराश होना पड़ेगा। आखिर यह कैसे संभव है कि टीवी या समाचार पत्र पत्रिकाओं के संपादक अपने पूंजीपतियों के बरसों पूर्व तय मार्गदर्शक सिद्धांतों का उल्लंघन कर जायें। पूंजीपतियों की स्थिति यह है कि जहां से धन मिलता है वहां अपने संबंध अच्छा बनाता है। यही कारण है कि जब हम देश के आतंकवाद के लिये पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराते हैं तब खाड़ी देशों के उसमें सहयोग को अनदेखा करते देते हैं क्योंकि वहां भारतीय पूंजीपतियों के आर्थिक संपर्क हैं। ऐसे एक नहीं अनेक प्रमाण हैं कि भले ही खाड़ी देश पाकिस्तान को पसंद करें या न करें पर भारत विरोध के लिये वह उनका एक बहुत बड़ा हथियार है। नंगा भूखा पाकिस्तान भारत में आतंकवाद का प्रायोजन जिस पैसे पर करता है उसका स्त्रोत बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि सभी को पता है। स्थिति यह है कि भारतीय टीवी चैनल और फिल्मों में पाकिस्तानियों को प्रवेश भी मिल जाता है और यकीनन इसके लिये कहीं न कहीं भारत के बाहर के प्रायोजक पाकिस्तानी आकाओं को प्रसन्न करते हैं।
कुछ बुद्धिजीवी और कलाकार तो अपने पाकिस्तान प्रेम के कारण ही मशहूर हैं। वह इसलिये नहीं कि उसकी कोई उनसे वास्तविक हमदर्दी है बल्कि उनके आर्थिक आका उनको बाध्य करते हैं या संभव है उनको प्रसन्न करने के लिये वह ऐसा करते हों। मज़े की बात यह है कि ऐसे लोग सार्वजनिक आलोचनाओं को भी पी जाते हैं। उनको पता है कि देश में प्रचारतंत्र का सक्रिय एक तबका कहीं न कहीं उनके साथ है जिनके आर्थिक स्त्रोत उन जैसे ही हैं।
अभी हाल ही में वाराणसी में हुए विस्फोट में दुबई और शारजाह में रह रहे आतंकवादियों का नाम आ रहा है, पर क्या किसी चैनल ने इन देशों के विरुद्ध एक शब्द भी कहा है? विकीलीक्स ने बताया कि एक पाकिस्तानी आतंकवादी सऊदी अरब से धर्म के नाम पर पैसा लेकर आतंकवादियों पर खर्च करता है? क्या किसी चैनल ने सऊदी अरब पर कोई आक्षेप किया। नहीं, क्योंकि पूंजीपतियों के इन खाड़ी देशों में आर्थिक संपर्क हैं और प्रचार तंत्र अंततः उनके ही हाथों में हैं। उनको नाराज नहीं करना है, इस बात की परवाह कोई शुद्ध पत्रकार नहीं करेगा पर दलाल पत्रकार कभी भी पाकिस्तान से आगे अपनी बात नहीं करेंगे। मुश्किल यह है कि पूंजी, विद्वान समाज, राज्य तंत्र में कुछ ऐसे लोग हैं जो शुद्ध पत्रकारों को भाव नहीं देते। उनको लगता है कि कहीं उनके आर्थिक पिता कहीं नाराज न हो जायें। सभी चैनल और अखबारों में अच्छे पत्रकार हैं। अपना काम कर रहे हैं पर जब शिखर पर बैठे पत्रकारों के नाम आये तो यह प्रश्न उठता ही है कि क्या इस देश में विदेशी विचाराधारा, संस्कृति और शिक्षा के प्रचार में क्या ऐसे ही लोग हैं जिनका उद्देश्य अपना हित साधना है न कि समाज में चेतना लाना। जब शिखर पर बैठे लोग ऐसे हों तो दूसरी पंक्ति के कर्मियों से स्वतंत्रता से काम करने की आशा करना बेकार है। क्रिकेट, टीवी कार्यक्रमों के अंशों तथा फूहड़ मज़ाक के सहारे चल रहे भारतीय चैनलों से यह आशा करना भी बेकार है कि वह अपना रास्ता बदलेंगे क्योंकि उनके आर्थिक आधार फिलहाल तो बदलने से ही रहे। यही कारण है कि वह हिन्दी की आड़ में अंग्रेजी, संस्कृति की आड़ में विदेशी कुचक्र तथा शिक्षा के नाम पर नंगापन परोसते जा रहे हैं। हम उनसे कोई आशा नहीं करते इसलिये लोगों से यही कहते हैं कि अपने मनोरंजन की भूख को कम करो। नंगे दृश्य या गाली सुनकर आनंद उठाने से अच्छा है तो स्वयं ही बैठकर कोई गाना गुनागुनाने लगो, या बिना कारण पार्क में टहलने चले जाओ। किसी भी हालत में मनोरंजन के नाम पर मानसिक विलासिता से बचो। सुबह योग साधना करें। दिन में ध्यान लगायें और शाम को कोई अध्यात्मिक पत्रिका पढ़ें। आवश्यक न हो तो गाड़ी की बजाय साइकिल की सवारी भी करो ताकि अपनी सक्रियता का आनंद मिले। तब दूसरे की सक्रियता या एक्शन में आनंद उठाने की इच्छा जाती रहती है। अपना चिंत्तन  करो ताकि दूसरे की राय पर विचार कर सको। जब किसी का अंधानुकरण नहीं करोगे तो कोई अंधेर में रहना सीख लोगे तो कोई  चिराग बेचने भी नहीं आयेगा।
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संकलक एवं संपादक-दीपक    'भारतदीप', ग्वालियर 
author aur writter-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Saturday, December 04, 2010

हिंदू धार्मिक विचार-ज्ञानी लोग खाने के लिए खानदान का नाम नहीं लेते

मनु महाराज के अनुसार 
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न भोजनार्थ स्वे विप्र कुलगोत्रे निवेदयेत्।
भोजनार्थ हि ते शंसन्न्वान्ताशीत्युच्यते बुधैः।।
हिन्दी में भावार्थ-
किसी भी ज्ञानी आदमी को कहीं से खाना प्राप्त करने के लिये अपने कुल या जाति की सहायता नहीं लेना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति वान्ताशी यानि उल्टी किए गऐ भोजन को खाने वाला माना जाता है।

उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः।
तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नांदिदायिजः।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनु महाराज के अनुसार जो निर्बुद्धि मनुष्य अच्छे खाने की लालच में दूसरे स्थान पर जाकर आतिथ्य सत्कार पाने का प्रयास करता है वह अगले जन्म में अन्न खिलाने वाले मनुष्यों के घर में पशु का रूप धारण कर रहता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की जीभ स्वाद के लालायित रहती है। जो ज्ञानी लोग भोजन को केवल पेट भरने के लिये मानते हैं वह तो हर प्रकार के भोजन में संतुष्ट हो जाते हैं पर पेट भरना ही जीवन मानते हैं वह अच्छे खाने के लिये इधर उधर मुंह मारते हैं। जीवन के लिये भोजन आवश्यक है पर कुछ लोग तो भोजन को ही जीवन मानकर उसके पीछे फिरते हैं। ऐसे लोग हमेशा भूखे रहते हैं और अपने घर के खाने को विष समझकर इधर उधर ताकते रहते हैं। एसे लोगों की बुद्धि अत्यंत निकृष्ट होती है।
भोजन हमें इस उद्देश्य से ग्रहण करना चाहिये कि उससे हमारे शरीर को नियमित ऊर्जा मिलती रहे। भोजन में ऐसे पदार्थ ग्रहण करना चाहिए जो भले ही स्वादिष्ट न हों पर सुपाच्य होना चाहिए। जीभ के स्वाद के चक्कर में अज्ञानी लोग ऐसे पदार्थ ग्रहण करते हैं जो पेट के लिए हानिकारक हैं। आजकल हम देख भी रहे है कि स्वादिष्ट पदार्थों के सेवन से बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है। इसलिये सुपाच्य पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कर ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।
उसी तरह भोजन प्राप्त करने के लिऐ कभी अपने कुल या गौत्र का नहीं लेकर सदाशयी गृहस्थ की सद्भावना पर ही निर्भर रहना चाहिए। जो लोग अपने भोजन के लिये कुल या जाति का आसरा लेते हैं वह ऐसे ही होते हैं जैसे कि उल्टी का भोजन करने वाले पशु होते हैं।  वैसे  भी कहा जाता है कि जिसने पेट दिया है उसने उसके लिए भोजन भी बना दिया है।

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Sunday, November 21, 2010

मांस की बरफी-हिन्दी व्यंग्य कविता (maans ki barfi-hindi vyangya kavita)

बेईमानी और भ्रष्टाचार के खिलाफ
दिखावे की जंग वह लड़ रहे हैं,
पर उनकी तलवारें म्यान में रखी हैं।
कमीज की आस्तीनें ऊपर वह कर रहे हैंे,
जैसे जीत की राह में बढ़ रहे हैं,
हकीकत नहीं है उनका यह नाटक
सभी के मुंह लग गया है खून
दूसरे के मांस की बरफी सभी ने चखी है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, November 05, 2010

श्रीगुरुग्रंथ साहिब-अपने को पीर प्रचारित करने वालों के चरण स्पर्श न करें (shri guru granth sahib-apne ko peer kahane valon ke charan sparsh na karen)

‘गुरु पीरु सदाए मंगण जाइ।
त के मूलि न लगीअै पाई।।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब की वाणी के अनुसार कुछ लोग अपने को गुरु और पीर कहते हुए अपने भक्तों से धन आदि की याचना करते हैं ऐसे लोगों के पांव कभी नहीं छूना चाहिये।

‘पर का बुरा न राखहु चीत।
तम कउ दुखु नहीं भाई मीत।
हिन्दी में भावार्थ-
दूसरे के अहित का विचार मन में भी नहीं रखना चाहिये। दूसरे के हित का भाव रखने वाले मनुष्य के पास कभी दुःख नहीं फटकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- महान संत भगवान श्री गुरुनानक देव जी ने अपने समय में देश में व्याप्त अंधविश्वास और रूढ़िवादिता पर जमकर प्रहार कर केवल अध्यात्मिक ज्ञान की स्थापना का प्रयास किया। उनके समकालीन तथा उनके बाद भी अनेक संत और कवियों ने धर्म के नाम पर पाखंड का जमकर प्रतिकार किया पर दुर्भाग्यवश इसके बावजूद भी हमारे देश में अंधविश्वास का अब भी बोलाबाला है। इतना ही अनेक संत कथित रूप से गुरु या पीर बनकर अपने भक्तों का दोहन करते हैं। हैरानी की बात यह है कि आजकल उनके जाल में अनपढ़ या ग्रामीण परिवेश के काम बल्कि शिक्षित लोग अधिक फंसते हैं। आज से सौ वर्ष पूर्व तक तो अंधविश्वास तथा रूढ़िवादिता के लिये देश की अशिक्षा तथा गरीबी को बताया जाता था मगर आजकल तो धनी और शिक्षित वर्ग अधिक जाल में फंसता है और हम जिनको अनपढ़, अनगढ़ और गंवार कहते हैं वही समझदार दिखते हैं।
आधुनिक शिक्षा में अध्यात्मिक ज्ञान को स्थान नहीं मिलता। लोग तकनीकी तथा उच्च शिक्षा को सर्वोपरि मानते हैं पर मन की शांति और अध्यात्मिक ज्ञान के लिये वह ऐसे अनेक ढोंगियों महात्माओं और संतों के जाल में फंस जाते हैं जो खुलेआम पैसा मांगने के साथ ही धर्म का खुलेआम व्यापार करते हैं। आश्चर्य तब होता है जब उच्च शिक्षा प्राप्त और धनीवर्ग उनके चरण स्पर्श करने के लिये भागता नज़र आता है।
जीवन में खुश रहने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि सबके हित की कामना करें। किसी के लिये बुरा विचार मन में न लायें। कभी कभी तो यह भी होता है कि जैसा अब दूसरे के लिये बुरा सोचते हैं वैसा ही अपने साथ ही हो जाता है। अतः सभी के लिये अच्छा सोचा जाये ताकि अपने साथ भी अच्छा हो।
आजकल अनेक ऐसे गुरु हैं जो खुलेआम अपने शिष्यों से आर्थिक भेंट मांगते हैं। इनमें कुछ तो ऐसे हैं जो धन से ही धर्म की रक्षा का नारा देकर भक्तों के अंदर दान की भावना पैदा कर उसका दोहन करते हैं। सच बात तो यह है कि आदमी धर्म की रक्षा तभी कर सकता है जब उसके पास ज्ञान हो और उसके लिये जरूरी है कि स्वयं ही धार्मिक पुस्तको का एकांत में चिंतन कर ज्ञान प्राप्त किया किये जाये। भेंट या दक्षिण मांगने वाले गुरु कुछ देर तक हृदय में मनारंजन का भाव पैदा कर सकते हैं पर उससे मनुष्य के मन में स्थिरता नहीं आती। जब मन अस्थिर होता है तब मनुष्य अपने ही कार्यों से ताने में फंसता जाता है। इतना ही नहीं तब वह दूसरों के अहित की कामना करता है जो कि अंतत: उसके लिए ही कष्टदायक होता है।
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Saturday, October 30, 2010

धार्मिक विचार-मन शरीर और वाणी के दंड धारण करने वाला ही सुखी (dharmik vichar-man,sharir aur vani ke dand)

मनु महाराज के अनुसार 
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त्रिदण्डमेतिन्निक्षप्य सर्वभूतेषु मानवः।
कामक्रोधी तु संयभ्य ततः सिद्धिं नियच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य सभी जीवों के साथ मन, शरीर वह वाणी तीनों प्रकार के दंडों का पालन करते हुए व्यवहार करता है वह किसी को पीड़ा नहीं देता। उसका काम व क्रोध के साथ ही अपने आचरण पर भी संयम रहता है जिसके कारण वह सिद्ध कहलाता है।

वाग्उण्डोऽडःकायादण्डस्तथैव च।
वसयैते निहिता बुद्धौ त्रिडण्डीति स उच्यते
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य सोच विचार कर वाणी का प्रयोग करते हुए देह और मन पर अपना नियंत्रण बनाये रखते हैं उसे त्रिदंडी कह जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने कर्मों से मन, शरीर और वाणी के द्वारा बंधा रहता है। जिस तरह का कोई कर्म करता है वैसा ही उसे परिणाम प्राप्त होता है। सिद्ध व्यक्ति वही है जो दृष्टा की तरह अपने मन, शरीर और वाणी को अभिव्यक्त होते देखता है। इसलिये वह उन पर नियंत्रण करता है। दृष्टा होने के कारण मनुष्य के किसी भी कर्म के प्रति अकर्ता का भाव पैदा होता है जिससे उसके अंतर्मन में विद्यमान अहंकार की भावना प्रायः समाप्त हो जाती है।
ऐसा निरंकार मनुष्य मन, वचन और शरीर से संयम पूर्वक जीवन व्यतीत करता है और इससे न केवल वह अपना बल्कि दूसरे लोगों के जीवन का भी उद्धार करता है। इससे दूसरे लोग भी प्रसन्न होते हैं और उसका सिद्ध की उपाधि प्रदान करते हैं। जिन मनुष्यों के पास तत्व ज्ञान है वह अपने मुख से आत्मप्रचार कर अपने व्यवहार और आचरण से ही अपनी सिद्धि को प्रमाण करते है। जिनको ऐसा सिद्ध बनना है उनको चाहिये कि वह मन, वचन और देह के दंडों पर अभ्यास से नियंत्रण करें। ऐसी सिद्धि योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान से प्राप्त कि जा सकती है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज  कुकरेजा 'भारतदीप',ग्वालियर मध्य प्रदेश
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep' Gwalior Madhya Pradesh
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Friday, October 01, 2010

राम की लीला राम ही जाने (ram ki leela ram he jane)

घर से बाहर निकलकर जैसे ही स्कूटर पर सवार हुआ, वैसे ही पास से गुजरते दो आदमियों का वार्तालाप कानों में सुनाई दिया। एक दूसरे से कह रहा था कि ‘आज तो शहर में धारा 144 लागू है। अयोध्या के राम मंदिर पर फैसला आने वाला है।’
दूसरा बोला-हां, अयोध्या के राम मंदिर पर अदालत का फैसला साढ़े तीन बजे आयेगा। आज बच्चे भी स्कूल नहंी गये हैं। बता रहे हैं कि टैम्पो और ऑटो भी साढ़े तीन बजे के बंद हो जायेंगेे। एक तरह से शहर में सन्नाटा छा जायेगा।’’
मैं सोच रहा हूं कि मेरा इस विषय से संबंध नहीं है क्योंकि घर तो अपने ही वाहन से मुझे वापस आना है। राम मंदिर पर फैसला! याद आया, पिछले कई बरसों से मेरे जेहन में बसा है राम मंदिर! मन में तो राम भी बसे हैं पर मंदिर एक अलग विषय है। राम पर चर्चा करने में मज़ा आता है पर अयोध्या का राम मंदिर अब गुजरे ज़माने की बात लगता है। ऐसा लगता है कि मेरी बुद्धि समय दूसरों के विषय पर काम करती थी जब इस विषय पर लोगों से चर्चा करता था। अब स्वतंत्र रूप से सोचता हूं तो लगता है कि राम मंदिर तो मेरे पास ही है। अपने कार्यस्थल से आते जाते दोनेां की बार ही मार्ग में पड़ता है जहां समय मिलने पर अवश्य जाता हूं। एक विष्णु जी का भी मंदिर है जहां परिवार के साथ जाना होता है। मोहल्ले से थोड़ी दूरी पर ही हनुमानजी और शिवजी के मंदिर हैं और वहां ध्यान लगाने में बहुत मज़ा आता है। जिन मंदिरों में जाता हूं मुझे वही सिद्ध लगते हैं जहां नहीं गया उनको हृदय में अब स्थान नहीं दे पाता। पता नहीं कभी अयोध्या जाना होगा या नहंी, पर अभी तक अनेक बार वृंदावन और उज्जैन में जाकर ही मुझे आनंद प्राप्त करने का अवसर मिला है।
एक राम मेरे अंदर है जहां उनकी अयोध्या उनकेसाथ है तो दूसरी अयोध्या मुझसे बहुत दूर है। मेरी आस्था मेरे घर के आसपास ही सिमटती जाती है और अपना स्कूटर लेकर चल पड़ता हूं। सोचता हूं-‘शाम को आकर टीवी पर समाचार सुनूंगा।’
शाम को चार बजे हैं। एक मित्र से फोन पर पूछता हूं कि-‘क्या अयोध्या के राम मंदिर पर फैसले का कोई समाचार आया?’’
वह बताता है कि ‘अभी नहीं आया! साढ़े चार बजे तक आने की संभावना है।’
मैं घर चलने की तैयारी में हूं। एक मित्र रास्ते में मिल जाता है। उससे बात करता हूं तो वह कहता है कि चलो, थोड़ी दूर चलकर चाय पीते हैं।
मैं उसे बिठाकर बाज़ार मंे आता हूं। दुकानें बंद हैं! मैंने कहा-‘पता नहीं आज यह बाज़ार क्यों बंद है! वह होटल वाला भी बंद कर गया, सुबह तो खुला था!
मित्र ने कहा-‘अरे यार, याद आया आज तो अयोध्या में राम मंदिर पर फैसला आना था। इसलिये उपद्रव होने की आशंका में बाज़ार बंद हो गया है। चलो फिर कल मिलेंगे।’
वह स्कूटर से उतरता ही है कि एक अन्य मित्र वहां से कहीं से निकलकर आया। मैने उत्सुकतावश पूछा-‘तुमने राम मंदिर के फैसले पर समाचार सुना है।’
वह बोला-‘हां, पूरा तो सुन नहीं पाया पर विवादित ज़मीन को तीनों पक्षों में एक समान बांटने का निर्णय सुनाया गया है। बाकी पूरा सुनने ही घर जा रहा हूं। मुख्य बात यह है कि रामलला की मूर्तियां वहां से नहीं हटेंगी।’
पहला वाला मित्र जो अभी वहीं खड़ा था‘-यार आपकी पूरी बात समझ में नहीं आयी। अभी जाकर समाचार सुनते हैं।’
मैंने कहा-‘अभी तो पूरे समाचार आने हैं। घर जाकर देखते हूं कि क्या फैसला और कैसा है।’’
मैं चल पड़ता हूं। रास्ते भर सन्नाटा छाया लगता है। बाज़ार में कुछ ही दुकाने खुली हुईं हैं। आवागमन भी अत्यंत कम है। यह दृश्य या तो एकदम सुबह दिखता है या रात को दस बजे के बाद! जिन मार्गों पर जाम लगते हैं वहां पर आसानी से चला जा रहा हूं। कुछ जगह लड़के झुंड बनाकर खड़े हैं तो उनको देखता हूं कि कहंी वह किसी विवाद में तो नहीं लगे हैं। कुछ सड़कों पर बच्चे इधर से उधर बड़े आराम से जा रहे हैं जहां उनको वाहनों की कम आवाजाही के कारण भय नहीं रहता।
मेरा घर शहर से दूर है। सोचता हूं मेरे घर के आसपास ऐसा नहीं होगा। मगर जैसे ही अपने घर के पास पहुंचता हूं। सारी दुकाने बंद हैं। कहंी ठेले नहंी लगे। पूरा शहर भयाक्रांत लगता है? किसलिये? ऐसा लगता है कि जैसे सभी को डरा दिया गया है। इतिहास की पुनरावृत्ति की आशंकाऐं सभी को कंपित किये हुए हैं। लोग चिंतित हैं और मैने बड़ी बेफिक्री से अपना रास्ता तय किया है। अचानक मेरे मन में राम के प्रति भावनाओं का ज्वार उठने लगता है।
मैं सोच रहा हूं कि किस राम मंदिर पर फैसला आया है और मैं किस राम मंदिर में जाता हूं। वह राम कौनसे हैं और मेरे राम कौनसे हैं। मेरे राम ने मुझे इतनी बेफिक्री दी कि बिना बाधा के अपना मार्ग तय कर आया और कहीं भय नहीं लगा पर वह कौन से राम हैं जिन्होंने लोगों को फिक्र देकर घर में बंद कर दिया। जिस राम मंदिर पर फैसला आया उससे मेरे क्या लेना देना था और अपने शहर के जिस राम मंदिर में जाता हूं वह तो निर्विवाद खड़ा है। अंतर्मन दो राम मंदिरों में बंटता दिखाई देता है। मैं अंदर और बाहर स्थित राम के दोनों रूपों को मिलाने का प्रयास करता हूं। तब ऐसा लगता है कि मेरे राम और बाहर के राम अलग हैं। मेरे मन के बाहर स्थित राम के रूप के प्रति कोई आकर्षण क्यों नहीं है? मैं दिमाग पर जोर डालता हूं पर कोई उत्तर नहीं नज़र आता? तब सोचना बंद करता हूं। आखिर राम तो राम हैं! उनके अनेक रूप हैं! वह दिव्य है और मेरे अंदर और बाहर के चक्षु उतना ही देख सकते हैं जितना एक आम इंसान। मैं कोई सिद्ध नहीं हूं कि उनके चरित्र का वर्णन कर सकूं।
अपना स्कूटर लेकर मैं घर के अंदर प्रविष्ट हो जाता हूं जहां टीवी पर यही समाचार आ रहा है। उसमें भी दिलचस्पी नहंी रह जाती क्योंकि उसका सार मैं पहले ही सुन चुका हूं। मन ही मन कहता हूं कि‘-राम की लीला राम ही जाने। मेरे राम मेरे पास और उनका मंदिर भी दूर नहीं है चाहे जब जा सकता हूं फिर क्यों चिंता करूं।’
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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