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Thursday, June 26, 2014

ज्ञान धारण करने के लिये योगाभ्यास करें-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(gyan dharan karne ke liye yogabhyas karen-A hindu hindi relgion thought based on chankya policy)



                 हमारे देश में संत परंपरा हमेशा रही है इसी कारण भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की धारा अनवरत बहती आयी है। यह अलग बात है कि इस पवित्र धारा में हाथ धोने का काम पेशेवर धार्मिक ठेकेदारों ने हमेशा ही उठाया है। स्थिति यह रही है कि समाज की धर्मभीरुता को भ्रम धारा में बदलने का काम इन इन ठेकेदारों ने किया है।  ऐसे लोग प्राचीन धार्मिक ग्रंथों के मनमोहक संदेश सुनाकर लोगों में अपनी धार्मिक गुरु की छवि बनाते हैं।  हम देख रहे हैं समाज में एक से एक प्रसिद्ध धार्मिक गुरु लोगों का मार्गदर्शन कर रहे हैं।  उन्होंने बड़े बड़े विशाल सर्वसुविधाजनक वातानुकूलित आश्रम बना लिये हैं जहां उनके शिष्य उन्हें घेरे रहते हैं। जगह जगह सत्संग और समागम होते हैं। श्रीमद्भागवत कथा के लिये श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा होती है उस दृष्टि से हमारे देश का वातावरण स्वर्गमय होना चाहिये पर जब विषाक्त स्थितियों को देखते हैं तो भारी निराशा होती है। इसका कारण यह है कि लोग धार्मिक सत्संगों को भी मनोंरजन की दृष्टि से देखते हैं।  जिस तरह किसी धारावाहिक या फिल्म को देखते हुए लोग मनस्थिति में परिवर्तन का बोध करने के बाद अपनी दुनियां में खो जाते हैं वैसे ही सत्संग या समागम में शामिल होने के बावजूद अपने मन, विचार और व्यवहार में शुद्धता लाने का प्रयास नहीं करते।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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धर्माऽख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्।
सा सर्वदैव तिष्ठेयत् को न मुच्येत बन्धनात्।।
               हिन्दी में भावार्थ-धर्म के विषय पर व्याख्यान सुनते, श्मशान में किसी के दाहसंस्कार में शामिल होने तथा किसी रोगी को छटपटाते देखकर किसी भी व्यक्ति के अंदर संसार के विषयों के प्रति वैराग्य का भाव पैदा होता है पर वहां से हटते ही वह फिर बंधन में फंस जाता है।
             इसका कारण यह है कि लोग मन, विचार, और देह पर पूरा नियंत्रण नहीं है।  वह वातावरण, संगत, खान पान तथा कर्म से प्रभावित होकर यंत्रवत जीवन जीते हैं। अनियंत्रित देह में चंचल मन उनके अंदर हमेशा ही तनाव पैदा किये रहता है। प्रेम, अहिंसा, सत्य और धर्म का उपदेश देने वाले बहुत हैं पर अंदर कैसे स्थापित हों यह कला केवल योग सिद्धों को ही आती है।
              श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि योग साधक त्रिगुणमयी माया को लांघ जाते हैं।  इसका आशय यह है कि योगाभ्यास से जीवन पर सहजता से नियंत्रण हो जाता हैं। सत्व, राजस तथा तामस गुण की पहचान होने पर मनुष्य आत्मचिंत्तन करता है।  ऐसा नहीं है वह इन तीन गुणों से मुक्त होता है पर पहचान होने की वजह से वह जल्द ही स्वयं को नियंत्रित कर लेता है।  उसकी यंत्रवत् योग बुंद्धि स्वतः ही सहज भाव पर चलने लगती है।  उसे कोई उपदेश मिले या न मिले वह धर्म पथ पर स्वयमेव चलने लगता है।  उसे मिला या दिया गया कोई ज्ञान एक कान से निकलकर दूसरे से बाहर नहीं जाता। जिन लोगों को अपने ज्ञान को अक्षुण्ण बनाकर सहजता जीवन जीना है उन्हें नियमित रूप से योगाभ्यास अवश्य करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Friday, June 13, 2014

चित्त और आत्मा के भेद को समझना जरूरी-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिन्तन लेख (chitta aur atma ke bhed ko samajhana jaroori-A hindu hindi relgion thought based on patanjali yog literature)



            स संसार में सारा खेल संकल्प का है।  संकल्प वह विचार हैं जो हम अपने चित्त में धारण करते हैं।  जब चित्त प्रसन्न हो तो सारा संसार सुखमय लगता है और अगर तनाव हो तो अपने चारों तरफ नरक व्याप्त लगता है। इस चित्त पर नियंत्रण की कला को योग कहा जाता है। हम जब अपने चित्त पर नियंत्रण कर लेते हैं तब जीवन के प्रति आत्मविश्वास पैदा होता है। भटकते हुआ चित्त हमें इतना कुंठित कर देता है कि हम कोई भी काम ठीक से नहीं कर सकते।  इसलिये कहा जाता है कि जिसने चित्त पर नियंत्रण कर लिया उसने संसार जीत लिया।

पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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द्रष्टृदृश्यघोपरक्तं चितं सर्वार्थम्

           
हिन्दी में भावार्थ- द्रष्टा और दृश्य-इन दो रंगों से रंगा चित्त सभी अर्थवाला हो जाता है।
तदंसख्येयवासनाभिश्चिन्नमपि परार्थ संहृत्यकारित्वात।

           
हिन्दी में भावार्थ-वह चित्त असंख्येय वासनाओं से चित्रित होने पर भी दूसरे के लिए है क्योंकि वह सहकारिता के भाव से काम करने वाला है।
विशेषंषर्शिन आत्मभावभावनविनिवृत्तिः।।

           
हिन्दी में भावार्थ-चित्त और आत्मा के भेद को  प्रत्यक्ष करने वाले योगी की आत्मा सांसरिक विषयों के पार्टी  भावना से सर्वथा निवृत्त हो जाता  है।
तदा विवेनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्।

           
हिन्दी में भावार्थ-उस समय चित्त विवेक की तरफ झुककर कैवल्य के अभिमुख हो जाता है।
तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्राणि संसकारेभ्यः।

           
हिन्दी में भावार्थ-उसके अंतराल में दूसरे पदार्थों का ज्ञान पूर्वसंस्कारों से होता है।

      महर्षि पतंजलि का योग सूत्र संस्कृत में है और उसके हिन्दी अनुवाद का अर्थ इतना किल्ष्ट होता है कि सीधी भाषा में बहुत कम विद्वान उसकी व्याख्या कर पाते हैं। हम यहां सीधी सादी भाषा में कहें तो हमारा चित्त या बुद्धि इस देह के कारण है और उसे आत्मा समझना अज्ञान का प्रमाण है। हमारे मन और बुद्धि में विचारों का क्रम आता जाता है जो केवल सांसरिक विषयों से संबंधित होता है। अध्यात्मिक विषयों के लिये हमें अपने अंदर संकल्प धारण करना पड़ता है और जब हम आत्मा और मन का अंतर समझ लेंगे तो दृष्टा की तरह जीने का आनंद ले  पायेंगे।
      एक तो संसार का दृश्य है और दूसरा वह दृष्टा आत्मा है जिसके बीच में यह देह स्थित है। पंच तत्वों से बनी इस देह की मन, बुद्धि तथा अहंकार की प्रकृतियों को अहंता, ममता और वासना की भावनायें बांधे रहती हैं। हम दृष्टा हैं पर कर्तापन का अहंकार कभी यह बात समझने नहीं देता। तत्वज्ञान के अभाव मनुष्य को दूसरा चतुर मायावी मनुष्य चाहे जब जहां हांक कर ले जाता है। इस संसार दो प्रकार के मनुष्य है एक वह जो शासक हैं दूसरे जो शासित हैं। निश्चित रूप से शासक चतुर मायावी मनुष्यों की संख्या कम और शासित होने वाले लोगों की संख्या अधिक है पर अगर तत्वज्ञान को जो समझ लें तो वह न तो शासक बनता है न शासित। योगी बनकर अपना जीवन आंनद से व्यतीत करता है।
      एक बात दूसरी यह भी है इस विश्व में मनुष्य मन के चलने के दो ही मार्ग हैं-सहज योग और असहज योग। योग तो हर मनुष्य कर रहा है पर जो बिना ज्ञान के चलते हैं वह सांसरिक विषयों में चक्कर में अपना जीवन तबाह कर लेते हैं और जो ज्ञानी हैं वह उसे संवारते रहते हुए सुख अनुभव करते हैं। अतः आत्मा और चित्त का भेद समझना जरूरी है।
      दूसरी बात हम समाधि या ध्यान के विषय में यह भी समझ लें कि जब हम उसमें लीन होने का प्रयास करते हैं तब हमारे अंदर विषयों का घेर आने लगता है। उनसे विचलित नहीं होना चाहिए क्योंकि यह उन विषयों से उत्पन्न विकार हैं जो उस समय भस्म होने आते हैं। जब वह पूरी तरह से भस्म होते हैं तब ध्यान आसानी से लग जाता है। ध्यान से जो मन को शांति मिलती है उससे बुद्धि में तीक्ष्णता आती है और प्रसन्न हो जाता है।
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Thursday, June 05, 2014

दौलत का घमंड आदमी को भ्रष्ट कर देता है-विदुर नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(dualat ka ghamand admi ko bhrasht kar deta hai-A hindi hindu religion thought based on vidur neeti)



      भारत में जैसे जैसे विकास बढ़ रहा है वैसे ही अपराध, दुर्घटनायें तथा आत्महत्या के प्रकरण भी बढ़ रहे हैं।  पहले हम पश्चिम में जिस प्रकार की दुर्घटनाओं के समाचार देखकर उंगलियां दबाते थे उसी प्रकार अब अपने देश में होने पर परेशान होते हैं।  एक बात निश्चित है कि जितना भौतिक विकास होता है उतना ही आदमी अध्यत्मिक ज्ञान से परे हो जाता है।  उसी दैहिक तथा मानसिक इंद्रियां बाहरी दृश्यों पर अधिक केंद्रित हो जाती हैं जिससे आत्म चिंत्तन तथा मनन की प्रक्रिया से वह दूर हो जाता है। तीव्रगति में मति मंद तथा विलासिता से कुंठित होती है यह हम देश के वर्तमान परिदृश्य से समझ सकते हैं।

विदुर नीति में कहा गया है कि
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धर्मार्थोश्यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानगुः।
श्रीप्राणधनदारेभ्यः क्षिप्र स परिहीयते।।

           
हिन्दी में भावार्थ- जो मनुष्य धर्म और अर्थ इंद्रियों के वश में हो जाता है वह शीघ्र ही अपने ऐश्वर्य, प्राण, धन, स्त्री को अपने हाथ से गंवा बैठता है।
अर्थानामीश्वरो यः स्यादिन्द्रियाणमीनश्वरः।
इन्द्रियाणामनैश्वर्यर्दिश्वर्याद भ्रश्यते हि सः।।

     हिन्दी में भावार्थ-अधिक धन का स्वामी होने भी इंद्रियों पर अधिकार करने की बजाय उसके वश में हो जाने वाला भी मनुष्य ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है।

      अनेक लोगों को यह लगता है कि अगर अधिक धन आ गया तो जैसे सारा संसार जीत लिया। इस भ्रम में अनेक लोग धन के कारण अनुशासहीनता पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि शीघ्र ही न केवल अपना वैभव गंवाते हैं बल्कि कहीं कहीं उनको शारीरिक हानि भी झेलनी पड़ती हैं। जीवन में दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन का होना जरूरी है। अधिक धन है तो भी समाज में सम्मान प्राप्त होता है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि अनुशासनहीनता बरती जाये। ऐसे ढेर सारे उदाहरण है जिसमें अनेक धनपतियों की औलादें मदांध होकर ऐसे अपराधिक कार्य इस आशय से करती हैं कि उनके पालक धन से कानून खरीद लेंगे। ऐसा होता भी है पर उसकी एक सीमा होती है जहां उसका अतिक्रमण होता है वहां फिर सींखचों के अंदर भी जाना पड़ता है। इस समय ऐसा दौर भी है जिसमें धनपति स्वयं और उनकी औलादें समाज में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिये अनुशासन हीनता दिखाते हैं। धन उनकी आंखों बंद कर देता है और उनको यह ज्ञान नहीं रहता कि आजकल प्रचार माध्यम सशक्त हो गये हैं जिनकी वजह से हर समाचार बहुत जल्दी ही लोगों तक पहुंचता है। भले ही यह प्रचार माध्यम भी धनपतियों के हैं पर उनको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये सनसनीखेज खबरों की आवश्यकता होती है और ऐसे में किसी धनी, प्रतिष्ठित या बाहुबली द्वारा किसी प्रकार के अपराध की जानकारी मिलने पर उसे जोरदार ढंग से प्रसारित भी करते हैं।
      कहने का तात्पर्य यह है कि अब वह समय चला गया जब धन और वैभव का प्रदर्शन करने के लिये अनुशासनहीनता बरतना आवश्यक लगता था।  आदमी के पास चाहे कितना भी धन हो उसे जीवन में अनुशासन अवश्य रखना चाहिये। याद रहे धन की असीमित शक्ति है पर देह की सीमायें हैं और किसी प्रकार की अनुशासनहीनता का दुष्परिणाम उसे ही भोगना पड़ता है।

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Saturday, May 31, 2014

लकड़ी और पत्थर में परमात्मा का निवास नहीं होता-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन पर लेख(lakdi aur patthar mein parmatma ka niwas nahin hota-A hindi religion thought based on chankya policy)



      हमारे देश में साकार तथा निरंकार दोनों प्रकार की भक्ति को मान्यता प्रदान की जाती है। यहां तक कि अनेक अध्यात्मिक विद्वान यह भी मानते हैं कि चाहे मूर्ति पूजा करें या नहीं पर परमात्मा के प्रति सहज भाव से की गयी भक्ति अध्यात्मिक शुद्धता प्रदान करती है। यही अध्यात्मिक शुद्धता जीवन में शांति के साथ ही अपनी समस्याओं का हल करने की शक्ति प्रदान करती है। यह अलग बात है कि साकार भक्ति की आड़ में हमारे यहां अनेक प्रकार के सिद्ध मंदिर बताकर वहां लोगों को पर्यटन के लिये प्रेरित करने का प्रयास किया जाता है। प्राचीन धर्मग्रंथों की कथाओं में वर्णित महापुरुषों से संबंद्ध स्थानों को पवित्र मानकर वहां अनेक प्रकार के कर्मकांडों की परंपरायें विकसित की गयी हैं।  इनसे धर्म के व्यापारियों के वारे न्यारे होते हैं।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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काष्ठापाषाणधातूनां कृत्वा भावेन सेवनम्।
श्रद्धया च तया सिद्धस्तब्ध विष्णुः प्रसीदति।।
     हिन्दी में भावार्थ-लकड़ी, पत्थर एवं धातु की बनी मूर्तियों भावना पूर्वक सेवा करनी चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु अपनी कृपा का प्रसाद प्रदान करते हैं।
न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृन्मये।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद् भावी हि कारणम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-देव लकड़ी में विद्यमान नहीं है न ही पत्थर में विराजमान है न ही मिट्टी का प्रतिमा उसके रूप का प्रमाण है। निश्चय ही परमात्मा वहीं विराजमान है जहां हार्दिक भावना से भक्ति की जाती है।

      देखा जाये तो दिन का विभाजन प्रातः धर्म, दोपहर अर्थ, सांय मनोरंजन तथा रात्रि मोक्ष यानि निद्रा के लिये होता है। देखा यह जा रहा है कि कथित तीर्थों पर लोग जाकर एक तरह से पर्यटन करने जाते हैं। वहां स्थित धार्मिक ठेकेदार दान के नाम पर कर्मकांड कराकर उनका आर्थिक शोषण करते हैं। अज्ञान के अभाव के स्वर्ग की चाहत में लोग इन कर्मकांडों में व्यय कर अपने घर लौटकर आते हैं।  इससे न तो उनके मन की शुद्ध होती है न विचार पवित्र रहते हैं इसलिये उनका जीवन फिर पुराने ढर्रे पर चलता है जिसमें बीमारी, तनाव और अशांति के अलावा कुछ नहीं रह जाता।
      जिन लोगों को अपना जीवन सहजता और शांति के साथ बिताना है उन्हें प्रातकाल के समय का उपयोग योग साधना तथा उद्यानों के भ्रमण में बिताना चाहिये।  समय मिले तो मूर्तियों की पूजा करना चाहिये पर सच यह है कि पत्थर, लोहे, पीतल या मिट्टी की बनी प्रतिमाओं में परमात्मा नहीं होते वरन् हमारे अंदर के भाव से उनमें आभास रहता है।  इस भाव का आनंद तभी लिया जा सकता है जब अपना हृदय शुद्ध हो।

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Wednesday, May 14, 2014

हृदय में पवित्रता न हो तो सत्संग में जाने से भी लाभ नहीं-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेखhridya mein pavitrata na ho to satsang mein jaane se labh nahin- A Hindi religion thought basedrahim darshan)



                      हमारे देश में धर्म पर व्याख्यान करना भी एक तरह से पेशा रहा है। यह अलग बात है कि कथित धर्म प्रचारक कभी प्रत्यक्ष रूप से अपने परिश्रम का प्रतिफल शुल्क या मूल्य के रूप में नहीं लेते देखे गये  पर दान दक्षिणा के नाम पर उन्हें इतना मिल जाता है कि वह अपना घर चला ही लेते हैं। अब तो यह देखा जा रहा है कि धार्मिक संगठनों के प्रमुख किसी पूंजीपति  से कम नहीं रह गये।  दवा, कपड़े, खानेपीने का सामान तथा पूजा सामग्री बेचने के अलावा अनेक धार्मिक संगठन तीर्थयात्राओं का भी इंतजाम करने लगे हैं। अनेक धार्मिक प्रमुखों के आश्रम राजमहल की तरह हैं तो उनके शिष्यों के आवास भी होटल से कम नहीं होते।
                      हम जिस धर्म को आचरण में लाने पर प्रमाणिक मानते हैं वही वस्तुओं के विक्रय तथा अनेक सेवाओं के लिये एक विज्ञापन की छाप बन गया है। एक तरह से बाज़ार स्वामियों  का एक बहुत बड़ा भाग धर्म की आड़ लेकर व्यापार कर रहा है। यही कारण है कि ऐसा लगता है जैसे हमारा पूरा देश ही धर्ममय हो रहा है पर इधर यह भी दिखाई देता है कि समाज में  नैतिक आचरण भी निरंतर पतन की तरफ जा रहा है। आर्थिक विकास दृष्टि से हम जहां आगे जा रहा है वहीं मानसिक रूप से हमारा समाज पिछड़ रहा है।

कविवर रहीम कहते हैं कि
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रहिमन जो तुम कहत थे, संगति ही गुन होय।
बीच उखारी रसभरा, रस काहै न होय।।
                   सरल हिन्दी में व्याख्या-यह कहना गलत है कि सत्संग का असर मनुष्य पर सदैव अच्छा होता है।  ईख के खेत में उगन वाला रसभरा पौध कभी रस से नहीं होता है।
                      कहने का अभिप्राय यह है कि हम भौतिक विषयों पर किसी एक सूत्र के आधार पर निर्णय नहीं कर सकते क्योंकि मनुष्य देह जहां प्रत्यक्ष दिखती है वहीं उसमें बैठा मन कभी दिखाई नहीं देता जो कि बंदर की तरह नाचता और नचाता है। मनुष्य मन को धर्म के नाम पर सहजता से भरमाया जा सकता है। वह कब किसी तरह गुलाटी मारेगा इसका कोई तयशुदा सूत्र नहीं है। यही कारण है कि जहां हमारे देश के ऋषि मुनि समाज को हमेशा ही अन्धविश्वास  से दूर रहने की प्रेरणा देते रहे हैं वहीं चालाक लोगों का एक वर्ग कर्मकांडों से समाज को स्वर्ग दिलाने की आड़ में भ्रमित करता रहा है।  आधुनिक समय में पैसे का खेल इस कदर हो गया है कि अनेक प्रकार के आकर्षक धार्मिक स्थान बन गये हैं जो जहां लोग श्रद्धा से कम पर्यटन करने अधिक जाते हैं।  अनेक पर्यटन स्थल तो सर्वशक्तिमान की दरबारों की वजह से ही प्रसिद्ध हैं। वहां भारी भीड़ जुटती है। करोड़ों का चढ़ावा आता है।  आने वाले सभी लोगों को श्रद्धालू और दानी माने तो हमारा पूरा समाज देवत्व का प्रमाण माना जाना चाहिये पर ऐसा है नहीं। देश में व्याप्त भ्रष्टाचारशोषण, महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, नशेबाजी और सट्टेबाजी को देखें तब लगता है कि यहां असुरों की संख्या भी कम नहीं है।
                      कहने का अभिप्राय यह है कि कथित रूप से धर्म की संगत करने का कोई लाभ तब तक नहीं होता जब तक अपनी नीयत साफ न हो। श्रद्धा के बिना सत्संग में जाने से मन में विचार स्वच्छ नहीं होते और इसके अभाव में मनुष्य का व्यवहार अच्छा नहीं होता।



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Friday, May 09, 2014

जीवन में संताप भोगने वाले ही आत्मप्रशंसा करते हैं-रहीम के आधार पर चिंत्तन लेख(jivan mein santap bhogne wale hi aatmprashasa karte hain-A hindi thought article on rahim darshan)



      आमतौर से आत्मप्रशंसा करने की प्रवृत्ति सभी इंसानों में स्वाभाविक रूप से  होती है पर जिन लोगों का व्यवहार असंतुलित तथा विचार संकीर्ण होते हैं उनके अंदर बिना कोई खास काम किये सम्मान पाने का मोह ज्यादा ही होता है।  अपने दुर्गुणों के कारण वह हमेशा संकट में रहते हैं पर दूसरों के सामने इस तरह प्रदर्शित करते हैं जैसे कि वह कोई विशिष्ट व्यक्तित्व के स्वामी हों।  यह अलग बात है कि एकांत में उनके चेहरे पर हवाईयां उड़ रही होती हैं।

कविवर रहीम कहते हैं कि
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ये रहीम फीके दुवौ, जानि महा संतापु।
ज्यों तिय कुच आपन गहे, आपु बड़ाई आपु।।
     हिन्दी में भावार्थ-यदि कोई व्यक्ति रूखा व्यवहार करे तो समझ लेना चाहिये कि वह अंदर किसी महा संताप का सामना कर रहा है। ऐसे लोग आत्मप्रवंचना करते हुए केवल अपनी बात ही कहते हैं।

      जिन लोगों के अंदर सद्गुणों का भंडार होता  है वह उसको दिखाने की बजाय उसका उपयोग करते हुए सभी से  न केवल अच्छे व्यवहार की नीति पर चलते हैं वरन् अपने विचारों को भी पवित्र रखते हैं। उनकी सांसरिक विषयों के साथ अध्यात्मिक ज्ञान में भी रुचि रहती है। जिन लोगों का संपूर्ण दिन सांसरिक विषयों में बीतता है उन पर केवल माया का प्रभाव रहता है।  अध्यात्मिक ज्ञान होने की बात तो दूर वह उसके श्रवण, अध्ययन और चिंत्तन से भी बचते हैं।  सच बात तो यह है कि बिना अध्यात्मिक ज्ञान के मन में शांति हो ही नहीं सकती इसलिये अज्ञानी लोग अपना तनाव दूसरों पर डालने का प्रयास करते हैं। अपने खालीपन को वह दूसरों के विषयों में दोष से भरना चाहते हैं।
      परनिंदा, ईर्ष्या, अहंकार तथा आत्मप्रवंचना से कभी किसी को प्रशंसा नहीं मिलती वरन् पीठ पीछे लोग मजाक बनाते हैं।  इसलिये जहां तक हो सके अपने अंदर अध्यात्मिक साधना की प्रक्रिया से ज्ञान का सृजन करना चाहिये।


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Tuesday, May 06, 2014

भोजन करते समय मन सदैव प्रसन्न रखें-मनस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(bhojan karte samaya man prasanna rakhen-A Hindu religion thought on manu smriti)



            मनुष्य भोजन, आवास तथा वस्त्र प्राप्त करने के बाद भी संग्रह करता है जबकि पशु पक्षी तथा अन्य जीव अपनी आवश्यकता पूरी होने पर शांत होकर विश्राम करते हैं। मनुष्य जहां के मन की भूख कभी शांत नहीं होती। इतना ही नहीं जब माया का प्रभाव उस पर बढ़ जाये तो वह भोजन तक आराम से नहीं करता।  कहा जाता है कि जब भोजन करें तो मन शांत रखें पर मनुष्य खुशी हो या दुःख अपने मन के भावों को भोजन के वक्त भी जाग्रत रखता है।  आमतौर से ज्ञान तािा योग साधक भोजन को औषधि की तरह ग्रहण करते हैं पर सामान्य मनुष्य भोजन के पेट भरने के साथ जीभ के स्वाद की तृप्ति भी करना चाहते हैं। आजकल तो जीभ के स्वाद के लिये ऐसे पदार्थों को उदरस्थ कर रहे हैं जो न केवल अपाचक हैं वरन् स्वास्थ के लिये हानिकारक भी होते हैं।

मनु स्मृति में कहा गया है कि
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पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सन्।
दृष्टया हृध्येत्प्रसींदेच्च प्रतिनदेच्य सर्वेशः।

     हिंदी में भावार्थ-थाली में सजकर जैसा भी भोजन प्राप्त हो उसे देखकर अपने मन में प्रसन्नता का भाव लाना चाहिये। ऐसा अच्छा भोजन हमेशा प्राप्त हो यह कामना हृदय में करना चाहिए।
अनारोगयमन्तयुरूयमस्वगर्यं चारिभोजनम्।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्त्परिर्जयेत्।।

     हिंदी में भावार्थ- भूख से अधिक भोजन करने से  देह के लिये अस्वास्थ्यकर है। इससे आयु कम होने के साथ ही पुण्य का भी नाश होता है। दूसरे लोग अधिक खाने वाले की निंदा करते या मजाक उड़ाते हैं।
     जब सामने थाली में भोजन आता है तो उसे देखकर हमारे मन में कोई न कोई भाव अवश्य आता है। सब्जी मनपंसद हो तो अच्छा लगता है और न हो तो निराशा घेर लेती है। भोजन पसंद का न होने पर परोसने वाला कोई बाहर का आदमी हो तो हम उससे कुछ नहीं कहते पर मन में उपजा वितृष्णा का भाव उस भोजन से मिलने वाले अमृत को विष तो बना ही देता है। घर का आदमी या पुरुष हो तो हम उसे डांटफटकार देते हैं और इससे उसी भोजन को विषप्रद बना देते हैं जो अमृत देने वाला होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मन के भावों से भोजन से मिलने वाली ऊर्जा का स्वरूप निर्धारित होता है।
     भोजन खाते समय केवल उसी पर ध्यान रखना चाहिये। न तो उस समय किसी से बात करना चाहिये और न ही मन में अन्य विचार लाना चाहिये। इससे भोजन सुपाच्य हो जाता है। चिकित्साविज्ञान ने अब इस बात की पुष्टि कर दी है कि भोजन करते समय तनाव रहित व्यक्ति विकार रहित भी हो जाते हैं।
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