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Sunday, August 02, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-जेब खाली होने पर भी इच्छाएं पीछा नहीं छोड़ती (bhartrihari niti shatak in hindi)

भिक्षाशनं तदपि नीरसमेकवरं शय्या च भूः परिजनो निजदेहमात्रम्
वस्त्रं विशीर्णशतखण्डमयी च कन्था हा हा! तथापि विषया न परित्यजन्ति

हिंदी में भावार्थ- भिक्षा में मांग कर लायी वस्तु है वह भी एक बार मिली और उसमें कोई रस भी नहीं है। विश्राम करने के लिये अपनी देह को बस जमीन ही मिलती है। आत्मीयजन और सेवक के नाम पर बस एक अपनी देह है। ओढ़ने के लिये पुराना वस्त्र है जो तमाम जगह से फटा हुआ है। हा! हा! फिर भी विषयों में लिप्त होने की इच्छा पीछा नहीं छोड़ती।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- आदमी अमीर हो या गरीब लोगों की विषयों में लिप्तता विद्वानों को दर्शनीय और हास्यास्पद लगती हैं। जिसके पास धन है वह भी उससे प्राप्त होने वाले सुख को लेकर इच्छायें करता हैं-जैसे बड़ा और आकर्षक भवन हो, अनेक महिला ओर पुरुष मित्र हों, समाज पर नियत्रंण करने वाली संस्थाओं पर अपना प्रभाव हो और हर व्यक्ति हमारा अभिवादन करे। इसके बावजूद भी धनी को चैन नहीं पड़ता। वह अपनी शक्ति का प्रमाण स्वयं ही पाने के लिये समाज में उपद्रव भी फैला देता है यह देखने के लिये कहीं समाज उसकी पकड़ से बाहर तो नहीं हो रहा है। धनिक लोगोंं की यह फितरत होती है कि वह समाज में छोटे और गरीब आदमी को आपस में लड़ाकर फिर पंचायत करने लगते हैं। मतलब उनके अंदर स्वयं को देवता कहलाने की इच्छा बनी रहती है।
धनिकों की बात क्या जिसके पास कुछ भी नहीं है वह भी राजा बनने की इच्छा करता है। उसे पता है कि अब कोई रातों रात अमीर नहीं बनता पर वह बनना चाहता है। तन पर कपड़ फटे हुए हैं, खाने का यह हाल है कि लोग दया कर स्वतः ही प्रदान करते हैं और सोने के लिये उसके पास जमीन ही होती है। ऐसे में भी यही सोचता है कि वह किसी तरह अमीर बने। आजकल तो आधुनिक प्रचार माध्यमों द्वारा गरीब और निम्न श्रेणी के परिवारों के बच्चों को भ्रमित किया जा रहा है उसके परिणाम स्वरूप जो उनमें विद्रोह पैदा हो रहा है उसका आंकलन कोई नहीं करता।
फिल्मों की कहानियों में जो पात्र प्रदर्शित होते हैं उनकी कल्पना में आम युवक बहक जाते हैं। हर कोई लड़का फिल्म अभिनेत्रियों जैसी पत्नी चाहता है और हर लड़की पति के रूप में अभिनेता की कल्पना करती है। हालत यह है कि पैंतालीस साल के अभिनेता 16 वर्ष की लड़कियों के ख्वाब में बसे हुए है तो वहीं अड़तीस साल की अभिनेत्री की फोटो को अठारह साल का लड़का पर्स में रखकर घूमता है। बस वह उमर की धारा में बह रहे हैं पर उसमें अमीर और गरीब दोनों प्रकार के युवक शामिल है। कुल मिलाकर यह है कि इच्छायें और सपने आदमी का किसी भी हालत में पीछा नहीं छोड़ते।
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Friday, April 24, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-यह दुनियाँ तो बदलती रहती है

राजा भर्तृहरि कहते हैं कि
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परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्

हिंदी में भावार्थ-परिवर्तन होते रहना संसार का नियम। जो पैदा हुआ है उसकी मृत्यु होना निश्चित है। जन्म लेना उसका ही सार्थक है जो अपने कुल की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है अर्थात समस्त समाज के लिये ऐसे काम करता है जिससे सभी का हित होता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर आदमी को किसी से भय लगता है तो वह अपने आसपास परिवर्तन आने के भय से। कहीं भाषा तो कहीं धर्म और कहीं क्षेत्र के विवाद आदमी के हृदय में व्याप्त इसी भय की भावना का दोहन करने की दृष्टि से उनके मुखिया उपयोग करते हैं।कई लोगों के हृदय में ऐसे भाव आते है जैसे- अगर पास का मकान बिक गया तो लगता है कि पता नहीं कौन लोग वहां रहने आयेंगे और हमसे संबंध अच्छे रखेंगे कि नहीं। उसी तरह कई लोग स्थान परिवर्तन करते हुए भय से ग्रस्त होते हैं कि पता नहीं कि वहां किस तरह के लोग मिलेंगे। जाति के आधार पर किसी दूसरे जाति वाले का भय पैदा किया जाता है कि अमुक जाति का व्यक्ति अगर यहां आ गया तो हमारे लिए विपत्ति खड़ी कर सकता है। अपने क्षेत्र में दूसरे क्षेत्र से आये व्यक्ति का भय पैदा किया जाता है कि अगर वह यहंा जम गया तो हमारा अस्तित्व खत्म कर देगा।

ऐसे भाव लाने का कोई औचित्य नहीं है। यह मान लेना चाहिए कि परिवर्तन आयेगा। आज हम जहां हैं वहां कल कोई अन्य व्यक्ति आयेगा। जहां हम आज हैं वह पहले कोई अन्य था। कई परिवर्तनों की अनुभूति तो हमें हो ही नहीं पाती। बचपन के मित्र युवावस्था में नहीं होते। युवावस्था के मित्र नौकरी में साथ नहीं होते। इस संसार में समय का चक्र घूमता है और उसमें परिवर्तन तो होते ही रहना है और हमें उनको दृष्टा होकर देखना चाहिए।
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Friday, March 20, 2009

भर्तृहरि संदेश: दूसरे को खुश करें ऐसे लोग होते ही कितने हैं?

मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णास्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः
परगुणपनमाणून्पर्वतीकृत्य नित्यं
निजहृवि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः

हिंदी में भावार्थ- जिनकी देह मन और वचन की शुद्धता और पुण्य के अमृत से परिपूर्ण है और वह परोपकार से सभी का हृदय जीत लेते हैं। वह तो दूसरों को गुणों को बड़ा मानते हुए प्रसन्न होते हैं पर ऐसे सज्जन इस संसार में हैं ही कितने?
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-दूसरों के दोष गिनाते हुए अपने गुणों का बखान तथा दिखाने के लिये समाज के कल्याण में जुटे कथित लोगों की कमी नहीं है। आत्म विज्ञापन से प्रचार माध्यम भरे पड़े हैं। अपने अंदर गुणों का विकास कर सच्चे हृदय से समाज सेवा करने वालों का तो कहीं अस्तित्व हीं दिखाई नहीं देता। अपनी लकीर को दूसरे की लकीर से बड़ा करने वाले बुद्धिमान अब कहां हैं। यहां तो सभी जगह अपनी थूक से दूसरे की लकीर मिटाने वाले हो गये हैं। ऐसे लोगों की सोच यह नहीं है कि वह समाज कल्याण के लिये कार्य कैसे करें बल्कि यह है कि वह किस तरह समाज में दयालू और उदार व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हों। प्रचार करने में जुटे लोग, गरीबों और मजबूरों के लिये तमाम तरह के आयोजन करते हैं पर वह उनका दिखावा होता है। ‘मैंने यह अच्छा काम किया’ या ‘मैंने उसको दान दिया’ जैसे वाक्य लोग स्वयं ही बताते हैं क्योंकि उनके इस अच्छे काम को किसी ने देखा ही नहीं होता। देखेगा भी कौन, उन्होंने किया ही कहां होता?

इस संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो परोपकार और दया काम चुपचाप करते हैं पर किसी से कहते नहीं। हालांकि उनकी संख्या बहुत नगण्य है पर सच तो यह है कि संसार के सभी सभ्य समाज उनके त्याग और बलिदान के पुण्य से चल रहे हैं नकली दयालू लोग तो केवल अपना प्रचार करते हैं।
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Sunday, February 22, 2009

भर्तृहरि नीति शतक: अपनी इच्छाएँ मनुष्य को नृत्य करने को बाध्य करती हैं

खलालापाः सोढाः कथमपि तदाराधनपरैर्निगृह्यह्यान्तर्वाष्पं हसितमपि शून्येन मनसा।
कृतश्चित्तस्तम्भः प्रहसितधियाम´्जलिरपित्वमाशे मोघाशे किमपरमतो नर्तयसि माम्

हिंदी में भावार्थ-भर्तृहरि जी कहते हैं कि दुष्ट लोगों की सेवा करते हुए उनके अनेक व्यंग्यात्मक कथन सुनने पड़े। दुःख के कारण अंदर के आंसुओं को किसी तरह बाहर आने से रोका और उनको प्रसन्न करने के लिये जबरन चेहरे पर हंसी लाने का प्रयास किया। अपने मन को समझाकर उन्हें प्रसन्न करने के लिये उनके सामने अनेक बार हाथ जोड़े। अपने अंदर जो आशायें और आकांक्षायें हैं वह पता नहीं कितना नचायेंगी

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आदमी के मन में अनेक प्रकार की आशायें, आकांक्षायें और इच्छायें होती हैं जो उनको उनको अपने स्वामी या उच्च पदस्थ व्यक्ति की जीहुजूरी के लिये बाध्य करती हैं। जो सोने का चम्मच मूंह में लेकर पैदा हुए हैं वह निरीह लोगों के मन की बात को नहीं समझ सकते। धन, पद और बाहूबल से संपन्न लोगों के सामने अनेक प्रकार के लोग हाथ जोड़े खड़े रहते हैं पर वह मन से कभी उनके नहीं होते। अपनी आशाओं और आशाओं की पूर्ति के लिये उनके सामने उनकी प्रशंसा और पीठ पीछे निंदा कर अपने मन हल्का करते हैं। संसार में माया का प्रभाव है और वह अनेक प्रकार से मनुष्य को उलझाये रहती हैं। अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये एक मनुष्य को माया दूसरे का गुलाम बना देती हैं।
कई बार गुलामी और नौकरी से ऊबा आदमी व्यथित हो जाता है पर वह अपनी जगह से हट नहीं सकता क्योंकि उसे अपनी आशाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिये माया की जरूरत होती है और वह इसलिये नाचता रहता है और सोचता भी है कि कब वह इससे मुक्ति पाये पर वह कभी आजाद नहीं हो पाता। उसका मन ही उसको उकसाता है और वही उसको पिंजरे में रहने को भी बाध्य करता है।
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Wednesday, January 21, 2009

भर्तृहरि संदेशः ज्यादा पैसा हो तो राज्य से डर पैदा होता है

भोग रोगभयं कुले च्यूतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं
माने दैन्यभयं बले रिपुभर्य रूपे जरायाः भयम्
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद् भयं
सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्


हिंदी में भावार्थ- इस संसार में आने पर रोग का भय, ऊंचे कुल में पैदा हानेपर नीच कर्मों में लिप्त होने का भय, अधिक धन होने पर राज्य का भय, मौन रहने में दीनता का भय, शारीरिक रूप से बलवान होने पर शत्रु का भय, सुंदर होने पर बुढ़ापे का भय, ज्ञानी और शास्त्रों में पारंगत होने पर कहीं वाद विवाद में हार जाने का भय, शरीर रहने पर यमराज का भय रहता है। संसार में सभी जीवों के लिये सभी पदार्थ कहीं न कहीं पदार्थ भय से पीडि़त करने वाले हैं। इस भय से मन में वैराग्य भाव स्थापित कर ही बचा जा सकता है

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर आदमी कहीं न कहीं भय से पीडि़त होता है। अगर यह देह है तो अनेक प्रकार के ऐसे कार्य करने पड़ते हैं जिससे उसका पालन पोषण हो सके पर इसी कारण अनेक त्रुटियां भी होती हैं। इन्हीं त्रुटियों के परिणाम का भय मन को खाये जाता है। इसके अलावा जो वस्तु हमारे पास होती है उसके खो जाने का भय रहता है। इससे बचने का एक ही मार्ग है वह वैराग्य भाव। श्रीमद्भागवत गीता मेें इसे निष्काम भाव कहा गया है। वैराग्य भाव या निष्काम भाव का आशय यह कतई नहीं है कि जीवन में कोई कार्य न किया जाये बल्कि इससे आशय यह है कि हम जो कोई भी कार्य करें उसके परिणाम या फल में मोह न पालेंं। दरअसल यही मोह हमारे लिये भय का कारण बनकर हमारे दिन रात की शांति को हर लेता है। हमारे पास अगर नौकरी या व्यापार से जो धन प्राप्त होता है वह कोई फल नहीं है और उससे हम अन्य सांसरिक कार्य करते हैं-इस तरह अपने परिश्रम के बदल्र प्राप्त धन को फल मानने का कोई अर्थ ही नहीं है बल्कि यह तो कर्म का ही एक भाग है। हम अपने पास पैसा देखकर उसमें मोह पाल लेते हैं तो उसके चोरी होने का भय रहता है। अधिक धन हुआ तो राज्य से भय प्राप्त होता है क्योंकि कर आदि का भुगतान न करने पर दंड का भागी बनना पड़ता है।

इसी तरह ज्ञान हो जाने पर जब उसका अहंकार उत्पन्न होता है तब यह डर भी साथ में लग जाता है कि कहीं किसी के साथ वाद विवाद में हार न जायें। यह समझना चाहिये कि कोई सर्वज्ञ नहीं हो सकता है। भले ही एक विषय के अध्ययन या कार्य करने में पूरी जिंदगी लगा दी जाये पर सर्वज्ञ नहीं बना जा सकता है। समय के साथ विज्ञान के स्वरूप में बदलाव आता है और इसलिये नित नये तत्व उसमें शामिल होते हैं। जिस आदमी में ज्ञान होते हुए भी नयी बात को सीखने और समझने की जिज्ञासा होती है वही जीवन को समझ पाते हैं पर ज्ञानी होने का अहंकार उनको भी नहीं पालना चाहिये तब किसी हारने का भय नहीं रहता।

कुल मिलाकर सांसरिक कार्य करते हुए अपने अंदर निष्काम या वैराग्य भाव रखकर हम अपने अंदर व्याप्त भय के भाव से बच सकते हैं जहां मोह पाला वह अपने लिये मानसिक संताप का कारण बनता है।
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Saturday, December 27, 2008

भृतहरि संदेश:इस विश्व में सभी का लोगों स्वभाव एक जैसा नहीं होता

विरहेऽपि संगमः खलु परस्परं संगतं मनो येषाम्
हृदयमपि विघट्टितं चेत्संगी विरहं विशेषयति


हिंदी में भावार्थ-जिनके व्यक्तियों हृदय आपस मिले हों वह दैहिक रूप से एक दूसरे से परे होते हुए भी अपने को साथ अनुभव करते हैं। जिनसे हार्दिक प्रेम न हो तो वह कितने भी पास हो उनसे एक प्रकार से दूर बनी रहती है।

वैराग्ये सञ्चरत्येको नीतौ भ्रमति चापरः
श्रंृगाारे रमते कश्चिद् भुवि भेदाः परस्परम्


हिंदी में भावार्थ-इस विश्व में सभी व्यक्तियों का स्वभाव ऐक जैसा नहीं होता। सभी के हृदय में व्याप्त रुचियों भिन्न होती हैं। कोई वैराग्य धारण कर मोक्ष के लिये कार्य करता है तो कोई नीति शास्त्र के अनुसार अपने कार्य कर संतुष्ट होता है तो कोई श्रंृगार रस में आनंद मग्न है। यह भेद तो प्राकृतिक रूप से बना ही है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- वर्तमान समय में विकास का ऐसा पहिया घूमा है कि आत्मीय लोग अपने से दूर हो जाते हैं। अधिक धन और विकास की लालसा मनुष्य को अपनों से दूर जाने का बाध्य करती है पर इसे विरह नहीं मानना चाहिये। हालांकि अनेक शायर और गीतकार इसे विरह मानते हुए कवितायें, शायरी और गीत लिखते हैं पर उनको हृदय में धारण नहीं करना चाहिये। ऐसी रचनायें अध्यात्म ज्ञान से परे होती हैं। खासतौर से फिल्मों में काल्पनिक दृश्य गढ़कर ऐसे गीत रचे जाते हैं। एक देश से दूसरे देश पात्र भेजकर ‘चिट्ठी आई है’जैसे गीत लिखे जाते हैं जिसे सुनकर लोग भावुक हो जाते हैं। यह अज्ञान है। मनुष्य की पहचान उसके मन से है और अगर किसी के मन में बसे हैं और वह हमारे मन में बसा है तो उसे कभी दूर नहीं समझना चाहिये। ऐसे गीतों को सुनकर भूल जाना चाहिये। अरे जो मन में बसा है वह भला कभी दूर जा सकता है। विरह गीत रखने वाले दैहिक तत्व तक का सीमित ज्ञान रखते हैं और संगीत की धुनों से उनको लोकप्रियता मिलती है। अध्यात्म ज्ञान रखने वाले भी उनको सुनते हैं पर फिर भूल जाते हैं पर जिनको नहीं है वह भले ही कोई अपना दूर न हुआ हो फिर भी ऐसे गीतों को गुनगनाते हैं।
जीवन में विभिन्न अवसरों पर भिन्न प्रकार के लोगों से हमारा वास्ता पड़ता है। इनके कई तो अच्छा व्यवहार करते हैं और कई बुरा। जब कोई अच्छा व्यवहार करता है तो मन प्रसन्न होना स्वाभाविक है पर अगर कोई व्यक्ति बुरा बर्ताव करता है तो उस दुःखी नहीं होना चाहिए क्योंकि यह मानकर चलना चाहिये कि हर कोई व्यक्ति अपने मूल स्वभाव क अनुसार व्यवहार करता है। कई ऐसे लोग होते हैं जिनको दूसरे का दिल दुखाने में मजा आता है ऐसे लोगों से संपर्क रखना ठीक नहीं पर अगर कहीं धोखे में सामने आकर वह अपनी बदतमीजी दिखायें तो उसकी उपेक्षा करना ही ठीक है।
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