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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Tuesday, June 07, 2011

अन्य लोगों पर सीमित मात्रा में विश्वास करें-हिन्दी धार्मिक विचार (unlimit confidenc on other parson not good in life-hindi religion thought)

          कहा जाता है कि आजकल कलियुग चल रहा है और मनुष्य की प्रवृत्ति पर राक्षसत्व हावी है। ऐसे में सतयुग, त्रेतायुग तथा द्वापर काल में महामनीषियों की कही गयी बातें अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं। हालांकि इन सात्विक संदेशों को देखें तो एक प्रश्न उठता है कि हमारे देश में कलियुग कब नहीं रहा। यह भी विचार आता है कि सतयुग, त्रेतायुग या द्वापर में मनुष्य की प्रवृत्तियां दैवीय होने का भ्रम ही है न कि सच। आखिर महान विद्वान विदुर क्यों कहते हैं कि जो अविश्वसनीय हो उस पर तो विश्वास करना ही नहीं चाहिए पर जो विश्वास योग्य हो उस पर भी अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए।
           महात्मा विदुर कहते हैं
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             न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।
          विश्वासाद भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति।
       "जिस मनुष्य का विश्वास प्रमाणिक न हो उस पर तो विश्वास करना ही नहीं चाहिए पर जिस पर जो योग्य हो उस भी अधिक विश्वास न करें। विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है वह मूल लक्ष्य को ही नष्ट कर डालता है।"
            अनीर्षुर्गुप्तदारश्च संविभागी पियंवदः।
          श्लक्ष्णो मधुरपाक् स्वीणां न चासां वशगो भवेत्।।"
          "मनुष्य ईर्ष्या रहित, स्त्रियों की रक्षा करने वाला, संपत्ति का न्यायपूर्वक बांटने वाला, प्रिय वाणी बोलने वाला, साफ सुथरा तथा स्त्रियों से सद्व्यवहार करने वाला हो परंतु किसी के वश में न हो।"
               अगर हम आजकल अपने देश में हो रहे अपराधों को देखें तो उनमें से अधिकतर विश्वासघात का परिणाम होते हैं। खासतौर से स्त्रियों के प्रति हो रही अपराधों को देखें। आजकल ऐसी अनेक घटनायें होती हैं जिसमें स्त्रियों के साथ बलात्कार या हत्यायें की जाती हैं। अनेक जगह तो उनको गठरी में मारकर फैंक दिया जाता है। समाज और अपराध विशेषज्ञ कहते हैं कि स्त्रियों के प्रति अपराध उनके निकटस्थ लोग ही करते हैं। कहंी परिवार तो कहीं जानपहचान वाले ही उनको निशाना बनाते हैं। हमारे यहां संयुक्त परिवार की परंपरा के विघटन के बाद स्थितियां बदली हैं। अपने परिवार तथा रिश्तेदारों की बजाय लोग गैरों पर अधिक विश्वास करने लगे हैं। पुरुष के लिये धन का विषय हो या स्त्री के सम्मान का सवाल इसमें अब विश्वासघात अपना काम करने लगा है। आजकल पुरुष हो या स्त्री चिकनी चुकड़ी बातों में आकर हाल ही दूसरे पर विश्वास करने लगते हैं। ऐसे में जहां पुरुष अपना धन तो स्त्री अपने सम्मान के साथ जान तक से हाथ धो बैठती हैं।
हमारा अध्यात्मिक ज्ञान कितना शक्तिशाली और प्रासंगिक है यह हम तभी समझ सकते हैं जब उसका अध्ययन करते हुए ज्ञान को धारण करें। इसलिये भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का नियमित अध्ययन करना चाहिए। ऐसा करने से जहां ज्ञान प्राप्त होता है वहीं किसी से व्यवहार करने में सतर्कता का भाव पैदा होता है। तब यह भी पता लगता है कि हम ऐसे लोगों पर ही भरोसा करते हैं जिन्होंने अपना साम्राज्य ही धोखे पर खड़ा किया है। अत: अन्य लोगों पर विश्वास सीमित मात्र में ही क्या जाना चाहिए। 
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Saturday, January 08, 2011

योग्य लोग किसी की परवाह नहीं करते-हिन्दी चिंतन आलेख (yogya log parvah nahin karte-hindu chitan lekh)

इस संसार में कलुषित वाणी बोलने वालों की कमी नहीं है। उससे भी अधिक संख्या तो उन लोगों की है जो दूसरे के दुःख पर हंसते हैं। किसी की परेशानी आने पर उसका मजाक उड़ाते हैं। अगर हम देखें तो आम इंसान सबसे ज्यादा इसी बात पर चिंतित रहते हैं कि कहीं उनके पास दुःख न आये। इसलिये नहीं कि वह उससे लड़ नहीं सकते बल्कि कहीं अपने ही लोग उनका मजाक न उड़ायें यही चिंता उनको खाये जाती है।  इस विषय पर नीति विशारद विदुर कहते हैं कि
परश्चेदेनभिविध्येत वाणीमुंशं सुतीक्ष्यौरनलार्कदीप्तैः।
स विध्यमानोऽप्यतिदहृामानो विद्यात् कविः सुकृतं में दधाति।।
"विद्वान मनुष्य अन्य व्यक्ति के मुख से अपने प्रति वाग्बाण तथा कटुशब्दों से चोट पहुंचाने पर वेदना होने के बावजूद यह सोचकर मौन हो जाते हैं कि वह मेरे ही पुण्यों को पुष्ट कर रहा है।
यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव।"
वासो तथा रंगवशं प्रवानि तथा स तेषां वशमभ्युवैति।।
जिस तरह किसी कपड़े को रंगा जाये तो वह भी उसी रंग का हो जाता है। उसी तरह सज्जन पुरुष दुष्ट से संगत करने पर उस जैसा प्रभाव हो जाता है।
तत्वज्ञानी तथा जीवन रहस्य को समझने वाले विद्वान इस प्रकार के भय से मुक्त होते हैं। वह जानते हैं कि मनुष्य मन की यह स्थिति यह है कि वह अपने दुःख से कम दुखी बल्कि दूसरे के सुख से अधिक सुखी होता है। लोभ, लालच तथा अहंकार से भरा मनुष्य कभी संतुष्ट या सुखी नहीं रह सकता इसलिये वह दूसरे के दुःख तथा क्षोभ में अपने लिये संतोष ढूंढता है। इतना ही नहीं अनेक लोग तो दूसरों की रचनात्मक प्रवृत्तियों का भी उपहास उड़ाते हैं।
यही कारण है कि विद्वान तथा समझदार लोग दूसरों की आलोचना की परवाह तथा प्रशंसा का लोभ त्यागकर अपने सत्य पथ पर बढ़ते जाते हैं। उनको किसीके मन अपमान कि चिंता नहीं होती और वह अपने कर्म में लीन रहते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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